वाल्टर ने बताया व्यक्ति के मूल्यांकन का सही तरीका
वह दोपहर का समय था। फिर भी उन्होंने पत्नी से कहा कि मुझे दीपक जलाकर दो, ताकि उसके प्रकाश में मैं कपड़ा अच्छी तरह से बुन सकूं। पत्नी ने बिना कोई तर्क किए दीपक जला दिया और चली गई। इस घटना से कबीर ने जिज्ञासु को समझाया - यदि गृहस्थ बनना है, तो परस्पर ऐसा दृढ़ विश्वास रखना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा हो। इसके बाद कबीर जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गए, जहां एक बुजुर्ग संत रहते थे।
क्रमश:...
वाल्टर हाइन्स येज ब्रिटेन के एक प्रसिद्ध अखबार के संपादक थे। वाल्टर सूक्ष्म
व पैनी दृष्टि रखते थे। वह अपने संवाददाताओं को भी काफी प्रशिक्षण देने के बाद
अखबार के कामों में लगाते थे। अत: उनका अखबार पत्रकारिता की सभी कसौटियों पर खरा
उतरता था।
संपादक होने के नाते वाल्टर को कई लेखकों की रचनाएं स्वीकृत या अस्वीकृत करनी
पड़ती थीं। जिनकी रचनाएं अस्वीकृत होतीं, उनकी नाराजगी भी वाल्टर को झेलनी पड़ती थी किंतु
उनके सटीक जवाब ऐसे लोगों को निरुत्तर कर देते थे। एक बार एक लेखिका की कहानियां
वाल्टर ने अस्वीकृत कर दीं। उसने चिढ़कर उन्हें एक पत्र में यह लिखा - पिछले
सप्ताह आपने मेरी कहानियां सखेद लौटा दीं।
मेरा दावा है कि आपने उन्हें पढ़ा ही नहीं। मेरा पूर्वानुमान था कि आप जैसे
संपादक अपने काम में ईमानदारी नहीं बरतते। इसी की जांच के लिए मैंने अपनी कहानियों
के बीच के पृष्ठों को चिपका दिया था और जब ये वापस आईं तो वे पृष्ठ वैसे ही थे। यह
आपकी अयोग्यता नहीं तो और क्या है? वाल्टर ने उत्तर में लिखा - मैडम! आपका ज्ञान अभी कच्च है।
हांडी के चावल पके या नहीं, यह जानने के लिए मात्र एक चावल देखा जाता है, पूरी हांडी को उलटकर
चावलों को देखने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार किसी के मूल्यांकन के लिए उसकी
वाणी का एक अंश या लेखन के चंद शब्द अथवा आचरण की एक झलक ही काफी होती है। अत: जब
भी कहीं बोलें या कुछ लिखें अथवा लोक-समाज में व्यवहार करें, तो पूर्ण आंतरिक व बाह्य
तैयारी के साथ करें।
व्यस्तता के बावजूद जरूरतमंद की मदद की पंडित नेहरू ने
पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े थे।
इस सिलसिले में उन्हें अनेक यात्राएं करनी पड़ती थीं। अधिक से अधिक लोगों को इस
आंदोलन से जोड़ने के लिए पं. नेहरू अनेक स्थानों पर जाते और अपने भाषणों में लोगों
से विनम्र अपील करते थे। उनके, गांधीजी व अन्य लोगों के प्रयासों से स्वतंत्रता प्राप्त
हुई। पं. नेहरू की लोकप्रियता के कारण स्वतंत्रता मिलने के बाद वे प्रधानमंत्री
बने।
पदासीन होने के बाद एक बार उनका कार्यक्रम अहमदनगर की एक सभा में भाषण देने के
बाद मलाया जाने का था। वे अहमदनगर पहुंचे और वहां उनके कार्यक्रम के दौरान ही
उन्हें एक मलाया निवासी के हाथ की लिखी एक चिट मिली। वह व्यक्ति भारत में आया था
और किसी कारणवश मलाया वापस नहीं जा सकता था।
उसने चिट में बड़ी विनम्रता से यह लिखा था - ‘मेरा पुत्र सख्त बीमार है। उसके
लिए एक खास दवा मलाया से मंगवानी है। यदि आप उसे वापसी में लाने का कष्ट करेंगे तो
मैं आपका बहुत आभारी रहूंगा।’ चिट में उसने अपना नाम तथा पता भी लिखा था।
मलाया में अनेकानेक कार्यक्रमों में दिन-रात व्यस्त रहने के बावजूद पं. नेहरू
ने दवा लाने की बात नहीं भुलाई। वापसी के समय वे दवा खरीदकर लाए और उसे उस व्यक्ति
के पास भिजवा दी। सार यह है कि ‘खास’ हो जाने के बावजूद हर ‘आम’ को सहयोग करने का स्वभाव संबंधित
की विनम्रता को दर्शाता है और यह अहंकार पर विजय का प्रतीक है।
लेखिका ने पुरस्कार से अधिक अपनी ममता को दी वरीयता
नॉर्वे की विख्यात लेखिका थीं सिग्रिड अनसेट। उनका लेखन अत्यंत उच्च स्तर का
था। नॉर्वे का साहित्य जगत उन्हें बड़े सम्मान की दृष्टि से देखता था। कोई भी
साहित्यिक आयोजन सिग्रिड की उपस्थिति अथवा चर्चा के बिना संपन्न नहीं होता था।
जैसा कि सभी का विश्वास था, सिग्रिड को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई।
खबर फैलते ही अनेक पत्रकार सिग्रिड के घर उनका साक्षात्कार लेने पहुंच गए।
चूंकि यह घोषणा रात को हुई थी, इसलिए पत्रकार भी देर रात को सिग्रिड के घर आए। सिग्रिड ने
उनका यथोचित सत्कार किया, किंतु उन्हें साक्षात्कार देने से मना कर दिया।
उन्होंने नम्रतापूर्वक कहा - ‘इतनी रात गए आप लोगों के आने की वजह मैं समझ सकती हूं,
क्योंकि अभी-अभी
मुझे नोबेल पुरस्कार दिए जाने की सूचना मिली है, किंतु खेद है कि मैं अभी आपसे
चर्चा करने की स्थिति में नहीं हूं।’ कारण पूछने पर वे बोलीं - ‘क्योंकि यह मेरे बच्चे के सोने
का समय है।
इस समय मैं उसे सुला रही हूं। पुरस्कार पाने की खुशी तो मुझे है, किंतु उससे भी अधिक खुशी
मुझे अपने बच्चे के साथ रहने और उसकी देखभाल में मिलती है।’ मां की ममता से अभिभूत सभी
पत्रकार सिग्रिड को नमन कर लौट गए। सार यह है कि बच्चों का बचपन स्नेह, दुलार व ममत्व से भरा हो
तो यह उनके समुचित विकास की दिशा में बड़ा सहायक होता है। इसलिए अपने सभी
महत्वपूर्ण कार्यो की अपेक्षा बच्चों की साज-संभाल को वरीयता देनी चाहिए।
जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किसान मित्र से दिखाई आत्मीयता
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपतिकाल पूर्ण होने पर वे पटना के सदाकत आश्रम
पहुंचे। उन्हें उस स्थान से अत्यधिक स्नेह था, क्योंकि एक युवा क्रांतिकारी के
रूप में वे वहां रह चुके थे। एक दिन उनका एक किसान मित्र किसी केस के सिलसिले में
पटना आया था। किसान ने सोचा कि अपने पुराने मित्र राजेंद्र से मिल लेते हैं।
देखें, पहचानता है या नहीं? वह सदाकत आश्रम पहुंचा और सिपाही से अंदर जाने के लिए
अनुमति मांगी। किसान से सिपाही ने प्रयोजन पूछा। किसान बोला - ‘बस, हमें राजेंद्र से मिलना
है’ सिपाही
ने कहा - ‘अभी नहीं मिल सकते। साहब आराम कर रहे हैं।’ किसान नाराज होते हुए बोला - ‘अरे भाई, हम लोग आंदोलन में साथ
थे, मिलने
दो।’ सिपाही
ने कहा - ‘जाओ-जाओ, सभी ऐसा ही कहते हैं।’
तभी राजेंद्र बाबू ने भीतर से किसान मित्र की आवाज पहचानकर उसे अंदर आने देने
को कहा। किसान अंदर पहुंचा और यह देखकर हैरान रह गया कि राजेंद्र बाबू बांस की
खटिया पर दरी डालकर लेटे हुए हैं। इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी राजेंद्र बाबू
का साधारण रहन-सहन देख किसान चकित रह गया।
राद्र बाबू उसका हाथ पकड़कर रुंआसे होकर कहने लगे - ‘हम अपने देश के लिए कुछ खास नहीं
कर पाए।’ किसान
ने जब उनके बड़े महत्वपूर्ण राष्ट्रहितकारी कार्यो की चर्चा की, तब भी वे खेद जताते रहे
कि हम कुछ नहीं कर पाए। वस्तुत: देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देकर भी
स्वयं को अकिंचन मानने की प्रवृत्ति सही मायनों में बड़प्पन का लक्षण है।
संकट के समय भी आजाद ने की स्त्री सम्मान की रक्षा
रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में चंद्रशेखर आजाद व अन्य क्रांतिकारी मातृभूमि
को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से धन एकत्रित करने प्रतापगढ़ पहुंचे। वे यहां के
एक सूदखोर महाजन के घर डाका डालने आए थे। ये क्रांतिकारी उन्हीं स्थानों पर डाका
डालते थे, जहां बेईमानी का पैसा एकत्रित कर रखा गया हो और यह महाजन ऐसे ही लोगों में से
एक था। निर्धनों को ये लोग कभी नहीं सताते थे।
जब आजाद आदि महाजन के घर में घुसे तो अंदर अधिकतर महिलाएं थीं और वे बड़ी
साहसी थीं। जब क्रांतिकारियों को डाका डालने की कोशिश करते देखा तो वे संघर्ष पर
उतर आईं। उनमें से एक महिला ने आजाद की बांह पकड़ लीं और उनकी पिस्तौल भी छीन ली।
आजाद ने उसे लौटाने की विनती की। इसी बीच हथियारों से लैस ग्रामीण
क्रांतिकारियों के विरुद्ध जुटने लगे। आजाद को छोड़ अन्य क्रांतिकारी भाग गए
क्योंकि उन पर ग्रामीण पत्थर बरसाने लगे। ग्रामीणों को डराने के लिए बिस्मिल ने दो
फायर किए और सभी को लेकर आगे निकल गए। जब आजाद को उन्होंने अपने साथ न पाया,
जो वापस लौटने का
विचार किया।
तभी आजाद आ गए। एक क्रांतिकारी ने उनसे कहा - क्या बलप्रयोग के जरिए उस महिला
से पिस्तौल छीन नहीं सकते थे? आजाद बोले -स्त्री पर हाथ उठाना नीति विरुद्ध है और कैसी भी
स्थिति में मैं यह नहीं कर सकता।वस्तुत: विपरीत स्थिति में भी नीतिपूर्ण आचरण समाज
का वातावरण पवित्र बनाए रखने के साथ-साथ संबंधित व्यक्ति को पतन से बचाकर आत्मिक
शांति प्रदान करता है।
हनुमानचालीसा हमारे अंदर नैतिक उत्तेजना भर देती है
वैसे तो हम जैसे भीतर से हैं, वैसे ही बाहर से भी होने चाहिए, लेकिन कभी-कभी गलत लोगों को आभास
कराना पड़ता है कि हम भी उनकी तरह आक्रामक हो सकते हैं।
फिर भी सावधान रहें, हमें अपनी भीतरी अच्छाई खोना नहीं है। आज जो नेतृत्व हमें
अपने चारों ओर दिखता है, उसमें दोहरा जीवन नजर आता है। कुछ समय पूर्व ऐसे लोग भी थे,
जिन्हें आदर्श
मानकर जीवन दिशा तय कर सकते थे। इस समय जो नेतृत्व की पायदान पर खड़े हैं, उनके पैर कीचड़ में सने
हैं, हाथों
से वे अपराध के पासे उछाल रहे हैं। मजेदार बात यह है कि उनकी यही छवि लोकप्रिय
होकर उन्हें हमारा कर्मधार बना रही है।
ऐसे में हमें कोई ऐसा व्यक्तित्व चाहिए जो खासतौर पर युवाओं का रोल मॉडल बन
सके। हनुमानजी को अब इस श्रेणी में रखना पड़ेगा। उनका संबंध किसी धर्म से न जोड़ा
जाए। वे ज्ञान, कर्म और उपासना द्वारा सफलता हासिल करने का आदर्श हैं। पाठ करने वाले समझ सकते
हैं कि श्री हनुमानचालीसा हमारे भीतर किस तरह नैतिक उत्तेजना भर देती है। उनके इसी
रूप से परिचय कराने के लिए महापाठ नाम का एक कार्यक्रम किया जाता है।
रामनवमी के दिन सायंकाल 7 से 8 बजे यदि आप थोड़ा भी चौकन्ने रहें, तो संसार के इस अद्भुत
व्यक्तित्व से परिचित हो सकेंगे। इस समय अपने व्यावसायिक जीवन में सफलता प्राप्त
करने वाले लोग चार बातों का नुकसान उठा रहे हैं- संबंध, समय, स्वास्थ्य और संतान।
असफल लोग तो घाटे में हैं ही, पर सफल लोग भी परेशानी में हैं। जो लोग आज रामनवमी पर
सायंकाल महापाठ से गुजरेंगे, वे संभवत: जान सकेंगे, सफल तो होना ही है, लेकिन हमारे संबंधों की
गरिमा बनी रहे। हम समय का दुरुपयोग न करें। स्वास्थ्य को बचाते हुए श्रेष्ठ संतानें
इस संसार में देना हमारा कर्तव्य है। हनुमानजी जैसे चरित्र किसी एक धर्म के लिए
नहीं है, ये
हर उस व्यक्ति के लिए हैं, जो अपने जीवन प्रबंधन को व्यवहार की जगह स्वभाव से चलाना
चाहता है। आज हनुमानजी के साथ यह कला भी सीखें।
नुकसान उठाकर भी भारतेंदुजी ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा
खड़ी बोली के विकास की पीठिका रचने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का भाषा के विकास
और सभी विधाओं को समृद्ध करने में अप्रतिम योगदान रहा है। भारतेंदु सत्यवादी थे।
एक बार एक महाजन ने उनके विरुद्ध तीन हजार रुपए का दावा ठोंक दिया, क्योंकि उन्होंने एक नाव
खरीदी थी और कुछ रुपए उधार लिए थे, जिन्हें वे लौटा नहीं पाए थे।
अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने भारतेंदुजी को अकेले में
बुलाकर पूछा कि नाव का वास्तविक मूल्य क्या था और असल में कितने रुपए उधार लिए थे?
भारतेंदु ने
उन्हें बताया कि दावे में लिखा मूल्य सही है और नकद राशि भी सही है। तब न्यायाधीश
ने उनसे कहा कि कुछ देर बाहर की ताजी हवा खाकर फिर बताओ, ताकि तत्काल फैसला हो सके।
भारतेंदु के मित्रों ने न्यायाधीश का संकेत समझकर उन्हें कुछ दे-दिलाकर मामले
से छुटकारा पाने की सलाह दी, किंतु उन्होंने अंदर जाकर पुन: वही कथन दोहरा दिया।
न्यायाधीश ने यह सोचकर कि नवयुवक उनका इशारा शायद नहीं समझा, फिर नाव का असली मूल्य
पूछा। तब भारतेंदु ने स्पष्ट कहा कि पैसों के लिए वे सत्य का त्याग नहीं करेंगे।
वे बोले -मैंने स्वेच्छा से रुक्का लिखा और रुपए लौटाने का वचन दिया था। मैं अपना
वचन भंग नहीं करूंगा।
आखिर न्यायाधीश ने महाजन के पक्ष में निर्णय सुनाया, जिसे भारतेंदु ने स्वीकार किया।
वस्तुत: सत्य का पालन ऐसे समाज की रचना करना है, जहां ईमानदारी व पारदर्शिता होती
है और तब नैतिकता सही मायनों में प्रतिफलित होती है।
मितव्ययी रहकर जरूरतमंदों की सहायता की प्रफुल्लचंद ने
शांतिस्वरूप भटनागर और मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों के गुरु
प्रफुल्लचंद राय अपने विचार और आचरण दोनों स्तरों पर अनुकरणीय व्यक्तित्व के
स्वामी थे। कई उदाहरणों से यह बात पुष्ट होती है। जैसे, वे समय का अपव्यय कभी नहीं करते
थे। धन के अपव्यय से भी उन्हें सख्त एतराज था। वे खादी के वस्त्र पहनते थे और
दूसरों से कभी अपना काम नहीं कराते थे। स्वयं अपने कपड़े धोते और जूतों पर पॉलिश
भी खुद ही करते। अपने आहार पर भी उनका कड़ा नियंत्रण था।
एक दिन एक छात्र, जो उनके भोजन की व्यवस्था करता था, डेढ़ आने के केले उनके लिए ले आया, जबकि प्रतिदिन मात्र दो
पैसे के केले आते थे। ताजे और सुस्वाद केले देखकर छात्र श्रद्धावश अपने शिक्षक के
लिए उस दिन कुछ अधिक खरीद लाया, किंतु प्रफुल्लचंद राय ने धन का ऐसा अपव्यय करने पर उसे
डांटा और भविष्य में ऐसा न करने का आदेश दिया। उसी दिन एक सामाजिक कार्यकर्ता ने
एक अनाथ व्यक्ति के लिए सहायता मांगी, तो डॉ. राय ने उसी छात्र को बुलवाकर पूछा कि बैंक
में उनका कितना धन है? छात्र ने उन्हें बताया कि 3500 रुपए जमा हैं।
डॉ. राय ने तीन हजार का चेक काटकर उस कार्यकर्ता को दे दिया। अपने व्यक्तिगत
जीवन में एक आने के लिए छात्र को डांटने वाले शिक्षक द्वारा जरूरतमंद को यह सहायता
देते देख छात्र श्रद्धावनत हो गया। वस्तुत: अपनी आवश्यकताओं को संतुलित रखकर
दूसरों की सहायता करने वाला स्वयं के लिए विश्वास का एक ठोस आधार बना देता है।
मां की आज्ञा मान बिस्मिल ने अपनी प्रतिज्ञा भंग की
एक बार रामप्रसाद बिस्मिल का किसी बात पर कुछ लोगों से विवाद हो गया। उन लोगों
ने बिस्मिल की हत्या करने का प्रयास किया, लेकिन वे बच गए। बिस्मिल इस बात को भूले नहीं थे। वे
उन लोगों से बदला लेना चाहते थे। एक-दो बार वे इसके लिए गए भी, किंतु सफलता नहीं मिली।
उनके मन में सदैव यह बात चुभती रहती थी, इस कारण वे बीमार पड़ गए। उन्हें बुखार रहने लगा।
बदले की नकारात्मक भावना ने उन्हें रोगी बना दिया और महीनों तक इलाज किए जाने
पर भी वे ठीक नहीं हुए। उनकी मां इस रोग का कारण समझ गई। उन्होंने बिस्मिल से इस
विषय में पूछा, तो उन्होंने जो सच था, बता दिया। मां समझ गई कि प्रतिशोध की प्रबल भावना ने रोग का
रूप ले लिया है। तब उन्होंने बिस्मिल को आज्ञा दी कि तुम प्रतिज्ञा करो कि उन
लोगों से बदला नहीं लोगे।
बिस्मिल ने आनाकानी की, तो मां बोली - इसे तुम मातृ ऋण समझ लो। इसे चुकाने के लिए
तुम्हें प्रतिज्ञा करनी ही होगी। क्या तुम इस ऋण को नहीं चुकाओगे? बिस्मिल ने कहा - मैं
बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूं। लेकिन मां अड़ गईं। चूंकि बिस्मिल सच्चे आर्य
समाजी थे, अत: मातृ ऋण से उऋण होना अपना धर्म मानते थे। आखिर उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा
भंग कर मां से वादा किया कि वे बदला नहीं लेंगे।
उसी दिन से उनका ज्वर कम होने लगा और कुछ ही दिनों में वे पूर्ण स्वस्थ हो गए।
वस्तुत: मां ईश्वर का प्रतिरूप होती है और उसके द्वारा दी जाने वाली शिक्षाएं सदा
सही मार्गदर्शन करती हैं। इसलिए हमेशा मां को सुनें, मां को गुनें और मां को अपने
संपूर्ण आचरण में उतारें।
जब शिष्यों की भारी भूल को गुरुजी ने क्षमा कर दिया
घटना महात्मा गांधी विज्ञान अन्वेषणशाला, अहमदाबाद की है। उस समय वहां के
प्रमुख विक्रम साराभाई थे। श्री साराभाई अपने छात्रों को पूर्ण लगन व निष्ठा से
पढ़ाते थे। छात्रों को जब भी अध्ययन विषयक कोई बाधा आती, तो साराभाई अपना काम-काज छोड़कर
उन्हें समय देते थे।
एक दिन दो छात्र प्रयोगशाला में कोई प्रयोग कर रहे थे। साराभाई उन्हें यथोचित
मार्गदर्शन दे चुके थे। इसके बावजूद उनकी किसी गलती के कारण अचानक भारी विद्युत
प्रवाह हो गया और एक यंत्र जल गया। बाजार में भी वह यंत्र उपलब्ध नहीं था। उसके
अभाव में अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग स्थगित करने पड़ते।
दोनों छात्र डर गए। इतनी देर में साराभाई आ गए। एक छात्र ने दूसरे से धीरे से
कहा - तुम उन्हें यह घटना बता दो, मुझे तो डर लग रहा है। दूसरे ने भी भय के कारण इंकार किया।
साराभाई ने काना-फूसी सुनकर माजरा पूछा तो छात्रों ने सच बता दिया। तब साराभाई न
तो क्रोधित हुए और न उनके चेहरे पर तनाव दिखाई दिया। वे सहजता से बोले- इतनी सी
बात थी।
तुम लोग चिंता मत करो। छात्र जब अध्ययन व प्रयोग करते हैं, तो ऐसी घटनाएं हो ही
जाती हैं। गलतियां नहीं होंगी, तो तुम सीखोगे कैसे? बस भविष्य में सावधानी रखना। यह
सुनकर छात्र उनके प्रति आदर से भर गए। दरअसल सीखना एक निरंतर प्रक्रिया है,
जो प्रयोग व
गलतियों से ही परिष्कार और पूर्णता को प्राप्त होती है। इसलिए सच्चे गुरु अपने
शिष्यों को गलती होने पर भी प्रोत्साहन देता है ताकि वे सुधार के मार्ग पर आगे
बढ़ते हुए इच्छित परिणाम पा सकें।
पैगंबर साहब के तर्क के आगे शराबी का कुतर्क हारा
पैगंबर हजरत मोहम्मद लोगों को सदाचरण की शिक्षा और सन्मार्ग पर चलने की सलाह
देते थे। दुगरुणों और व्यसनों से ग्रस्त लोगों को मोहम्मद साहब अत्यंत स्नेह से
समझाते और उन्हें पवित्र जीवन जीने का मार्ग दिखाते थे।
एक दिन वे अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे कि सामने से एक शराबी आ गया और
उनका रास्ता रोककर पूछने लगा - तुमने हमें शराब पीने से क्यों मना किया? मोहम्मद साहब बोले -
क्योंकि यह एक बुरा काम है। शराबी कहने लगा - अच्छा यह बताओ कि क्या ज्वार,
मक्का खाना हराम
है? मोहम्मद
साहब ने कहा नहीं।
शराबी ने प्रश्न किया - जब इन्हें खाना-पीना हराम नहीं है तो इन्हें मिलाकर
बनाई गई शराब पीना क्यों हराम है? मोहम्मद साहब बोले - यदि एक मुट्ठी मिट्टी तुम्हें मारूं तो
चोट लगेगी? शराबी ने कहा - नहीं।
मोहम्मद साहब बोले - यदि मैं एक गिलास पानी तुम्हें फेंककर मारूं तो तुम्हें
चोट लगेगी? शराबी ने इंकार किया। तब वे बोले - यदि इन चीजों को पकाकर उसकी ईंट बनाएं और
उससे तुम्हें मारें, तब तो तुम्हें चोट लगेगी। शराबी ने हां में सिर हिलाया।
जब चाकू सौंपने के उपरांत मिला मां का आशीर्वाद
मोहम्मद साहब का तर्क था - बस उसी तरह शराब पीने से इंसान को हानि होती है।
शराबी ने उस दिन से शराब पीना छोड़ दिया। वस्तुत: कुतर्क सदैव आत्मघाती होता है।
इसलिए यदि उम्र या ज्ञान अथवा अनुभव में हमसे बड़ा व्यक्ति कोई सलाह दे तो उसे
ध्यान से सुनकर उस पर सम्यक विचार कर उचित निर्णय लेना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद अमेरिका जाने वाले थे। जाने से पूर्व अपनी मां शारदा देवी से
आशीर्वाद लेने गए, क्योंकि वे मां को अत्यधिक सम्मान देते थे। उन्होंने मां के पास जाकर कहा -
मां मैं अमेरिका जा रहा हूं। मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए।
यह कहकर उन्होंने मां के चरणों में शीश नवाया, किंतु मां ने आशीर्वाद न देते
हुए चुप्पी साध ली। स्वामीजी ने फिर अपनी बात दोहराते हुए मां से आशीर्वाद मांगा,
किंतु मां मौन ही
रहीं। फिर काफी देर बाद मां ने स्वामीजी से कमरे के आले में रखा चाकू लाने को कहा।
स्वामीजी ने चाकू लाकर दे दिया, किंतु आशीर्वाद से चाकू का क्या संबंध है, यह वे नहीं समझ पाए। इधर
मां ने चाकू पाते ही आशीर्वाद की झड़ी लगा दी। स्वामीजी ने चकित होकर उसका कारण
पूछा, तो
मां बोली - बेटा! जब मैंने तुमसे चाकू मांगा, तो तुम चाकू की नोंक अपने हाथ
में पकड़े रहे और मुझे दूसरी ओर से चाकू थमाया। इससे मैं समझ गई कि तुम सारी
बुराइयों को अपने पास रखकर लोगों की भलाई करोगे।
स्वयं चाहे विष ले लोगे, किंतु लोगों में अमृत ही बांटोगे। इसलिए मैं तुम्हें आत्मा
से आशीर्वाद दे रही हूं। यह सुनकर स्वामीजी ने कहा - किंतु मैंने यह सब नहीं सोचा
था। मैं चाकू की नोंक इसलिए पकड़े रहा, ताकि आपको चोट न लगे।
तब मां और अधिक प्रसन्न होकर बोली - यह तो और भी अच्छा है। तुम्हारे तो स्वभाव
में ही भलाई है। तुम किसी का बुरा कभी नहीं करोगे। जाओ, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।
यह सर्वविदित है कि स्वामी विवेकानंदजी का संपूर्ण जीवन दूसरों की भलाई में ही
बीता।
शिखर पर खड़े रहने के लिए लोहे के पैर होना जरूरी है
आदमी जब जमकर काम करने पर उतारू हो जाता है और सफलता हर हालत में हासिल करना
है, इस
विचार के साथ सही-गलत का चिंतन छोड़ देता है, तो उसकी प्रतिस्पर्धा में नफरत,
छल, ईष्र्या, जलन आ जाती है और यहीं
से प्रतिस्पर्धा प्रतिद्वंद्विता में बदल जाती है।
अपने कार्यस्थल पर काम करते हुए हम लगातार चीजों को खोजते हैं, जैसे- हानि-लाभ के
आंकड़ों में गलतियां, अच्छे काम करने वाले की खोज, अपने लिए अनुकूल स्थान को ढूंढ़ना, लेकिन ये सब बाहर ही बाहर होता
है और ऐसा करना जरूरी भी है। इसी के साथ कुछ समय योग किया जाना चाहिए। योग-यात्रा
ही उल्टी चलती है। जब हम बाहर सक्रिय होते हैं, तो योग से जुड़कर भीतर की ओर
गतिशील होने लगते हैं।
२४ घंटे में कुछ समय एक प्रयोग कीजिए- आंखें बंद करें और अपने शरीर को देखें।
इस अंतर को पकड़ें कि शरीर अलग है और देखने वाला मैं अलग हूं। फिर अगले चरण में
अपनी कुछ इंद्रियों को देखें, जैसे- आंख, नाक, कान। इनमें भी इंद्रियों और देखने वाले का भेद पैदा करें।
तीसरे चरण में हमें अपनी श्वास पर नजर रखना होगी। हम समझ सकेंगे कि सांस लेना
अलग है और हम देखने वाले उससे अलग हैं। चौथे चरण में इसी प्रकार मन को देखें। वहां
देखते ही विचार, व्यक्ति, घटनाएं दिखेंगी।
यहां भी महसूस करें कि हम दर्शक हैं और मन तथा उसकी गतिविधियां अलग हैं। फिर
और थोड़ा आगे बढ़ें। शरीर, इंद्रियां, सांस और मन इनको देखते-देखते जैसे ही गहरे उतरेंगे हमें
महसूस होगा कि अब तक ये सब अलग थे और हम अलग थे, लेकिन अब कुछ ऐसा महसूस होने
लगेगा कि हम अलग नहीं रह पा रहे।
कुछ गहरे तल पर ऐसा है, जहां हम ही हैं। किसी ने उसको आत्मा, किसी ने चेतना, किसी ने अपना होना और
किसी ने इसे होश कहा है। जैसे ही हम इस स्थिति में आते हैं, भले ही थोड़ी देर के लिए आएं,
स्वयं को शांत
पाएंगे।
बाहर हम जब अपनी श्रेष्ठता के शिखर पर होंगे, तो हमें भी लगेगा तथा लोग भी
स्वीकार करेंगे कि शिखर पर खड़े रहने के लिए हमने पैरों में मोजे तो मखमल के पहने
हैं, लेकिन
पैर हमारे लोहे के हैं और हमें कोई डिगा नहीं पाएगा।
माली की बात मानकर बालक ने फिर गलती नहीं करने की ठानी
एक बालक अभी पूरे दो साल का भी नहीं हुआ था कि उसके पिता का देहावसान हो गया।
ऐसी कठिन परिस्थिति में उसकी मां उसे लेकर अपने मायके में रहने लगी। सभी उसे नन्हा
कहकर पुकारते थे। छोटे-से कद का यह बालक शारीरिक रूप से दुर्बल था, किंतु मानसिक रूप से
अत्यंत मेधावी। उसे जो भी कुछ कहता या सिखाता, वह बड़े मनोयोग से उसे ग्रहण
करता था।
धीरे-धीरे दिन बीतते गए और बालक छह वर्ष का हो गया। एक बार वह अपने कुछ
मित्रों के साथ मिलकर किसी बाग में फूल तोड़ने पहुंचा। चूंकि उसका कद छोटा था,
इसलिए उसके हाथ
फूल तक नहीं पहुंच पा रहे थे। सभी मित्रों ने फूल तोड़ लिए और वह कोशिश करता रहा।
बड़े प्रयासों के बाद उसका हाथ एक फूल तक पहुंचा ही था कि माली आ गया और उसे पीटना
शुरू कर दिया।
नन्हा मार खाता रहा फिर धीमी आवाज में बोला - मेरे पिता नहीं हैं, इसलिए तुम मुझे इस तरह
मार रहे हो? उसकी बात सुनकर माली का हाथ रुक गया और वह शांत होकर बोला - बेटा, पिता के न होने से तो
तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है कि तुम कोई भी गलत काम नहीं करो।
यह सुनते ही नन्हा फूट-फूटकर रो पड़ा और फिर कभी कोई गलत काम न करने का संकल्प
लिया। यही नन्हा बड़ा होकर लाल बहादुर शास्त्री के नाम से विख्यात हुआ और
प्रधानमंत्री के रूप में अपने गुण व व्यवहार से सर्वत्र प्रशंसा पाई। सार यह है कि
अभिभावकों के अमूल्य मार्गदर्शन के अभाव की स्थिति में बड़े-बुजुर्गो की शिक्षाओं
का उपयोग आत्मविकास हेतु करना चाहिए।
श्रद्धालु ने शंकराचार्य से सीखा समय प्रबंधन का महत्व
जगदगुरु शंकराचार्य ज्ञान की जटिल व सूक्ष्म बातों को जितनी सरलता से समझाते
थे, उतनी
ही आसानी से वे व्यावहारिक जीवन में काम आने वाले सूत्रों की भी व्याख्या कर देते
थे। लोग उनके पास दूर-दूर से आते और वे अनमोल ज्ञान की ऐसी पूंजी उन्हें देते,
जो लोगों के लिए
संपूर्ण जीवन का आधार हो जाती। एक बार एक संपन्न श्रद्धालु शंकराचार्य के पास आया
और कहने लगा - प्रभु मेरे पास कई कामों के लिए समय ही नहीं रहता।
मैं सोचता ही रह जाता हूं कि फलां सद्कार्य करूं, अमुक अच्छा कार्य भी करना है,
किंतु समय न होने
से नहीं कर पाता। आप ही बताइए कि समयाभाव के कारण कोई व्यक्ति सद्कार्य न कर पाए
तो वह क्या करे? शंकराचार्य ने मुस्कराते हुए कहा - वत्स, मेरा परिचय तो आज तक उस व्यक्ति
से नहीं हो पाया है, जिसको विधाता के बनाए समय में से एक क्षण भी कम मिला हो।
वस्तुत: जिसे तुम समयाभाव कह रहे हो, वह अव्यवस्थित जीवन जीने का ढंग है। जो लोग
व्यवस्थित जीवन नहीं जीते, वे अपने अमूल्य जीवन को भारस्वरूप ढोते हैं। जीवन यह नहीं
कि कितने वर्ष जीया। जीवन वह है कि व्यक्ति ने समय का कितना सदुपयोग किया। सार यह
है कि कार्यो का समयानुसार विभाजन कर प्रत्येक कार्य को उसके तय समय पर किया जाए
तो समयाभाव जैसी स्थिति कभी निर्मित नहीं होगी और समय का सदुपयोग संबंधित को पूर्ण
कर्म संतुष्टि देगा और विकास के स्तर पर भी इसके अच्छे परिणाम आएंगे।
घी का जलता हुआ दीपक देखकर नाराज हुए बापू
बापू का जन्मदिन था। प्रतिदिन की भांति संध्या के समय प्रार्थना सभा हुई।
प्रार्थना के बाद उनका प्रवचन हुआ। अंत में बापू ने पूछा - आज यह घी का दीपक किसने
जलाया है? यह सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। सभी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं हुआ। बापू पुन: बोले - आज यदि सबसे बुरी बात
हुई है तो वह यह कि आपने यह घी का दीपक जलाया है। सभी हैरान हो गए और सोचने लगे कि
भला इसमें क्या बुरी बात हो गइर्? कुछ देर रुककर बापू बोले - कस्तूर बा।
तुम इतने समय से मेरी जीवनसंगिनी हो, फिर भी कुछ नहीं सीख पाईं। हमारे गांवों में लोग
कितने गरीब हैं? उन्हें नमक और तेल तक नहीं मिलता और हम बेवजह घी जला रहे हैं। जमनालाल बजाज
बीच में बोल पड़े - आज आपका जन्मदिन है इसलिए। बात काटते हुए बापू ने कहा - तो
क्या इसका अर्थ यह हुआ कि मितव्ययिता त्यागकर दुरुपयोग आरंभ कर दिया जाए? जो हुआ सो हुआ, पर आगे से ध्यान रखना।
जो वस्तु आम आदमी को उपलब्ध न हो, उसे हमें भी उपयोग में लेने का कोई अधिकार नहीं है।
जब तक हर आदमी में यह भावना नहीं आएगी, देश में खुशहाली कैसे आ पाएगी? उपस्थितजनों ने हृदय से
बापू की बात में सहमति जताई। देश की वर्तमान ऊर्जा संकट व अर्थ संकट में बापू के
ये विचार अनुकरणीय हैं।
वस्तुत: यदि हममें से हर एक वस्तुओं की आवश्यकतानुसार उपयोग करने की आदत डाल
ले तो कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं होगा और एक सुखी व संतुष्ट समाज की रचना संभव
होगी।
घायल होने के बावजूद नहीं छोड़ी जीतने की जिद
घटना 1933 की है। पंजाब रेजीमेंट और सैपर्स एंड माइनर्स की टीमों के बीच हॉकी का मैच चल
रहा था। पंजाब रेजीमेंट का एक खिलाड़ी अपने प्रभावशाली खेल से दर्शकों का मन मोह
रहा था। यह देख विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी के मन में ईष्या की भावना आ गई। उसने
अवसर पाते ही उस खिलाड़ी के सिर पर प्रहार कर दिया।
वह घायल हो गया, किंतु अगले कुछ ही मिनटों में सिर पर पट्टी बांधे वह खिलाड़ी मैदान में हाजिर
था। आमना-सामना होने पर उसने प्रहार करने वाले खिलाड़ी से कहा - मैं बदला लिए बिना
नहीं रहूंगा, तुम देख लेना।
यह सुनकर उस खिलाड़ी के मन में यह भय बैठ गया कि वह खिलाड़ी भी उस पर हॉकी से
चोट करेगा। अत: वह संभलकर खेलने लगा। उस घायल खिलाड़ी के चेहरे पर एक दृढ़ निश्चय
झलक रहा था। उसके खेल में और अधिक पैनापन आ गया। उसने विपक्षी टीम पर एक के बाद एक
छह गोल कर दिए और अपनी टीम को जिता दिया। खेल समाप्त होने पर वह प्रहार करने वाले
खिलाड़ी के पास जाकर बोला - तुमने मुझ पर वार करके मुझे बदला लेने के लिए मजबूर कर
दिया।
इसी भावना से मैंने छह गोल किए और अपना बदला पूरा किया। यदि तुमने मुझ पर वार
न किया होता तो शायद मैं दो गोल भी न कर पाता। यह घायल खिलाड़ी थे ध्यानचंद जो आगे
चलकर हॉकी के जादूगर की उपाधि से अलंकृत हुए। अत: व्यक्ति या प्रकृति प्रदत्त
प्रतिकूलताओं से निराश न होते हुए उन्हें ही आगे बढ़ने का जरिया बना लिया जाए तो
बड़ी उपलब्धियां हासिल हो सकती हैं।
शिवजी का वरदान पाकर भी वृद्ध दंपती शापित ही रहे
एक दिन कैलाश पर्वत पर शिव-पार्वती बैठे थे। दोनों के मध्य पृथ्वी लोक के विषय
में बातचीत चल रही थी। तभी पार्वतीजी ने देखा कि पृथ्वी के एक नगर में एक वृद्ध
दंपती अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांग रहे हैं। पार्वतीजी दुखी हो गईं।
वे शंकरजी से बोलीं - प्रभु! आपकी बनाई दुनिया में कैसे गरीब लोग हैं? इनकी मदद कीजिए। शिवजी
बोले -देवी! मैं इन्हें प्रसन्न नहीं कर सकता, क्योंकि ये अपनी आंतरिक दुर्बलता
के कारण दुखी हैं। किंतु पार्वतीजी का आग्रह जारी रहा।
आखिर शिवजी ने वृद्ध दंपती के सामने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। वृद्धा
बोली - देव आप मुझे 18 वर्ष की युवती बना दें। शिवजी ने तथास्तु कह दिया। यह देख वृद्ध ने चिढ़कर
कहा - दुष्टा! मुझे पता था कि अपने आसक्तियुक्त आचरण के कारण मुझे इस अवस्था में
तू छोड़कर जाएगी। शिवजी बोले - आप परेशान क्यों हो रहे हैं? आप भी वरदान मांग लें। वृद्ध ने
कहा - भगवन आप इसे सूअरी बना दें। भगवान के ‘तथास्तु’ कहते ही वह सूअरी बन गई।
मां की यह दशा देख पुत्र रोने लगा। शिवजी ने उससे भी वरदान मांगने को कहा,
तो वह बोला - भगवन
आप तो बस मेरी मां ही वापस कर दें। ‘तथास्तु’ कहते ही सभी पूर्ववत हो गए। यह देख पार्वती ने शिवजी
से कहा - प्रभु आपने सत्य कहा था।
अच्छा वरदान मांगते कैसे? आखिर मन की दुर्बलता ही बाहर आई। वस्तुत: असंयमी व असंतुष्ट
लोग अच्छे अवसरों का कोई लाभ नहीं उठा पाते और दुखी ही बने रहते हैं। यदि धर्य से
काम लिया जाए, तो अवसर का लाभ अवश्य मिलता है।
जब हातिमताई को अपनी पत्नी से मिली बड़ी सीख
एक बार हातिमताई किसी कार्यवश बाहर जा रहे थे। उन्हें अपने पीछे पत्नी की चिंता
हुई, क्योंकि
वे कई दिनों के बाद आने वाले थे। उन्होंने पहले सोचा कि पत्नी के लिए इतने दिनों
की भोजन सामग्री की व्यवस्था कर दूं तो ठीक रहेगा और उसे मेरे न रहने पर कोई
परेशानी नहीं होगी।
फिर हातिमताई को यह समझ में नहीं आया कि व्यवस्था कितने अनुपात में करें,
इसलिए उन्हें
पत्नी से सलाह कर लेना उचित लगा। वे अपनी पत्नी के पास पहुंचे और बड़े स्नेह से
पूछा - तुम्हारे लिए खाने-पीने की कितनी सामग्री एकत्र कर जाऊं? पत्नी ने हंसते हुए कहा
- जितनी मेरी आयु हो।
हातिम बोले - मुझे तुम्हारी आयु के बारे में कैसे पता होगा?ञ्ज तब पत्नी ने कहा -
जब आपको मेरी आयु का ही पता नहीं, तब मैं भोजनादि का कैसे सही अनुमान बता सकूंगी? यह काम आपके बस का नहीं
है। जिस सत्ता का है, उसे ही करने दीजिए।
हातिम पत्नी की बात का अर्थ समझ यात्रा पर चले गए। अगले दिन पड़ोस में रहने
वाली एक महिला ने हातिम की पत्नी से पूछा - बेटी! तुम्हारे पति जाने से पूर्व
तुम्हारे लिए क्या व्यवस्था करके गए हैं? वह बड़े विश्वास से बोली - मां! मेरे पति मेरे लिए
क्या व्यवस्था करेंगे? जो देने वाला है, वह अब भी मेरे पास है।
कामयाबी की चकाचौंध में लोग कई चीजों को नहीं देख पाते हैं
कामयाब आदमी कामयाबी की चकाचौंध में कई चीजों को देख ही नहीं पाता। जिंदगी
अंधकार और प्रकाश दोनों का नाम है। उजाले में तो सभी को दिखता है, पर जिंदगी कुछ सच अंधेरे
में ही उजागर करती है। इसलिए जब आप श्रेष्ठता की ओर हों, तो आप से जुड़े लोग हीन भावना से
ग्रस्त न हो जाएं।
पति-पत्नी के बीच भी यह भावना पैदा हो जाती है। आपकी लोकप्रियता ऐसी हो जाती
है, जैसे
भरी गर्मी में एयरकंडीशनर की जगह हीटर चला दिया गया हो। तन, मन, धन तीनों की गर्मी आपके
व्यक्तित्व से थ्रो होने लगती है। क्योंकि तेजी से चलने की आदत वाले लोग बहना भूल
जाते हैं। जिंदगी सदैव छलांग का नाम नहीं है।
छलांग अपने आप में एक संतुलित चाल है। कृष्ण ने अजरुन को महाभारत के पहले कुछ
ऐसी बातें समझाई थीं, जो इशारे में ही डूब गईं। गीता में जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह टीकाकारों की नजरों
से आया है, लेकिन कभी खुद की नजर से देखेंगे, तो पाएंगे कृष्ण ने अजरुन से कहा था, कर्म मत छोड़ना, कर्ता भाव छोड़ देना।
कर्ता भाव से जब आप कोई काम करते हैं, तो उसका अर्थ है तेजी से दौड़ना और उस दौड़ने में ‘मैं’ को प्रमुख रखना। जब आप
कर्ता भाव हटा लेते हैं और बिना मैं के भले ही तूफान की तरह दौड़ें, आपकी चाल दूसरों के लिए
ठंडी लहर, आश्वासन, सांत्वना और भरोसा देने वाली बन जाएगी।
आप यदि अधीनस्थ हैं, तो अपने टफ से टफ बॉस को भी ऐसे सहन करेंगे, जैसे परिंदों के बच्चे
अपने मां-बाप को बर्दाश्त करते हैं। किसी पेड़ के पास खड़े होकर देखिएगा, परिंदे जब बच्चों को
उड़ाना सिखाते हैं, तो धक्का दे देते हैं और पेड़ पर बैठकर देखते हैं। परिंदा बच्च सोचता है,
इस खतरे में क्या
करूं।
उड़कर दूर चला जाऊं या लौटकर माता-पिता के पास आ जाऊं। उसे आवेश भी आता होगा
कि मुझे धक्का दे दिया। यह घटना हमारे लिए एक सबक है। हमारे टफ बॉस या टफ
सब-ऑर्डिनेट हमें इसी तरह परेशानी में धक्का देते रहते हैं, पर हमारी तैयारी होना चाहिए कि
हर विपरीत, हर परेशानी एक नई उड़ान का सबक है। फिर भी याद रखिए, अपनी गति और उड़ान में ‘मैं’ का भाव हटा दीजिएगा,
तब आपको महसूस
होगा कि उड़े तो आप अकेले, पर आपके साथ कई और भी शामिल होंगे।
जब मां ने किसी और के पुत्र के लिए मंगलसूत्र बेच दिया
यह घटना ईश्वरचंद्र विद्यासागर के किशोरावस्था की है। वे बाल्यकाल से ही बहुत
सहृदयी थे और लोगों की सहायता करके उन्हें बेहद खुशी होती थी। यह गुण उन्हें अपनी
मां से मिला था। ईश्वरचंद्रजी की मां परम दयालु थीं।
उन्होंने सदैव अपने पुत्र को यह शिक्षा दी थी कि अपनी स्वार्थपूर्ति से पहले
दूसरों का हित देखो और सदा ऐसे कार्य करो, जिसमें लोक-कल्याण समाहित हो। एक दिन ईश्वरचंद्र
विद्यासागर अपने एक मित्र को लेकर घर आए और अपनी मां से बोले - मां! यह अत्यंत
निर्धन है।
यह पढ़ना चाहता है, किंतु इसके पास फीस के पैसे नहीं हैं। हम इसकी सहायता करने
के इच्छुक हैं। मां ने तत्काल अपने गले से मंगलसूत्र उतारकर उसे देते हुए कहा -
बेटे, इसे
गिरवी रखकर तुम फीस चुकाकर परीक्षा दो। परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के बाद उस लड़के
ने गिरवी मंगलसूत्र लाकर मां को वापस करना चाहा तो मां ने स्नेहपूर्वक कहा - बेटा,
इसका नाम ही
मंगलसूत्र अर्थात दूसरों की भलाई व मंगल के कार्य करना है।
अत: इसे बेचकर आगे की पढ़ाई जारी रखो। लड़का मां की उदारता देख अभिभूत हो गया।
किसी असहाय की सहायता के लिए मंगलसूत्र बेचने का यह प्रसंग उन भारतीय महिलाओं की
आंखें खोलने जैसा है, जो सुहाग के इस सूचक के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहती हैं और किसी भी विपरीत
स्थिति के बावजूद इसे कभी नहीं उतारती हैं। कथा का सार यह है कि मानवीयता
मंगलसूत्र से बड़ा धर्म है, जिसका निर्वाह हर हाल में किया जाना चाहिए।
उसकी सत्ता हमेशा मेरे पास विद्यमान रहती है। कथा का सार यह है कि परम सत्ता
में अटूट विश्वास ऐसे आत्मविश्वास को जन्म देता है, जिसके बल पर व्यक्ति कठिन
परिस्थितियों में भी समाधान की राह खोज लेता है।
कबीर ने शिष्य को दी परम धर्म के निर्वहन की सीख
कबीर अपने सटीक दोहों और पैनी साखियों के कारण धीरे-धीरे सिद्धपुरुष के रूप
में ख्याति पाने लगे थे। वे जुलाहे का काम करते थे। सत्य को सीधे, सपाट ढंग से कह देना और
वह भी निर्भीकता के साथ, यह कबीर ही थे, जिनका इतना साहस था।
आम जनता के लिए इसीलिए वे श्रद्धा का केंद्र बन चुके थे। इतनी प्रसिद्धि पाने
के बाद भी कबीर ने अपना पैतृक व्यवसाय नहीं छोड़ा। वे प्रतिदिन कपड़ा बनाते थे और
साथ-साथ जनसंपर्क व भजनादि का कार्यक्रम भी चलता रहता था।
कबीर के कुछ शिष्यों को यह ठीक नहीं लगता था। अत: एक दिन उनमें से एक ने कबीर
से पूछा - गुरुदेव! जब आप साधारण मनुष्य थे, तब कपड़ा बुनते थे, यह ठीक बात थी। किंतु अब
आप इतने विख्यात हो गए हैं।
जीवन निर्वाह में भी कोई कमी नहीं है, फिर भी आप क्यों कपड़ा बुनते हैं? आपको यह शोभा नहीं देता।
उसकी बात सुनकर कबीर मुस्कराते हुए सहजता से बोले - बेटा, पहले मैं मात्र अपने पेट का पालन
करने के लिए कपड़ा बुनता था, किंतु अब मैं जन- जन में समाए हुए भगवान के तन को ढंकने के
लिए पूर्ण मनोयोग से कपड़ा बुनता हूं। कार्य वही कर रहा हूं, किंतु मेरा दृष्टिकोण
बदल गया है।
शिष्य ने भी श्रद्धापूर्वक सहमति जताई। कथा का सार यह है कि स्वहित में कार्य
करना स्वधर्म है, किंतु जब कार्य का लक्ष्य समाज हित हो जाए तो वह परम धर्म कहलाता है और इस
धर्म का पालन करने वाला परमयोगी हो जाता है।
संत ने शास्त्रार्थ से पहले अपने कर्म को वरीयता दी
एक संत परम ज्ञानी थे। तर्क-वितर्क में कोई उनसे जीत नहीं पाता था। अपनी बात
के पक्ष में सदैव उनके पास अकाटच्य तर्क और ठोस प्रमाण होते थे। उनकी इस नैसर्गिक
प्रतिभा के कारण वे जहां आम जनता के बीच आदरणीय थे, वहीं बौद्धिक जगत में उनके प्रति
ईष्र्या रखने वाले भी कम नहीं थे। ऐसे ही ईष्र्यालुओं ने एक बार संत को
शास्त्रार्थ हेतु आमंत्रित किया।
दूर-दूर से उन्होंने विद्वानों की फौज बुला ली, ताकि संत को पराजित किया जा सके।
जब संत मंच पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सामने बैठे एक व्यक्ति के हाथ में बहुत
दर्द है और वह तड़प रहा है। संत शास्त्रार्थ के पहले ही मंच से उतर गए और उस
व्यक्ति के पास जाकर उसके कष्ट निवारण का प्रयास करने लगे। उन्हें ऐसा करते देख
उनके निंदकों ने कहना आरंभ कर दिया - महात्माजी! आप तो यहां शास्त्रार्थ करने आए
थे। उससे पीछे हट गए और सेवा करने लगे।
ऐसा लगता है कि आप शास्त्रार्थ से घबरा रहे हैं। यह सुनकर संत ने शांत स्वर
में कहा - मित्रो! क्या आप लोगों में कोई ऐसा है, जिसका एक ही बेटा हो और यदि वह
कुएं में गिर जाए, तब भी आप विचलित न हों? यह सुनते ही निंदक वर्ग लज्जित हो चुप हो गया। तब संत बोले
- शास्त्रार्थ तो कोई भी कर लेगा, किंतु पीड़ितों की सेवा नहीं। मेरा कर्म पीड़ितों की सेवा
करना पहले है, शास्त्रार्थ करना बाद में। कथा का सार यह है कि प्रत्येक स्थिति में सहयोग का
भाव रखकर सदैव यश से अधिक कर्म को प्रमुखता देनी चाहिए। कर्म का उचित रीति से पालन
अनिवार्य रूप से यश दिलाता है।
खलीफा को उसी की भाषा में समझाया गुरु नानक ने
एक बार गुरु नानकदेव को लोगों ने बताया कि बगदाद का एक खलीफा निर्धनों का
अमानवीय तरीके से शोषण करता है और इस प्रकार उसने अथाह संपत्ति एकत्रित कर ली है।
चूंकि थोड़े दिनों बाद नानकदेव को मक्का की यात्रा करनी थी, सो उन्होंने इसमें बगदाद यात्रा
को भी शामिल कर लिया।
मक्का दर्शन के पश्चात नानकदेव बगदाद गए और वहां लोगों से खलीफा के विषय में
पूछताछ की। सभी को खलीफा से शिकायत थी कि वह उन्हें कई प्रकार से परेशान करता है
और स्वयं का घर, धन से भर रहा है। तब नानक ने खलीफा को सही मार्ग पर लाने के लिए एक योजना
बनाई। उन्होंने ऐसा रास्ता चुना, जहां से खलीफा प्रतिदिन गुजरता था। वे उस रास्ते के एक पेड़
के नीचे बैठ गए। वहां उन्होंने कंकरों और पत्थरों का ढेर लगा लिया और उनकी गिनती
करने लगे।
खलीफा थोड़ी देर बाद उधर से निकला तो उसने नानक के पास जाकर पूछा - ये आप क्या
कर रहे हैं? नानक ने उत्तर दिया - जब मैं मरूंगा तो इन्हें अपने साथ ले जाऊंगा। खलीफा इसे
नानकजी की मूर्खता बताकर हंसने लगा, तब उन्होंने कहा - जिस प्रकार आप संपत्ति इसलिए जोड़
रहे हैं कि उसे अपने साथ ले जाएंगे, उसी प्रकार मैं भी इन पत्थरों को ले जाऊंगा।
यह सुनकर खलीफा को स्वयं पर ग्लानि हुई और उसने निर्धनों पर अत्याचार बंद कर
अपनी सारी संपत्ति उनमें बांट दी। वस्तुत: उचित प्रयत्न के परिणामस्वरूप जो
प्राप्त हो, उसमें संतुष्ट रहना परम सुख की कुंजी है। अधिक की चाह असंतोष उत्पन्न करती है
और असंतोष अनुचित कर्मो का वाहक बनता है।
उदारता का श्रेष्ठ उदाहरण पेश किया पुरुषोत्तमदास टंडन ने
पुरुषोत्तमदास टंडन एक उदार राजनेता थे। उनकी धन संग्रह में जरा भी रुचि नहीं
थी और उनके हाथ सदैव दान की मुद्रा में ही रहते थे। यह घटना उन दिनों की है,
जब श्री टंडन
राज्यसभा के सदस्य थे। यहां भी सभी लोग उनकी निरासक्त प्रवृत्ति से काफी प्रभावित
थे। यह उल्लेखनीय है कि श्री टंडन अपनी इस उदारता पर तनिक भी अहंकार नहीं करते थे।
एक दिन उन्हें किसी ने आकर कहा कि वे अपना भत्ता राज्यसभा कार्यालय से ले लें।
वे कार्यालय में पहुंचे। जब उन्हें चैक दिया गया तो उन्होंने किसी से पेन लेकर
अपने चैक को ‘लोक सेवा मंडल’ के नाम समर्पित कर दिया।
वहीं खड़े एक व्यक्ति ने जब उन्हें ऐसा करते देखा, तो उससे रहा नहीं गया और वह उनसे
पूछ बैठा - ‘टंडनजी! मात्र चार सौ रुपए इतनी मुश्किल से मिले थे, उन्हें भी आपने दान में क्यों दे
दिया?’ टंडनजी
सहजता से बोले - ‘भाई! मेरे सात बेटे हैं। मैं उन सातों से प्रतिमाह सौ-सौ रुपए ‘कर’ स्वरूप लेता हूं। मेरे
लिए तीन-चार सौ रुपए पर्याप्त होते हैं, शेष को भी मैं ‘लोक सेवा मंडल’ को दे देता हूं। फिर यह
तो ऊपरी आय है।
इसे अपने पास क्यों रखूं?’ सार यह है कि धन की तीन गतियां होती हैं - दान, भोग और नाश। इनमें भोग,
धन की मध्यम गति
है। नाश अधम गति है और दान उत्तम गति है। इसलिए अपने द्वारा अर्जित आय का एक
हिस्सा दान अवश्य करना चाहिए, तभी उस धन की सार्थकता है।
युधिष्ठिर ने अपने आचरण से श्रीकृष्ण को किया प्रभावित
पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर अपने सत्यभाषण व धर्मानुकूल आचरण के कारण
लोगों की श्रद्धा के पात्र थे। स्वयं श्रीकृष्ण भी उनका बड़ा आदर करते और उन्हें ‘धर्मराज’ कहकर पुकारते थे। अनेक
यदुवंशी श्रीकृष्ण के इस व्यवहार को देखकर आश्चर्य से भर उठते। उनके विचार से
श्रीकृष्ण को तो युधिष्ठिर के प्रति आशीष की मुद्रा बनाए रखनी चाहिए थी, जबकि श्रीकृष्ण हैं कि
युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ कहकर श्रद्धावनत हो जाते हैं। एक दिन एक यदुवंशी से रहा नहीं गया।
उसने श्रीकृष्ण से पूछा - ‘आप युधिष्ठिर को धर्मराज कहकर उनका इतना सम्मान क्यों करते
हैं?’ श्रीकृष्ण
बोले - ‘मित्र!
महाभारत के युद्ध के समय युधिष्ठिर प्रतिदिन सायंकाल वेश बदलकर कहीं जाते थे।
अजरुनादि पांडवों ने इस रहस्य का पता लगाना चाहा।
जब एक शाम उन्होंने युधिष्ठिर का पीछा किया तो देखा कि वे युद्ध में घायल कौरव
सैनिकों की सेवा कर रहे हैं। जब भाइयों ने वेश बदलकर इस कौरव सेवा का कारण पूछा,
तो वे बोले - ‘यदि मैं वास्तविक स्वरूप
में होता तो ये पीड़ित अपना कोई कष्ट मुझे नहीं बताते। इसलिए वेश बदलकर सच्ची सेवा
करने का धर्म निभा रहा हूं।’ इसी कारण न केवल मैं, बल्कि यह संपूर्ण समाज धर्मराज
के रूप में युधिष्ठिर को शीर्ष स्थान देता है।’
यह सुनकर सभी यदुवंशियों के मन युधिष्ठिर के प्रति हार्दिक श्रद्धा से भर गए।
वस्तुत: सेवा का कोई लिंग, संप्रदाय या अपना-पराया नहीं होता। वह सहज दयावश और मानवता
के नाते की जानी चाहिए। तभी वह सच्चे पुण्य की भागी बनती है।
यदि आगे बढ़ना चाहते हैं तो लक्ष्य की ओर ध्यान दें
अपने बारे में दूसरों द्वारा दी गई राय जानना अच्छा लगता है। जब दूसरे प्रशंसा
कर रहे हों, तब और अच्छा लगता है। जो लोग अपने परिश्रम और संघर्ष से आगे बढ़ते हैं,
उन्हें एक बात और
सिखाई जाती है कि दूसरों की विपरीत और आलोचनात्मक टिप्पणियों की ज्यादा चिंता न
करें।
जिन्हें आगे बढ़ना है, वे अपने लक्ष्य की ओर ध्यान रखें, क्योंकि दूसरों के शब्द अड़ंगे
बन सकते हैं, लेकिन यह जानने की कोशिश जरूर की जाए कि उसमें सच्चई कितनी है। दूसरों द्वारा
की जा रही अपनी आलोचना में सच्चई ढूंढ़ लेना एक बड़ी अक्लमंदी का काम है।
इसके लिए हमें अपने जीवन के कुछ पुराने लालन-पालन के क्षणों को याद कर लेना
चाहिए। सामान्यत: मनुष्य के जीवन में उनके माता-पिता ने खूब समझाइश दी हुई होती है
या रोका-टोकी भी की गई रहती है।
पुराने दिनों को याद करें और एक आध्यात्मिक अभ्यास किया जाए। अपने माता-पिता
स्वयं बन जाएं। ऐसा समझंे अभी भी वे हमें कुछ कह रहे हैं। अपने आलोचकों की
पंक्तियों में ऐसा भाव रखकर सच्चई ढूंढ़ी जाए। तीन काम माता-पिता बच्चे से
सामान्यत: कराते हैं- भोजन, चलना और बोलना।
इन तीन बातों को बच्चों ने अपने पालकों से ही सीखा है। इसमें शिक्षा, प्रेरणा और परिश्रम
तीनों एक साथ चलते हैं, जबकि इन कामों के करने की क्षमता हर बच्चे में नैसर्गिक रूप
से मौजूद रहती है, लेकिन फिर भी माता-पिता उसे सही रूप दे देते हैं। वह समर्थ तो था, पर उसे उसकी सक्षमता का
आभास माता-पिता कराते हैं।
इन बातों को लगातार याद करिए, क्योंकि कुछ मौकों की स्मृतियां मनुष्य को आनंद देती हैं और
कुछ अवसरों की विस्मृतियां भी राहत देती हैं। इन घटनाओं से जैसे-जैसे आप जुड़ंेगे,आपको लगेगा माता-पिता ने
फलां काम कई बार करना दिए, लेकिन करने से रोका भी। हो सकता है वह रोक-टोक उस समय खराब
भी लगी हो।
ठीक यही भाव जैसे-जैसे मन-मस्तिष्क परिपक्व होगा हम अपने शत्रु, प्रतिद्वंद्वी और
आलोचकों के प्रति वैर-भाव न रखते हुए उस सच्चई को ढूंढ़ने लगेंगे, जो उन्होंने हमारे
नुकसान के लिए हमारी ओर फेंकी पर हमारे लिए बड़े काम की बन गई।
गुरु की आज्ञा का पालन कर लहणा बने गुरु अंगददेव
गुरुनानक देव ने अपने पंथ के उत्तराधिकारी के रूप में अपने परिवार के सदस्यों
में से किसी का चयन नहीं किया था। उनके मन में अपने शिष्य लहणा को वारिस बनाने की
इच्छा थी। इसका कारण यह था कि लहणा सदैव गुरु की आज्ञा का पालन करते थे।
उन्होंने लंगर व्यवस्था से लेकर वे सभी कार्य किए, जिनका निर्देश नानकदेव ने दिया।
गुरुजी ने लहणा को मन ही मन उत्तराधिकारी चुन लिया था, किंतु वे उन्हें सर्वश्रेष्ठ
सिद्ध करना चाहते थे। एक दिन कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। ऐसे में आधी रात को
गुरुजी ने अपने पुत्रों को बुलाकर कहा कि मेरे कपड़े मैले हो गए हैं, तुम इन्हें नदी में धोकर
ले आओ। सुबह मैं इन्हें ही पहनूंगा।
यह सुनकर पुत्र हैरान हो गए। बर्फीली हवाओं के बीच आधी रात को इतनी ठंड में
नदी के ठंडे पानी से कपड़े धोने की बात उनके लिए अकल्पनीय थी। वे बोले - अभी तो
हमें नींद आ रही है, सुबह आपके कपड़े धो लाएंगे। तब गुरुजी ने लहणा को जगाया और कपड़े धोने को कहा।
वे तत्काल उठे और उस कड़ाके की सर्दी में नदी पर जाकर गुरुजी के कपड़े धोए।
सुबह तक कपड़े सूख गए, तब नानक ने अपने पुत्रों को यह जानकारी दी और कहा कि ऐसे
निष्ठावान शिष्य को मैं अपना उत्तराधिकारी बना रहा हूं। उन्होंने लहणा को गुरु
अंगददेव का नाम देकर स्नेहपूर्वक गद्दी सौंपी। सार यह है कि सच्च शिष्य हर
परिस्थिति में गुरु की आज्ञा का पालन करता है। गुरु के आदेश को पत्थर की लकीर
मानने वाला ही शिष्य की उपाधि के योग्य बनकर अमूल्य गुरुकृपा हासिल करता है।
कबीरदासजी ने जिज्ञासु को समझाए पूर्णता के मायने
एक बार कबीरदासजी के पास एक जिज्ञासु आया और पूछने लगा - महात्मन! मुझे गृहस्थ
बनना चाहिए अथवा संन्यासी? कृपया मार्गदर्शन दें। कबीरदासजी ने कहा - जो भी बनो,
आदर्श बनो। उसे
अच्छी तरह से समझाने के लिए कबीर ने उसे दो घटनाएं दिखाईं। उन्होंने अपनी पत्नी को
बुलाया।
वह दोपहर का समय था। फिर भी उन्होंने पत्नी से कहा कि मुझे दीपक जलाकर दो, ताकि उसके प्रकाश में मैं कपड़ा अच्छी तरह से बुन सकूं। पत्नी ने बिना कोई तर्क किए दीपक जला दिया और चली गई। इस घटना से कबीर ने जिज्ञासु को समझाया - यदि गृहस्थ बनना है, तो परस्पर ऐसा दृढ़ विश्वास रखना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा हो। इसके बाद कबीर जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गए, जहां एक बुजुर्ग संत रहते थे।
कबीर ने उनसे पूछा - बाबाजी! आपकी आयु कितनी है? संत ने कहा अस्सी वर्ष। थोड़ी
देर इधर-उधर की चर्चा कर कबीर ने फिर उनकी उम्र पूछी। संत बोले - बेटे! अभी तो
बताई अस्सी वर्ष। लगता है कि तुम भूल गए। टीले की आधी चढ़ाई उतरने के पश्चात कबीर
ने संत को आवाज दी और नीचे आने को कहा। वे हांफते हुए नीचे आए और पूछा कि क्या बात
है? कबीर
बोले? आपने
अपनी आयु तो बताई ही नहीं।
संत ने हंसते हुए अपनी आयु फिर बताई और वापस लौट गए। तब कबीर ने कहा -
जिज्ञासु भाई! यदि संत बनना है तो इस तरह धर्यवान व क्षमाशील बनना। वस्तुत: हम
जहां, जिस
भी भूमिका में रहें, उसके अनुकूल बनकर रहने से ही पूर्णता आती है। अत: जो भी बनें, आदर्श बनें।
कर्मशीलता को सच्ची उपासना मानने वाले ने पाई सफलता
दो मित्र थे। दोनों के मध्य मित्रता अवश्य थी, किंतु दृष्टि और विचार दोनों के
भिन्न-भिन्न थे। एक सदैव ईश्वर से कुछ न कुछ मांगा करता और दूसरा हमेशा अपने काम
में मग्न रहता था। दुनिया के प्रत्येक आयाम को नकारात्मक दृष्टि से देखना पहले का
स्वभाव था, तो दूसरा सकारात्मकता से भरा था। एक दिन दोनों कहीं जा रहे थे।
मार्ग में उन्हें सिंदूर से पुते दो पत्थर दिखाई दिए। पहले मित्र ने तत्काल
उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और आंखें बंद कर प्रार्थना करने लगा। दूसरा मित्र
उन पत्थरों को ध्यान से देखता रहा, फिर कुछ सोचकर छेनी-हथौड़ी लेकर एक प्रतिमा बनाने लगा।
शीघ्र ही उसने उस पत्थर से भगवान की अत्यंत सुंदर प्रतिमा बना दी। कलाकार की इस
सुंदर कला को जिसने देखा, उसी ने सराहा।
एक श्रद्धालु ने इस प्रतिमा को खरीदकर एक विशाल मंदिर बनाया और वहां इसे
प्रतिष्ठित कर दिया। एक दिन दोनों मित्र मिले, तो अपने आराध्य देव की बातें
करने लगे। एक ने दुख व क्लेश प्रकट किया, किंतु दूसरे ने प्रगति व प्रसन्नता का समाचार
सुनाया। दरअसल पहला मित्र परिश्रम के बजाय भाग्य के भरोसे रहता था, वहीं दूसरा कर्म में
विश्वास करता था और मानता था कि सच्ची उपासना कर्मशीलता में निहित है।
वस्तुत: विभिन्न बाह्याचार पाखंड होते हैं या फिर परंपरा की लकीर पीटने के लिए
इनका निर्वाह किया जाता है। वास्तव में अपने समस्त कर्तव्यों का निष्काम भाव से
समुचित निर्वहन ही कर्मयोग है और यही सच्ची भक्ति या उपासना है।
टालेमी ने गुरु यूक्लिड से सीखे सफलता पाने के गुर
एलेक्जेंड्रिया में एक गणितज्ञ था टालेमी। वह जिज्ञासु प्रवृत्ति का था। उसे
नए-नए विषयों को सीखने की इच्छा होती और फिर वह अनेक विशेषज्ञों से उन विषयों के
बारे में जानकारी हासिल करता।
उसके आसपास प्राय: बौद्धिक वर्ग का ही जमावड़ा होता था और चर्चाएं चलती रहती
थीं। एक दिन टालेमी ने ज्यामिति के विषय में कहीं कुछ पढ़ा। उसे ज्यामिति अच्छी
लगी और इच्छा हुई कि उस विषय के बारे में अधिकाधिक जाने, सीखे और उसमें दक्षता हासिल करे।
उसने अपने साथियों से पूछा कि ज्यामिति का विशेषज्ञ कौन है? उन्होंने टालेमी को
यूक्लिड का नाम सुझाया, जो धुरंधर गणितज्ञ थे। टालेमी ने तत्काल यूक्लिड को बुलाया
और उनसे ज्यामिति सिखाने का आग्रह किया। यूक्लिड ने उसी दिन से टालेमी को ज्यामिति
सिखानी शुरू कर दी।
कुछ दिन बीत गए, किंतु यह कठिन विद्या टालेमी नहीं समझ पाया। एक दिन वह परेशान होकर यूक्लिड से
पूछने लगा - क्या ज्यामिति सीखने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है? यूक्लिड ने उत्तर दिया -
एलेक्जेंड्रिया में विशिष्ट नागरिकों और आम नागरिकों के लिए राह भिन्न-भिन्न होंगी,
किंतु ज्ञान-मार्ग
तो सबके लिए एक समान है।
इसमें विशिष्ट नागरिकों के लिए राजमार्ग की तरह अलग सुविधा नहीं है। अपने गुरु
की बात टालेमी को समझ में आ गई और फिर उसने कठोर परिश्रम कर ज्यामिति में निपुणता
हासिल की। वस्तुत: लक्ष्य प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम अनिवार्य शर्त है, क्योंकि वांछित सफलता
परिश्रम पर ही निर्भर है।
जब शास्त्रीजी ने श्रमिक स्त्रियों के श्रम को मान दिया
लालबहादुर शास्त्री की सहृदयता विख्यात है। उन्हें छोटे-से-छोटे इंसान के
कष्टों और समस्याओं की बहुत परवाह रहती थी और वे सदैव उनके समाधान की दिशा में
सक्रिय रहते थे। कभी कोई परेशानी में हो और यह शास्त्रीजी की जानकारी में हो,
तो वे शांत होकर
बैठ ही नहीं सकते थे।
जब वे देश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हुए, तो भी उनका यह व्यवहार कायम रहा।
उनके हृदय, उनकी दृष्टि और उनकी सोच में केंद्रीय पात्र की तरह आम आदमी ही रहा। यह घटना
उस समय की है, जब शास्त्रीजी केंद्रीय गृहमंत्री थे। उनके निवास की रचना कुछ ऐसी थी कि एक
दरवाजा जनपथ की ओर तो दूसरा अकबर मार्ग की ओर था।
एक दिन दो श्रमिक स्त्रियां सिर पर घास का भारी गट्ठर लेकर उनके निवास की ओर
से जाने वाले छोटे रास्ते से जाने का प्रयास कर रही थीं, किंतु चौकीदार उन्हें मना कर
भगाने लगा। शास्त्रीजी बाहर ही बैठे कुछ काम कर रहे थे। उन्होंने सुना तो चौकीदार
को बुलाकर कहा - भाई! देखते नहीं हो, उनके सिर पर कितना बोझ है? वे छोटे रास्ते से जाना चाहें,
तो जाने दो। दोनों
स्त्रियां उन्हें आशीष देती हुईं उस मार्ग से चली गईं।
यह छोटी, किंतु महत्वपूर्ण घटना यह सिखाती है कि अपनी विशिष्ट सुविधाओं को आम जनता के
लिए उपलब्ध कराना एक ऐसा बड़प्पन है, जो पद से आगे बढ़कर हमारा कद ऊंचा करता है और तब
संबंधित व्यक्ति जन-जन के हृदय में श्रद्धा का पात्र बनकर उच्च स्थान हासिल कर
लेता है।
जब न्यायाधीश की पत्नी को आम तोड़ना भारी पड़ा
एक न्यायाधीश अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करते थे। वह अपनी पत्नी के साथ एक
साधारण मकान में रहते थे और सीमित साधनों में गुजारा करते थे। अधिक की लालसा उनके
मन में नहीं थी। जो अर्जित कर पाते थे, उसमें संतुष्ट रहते थे। एक बार उन्हें किसी सरकारी
कार्य से सतारा जिले में जाना पड़ा। सतारा में उन्हें अनेक स्थानों पर जाना था,
किंतु उन्होंने
कोई सवारी नहीं ली।
पैदल ही पूरे जिले की यात्रा करने लगे। साथ में पत्नी भी थी। उन्होंने पत्नी
से कहा कि तुम बाद में घोड़ागाड़ी से आ जाना, मैं कार्य निपटाकर पैदल ही घर
चला आऊंगा। पत्नी ने घोड़ागाड़ी कर ली। घोड़ागाड़ी रवाना हुई, तो मार्ग में एक आम का
बगीचा दिखाई दिया। रसीले आम देखकर न्यायाधीश की पत्नी का मन ललचा गया। उन्होंने
गाड़ीवान से आम तोड़ने को कहा। वह गाड़ी रोककर आम तोड़ने लगा।
दुर्भाग्यवश एक बड़ा आम उनके हाथ पर गिरा, जिससे स्वर्ण जड़ित चूड़ी टूट
गई। टूटा स्वर्ण अंश भी नहीं मिला। उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ। घर आकर उन्होंने पति
को सारी बात बताई। उन्होंने कहा - पराई वस्तु लेने का यही परिणाम होता है। साथ में
मुझे भी तुम्हारे अपराध की थोड़ी सजा मिल गई।
मेरा चाकू कहीं खो गया है, वह कहीं नहीं मिला। न्यायाधीश की पत्नी ने भविष्य में ऐसा
फिर नहीं करने का संकल्प लिया। ये न्यायाधीश थे - श्री महादेव गोविंद रानाडे। एक
कहावत के अनुसार पाप की कौड़ी पुण्य का सोना भी खींच लेती है। अच्छे कर्म सद्गति
की ओर तथा बुरे कर्म दुर्गति की ओर ले जाते हैं। अत: सदैव अच्छे कर्म करें।
स्वयं को सहज बनाने का एक सुंदर तरीका है- मौन
जब आप किसी बड़े अभियान से जुड़ते हैं, तब आपसे एकाग्रता, परिश्रम और दूरदर्शिता
की उम्मीद की जाती है। इसके बिना लक्ष्य पर पहुंचना संभव भी नहीं होता है।
धीरे-धीरे आप विशिष्ट व्यक्ति होने लगते हैं। बड़ा काम करेंगे, तो अधिक नजरें आपकी ओर
उठेंगी। चूंकि आजकल विलंब खतरनाक है, अत: समयसीमा जरूर तय करिए और सीमित समय में लक्ष्य
पर पहुंचने की तैयारी रखें। ऐसे में सबसे अधिक समय नष्ट करते हैं दूसरे लोग। आपका
विशिष्ट होना ही आपके लिए नुकसान का कारण बन जाता है। अपने आप को सामान्य जन के
रूप में बनाए रखें।
इसका फायदा यह होता है कि लोग आपका समय कम नष्ट करेंगे और आप अपनी ऊर्जा का
अधिक उपयोग कर पाएंगे। जितनी भीड़ आपके आसपास होगी, उतना ही आपका समय दूसरों के
द्वारा खर्च किया जाएगा। सामान्यजन न बन सके, तो कम से कम उसका स्वांग रच लें।
लोग आपको नोटिस में लेना बंद कर देंगे और आप अपनी एकाग्रता के लिए स्वतंत्र हो
जाएंगे। कभी गर्दन उठाकर बादलों द्वारा सूरज को ढंकते हुए देखिए।
स्वयं को सहज बनाने का एक सुंदर तरीका है मौन। कई मौके आएंगे, जब वातावरण विपरीत होगा,
आप सामने वाले को
समझाने की स्थिति में नहीं रहेंगे, अकारण असहमति बनी होगी, परिचित और अपरिचित दोनों ही
किस्म के लोग सामने होंगे। हो सकता है आप शॉर्ट टेंपर्ड लोगों के साथ गुजर रहे हों,
ऐसे में मौन बड़ा
काम का है।
हालात जब विपरीत होते हैं, तो कुछ लोग गैर-मौजूद हो जाते हैं, स्थितियों से भाग लेते हैं,
लेकिन यदि आप मौन
रखने की कला जानते हैं, तो आप मौजूद रहकर भी गैर-मौजूद हो पाएंगे। मौन का अर्थ केवल
बाहर से चुप होना न समझें। जिस समय आप खामोश हों उस समय अपने मन को भी मौका मत
दीजिए कि वह भीतर-भीतर बात करता रहे। मौन का एक और अर्थ है धर्य। धर्य बना रहा तो
ऐसा नहीं होगा कि बाहर से आप शांत दिखें और भीतर से बैचेन।
जब मौन घटता है तो प्रकृति भी पूरी तरह से मदद करने उतर आती है और आप पाएंगे
बहुत सारी बातें अपने आप सुलझ जाएंगी।
मां के कहने पर बालक ने पुस्तकें स्कूल को लौटा दीं
ब्रिटेन के एक कवि डेनियल अपनी बाल्यावस्था में अत्यंत निर्धन थे। उनके पिता
नहीं थे और मां मेहनत-मजदूरी कर घर चलाती थीं। डेनियल के मन में विद्यालय के उन
विद्यार्थियों को देखकर गहरी टीस उठती, जो संपन्न थे और जिनके जीवन में कोई अभाव नहीं था।
डेनियल जब उनके माता-पिता द्वारा उन्हें दिलाई गई वस्तुओं को देखते तो उन्हें
लगता कि काश, उनके पास भी वे सब वस्तुएं होतीं। डेनियल इतने निर्धन थे कि पाठच्यपुस्तकों के
लिए भी उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता था। एक दिन वे विद्यालय से बहुत
प्रसन्नचित्त लौटे। मां ने उनकी प्रसन्नता का कारण जानना चाहा तो उन्होंने अपने
बस्ते में से सारी पाठच्यपुस्तकें निकालकर बताईं। मां को अचरज हुआ क्योंकि
उन्होंने वे सब नहीं दिलाई थीं।
डेनियल ने बताया कि विद्यालय से निर्धन छात्रों को ये पुस्तकें दी जाती हैं,
जो नि:शुल्क होती
हैं। आज उन्होंने भी इस सुविधा का लाभ उठाया है। यह सुनकर मां बोली - तुम ये
पुस्तकें विद्यालय जाकर लौटा दो। मैं मेहनत-मजदूरी कर तुम्हारी फीस और पुस्तकों का
खर्च उठा सकती हूं।
यह सुविधा उन विद्यार्थियों के लिए है, जो सर्वथा असमर्थ हैं। हमें उन
गरीबों का हक नहीं मारना चाहिए। डेनियल ने मां के कहे अनुसार पुस्तकें लौटा दीं और
मां से यह सीख ली कि यदि संपन्न वर्ग निर्धनों को मिलने वाले न्यायोचित अधिकारों
पर कब्जा न जमाए तो संपूर्ण विश्व की निर्धनता आधी रह जाएगी, क्योंकि तब निर्धनों को
जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई मानवीय बाधा नहीं रहेगी।
श्री हनुमान का यह खास सबक..खुल जाएगा खुशियों का खजाना
श्री हनुमान चरित्र में भक्ति एक ऐसा पक्ष है, जिसमें छुपे अंतहीन सुख-शांति के
सूत्र सांसारिक जीवन के कलह व संताप दूर कर देते हैं। हालांकि धर्मशास्त्रों में
भक्ति के अलग-अलग नौ तरीके, जो नवधा भक्ति के रूप में प्रसिद्ध हैं, भी चिंतन, मनन, व्यवहार, ध्यान या उठते-बैठते,
चलते-फिरते कर्म,
वचन और बोल में
भगवान के स्मरण द्वारा जीवन को सुखी और
सुरक्षित बनाने के उपाय ही है। किंतु श्री हनुमान ने गहरी सेवा और समर्पण को
सर्वोपरि मानकर राम भक्ति द्वारा सुख पाने की आसान राह बताई।
हिन्दू धर्मग्रंथ रामचरितमानस में श्री हनुमान द्वारा कही बात में ईश्वर भक्ति
के महत्व को उजागर कर सुख का ऐसा ही सूत्र बताया गया है। लिखा गया है कि -
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई।
जिसका सार यही है कि भगवान का स्मरण करते रहना ही सुख व भूल जाना दु:ख का कारण
है। दरअसल, इसमें व्यावहारिक जीवन के लिए यही संकेत है कि चूंकि जीवन शोक और खुशी का
सिलसिला है। इसलिए इंसान को सुख और दु:ख दोनों में ही समान भाव से जीना चाहिए।
चूंकि दु:ख का शमन ज्ञान से ही संभव है। इसलिए यह बात भी स्वीकार करना चाहिए
कि जिस तरह सुख ईश्वर कृपा से प्राप्त हुए, ठीक उसी भाव से दु:ख को भगवान की
समीपता की घड़ी मान स्वीकार करना चाहिए। वैसे भी कहा गया है कि सांसारिक जीवन में
सुख के साथी प्राणी और दु:ख के भगवान होते हैं। इसलिए दु:खों से बचने के लिए ईश्वर
व स्वयं पर भरोसा रखें तो बुरा वक्त भी भारी न लग आसानी से कट जाएगा।
दृष्टिहीनता के बावजूद होकीची ने कायम की अनूठी मिसाल
करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व जापान में होकीची नामक एक बालक का जन्म हुआ। सात वर्ष
की उम्र में उसे चेचक हो गया। उसके माता-पिता ने काफी उपचार कराया, जिससे होकीची ठीक तो हो
गया, किंतु
उसकी आंखों की रोशनी चली गई।
होकीची ने नेत्रहीन हो जाने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और यह सोचा कि मात्र
आंखें ही तो गई हैं, शेष शरीर तो स्वस्थ है, उसका उपयोग राष्ट्रहित में करना चाहिए। होकीची किशोरावस्था
तक अध्ययन करता रहा। वह दूसरों के माध्यम से पुस्तकें पढ़वाता।
इस प्रकार ज्ञानार्जन कर दूसरों को पढ़ाने का कार्य उसने अपने हाथों में लिया।
आजीवन होकीची का यह अध्ययन क्रम चलता रहा और वह एक जीता-जागता ज्ञानकोश बन गया। वह
एक सौ एक वर्ष तक जीवित रहा। उसके मस्तिष्क में संगृहीत अति उपयोगी ज्ञान को एक
राष्ट्रीय संस्था ने लिखवाया और उसके आधार पर एक विश्व ज्ञानकोश दो हजार आठ सौ बीस
खंडों में प्रकाशित किया गया। विश्व के इतिहास में इससे बड़ी और इससे अधिक
प्रामाणिक तथ्यों से परिपूर्ण पुस्तक संभवत: कहीं प्रकाशित नहीं हुई।
उक्त कथा का सार यह है कि मजबूत हौसले के बल पर अपने दुर्भाग्य से टक्कर लेने
वाले साहसी लोग जीवन में बड़ी सफलताएं अर्जित करते हैं। अत: जीवन में दुर्बलताओं
से हारने के स्थान पर अपनी उन कमजोरियों को ही लड़ने का हथियार बना लेना उचित है।
आचरण में बदलाव कर स्वामीजी का दिल जीता अमीरचंद ने
स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रवचनों में अमीरचंद नामक व्यक्ति गाना गाता था।
उसका गला अत्यंत सुरीला था और वह जब भी गाता, बड़ी तन्मयता के साथ गाता था।
उसे सुनकर श्रोता मुग्ध हो जाते। अमीरचंद के भावपूर्ण गीतों ने स्वामीजी को भी
उसका मुरीद बना दिया था और वे सदैव उसे प्रोत्साहन देते थे।
एक बार उनके प्रवचन के उपरांत जब अमीरचंद गाना गाकर चला गया तो कुछ प्रतिष्ठित
लोगों ने उनसे अमीरचंद के खराब आचरण के विषय में शिकायत की। स्वामीजी हैरान हुए,
किंतु जब उन्होंने
इन आरोपों की जांच की तो उन्हें सत्य पाया। उन्हें पता चला कि अमीरचंद रिश्वत लेता
है, नशा
करता है और पत्नी को भी त्याग चुका है।
अगले दिन अमीरचंद ने गाना समाप्त करने के बाद जब स्वामीजी से जाने की अनुमति
मांगी तो वे बोले - तुम्हारा गला तो कोयल जैसा है, किंतु आचरण कौए के समान है।
अमीरचंद को बात की गहराई समझ में आई। उसने अच्छा बनने के बाद ही स्वामीजी से मिलने
का संकल्प व्यक्त किया। सबसे पहले उसने रिश्वत लेना छोड़ा। फिर नशे से मुक्ति ली।
तत्पश्चात पत्नी को स्वयं जाकर आदरपूर्वक लाया और सदैव उसके प्रति निष्ठावान
रहने का संकल्प लिया। फिर वह स्वामीजी से मिला, तो उन्होंने उसके इस कायाकल्प पर
प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशीर्वाद दिया। कथा का सार यह है कि यदि वाणी में
सरस्वती बसती हो और आचरण रावण के समान हो तो यह प्रतिकूलता अपयश का भागी ही बनाती
है। वस्तुत: मीठी वाणी और सदाचरण का मेल व्यक्ति को लोकप्रिय बनाता है।
अनुचित को ग्रंथ से हटाकर संत राबिया ने पाया श्रेष्ठ संतत्व
राबिया महान भक्त थीं। उनकी अटूट भक्ति से सभी प्रभावित थे। लोक समाज में वे
श्रद्धा का केंद्र थीं। उनके संतत्व में आम जनता के साथ-साथ ज्ञानानुरागी संत साधक
भी सम्मिलित होते थे और उनके आध्यात्मिक अनुभवों का लाभ उठाते थे।
राबिया जिन धर्मग्रंथों का अध्ययन करती थीं, उनका अध्ययन यह संत समुदाय भी
उनकी अनुमति लेकर करता और जहां कोई बात समझ नहीं आती, तो राबिया उनका यथोचित समाधान कर
देती थीं। एक बार एक संत राबिया के किसी धर्मग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे।
अचानक पढ़ते हुए वे बीच में रुक गए। राबिया ने कारण पूछा तो वे बोले -
धर्मग्रंथ में एक पंक्ति कटी हुई है। अत: यह ग्रंथ तो खंडित हो गया है। अब दूसरा
ग्रंथ लेना होगा। आखिर यह धृष्टता किसने की?
संत राबिया बोलीं - यह कार्य मैंने किया है। विस्मित संत ने कारण पूछा,
तो राबिया ने कहा
- इस ग्रंथ में लिखा है कि शैतान से घृणा करो। मैंने जब से ईश्वर से प्रेम किया,
तब से मेरे हृदय
से घृणा भाव समाप्त हो गया है। मेरा संकुचित दृष्टिकोण विशाल हृदय में परिवर्तित
हो गया है। अब यदि शैतान भी आकर खड़ा हो जाए तो उससे भी मैं प्रेम ही करूंगी।
इसलिए मैंने वह पंक्ति काट दी। संतत्व की कसौटी पर सर्वथा खरी उतरने वाली
राबिया का उत्तर सुनकर संत समुदाय श्रद्धावनत हो गया। वस्तुत: आत्मा और परमात्मा
के एकाकार होने की स्थिति में दृष्टि समत्व से पूर्ण हो जाती है, क्योंकि तब आत्मा को हर
जीव में परमात्मा का अंश दिखाई देने लगता है।
बुजुर्ग रानाडे ने महज दो दिन में सीख ली बांग्ला
महादेव गोविंद रानाडे को नई चीजें सीखने की सदा चाह रहती थी। वे हमेशा तत्पर
रहते थे कि जो अब तक नहीं सीख पाए, उसे पूर्ण मनोयोग से सीख लें। कई बार लोग हैरान हो जाते थे
कि रानाडे ने इतनी जल्दी कोई नई चीज कैसे सीख ली? रानाडे कहते थे कि सीखने के लिए
बस लगन की आवश्यकता होती है।
लगन होगी, तो जटिल से जटिल विधा भी आसानी से सीखी जा सकती है। एक बार की बात है रानाडे
कलकत्ता से पूना के लिए रवाना हुए। रेल का सफर दो दिनों का था और उनकी पत्नी भी
साथ थीं। रानाडे ने रेल में बैठते ही एक बांग्ला अखबार खरीदा।
उनकी पत्नी ने हंसते हुए कहा - आपको तो बांग्ला भाषा आती ही नहीं है, फिर इसे क्यों खरीदा?
आप इसे पढ़ ही
नहीं पाएंगे। रानाडे ने जवाब दिया - दो दिन के सफर में बांग्ला आसानी से सीखी जा
सकती है। पत्नी को इस बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ, किंतु रानाडे ने बड़ी बारीकी से
बांग्ला लिपि और उसके गठन का अध्ययन किया और पूना पहुंचकर अपनी पत्नी को पूरा
अखबार पढ़कर सुना दिया। उस समय रानाडे की उम्र 66 वर्ष की थी।
उनकी यह मनोयोग साधना आज की अस्थिर युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा देने वाली है।
प्रस्तुत घटना का निहितार्थ यह है कि यदि सीखने की इच्छा प्रबल हो तो किसी भी उम्र
में और किसी भी परिस्थिति में सीखा जा सकता है। वस्तुत: लगन असंभव दिखने वाली
उपलब्धियों को संभव बना देती है।
दृढ़ संकल्प के बल पर मूढ़ से बुद्धिमान हुए जोसेफ
जर्मनी के जोसेफ बर्नार्ड अपनी बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक अत्यंत
बुद्धिहीन रहे। उनके पिता ने अच्छी से अच्छी टच्यूशन लगवाई, किंतु कोई सकारात्मक परिणाम नहीं
निकला। वे अत्यंत मेधावी शिक्षकों को जोसेफ बर्नार्ड को शिक्षण देने हेतु नियुक्त
करते थे, किंतु
वह इतने जड़ बुद्धि थे कि किसी भी प्रकार से न व शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते थे। एक
दिन उनके पिता इस बात से नाराज होकर बोले - तेरे जैसी बुद्धू औलाद से तो कुत्ते का
बच्च पालना अच्छा था। यह बात जोसेफ को चुभ गई।
अब उन्होंने पूर्ण मनोयोग और लगन से अध्ययन आरंभ किया, जिससे चमत्कारी परिणाम सामने आए
और वे अत्यधिक मेधावी बने। उन्होंने बाइबिल कंठाग्र कर ली और कुछ ही वर्षो में वे
नौ भाषाओं के मूर्धन्य विद्वान बन गए। अपने विभाग के नौ अधिकारियों को एक साथ
बैठाकर कितने ही आदेश वह एक साथ लिखवा देते और असंख्य सेवा कार्यो को अंजाम देते।
उन्हें लोग चमत्कारी पुरुष मानने लगे। जर्मनी के इतिहास में उन्हें मेधा का धनी
माना जाता है, जबकि किशोरावस्था तक वे अत्यंत मूढ़ कहे और समझे जाते थे।
उपरोक्त कथा का सार यह है कि संकल्पित होकर लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास व्यक्ति
के जीवन में असाधारण परिवर्तन ला देते हैं। इसलिए बेहद जरूरी है कि पहले अपने जीवन
के लक्ष्य निर्धारित किए जाएं, फिर दृढ़ संकल्पित होकर उन्हें प्राप्त करने में जुट जाएं।
इससे सफलता अवश्य प्राप्त होगी।
अपनी सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलकर देखिए
विकास और प्रगति जैसे शब्द जब व्यावसायिक जीवन से जुड़ते हैं, तो इनमें एक लक्ष्य
निर्धारित होता है। जब ये आध्यात्मिक जीवन से जुड़ते हैं, तो इनमें अंत नहीं होता, आरंभ और चलना ही होता
है। आजकल प्रोफेशनल लाइफ में भी यही समझाया जा रहा है कि लक्ष्य पर पहुंचकर अंत
नहीं मानें।
हर दिन लक्ष्य नए गढ़ना पड़ेंगे, इसलिए रुकें नहीं, चलते रहें। व्यावसायिक जीवन में
एक बड़ी रुकावट है होम सिकनेस। आदमी अपनी सुविधा के दायरे से बाहर निकलना ही नहीं
चाहता। यहीं से उसका विकास रुक जाता है।
शास्त्रों में अच्छी बात लिखी है - यस्यास्ति सर्वत्र गतिस्स
कस्मात्स्वदेशरागेण हि याति खेदम्। तातस्य कूपोùयमिति ब्रुवारण: क्षारं जलं के
पुरुषा: पिबंति।। जिसकी सर्वत्र गति है, वह स्वदेशानुराग का कष्ट क्यों सहेगा? मंद बुद्धि वाले पुरुष
यह कहकर खारा जल पीते हैं कि यह मेरे पितृकुल का कुआ है। इन पंक्तियों में एक शब्द
आया है क्षारं जल के पुरुषा: पिबंति। हम लोग भी यही कर जाते हैं।
ऐसा दो कारणों से किया जाता है- या तो कुछ दायित्व ऐसे हों, जिनका निवारण स्वयं करना
हो, तब बात
समझ में आती है, किसी के साथ बूढ़े माता-पिता हैं, किसी के साथ अन्य पारिवारिक समस्याएं हैं, दायित्व आपको रोक ले,
वह तो फिर भी ठीक
है, लेकिन
लोग सुविधाओं के कारण सरकना नहीं चाहते।
बुद्ध जयंती पर बुद्ध को इस बात के लिए याद किया जाए कि उन्होंने एक अनूठा
आशीर्वाद कुछ लोगों को दिया था। कुछ लोग उनके पास आए, तो बुद्ध ने कहा- यहीं बस जाओ।
फिर कुछ समय बाद एक दूसरा वर्ग उनके पास आया, बुद्ध का आशीर्वाद पलट गया।
उन्होंने कहा- फैल जाओ, बिखर जाओ। बुद्ध के शिष्यों को आश्चर्य हुआ कि अलग-अलग
आशीर्वाद क्यों? बुद्ध बोले- पहले लोग दुष्टवृत्ति के थे, इसलिए यहीं बसने का आशीर्वाद
दिया, बुराई
फैले न।
दूसरा वर्ग भले लोगों का था, तो आशीर्वाद बदला, क्योंकि भलाई फैलना चाहिए। आज हम भी इस बात पर विचार
करें कि जब भी अवसर आए, तो सुविधाओं के क्षेत्र से बाहर निकलकर खूब परिश्रम करिए,
विकास करिए और
अपने सद्गुणों को फैलाइए।
राष्ट्रीय संपत्ति का विवेकपूर्ण उपयोग सिखाया गांधीजी ने
गांधीजी प्रत्येक वस्तु का उपयोग बहुत सोच-समझकर करते थे। वे अपनी जरूरत के
मुताबिक वस्तु का उपयोग करते और शेष को भविष्य के लिए सुरक्षित रख देते।
मितव्ययिता की यह शिक्षा वे अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देते थे,
ताकि देश के सभी
लोगों की महत्वपूर्ण आवश्यकताएं पूर्ण हो सकें और कोई किसी वस्तु के लिए न तरसें।
गांधीजी के पास देशभर से पत्र आते थे और सुबह के समय वे इन्हें पढ़कर इनका
उत्तर लिखते थे। एक बार उनके समक्ष डाक का ढेर लगा था। वे प्रत्येक पत्र को ध्यान
से पढ़ते, फिर उसके कोरे हिस्से को कैंची से काट लेते। तभी एक सज्जन उनसे मिलने आए।
गांधीजी ने उनसे बात करते हुए पत्र पढ़ने और कोरे हिस्से को कैंची से काटने का काम
जारी रखा, तो उन सज्जन ने कतरनों को काटने का कारण पूछा।
गांधीजी बोले - ‘मुझे जब पत्रों के उत्तर देने होते हैं, तब मैं इन्हीं कतरनों का उपयोग
करता हूं। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो ये कागज बेकार हो जाएंगे। इससे दो प्रकार की
हानियां होंगी - एक तो अनावश्यक खर्च में वृद्धि होगी और दूसरा, राष्ट्रीय संपत्ति नष्ट
होगी। देश में जितनी वस्तुएं हैं, वे देश की संपत्ति हैं।
हमारा देश निर्धन है, ऐसी दशा में हमें वस्तुओं का सोच-समझकर उपयोग करना चाहिए।’
सार यह है कि देश
का प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय संपत्ति और प्राकृतिक संपदा के उपयोग में मितव्ययिता
बरते, तो
बिजली, पानी,
अनाज जैसी मूलभूत
आवश्यकताओं की पूर्ति में कभी कमी नहीं आएगी और ये भरपूर मात्रा में तथा समाज के
अंतिम व्यक्ति को भी उपलब्ध होंगे।
स्वामी विवेकानंद ने जिज्ञासु को शब्द की महिमा समझाई
स्वामी विवेकानंद के प्रवचन ज्ञानयुक्त और तर्क आधारित होते थे। ज्ञान,
भक्ति और कर्म
विषयक जटिल से जटिल प्रश्नों का समाधान स्वामीजी अपनी सहज मेधा से कर देते थे। कई
बार ऐसा होता था कि जिज्ञासुओं का जमावड़ा उनके आसपास होता और प्रवचन के दौरान भी
तथा प्रवचन समाप्ति के उपरांत भी उनकी ओर से प्रश्न आते रहते और स्वामीजी उन्हें
परम संतुष्टिकारक उत्तर देते।
एक बार स्वामीजी अपने प्रवचन में भगवान के नाम की महत्ता बता रहे थे। यह सुनकर
एक व्यक्ति ने तर्क दिया - ‘शब्दों में क्या रखा है, स्वामीजी! उन्हें रटने से क्या
लाभ होगा?’ तब स्वामीजी ने उसे प्रमाण सहित समझाने के उद्देश्य से नीच, जाहिल, मूर्ख आदि अपशब्दों से
संबोधित किया।
यह सुनकर वह अत्यंत क्रोधित हो गया और कहने लगा - ‘आप जैसे संन्यासी के मुंह से ऐसे
शब्द शोभा नहीं देते। आपके इन कुवचनों से मुझे बहुत आघात पहुंचा है।’ तब स्वामीजी बोले - ‘भाई! वे तो शब्द मात्र
थे।
आपने ही अभी कहा कि शब्दों में क्या रखा है? मैंने भी तो आपको मात्र शब्द ही
कहे, कोई
पत्थर तो नहीं मारे।’ स्वामीजी की बात सुनकर उस व्यक्ति को अपने प्रश्न का जवाब मिल गया कि जब
अपशब्द क्रोध का कारण बन सकते हैं तो प्रिय वचन भी आशीर्वाद और कृपा दिला सकते
हैं।
वस्तुत: शब्द की महिमा अपरंपार है। अप्रिय वाणी मर्मभेदी होती है और मधुरवाणी
मरहम का काम करती है। इसलिए प्रथम स्थिति में अपयश और दूसरी स्थिति में सम्मान व
शुभाशीष मिलते हैं।
जब पत्नी ने कराया डॉक्टर क्रोनिन को आत्मबोध
उपन्यासकार डॉ. क्रोनिन अत्यंत निर्धन थे। पुस्तकों की रॉयल्टी या तो प्रकाशक
हड़प जाते अथवा क्रोनिन को उनके हक से कम देते। क्रोनिन बहुत सीधे थे। प्रकाशकों
से लड़ाई कर अपना हक लेना उन्हें नहीं आता था। अत: बड़ी गरीबी में उनका जीवन बीत
रहा था। इसी गरीबी में जैसे-तैसे उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई पूर्ण की और डॉक्टर
बन गए।
जब वे चिकित्सा के क्षेत्र में आए तो कुछ लोगों ने उन्हें इसके जरिए पैसा
कमाने का तरीका बताया। वे लोगों की बातों में आकर मरीजों से मोटी फीस वसूलने लगे।
वे किसी निर्धन पर भी दया नहीं करते और पूरा चिकित्सा खर्च लेते। यह देखकर क्रोनिन
की पत्नी बहुत दुखी हुईं।
वे अत्यंत दयालु थीं। पति की गरीबों के साथ यह निर्दयता देख एक दिन वे बोलीं -
‘हम गरीब
ही ठीक थे। कम से कम दिल में दया तो थी। उस दया को खोकर तो हम कंगाल हो गए,
क्योंकि अब मनुष्य
रहे ही कहां?’ पत्नी की मर्मस्पर्शी बात सुनकर डॉ. क्रोनिन को आत्मबोध हुआ और उन्होंने पत्नी
से कहा - ‘तुम सच कहती हो। व्यक्ति धन से नहीं, मन से धनी होता है। तुमने सही समय पर सही राह दिखाई,
अन्यथा हम
अमानवीयता की गहरी खाई में गिर जाते तो कभी उठ ही नहीं पाते।’
कथा का निहितार्थ यह है कि जब मनुष्य अपनी मानवीयता की मूल पहचान से डिगने
लगता है, तो
सामाजिक नैतिकता तो खंडित होती ही है, वह स्वयं भी भीतर से खोखला हो जाता है, क्योंकि ऐसा उसकी पवित्र
संस्कारशीलता की बलि चढ़ चुकने के बाद ही होता है।
सभी का ध्यान रखने वाले का चयन किया मौदगल्यायन ने
बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो चुका था। अनेक बौद्ध मठ स्थापित हो
चुके थे। सभी मठों में योग्य आचार्य व कुलपति की नियुक्ति की जाती थी, ताकि वे बौद्ध धर्म के
समुचित प्रसार में अपनी महती भूमिका निभा सकें। आचार्य व कुलपति की नियुक्ति में
उनके ज्ञान और विवेक के अतिरिक्त उनकी परहित-रुचि को भी विशेष रूप से परखा जाता था,
क्योंकि मठ
सामूहिक हितों को प्रमुखता देते थे। एक बड़े बौद्ध मठ के लिए योग्य कुलपति की
नियुक्ति उन दिनों चर्चा का विषय थी। आचार्य पद के लिए ज्ञान और विवेक के धनी
मौदगल्यायन का चयन किया गया।
कुलपति पद के लिए तीन उम्मीदवार थे और तीनों ही योग्य थे, किंतु चयन तो एक का ही
करना था। अत: तीनों की परीक्षा ली गई। तीनों को प्रवास पर भेजा गया। आचार्य
मौदगल्यायन उनकी परीक्षा लेने के लिए जंगल में पहले ही पहुंच गए। उन्होंने मार्ग
में कांटे बिछा दिए।
संध्या होने तक तीनों विद्वान भी वहां पहुंचे। कांटे देखकर तीनों रुके। एक ने
कुछ सोचकर अपना मार्ग बदल लिया। दूसरे ने कांटों पर से कूदकर रास्ता पार कर लिया।
तीसरा कांटे हटाने लगा, ताकि मार्ग दूसरों के लिए निष्कंटक बन जाए।
मौदगल्यायन ने इस तीसरे को यह कहते हुए कुलपति घोषित किया कि मठ में
सत्प्रवृत्तियों की परंपरा वही डाल सकेगा, जो सभी का ध्यान रख सके और अपने आचरण से प्रेरणा
देने की क्षमता रखता हो। कथा का सार यह है कि निजी हितों पर सामूहिक हितों को
वरीयता देने वाला ही सच्च नेतृत्वकर्ता होता है।
परोपकार की अनूठी मिसाल पेश की गंगाधर शास्त्री ने
मिथिला में गंगाधर शास्त्री नामक पंडित एक विद्यालय में अध्यापन कार्य करते
थे। शास्त्रीजी अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा से करते थे। उन्होंने अपने एकमात्र
पुत्र गोविंद को भी यही शिक्षा दी थी। गोविंद भी उसी विद्यालय में अध्ययनरत था।
अपने पिता के ही समान वह भी अत्यंत शिष्ट, अनुशासित और अपना कार्य पूर्ण
मनोयोग से करने वाला था। उसके शिक्षक और सहपाठी उसके इन्हीं गुणों के कारण उससे
बहुत स्नेह करते थे। एक दिन शास्त्रीजी के साथ गोविंद विद्यालय नहीं आया। उसके
मित्रों को उसकी अनुपस्थिति बहुत खली।
जब शास्त्रीजी विद्यालय बंद कर जाने लगे, तो बच्चों ने गोविंद के न आने का
कारण पूछा। शास्त्रीजी भारी मन से बोले - ‘बच्चो! अब वह कभी नहीं आएगा। उसे अचानक दिल का दौरा
पड़ा और वह हमें छोड़कर चला गया।’ बच्चे स्तब्ध रह गए।
उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें हैरानी भी हुई कि इतने दर्दनाक हादसे के
बावजूद शास्त्रीजी पढ़ाने कैसे आ सके? उन्होंने शास्त्रीजी से जब इस विषय में पूछा,
तो वे बोले - ‘मेरे दो परिवार हैं। उस
परिवार के बालक का बिछुड़ना असहनीय अवश्य है, किंतु उसके कारण इस परिवार के बालकों
का हक मारता, तो दुख और बढ़ जाता।
गोविंद के लिए जो कर सकता था, पूर्ण मनोयोग से किया, अब तुम्हारे लिए जो कर सकता हूं,
उसे क्यों न करता?’
बच्चे अपने गुरु
की इस विशाल हृदयता को देख श्रद्धावनत हो गए। कथा का सार यह है कि परोपकार जहां
हमें परम संतुष्ट और शांत रखता है, वहीं लोक में आदरणीय भी बनाता है।
शंकरदेव ने रूढ़िवादिता दूर करने के लिए किया संघर्ष
शंकरदेव का जन्म असम के नौगांव जिले में हुआ था। पारिवारिक और सामाजिक दबावों
के समक्ष न झुकते हुए खासतौर से उन्होंने संतों और ब्राह्मणों वाली जीवनचर्या
अपनाई। एक ओर उन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन कर उसमें दक्षता हासिल की, तो दूसरी ओर श्रीमद्
भागवत को अपने आचरण में उतारा।
फिर शंकरदेव ने धर्मप्रचार को अपना लक्ष्य बना लिया और युवावस्था में ही
पदयात्रा पर निकल पड़े। शंकरदेव भागवत के माध्यम से धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों
पर प्रहार करते और सामाजिक विकृतियों को दूर करने का प्रयास करते। यह देख
पंडे-पुजारियों ने उनका घोर विरोध किया, किंतु वह अपने लक्ष्य पर अडिग रहे।
अन्य स्वार्थी महात्माओं की कथा का उद्देश्य दक्षिणा बटोरना होता था, जबकि शंकरदेव नि:शुल्क
और नि:स्वार्थ भाव से गांव-गांव जाकर कथा सुनाते, क्योंकि उनका उद्देश्य
सद्वृत्तियों का प्रचार करना था। आरंभ में समाज द्वारा भागवत पाठ का विरोध हुआ,
किंतु वह संत
वृत्ति के समक्ष टिक नहीं पाया।
इस प्रकार शंकरदेव ने अनेक कष्ट सहकर भक्ति को पाखंड से मुक्त कराया और उसके
सही अर्थ को लोगों को हृदयंगम कराया। सार यह है कि रूढ़िवादिता से लड़ने के लिए
आत्मविश्वास और आत्मत्याग दोनों ही अपेक्षित हैं। यह एक सामाजिक बुराई है, जिसे दूर करना असीम धर्य
और अधिकतम प्रयास के बलबूते ही संभव हो सकता है।
हर एक की उपयोगिता है उसे जानें, पहचानें और मानें
यह दौर उपयोगिता का है। सभी को साबित करना पड़ता है कि वे उपयोगी हैं। अब
रिश्ते संवेदनाओं से नहीं, उपयोगिता से चल रहे हैं। इसके दो पक्ष हैं। पहला यह कि आप
अपनी उपयोगिता साबित करिए और इसके लिए लगातार उपयोगी बने रहिए। ऐसा लोग कर भी रहे
हैं।
परिश्रम और अपडेट रहना इसमें बड़ा काम आता है। दूसरा पक्ष है किसी के भीतर
छिपी उपयोगिता को ढूंढ़ लेना। हो सकता है कुछ लोग अपनी उपयोगिता का प्रदर्शन न कर
पाएं। ऐसे समय बुद्धिमानी यह होगी कि हम सामने वाले की उपयोगिता को उसके भीतर से
उजागर कर दें।
शास्त्रों में लिखा है- अहो खलस्यापि महोपयोग: स्नेहद्रुहो यत्परिशीलनेन।
आकर्णमापूरितपात्रमेता: क्षीरं क्षरन्त्यक्षतमेव गाव:।। कैसा आश्चर्य है कि
तेल-रहित खली का भी बड़ा उपयोग होता है, क्योंकि उससे पूरित पात्र को देखते ही गायें बिना
किसी आघात के बर्तन भर-भर कर दूध देती हैं।
खली में से तेल निकाल लिया गया, तो सामान्य स्थिति यह है कि खली किसी काम की नहीं
रही, लेकिन
गायें उसको खा लें, तो भरपूर दूध देती हैं। ऐसे ही व्यावसायिक संस्थानों में लंबे समय सेवा करने
के बाद कुछ वरिष्ठ लोग उम्र के कारण, हाशिए पर पटक दिए जाते हैं। सालों उन्होंने काम किया,
व्यवस्था ने जमकर
उनका तेल निकाला और अब वे खली की तरह किसी काम के नहीं रहे। लेकिन चतुर मैनेजमेंट
उस खली की उपयोगिता को देख लेता है, जो अभी भी गाय के दूध के लिए काम आती है।
बुजुर्ग, अनुभवी व्यक्ति कहीं भी हों, बेकार नहीं होंगे। हमें उनके भीतर की उपयोगिता निकालने की
कला आना चाहिए। तैराकी सिखाने वाला एक बूढ़ा उस्ताद था। जब भी कोई तैराक समंदर की
तमाम दूरियों को पार करके किनारे पर आता, उस्ताद चिल्लाकर कहता-सावधान! एक तैराक ने पूछा- जब
पूरा दरिया पार कर गए, तब कुछ नहीं कहा और अब किनारे पर सावधान कर रहे हो, ऐसा क्यों? उस्ताद बोला- मेरा अनुभव
है लोग किनारे पर ही डूब जाते हैं। बीच दरिया में लहरों और गहराई की चुनौती थी।
जब संघर्ष होता है, समय होता है, तब आदमी सावधान रहता है, लेकिन सफलता के किनारे पर आकर
बड़े-बड़े असावधान हो जाते हैं। इसलिए हर एक की उपयोगिता है। कब, कौन, कैसे काम में लिया जाए,
यही समझदारी है।
जब राजा ने खाली गमला लाने वाले को विजेता घोषित किया
एक राजा को सुयोग्य व ईमानदार मंत्री की आवश्यकता थी। उसके दरबार में
चाटुकारों की भरमार थी, जिनसे राजा बहुत परेशान था। एक दिन उसने एक उपाय सोचा। सभी
दरबारियों को बुलाकर राजा ने कहा - ‘मैं चाहता हूं कि आप लोग मेरे लिए एक-एक पौधा लगाएं।
जिसका पौधा सबसे सुंदर और हरा-भरा होगा, उसे मैं अपना मंत्री नियुक्त करूंगा। आप लोगों को
बीज और गमले हम देंगे। आपको खाद-पानी देकर पौधा तैयार करना है।
आपके पास एक महीने का समय है।’ चापलूस दरबारी यह सुनकर प्रसन्न हो गए, क्योंकि यह बहुत आसान
कार्य था। सब अपने-अपने पौधे में बीज डालकर नित्य खाद व पानी देने लगे। सभी के मन
में मंत्री पद का लोभ था। जब एक महीना पूरा हो गया, तो सभी अपने गमले लेकर दरबार में
पहुंचे। सभी के गमले सुंदर पौधों से सजे हुए थे, किंतु एक व्यक्ति का गमला खाली
था, जिसे
देखकर सभी हंस रहे थे।
जब राजा ने मंत्री पद के लिए खाली गमले वाले व्यक्ति का नाम घोषित किया तो सभी
अवाक् रह गए। तब राजा ने कहा - ‘मैंने आप सभी को जो बीज दिए थे, वे उबले हुए थे। अत: वे उग ही
नहीं सकते थे। आप सबने मुझे प्रसन्न कर मंत्री पद पाने के लोभ में बीज बदल दिए।
इससे मुझे बहुत दुख हुआ। वह राज्य कभी उन्नति नहीं कर सकता, जिसके दरबारी किसी भी तरह बस
राजा को खुश करना चाहते हों और प्रजा की भलाई की ओर किसी का ध्यान न हो।’ वस्तुत: एक विशिष्ट
व्यक्ति की हित-पूर्ति से अधिक वरीयता बहुसंख्य लोगों के कल्याण को देना चाहिए।
जौहरी ने अमूल्य हीरा पाकर भी आखिर खो दिया
एक किसान खेत में हल चला रहा था। थोड़ी देर बाद उसका हल एक पत्थर से अटक गया। किसान
ने जोर लगाकर पत्थर को हटा दिया। तभी उसके जूते में एक कील चुभी तो उसने उसी पत्थर
से उसे ठोंकना शुरू कर दिया। उसी समय उधर से गुजर रहे एक जौहरी की नजर उस पत्थर पर
पड़ी। उसने पहचान लिया कि वह पत्थर हीरा है। उसने किसान से उसे खरीदने की इच्छा
जाहिर की।
किसान हैरान हुआ कि यह आदमी एक सामान्य पत्थर क्यों खरीदना चाहता है? फिर उसने सोचा कि इस
पत्थर के बदले जो मिल जाए, बहुत है। किसान ने पांच रुपए में वह पत्थर जौहरी को दे
दिया। हीरा पाकर जौहरी खुशी-खुशी घर पहुंचा और उसने हीरे को जैसे ही थैली में से
निकाला, हीरा
उसके हाथ से छिटककर गिरा और टुकड़े-टुकड़े हो गया। जौहरी दुखी होकर बोला - ‘अभी कुछ देर पहले किसान
इसे अपने जूते पर जोर-जोर से मार रहा था, तो यह नहीं टूटा, लेकिन अब गिरते ही टूट गया।
ऐसा कैसे हो गया?’ तभी हीरे के बिखरे टुकड़ों से आवाज आई - ‘जौहरी! तूने मेरा अपमान
किया है।’ जौहरी बोला - ‘अपमान तो उस मूर्ख किसान ने किया है, जो इतने कीमती हीरे से अपने जूते की कील ठोंक रहा
था।’ तब
हीरे ने दुखी होकर कहा - ‘वह किसान मेरी कीमत नहीं जानता था, किंतु तुमने जानने के बावजूद
मेरा मूल्य मात्र पांच रुपए आंका। इस अपमान के बाद मेरे जीवन का कोई मोल नहीं रह
गया।’ जौहरी
ने इस प्रकार हीरे को पाकर भी खो दिया। सार यह है कि प्रत्येक वस्तु को उसके सही
मूल्य से आंकना चाहिए।
मौलुंक ने मौन में पाया सभी प्रश्नों का समाधान
संत तिलोपा की ख्याति इस रूप में थी कि उनके पास सभी प्रश्नों के सटीक जवाब
होते थे। एक बार मौलुंक नाम का एक व्यक्ति उनके पास आया और अपने मन में उठने वाले
अनेक प्रश्नों का उत्तर संत तिलोपा से जानने की इच्छा व्यक्त की। संत ने कहा - ‘मैं तुम्हारे सभी
प्रश्नों के उत्तर दूंगा, लेकिन तुम्हें इसकी कीमत चुकानी होगी।’
मौलुंक ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। तब तिलोपा बोले - ‘तुम्हें दो वर्ष तक मेरे
पास मौन बैठना पड़ेगा। इसके बाद मैं तुम्हारे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दूंगा। इन
दो वर्षो में तुम्हें कितना ही कष्ट हो या परेशानी आए, किंतु तुम कुछ नहीं बोलोगे।’
मौलुंक राजी हो
गया। वह दो वर्ष तक संत तिलोपा के पास रहा और मौन ही रहा।
इस अवधि में उसका मन शांत होता गया, विचार-आवेग मंद होता गया और उसके भीतर शांति का
प्रवाह होने लगा। दो वर्ष पूर्ण होने पर संत ने उससे प्रश्न पूछने का आग्रह किया,
तो वह उनके चरणों
में झुककर बोला - ‘आपकी कृपा से मैं यह जान गया हूं कि मन के मौन में ही सारे प्रश्नों के उत्तर
छिपे हैं। अब मुझे कुछ नहीं पूछना। मैंने सभी प्रश्नों के उत्तर पा लिए हैं।’
सार यह है कि मानव मन में उसकी सभी जिज्ञासाओं के समाधान मौजूद हैं, किंतु मन से उत्तर पाने
के लिए मौन रहना जरूरी है। शांतचित्तता के अभाव में व्यक्ति बेचैन रहता है और इस
अवस्था में वह बाहर से उत्तर पाने के लिए भटकता है। वस्तुत: मन की शांति में ही मन
के सभी प्रश्नों के उत्तर समाहित हैं।
प्रभु नाम का स्मरण कर भयावह जंगल से कैदी ने मुक्ति पाई
एक शिष्य ने गुरु से पूछा - ‘गुरुदेव! आप हमेशा कहते हैं कि हमें एक क्षण के लिए भी
प्रभु की ओर से ध्यान नहीं हटाना चाहिए। किंतु यह कैसे संभव है? क्योंकि जिसे मोक्ष
मिलना है, उसे किसी भी समय मिल सकता है।’ यह सुनकर गुरुजी बोले - ‘मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं।
किसी राज्य का राजा बहुत अत्याचारी था।
वह जरा-सी बात पर ही नाराज होकर लोगों को कैद कर एक ऐसे जंगल में छोड़ देता था,
जिसके चारों ओर एक
ऊंची व गोलाकार दीवार बनी थी। अधिकांश लोग उस जंगल में भटकते हुए पत्थरों से सिर
टकराकर मर जाते थे। उन्हीं में से एक ऐसा आदमी भी था, जो सदैव ईश्वर का स्मरण करता रहता
था। उसे विश्वास था कि जब ईश्वर ने ये सारी मायावी रचनाएं की हैं, तो उस माया से निकलने का
कोई मार्ग भी बनाया होगा।
वह प्रतिदिन दीवार के सहारे गोल-गोल घूमा करता था और दूसरों से भी ऐसा करने का
आग्रह करता था, किंतु दूसरे कैदी या तो बातचीत करने लगते अथवा थककर बैठ जाते। वह आदमी न थका
और न उसने बातों में समय गंवाया। आखिर उसने निरंतर भगवान का नाम लेते हुए हर जगह
स्पर्श कर-करके वह स्थान खोज लिया, जहां से बाहर का रास्ता था।
इस तरह उसने भयावह जंगल से मुक्ति पा ली।’ यह कहानी सुनाकर गुरु बोले - ‘वत्स! यह सृष्टि भी चौरासी
लाख योनियों का जंगल है, जिसमें विधाता ने हमें रखा है। जो प्रभु नाम रूपी दीवार को
पकड़े रहते हैं, वे मोक्ष पा जाते हैं और जो इसमें चूके, वे भटकते रहकर कष्ट पाते हैं।’
अटूट विश्वास
अंतत: फलता ही है।
बड़ा सुख पाने की चाहत में छोटी खुशियां भी खोई मछली ने
एक सरोवर में एक हंस और एक मछली रहते थे। दोनों के बीच अच्छी मित्रता थी।
दोनों घंटों एक-दूसरे के साथ समय बिताते। रात होने पर मछली सरोवर के तल में चली
जाती और हंस निकट के पेड़ पर सो जाता। सुबह होने पर हंस कहीं चला जाता और कुछ समय
बाद मछली से मिलने आता।
एक दिन मछली ने हंस से पूछा - ‘मित्र! तुम नित्य कहां जाते हो?’ हंस ने बताया - ‘मैं समुद्र की ओर जाता
हूं। वहां बहुत सारी सीप होती हैं। उन सीपों में से जिस सीप से मोती निकलता है,
मुझे उसकी तलाश
होती है, क्योंकि
मेरी खुराक मोती ही है।
मैं हंस हूं, सिर्फ मोती ही खाता हूं।’ यह सुनकर मछली बोली - ‘मित्र! मुझे भी समुद्र देखना है
कि वह कैसा होता है?’ मछली की उत्कट अभिलाषा देख हंस ने कहा - ‘यहां से थोड़ी दूर एक नदी है,
जो समुद्र में
जाकर मिल जाती है। तुम उस नदी में चली जाओ।’
एक दिन जब जोरदार बारिश हुई तो सरोवर का पानी बढ़कर नदी तक पहुंच गया और इस
तरह मछली नदी में पहुंच गई। नदी का बहाव उसे समुद्र में ले गया। मछली ने समुद्र
में देखा कि वहां लाखों मछलियां हैं। इस मछली को वहां कोई पूछता भी नहीं था। वह
नितांत अकेली हो गई।
अब उसे रह-रहकर अपने मित्र हंस की याद सताने लगी, किंतु अब उसके पास सरोवर में
वापस जाने का कोई मार्ग नहीं था। कथा का निहितार्थ यह है कि कई बार कुछ बड़ा पाने
की महत्वाकांक्षा हमारी छोटी-छोटी खुशियों का सुख भी छीन लेती है। इसलिए अनुपलब्ध
के प्रति अत्यधिक आग्रह न रखें और उपलब्ध में ही संतुष्ट रहें।
बुद्धि को मन के वशीभूत होने से बचाएगा प्राणायाम
कुछ लोग अभी भी अपने घर और दफ्तर का भेद नहीं बना पाते। घर में होते हैं तो
धंधेपानी के काम चालू रहते हैं, कार्यस्थल पर होते हैं तो घर-परिवार की झंझटें पीछा नहीं
छोड़तीं। न यहां चैन, न वहां शांति। इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण है। परिस्थिति बदलती है, मनोस्थिति नहीं बदलती,
जबकि हमें
परिस्थिति बदलते ही मनोस्थिति पर भी काम करना चाहिए।
इसके लिए दफ्तर में घुसते ही जिस तरह बाहरी सिस्टम से हम परिचित होते हैं,
जैसे हर विभाग की
अपनी जिम्मेदारी होती है, वैसे ही अपने इनर सिस्टम को भी एक्टिव कर लीजिए। बराबर सजग
रहिए कि कहां बुद्धि का उपयोग करना है और कहां मन का।
इसके लिए अवेयरनेस चाहिए, जिसे घर से निकलने के पहले योग-प्राणायाम से पैदा कर लें।
जरूरत पड़े, तो कार्यालय में बीच-बीच में इसके प्रयोग करते रहें। मन का सारा प्रवाह
इंद्रियों की ओर रहता है। इंद्रियों के भोग-विलास में मन भी रम जाता है।
बुद्धि इनके पीछे चल देती है। उदाहरण के तौर पर रसीला स्वाददार भोजन करते समय
इंद्रियां पूरी तरह उसमें डूबी रहती हैं, बुद्धि भी उसमें रम जाती है, जबकि बुद्धि का काम यह था कि वह
चेतावनी दे, यह रस पेट में जाकर नुकसान पहुंचा सकता है। मन तो खानपान में रम ही गया था,
बुद्धि को और ले
डूबा। मन को भटकना खूब पसंद है। भटकते-भटकते वह भोगों का स्मरण करता है। यहीं से
वह उसे क्रिया में बदलने की कोशिश करता है।
हमें ध्यान रखना होगा कि जब हम बुद्धि का काम कर रहे हों, तब मन व्यवधान न पहुंचाए,
वरना एकाग्रता चली
जाएगी और परिणाम गलत होगा। मन की शक्ति एक ही होती है, लेकिन समझ, अनुभव और जागरूकता के
कारण उसका रूप बदल जाता है।
अच्छी संगति होगी, तो मन बुद्धि के सदुपयोग में बाधा नहीं पहुंचाएगा और हम
श्रेष्ठ कार्य कर जाएंगे, वरना मन हरकतें करेगा- अपने सहकर्मियों को देख काम जाग जाना,
साथियों की सफलता
देख ईष्र्या होना, बॉस के प्रति षड्यंत्र में रमना या अधीनस्थों को व्यर्थ प्रताड़ित करना,
सब मन के खेल हैं।
करता मन है, बदनाम बुद्धि हो जाती है। यह अंतर केवल अवेयरनेस से आएगा, जिसका जन्म योग से होता
है।
संत बहिणाबाई ने शिक्षा को विकास का आधार बताया
बहिणाबाई विख्यात महिला संत हुई हैं। एक बार सुबह वे अपनी बगिया में लगे
पेड़-पौधों को पानी दे रही थीं, तभी चार विद्वान उनके पास आए। विद्वानों ने उनसे कहा - ‘हम एक जिज्ञासा लेकर
आपके पास आए हैं। हमने वेदों का अध्ययन किया तथा विभिन्न शास्त्रों का भी ज्ञान
अर्जित किया है, किंतु हम उनका उपयोग करने में असमर्थ हैं।
हम देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर कार्य करना चाहते हैं, ताकि हर ओर विकास की
गंगा प्रवाहित हो, किंतु इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या करें, नहीं समझ पा रहे हैं।’ उनकी बात सुनकर बहिणाबाई
ने चारों विद्वानों से उनके लक्ष्य के विषय में जानना चाहा। पहले विद्वान ने कहा -
‘मैं देश
में सबको शिक्षित और सभ्य देखना चाहता हूं।’ दूसरा बोला - ‘मैं सबको सुखी व संपन्न
बनाना चाहता हूं।’ तीसरे ने कहा - ‘मैं सबको एकता के सूत्र में बांधना चाहता हूं।’
चौथे ने बताया - ‘मेरी इच्छा है कि मेरा देश एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विकसित हो।’
बहिणाबाई ने कहा -
‘आप सब
मिलकर शिक्षा का प्रसार करें।’ विद्वानों ने हैरानी जताई कि मात्र शिक्षा के प्रसार से ये
सारे लक्ष्य कैसे प्राप्त होंगे? तब बहिणाबाई ने समझाया - ‘शिक्षा से ज्ञान और विवेक की
प्राप्ति होती है। शिक्षित होने पर उद्यमता विकसित होगी। उद्यम से आय बढ़ेगी और
देश आर्थिक रूप से सक्षम होगा। आर्थिक सक्षमता से एकता स्थापित होगी और तभी
राष्ट्र शक्ति-संपन्न बनेगा।’ वस्तुत: शिक्षा ऐसी नींव है, जिस पर ज्ञान, संस्कार और उद्यमिता का
सुदृढ़ भवन खड़ा होता है। शिक्षा ही सर्वागीण विकास का आधार है।
धैर्य के बल पर भिक्षु ने ब्राह्मण की ‘ना’ को ‘हां’ में बदलवाया
प्राचीन सियालकोट में एक बार बौद्धों का बहुत बड़ा भिक्षु संघ आया। इस संघ को
यहां आकर एक ऐसे वेदपाठी ब्राह्मण के विषय में ज्ञात हुआ, जो इतना रूढ़िवादी था कि किसी
अवैदिक पंडित की छाया भी स्वयं पर नहीं पड़ने देता था। उसे सुधारने का बीड़ा एक
भिक्षु ने उठाया। अगले दिन वह अपना भिक्षा पात्र लेकर ब्राह्मण के घर पहुंच गया और
पूछा -‘कुछ
आहार-पानी की सुविधा है?’ उसकी बात सुनकर घर केसभी लोग मौन रहे और उसकी ओर घृणा की
दृष्टि से देखा। भिक्षु लौट आया। दूसरे दिन फिर गया और वही प्रश्न दोहराया। इस बार
भी उसे चुप्पी और तिरस्कार का सामना करना पड़ा। वह पुन: लौट गया। एक दिन जब वह
ब्राह्मण के घर पहुंचा तो ब्राह्मण वहां नहीं था। नित्य आने-जाने से ब्राह्मणी का
मन पसीज गया। वह बोली - ‘मैं तो तुम्हें आहार-पानी दे दूं, किंतु पंडितजी की नाराजी के कारण
विवश हूं।’ भिक्षु ने कहा - ‘कोई बात नहीं बहन, मैं अपना काम करता हूं, तुम अपना करो।’ वापस लौटते हुए भिक्षु
को ब्राह्मण मिल गया।
उसने भिक्षु को खूब खरी-खोटी सुनाई, तब भिक्षु ने कहा - ‘इतने दिनों तक आपके घर से कुछ
नहीं मिला, किंतु आज आपकी पत्नी ने ‘ना’ दी है। अब किसी दिन ‘हां’ भी मिल जाएगी।’ ब्राह्मण थोड़ा शांत हुआ
और बोला -‘यह क्रम कब तक जारी रखोगे?’ भिक्षु ने उत्तर दिया -‘जब तक जीवित हूं।’ उसका धैर्य देख ब्राह्मण
का अहंकार पिघल गया और उसने भिक्षु से क्षमा मांगी। वस्तुत: धैर्य व सहिष्णुता के
बल पर बड़ी से बड़ी प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदला जा सकता है।
महात्मा से राजा और सेठ ने पढ़ा संबंधों की मधुरता का पाठ
एक राजा और नगर सेठ में घनिष्ठ मित्रता थी। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार
करता था। एक दिन नगर सेठ को पता चला कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। यह सुनते ही सेठ
के मन में विचार आया कि यदि राजा की मृत्यु हो जाए तो उनके परिजन चंदन की लकड़ियां
उसी से खरीदेंगे।
इससे उसे मुनाफा होगा। शाम को सेठ राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि
इस नगर सेठ ने मुझसे मित्रता करके अपार दौलत कमा ली होगी। कोई ऐसा नियम बनाना चाहिए,
जिससे इसका सारा
धन राज्य के खजाने में जमा हो जाए।
एक दिन नगर सेठ से रहा नहीं गया। उसने राजा से पूछा - ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्ते
में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा - ‘मुझे भी ऐसा ही लग रहा है। चलो
नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं उनसे इसका हल पूछें।’ दोनों ने महात्मा को अपनी उलझन
बताई, तो
वे बोले - ‘पहले आप दोनों शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, किंतु अब संभवत: कुछ बुरे विचार
आ गए हैं।’
जब नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की भावनाएं महात्मा को बताईं तो वे सेठ से
बोले - ‘तुमने
यह क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का महल बनवाने की बात आए?
इससे तुम्हारे
चंदन की बिक्री बढ़ जाती।
तुमने राजा के लिए गलत सोचा, इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए कुविचार आया। गलत सोच
ने दूरियां बढ़ा दीं। अब दोनों अपना मन शुद्ध कर लो, तो फिर पहले जैसा सुख मिलेगा।’
वस्तुत: विचारों
की पवित्रता से ही संबंधों में स्नेह की मिठास बनी रहती है, इसलिए मन सदा शुद्ध रखें।
संत के सान्निध्य से राजा को हुआ आत्म-साक्षात्कार
एक विख्यात संत के पास एक राजा मिलने पहुंचा और बोला - ‘आप मुझे उस स्थिति में ले जाएं,
जिसमें आप पहुंच
गए हैं।’ संत
ने कहा - ‘अवश्य ले चलूंगा, किंतु एक शर्त है। कल सुबह चार बजे मेरी कुटिया में बिलकुल अकेले आना।’
राजा बोला - ‘ठीक है।’ संत ने कहा - ‘तो भी तुम अकेले नहीं
रहोगे। अध्यात्म की भाषा में अकेले होने का अर्थ है अपने मन को भी साथ न लाना।’
राजा विस्मित होकर बोला - ‘ऐसा क्यों करना होगा?’ संत ने उत्तर दिया - ‘मेरी अवस्था में पहुंचने
के लिए अपने भीतर के ‘मैं’ को
समाप्त करना होगा। मैं तुम्हारे भीतर के ‘मैं’ को डंडा मारकर समाप्त कर दूंगा।’ राजा के मन में भय हुआ कि संत
पता नहीं किसे डंडा मारेंगे। मगर राजा में लगन सच्ची थी, इसलिए वह सुबह जाकर संत के पास
बैठ गया। एक घंटे तक संत भी मौन रहे और राजा भी।
जब सूर्योदय हुआ और सूरज की प्रथम किरण राजा के चेहरे पर पड़ी, तो उसे अत्यधिक आनंद की
अनुभूति हुई। तब संत ने राजा से कहा - ‘मुझे उस ‘मैं’ को दे दो, ताकि मैं उसे मार सकूं।’ यह सुनकर राजा बोला-‘वह ‘मैं’ तो मुझे नहीं मिला,
किंतु अभी जो मिल
रहा है, वह
मैं व्यक्त नहीं कर सकता।
बस, आज
मुझे और दिनों से सर्वथा अलग लग रहा है, जो बहुत आनंददायी है।’ संत मुस्कराकर बोले - ‘यही वह स्थिति है,
जो तुम जानना
चाहते थे। इसे हम आनंद की स्थिति कहते हैं। वास्तव में मन का अभाव और ‘मैं’ की मृत्यु व्यक्ति को
इसी आनंद की अनुभूति कराती है, जिसके अगले कदम पर परमात्मा होता है।’
गौतम बुद्ध से शिष्य श्रोण ने जाना संतुलित जीवन का राज
गौतम बुद्ध से राजकुमार श्रोण ने दीक्षा ली थी। एक दिन बुद्ध के अन्य शिष्यों
ने श्रोण की शिकायत करते हुए कहा कि श्रोण तप की उच्चतम सीमा पर पहुंच गया है,
जिसे देखकर चिंता
होती है। सारे भिक्षु एक दिन में एक बार भोजन करते हैं तो श्रोण दो दिन में एक बार
भोजन करता है। अन्न-जल ग्रहण नहीं करने से वह अत्यधिक कमजोर हो गया है।
चूंकि वह पहले राजसी जीवन जीता था, इसलिए इतने त्यागमय जीवन का वह आदी नहीं है। वह
हड्डियों का ढांचा रह गया है। यह सुनकर बुद्ध ने श्रोण को बुलाकर कहा - ‘मैंने सुना है कि तुम
सितार बहुत अच्छा बजाते थे।
क्या मुझे सुना सकते हो?’ श्रोण बोला - ‘हां, मैं आपको सितार सुना सकता हूं, किंतु आप अचानक सितार क्यों
सुनना चाहते हैं?’ बुद्ध ने कहा - ‘न सिर्फ सुनना चाहता हूं, बल्कि उसके विषय में जानना भी चाहता हूं। मैंने सुना है कि
यदि सितार के तार बहुत ढीले हों या अत्यधिक कसे हुए हों तो उनसे संगीत नहीं पैदा
होता।’ श्रोण
बोला - ‘यह
सही है।
यदि तार ढीले होंगे तो सुर बिगड़ जाएंगे और अधिक कसे होने की स्थिति में वे
टूट जाएंगे। तार मध्य में होने चाहिए।’ तब बुद्ध ने उसे समझाया - ‘जो सितार के तार का नियम है,
वही जीवन की
तपस्या का भी नियम है।
मध्य में रहो। न भोग की अति करो, न तप की। अपने अध्यात्म को संतुलित दृष्टि से देखो।’
श्रोण समझ गया कि
मध्य में रहकर ही जीवन रूपी सितार से संगीत का आनंद उठाया जा सकता है। वस्तुत:
जीवन में अनुशासन और तप आवश्यक है, किंतु एक संतुलन के साथ, क्योंकि अति हर चीज की बुरी होती
है।
लालच में आकर पड़ोसियों ने गंवाए अपने बर्तन
एक बार किसी व्यक्ति ने अपने घर कथा का आयोजन किया और रिश्तेदारों सहित
पड़ोसियों को भी आमंत्रित किया। चूंकि ऐसे अवसरों पर भोजन हेतु अधिक बर्तनों की
आवश्यकता होती है, अत: उस व्यक्ति ने अपने पड़ोसियों से ढेर सारे बर्तन मांगे और सभी को शानदार
दावत दी।
अगले दिन जब उसने पड़ोसियों के बर्तन लौटाए तो सभी बर्तनों के साथ उन्हीं के
जैसा एक-एक छोटा बर्तन भी साथ रखकर भिजवाया। जब पड़ोसियों ने इसका कारण पूछा,
तो उसने कहा कि
रात को तुम्हारे बर्तनों ने बच्चे दिए, सो ये भी तुम्हारे ही हुए।
पड़ोसी प्रसन्न हो गए, क्योंकि हर बर्तन के साथ मुफ्त में एक छोटा बर्तन भी मिल
गया। कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति अपने यहां भोज के आयोजन के बहाने फिर पड़ोसियों के
घर बर्तन मांगने गया। पड़ोसियों ने खुशी-खुशी अपने बर्तन उसे दे दिए।
कइयों ने तो घर के सभी बर्तन उसे दे दिए और अनेक ऐसे थे, जिन्होंने उसके मांगे
हुए बर्तनों से अधिक बर्तन उसे दिए। अगले दिन जब उसने बर्तन वापस नहीं किए तो सभी
लोग उसके घर पहुंचे। तब उसने उन सभी को एक खाली कमरा खोलकर दिखाते हुए कहा कि उनके
बर्तन भगवान को प्यारे हो गए।
अब मैं कहां से आपके बर्तन लाऊं? सारे लोगों ने सिर पीट लिया, क्योंकि पहले जब उसने बर्तनों के
साथ उन्हें अधिक बर्तन दिए, तब लोभवश किसी ने इस असंभव बात का विरोध नहीं किया था। सार
यह है कि जब लालच में आकर हम किसी गलत बात का विरोध नहीं करते हैं और फिर हानि की
स्थिति बनती है तो उसका विरोध असंभव हो जाता है।
बुद्धि को जाग्रत कर इंद्रियों का बहाव रोक सकते हैं
अच्छे और बुरे, दोनों प्रकार के विचार बनाने की शक्ति हर मनुष्य में होती है। सही और गलत का
अंतर अधिकांश लोगो को मालूम भी होता है, लेकिन फिर भी रुचि हावी हो जाती है और वे इस फर्क के
महत्व को भूल जाते हैं। कई बार हमें महसूस होता है कि जो काम हमें करना चाहिए या
जिस नियम से हम बंधे हैं, उसका पालन नहीं करते। पछतावा भी होता है, फिर भी गलत करते ही जाते
हैं। जिस प्रकार दफ्तरों में कुछ विभाग होते हैं, विभाग प्रमुख होते हैं, सबका अपना-अपना दायित्व
होता है।
आप किसी भी भूमिका में हों, मामला दायित्व बोध का है। इसी बात को आध्यात्मिक दृष्टि से
देखें। अध्यात्म में जिस तरह से व्यवस्था बाहर है, वैसी ही व्यवस्था भीतर भी होती
है। बाहर की व्यवस्था से परिस्थिति बदलती है और भीतर की व्यवस्था को जान लेने से
मन: स्थिति बदल जाती है। जिसका मनोस्थिति पर नियंत्रण है, वह बाहर की स्थिति पर ज्यादा
लगाम रख सकेगा।
थोड़ा भीतर की व्यवस्था को जानें। शरीर, मन और बुद्धि इन तीनों पर हमें
अलग-अलग स्थितियों में नियंत्रण करना आना चाहिए। मन अपने वेग के लिए जाना जाता है,
इसीलिए वह
इंद्रियों पर सवार रहता है। इंद्रियां सदैव सुख चाहती हैं, भोग चाहती हैं। मन और इंद्रियां
मिलीं कि उनकी तेज गति के पीछे बुद्धि भी बहने लगती है।
ऐसी स्थिति में बुद्धि का काम यह चेतावनी देना था कि बहुत अधिक मिठाई न खा ली
जाए, क्योंकि
स्वाद में मीठी है, पर पेट में जाकर परिणाम दूसरा हो सकता है। जहां बुद्धि को चेतावनी देकर रोकना
था, वह मन
के साथ मिल जाती है और मन पहले से मिठाई के साथ घुला हुआ था।
यहीं से व्यक्तित्व मे भटकाव आता है। मिठाई वाली बात तो एक उदाहरण है। ऐसा कई
अलग-अलग परिस्थितियों और लोगों के साथ होता रहता है। इसलिए हमें मन की शक्ति को
अपने अधिकार से निष्क्रिय करना होगा, इंद्रियों के बहाव को रोकना होगा और बुद्धि को
जाग्रत रखना होगा। भीतर की व्यवस्था संभली तो बाहर का सिस्टम अपने आप ठीक हो
जाएगा।
राष्ट्रकवि दिनकर ने बताया साहित्य का महत्व
जब पं. जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्हीं के प्रयासों से कवि
सम्मेलन शुरू हुआ था। उस समय राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर जैसे महान रचनाकार इस
सम्मेलन में शिरकत करते थे। एक बार जब कवि सम्मेलन आयोजित किया गया और काव्यपाठ के
बाद जब समापन की बेला आई, उस समय पं. नेहरू और दिनकर अपने कुछ साथियों के साथ वापस
लौट रहे थे। लौटते समय दिनकर अपने मित्रों के साथ आगे थे और पं. नेहरू उनके पीछे।
सीढ़ियों से उतरते वक्त अचानक पंडितजी का पैर फिसला और वे गिरते, इससे पहले ही उन्होंने
अपने दो कदम आगे चल रहे दिनकर के कंधे पर हाथ रख दिया। आभार व्यक्त करते हुए पं.
नेहरू ने कहा - दिनकरजी शुक्रिया, आज आपके कारण मैं हादसे का शिकार होते-होते बच गया।
मैत्री के ही भाव में दिनकर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया - कोई बात नहीं
पंडितजी, जब-जब
किसी देश की राजनीति लड़खड़ाती है, साहित्य उसे सहारा देता है। साहित्य का धर्म है कि वह समाज
को सही दिशा की ओर उन्मुख करे। गौरतलब है कि रूस के साम्यवादी आंदोलन से लेकर
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तक में साहित्यकारों ने समाज को जाग्रत और आंदोलित करने
में बड़ी भूमिका निभाई। यह भी कि कई पुस्तकें इसलिए तत्कालीन तानाशाह सरकारों ने जब्त
कर लीं क्योंकि उनकी सामग्री न केवल गलत दिशा में चली राजनीति को ठीक करने वाली थी,
अपितु उसके माध्यम
से समाज को भी सही दिशा की ओर जाने के संकेत दिए गए थे।
बालक ने युवा होने पर सीखा ध्यान का रहस्य
एक आश्रम में एक वीतरागी संत रहते थे। उनके साथ एक अनाथ बालक भी रहता था। संत
को देख उस बालक को भी ध्यान सीखने की इच्छा हुई। वह संत के पास जाकर बोला - ‘गुरुजी! मुझे भी ध्यान
सिखाइए।’
संत ने उसे समझाया कि उसकी उम्र अभी ध्यान सीखने की नहीं है, अभी वह भक्ति सीखे,
किंतु बालक जिद पर
अड़ा रहा। उसकी हठ देखकर संत ने जोर से ताली बजाकर कहा - ‘ये दो हाथों की ताली की आवाज है।
अब जाकर एक हाथ की ताली की आवाज खोजो।’ बालक ने सोचा कि यदि एक हाथ की ताली की आवाज ही
ध्यान है, तो वह निश्चित ही अत्यंत मधुर व अद्भुत आवाज होगी।
बालक दिन-रात एक ताली की आवाज ढूंढ़ने में लग गया। एक दिन वह जंगल में एक सूने
स्थान पर बैठा था। वहां मंद-मंद हवा से पत्ते सरसरा रहे थे। उसे लगा कि पत्तों की
इस सरसराहट में जो दिव्य शांति है, वही एक हाथ की ताली की आवाज है।
वह दौड़कर संत के पास गया और वैसी ही आवाज निकाली। संत ने कहा - ‘यह पत्तों की सरसराहट की
आवाज है, एक
हाथ की ताली की आवाज नहीं। और ढूंढ़ो।’ यह सिलसिला चलता रहा। हर बार संत ने अस्वीकार कर
बालक को लौटा दिया।
बालक अठारह वर्ष का हो गया। एक दिन वह गुरुजी के पास जाकर बैठा और आंखें बंद
कर गहरे मौन में डूब गया। गुरुजी कुछ नहीं बोले, क्योंकि एक हाथ की ताली की आवाज
जो भंग हो जाती। वस्तुत: ध्यान मन की एकाग्रता पर ही संभव है और मन की एकाग्रता
योग्य गुरु के मार्गदर्शन तथा कठिन अभ्यास से आती है।
बुजुर्ग शेर से शावक ने पाई जीवन जीने की शिक्षा
जैन साहित्य में एक कथा है। शेर का एक बच्च अपने माता-पिता से बिछुड़ गया। वह
इधर-उधर घूम रहा था कि उसे बकरियों का एक झुंड दिखाई दिया। वह उस झुंड में शामिल
हो गया। लंबे समय तक वह उन बकरियों के साथ रहा। इस कारण उसका आचरण बकरियों जैसा हो
गया। वह न तो दहाड़ता था और न कोई वीरता दिखाता था, क्योंकि वह शेरों के साथ रहा ही
नहीं था।
एक दिन एक बुजुर्ग शेर ने उसे बकरियों के झुंड में देखा। वह समझ गया कि यह है
तो शेर का बच्चा, किंतु शेरों के साथ नहीं रहने के कारण उसका आचरण शेर जैसा नहीं है। तब उस
बुजुर्ग शेर ने जोर से गर्जना की, जिससे सारी बकरियां डरकर भाग गईं, किंतु वह शेर का बच्च वहीं खड़ा
रहा।
यह देखकर बुजुर्ग शेर ने उसे समझाया - ‘तू बकरी नहीं है, जो मिमिया रहा है। तेरा
जीवन शेर जैसा होना चाहिए, क्योंकि तू शेर का बच्चा है, बकरी का नहीं। मेरे गरजने पर
बकरियां भाग गईं, किंतु तू नहीं भागा, क्योंकि तेरे भीतर का शेर आज भी जिंदा है।’ फिर बुजुर्ग शेर ने उसे
पानी के पास ले जाकर कहा - ‘देख, तेरा और मेरा चेहरा एक जैसा है। तू सिंहनाद कर और हमारी
टोली में आ जा। स्वयं को पहचान। वही जीवन जी, जो वास्तव में तेरे लिए है।’
शेर का बच्च पुन:
अपने समूह में चला गया।
कथा का प्रतीकार्थ यह है कि माया, मोह, क्रोध, हिंसा आदि विकारों में फंसकर मनुष्य भी उस शेर के बच्चे की
तरह यह विस्मृत कर देता है कि वह परमात्मा का ही अंश है और उसी की तरह सात्विक और
उदार दृष्टि से जीने में ही उसके जीवन की सार्थकता है।
युवक ने बुद्धिमानी के बल पर पाई राजा की कृपा
एक राजा कुशल प्रशासक था। प्रजा के सुख-दुख जानने के लिए वह प्राय: साधारण
वेशभूषा में उनके बीच घूमा करता था। एक दिन जब वह नगर भ्रमण कर रहा था तो कुछ
घुड़सवार अपनी ओर बढ़ते देखे। राजा समझ गया कि वे लुटेरे हैं और उन्हें लूटने की
नीयत से आ रहे हैं। राजा साहसी था, अत: घबराने के बजाय उनसे लड़ने के लिए तैयार हो गया। उसी
समय अचानक राजा के घोड़े का पैर एक गड्ढे में फंस गया।
घोड़ा एक कदम भी हिल-डुल नहीं पा रहा था। उधर लुटेरे बढ़ते चले आ रहे थे। तभी
कुछ नवयुवक वहां आए। वे स्थिति की गंभीरता को समझ गए और उन्होंने लुटेरों पर हमला
कर उन्हें भगा दिया। राजा ने अपना असली परिचय देते हुए उनमें से हर एक युवक को
अपनी इच्छित वस्तु मांगने के लिए कहा।
एक युवक ने धन मांगा, दूसरे ने मकान। तीसरे को सभासद पद चाहिए था, तो चौथे को खेत। पांचवें
ने अपने गांव तक सड़क बनवाने की मांग की और छठे ने कहा कि राजा वर्ष में दो बार
मेरे घर में मेहमान बनें।
राजा पांचों की इच्छा पूर्ण करने के बाद छठे के घर मेहमान बनकर आया तो उसे
जर्जर घर में रहना पड़ा और जमीन पर सोना पड़ा। तब राजा ने उसे एक शानदार मकान बनवा
दिया और राजा के प्रत्येक आगमन पर उसे कुछ न कुछ सौगात मिलती रही।
अपनी बुद्धिमानी से इस युवक ने राजा का आतिथ्य मांगकर स्वयं का जीवन सदा के
लिए खुशहाल बना लिया। सार यह है कि यथोचित लाभ पाने के लिए अवसरों का उपयोग
बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से करना चाहिए।
मुनि मरकडेय ने इंद्र का भय अंतत: निमरूल साबित किया
मुनि मरकडेय की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हुए कि कहीं मुनि उनके
सिंहासन पर अधिकार न कर लें। उन्होंने तय किया कि वे मरकडेय की तपस्या भंग कर
देंगे। एक दिन मुनि की अनुपस्थिति में इंद्र ने उनके आश्रम में बहुत-सा धन रखवा
दिया। जब मुनि लौटे तो देखकर हैरान रह गए। अपने शिष्यों को बुलाकर मरकडेय बोले - ‘यह धन मेरा नहीं है।
इसलिए इसे गरीबों में बांट दिया जाए।’ जब इंद्र ने देखा कि मुनि को धन का लोभ नहीं है,
तो वे एक राजा का
वेश धारण कर आश्रम पहुंचे और मुनि से बोले - ‘मुनिवर! मैं एक राजा हूं। मेरे
पास अपार संपत्ति है, किंतु कोई संतान नहीं है। मेरी इच्छा है कि आपको गोद लेकर, राजगद्दी पर बैठाकर
संन्यास ले लूं।’ मुनि ने कहा - ‘राजन! जिसने एक बार ईश्वर से नाता जोड़ लिया, वह धन और सिंहासन के मोह से ऊपर
हो जाता है। मुझे इनका कोई लोभ नहीं।
आपको संन्यास लेना है तो मैं यहां आपके लिए एक कुटिया बनवा दूंगा। इससे अधिक
मैं आपकी कोई सेवा नहीं कर सकता।’ मुनि का उत्तर सुन इंद्र अपने असली रूप में प्रकट हो गए और
बोले - ‘मुझे
आपकी कठोर तपस्या से भय हुआ कि कहीं आप मेरे सिंहासन पर अधिकार न कर लें, इसलिए आपकी तपस्या भंग
करने के लिए यह सब किया।’ तब मरकडेय ने कहा - ‘देवेंद्र! आपको जब स्वयं पर ही
विश्वास नहीं है, तो राजकाज कैसे चलाएंगे? संन्यासी को सिंहासन की नहीं, समाज की चिंता होती है।’ इंद्र लज्जित होकर लौट
गए। वस्तुत: भौतिक आकर्षणों से निर्लिप्त रहने वाला ही साधुता की कसौटी पर खरा
उतरता है।
कठोर श्रम से भाग्य की कुंजी पाई पंडितजी ने
किसी गांव में एक निर्धन पंडित रहा करते थे। वे सोचते थे कि भाग्य से ही सबकुछ
मिलता है। जब उनका पुत्र अपनी गरीबी के विषय में पूछता तो वे कहते कि सब भाग्य का
खेल है। एक दिन उनके पुत्र ने यही प्रश्न गांव के मंदिर के पुजारी से किया।
पुजारी ने उसे अगले दिन अपने पिता के साथ आने के लिए कहा। जब दोनों पुजारी के
पास पहुंचे, तो पुजारी ने पुत्र के हाथों की रेखाएं देखकर कहा - ‘पंडितजी! आपका बेटा बड़ा
भाग्यशाली है, किंतु इस पर एक ग्रह का बुरा असर है। एक अनुष्ठान करने से वह कुप्रभाव खत्म हो
जाएगा।’ पंडितजी
ने पूछा - ‘हमें क्या करना होगा?’ पुजारी ने कहा - ‘यदि आप दोनों मिलकर आश्रम के आंगन में एक कुआं खोदो
तो ग्रह का बुरा असर तो समाप्त हो जाएगा।’ पिता-पुत्र कुआं खोदने में जुट गए। कई दिनों के कड़े
परिश्रम के बाद उन्हें एक घड़ा दिखाई दिया।
वे उस घड़े को पुजारी के पास लेकर गए। पुजारी ने घड़े के ऊपर बंधे कपड़े को
हटाया तो उसमें स्वर्ण मुद्राएं भरी दिखाई दीं और कागज का एक पर्चा भी उसमें था।
पुजारी ने पर्चा हाथ में लेकर स्वर्ण मुद्राएं पंडितजी को देते हुए कहा - ‘यह आपके भाग्य का है।’
यह सुनकर पुत्र ने
पंडितजी से पूछा - ‘आपने बताया नहीं कि भाग्य क्या होता है?’ पुजारी ने पर्चा उसे दिया,
जिसमें लिखा था- ‘भाग्य का दूसरा नाम कर्म
है।’ अब
पंडितजी को समझ में आया कि भाग्य अपने आप में कुछ नहीं होता। कर्म करने से भाग्य
साथ देता है। सार यह है कि अकर्मण्यता दुर्भाग्य को आमंत्रण देती है और कर्मठता से
भाग्य खुल जाते हैं।
जब चोर के स्थान पर लालची चरवाहे ने पाई सजा
एक गांव में एक चोर चोरी के इरादे से आया और ग्रामीणों द्वारा पकड़ लिया गया।
उन्होंने उसे एक पेड़ से बांध दिया। फिर विचार करने लगे कि इसे क्या सजा दी जाए?
आखिर तय हुआ कि गांव के मुखिया से पूछा जाए। चोर को वहीं बंधा छोड़कर सब
मुखिया के पास चले गए। इधर उस चोर को एक चरवाहे ने देखा। वह भेड़ों का रेवड़ लेकर
चराने जा रहा था। उसने चोर से पूछा - ‘तुम कौन हो और यहां तुम्हें किसने बांधा है? तुमने ऐसा क्या किया था?’
चोर ने कहा - ‘यहां कुछ चोर-डाकू आए थे, जो लोगों को लूटकर धन कमाते हैं। पाप से बचने के लिए वे धन
को दान भी करते हैं। कई दिनों से वे सोने की मोहरें दान करना चाहते थे, किंतु लेने वाला कोई
नहीं मिल रहा था। मैं एक सच्चा फकीर हूं।
मैंने मोहरें लेने से मना किया, तो वे मुझे जबर्दस्ती बांध गए। वे अपनी पाप की कमाई
लेने गए हैं, जिसे मुझे जबरन देंगे, जबकि मैं उससे दूर रहना चाहता हूं।’ चोर की बात सुनकर चरवाहे के मन
में लोभ जाग गया। उसने कहा - ‘मैं तुम्हें छोड़ देता हूं।
तुम मुझे अपनी जगह बांध दो। अभी अंधेरा हो रहा है। अंधेरे में वे मुझे नहीं
पहचान पाएंगे और मोहरें मुझे दे देंगे, जिससे मेरी गरीबी दूर हो जाएगी।’ चोर ने यही किया और
चरवाहे का रेवड़ लेकर चला गया। उधर ग्रामीणों को मुखिया ने चोर को समुद्र में
फेंकने का आदेश दिया। ग्रामीणों ने चरवाहे को समुद्र में फेंक दिया। इस प्रकार
लालच ने चरवाहे के प्राण ले लिए। सार यह है कि लालच का परिणाम सदैव आत्मघाती ही
होता है। अत: इससे दूर रहकर संतोषी जीवन जीना चाहिए।
व्यापारी ने मृत्यु के भय से किया कुप्रवृत्तियों का त्याग
एक व्यापारी बुरी आदतों का शिकार था। वह चाहता था कि इनसे मुक्ति मिल जाए,
किंतु बहुत प्रयास
के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया। फिर उसे किसी ने संत फरीद के बारे में बताया।
वह तत्काल उनके पास पहुंचा और अपने विषय में सब कुछ बताकर पूछा - मेरी बुरी
आदतें कैसे छूटेंगी? किंतु फरीद ने उसकी बात को अनसुना कर दिया। वह भी धुन का पक्का था। उसने
प्रतिदिन फरीद के पास आकर पूछना जारी रखा। फरीद ने भी उसे रोज टाला।
एक दिन जब वह जिद पर उतर आया तो वे बोले - मैं तुम्हें क्या मार्ग दिखाऊं?
तुम्हारा जीवन अब
चालीस दिनों से अधिक नहीं है। इतने कम समय में कैसे तुम सुधरोगे? यह सुनते ही व्यापारी
तनाव में घिर गया। इसके बाद वह दुख, भय, पश्चाताप और भजन-पूजन में लगा रहा। जब चालीस दिन खत्म होने
में एक दिन शेष बचा तो संत फरीद ने उसे बुलाकर पूछा - इन उनचालीस दिनों में कितनी
बार तुमने दुष्टतापूर्ण कर्म किए?
व्यापारी बोला - हैरानी की बात है कि इतने दिनों में एक बार भी मेरे मन में
कोई गलत विचार नहीं आया। मन पर हर क्षण मृत्यु का डर बना रहा। तब संत ने उसे
समझाया - बुराइयों से बचने का एकमात्र उपाय है कि हर क्षण मृत्यु को याद रखो और
ऐसे काम करो, जिनसे आत्मा को सुकून मिले। व्यापारी फरीद के सुधार का तरीका समझ गया और उनके
प्रति आभार व्यक्त कर निष्पाप जीवन जीने का संकल्प लिया। वस्तुत: मानव जीवन
क्षणभंगुर है, इसलिए सदैव सदचिंतन और सत्कर्म करें।
जमींदार ने झूठ बोलकर भी पाया सच बोलने का पुण्य
एक किसान की फसल पाले ने बर्बाद कर दी। उसके घर में अन्न का एक दाना भी नहीं
बचा। गांव में ऐसा कोई नहीं था, जो किसान की सहायता करे। किसान सोचता रहा कि वह क्या करे।
जब कोई उपाय नहीं सूझा तो वह एक रात जमींदार के बाड़े में जाकर उनकी एक गाय चुरा
लाया। जब सुबह हुई तो उसने गाय का दूध दुहकर अपने बच्चों को भरपेट पिलाया।
उधर जमींदार के नौकरों को जब पता चला कि किसान ने जमींदार की गाय चुराई है तो
उन्होंने जमींदार से शिकायत की। जमींदार ने पंचायत में किसान को बुलाया। पंचों ने
किसान से पूछा - यह गाय तुम कहां से लाए? किसान ने उत्तर दिया - इसे मैं मेले से खरीदकर लाया
हूं। पंचों ने बहुत घुमा-फिराकर सवाल किए, किंतु किसान इसी उत्तर पर अडिग रहा। फिर पंचों ने
जमींदार से पूछा - क्या यह गाय आपकी ही है? जमींदार ने किसान की ओर देखा तो
उसने अपनी आंखें नीची कर लीं। तब जमींदार ने कहा - पंचो मुझसे भूल हुई। यह गाय मेरी
नहीं है। पंचों ने किसान को दोषमुक्त कर दिया।
घर पहुंचने पर जमींदार के नौकरों ने झूठ बोलने का कारण पूछा तो जमींदार बोला -
उस किसान की नजरों में उसका दर्द झलक रहा था। मैं उसकी विवशता समझ गया। यदि मैं सच
बोलता तो उसे सजा हो जाती। इसलिए मैंने झूठ बोलकर एक परिवार को और अधिक संकटग्रस्त
होने से बचा लिया। वस्तुत: किसी के भले के लिए बोला गया झूठ पूर्णत: धार्मिक है,
क्योंकि
संकटग्रस्त की सहायता के लिए साधन की पवित्रता नहीं, बल्कि साध्य की सात्विकता देखी
जाती है।
कष्टों में तपकर खरा सोना बने दयानंद सरस्वती
दंडी स्वामी बहुत बड़े विद्वान थे। वे सत्य के आग्रही थे और अहंकार व पाखंड से
दूर रहते थे। उनका आश्रम मथुरा में था, और उनसे शिक्षा पाने दूर-दूर से लोग आते थे। उनके
शिष्यों में दयानंद भी थे। सभी शिष्यों के मध्य आश्रम के कार्यो का स्पष्ट विभाजन
था, किंतु
दयानंद से अधिक काम लिया जाता था। उन्हें भोजन भी कम दिया जाता, जिसमें मात्र गुड़ व
भुने हुए चने होते थे।
रात में पढ़ने के लिए प्रकाश की सुविधा भी उन्हें नहीं दी जाती थी। जबकि
दूसरों शिष्यों को अनेक प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं। स्वामीजी के शिष्य दयानंद
के प्रति उनके इस व्यवहार से चकित थे और परस्पर बातचीत में इसकी निंदा भी करते थे,
किंतु दयानंद को
गुरु की निंदा असहनीय थी। वे अन्य शिष्यों को ऐसा करने से रोकते थे और सदैव खुश
रहकर गुरु की आज्ञा का पालन करते थे।
एक दिन एक शिष्य ने स्वामीजी से इसका कारण पूछा, तो वे मौन ही रहे। अगले दिन
उन्होंने अपने शिष्यों के मध्य शास्त्रार्थ कराने का निर्णय लिया। सभी शिष्यों को
बुलाकर उन्हें बहस हेतु एक विषय दे दिया, किंतु सारे शिष्यों को एक तरफ और दयानंद को अकेले
दूसरी तरफ बैठाया। शास्त्रार्थ शुरू हुआ। सभी शिष्यों पर दयानंद भारी पड़े और जीत
गए।
तब दंडी स्वामी ने शेष शिष्यों से कहा- देखा आप लोगों ने, दयानंद अकेला आप सबसे
लोहा ले सकता है, क्योंकि वह हर काम पूर्ण समर्पण से करता है। दयानंद खरा सोना है और सोना आग
में तपकर ही निखरता है। यही दयानंद आगे चलकर भारत के महान समाज सुधारक दयानंद सरस्वती
के नाम से विख्यात हुए।
भगवान राम और लक्ष्मण ने ऐसे पाई थी व्यावहारिक शिक्षा
राजा दशरथ ने अपने चारों पुत्रों- राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को अध्ययन हेतु
महर्षि वशिष्ठ के आश्रम भेजा था। उनके लिए राजमहल में भी शिक्षण की व्यवस्था हो
सकती थी, किंतु
आश्रम इसलिए भेजा गया ताकि एक अनुशासन के भीतर रहकर वे शिक्षा प्राप्त करें और
शिक्षा के वास्तविक अर्थ को आत्मसात करें।
चारों राजपुत्रों ने आश्रम में रहकर सामान्य शिष्यों की तरह परिश्रम किया और
पूर्णत: अनुशासन में रहकर शिक्षा ग्रहण की। जब वे शिक्षा पूर्ण कर अयोध्या लौटे तब
एक दिन ऋषि विश्वामित्र ने दशरथ के पास आकर अपनी समस्या बताते हुए कहा - वन में
स्थापित हमारे आश्रमों को राक्षस नष्ट कर रहे हैं। वे हमें यज्ञ नहीं करने देते और
हमारे युवा ऋषि-मुनियों को परेशान करते हैं। हमारी संस्कृति खतरे में है।
कृपा कर आप अपने दो पुत्र राम और लक्ष्मण यज्ञादि के रक्षार्थ हमें प्रदान
करें। दशरथ तैयार नहीं हुए, क्योंकि उनका विचार था कि राजकुमारों ने अपनी शिक्षा आश्रम
में रहकर प्राप्त कर ली और अब उन्हें राजमहल में ही रहकर आगे का ज्ञान प्राप्त
करना चाहिए। तब गुरु वशिष्ठ ने उन्हें समझाया - राजन! इन्हें विश्वामित्र के साथ
भेज दीजिए, क्योंकि व्यावहारिक ज्ञान उन्हें उनसे ही प्राप्त होगा।
दशरथ ने राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया और राक्षसों का दमन कर
उन्होंेने अपनी शिक्षा की व्यावहारिकता ग्रहण की। सार यह है कि किताबी ज्ञान व्यावहारिक
ज्ञान तक पहुंचकर ही पूर्णता पाता है। इसलिए अपनी संतानों को सैद्धांतिक शिक्षा के
साथ व्यावहारिक शिक्षा भी दें।
बुजुर्ग के अनुभव से सेठपुत्रों को संकट में मिला धन
एक सेठ के पास अपार संपत्ति थी। एक दिन उनके मन में विचार आया कि एक भव्य शिव
मंदिर का निर्माण करवाएं। छह माह में मंदिर बनकर तैयार हो गया। मंदिर निर्माण में
लगे धन के अलावा जो धन सेठ के पास शेष था, उन्होंने उसे मंदिर के गुंबद में गुप्त रीति से भरवा
दिया।
इस बात का उल्लेख उन्होंने अपने बहीखातों में भी कर दिया। इसके बाद वे
तीर्थयात्रा पर निकल पड़े, किंतु रास्ते में ही उनका अवसान हो गया। सेठजी के चार पुत्र
थे और चारों ही व्यापारी थे। सेठजी की मृत्यु के थोड़े ही दिनों बाद उन्हें
व्यापार में घाटा होने लगा। अब चारों को धन की आवश्यकता पड़ी। तब उन्होंने पिता के
पुराने बहीखातों को टटोलना शुरू किया। इनमें से एक में गुंबद में धन वाली बात का
उल्लेख था।
उसमें यह भी लिखा था कि धन चैत्र शुक्ल नवमी के दिन गुंबद में भरवाया गया था।
चारों ने गुंबद तुड़वाया, किंतु धन नहीं मिला। तब वे अपने पिता के परम मित्र एक
बुजुर्ग के पास गए और अपनी समस्या बताई। बुजुर्ग ने उन्हें चैत्र शुक्ल नवमी के
दिन बारह बजे आने को कहा। तय दिन व समय पर बुजुर्ग ने उस स्थान को खुदवाना शुरू
किया, जहां
गुंबद की छाया पड़ती थी।
गुंबद की छाया में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन दोपहर बारह बजे धन भरा गया था और
उसी माह, दिन
और समय पर गुंबद की छाया पड़ने वाले स्थान पर खुदाई कराने से धन मिल गया। चारों ने
बुजुर्ग का आभार माना और उस धन से अपने व्यापार को पुन: खड़ा किया। उक्त कथा
बुजुर्गो की अनुभव संपन्नता को इंगित करती है। जो युवा पीढ़ी के लिए सदैव
मार्गदर्शक होती है।
सेनापति को अपने व्यवहार से ही मिल गया सवाल का जवाब
एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक
सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नर्क के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण
परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यो के बारे में सविस्तार बताया।
उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल-सूरत से तो आप सेनापति नहीं, भिखारी लगते हैं। मुझे
विश्वास नहीं होता कि आपमें हथियार उठाने की क्षमता भी होगी। दार्शनिक की अपमानजनक
बातें सुनकर सेनापति को गुस्सा आ गया। उसने म्यान से तलवार निकाल ली। यह देख
दार्शनिक ठहाका लगाते हुए बोले - अच्छा तो आप तलवार भी रखते हैं। यह शायद काठ की
होगी। लोहे की होती तो अब तक आपके हाथ से छूटकर गिर गई होती। अब तो सेनापति आपे से
बाहर हो गया।
उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गईं और वह दार्शनिक पर हमला करने को उद्यत हो गया।
तभी दार्शनिक ने गंभीर होकर कहा - बस यही नर्क है। क्रोध में उन्मत्त होकर आपने
अपना विवेक खो दिया और मेरी हत्या करने को तत्पर हो गए। दार्शनिक की बात सुनकर
सेनापति ने शांत होकर तलवार म्यान में वापस रख ली। तब दार्शनिक ने कहा - विवेक
जाग्रत होने पर व्यक्ति को अपनी भूलों का अहसास होने लगता है।
मन शांत होने से स्थिरता आती है और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है। यही
अनुभूति स्वर्ग है। सेनापति को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। सार यह है कि
आत्मनियंत्रण से विवेक उपजता है, जिसके कारण अनुचित कर्म या व्यवहार पर रोक लगती है और जीवन
में शांति व संतोष की अनुभूति होती है।
घूम-घूमकर भोजन कराने वाला शिष्य बना प्रशंसा का पात्र
गंगा किनारे गुरु अभेंद्र का आश्रम था। एक बार देश में भीषण अकाल पड़ा। गुरु
अभेंद्र ने संकटग्रस्तों की मदद के उद्देश्य से अपने तीन शिष्यों को बुलाकर कहा -
ऐसे संकट के समय में हमें अकाल पीड़ितों की सेवा करनी चाहिए। तुम लोग अलग-अलग
क्षेत्रों में जाकर भूखों को भोजन कराओ।
उनकी बात सुनकर शिष्य बोले - गुरुजी, हम इतने सारे लोगों को भोजन कैसे कराएंगे? हमारे पास न तो अन्न भंडार
है और न अनाज खरीदने के लिए धन। तब गुरु अभेंद्र ने उन्हें एक थाली देते हुए कहा -
यह थाली दिव्य है। तुम जितना भोजन मांगोगे, यह उतना भोजन उपलब्ध कराएगी।
तीनों शिष्य थाली लेकर निकल पड़े। दो शिष्य एक स्थान पर बैठ गए। उधर से जो भी
गुजरता, उसे
वे भोजन कराते। किंतु तीसरा शिष्य मोहन बैठा नहीं, बल्कि घूम-घूमकर भूखों को खोजता
रहा और उन्हें खाना बांटता रहा। कुछ दिनों बाद जब तीनों आश्रम लौटे, तो गुरु ने मोहन की खूब
प्रशंसा की। दोनों शिष्यों को यह अजीब लगा।
उन्होंने पूछा - गुरुदेव, हमने भी तो अकाल पीड़ितों की सेवा की है। फिर मोहन की ही
प्रशंसा क्यों? गुरु ने उत्तर दिया - तुमने एक ही स्थान पर बैठकर पीड़ितों की सहायता की। ऐसा
करने से वे लोग तुम्हारी मदद से वंचित रह गए, जो चलकर तुम्हारे पास आने में
असमर्थ थे। जबकि मोहन ने लोगों के पास जा-जाकर उन्हें भोजन कराया। उसकी सहायता
अधिकतम लोगों तक पहुंची, इसलिए उसकी सेवा अधिक प्रशंसा के योग्य है। कथा का सार यह
है कि वही सेवा अधिक सराहनीय होती है, जो आगे बढ़कर की जाए।
विचारक ने दिखाई राजा को सुखी जीवन की राह
एक राजा हमेशा तनाव में रहता था। एक दिन उससे मिलने एक विचारक आया। उसने राजा
से उसकी परेशानी पूछी तो वह बोला - मैं एक सफलतम राजा बनना चाहता हूं, जिसे प्रजा का हर
व्यक्ति पसंद करे। मैंने अब तक अनेक सफल राजाओं के विषय में पढ़ा और उनकी नीतियों
का अनुसरण किया, किंतु मुझे वैसी सफलता नहीं मिली। लाख प्रयासों के बावजूद मैं एक अच्छा राजा
नहीं बन पा रहा हूं।
राजा की बात सुनकर विचारक ने कहा- जब भी कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति के विपरीत
कोई काम करता है, तो यही होता है। राजा ने हैरानी जताते हुए कहा - मैंने अपनी प्रकृति के विपरीत
क्या काम किया? विचारक बोला - तुम्हें बाकी लोगों पर हुक्म चलाने का अधिकार प्रकृति से नहीं मिला
है। तुम जब बाकी लोगों की तरह साधारण जीवन बिताओगे, तभी तुम्हें आनंद मिलेगा। जंगल
में रहने वाले शेर की जान उसकी खाल की वजह से हमेशा खतरे में रहती है, क्योंकि वह बहुत कीमती
होती है।
इसी वजह से वह रात में शिकार पर निकलता है, इस भय से कि सुंदर खाल के कारण
उसे कोई मार न डाले। शेर तो अपनी खाल को नहीं त्याग सकता, किंतु तुम अपनी सफलता के लिए
स्वयं को राजा मानना छोड़ सकते हो।
जब तक स्वयं को राजा मानते रहोगे, दुख ही पाओगे। राजा को विचारक की बात जंच गई और उस
दिन से वह सुखी हो गया। दरअसल अपेक्षा दुख का कारण है। इसलिए किसी से कोई अपेक्षा
न रखें और अपने कर्म करते हुए सहज जीवन जिएं तो निर्मल आनंद की अनुभूति सुलभ हो
जाती है।
संत ने बताया बुराई से निपटने का सटीक उपाय
एक संत के आश्रम में सैकड़ों गायें थीं और उन गायों के दूध से वे आश्रम का संचालन
करते थे। एक दिन एक शिष्य बोला - गुरुजी आश्रम के दूध में निरंतर पानी मिलाया जा
रहा है। संत ने इसे रोकने का उपाय पूछा तो वह बोला - एक कर्मचारी रख लेते हैं,
जो दूध की निगरानी
करेगा। संत ने स्वीकृति दे दी। अगले ही दिन कर्मचारी रख लिया गया।
तीन दिन बाद वही शिष्य फिर आकर संत से बोला - इस कर्मचारी की नियुक्ति के बाद
से तो दूध में और पानी मिल रहा है। संत ने कहा - एक और आदमी रख लो, जो पहले वाले पर नजर
रखे। ऐसा ही किया गया। लेकिन दो दिन बाद तो आश्रम में हड़कंप मच गया। सभी शिष्य
संत के पास आकर बोले - आज दूध में पानी तो था ही, एक मछली भी पाई गई।
तब संत ने कहा - तुम लोग मिलावट रोकने के लिए जितने अधिक निरीक्षक रखोगे,
मिलावट उतनी ही
अधिक होगी, क्योंकि पहले इस अनैतिक कार्य में कम कर्मचारियों का हिस्सा होता था तो कम
पानी मिलता था। एक निरीक्षक को रखने से उसका हिस्सा बढ़ा तो पानी और अधिक मिलाया
जाने लगा। फिर एक और निरीक्षक रखने से उसके लाभ के मद्देनजर पानी की मात्रा और बढ़
गई। जब इतना पानी मिलाएंगे तो इसमें मछली नहीं आएगी तो क्या मक्खन मिलेगा? शिष्यों ने संत से
समाधान पूछा तो वे बोले - तुम्हें उनकी मानसिकता बदलकर उन्हें निष्ठावान बनाना
चाहिए ताकि वे यह कृत्य छोड़ दें। बुराई पर प्रतिबंध लगाने के स्थान पर यदि
आत्मबोध जाग्रत किया जाए तो व्यक्ति स्वयं ही कुमार्ग का त्याग कर देता है।
जब राजकुमारों से श्रेष्ठ सिद्ध हुआ किसान का पुत्र
एक महात्मा के शिष्यों में एक राजकुमार और एक किसान पुत्र भी शामिल थे।
राजकुमार को राजपुत्र होने का अहंकार था, जबकि किसान का बेटा विनम्र और कर्मठ था। राजकुमार के
पिता अर्थात वहां के राजा प्रतिवर्ष एक प्रतियोगिता का आयोजन करते थे, जिसमें प्रतिभागियों की
बुद्धि का पैनापन और दृष्टि की विशालता परखी जाती थी।
उसमें हिस्सा लेने के लिए दूर-दूर से राजकुमार आते थे। अध्ययन पूरा होने पर
राजकुमार ने किसान पुत्र को उक्त प्रतियोगिता में शामिल होने का न्यौता दिया,
ताकि वहां बुलाकर
उसका निरादर किया जाए। जब किसान पुत्र प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचा तो राजकुमार व
अन्य राजपुत्रों ने उसे अपने मध्य बैठाने से इनकार कर दिया।
अंतत: किसान पुत्र अलग बैठ गया। राजा ने प्रश्न पूछा - यदि तुम्हारे समक्ष एक
घायल शेर आ जाए तो तुम उसे छोड़कर भाग जाओगे या उसका उपचार करोगे? सभी राजकुमारों का उत्तर
एक ही था कि हम अपने प्राण संकट में डालकर शेर का उपचार नहीं करेंगे, किंतु किसान पुत्र बोला
- मैं घायल शेर का उपचार करूंगा, क्योंकि उस समय घायल जीव की जान बचाना मेरा परम कर्तव्य
होगा। मनुष्य होने के नाते मेरा यही कर्म है।
शेर का कर्म है मांस खाना। यदि स्वस्थ होने के बाद उसने मेरा शिकार किया तो वह
उसका कर्म होगा, दोष नहीं। राजा ने किसान पुत्र को विजेता घोषित कर उसे राज्य का मंत्री पद
प्रदान किया। वस्तुत: व्यक्ति का मूल्यांकन उसके वस्त्र या रहन-सहन से नहीं,
बल्कि उसके विचार
व कर्मो के आधार पर होना चाहिए।
एक फकीर से सम्राट ने जाना अमूल्य दौलत का राज
एक सम्राट रात में राजधानी का भ्रमण करते और देखते कि उनके यहां क्या कुछ हो
रहा है। भ्रमण के समय उन्हें एक फकीर सदैव जागता हुआ मिलता। उसकी कुटिया में सिवाय
पानी के मटके और कुछ वस्त्रों के अलावा कुछ नहीं था, फिर भी वह जोर-जोर से कहता रहता
- जागते रहो, जागते रहो। सो मत जाना अन्यथा लुट जाओगे।
सम्राट को लगा कि यह फकीर पागल है। फिर सोचा कि एक बार इससे बात तो की जाए।
सम्राट ने एक दिन उससे पूछा - आपके पास धन-दौलत कुछ नहीं है, फिर क्यों इतना जागते
हैं और सावधान रहते हैं? फकीर बोला - राजन, आपने अपने महल में इतना कूड़ा-कचरा इकट्ठा कर लिया
है कि वह लुट गया तो कोई चिंता नहीं, क्योंकि आप फिर इकट्ठा कर लेंगे, किंतु मेरे पास जो धन है,
उसकी लूट होने पर
फिर कभी वह नहीं मिलेगा। इसलिए मैं सदा सावधान रहता हूं।
राजा ने कहा - मेरे पास मौजूद हाथी-घोड़े, हीरे-जवाहरात, सोना-चांदी को आप
कूड़ा-कचरा क्यों कह रहे हैं? फकीर ने उत्तर दिया - जिसे आप अमूल्य दौलत समझते हैं,
उसे कोई भी छीन
सकता है। वह पुन: कमाई जा सकती है, किंतु मेरी संपत्ति ईश्वर द्वारा प्रदत्त है, इसलिए मैं स्वयं को
सावधान करता हूं कि मेरे मन में मोह, लोभ, क्रोध व अहंकार आदि का प्रवेश न हो अर्थात मेरी आत्मा जागती
रहे, सो न जाए।
फकीर की बातों का मर्म जान सम्राट ने भी राजपाट छोड़कर संन्यास ले लिया। सार यह है
कि आत्मा की जागृति से मानवीय गुण संपन्नता आती है और दुगरुणों से बचाव होता है।
इसलिए सदैव आत्मा की आवाज सुनें।
शिष्यों ने गुरु से जाना सुख-शांति का स्थायी आधार
आश्रम में रहने वाले शिष्यों ने एक दिन अपने गुरु से प्रश्न
किया- गुरुजी! धन, कुटुंब और धर्म में से कौन सच्चा सहायक है? गुरुजी ने उत्तर में यह कथा सुनाई - एक व्यक्ति के तीन मित्र
थे। तीनों में से एक उसे अत्यधिक प्रिय था।
वह प्रतिदिन उससे मिलता और जब कहीं जाना होता तो वह उसी के साथ जाता। दूसरे मित्र से उस व्यक्ति की मध्यम मित्रता थी। उससे वह दो-चार दिन में मिलता था। तीसरे मित्र से वह दो माह में एक बार ही मिलता और कभी किसी कार्य में उसे साथ नहीं रखता था। एक बार अपने व्यापार के सिलसिले में उस व्यक्ति से कोई गलती हो गई, जिसके लिए उसे राजदरबार में बुलाया गया।
वह घबराया और उसने प्रथम मित्र से सदा की भांति साथ चलने का आग्रह किया, किंतु उसने सारी बात सुनकर चलने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह राजा से संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था। दूसरे मित्र ने भी व्यस्तता बताकर चलने में असमर्थता जताई, किंतु तीसरा मित्र न केवल साथ चला, बल्कि राजा के समक्ष उस व्यक्ति का पक्ष जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया, जिस कारण राजा ने उसे दोषमुक्त कर दिया।
यह कथा सुनाकर गुरुजी ने समझाया - धन वह है, जिसे परम प्रिय समझा जाता है, किंतु मृत्यु के बाद वह किसी काम का नहीं। कुटुंब यथासंभव सहायता करता है, किंतु शरीर रहने तक ही। मगर धर्म वह है, जो इस लोक और परलोक दोनों में साथ देता है और सभी प्रकार की दुर्गति से बचाता है। सार यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी व आचरण, दोनों से धर्म का पालन करना चाहिए। यही सुख-शांति का स्थायी आधार है।
वह प्रतिदिन उससे मिलता और जब कहीं जाना होता तो वह उसी के साथ जाता। दूसरे मित्र से उस व्यक्ति की मध्यम मित्रता थी। उससे वह दो-चार दिन में मिलता था। तीसरे मित्र से वह दो माह में एक बार ही मिलता और कभी किसी कार्य में उसे साथ नहीं रखता था। एक बार अपने व्यापार के सिलसिले में उस व्यक्ति से कोई गलती हो गई, जिसके लिए उसे राजदरबार में बुलाया गया।
वह घबराया और उसने प्रथम मित्र से सदा की भांति साथ चलने का आग्रह किया, किंतु उसने सारी बात सुनकर चलने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह राजा से संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था। दूसरे मित्र ने भी व्यस्तता बताकर चलने में असमर्थता जताई, किंतु तीसरा मित्र न केवल साथ चला, बल्कि राजा के समक्ष उस व्यक्ति का पक्ष जोरदार ढंग से प्रस्तुत किया, जिस कारण राजा ने उसे दोषमुक्त कर दिया।
यह कथा सुनाकर गुरुजी ने समझाया - धन वह है, जिसे परम प्रिय समझा जाता है, किंतु मृत्यु के बाद वह किसी काम का नहीं। कुटुंब यथासंभव सहायता करता है, किंतु शरीर रहने तक ही। मगर धर्म वह है, जो इस लोक और परलोक दोनों में साथ देता है और सभी प्रकार की दुर्गति से बचाता है। सार यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी व आचरण, दोनों से धर्म का पालन करना चाहिए। यही सुख-शांति का स्थायी आधार है।
जब एक गृहस्थिन ने समझाए संन्यासी को साधना के मायने
एक युवक अपनी विधवा मां को अकेली छोड़कर घर से भाग निकला और एक मठ में जाकर
तंत्र-साधना करने लगा। कई वर्ष बीत गए। एक दिन उस युवक ने अपने वस्त्र सूखने के
लिए डाले और वहीं आसन बिछाकर ध्यानमग्न हो गया। जब आंखें खोलीं तो देखा कि एक कौआ
चोंच से उसके एक वस्त्र को खींच रहा है।
यह देख युवक ने क्रोधित हो कौए की ओर देखा तो कौआ जलकर राख हो गया। अपनी
सिद्धि की सफलता देख वह फूला नहीं समाया। अहंकार से भरा वह भिक्षा के लिए चला।
उसने एक द्वार पर पुकार लगाई, किंतु कोई बाहर नहीं आया। उसे बड़ा क्रोध आया। उसने कई
आवाजें लगाईं, तब किसी स्त्री ने कहा - ‘महात्मन! कुछ देर ठहरिए। मैं साधना समाप्त होते ही आपको
भिक्षा दूंगी।’ युवक का पारा चढ़ गया। उसने कहा - ‘दुष्टा! साधना कर रही है या हमारा परिहास।’
तू जानती नहीं, इसका कितना बुरा परिणाम होगा?’ वह बोली - ‘जानती हूं आप शाप देंगे, किंतु मैं कौआ नहीं हूं, जो आपकी क्रोधाग्नि में
जलकर भस्म हो जाऊं। मां को अकेली छोड़कर अपनी मुक्ति चाहने वाले अहंकारी संन्यासी,
तुम मेरा कुछ नहीं
बिगाड़ सकते।’ युवक का दर्प चूर हो गया। जब गृहस्वामिनी भिक्षा देने बाहर आई तो युवक ने उसकी
साधना का राज पूछा। वह बोली - ‘मैं गृहस्थ धर्म की साधना निष्ठापूर्वक करती हूं।’ युवक को अहसास हुआ कि
उसने न तो गृहस्थ धर्म और न साधु धर्म की ठीक से साधना की है। वह अहंकार त्याग घर
लौट गया। वस्तुत: कर्तव्यों का निर्वहन समुचित रूप में करना ही सच्चा धर्मपालन होता
है।
धनिक ने सेम के बीज से जाना संपत्ति बढ़ाने का रहस्य
किसी गांव में एक धनिक रहता था। दिन-रात वह इसी सोच में रहता कि इस धन में और
वृद्धि कैसे हो, किंतु इसके लिए वह कोई उद्यम नहीं करना चाहता था। उसे यह भी भय लगा रहता था कि
लोग उसकी अपार संपत्ति के विषय में कुछ जान न पाएं।
इस हेतु वह संत रैदास के पास गया और बोला - ‘महाराज! आप परम ज्ञानी हैं।
कृपया मुझे संपत्ति बढ़ाने का रहस्य बताइए।’ रैदास उसे सेम का एक बीज देते
हुए बोले - ‘यह चमत्कारी बीज है। तुम इसे ले जाकर अपने आंगन के किसी कोने में नमी वाली जगह
पर बो देना। तुम्हारे धन में वृद्धि अवश्य होगी।’ धनिक ने प्रसन्न होकर सेम का बीज
आंगन में बो दिया। दो-तीन माह में बीज एक बेल के रूप में फैल गया और उसमें बहुत
सारी सेम लगी, किंतु उसकी संपत्ति में बढ़ोतरी नहीं हुई।
वह फिर रैदास के पास पहुंचकर बोला - ‘वह बीज उग आया। फलियां भी आने लगीं, किंतु मेरी संपत्ति में
वृद्धि नहीं हुई।’ तब रैदास ने उसे समझाया - ‘भाई! यदि मैं बीज को भूनकर खाने को कहता और इससे तुम्हारा
पेट भरने का दावा करता, तो यह असंभव था। तुमने उसका सही उपयोग किया। अब वह एक बीज
इतने फल दे रहा है कि तुम ही नहीं, अन्य लोग भी उसकी सब्जी बनाकर खा सकते हैं। ठीक इसी प्रकार
तुम्हारे पास रखी संपत्ति को किसी उद्यम में लगाओ, तो उसमें वृद्धि होगी अन्यथा धन
नष्ट हो जाएगा। धनिक को अपनी भूल का अहसास हुआ। सार यह है कि आलस्य अपार संपत्ति
को भी समाप्त कर देता है, जबकि परिश्रम से उसमें कई गुना की वृद्धि होती है।
कैयट की निस्पृहता ने राजा व पंडितों का जीता दिल
कश्मीर के प्रकांड पंडित कैयट एक झोपड़ी में रहते थे। उनके पास संपत्ति के नाम
पर मात्र एक चटाई, कमंडल और कुछ किताबें थीं। उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी। एक बार काशी के कुछ
विद्वान कश्मीर यात्रा पर आए। वे कैयट की ख्याति का रहस्य जानना चाहते थे।
कश्मीर के राजा स्वयं उन्हें लेकर कैयट से मिलने गए। जब वे सभी कैयट के घर
पहुंचे, तो
वे कुछ लिखने में व्यस्त थे। लेख पूर्ण करने के बाद उन्होंने सभी को स्नेहपूर्वक
बैठाया और फिर आने का प्रयोजन पूछा। विद्वानों ने कहा - ‘हम यहां किसी उद्देश्य विशेष
हेतु नहीं आए हैं। हम तो केवल आपसे मिलने आए हैं।’ कैयट ने यह सुनते ही तत्काल कहा
- ‘आपकी-मेरी
भेंट हो गई। अब आप लोग पधारिए और मुझे अपना काम करने दीजिए।’
राजा ने सोचा शायद निर्धनता के कारण कैयट चिड़चिड़े हो गए हैं। यह सोचकर वे
बोले - ‘पंडितजी!
जिस राज्य में विद्वान कष्ट पाते हैं, वहां का राजा पाप का भागी होता है। आप बताइए मैं
आपकी किस तरीके से सेवा करूं?’ यह सुनते ही कैयट अपना सामान समेटकर खड़े हो गए और पत्नी से
बोले - ‘चलो
इस राज्य से बाहर चलें। हमारे यहां रहने से राजा को पाप लगता है।’ फिर से बोले - ‘मेरी सेवा यही होगी कि
आप स्वयं या किसी कर्मचारी को धन-दौलत आदि लेकर न भेजें। मुझे इनका तनिक लोभ नहीं
है। बस मेरे अध्ययन में कोई बाधा न पड़े, यह सबसे बड़ी सेवा आप करें।’ कैयट की विद्वत्ता का रहस्य काशी
के विद्वानों के समक्ष स्पष्ट हो गया। वस्तुत: ज्ञान की सार्थकता उसकी निस्पृहता
में ही निहित है।
वृद्धा ने अपनी मृत्यु को लौटाकर पाया आत्मबल
किसी गांव में एक निर्धन वृद्धा रहती थी। उसकी कोई संतान नहीं थी और पति किसी
लाइलाज बीमारी से ग्रस्त था। वह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करती और अपना तथा पति का
भरण-पोषण करती। वृद्धा के प्रति गांव के लोगों में सहानुभूति थी, किंतु वह अपने
स्वाभिमानी स्वभाव के चलते किसी से कोई सहायता नहीं लेती थी। एक दिन वह जंगल में
लकड़ियां काटने गई।
दिनभर उसने कठोर परिश्रम किया और ढेर सारी लकड़ियां काटीं। जब लकड़ियां जमा हो
गईं, तो
उसने उनका गट्ठर बना लिया, किंतु वह गट्ठर उठाकर सिर पर नहीं रख पाई। परेशान होकर वहीं
बैठ गई और निराश होकर मन ही मन कहने लगी - ‘ऐसे जीवन से क्या लाभ? अच्छा हो कि मेरी मृत्यु
अभी हो जाए। इस रोजाना के जंजाल से पीछा छूटेगा। हे ईश्वर! मुझे अभी उठा लो।’
ऐसा कहते ही उसके
सामने मृत्यु आकर खड़ी हो गई और बोली - ‘मैंने तुम्हारी पुकार सुन ली।
मैं तुम्हें लेने आई हूं, चलो।’ मृत्यु को सामने देख वृद्धा भयभीत हो कहने लगी - ‘मुझे अभी नहीं मरना है।
मैं मर गई, तो मेरे बीमार पति की सेवा कौन करेगा? फिर मैं इतनी कमजोर भी नहीं हूं। मुझमें अभी बहुत
ताकत है और बहुत सारे काम मुझे करने हैं। तुम मुझे छोड़ दो।’ यह सुनते ही मृत्यु वहां
से चली गई। तब वृद्धा उठी और पूरा दम लगाकर लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रख लिया। उसे
इस बात का अहसास हो गया कि जीवन से भागना समस्या का समाधान नहीं होता। सार यह है
कि जीवन की चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे जूझना और अपना कर्म करते रहना ही मानव का
कर्तव्य है।
बालक ध्रुव का हठ सभी के लिए आदर्श बन गया
प्राचीनकाल की बात है। राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं - सुनीति और सुरुचि।
दोनों रानियों से क्रमश: दो पुत्र - ध्रुव और उत्तम हुए। राजा उत्तानपाद रानी
सुरुचि को अधिक स्नेह करते थे, इसलिए उनके पुत्र उत्तम को पिता की आत्मीयता अधिक मिलती थी।
एक बार राजा सिंहासन पर बैठे थे और उनकी गोद में उत्तम बैठा हुआ था। तभी बालक
ध्रुव का वहां आना हुआ।
उन्होंने भी अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा व्यक्त की, तब उनकी विमाता सुरुचि
व्यंग्यात्मक लहजे में बोलीं - ‘तुम तपस्या कर मेरी कोख से जन्म लो, तभी राजा की गोद में बैठ पाओगे।’
यह सुनकर पांच
वर्षीय बालक ध्रुव ने स्वयं को बड़ा अपमानित महसूस किया। राजा सुरुचि से अधिक
स्नेह रखते थे, अत: वे भी मौन रहे। तब ध्रुव ने नारद मुनि से प्रेरणा लेकर यमुना तट पर मधुबन
में तपस्या की।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वर दिया कि वे सब लोकों, ग्रहों, नक्षत्रों के ऊपर आधार
बनकर स्थित रहेंगे। इसीलिए उनका स्थान ‘ध्रुवलोक’ कहलाता है। तपस्या के पश्चात ध्रुव राज्य में लौटे
और राजा बने। ध्रुव ने अनेक वर्षो तक सफलतापूर्वक शासन किया, तभी से वे इस बात का
आदर्श माने गए कि राजा यदि तपस्वी हो, तो उसकी नीतियां आदर्श होंगी और प्रजा सुखी रहेगी।
तप के पीछे जब तक हठ नहीं होगा, तप पूर्ण नहीं हो सकता। सार यह है कि अच्छे उद्देश्यों के
लिए किया जाने वाला संकल्प दृढ़ संकल्प कहलाता है और कार्य की आधी सफलता संकल्प की
दृढ़ता में ही छिपी रहती है।
अष्टावक्र ने सिखाया शारीरिक सौंदर्य से बड़ा है ज्ञान
हिंदू धर्मशास्त्रों में अष्टावक्र का नाम एक दार्शनिक और तत्व चिंतक के रूप
में आदर से लिया गया है। कहते हैं अष्टावक्र न केवल बेहद कुरूप थे, बल्कि उनका शरीर भी
बेढंगा था। वे अष्टावक्र इसीलिए कहे जाते हैं, क्योंकि उनका शरीर आठ जगह से
वक्र अर्थात टेढ़ा था।
प्रसिद्ध कथा है - अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में पहुंचे। दोनों ओर ऊंचे
आसनों पर सभासद, ज्ञानी, पंडित, राजकर्मी आदि बैठे थे और सामने राजा जनक का सिंहासन था, जिस पर वे विराजित थे। अष्टावक्र
को द्वारपाल ने नहीं रोका। अष्टावक्र उस समय किशोर वय के थे। अष्टावक्र ने जैसे ही
जनक की सभा के मुख्य मंडप में प्रवेश किया, उन पर दृष्टि पड़ते ही सभी ने
एक-दूसरे की ओर देखा और एक जोरदार ठहाका सभा में गूंज उठा।
इस ठहाके की गूंज देर तक सुनाई दी। सभी अष्टावक्र का अजीबो-गरीब व्यक्तित्व
देखकर हंस पड़े थे। इतना कि उनकी हंसी रुक न रही थी। यह देख पहले तो अष्टावक्र कुछ
समझ न पाए, फिर उन्हें अपने पर हंसता देख अचानक अष्टावक्र भी बहुत जोर से हंसने लगे।
देर तक हंसने पर जब जनक से न रहा गया तो उन्होंने पूछा - सब लोग तो तुम्हें
देखकर हंसे, आखिर तुम क्यों हंस पड़े? अष्टावक्र ने जवाब दिया - मुझे लगा मैं चर्मकारों की सभा
में आ गया हूं, जहां व्यक्ति की चमड़ी देखकर उसका निर्णय होता है। जनक सहित पूरी सभा
अष्टावक्र के इस उत्तर पर लज्जा से पानी-पानी हो गई। अष्टावक्र ने संदेश दिया कि
व्यक्ति का महत्व उसके शरीर से नहीं, उसके ज्ञान, व्यक्तित्व और कर्म से है।
जब वजीर ने माणिकनाथ का अहंकार चूर-चूर किया
साबरमती नदी के किनारे एक सिद्धपुरुष माणिकनाथ का आश्रम था। एक दिन बादशाह
अहमदशाह उनके आश्रम की ओर आया। उसे वह स्थान बहुत अच्छा लगा। उसने अपने वजीर को
आश्रम के निकट ही एक सुंदर विश्रामगृह बनवाने का आदेश दिया।
वजीर ने निर्माण शुरू करवा दिया। यह देख माणिकनाथ को बहुत क्रोध आया। उन्होंने
कहा - ‘बादशाह
की यह मजाल कि मुझसे बिना पूछे आश्रम के समीप निर्माण करवा रहा है।’ मजदूर दिनभर दीवार चुनते
और रात को माणिकनाथ मंत्र बल से दीवार गिरा देते। बादशाह परेशान हो गया। वजीर ने
एक उपाय सोचा। वह माणिकनाथ के आश्रम में पहुंचकर बोला - ‘गुरुजी! मैं आपकी सेवा करना
चाहता हूं।’ माणिकनाथ ने उसे आश्रम में रख लिया। कुछ दिनों बाद वजीर ने माणिकनाथ की
सिद्धियों की प्रशंसा करते हुए कोई चमत्कार दिखाने को कहा।
माणिकनाथ अपने शरीर को छोटा कर एक लोटे में प्रविष्ट हो गए। वजीर ने लोटे का
मुंह बंद कर दिया। माणिकनाथ मंत्रोच्चर करते-करते थक गए, किंतु बाहर नहीं आ पाए। तभी आकाश
में उनके गुरु का स्वर गूंजा - ‘तुमने अहंकारवश बादशाह के कार्य में बाधा डाली, इसलिए तुम्हारी
सिद्धियां खत्म हो गईं। बादशाह से माफी मांगकर मेरे पास आ जाओ।’ माणिकनाथ ने बादशाह से
माफी मांगकर प्राण त्याग दिए। कथा का निहितार्थ यह है कि अहंकार से विवेक का नाश
होता है, अत:
अपनी उपलब्धियों को विनम्रतापूर्वक धारण करें।
बीरबल की चतुराई से वैद्यों को सजा से मुक्ति मिली
एक बार बादशाह अकबर युद्ध के लिए गए। युद्ध तो जीत लिया, लेकिन अंगूठे में चोट
लगने से नाखून उखड़ गया। अकबर ने नामी-गिरामी वैद्यों को बुलवाया, किंतु नाखून फिर से लाने
में सभी असफल रहे। बादशाह का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
उन्होंने सभी वैद्यों से कहा कि दस दिनों में नाखून आ जाना चाहिए, अन्यथा कारावास की कठोर
सजा सहनी पड़ेगी। जब वैद्यों को सजा से मुक्ति का कोई उपाय नहीं सूझा, तो उन्होंने बीरबल को
अपनी समस्या बताई। बीरबल ने सभी को आश्वस्त किया और अगले दिन अकबर से कहा - ‘हुजूर! इन वैद्यों का
कहना है कि हम बादशाह सलामत का नाखून तो ला सकते हैं, किंतु इसके लिए जो औषधियां जरूरी
हैं, वे
हमें उपलब्ध करवा दी जाएं। इन लोगों ने मुझे एक नुस्खा लिखवाया है।
अब आप या तो उस नुस्खे के अनुसार औषधियों की व्यवस्था करवाएं या इन्हें छोड़
दें।’ बादशाह
ने बीरबल की बात मान ली और नुस्खा पूछा। बीरबल ने नुस्खा बताया - गूलर के फूल और
मछली के पेशाब से नाखून आ सकता है। बादशाह परेशानी में पड़ गए, क्योंकि गूलर पर तो फूल
होता ही नहीं और मछली का पेशाब लाना सर्वथा असंभव है। आखिर वायदे के मुताबिक
उन्हें सभी वैद्यों को मुक्त करना पड़ा। बीरबल के प्रति सभी वैद्यों ने आभार
व्यक्त किया। वस्तुत: अचानक आए संकट से निपटने के लिए बुद्धि का तत्काल क्रियाशील
होना जरूरी है। इसे प्रत्युत्पन्नमति कहते हैं, जिसे थोड़े ज्ञान, कुछ अनुभव और तनिक
चतुराई से अर्जित किया जा सकता है।
ईश्वर पर विश्वास की डोर थाम ग्वालिन ने नदी पार की
एक गांव में एक साधु बाबा रहते थे। लोग उनका बहुत आदर करते थे। उस गांव से लगे
हुए एक दूसरे गांव से एक निर्धन ग्वालिन दूध बेचने के लिए यहां आती थी। सबसे पहले
वह साधु बाबा को दूध देती, फिर गांव के दूसरे घरों में जाती थी। एक दिन वह देर से आई।
बाबा ने कारण पूछा तो वह बोली - ‘आज नदी पार करने के लिए नाव देर से मिली, इसलिए देर हो गई।’
बाबा ने हंसते हुए कहा - ‘लोग तो ईश्वर के नाम से संसार-सागर पार कर जाते हैं और तुझे
नदी पार करने के लिए नाव की जरूरत पड़ती है। ऐसा लगता है कि भगवान पर तुझे भरोसा
नहीं है।’ ग्वालिन पर बाबा की बातें गहरा असर छोड़ गईं। दूसरे दिन वह अलसुबह ही बाबा को
दूध देने आ पहुंची। उस समय बाबा सो रहे थे।
द्वार खोलते ही उन्होंने हैरानी से पूछा - ‘आज इतनी जल्दी कैसे आ गई?’
ग्वालिन बोली - ‘आपकी कृपा से नाव का
बखेड़ा ही समाप्त हो गया, रोज का किराया भी बचा। आपके कहे अनुसार भगवान का नाम लेकर
ही नदी पार कर आई हूं।’ बाबा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। जब वह नदी के रास्ते
लौटने लगी, तो बाबा भी उसके पीछे नदी में भीतर चले गए। जब पानी की गहराई बढ़ी, तो बाबा घबराकर पानी में
गिर गए और बचाने की पुकार लगाने लगे। तब ग्वालिन ने उन्हें पानी से बाहर निकालते
हुए कहा - ‘यदि आप अपने ही उपदेश पर अमल करते हुए भगवान के नाम पर भरोसा रखते, तो नदी पार कर जाते।’
ग्वालिन की बात
सुन बाबा लज्जित हुए। वस्तुत: संदेह लक्ष्य से भटकाता है और विश्वास फलता है,
बशर्ते वह अटूट
हो।
मनोबल जागने से अक्षम हाथी भी ऊर्जावान हुआ
एक राजा के पास एक हाथी था, जो उसे अत्यधिक प्रिय था। वह स्वामिभक्त होने के साथ-साथ
गजब का योद्धा था। जब-जब राजा ने उस पर सवार होकर युद्ध लड़े, वह विजयी रहा। समय
गुजरने के साथ हाथी वृद्ध हो चला। इस कारण राजा ने उसे युद्ध में ले जाना बंद कर
दिया, किंतु
उसका हाथी के प्रति प्रेम यथावत रहा। एक दिन वह हाथी सरोवर में जल पी रहा था।
सरोवर में जल कम था, इसलिए सरोवर के मध्य में पहुंचा हाथी दलदल में फंस गया।
वृद्धावस्था के कारण हाथी अपने शरीर को दलदल से बाहर निकालने में अक्षम था। वह मदद
के लिए जोर-जोर से चिंघाड़ने लगा। उसकी चिंघाड़ सुनकर सभी महावत उसकी ओर दौड़ पड़े,
किंतु सरोवर से
उसे निकालने में वे भी लाचार थे। तब उन्होंने उसके शरीर में भाले चुभाने शुरू किए,
ताकि उनकी चुभन से
वह अपनी समूची ताकत लगाकर बाहर निकल सके।
हाथी फिर भी नहीं निकल पाया और भालों की पीड़ा से उसके नेत्रों में आंसू आ गए।
राजा तक समाचार पहुंचा, तो वह तत्काल अपने सबसे बुजुर्ग और अनुभवी महावत को लेकर
आया। महावत ने राजा को सलाह दी कि तत्काल युद्ध के नगाड़े बजवाइए और सैनिकों की
कतार हाथी के सामने खड़ी कर दीजिए। राजा ने वैसा ही किया। नगाड़ों की आवाज और
सैनिकों की कतार देख हाथी में ऊर्जा का संचार हुआ और वह दलदल से बाहर निकल आया।
वस्तुत: मनोबल जाग्रत होते ही सफलता मिलते देर नहीं लगती। जिसका मनोबल जाग जाए,
उसे दुनिया की कोई
ताकत आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
पंडितजी के रुपए लौटाकर बढ़ई ने पाई शांति
बनारस में एक पंडितजी का विशाल आश्रम था, जहां वे अपने शिष्यों को शिक्षा
देते थे। उनके आश्रम के सामने एक बढ़ई बैठता था। वह अपना काम करते हुए मधुर भजन भी
गाता था। हालांकि पंडितजी भजनों की ओर गौर नहीं करते थे। एक बार पंडितजी गंभीर रूप
से बीमार हो गए।
धीरे-धीरे उनके अधिकांश शिष्य आश्रम छोड़कर चले गए। कुछ सेवाभावी शिष्यों के
सहयोग से पंडितजी का काम चल रहा था। अब पंडितजी बिस्तर पर लेटे-लेटे बढ़ई के भजन
सुनते, जो
उन्हें बहुत प्रिय लगते। धीरे-धीरे उनका ध्यान रोग से हटकर भजनों की ओर रहने लगा।
एक दिन उन्होंने एक शिष्य को भेजकर बढ़ई को बुलवाया और उससे बोले - ‘तुम बहुत अच्छा गाते हो।
मेरा जो रोग बड़े-बड़े वैद्य ठीक नहीं कर पाए, वह तुम्हारे भजनों से ठीक हो रहा
है। यह सौ रुपए रखो और रोज इसी तरह गाते रहना।’ बढ़ई इतने पैसे पाकर बहुत
प्रसन्न हुआ। लेकिन पैसे मिलने के बाद उसका मन काम से हट गया और भजन से भी विरक्ति
होने लगी, क्योंकि दिन-रात वह इसी चिंता में रहता कि ये सौ रुपए कहां संभालकर रखे?
धीरे-धीरे उसके
ग्राहक कम होने लगे।
अंतत: बढ़ई ने कुछ विचार करके पंडितजी को सौ रुपए वापस करते हुए कहा - ‘पंडितजी, ये आप वापस रख लीजिए।
मैं यह जान गया हूं कि अपनी कमाई में जो सुख है, वह पराए धन में नहीं।’ अगले ही दिन से बढ़ई के
भजन फिर सुनाई देने लगे। वस्तुत: बिना मेहनत से प्राप्त धन अशांति का कारक होता है,
जबकि परिश्रम से
अर्जित धन आत्मिक शांति प्रदान करता है।
ययाति को आत्मप्रशंसा करने का नतीजा भुगतना पड़ा
दीर्घकाल तक राज करने के बाद महाराज ययाति ने अपने पुत्र को सिंहासन सौंप दिया
और स्वयं वन में जाकर तप करने लगे। कठोर तप के फलस्वरूप वे स्वर्ग में पहुंचे।
उनके तप का प्रभाव इतना प्रबल था कि इंद्र उन्हें अपने से नीचे के आसन पर नहीं
बैठा सकते थे। इसलिए इंद्र को उन्हें अपने सिंहासन पर अपने साथ बैठाना पड़ता था।
यह बात इंद्र को तो अप्रिय लगती ही थी, देवता भी इसे स्वीकार नहीं कर
पाते थे। इंद्र भी देवताओं की इस भावना से परिचित थे। एक दिन इंद्र ने कुछ सोचकर
ययाति से कहा - ‘आपका पुण्य असीम है और तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। आपकी बराबरी कोई नहीं कर
सकता। मुझे यह बताइए कि आपने ऐसा कौन-सा तप किया है, जिसके प्रभाव से आप ब्रह्मलोक में
भी इच्छानुसार रह सकते हैं?’
इंद्र के वाक्चातुर्य को न समझते हुए ययाति अहंकारी स्वर में बोले - ‘देवता, मनुष्य, गंधर्व और ऋषियों में
कोई भी ऐसा नहीं है, जो मेरे समान तपस्वी हो।’ यह सुनते ही इंद्र ने आदेश दिया - ‘ययाति! तत्काल मेरे आसन से उठ
जाओ। अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से करके तुमने अपने सारे पुण्य समाप्त कर लिए हैं।
तुमने यह जाने बिना कि देवता, मनुष्य, गंधर्व और ऋषियों ने क्या-क्या तप किए, उनसे अपनी तुलना कर उनका
घोर अपमान किया है। अब तुम स्वर्ग से गिरोगे।’ स्वयं की प्रशंसा कर ययाति ने
अपने तप-फल को समाप्त कर लिया और वे स्वर्ग से अलग कर दिए गए। वस्तुत: प्रशंसा
अन्यों के द्वारा होना उत्तम है, क्योंकि यही बड़प्पन का लक्षण है, जबकि आत्मप्रशंसा ओछेपन का।
पानी में डुबकी लगाते ही गुलाम का डर काफूर हो गया
बादशाह के गुलाम ने कभी समुद्र की यात्रा नहीं की थी, इसलिए वह समुद्र की गहराई से
परिचित नहीं था। बादशाह प्राय: समुद्री यात्राएं करता था, पर अपने गुलाम को वह कभी इन
यात्राओं पर नहीं ले जाता था। एक बार वह अपने साथ गुलाम को भी ले गया। जब जहाज
समुद्र में आगे बढ़ने लगा तो गुलाम भयभीत हो गया।
वह हर तरफ पानी ही पानी देख खौफजदा हो चिल्लाने लगा। जहाज पर मौजूद लोगों ने
उसे बहुत समझाया कि डरने की कोई बात नहीं है, वह जहाज पर पूर्णत: सुरक्षित है,
किंतु उसे विश्वास
नहीं हुआ। वह लगातार चीख-पुकार करता रहा। यह देखकर बादशाह ने नाराज होकर जहाज के
खलासियों को उसे चुप करने का हुक्म दिया। उनके समझाने पर भी वह शांत नहीं हुआ। तब
एक बूढ़े खलासी ने बादशाह से कहा - ‘जहांपनाह! मुझे इजाजत दें, मैं इसे चुप करा सकता हूं।’
बादशाह ने अनुमति
दे दी।
उस बूढ़े के कहने पर गुलाम को रस्सी से बांधकर पानी में लटका दिया गया। जब
उसने पानी में दो-तीन गोते खा लिए तो उसे फिर जहाज में खींच लिया गया। ऊपर आते ही
गुलाम चुपचाप एक कोने में बैठ गया। यह देख सभी चकित हो गए। बादशाह ने बूढ़े खलासी
से कारण पूछा, तो वह बोला - ‘जहांपनाह! पहले यह समुद्र में डूबने का दुख नहीं जानता था, किंतु अब इसने दुख की
झलक पा ली है, अत: अब इसे यहां सुकून मिल रहा है। इसके शांत होने का यही भेद है।’ कथा का सार यह है कि दुख
को सहने के बाद ही सुख का महत्व ज्ञात होता है और तभी व्यक्ति सुख की कद्र करता
है।
भक्त दंपती ने पुत्र खोकर भी असीम धर्य का परिचय दिया
एक भक्त परिवार था, जिसमें पति-पत्नी के अतिरिक्त उनका एक पुत्र था। तीनों
भगवान पर अटूट विश्वास रखते थे। एक बार पुत्र बीमार हो गया। उन्होंने बहुत उपचार
कराया, किंतु
वह स्वस्थ नहीं हुआ। इसी बीच पति को दूसरे शहर में किसी जरूरी काम से जाना पड़ा।
उसने पत्नी के सामने चिंता जताई, किंतु पत्नी ने उसे आश्वस्त किया कि वह बेटे का पूरा
ध्यान रखेगी। पति भारी मन से चला गया, किंतु दुर्भाग्यवश उसके जाते ही पुत्र का देहांत हो
गया। पत्नी ने धर्य रखते हुए अपने बेटे के शव को ढंक दिया और शाम को जब पति के आने
का समय हुआ तो भोजन बनाने लगी। पति ने आते ही पूछा - ‘पुत्र की क्या दशा है?’ पत्नी बोली - ‘आज वह पूरा विश्राम कर
रहा है। आप भोजन कर लीजिए, फिर उसके पास जाना।’ जब पति भोजन करने लगा, तो पत्नी बोली - ‘पड़ोसन ने मुझसे एक
बर्तन में पानी मांगा था, जो मैंने उसे दिया।
अब मैं अपना बर्तन मांग रही हूं, तो वह दे नहीं रही है और मुझ पर रोती-चिल्लाती है।’
पति ने कहा - ‘वह बड़ी मूर्ख है। दूसरे
की वस्तु लौटाने में क्यों रोना?’ तब तक पति भोजन कर चुका था। तब पत्नी ने धीरे से कहा - ‘अपना पुत्र भी ईश्वर की
धरोहर था। आज ईश्वर ने अपनी वस्तु हमसे वापस ले ली है, तो हम भी क्यों रोएं?’ पति ने पत्नी का मुंह
देखा और सारा माजरा समझकर बोला - ‘तुम ठीक कहती हो।’ फिर दोनों ने धर्यपूर्वक अपने पुत्र का दाह-संस्कार
किया। कथासार यह है कि मानव-जीवन परमेश्वर की धरोहर है, अत: इसके छिन जाने पर हमें अवसाद
में नहीं डूबना चाहिए।
चतुर हिपोमिनिस ने अपराजेय अटलांटा को अंतत: हरा दिया
एक समय की बात है। यूनान में अटलांटा नाम की एक अत्यंत सुंदर लड़की थी। उसकी
खासियत थी कि वह बहुत तेज दौड़ती थी। उसकी सुंदरता पर अनेक युवक मुग्ध थे और उससे
विवाह करना चाहते थे। किंतु अटलांटा की एक शर्त थी कि वह उसी व्यक्ति से विवाह
करेगी, जो
उसे दौड़ में पराजित कर दे। उसे हराने की अनेक युवकों ने कोशिश की, किंतु कोई भी सफल नहीं
हुआ। यह दौड़ भी अजीब ढंग की होती थी।
अटलांटा अपने प्रतिस्पर्धी को १क्क् गज आगे खड़ा करती थी और स्वयं एक भाला
लेकर 100
गज पीछे खड़ी होती थी। जब दौड़ आरंभ होती तो अटलांटा तेजी से पहुंचकर अपने
प्रतिस्पर्धी को बीच में ही रोककर भाले से मार डालती। इस प्रकार अनेक युवकों ने
जान गंवाई। यह सब देखकर हिपोमिनिस नामक राजकुमार ने अटलांटा को हराने के लिए
देवताओं के राजा जुपिटर की आराधना की।
जुपिटर ने प्रसन्न होकर सुंदरता की देवी वीनस से हिपोमिनिस को सोने के तीन
सुंदर सेब दिलाए। जब दौड़ आरंभ हुई और अटलांटा हिपोमिनिस के करीब पहुंचने लगी,
तो हिपोमिनिस ने
चुपके से एक सेब जमीन पर डाल दिया। अटलांटा इतने सुंदर सेब का मोह न छोड़ पाई।
उसने सेब उठाया और दौड़ने लगी। हिपोमिनिस ने शेष दो सेबों को भी थोड़ी-थोड़ी दूरी
पर रख दिया, जिनके लोभ में अटलांटा को काफी देर हो गई और हिपोमिनिस निर्दिष्ट स्थान पर
पहले पहुंच गया। शर्त के मुताबिक अटलांटा ने उससे विवाह किया। वस्तुत: कठिन से
कठिन काम धर्य व बुद्धि के समन्वित प्रयास से पूर्ण किया जा सकता है।
धन के स्थान पर धर्म चुनकर ब्राह्मण ने पाई शांति
एक ब्राह्मण के हृदय में यज्ञ करने का विचार आया, किंतु उसके पास इसके लिए
पर्याप्त धन नहीं था। इसलिए उसने अनेक देवताओं की पूजा की, किंतु बात नहीं बनी। अंतत: उसने
विचार किया कि मैं उस देवता की उपासना करूंगा, जो शीघ्र मुझ पर प्रसन्न होकर धन
दे दे।
उसने आकाश में कुंडधार नामक मेघ के देवता की आराधना आरंभ की। वे प्रसन्न हुए,
किंतु मेघों के
देवता होने के कारण जल के सिवाय कुछ भी देने में असमर्थ थे। अत: कुंडधार मणिभद्र
के पास पहुंचे और बोले - ‘मैं अपने उपासक ब्राह्मण को सुख देना चाहता हूं।’ मणिभद्र ने कहा - ‘तुम्हारे भक्त ब्राह्मण
को मैं अपार धन दे देता हूं।’ किंतु कुंडधार ने उनसे उसे धन देने के बजाय धर्म की ओर
प्रेरित करने का आग्रह किया।
मणिभद्र की कृपा से ब्राह्मण की बुद्धि धर्म की ओर उन्मुख हो गई। ब्राह्मण वन
में जाकर कठोर तपस्या करने लगा और उसने दिव्य सिद्धियां प्राप्त कर लीं। एक दिन
कुंडधार ने उसे दर्शन देकर कहा - ‘तुम अभी तक धन की इच्छा से मेरी उपासना करते थे। अब तपस्या
के प्रभाव से स्वयं इतने सशक्त हो गए हो कि वरदान देकर किसी को भी धनवान बना सकते
हो। क्या तुम्हारी कोई कामना शेष है?’ ब्राह्माण ने हाथ जोड़कर कहा - ‘मैं आपकी कृपा से
प्रसन्न व संतुष्ट हूं। आपने धन के स्थान पर धर्म की ओर प्रेरित कर मुझे सिखाया है
कि धन महत्वपूर्ण है, किंतु धर्म का मार्ग उससे भी अधिक महत्वपूर्ण व श्रेष्ठ है।’ वस्तुत: धन और धर्म के
चयन में धर्म ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि धर्म स्थायी रूप से साथ रहता है, जबकि धन अस्थायी होता
है।
अवसर पाते ही मुखर हो उठी मातृगुप्त की प्रतिभा
उज्जयिनी में आधी रात को मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली कड़क रही थी। सारा
उज्जयिनी मीठी नींद सो रहा था, किंतु राजमहल का द्वारपाल मातृगुप्त पहरा देते हुए अपने
दुर्भाग्य पर विचार कर रहा था। वस्तुत: वह असाधारण काव्य प्रतिभा का धनी था।
राजा विक्रमादित्य गुणीजनों को समुचित सम्मान देते हैं, यह सुनकर ही वह यहां आया था,
किंतु राजा से
नहीं मिल सका। बड़ी कठिनाई से द्वारपाल का काम मिला। इस तूफानी रात में
विक्रमादित्य भी सोए न थे। वे राजकाज की किसी समस्या पर चिंतन कर रहे थे। तभी उनकी
दृष्टि द्वारपाल पर गई। उन्होंने प्रश्न किया - ‘अभी कितनी घड़ी की रात्रि शेष है?’
मातृगुप्त ने कहा
- ‘महाराज!
अभी डेढ़ प्रहर रात्रि शेष है।’ महाराज ने पूछा - ‘यह तुम्हें कैसे पता है?’
मातृगुप्त ने अपनी एक भावपूर्ण कविता उत्तर के रूप में उन्हें सुना दी। अगले
ही दिन विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को दरबार में बुलाया और एक पत्र देते हुए उसे
कश्मीर पहुंचाने को कहा। मातृगुप्त ने सोचा कि यह उसकी धृष्टता का दंड है। कई
दिनों की यात्रा के बाद जब मातृगुप्त ने कश्मीर पहुंचकर वहां के प्रधानमंत्री को यह
पत्र दिया, तो वह पत्र पढ़ने के बाद बड़े आदर से बोला - ‘महाराज! सम्राट विक्रमादित्य की
आज्ञा से अब इस देश के राजा आप हैं।’ मातृगुप्त सम्राट विक्रमादित्य की इस कृपा पर अभिभूत
हो गया। कथा का निहितार्थ यह है कि प्रतिभा को महज एक अवसर की आवश्यकता होती है।
यदि उचित समय, स्थान और व्यक्ति का सहयोग प्राप्त हो, तो प्रतिभा को मुखर होते देर
नहीं लगती।
गौतम बुद्ध ने अपमान सहकर भी दिया संयम का परिचय
एक बार गौतम बुद्ध भ्रमण करते हुए किसी गांव में पहुंचे। उस गांव का प्रधान
बुद्ध को पसंद नहीं करता था। जब उसे मालूम हुआ कि बुद्ध अपने शिष्यों के साथ गांव
में आ रहे हैं, तो उसने गांव के लोगों को आदेश दिया कि वे अपने घरों के दरवाजे बंद रखें और
बुद्ध को भिक्षा न दें। बुद्ध ग्रामप्रधान के दुर्भाव से परिचित थे।
मार्ग में जब उसका घर आया तो वे दरवाजे पर खड़े हो गए और भिक्षा मांगने लगे।
आवाज सुनकार ग्रामप्रधान नाराज होते हुए बोला - ‘तुम यहां से चले जाओ। काम-धंधा
कुछ करते नहीं और भीख मांगकर पेट भरते हो। कष्ट उठाकर काम करना सीखो और अपना पेट
स्वयं भरो।’ बुद्ध चुपचाप उसकी अपमानजनक बातें सुनते रहे। जब वह बोल चुका, तब उन्होंने कहा - ‘मेरी एक शंका का आप
समाधान करें। यदि आपके घर आकर कोई कुछ खाने को मांगे और आप थाली सजाकर लाएं,
फिर भी वह उसे
अस्वीकार कर चला जाए, तो आप उन खाद्य-पदार्थो का क्या करेंगे?’
ग्रामप्रधान बोला - ‘मैं उसे नष्ट नहीं करूंगा और वापस अपने घर में रख लूंगा।’
तब बुद्ध ने कहा -
‘उस दशा
में आपका सामान आपके पास ही रहा न? इसी प्रकार आपके घर आकर हमने भिक्षा मांगी और बदले में आपने
हमें अपशब्द कहे। भिक्षा में दिए इन अपशब्दों को हमने अस्वीकार कर दिया। इसलिए अब
ये आपके पास ही रह गए।’ ग्रामप्रधान को बुद्ध की बातों का मर्म समझ में आ गया। उसने
उनसे क्षमा मांगी और उनका शिष्य बन गया। सार यह है कि उग्रता बनता काम बिगाड़ देती
है, जबकि
संयम से बिगड़े हुए काम भी बन जाते हैं।
आसक्ति ने आखिरकार छोटे भाई की जान ले ली
एक चंदन व्यापारी के दो पुत्र थे। एक बार व्यापारी ने व्यापार के सिलसिले में
दोनों को अरब देश भेजा। दोनों समुद्री जहाज पर सवार होकर चले। दुर्भाग्यवश तूफान
में फंसकर जहाज भटक गया और दोनों भाई एक द्वीप पर पहुंच गए। वहां एक यक्षिणी से
उनकी भेंट हुई, जो अत्यंत सुंदर थी। यक्षिणी ने अपने महल में ले जाकर उनका खूब सत्कार किया।
दोनों बड़े प्रसन्न हुए।
अगले दिन वे द्वीप पर घूमने निकले तो मार्ग में एक व्यापारी को गंभीर रूप से
घायल अवस्था में पाया। पूछने पर उसने बताया कि वह भी अपने जहाज के भटक जाने से
वहां पहुंचा है। यहां एक यक्षिणी ने पहले तो उसका खूब स्वागत किया, किंतु फिर किसी बात पर
नाराज होकर यह दशा कर दी।
व्यापारी ने आगे बताया कि एक निश्चित तिथि पर यहां एक यक्ष घोड़े का रूप धारण
कर आता है और प्रार्थना करने पर समुद्र पार उतार देता है, किंतु यदि उस पर सवार व्यक्ति
पीछे दौड़कर आती यक्षिणी के रूप पर आसक्त होकर उसे मुड़कर देखे, तो यक्ष उस व्यक्ति को
समुद्र में फेंक देता है। दोनों भाइयों ने भी यक्ष से समुद्र पार उतारने की
प्रार्थना की, जिसे उसने मान लिया।
जैसे ही दोनों यक्ष पर सवार होकर रवाना हुए, पीछे से यक्षिणी ने रुकने की
पुकार लगाई। छोटा भाई स्वयं पर नियंत्रण न रख सका और उसने यक्षिणी के प्रति
मोहासक्त हो पीछे मुड़कर देखा। तत्क्षण यक्ष रूपी अश्व ने उसे समुद्र में गिरा
दिया और यक्षिणी ने उसे मार डाला। वस्तुत: आसक्ति पापकर्म की ओर प्रवृत्त करती है,
जबकि निरासक्ति से
जीवन निरापद रहकर उन्नति की ओर उन्मुख होता है।
संपन्न हीरामन ने निर्धन नारायण से
सीखा सफलता का मंत्र
एक गांव में दो किसान रहते थे-
हीरामन और नारायण। दोनों अच्छे मित्र थे। हीरामन बहुत बड़े भूखंड का स्वामी था,
जबकि नारायण के पास बहुत थोड़ी जमीन थी, किंतु वह अपने जीवन से परम संतुष्ट था। एक दिन नारायण हीरामन
के पास गया, तो वह काफी परेशान नजर आ रहा था।
उसके पूरे घर में गंदगी फैली हुई थी
और सामान भी बिखरा पड़ा था। नारायण ने हीरामन से उसकी परेशानी का कारण पूछा,
तो वह बोला - ‘समझ नहीं
आ रहा है कि हमारी खेती क्यों नष्ट हो रही है? जरूरत के लायक अनाज भी पैदा नहीं होता। अगर इसी तरह रहा, तो कुछ समय बाद गुजारा करना भी मुश्किल होगा।’ नारायण ने हैरानी से कहा - ‘तुम्हारे पास तो इतनी जमीन है, फिर तुम्हारा
ये हाल कैसे हो गया? तुम मेरे घर चलो। वहां से मैं
तुम्हें एक संत के पास ले चलूंगा, जो सफलता का
मंत्र जानते हैं।’
हीरामन नारायण के साथ उसके घर
पहुंचा। उसने देखा कि नारायण का घर बेहद साफ-सुथरा और व्यवस्थित था, पशु भी स्वस्थ थे और चारों ओर खुशहाली दिखाई दे रही थी।
हीरामन का यथोचित सत्कार करने के उपरांत नारायण और उसकी पत्नी ने पशुओं को
दाना-पानी दिया और घर के अन्य सभी कार्य स्वयं ही किए। काम से निवृत्त होकर नारायण
ने हीरामन को साधु के पास चलने को कहा, तो वह
बोला - ‘नहीं, उसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं भी अब तुम्हारी तरह स्वयं परिश्रम करूंगा।’
कथा का सार यह है कि आत्मनिर्भरता सफलता की कुंजी है,
इसलिए अपने कार्य स्वयं ही करें। दूसरों के भरोसे न
रहें।
गुरुनानक ने दिया खुदा की सही इबादत का संदेश
एक बार गुरुनानक सुल्तानपुर के नवाब के घर गए। नवाब ने नानक का आत्मीय स्वागत
किया। फिर दोनों के मध्य धर्म पर चर्चा होने लगी। नवाब ने कहा - ‘आप तो हिंदू-मुस्लिमों
में कोई अंतर नहीं करते, इसलिए आज मेरे साथ आप भी नमाज अदा करने चलें।’
नानक बोले - ‘देने वाला एक है और लेने वाला एक, तो अंतर कैसे करूं? चलिए, मस्जिद चलें।’ दोनों मस्जिद पहुंचे।
नवाब साहब नमाज अदा करने लगे, नानक भी ध्यानमग्न होकर एक ही मुद्रा में जहां खड़े थे,
वहीं खड़े रहे।
नमाज समाप्त होने के बाद नवाब साहब बोले - ‘आपने तो नमाज अदा की ही नहीं।’
नानक ने कहा - ‘आप मेरी गुस्ताखी माफ
करें। जब आप नमाज अदा कर रहे थे, तब मेरा मन अपने स्वामी में लगा हुआ था। उस समय मुझे अपने
स्वामी के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन आप तो अल्लाह में अपना मन
रमाए हुए थे, फिर आपने मुझे कैसे देखा?’ नवाब साहब नानक की बात का अभिप्राय समझकर बोले - ‘आप ठीक कह रहे हैं।
मेरा ध्यान अल्लाह में कम, आपको देखने में अधिक था। यह हमारी कमजोरी है कि हम इबादत
करने आते हैं, खुदा में चित्त लगाने नहीं।’ तब नानक ने कहा - ‘हुजूर! हम सब एक ही खुदा के बंदे हैं। हम चाहे उसे
देख पाएं या नहीं, वह सब कुछ देख रहा है, क्योंकि वह मंदिर, मस्जिद हर जगह व्याप्त है। उसे पाने के लिए एकनिष्ठ
भाव से उस पर चित्त लगाने की आवश्यकता है।’ सार यह है कि ईश्वर की अनुभूति
और प्राप्ति चित्त की लगन और समर्पण भाव से होती है।
जीवन-जल पाकर भी लालची राजा का हुआ अंत
राजा सूर्यदेव अत्यधिक लालची थे। वे अपना खजाना भरने के लिए प्रजा पर नए-नए कर
लगाते रहते थे। एक बार राजा गंभीर रूप से बीमार हो गए। उन्हें लेने यमदूत पहुंचे।
यमदूतों को देख राजा ने घबराकर उनसे प्रार्थना की - ‘हे यमदूतो! मुझे कुछ दिन और जी
लेने दो। मैंने प्रजा की भलाई के लिए अनेक योजनाएं बनाई हैं।
उन्हें साकार करने के लिए मेरा कुछ दिन और जीवित रहना जरूरी है।’ यह सुनकर यमदूतों ने कहा
- ‘राजन्!
प्रत्येक मनुष्य अमर होना चाहता है, किंतु यह संभव नहीं है।’ यमदूतों के समझाने के बावजूद
राजा का आग्रह जारी रहा। तब यमदूतों ने उन्हें एक कलश देते हुए कहा - ‘यह कलश जीवन-जल से भरा
हुआ है। तुम प्रतिदिन इस कलश से थोड़ा-थोड़ा जल ग्रहण करना। जब तक तुम जीवन-जल को
ग्रहण करते रहोगे, तब तक जीवित रहोगे।’
राजा ने पूछा - ‘किंतु यह तो जल्दी ही समाप्त हो जाएगा। उसके बाद क्या होगा?’ यमदूतों ने कहा - ‘यदि तुम थोड़ा-थोड़ा जल
पियोगे, तो
यह लंबे समय तक समाप्त नहीं होगा। यदि एक ही बार में पीने की कोशिश की तो तुम्हारी
मृत्यु हो जाएगी।’ यमदूतों के कहे अनुसार राजा थोड़ा-थोड़ा जीवन-जल ग्रहण करने लगा और अनेक वर्ष
जीवित रहने के कारण वह अति आत्मविश्वासी हो गया। फिर एक दिन उसने सोचा कि क्यों न
एक साथ सारा जीवन-जल पीकर अमर हो जाऊं। जैसे ही उसने कलश को खाली किया, उसकी मृत्यु हो गई।
वस्तुत: लोभ का अंत कष्ट, संकट अथवा विफलता से ही होता है, इसलिए मन पर नियंत्रण रखना जरूरी
है।
संत उमर ने समझाया मोह से लालसा बढ़ती है
सूफी संत उमर बगदाद में रहते थे। उनकी ख्याति से प्रभावित होकर बड़ी संख्या
में लोग उनके पास आते थे। वे सभी से प्रेमपूर्वक मिलते और प्रसन्न व संतुष्ट करते।
एक बार एक दरवेश उनसे मिलने आया। जब वह उमर के ठिकाने पर पहुंचा, तो उसने देखा कि संत उमर
एक फकीर होने के बावजूद सोने से निर्मित आसन पर बैठे थे।
उनके कक्ष में चारों ओर जरी के पर्दे लगे हुए थे तथा रेशमी रस्सियों की सजावट
थी। रस्सियों के निचले हिस्सों में सोने के घुंघरू बंधे हुए थे और चारों ओर सुगंध
फैली थी। कुल मिलाकर वहां के परिवेश से विलास और वैभव प्रदर्शित हो रहा था। उमर के
कुछ बोलने से पहले ही दरवेश ने कहा - ‘मैं आपकी फकीराना ख्याति सुनकर आपके दर्शन हेतु आया
था, किंतु
यहां देखता हूं कि आप तो भौतिक संपदा के सागर में हैं।’ उमर बोले - ‘यदि तुम्हें एतराज है,
तो मैं इसी पल यह
वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चलता हूं।’ दरवेश के हामी भरते ही उमर सब छोड़कर उसके साथ हो
लिए।
दोनों पैदल कुछ मील चले होंगे कि दरवेश ने कहा - ‘मैं आपके ठिकाने पर अपना कासा
(कटोरा) भूल आया हूं। उसे लेने के लिए वापस जाना होगा।’ तब उमर बोले - ‘मैं तुम्हारे कहने पर
अपनी संपत्ति को पलभर में ठोकर मारकर आ गया, किंतु तुम मामूली-से कटोरे का
मोह नहीं छोड़ सके। जब तक मन में मोह है, सत्य की प्राप्ति कठिन है।’ दरवेश को अपनी भूल का अहसास हुआ
और उसने उमर से क्षमा मांगी। सार यह है कि मोह से लालसा बढ़ती है, जो संग्रह-वृत्ति को
प्रोत्साहन देती है।
निरपेक्ष भक्तिभाव से निर्धन ने पाई ईश कृपा
एक धनी सेठ अपनी परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए प्रतिदिन मंदिर जाते और
सोने के थाल में वैभवपूर्ण पूजा-सामग्री सजाकर भगवान को समर्पित करते थे। वे लंबे
समय तक यह सब करते रहे कि एक दिन भगवान अवश्य प्रसन्न होंगे, किंतु ऐसा नहीं हुआ।
एक दिन मंदिर में उन्होंने देखा कि फटे वस्त्र पहने एक आदमी भगवान से कह रहा
था - ‘हे
ईश्वर! तेरा लाख-लाख शुक्र है। मैं तेरी कृपा से रोज सुख की नींद सोता हूं। मेरा
कोई दुश्मन नहीं और मुझे कोई कष्ट नहीं है। मुझ पर सदा ऐसी ही कृपा बनाए रखना।’
घर लौटने के बाद
भी सेठजी को उस व्यक्ति की बातें याद आती रहीं। वे समझ नहीं पा रहे थे कि भगवान को
प्रतिदिन बहुमूल्य उपहार चढ़ाने के बावजूद उनके कष्ट कम नहीं हो रहे। फिर वह
फटेहाल इंसान, जो भगवान को कुछ भी देने में असमर्थ है, इतना सुखी कैसे है? बहुत सोचने के बाद भी
सेठजी अपने दुखों का और उस निर्धन व्यक्ति के सुखों का कारण नहीं खोज पाए। तब वे
नगर में ही रहने वाले एक संत के पास गए।
संत ने उनकी बात सुनकर कहा - ‘सेठजी! आप जिस तरह मनुष्य को प्रसन्न करते हैं, उसी तरह ईश्वर को भी
प्रसन्न करना चाहते हैं, जबकि उस निर्धन ने भगवान को अपने हृदय में बसा रखा है। वह
उनके पास कोई इच्छा या अपेक्षा लेकर नहीं जाता। जिस दिन ईश्वर के प्रति आपका यह भाव
बदलेगा, आपके
मन का द्वंद्व अपने आप खत्म हो जाएगा।’ सार यह है कि ईश्वर के प्रति निरपेक्ष भक्तिभाव सदा
फलता है। वह भौतिक संपन्नता दे अथवा न दे, किंतु मानसिक शांति अवश्य देता है।
महात्मा के उपदेश ने किया चोरों का
हृदय परिवर्तन
किसी नगर में दो चोर रहते थे। वे
प्रतिदिन चोरी करते और चोरी का माल दो हिस्सों में बांट देते थे। एक हिस्स स्वयं
का और दूसरा भगवान को चढ़ा देते थे। एक रात जब वे चोरी के लिए निकले, तो खूब भटकने के बाद भी चोरी करने का कोई मौका नहीं मिला।
दोनों थककर एक मंदिर के चबूतरे पर
बैठ गए। वहां उनकी भेंट एक संत से हुई। संत ने उनसे परिचय पूछा तो उन्होंने स्वयं
के विषय में सच-सच बता दिया। यह सुनकर महात्मा बोले - ‘तुम जो करते हो, वह उचित है या
अनुचित, इस पर तुमने कभी विचार किया है?’ चोर बोले - ‘हम जो करते हैं,
वह उचित ही होगा, क्योंकि चोरी करके हम जो भी धन या वस्तु प्राप्त करते हैं, उसे दो भागों में बांट देते हैं।
एक भाग हम स्वयं रखते हैं और दूसरा
भगवान को अर्पित कर देते हैं।’ तब महात्मा ने
अपने झोले में से एक जीवित मुर्गा निकाला और उन्हें देते हुए कहा - ‘आज तुम चोरी न कर पाए। इस कारण निराश लग रहे हो। यह मुर्गा
रखो। इसके दो हिस्से कर लेना। एक खुद रख लेना और दूसरा भगवान के चरणों में चढ़ा
देना।’ दोनों चोर सकपका गए। फिर महात्मा का आशय
समझकर बोले - ‘महात्माजी! आपने हमारी आंखें खोल
दीं।
हम पाप की कमाई भगवान को चढ़ाकर
महापाप कर रहे थे। अब हम चोरी न करते हुए मेहनत की कमाई खाएंगे और उसका एक हिस्सा
ईश्वर को अर्पित करेंगे।’ सार यह है कि पाप
की कमाई संपन्नता देने के बावजूद असंतोष और व्यग्रता का कारण बनती है, जबकि मेहनत की कमाई सदैव आत्मा को सुकून देती है।
भिक्षु से राजा ने जाना मन की शांति
पाने का राज
एक राजा हमेशा उदास रहता था। लाख
कोशिश करने के बावजूद उसे शांति नहीं मिलती थी। एक बार उसके नगर में एक भिक्षु
आया। भिक्षु के ज्ञानपूर्ण उपदेश से राजा बहुत प्रभावित हुआ। उसने भिक्षु से पूछा
- ‘मैं राजा हूं, मेरे पास सब कुछ है, किंतु फिर भी मेरे
मन में शांति नहीं है।
मुझे क्या करना चाहिए?’ भिक्षु बोला - ‘आप अकेले में
बैठकर चिंतन करें।’ राजा अगले दिन सुबह अपने कक्ष में
आसन जमाकर बैठ गया। तभी उसके महल का एक कर्मचारी सफाई के लिए उधर आया। राजा उससे
बात करने लगा। कर्मचारी से राजा ने उसकी परेशानियां पूछीं, जिन्हें सुनकर उसका दिल भर आया। इसके बाद राजा ने हर कर्मचारी के कष्ट व
दुख जाने।
सबकी व्यथा सुनने के बाद राजा ने
निष्कर्ष निकाला कि वेतन कम होने से सभी आर्थिक रूप से त्रस्त थे। राजा ने तत्काल
उनके वेतन में वृद्धि की, जिससे वे सभी खुश
हो गए और उन्होंने राजा के प्रति आभार व्यक्त किया। अगले दिन जब राजा की भिक्षु से
भेंट हुई, तो उसने पूछा - ‘राजन! आपको कुछ शांति प्राप्त हुई?’ राजा बोला - ‘मुझे पूर्ण रूप से तो शांति नहीं
मिली, किंतु जबसे मैंने मनुष्य के दुखों के स्वरूप
को जाना है, अशांति थोड़ी-थोड़ी जाती रही।’
तब भिक्षु ने समझाया - ‘राजन! आपने शांति के मार्ग को खोज लिया है। बस, उस पर आगे बढ़ते जाएं। एक राजा तभी प्रसन्न रह सकता है, जब उसकी प्रजा सुखी हो।’ सार यह है कि मन की शांति स्वयं के सुख से अधिक दूसरों के दुख हरकर उन्हें
सुखी बनाने से मिलती है, इसलिए यथाशक्ति
दूसरों की सहायता करें।
श्रीराम ने भरत के प्यार और त्याग की श्रेष्ठता सिद्ध की
जब राम रावण का वध कर अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, तभी एक दिन एक सभासद ने
भरत से पूछा- ‘आपने राम के लिए इतना त्याग किया और श्रीरामजी भी आपको प्राणों से प्रिय बताते
हैं, फिर
क्या कारण है कि राजसभा में आपको सबसे पिछला स्थान दिया गया?’ भरत ने उत्तर दिया - ‘जो पेड़ कड़वा हो,
उसकी पत्तियां,
फूल व फल सभी
कड़वे होते हैं।
मेरी माता ने भ्राता राम को वनवास दिलवाकर जघन्य पाप किया था। उसका पुत्र होने
के कारण इस पाप की कड़वाहट से मैं कैसे बचा रह सकता था? इसलिए मुझे सबसे पीछे स्थान दिया
गया।’ जब
सभासद ने श्रीराम को भरत के ये विचार बताए, तो वे बोले - ‘भरत के विचार ठीक नहीं
हैं। अयोध्या लौटकर मैंने भरत से कहा था - कल से तुम मेरा छत्र लेकर मेरे पीछे
खड़े रहोगे। कोई भी राजा तभी तक राजा रह सकता है, जब तक उसका छत्र सुरक्षित है।’
सभासद दुविधा में पड़ गया कि क्या सही है? उसने फिर भरत को राम के वचन
सुनाए, तो
वे बोले - ‘राम तो अपने अधम से अधम सेवक की भी प्रशंसा करते हैं। वैसे सही वही है,
जो मैंने कहा।’
सभासद उलझन में
पड़ गया। उसने श्रीराम को पुन: भरत के विचार बताए, तो वे बोले - ‘प्रेम व त्याग के युद्ध
में मैं भरत से पराजित हो गया हूं। मैंने अपनी पराजय स्वीकार कर उन्हें पीठ दिखा
दी है, इसलिए
वे पीछे हैं। उनका पीछे होना उनकी महानता का सूचक है।’ रामायण का यह प्रसंग बताता है कि
त्याग, सेवा
और भक्ति की त्रयी धरती पर राम राज्य को साकार कर सकती है, जैसा भरत ने कर दिखाया।
महावीर द्वारा दी गई शिक्षा से क्रोधी सर्प बन गया देवता
एक तपस्वी वन में अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान करता था। लेकिन वह अत्यंत
क्रोधी स्वभाव का था। एक दिन वह क्रोध में आकर किसी शिष्य को मारने दौड़ा, किंतु गुस्से में वह
मार्ग में एक खंभे से टकरा गया और उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद अपने तपोबल से
वह फिर तपस्वी बना।
उसका नाम था - चंडकौशिक। उसके आश्रम के बगीचे में एक दिन कुछ लोग फूल तोड़ने
घुसे। चंडकौशिक को जैसे ही यह पता लगा, वह तुरंत वहां पहुंचा। उसके आते ही चोर भाग गए। इस
बार चंडकौशिक का क्रोध प्रबल हो गया। वह कुल्हाड़ी लेकर उन्हें मारने दौड़ा। आवेश
में आकर एक कुएं में गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। प्रचंड क्रोध के समय मृत्यु
होने के कारण अगले जन्म में वह भयावह विषधर बना। भय से लोगों ने उस वन से आना-जाना
बंद कर दिया। एक बार भगवान महावीर उस वन में आए।
लोगों ने उन्हें भीतर जाने से रोका, किंतु वे निर्भीक होकर गए। महावीर को देखते ही सर्प
ने फुफकारना शुरू किया, किंतु महावीर उसके बिल के पास अडिग खड़े रहे। क्षमा और
क्रोध का संघर्ष देर तक चलता रहा। सर्प ने महावीर के चरणों में डसा, तो वहां से दूध की धारा
बह निकली। सर्प हार गया। तब महावीर ने उसे समझाया - ‘चंड! अब चेत जाओ। जरा सोचो कि
तुम कौन थे और क्या बन गए हो?’ उस दिन से चंड ने लोगों को अभय देना सीखा। इसके बाद अगले
जन्म में वह देवता बना। सार यह है कि क्रोध तामसिक वृत्ति है, जबकि क्षमा सात्विक
वृत्ति। जीवन का आनंद सात्विकता में ही निहित है, इसलिए क्रोध त्यागें और क्षमा
अपनाएं।
स्वर्ण मुद्राओं का लालच भी शिष्य को डिगा नहीं पाया
एक शिष्य ने अध्ययन की समाप्ति पर अपने गुरु से पूछा कि वे उससे किस प्रकार की
दक्षिणा चाहेंगे? गुरु ने उत्तर दिया कि उन्हें उसकी कृतज्ञता के अतिरिक्त अन्य कोई दक्षिणा
नहीं चाहिए। उनके द्वारा दी गई शिक्षा के अनुरूप आचरण करके वह गुरु को सम्मान
दिलवाए, वही
उनके लिए उचित दक्षिणा होगी। किंतु शिष्य का दक्षिणा लेने का आग्रह बना रहा।
उसका कहना था कि फिर भी वे अपनी किसी आवश्यकता या इच्छा का संकेत दें। शिष्य
के इस अति आग्रह से गुरु को क्रोध आ गया। उन्हें लगा कि शायद शिष्य को अपनी देने
की क्षमता पर अभिमान हो गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने एक असंभव धनराशि बताते हुए कहा
- ‘तुमने
मुझसे सोलह विद्याएं सीखी हैं, तो मेरे लिए सोलह लाख स्वर्ण मुद्राएं लाओ।’ गुरु की बात सुनकर शिष्य
धनसंग्रह के लिए निकल पड़ा। सबसे पहले वह राजा रघु के पास गया और उनसे वचन लिया कि
वे उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण करेंगे। फिर उसने राजा के समक्ष सोलह लाख स्वर्ण
मुद्राओं की मांग रखी।
उस समय इतनी स्वर्ण मुद्राएं उनके पास नहीं थीं, किंतु अपने वचन पर दृढ़ रहने के
लिए वे धन के देवता कुबेर के पास गए और उनसे असंख्य स्वर्ण मुद्राएं ले आए। फिर उस
शिष्य को बुलाकर उससे सारी स्वर्ण मुद्राएं लेने का आग्रह किया, किंतु उसने सोलह लाख
स्वर्ण मुद्राएं ही लीं। रघु ने उससे बार-बार कहा किंतु युवक ने अपनी लालसा नहीं
बढ़ने दी और गुरु को ससम्मान सोलह लाख मुद्राएं समर्पित कर दीं। वस्तुत: अपनी
इच्छाओं को वश में रखने से जो संयम सिद्ध होता है, वह निजी स्तर पर संतोष और
सामाजिक स्तर पर सम्मान व प्रतिष्ठा देता है।
जानवरों की फौज के सामने राजा को भी झुकना पड़ा
एकजंगल में एक चींटा अपने बिल में रहता था। एक बार उस देश का राजा उस जंगल में
शिकार खेलने आया। सारे चींटों के घर राजा के सैनिकों के घोड़ों के चलने से फूट गए।
इससे चींटों को रहने की समस्या पैदा हो गई। उनके अंडे भी नष्ट हो गए और अनेक बच्चे
भी मारे गए। अपनी जाति और वंश को तहस-नहस हुआ देख चींटों के सरदार को बहुत गुस्सा
आया। उसने राजा से बदला लेने की ठानी। वह जंगल से महल की ओर चल पड़ा। रास्ते में
उसे सर्वप्रथम एक भालू मिला। उसने चींटे से पूछा - ‘कहां जा रहे हो, सरदार?’ चींटे ने पूरी कहानी
सुनाते हुए कहा - ‘मैं राजा से बदला लेने जा रहा हूं।’
भालू बोला - ‘मुझे भी साथ ले चलो।’ चींटे ने भालू को अपने साथ ले लिया। इसी तरह और आगे बढ़ने
पर चींटे को क्रमश: शेर, बंदर, लोमड़ी, सियार, हाथी और घोड़ा मिले, जिन्होंने चींटे का साथ देना
पसंद किया। इस प्रकार एक बहुत बड़ी फौज चींटे के साथ चल पड़ी। महल के द्वार पर
पहुंचकर चींटे ने राजा को युद्ध के लिए ललकारा। शोर सुनकर राजा ने अपने महल की
खिड़की से नीचे देखा, तो इतनी बड़ी फौज देखकर डर गया। कारण जानने के बाद उसने अपनी गलती स्वीकार
करते हुए चींटे के पास यह संधि प्रस्ताव भेजा कि उनके क्षेत्र को आने-जाने वालों
के लिए वर्जित क्षेत्र घोषित कर दिया जाए। इस प्रकार एक छोटे से चींटे ने राजा को
झुकने हेतु विवश कर दिया। इस जातक कथा में यह संदेश निहित है कि संगठन में बड़ी
ताकत होती है। मिल-जुलकर बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना आसानी से किया जा सकता है।
राजा ने किसानों का लगान लौटाकर पाई शांति
एक रात सम्राट को नींद नहीं आ रही थी। वे टहलते हुए अपने कक्ष से बाहर आए तो
उन्होंने देखा कि मंत्री महोदय बहीखातों को लेकर गहरी चिंता में बैठे थे। सम्राट
ने उनसे चिंता का कारण पूछा, तो वे बोले - ‘महाराज! पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष लगान अधिक
आया है, किंतु
कारण अब तक नहीं मिला।’
सम्राट ने कहा - ‘हिसाब में कुछ चूक हो गई होगी।’ मंत्री बोले - ‘हिसाब तो ठीक है।’ सम्राट ने कहा - ‘रात ज्यादा हो गई है,
इस समस्या को कल
निबटा लेना।’ किंतु मंत्री बोले - ‘आमदनी इस तरह बढ़ना साम्राज्य के लिए चिंता का कारण है।
लगान की कमी सही जा सकती है, किंतु अन्याय की एक कौड़ी भी खजाने में आती है, तो वह सारे साम्राज्य के
अंगों से फूट-फूटकर निकलती है।’ अब सम्राट भी गंभीर हो गए और मंत्री के सामने बैठ गए। बहुत
विचार के बाद मंत्री ने कहा - ‘इस वर्ष किसानों की पैदावार कम हुई है।
गर्मी अधिक पड़ने से नदियों का जलस्तर काफी कम हो गया, जिससे किनारे की जमीन निकल आई।
इस जमीन में कुछ किसानों ने बाड़े बनाए और उन्हीं से सरकारी खजाने में कुछ धन
ज्यादा आया।’ सम्राट ने कहा - ‘नदियों का जल सूखने से किसान पहले से ही संकट में हैं, उनसे अधिक लगान लेकर मुझे पाप का
भागी नहीं बनना है। गरीब किसानों को वह धन लौटा दो।’ सम्राट के आदेश का पालन हुआ और
अगले वर्ष प्रजा की दुआओं से भरपूर बारिश हुई। वस्तुत: प्रजा के हित को सर्वोपरि
रखने वाला राजा ही राज्य संचालन में सफल होता है और प्रजा के मध्य प्रतिष्ठा पाता
है।
गणिका ने राजगुरु को समझाया पाप कर्म का मूल
राजा ने अपने दरबार के सभासदों से पूछा- ‘बताइए, पाप का जनक कौन होता है?’ लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। तब राजगुरु की ओर राजा की दृष्टि घूमी। यद्यपि राजगुरु परम ज्ञानी थे, किंतु तत्काल उन्हें भी कोई उत्तर न सूझा। राजा ने उन्हें उत्तर देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। काफी चिंतन-मनन के बाद भी राजगुरु को सटीक उत्तर नहीं मिला। इसी तरह छह दिन बीत गए।
राजगुरु घबरा गए। डर के मारे उन्होंने राजधानी छोड़ दी। चलते-चलते एक गांव में पहुंचे। वहां एक मकान के चबूतरे पर वे थककर बैठ गए। वह मकान एक गणिका का था। उसने राजगुरु की घबराहट को भांपकर उनसे बात की तो राजगुरु ने अपनी राम कहानी सुना दी। गणिका ने कहा - ‘इसका उत्तर मेरे पास है, किंतु आपको मेरे घर चलना होगा।’ यह सुनते ही राजगुरु क्रोध में बोले - ‘तुम्हारी तो छाया तक से पाप लगता है।’
गणिका ने कहा - ‘आपकी इच्छा, किंतु ब्राह्मण देवता को दक्षिणा देना तो मेरा फर्ज है।’ यह कहकर उसने सोने की दो मोहरें उन्हें दीं। मोहरों को पाकर राजगुरु गणिका के प्रति कुछ नर्म हुए और उसके घर आए। जब गणिका ने उन्हें पानी पिलाना चाहा, तो उन्होंने ब्राह्मण होने का हवाला देकर उसके हाथ से जल पीने को निषिद्ध बताया। गणिका ने उन्हें चार मोहरें दीं। फिर तो उन्होंने जल भी पिया और भोजन भी किया। तब वह बोली - ‘अब तो आप समझ गए होंगे कि पाप का जनक होता है लोभ।’ राजगुरु निरुत्तर हो गए, किंतु राजा के प्रश्न का उत्तर उन्हें मिल चुका था। कथा का सार यह है कि कर्म और भाग्य से अधिक पाने का लालच सदैव पाप-कर्म कराता है।
संत राबिया ने युवाओं को बताया सेवा का महत्व
संत राबिया अलसुबह कबूतरों को दाना खिलाती थीं। यह उनका प्रतिदिन का नियम था।
शेष समय वे अध्ययन और आध्यात्मिक चर्चा में व्यतीत करतीं। एक दिन वह सुबह के समय
कबूतरों को दाना चुगा रही थीं कि पांच-छह नौजवान टहलते हुए उस बगीचे में आए और
राबिया के पास आकर खड़े हो गए।
संत राबिया उनकी ओर देखकर पहले तो मुस्कराईं, फिर जोर से हंस पड़ीं। युवकों को
उनकी हंसी का अर्थ समझ में नहीं आया। उनमें से एक ने कारण पूछा, तो वह बोलीं - ‘मैं इसलिए हंसी कि जिस
धरती पर तुम जैसे सजीले, सुंदर और बलिष्ठ नौजवान हों, वह धरती कितनी भाग्यशाली है।
मेरी हंसी वास्तव में खुदा के प्रति आभार है।’ युवक यह सुनकर वहीं खड़े हो गए।
राबिया फिर कबूतरों को दाना चुगाने में व्यस्त हो गईं। फिर थोड़ी देर बाद अचानक वह
रो पड़ीं।
उनका रोना देख युवक बेचैन हो गए। उनके द्वारा कारण पूछने पर वह बोलीं - ‘पहले तो मैं यह देखकर
हंसी थी कि धरती पर कितने युवा हैं, लेकिन अब मैं रोई तो इसलिए कि सारे युवा सेवा की
भावना से दूर हैं। यदि युवा अपनी शक्ति का उपयोग सृजनात्मक कार्यो के साथ सेवा में
करें, तो
जगत का कल्याण हो जाएगा। पर ऐसा न होते देखकर मेरे आंसू निकल आए।’ युवकों ने अपनी भूल
स्वीकारी। राबिया ने उन्हें प्रेरित किया कि यदि उनसे कोई बड़ी सेवा न हो सके,
तो वे प्यासों को
पानी, परिंदों
को दाना और मीठी बोली बोलकर ही सुकून पहुंचाएं। वस्तुत: युवावस्था की ऊर्जा को
सद्कार्यो में लगाना आत्मिक शांति का वाहक तो बनता ही है, समाज को सकारात्मक परिणाम देकर
उसकी उन्नति का मार्ग भी खोलता है।
अब्दाली के प्रलोभनों के आगे नहीं झुका मराठा सेनापति
इब्राहिम गार्दी मराठा तोपखाने के सेनापति थे। एक बार युद्धभूमि में उनके
शिविर में एक सैनिक आया और उन्हें सलाम कर बोला - ‘हुजूर! मैं बादशाह अहमदशाह
अब्दाली का दूत हूं। उनकी ओर से आपके लिए एक पैगाम लेकर आया हूं। यदि आप युद्ध में
उनका साथ देंगे तो आप न सिर्फ अपने मजहब की खिदमत करेंगे, बल्कि ऊंचे ओहदे और अतुलित
धन-संपत्ति से नवाजे जाएंगे।
फिलहाल उनकी ओर से यह तोहफा कबूल करें।’ यह कहते हुए अशर्फियों से भरा एक
थैला उसने गार्दी के पैरों के पास रख दिया। गार्दी ने यह सुनते ही क्रोध से
लाल-पीला होकर कहा - ‘यदि तुम दूत न होते, तो तुम्हारा सिर यहीं कलम कर देता। तुम मुल्क के ही नहीं,
दीन के भी दुश्मन
हो। मुझे एक विदेशी लुटेरे अब्दाली का साथ देने के लिए तोहफा दे रहे हो, जिसने हजारों निर्दोष
लोगों का निर्दयता से कत्ल करवा दिया। तुम इसे मजहब की खिदमत कहते हो।
अपने वतन के साथ गद्दारी को मैं मजहब और दीन के साथ गद्दारी मानता हूं।’
गार्दी म्यान से
तलवार निकालते हुए बोले - ‘उठा ये अशर्फियां और मेरी तलवार तुझ पर बिजली बनकर गिरे,
इसके पहले ही यहां
से चला जा।’ सैनिक भयभीत हो अशर्फियां उठाकर भाग गया। गार्दी सच्चे देशभक्त थे। उनके
नेतृत्व में मराठा तोपखाने ने अहमदशाह अब्दाली की सेना पर कहर बरपा दिया। बाद में
भी अब्दाली ने उन्हें तोड़ने का बहुत प्रयास किया, किंतु वे नहीं झुके और अपनी
वतनपरस्ती से कभी समझौता नहीं किया। वस्तुत: देशभक्ति का ऐसा जज्बा यदि देश के
प्रत्येक नागरिक में हो, तो देश की सुरक्षा व विकास सर्वथा सुनिश्चित हो जाते हैं।
निन्यानवे के फेर में पड़कर मोहन ने गंवाया सुख-चैन
सेठ धनीराम हमेशा पैसे कमाने में लगे रहते और परिवार पर पर्याप्त ध्यान नहीं
दे पाते थे। उनकी पत्नी अपनी हवेली के सामने रहने वाले मजदूर मोहन के परिवार की
खुशी देखकर उन्हें उलाहना देती - ‘तुम हमेशा काम में लगे रहते हो, तुम्हें न अपनी फिक्र है न
परिवारवालों की। मोहन के परिवार को देखो, कितना खुशहाल है।’
यह सुनकर सेठजी कहते- ‘मोहन कभी निन्यानवे के फेर में नहीं पड़ा, वरना इसकी सारी हंसी और
मस्ती चली जाती।’ सेठानी ने निन्यानवे के फेर का आशय पूछा, तो सेठजी ने समय आने पर उन्हें
दिखाने का वायदा किया। एक रात सेठजी ने रुपयों की एक पोटली मोहन के आंगन में
चुपचाप फेंक दी। सुबह मोहन की निगाह उस पर पड़ी। खोलने पर उसमें रुपए देख परिवार
बहुत खुश हुआ। पोटली में निन्यानवे रुपए थे। सभी विचार करने लगे कि इसमें जो एक
रुपया कम है, उसे भी कमाकर सौ रुपए पूरे कर लिए जाएं। सबने निश्चय किया कि अधिक मेहनत
करेंगे और पैसे बचाएंगे। यही किया गया।
सौ रुपए तो पूरे हो गए, लेकिन इच्छाएं और बलवती हुईं। अब मोहन, उसकी पत्नी और बच्चे
रुपए बचाने के फेर में व्यस्त रहने लगे। रात को सभी देर से आते और थके-मांदे सो
जाते। सुबह फिर कमाने के लिए निकल पड़ते। अब न वे परस्पर बातचीत करते और न
हंसी-खुशी रह पाते। इस परिवार का यह परिवर्तन दिखाकर सेठजी ने सेठानी से कहा - ‘इसे ही कहते हैं
निन्यानवे का फेर।’ वस्तुत: अधिक पाने की चाह व्यक्ति का सुख-चैन हर लेती है। इसलिए जितना है,
उसी में संतुष्ट
रहना चाहिए।
बुद्धिबल से लड़के ने कंजूस वृद्धा से भी निकाला काम
किसी गांव में एक वृद्धा रहती थी। उसकी कंजूसी के चर्चे पूरे गांव में थे। एक
दिन एक लड़के ने उसे सबक सिखाने की सोची। वह वृद्धा के घर पहुंचा और उसने उसे
बताया कि वह उसका दूर का रिश्तेदार है। वृद्धा ने रिश्तेदारी से इंकार किया,
तो वह बोला - ‘कुछ भी हो, बाहर बहुत बारिश हो रही
है।
आज की रात तो मुझे आपके यहां काटनी ही होगी।’ वृद्धा ने मन मारकर स्वीकृति दे
दी। फिर इस डर से कि लड़का भोजन न मांग बैठे, बोली - ‘तुम रुक जाओ, किंतु मेरे घर में खाने
के लिए कुछ नहीं है।’ लड़के ने कहा - ‘मुझे भूख तो बहुत लगी है अम्मा! किंतु मैं तुमसे कुछ नहीं मांगूंगा। मेरे पास
जादू की एक छड़ी है।
उसकी मदद से जब चाहूं, मैं खीर बना सकता हूं।’ वृद्धा ने बहुत दिनों से खीर
नहीं खाई थी, इसलिए उसने भी खीर खाने की इच्छा व्यक्त की। तब लड़के ने वृद्धा से एक बर्तन
मांगा और बर्तन में पानी डालकर आग पर रख दिया और छड़ी वृद्धा को दिखाते हुए उसमें
डाल दी। फिर उसे ढंक दिया। कुछ देर बाद उसमें कलछी घुमाई और नाक के पास लाकर
सूंघते हुए कहा - ‘बहुत ही स्वादिष्ट खीर बन रही है।’ वृद्धा के मुंह में पानी आ गया।
लड़का बोला - ‘इसमें एक मुट्ठी चावल डल जाता, तो यह और स्वादिष्ट होती।’ वृद्धा ने झट चावल दे दिए। थोड़ी
देर बाद लड़के ने थोड़ा दूध शक्कर और इलायची मांगे और वृद्धा ने खीर के लालच में
दे दिए। अब वृद्धा और लड़के ने साथ बैठकर स्वादिष्ट खीर खाई। वृद्धा ने इसे जादुई
छड़ी का चमत्कार माना। सार यह है कि बुद्धिबल के द्वारा जटिल समय में अपना काम
बनाया जा सकता है।
बुजुर्ग महिला की बात सुनकर निरुत्तर हुआ सिकंदर
यूनान के बादशाह सिकंदर का एक ही स्वप्न था संपूर्ण विश्व पर अपनी विजय का
परचम लहराना। उसने अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वयं को और अपनी सेना को हर
प्रकार से तैयार किया और फिर निकल पड़ा। अनेक देशों को जीतकर उसने हिंदुस्तान पर
चढ़ाई की। जब वह एक गांव से होकर गुजर रहा था, तो एक स्थान पर राह संकरी थी।
वहां एक बुजुर्ग महिला राह रोककर बैठी थी। सिकंदर के सैनिकों ने उसे मार्ग से
हट जाने को कहा, किंतु वह नहीं हटी। जब सिकंदर को यह बात पता चली तो वह स्वयं उस महिला के पास
पहुंचा और उससे पूछा - ‘अम्मा! तू रास्ता क्यों नहीं छोड़ती?’ बुजुर्ग महिला ने प्रश्न
किया - ‘तू
कौन है?’
सिकंदर ने अभिमानपूर्वक जवाब दिया - ‘मैं यूनान का बादशाह सिकंदर महान हूं।’ उसने पूछा - ‘तू अपने देश से यहां
क्यों आया है?’ सिकंदर ने कहा - ‘हिंदुस्तान को जीतने।’ महिला ने पूछा - ‘इसे जीतकर क्या करेगा?’ सिकंदर का उत्तर था - ‘हिंदुस्तान ही नहीं,
मुझे तो अभी पूरा
संसार जीतना है।
सभी देशों को जीतकर मैं एक महान शासक बनूंगा।’ वृद्ध महिला ने फिर प्रश्न किया
- ‘महान
बनकर क्या करेगा?’ सिकंदर बोला - ‘सुख से रोटी खाऊंगा।’ तब उसने हंसकर कहा - ‘अरे नासमझ! रोटी तो तू अभी भी खा
रहा है। सुख की रोटी तो साधारण आदमी भी खा सकता है, फिर युद्ध करने की क्या जरूरत है?’
सिकंदर निरुत्तर हो गया। वस्तुत: दूसरों पर जीत हासिल करने से मात्र अहंकार
तुष्ट होता है, जबकि स्वयं पर विजय (इच्छाओं पर नियंत्रण) प्राप्त करने से आत्मा को सुख मिलता
है। निश्चित रूप से अहं से बड़ा आत्मा का संतोष है।
नेहरूजी ने पिता को अहसास कराया आजादी सबको प्यारी है
बात उन दिनों की है, जब मोतीलाल नेहरू स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। उनके
पुत्र जवाहरलाल तब किशोरवय में ही थे, लेकिन पिता के विचारों और घर के माहौल के कारण उनके
मन में भी स्वतंत्रता की ज्वाला धधकने लगी थी। चूंकि जवाहर की उम्र कम थी, इसलिए वह सक्रिय रूप से
आंदोलनों में भाग नहीं ले पाते थे, परंतु आजादी हासिल करने के लिए कुछ करने की चाह उनके मन में
थी। उनके मन में चिंतन चलता रहता।
ऐसे ही दौर में वह अहिंसा और आजादी के व्यापक अर्थो पर भी विचार करते थे। उन
दिनों मोतीलाल नेहरू को एक पालतू तोते से बड़ा लगाव था। वह उसकी सुख-सुविधाओं का इतना
ख्याल रखा करते थे कि उसके लिए एक नौकर तक रख छोड़ा था, जो उस तोते की ही देखभाल करता।
आम बालकों की तरह जवाहरलाल को भी वह तोता बड़ा प्रिय था। एक दिन, अचानक उन्होंने पिंजरे
का दरवाजा खोल दिया और तोते को उड़ जाने दिया। तोते की देखभाल करने वाला नौकर बड़ा
घबराया।
भागा-भागा पहुंचा मोतीलाल नेहरू के पास और उन्हें डरते-डरते यह खबर दी। सारी
बात जानकर मोतीलाल नेहरू को बड़ा गुस्सा आया, पर उन्हें हैरानी भी हुई कि
जवाहरलाल को अचानक यह क्या सूझी! जब उन्होंने बेटे को बुलाया, तो उसके चेहरे पर डांट
का जरा भी डर नहीं था। पिता के पूछने पर जवाहरलाल ने कहा, ‘पिताजी, जब हमें अपनी आजादी प्यारी है,
तो अपने मनोरंजन
के लिए दूसरे प्राणियों को गुलाम बनाकर रखना कैसे उचित हो सकता है?’ बेटे की बात सुनकर पिता
को अपनी भूल का अहसास हुआ।
डर जब विवेक हर लेता है तो लोग उपकार को भूल जाते हैं
एक बार मुल्ला नसरुद्दीन रात में जंगल से होकर गुजर रहे थे। अचानक जमीन के
नीचे से गहरी-गहरी सांसों की आवाज सुनाई पड़ी तो वह भय से कांपने लगे। उन्हें लगा
कि जरूर कोई भूत है। उन्होंने नीचे देखा तो एक खोह दिखाई दी, जिसमें बैठा एक आदमी
गहरी सांसें ले रहा था।
मुल्ला ने हिम्मत जुटाकर पूछा, ‘कौन हो भाई?’ उस आदमी ने कहा, ‘मैं एक दरवेश हूं। जंगल
के एकांत में साधना कर रहा हूं।’ मुल्ला बोले, ‘भाई! मैं यहां बहुत भयभीत हूं। कृपया मुझे रात अपने
पास गुजार लेने दो।’ दरवेश ने कहा, ‘ठीक है। किंतु मेरी साधना में विघ्न मत पहुंचाना।’ मुल्ला ने खोह में उतरते ही पानी
मांगा। दरवेश ने एक बर्तन देकर सामने नदी से पानी पीने को कहा तो मुल्ला ने वहां
तक जाने में भी डर बताया। दरवेश झुंझलाकर स्वयं पानी लेने जाने लगा तो मुल्ला बोले,
‘मुझे आपके जाने
के बाद डर लगेगा।’
दरवेश ने चिढ़कर उन्हें एक कटार आत्मरक्षार्थ दे दी। जब वह पानी लेकर लौटा तो
मुल्ला चिल्लाया, ‘आगे बढ़े, तो मार डालूंगा।’ दरवेश ने अपना परिचय दिया तो मुल्ला ने कहा, ‘मैं कैसे मानूं कि दरवेश का वेश
बनाए तुम कोई भूत-प्रेत या जिन्न नहीं हो?’ हैरान दरवेश ने कहा, ‘मैंने तुम्हें शरण दी और
अब तुम मेरे ही घर में मुझे नहीं आने दे रहे हो। यह कैसा डर है?’ मुल्ला ने दरवेश की एक न
सुनी और रातभर वह खोह के अंदर और दरवेश बाहर रहा। सुबह यह कहते हुए मुल्ला चले गए,
‘भाई! माफ करना,
डर के कई चेहरे
होते हैं। तुमने आज एक देखा।’ भय कई बार व्यक्ति का विवेक हर लेता है और वह अपने ही
मददगारों को कष्ट पहुंचाता है। इसलिए मदद करें, मगर सोच-समझकर।
राजा की चतुराई से ब्राह्मण को सम्मान सहित मिले अपने पैसे
एक ब्राह्मण ने किसी सेठ के पास अपने एक हजार रुपए जमा कराए। इस बात को कई वर्ष
गुजर गए। जब एक बार ब्राह्मण को धन की जरूरत पड़ी, तो वह अपने रुपए लेने के लिए सेठ
के पास पहुंचा। तब तक सेठ की नीयत बदल चुकी थी।
सेठ ने ब्राह्मण के रुपए देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उसके पास रुपए
जमा करने का कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण परेशान होकर राजा के पास गया, किंतु प्रमाण के अभाव
में राजा भी कुछ करने में असमर्थ था। इसलिए उसने एक उपाय सोचा जिससे सेठ बिना कुछ
कहे ही ब्राह्मण के रुपए वापस कर दे।
अगले दिन राजा ने नगर में अपनी शोभायात्रा निकालने की घोषणा करवाई। जब
शोभायात्रा सेठ की हवेली के सामने से निकली तो राजा ने ब्राह्मण को गुरुदेव कहते
हुए अपने पास बैठाया। सेठ ने यह सब देखकर सोचा कि यह ब्राह्मण तो राजा का गुरु है।
यदि इसने राजा को कुछ कह दिया तो मुझे दंड मिल सकता है। इससे बचने के लिए यही ठीक
होगा कि मैं ब्राह्मण के रुपए वापस कर दूं। शोभायात्रा के तत्काल बाद सेठ रुपए
लेकर ब्राह्मण के पास गया और उसे ससम्मान देकर आया। ब्राह्मण बड़ा प्रसन्न था
क्योंकि राजा की चतुराई ने न केवल उसे अपना धन दिलाया बल्कि उसके सम्मान में भी
वृद्धि हुई। जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आपके पास अपनी सचाई का सबूत नहीं
होता। ऐसी परिस्थितियों में काम निकालने के लिए सीधेपन की राह छोड़ चतुराई का
मार्ग अपनाना जरूरी होता है।
संत रज्जब ने जुबेर की मदद कर बदला उसका जीवन
संत रज्जब सदैव सर्वोच्च शक्ति के स्मरण में लगे रहते थे। न कभी बुरा कहते,
न सोचते और न
करते। अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सदाचरण की शिक्षा देते और सदा
प्रेम की मीठी वाणी बोलते थे। रज्जब अपने गांव के लोगों की श्रद्धा का केंद्र थे।
सभी ग्रामवासी उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते और अपने व्यवहार में उनका अनुसरण
भी करते। एक बार किसी और स्थान से एक युवक जुबेर उस गांव में काम की तलाश में आया।
उसे काम तो मिल गया, किंतु पैसा आते ही वह शराब और जुए का आदी बन गया। शराब पीकर
वह लोगों को अपशब्द कहता और पूरे गांव में हंगामा मचाता। सभी लोग बहुत परेशान हो
गए। एक दिन अधिक शराब पी लेने के कारण जुबेर नाली में गिर पड़ा। कई लोग वहां
एकत्रित हो गए, किंतु जुबेर की मदद किसी ने नहीं की। तभी उधर से रज्जब निकले। उन्होंने उसे
उठाया और उसका मुंह धोया। रज्जब, जुबेर से बोले- ‘नौजवान! जिस मुंह से ऊपरवाले का पवित्र नाम लेना
चाहिए, उससे
शराब पीकर अपशब्द कहना गुनाह है।’
किंतु जुबेर ने यह सब नहीं सुना, क्योंकि वह होश में नहीं था। जब उसे होश आया तो
लोगों ने उसे रज्जब की सहायता और सलाह के विषय में बताया। जुबेर के हृदय पर इन
बातों का गहरा असर हुआ और उसने संकल्प लिया- ‘मेरे जिस मुंह को संत ने अपने
हाथों से धोया है, उससे अब कभी बुरे वचन नहीं निकलेंगे।’ इसके बाद उसने सात्विक जीवन की राह पकड़ ली। संतों
का मार्गदर्शन सदा सुलभ होता है, किंतु उसका पालन व्यक्ति की इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है।
ख्याली पुलाव पकाते-पकाते चावल धूल में मिल गए
एक अत्यंत निर्धन व्यक्ति था। अशिक्षित होने के कारण उसे कोई ढंग का काम भी
नहीं मिलता था, सो वह भिक्षा मांगकर पेट भरता। एक दिन भिक्षा में उसे कुछ चावल मिले। चावल उसे
काफी दिनों बाद मिले थे, इसलिए वह बड़ा प्रसन्न हुआ। फिर अगले घर से उसे रोटी-सब्जी
मिली।
घर आकर उसने रोटी-सब्जी से भूख मिटाई और चावल एक मटके में डालकर उसे दीवार पर
खूंटी से लटका दिया। फिर वह नीचे लगी चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गया। मटके को
देखकर वह सोचने लगा कि उसमें कुछ चावल हैं। यदि कल भी चावल मिलेंगे तो मटका आधा भर
जाएगा। फिर सौभाग्य से यदि परसों भी चावल मिल जाएं तो मटका पूरा भर जाएगा। अब उसकी
सोच उड़ान भरने लगी कि इस प्रकार एक माह में चार-पांच मटके भर जाएंगे। दो-तीन माह
के बाद एक बोरी चावल जमा हो जाएगा।
इसी तरह बोरियां भरती रहेंगी तो मैं उन्हें बेचूंगा। पैसे आएंगे तो और चावल
खरीदकर बेचूंगा। जब मैं धनवान हो जाऊंगा तो मेरा विवाह होगा, फिर मेरे बच्चे होंगे जो
बड़े सुंदर व शरारती होंगे। मैं उन्हें अच्छी बातें सिखाऊंगा। यदि उन्होंने उनका
पालन नहीं किया तो उन्हें लात मारूंगा। यह सोचते हुए उसने सचमुच हवा में लात मार
दी जो मटके को लगी। मटका टूट गया और सब चावल नीचे बिखरकर धूल में मिल गए, साथ ही उसके सपने भी
ध्वस्त हो गए। अपनी करनी और दृष्टि अर्थात आचरण और विचार में साम्य न होने पर सदैव
हानि ही होती है। अत: जो विचार में हो, वही करनी में होना चाहिए।
आम के पेड़ से मोहन ने सीखा कुविचारों का त्याग करना
दो दोस्त थे। मोहन और राम। बचपन की मित्रता युवावस्था तक आते-आते और गहरी हो
गई। एक दिन भी ऐसा नहीं जाता था जब दोनों मिलते न हों। कोई निर्णय ऐसा न रहा,
जो दोनों में से
किसी एक ने अकेले लिया हो। एक दिन मोहन शहर में नहीं था और राम ने उससे बिना पूछे
अपने साझे व्यापार के सिलसिले में कोई बड़ा सौदा कर लिया। मोहन जब वापस आया,
तो लोगों के
भड़काने पर उसे शंका हो गई कि राम ने अधिक लाभ पाने के लालच से ही उससे बिना पूछे
सौदा किया है।
राम उसे समझाने में असफल रहा और अंतत: मित्रता, शत्रुता में बदल गई। दोनों के
परिजन यह देखकर बड़े दुखी हुए। उन्होंने आपस में मिलकर दोनों के मध्य सुलह कराना
तय किया। फिर एक दिन मोहन की मां ने उसे बुलाकर पूछा-‘आजकल तुम दुखी क्यों दिखाई देते
हो?’ मोहन
ने मित्र के छल और मित्रता टूटने को अपने दुख का कारण बताया तो मां बोली- ‘यह जो सामने आम का पेड़
है, इसके
पीले व सूखे पत्ते कहां गए?’
मोहन ने कहा- ‘गिर गए होंगे।’ तब मां बोली- ‘नहीं गिरते तो अच्छा होता न?’ मोहन ने अचरज से कहा- ‘यदि नहीं गिरते, तो पेड़ कितना खराब लगता?’
तब मां ने समझाया-
‘इसी
प्रकार तुम भी अपने मन से राम के प्रति कुविचार नहीं हटाओगे, तो इस गंदगी के बोझ से
मन कभी प्रसन्न नहीं रह सकेगा।’ मोहन ने तत्क्षण अपनी भूल सुधारकर राम की ओर मित्रता का हाथ
बढ़ा दिया। मन को यथासंभव कटु बातों व अनुभवों से मुक्त करते चलना चाहिए, ताकि उसमें सुख व शांति
का वास रहे।
अभिमान रहित स्वामी को भक्तों में हुए भगवान के दर्शन
स्वामी अखिलानंद हरिद्वार में गंगा तट पर आश्रम में प्रतिदिन रामकथा करते थे।
एक दिन वह शिष्यों के साथ गंगा किनारे टहल रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि आश्रम के
पास पेड़ों के झुरमुट में दो व्यक्ति बैठे हुए हैं। शिष्यों से पूछने पर उन्होंने
बताया कि ये दोनों ग्रामीण भक्त हैं और कथा सुनने रोज आते हैं।
उनके फटे वस्त्र देख स्वामीजी सोचने लगे कि ये गंवार रामकथा का मर्म क्या
समझेंगे? शायद
प्रसाद के लोभ में आते होंगे। उन्होंने उनको बुलवाकर रामभक्ति का महत्व पूछा,
तो दोनों कुछ बता
नहीं पाए। स्वामीजी ने डांटते हुए कहा- ‘यहां व्यर्थ की भीड़ मत लगाओ। कल सुबह जब मेरा
प्रवचन हो, तब आना। प्रसाद भी तभी मिलेगा।’ दोनों मान-अपमान की चिंता किए बिना सहज भाव से चले
गए। स्वामीजी ने ठहाका लगाते हुए शिष्यों को जताया कि रामकथा का रस लेना इतना आसान
नहीं है। इसके लिए उनके जैसा गहन अध्ययन और विषद चिंतन जरूरी है।
आगे चलते हुए स्वामीजी को एक बालक मिला, जो रेत का एक छोटा कुंड बनाकर
उसे अंजुरी में पानी ला-लाकर भर रहा था। यह देख उन्हें भान हुआ कि जैसे नदी का
सारा पानी रेत के छोटे कुंड में नहीं भर सकते, वैसे ही ज्ञान की समग्रता भी एक
छोटे से दिमाग में नहीं भरी जा सकती। इस बात का पूर्ण अहसास स्वामीजी को अगले दिन
हुआ, जब
भारी बारिश के चलते रामकथा सुनने कोई नहीं आया, किंतु वे दोनों ग्रामीण नदी पार
कर आ पहुंचे। स्वामीजी ने ज्ञान के अभिमान से रहित होकर उन दोनों भक्तों में भगवान
के दर्शन किए।
अभिमान रहित स्वामी को भक्तों में हुए भगवान के दर्शन
स्वामी अखिलानंद हरिद्वार में गंगा तट पर आश्रम में प्रतिदिन रामकथा करते थे।
एक दिन वह शिष्यों के साथ गंगा किनारे टहल रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि आश्रम के
पास पेड़ों के झुरमुट में दो व्यक्ति बैठे हुए हैं। शिष्यों से पूछने पर उन्होंने
बताया कि ये दोनों ग्रामीण भक्त हैं और कथा सुनने रोज आते हैं।
उनके फटे वस्त्र देख स्वामीजी सोचने लगे कि ये गंवार रामकथा का मर्म क्या
समझेंगे? शायद
प्रसाद के लोभ में आते होंगे। उन्होंने उनको बुलवाकर रामभक्ति का महत्व पूछा,
तो दोनों कुछ बता
नहीं पाए। स्वामीजी ने डांटते हुए कहा- ‘यहां व्यर्थ की भीड़ मत लगाओ। कल सुबह जब मेरा
प्रवचन हो, तब आना। प्रसाद भी तभी मिलेगा।’ दोनों मान-अपमान की चिंता किए बिना सहज भाव से चले
गए। स्वामीजी ने ठहाका लगाते हुए शिष्यों को जताया कि रामकथा का रस लेना इतना आसान
नहीं है। इसके लिए उनके जैसा गहन अध्ययन और विषद चिंतन जरूरी है।
आगे चलते हुए स्वामीजी को एक बालक मिला, जो रेत का एक छोटा कुंड बनाकर
उसे अंजुरी में पानी ला-लाकर भर रहा था। यह देख उन्हें भान हुआ कि जैसे नदी का
सारा पानी रेत के छोटे कुंड में नहीं भर सकते, वैसे ही ज्ञान की समग्रता भी एक
छोटे से दिमाग में नहीं भरी जा सकती। इस बात का पूर्ण अहसास स्वामीजी को अगले दिन
हुआ, जब
भारी बारिश के चलते रामकथा सुनने कोई नहीं आया, किंतु वे दोनों ग्रामीण नदी पार
कर आ पहुंचे। स्वामीजी ने ज्ञान के अभिमान से रहित होकर उन दोनों भक्तों में भगवान
के दर्शन किए।
लोमड़ी की अक्लमंदी से बच पाई किसान की जान
जंगल में एक हिरण का एक छौना घास चर रहा था। अचानक वहां एक तेंदुआ आ धमका।
छौना जान बचाने के लिए बरगद की जड़ के नीचे खाली जगह में घुस गया। उसे पकड़ने के
लिए तेंदुआ भी जड़ के नीचे घुसने लगा। छौना तो वहां से भाग गया, किंतु तेंदुआ जड़ों के
बीच उलझ गया।
उसी समय एक किसान वहां से गुजरा। तेंदुए ने उससे जड़ से निकालने की प्रार्थना
की, किंतु
किसान बोला- ‘तुम छूटने के बाद मुझे मार डालोगे।’ तेंदुए ने उसे ऐसा न करने का आश्वासन दिया। तेंदुए
पर विश्वास करते हुए किसान ने बरगद की जड़ें काटकर उसे मुक्त कर दिया। तब तेंदुआ
बोला- ‘मुझे
बहुत भूख लगी है। इसलिए मैं तुम्हें खाऊंगा।’ किसान ने कहा- ‘क्या यही मेरी नेकी का
बदला है?’ तेंदुए ने भूख का हवाला दिया।
इसी बीच उधर से एक लोमड़ी गुजरी। दोनों की बातें सुनने के बाद वह किसान से
बोली- ‘अरे
मूर्ख! यह हमारे जंगल के राजा हैं। एक बरगद की जड़ में राजा फंस ही नहीं सकते। तुम
झूठ बोल रहे हो कि तुमने इन्हें बचाया है।’ किसान के बहुत समझाने पर वह
बोली- ‘यदि
तुम सही हो, तो एक बार फिर देखते हैं कि राजा साहब कैसे फंसे थे?’ तेंदुआ भी घमंड में आकर मान गया।
वह झुरमुट के बीच चला गया। लोमड़ी ने जब उसे बाहर आने को कहा, तो वह नहीं निकल पाया।
तब लोमड़ी ने किसान से कहा, अब सिर पर पैर रखकर भागो। जो सदा से विश्वासघाती रहे हों,
उन पर विश्वास
करना ज्यादातर मौकों पर ठीक नहीं होता। विश्वास उन्हीं पर करना चाहिए, जो भरोसेमंद हों।
मरने के बाद भी मोह से मुक्त नहीं हो पाया किसान
किसी गांव में एक संत आए। उनकी ख्याति सुनकर गांव का एक किसान उनसे मिलने
पहुंचा। उसने अपने कुछ कष्ट उन्हें बताए और मुक्ति की राह पूछी। संत बोले- ‘मैं तुम्हें वैकुंठधाम
लिए चलता हूं। ऐसा करने से तुम कष्टों से पूर्णत: मुक्त हो जाओगे।’ यह सुनकर किसान बोला- ‘महाराज! अभी तो मेरे
बच्चे बहुत छोटे हैं। जब दस साल बाद वे बड़े हो जाएंगे और काम-धंधे में लग जाएंगे,
तब मैं आपके साथ
चलूंगा।’
दस साल के बाद संत फिर गांव में आए और किसान से वैकुंठधाम चलने को कहा। किसान
बोला- ‘स्वामीजी!
एक महीने पहले ही मेरे लड़के का विवाह हुआ है। आपके आशीर्वाद से जरा पोते का मुंह
देख लूं। फिर अवश्य आपके साथ चलूंगा।’ दस साल और बीत गए। संत फिर गांव पहुंचे, तो किसान के घर के बाहर
एक कुत्ता बैठा दिखाई दिया। संत ने योगबल से जान लिया कि यह कुत्ता ही पूर्वजन्म
में किसान था। फिर उन्होंने अपने योगबल से उस कुत्ते को अपने पूर्वजन्म में किए
वायदे की याद दिलाई, तो वह बोला- ‘स्वामीजी! मेरे पोते अभी नादान हैं। आजकल जमाना बहुत खराब है। मुझे अपने घर की
रखवाली करनी है।
हां, दस
साल बाद निश्चित रूप से आपके साथ चलूंगा।’ संत ने हंसकर कहा - ‘अब नहीं आऊंगा, क्योंकि तुम फिर कोई
बहाना खोज लोगे।’ सार यह है कि संसारी जीव मोह से कभी मुक्त नहीं हो पाता। मोहासक्त व्यक्ति की
संतुष्टि का कोई अंतिम बिंदु नहीं होता। संतोष रूपी अमूल्य धन की प्राप्ति सभी
प्रकार के मोह से विरक्त होने पर ही होती है।
जब क्रांतिकारी के लिए श्रद्धा से भर उठी अंग्रेज युवती
बैसाखी के दिन वर्ष 1969 में जलियावाला बाग में एक आमसभा हो रही थी। अंग्रेज सरकार
के नुमाइंदे जनरल डायर ने निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवा दीं। सैकड़ों लोग मारे गए
और हजारों घायल हुए। संपूर्ण भारत में रोष की लहर फैल गई। क्रांतिकारियों के मध्य
भी इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई।
ऊधमसिंह नामक क्रांतिकारी ने डायर से बदला लेने का बीड़ा उठाया। उन्होंने दिन
व समय तय करके जनरल डायर को गोली मार दी, किंतु वह पकड़े गए। जब उन्हें न्यायालय में
न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तो वह निर्विकार भाव से सगर्व खड़े रहे। न्यायाधीश
ने उनसे प्रश्न पूछना शुरू किया, तभी एक अंग्रेज युवती भीड़ को चीरते हुए वहां आई।
उसने न्यायाधीश से ऊधमसिंह से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने
पर उसने ऊधमसिंह से पूछा- ‘तुम्हारी रिवॉल्वर में तीन गोलियां शेष थीं। फिर तुमने मुझ
पर गोली क्यों नहीं चलाई? ऐसा करके तुम आसानी से भाग सकते थे।’ उधमसिंह इस युवती को पहचान गए।
उसी के कारण वह गिरफ्तार हुए थे। उन्होंने विनम्रता से कहा- ‘बहन! हम भारतीय हैं।
नारी पर हाथ उठाना हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। इस कारण मैंने आप पर गोली नहीं
चलाई।’
अंग्रेज युवती ऊधमसिंह का उच्च भाव देखकर श्रद्धा से अभिभूत हो गई। प्रतिकूल
दशाओं में भी अपनी संस्कृति के अनुरूप आचरण करने वाला सच्च नीतिवान होता है।
नैतिकता के प्रतिमान ऐसे ही कायम होते हैं, जो समाज के लिए प्रकाश स्तंभ का
कार्य करते हैं।.
स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा बनी एक पंडित की सलाह
बात उन दिनों की है, जब स्वामी विवेकानंद अल्पज्ञात थे। उनका गहन ज्ञान और
पांडित्य देखकर पोरबंदर के एक पंडित ने उनसे कहा- ‘स्वामीजी! यहां भारत में धर्म के
बहुत पंडित हैं। सभी को अपने ज्ञान पर गर्व है और कोई किसी की सुनना नहीं चाहता।
सभी आपका उपहास करेंगे और आपकी विद्वता का समाज के हित में कोई उपयोग नहीं होगा।
मेरी मानिए, पहले आप विदेश जाइए।’
स्वामीजी को यह विचार पसंद आया। वह अमेरिका चले गए। थोड़े दिन अमेरिका भ्रमण
के बाद उनकी जमा पूंजी चुक गई। तब उनके किसी स्नेही ने उन्हें बोस्टन जाने का
किराया दिया और विश्व धर्म सम्मेलन के एक सदस्य के नाम पत्र भी दिया। दुर्भाग्यवश
वह पत्र रास्ते में कहीं खो गया। ठंड में ठिठुरते स्वामीजी ने किसी तरह रात बिताई।
फिर सुबह होने पर पैदल चलते हुए सोचने लगे कि अब विश्व धर्म सम्मेलन में प्रवेश
कैसे मिले? चलते-चलते थक गए, तो एक आलीशान भवन के नीचे बैठ गए। उस भवन से एक संभ्रांत महिला बहुत देर तक
स्वामीजी को देखती रही।
वास्तव में वह उनके तेजोमय व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई। यह महिला श्रीमती
एचडब्ल्यू हैल थीं, जिनकी पहुंच विश्व धर्म सम्मेलन के सदस्यों तक थी। उन्होंने स्वामीजी को
बुलाकर उनसे बात की और इस तरह स्वामीजी की सम्मेलन में पहुंचने की राह आसान हो गई।
इस सम्मेलन में दिए गए प्रभावशाली भाषण ने देश-विदेश में स्वामीजी को लोकप्रिय कर
दिया। प्रेरणा कहीं से भी मिल सकती है, बशर्ते संकल्प शक्ति दृढ़ हो और प्रयास उचित दिशा
में हों।
तिलक ने कहा उपलब्धि नहीं स्वराज्य के लिए है मेरी शक्ति
देश के स्वतंत्रता संग्राम में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का अप्रतिम योगदान
है। ‘स्वराज्य
मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का उद्घोष करने वाले तिलक जब भाषण देते थे, तो भारतीय जनता की रग-रग
जोश से भर उठती थी। तिलक के शब्दों में ओज भरा होता था और उनके दिल में मौजूद
देशभक्ति का जज्बा वाणी से ज्वाला बनकर निकलता था। श्रोता आंदोलित हो जाते और तिलक
का अनुसरण करने के लिए व्यग्र हो उठते थे।
एक बार तिलक किसी काम से बंबई गए। वहां उन्होंने पहले अपना कार्य निपटाया,
फिर स्वातं˜य आंदोलन से संबंधित एक
सभा में सम्मिलित होने गए। जब तिलक ओजस्वी भाषण दे रहे थे, तो अन्य लोगों के साथ ही सभापति
भी उनसे बहुत प्रभावित हुए। सभा समाप्ति के उपरांत वह तिलक के पास आकर बोले- ‘तिलकजी! आप अपनी योग्यता
का समुचित इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
आप इतना अच्छा बोलते हैं, इतने ज्ञानवान हैं। यदि आप अपनी विद्वत्ता का उपयोग
ऐतिहासिक खोज में करें, तो संसारभर में आपकी ख्याति होगी। आप इस राजनीति के दलदल
में क्यों फंसे हुए हैं?’ यह सुनते ही तिलकजी ने सगर्व कहा- ‘भारत-भूमि बांझ नहीं है।
स्वराज्य प्राप्त हो जाने पर मुझ जैसे हजारों विद्वान पैदा हो जाएंगे। इस समय यह
सबसे आवश्यक काम है कि हम सब समस्त योग्यता, शक्ति सहित अपना सर्वस्व
स्वराज्य प्राप्ति में लगा दें।’ समय व परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्तव्यों को निश्चित
करने पर ही क्षमताओं का सही व विविधमुखी उपयोग होता है।
खुद पर व्यंग्य करने वाले मित्र को लिंकन ने बनाया सचिव
अमेरिका के एक जंगल में एक युवक दिन में लकड़ियां काटता और शाम तक उन्हें
बेचकर जो पैसे मिलते, उसमें अपना गुजारा चलाता। उसकी खूब पढ़ने-लिखने की इच्छा थी, किंतु वह बेहद गरीब था।
फीस और किताबों का प्रबंध करने की आर्थिक क्षमता वह नहीं रखता था।
अंतत: उसने स्वप्रयासों से पढ़ना तय किया। उसके घर से पुस्तकालय दस मील दूर
था। प्रतिदिन काम से निवृत्त होकर वह पुस्तकालय जाकर किताबें लाता, लकड़ी से आग जलाकर उसकी
रोशनी में पढ़ता और समय से पूर्व किताबें लौटा देता। पढ़-लिखकर अंतत: वह वकील बना।
उसका सादा रहन-सहन देखकर कई लोग उसका उपहास करते, किंतु वह परवाह नहीं करता। एक
दिन उसके एक मित्र स्टैंटन ने व्यंग्य किया- ‘तू वकील तो लगता ही नहीं।
वकालत कैसी चलेगी?’ युवक ने जवाब दिया- ‘चले या न चले, मैं पोशाक में विश्वास
नहीं करता। विश्वास मात्र इस बात में है कि मैं झूठा मुकदमा नहीं लूंगा।’ जब मुवक्किल कहता- मुझे
फंसाया गया है, तभी वह मुकदमा लड़ता।
अपनी सत्यवादिता के बल पर वह धीरे-धीरे न्यायाधीशों के मध्य भी प्रतिष्ठा पाने
लगा और उसकी वकालत चलने लगी। आगे चलकर वह अमेरिका का राष्ट्रपति बना। उसका नाम था-
अब्राहम लिंकन। स्वयं पर व्यंग्य करने वाले स्टैंटन को उसने अपना निजी सचिव बनाया।
पुरुषार्थ, सफलता की अनिवार्य शर्त है। पुरुषार्थ से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
प्रलोभन को ठुकरा गांधीजी ने वरीयता दी संस्कार को
उन दिनों गांधीजी राजकोट के हाईस्कूल में पढ़ते थे। वह अपने कुछ मित्रों की
बातों पर इतना विश्वास करने लगे थे कि उनके सामने घरवालों का असर भी कम होता था।
इन्हीं मित्रों ने गांधीजी को एक दिन मांसाहार का न्यौता दिया, जिसे उन्होंने अस्वीकार
कर दिया, क्योंकि
उनका परिवार शाकाहारी था। लेकिन ये लड़के गांधीजी के पीछे पड़ गए। वे उन्हें
समझाते कि मांसाहार नहीं करने से मनुष्य कमजोर हो जाता है। अंग्रेज मांसाहारी हैं,
इसलिए भारत पर
शासन कर रहे हैं आदि।
धीरे-धीरे गांधीजी पर इन बातों का असर होने लगा और अंतत: एक दिन इन मित्रों ने
उनको यह आहार लेने पर विवश कर दिया। मित्रों के दबाव में गांधीजी ने ऐसा कर तो
लिया, किंतु
उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ। वह यह सोचकर ग्लानि से भर गए कि सात्विक प्रकृति के
माता-पिता को इस बात का पता चला, तो जीवित रहते हुए उनकी दशा मृतक के समान हो जाएगी। एक ओर
मित्रों की दलीलें थीं कि मांसाहार जरूरी है और दूसरी ओर माता-पिता के संस्कार।
गंभीर मंथन के बाद गांधीजी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि माता-पिता को धोखा देना
बहुत बुरा है, क्योंकि वे जीवनदाता हैं। इसलिए आज के बाद से वह माता-पिता के कहे अनुसार ही
चलेंगे और उनके दिए संस्कारों के विरुद्ध कोई आचरण नहीं करेंगे। यह तय करते ही
गांधीजी के मन से मांसाहार का विचार सदा के लिए छूट गया। सत्य और ईमानदारी की राह
बहुत कठिन होती है, किंतु उस पर चलने वाला आत्मिक रूप से सदैव सुखी रहता है।
क्रांतिकारियों के मन में था राष्ट्र के प्रति बलिदान का उल्लास
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सरदार भगत सिंह व उनके साथियों के योगदान से
सभी लोग वाकिफ हैं। लेकिन यह शायद ज्यादातर लोग नहीं जानते होंगे कि देश के लिए
बलिदान देने का उनके मन में किस कदर उल्लास था।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव व राजगुरु को फांसी दी गई थी। अदालती फैसले
में फांसी का दिन २४ मार्च तय किया गया था। फांसी का राष्ट्रव्यापी विरोध हुआ और
लोग सड़कों पर निकल आए। भयभीत ब्रिटिश सरकार ने तय किया कि एक दिन पहले ही तीनों
को फांसी पर चढ़ा दिया जाए।
लिहाजा 23 मार्च को शाम के वक्त ही इन तीनों को फांसी पर चढ़ाने का फैसला आनन-फानन में
किया गया। संतरी को भेजकर तीनों को कालकोठरी से बाहर लाया गया और फांसी के तख्ते
तक ले जाने से पहले नियमानुसार उनका मेडिकल परीक्षण किया गया।
बताया जाता है कि परीक्षण के समय उनका रक्तचाप सामान्य था, उनके चेहरों पर रौनक थी,
होठों पर मुस्कान
सजी हुई थी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शरीर का वजन किए जाने पर उन तीनों का वजन बढ़ा
हुआ था।
सामान्यत: फांसी की सजा पाने वाले लोग तनाव में दुर्बल हो जाते हैं और उनका
वजन घट जाता है, लेकिन यहां राष्ट्र के लिए प्राण उत्सर्ग करने का भाव था, इसलिए वजन उत्साह में
बढ़ चुका था। भगत सिंह व उनके साथियों ने अपने बलिदान के जरिए लोगों को यह संदेश
दिया कि जब देश के लिए मरने का क्षण हो, हमारे मन में उल्लास होना चाहिए, न कि तनाव।
दृष्टि विशाल रखें और सोचें कि रिश्तों में प्रेम, दायित्व-बोध हो, लेकिन अनुराग न हो,
क्योंकि संसार में
ऐसे अनेक रिश्ते हैं। जगत है बड़ा, लेकिन उसकी कई व्यवस्थाएं सूक्ष्म होती हैं। रिश्ते केवल
मांस-मज्जा और वस्तुओं के ही नहीं होते, इनसे हटकर भी संसार में कुछ चैतन्य है और उसका नाम
ईश्वर है। किसी गुरु की आंख में से झांककर उस ईश्वर को देखा व उससे जुड़ा जा सकता
है और यहीं से दुख-शोक से मुक्ति की राह निकलती है।
गांधीजी को उपवास के जरिए मिला एक नया खजाना
वर्ष 1932 की घटना है। अंग्रेजों की सांप्रदायिक नीतियों के विरोधस्वरूप गांधीजी ने
अनशन की घोषणा की। चूंकि गांधीजी अहिंसा मार्ग के अनुयायी थे, लिहाजा उनके लिए उपवास
किसी भी जटिल समस्या के समाधान का श्रेष्ठ मार्ग था। इसके जरिए वह आत्मशुद्धि करते
हुए अंग्रेजों पर नैतिक दबाव निर्मित करते।
जब रबींद्रनाथ टैगोर ने गांधीजी के अनशन के विषय में सुना, तो वह काफी प्रभावित
हुए। उन्होंने गांव-गांव जाकर गांधीजी के पक्ष में बोलते हुए कहा- ‘मैं महात्मा गांधी का इस
जीवन में ही नहीं, बल्कि अगले जन्म में भी अनुसरण करूंगा।’ जब गांधीजी को टैगोर के इन
कार्यो व विचारों की सूचना प्राप्त हुई, तो भाव-विह्वल हो उन्होंने कहा- ‘इस छोटे-से उपवास में
उन्हें जो खजाना मिला, उसे उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।
वे और कोई नहीं, गुरुदेव ही हैं। यदि किसी ने कहा होता कि अन्य किसी काम के लिए नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति की
खोज के लिए उपवास करो, तो मैं उनके जैसी हस्ती को खोजने हेतु उपवास करता।’ जिस समय गांधीजी ने
उपवास तोड़ा, टैगोर वहां पहुंचे। तब गांधीजी ने उनके चरण छूकर उपवास तोड़ा।
गुरुदेव ने अभिभूत होकर ये काव्य पंक्तियां कहीं - ‘जब जीवन का सरोवर सूख जाए,
तब तुम करुणा के
बादलों के साथ उमड़-घुमड़कर आना।’ तबसे गांधीजी ने प्रत्येक जटिल समस्या के समाधान में
गुरुदेव से हमेशा सलाह ली। सार यह है कि सफलता के अर्श पर खड़े व्यक्ति का विनम्र
व्यवहार उसके व्यक्तित्व में चार चांद लगाते हुए उसके यश को द्विगुणित कर देता है।
अपनी हाजिरजवाबी से जर्मनी में प्रशंसा पाई जाकिर हुसैन ने
घटना उन दिनों की है, जब जाकिर हुसैन किसी विशेष अध्ययन के लिए जर्मनी पहुंचे थे।
जर्मनी में ऐसा रिवाज है कि जब किसी अजनबी व्यक्ति से मित्रता करनी होती है,
तो अपना नाम बताकर
उससे हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया जाता है। हुसैन साहब मिलनसार
स्वभाव के व्यक्ति थे, अत: उन्हें इस रिवाज का पालन करने में कोई दिक्कत नहीं होती
थी। जिस महाविद्यालय में वे अध्ययनरत थे, उसका वार्षिकोत्सव मनाया जाना था। हुसैन साहब काफी
उत्साहित थे। प्रात:काल उन्होंने जल्दी उठकर अपने सभी कार्य निपटाए। फिर तैयार
होकर महाविद्यालय के लिए निकले।
रास्ते में किसी काम से रुके, तो कुछ विलंब हो गया। इसलिए उन्होंने जल्दी-जल्दी चलना शुरू
किया। जैसे ही उन्होंने महाविद्यालय में प्रवेश किया, तभी वहां के एक प्राध्यापक ने भी
प्रवेश किया। जल्दबाजी और अनजाने में दोनों परस्पर टकरा गए। प्राध्यापक महोदय ने
गुस्से में कहा - ‘गधा!’ जाकिर साहब झट से बोले -‘जाकिर हुसैन!’ यह कहते हुए उन्होंने अपना हाथ प्राध्यापक महोदय की
ओर बढ़ा दिया।
हुसैन साहब की हाजिरजवाबी ने प्राध्यापक महोदय का गुस्सा ठंडा कर दिया और
उन्होंने प्रभावित होकर उनसे हाथ मिलाया। बाद में सभी के सामने उन्होंने हुसैन
साहब की हाजिरजवाबी और सहजता की बहुत प्रशंसा की। सार यह है कि किसी अनचाही
परिस्थिति के अचानक बन जाने पर धर्य और बुद्धिमानी से उसका सामना करना चाहिए। ऐसा
करने से उस परिस्थिति से निकलना बेहद आसान हो जाता है।
गुरु द्रोण ने दुनिया को दिया शिक्षक धर्म का संदेश
गुरु द्रोणाचार्य से जुड़ी एकलव्य की कथा सभी जानते हैं। माना जाता है कि अपने
प्रिय शिष्य अजरुन के मुकाबले एकलव्य को धनुर्विद्या में अधिक श्रेष्ठ अनुभव कर
द्रोण ने गुरुदक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया था। लेकिन
गुरु द्रोण के इस एक पहलू से परे उनके जीवन का एक ऐसा पहलू भी है, जो कम लोग जानते हैं। यह
द्रोण के उस उदात्त स्वरूप को व्यक्त करता है, जो शिक्षकों की उच्चतम गरिमा का
श्रेष्ठतम उदाहरण है।
महाभारत में कथा है कि द्रोण के मित्र पांचाल नरेश द्रुपद थे। आवश्यकता पड़ने
पर जब द्रोण आर्थिक सहायता के लिए द्रुपद के पास पहुंचे तो उन्हें द्रुपद की ओर से
तिरस्कार मिला। इससे नाराज द्रोण ने कौरव-पांडवों को शिक्षित करने के बाद
गुरुदक्षिणा में मांगा कि सभी शिष्य कौरव-पांडव द्रुपद को बंदी बनाकर लाएं और ऐसा
हुआ भी। तब अपने अपमान से आहत द्रुपद ने एक यज्ञ के द्वारा दिव्य राजकुमार
धृष्टद्युम्न और द्रोपदी को उत्पन्न किया।
द्रुपद ने धृष्टद्युम्न को केवल इसी उद्देश्य से प्राप्त किया था कि वह द्रोण
को मारकर उनके बंदी बनाए जाने के अपमान का बदला लेगा। द्रोणाचार्य यह जानते थे कि
उनकी मृत्यु धृष्टद्युम्न के हाथों होगी। लेकिन जब शिक्षा के लिए द्रुपद ने अपने
पुत्र को द्रोण के पास भेजा तो वह उसे शिक्षा देने के लिए सहज तैयार हो गए। यह
जानते हुए कि वे जिसे शिक्षित करेंगे, वही उनके प्राण लेगा, उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया।
इसके माध्यम से द्रोण ने संदेश दिया कि शिक्षक का धर्म शिक्षा का दान करना है। भले
ही वह ऐसे व्यक्ति को दी जा रही हो, जिसके द्वारा भविष्य में उसे सर्वाधिक खतरा हो।
जब एक मरीज ने किया अपने डॉक्टर का इलाज
एक व्यक्ति कुछ अस्वस्थ था। उसने डॉक्टर को बुलवाया। लिफ्ट खराब थी, अत: उन्हें उस व्यक्ति
के घर पर सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ा। वे जोरों से हांफने लगे। जब अस्वस्थ व्यक्ति
ने उनकी यह दशा देखी, तो बिस्तर से उठकर उसने डॉक्टर को बैठने के लिए कुर्सी दी और एक गोली उन्हें
देते हुए बोला - ‘यह तुम्हें फौरन आराम पहुंचाएगी। तुम गरिष्ठ भोजन बंद कर दो और साग-सब्जी व फल
खाओ। मैं तुमसे उम्र में दोगुना बड़ा हूं, फिर भी सौ गुना चुस्त हूं।’
डॉक्टर ने मरीज की चुस्ती की तारीफ की। उस व्यक्ति ने फिर डॉक्टर से पूछा कि
क्या वे नृत्य कर सकते हैं? डॉक्टर ने इंकार कर दिया। तब उसने संगीत बजाया और नृत्य भी
किया। साथ ही डॉक्टर को सलाह दी कि प्रतिदिन कम से कम पंद्रह मिनट तक नृत्य करने
से तुम दुबले और चुस्त हो जाओगे। तुम डॉक्टर मरीजों को हमेशा ऐसी सलाह देते हो,
जो उनके लिए
उपयोगी नहीं होती। तुम एक डाकिए से घूमने-फिरने को कहते हो, जबकि वह तो घूमने-फिरने में ही
अपनी शक्ति व्यय करता है। अब तुम मुझे लिखने के लिए मना करोगे कि उसमें मुझे मेहनत
लगेगी, किंतु
मैं एक लेखक हूं, इसलिए लिखने से ही स्वस्थ रहता हूं। अब तुम यह अनुभवी सलाह देने के लिए मुझे
पांच शिलिंग दो।’
डॉक्टर ने हंसते हुए कहा - ‘ठीक है, आप उन्हें काटकर मुझे दो पौंड दे दीजिए।’ कारण पूछने पर डॉक्टर
बोले - ‘क्योंकि
मैंने आपको स्वस्थ कर दिया। मुझे मरीज समझकर आप अपना कष्ट भूल गए।’ ये व्यक्ति थे - जॉर्ज
बर्नार्ड शॉ। स्वभाव की जिंदादिली व्यक्ति को सदैव स्वस्थ व ऊर्जावान बनाए रखती
है। इसलिए हमेशा खुश रहना चाहिए।
जब अर्जुन के तीर सुधन्वा के बाणों के आगे निष्प्रभावी हुए
महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से परमवीर सुधन्वा अर्जुन से युद्ध कर रहे
थे। हार-जीत का फैसला न होते देख यह तय किया गया कि तीन बाणों में युद्ध का निर्णय
होगा। या तो किसी का वध होगा, अन्यथा दोनों पक्ष युद्ध बंद कर पराजय स्वीकार करेंगे।
कृष्ण पांडवों की ओर थे, अत: उन्होंने अर्जुन की सहायता के लिए हाथ में जल लेकर
संकल्प किया कि गोवर्धन उठाने और ब्रज की रक्षा करने के पुण्य मैं अर्जुन के बाण
के साथ संयोजित करता हूं। इससे अर्जुन का आग्नेयास्त्र और भी सशक्त हो गया।
आग्नेयास्त्र का सामना करने के लिए सुधन्वा ने संकल्प लिया कि एक पत्नी व्रत पालने
का मेरा पुण्य मेरे अस्त्र के साथ जुड़े। दोनों अस्त्र आकाश मार्ग से चले और
परस्पर एक-दूसरे को काटने लगे। अर्जुन का अस्त्र कट गया और सुधन्वा का बाण आगे
बढ़ा, किंतु
निशाना चूक गया।
दूसरी बार अर्जुन को अपना पुण्य प्रदान करते हुए कृष्ण बोले कि गज को बचाने
तथा द्रौपदी की लाज बचाने का पुण्य मैं अर्जुन के बाण के साथ जोड़ता हूं। सुधन्वा
ने उज्ज्वल चरित्र का पुण्य अपने अस्त्र में जोड़ा। अर्जुन का बाण पुन: कट गया।
तीसरी बार कृष्ण ने बार-बार अवतार लेकर धरती का भार उतारने का पुण्य अर्जुन के बाण
के साथ संयुक्त किया, तो सुधन्वा ने संकल्प लिया कि मेरे परमार्थ का पुण्य मेरे अस्त्र में जुड़े।
सुधन्वा का बाण फिर विजयी हुआ। अर्जुन ने पराजय मानी और कृष्ण ने सुधन्वा से कहा -
‘हे
सद्गृहस्थ! तुमने सिद्ध कर दिया कि कर्तव्यपरायण गृहस्थ किसी तपस्वी से कम नहीं
होता।’ वस्तुत:
भाग्यवश जो भी भूमिका मिले, उसका ईमानदारी से निर्वाह अपार पुण्यों का सृजन करता है।
बालक आजाद ने पेश की साहस की अनोखी मिसाल
घटना उस समय की है, जब महात्मा गांधी ने स्वराज्य के लिए असहयोग आंदोलन छेड़
रखा था। देश में अंग्रेजों के अत्याचार चरम पर थे। गांधीजी अपने अहिंसावादी मार्ग
से, तो
क्रांतिकारी हिंसा मार्ग से अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार किया जा रहा था।
अंग्रेजों ने यह जनांदोलन कुचलने के लिए अनेक हथकंडे अपनाए। लोगों को अनावश्यक
जेलों में बंद कर दिया। उन्हें शारीरिक यातनाएं दीं। उस समय अंग्रेजों ने दफा 144 लगा रखी थी। पांच से
अधिक आदमी एक स्थान पर इकट्ठे नहीं हो सकते थे। जनता ने लगातार इसका विरोध किया।
उन दिनों बनारस के संस्कृत स्कूल में एक बालक पढ़ता था, जो अत्यंत साहसी था। एक बार उसने
जोर-शोर से नारे लगाती भीड़ देखी, तो वह भी उसमें शामिल होकर ऊंची आवाज में नारे लगाने लगा।
उसे ऐसा करते देख एक पुलिसकर्मी ने पकड़कर एक जोरदार चांटा मारा और हथकड़ी पहनाकर
अंग्रेज जज के सामने प्रस्तुत किया। जज ने उससे नाम पूछा, तो वह बोला - ‘आजाद।’ पिता का नाम पूछने पर वह
बोला - ‘ईश्वर।’
जज ने नाराज होकर
उसे बारह बेंत लगाने की सजा सुना दी। बिना उफ् किए वह बेंतों की मार सहता रहा और
हर बेंत पर ‘भारत माता की जय’ बोलता रहा। यही बालक आगे चलकर चंद्रशेखर आजाद के नाम से मशहूर हुआ और देश के
स्वाधीनता संग्राम में अपना बलिदान कर अमूल्य योगदान दिया। वस्तुत: आजाद भारत ऐसे
ही महान देशभक्तों के त्याग व बलिदान की देन है।
बिना अपराध दंड भुगतने को तैयार नहीं हुए तिलक
एक विद्यालय के कुछ छात्र आपस में हंसी-ठिठोली कर रहे थे। भोजनावकाश का समय था,
तभी उन छात्रों
में से एक मूंगफलियां खरीद लाया। मेज पर मूंगफलियों को रखकर सभी उसके आसपास बैठ गए
और खाने लगे। बड़ी लापरवाही से उन लोगों ने छिलके कक्षा के फर्श पर ही फेंक दिए।
जब भोजनावकाश समाप्त हुआ, तो सभी अपनी-अपनी जगह बैठ गए।
अध्यापक महोदय जैसे ही अंदर आए, उन्हें मूंगफली के छिलके यहां-वहां बिखरे हुए दिखाई
दिए। उन्होंने नाराज होकर पूछा कि यह किसने किया? पिटने के भय से किसी भी छात्र ने
अपना अपराध स्वीकार नहीं किया। इससे अध्यापक को और गुस्सा आया। उन्होंने सभी
छात्रों को हाथ आगे बढ़ाने के लिए कहा। सभी छात्रों ने उनकी आज्ञा का पालन किया।
वे सभी की हथेलियां खुलवाकर दो-दो बेंत मारने लगे। लेकिन एक छात्र ने अपने हाथ आगे
नहीं बढ़ाए और यह कहते हुए अपने हाथ बगल में दबा लिए - ‘मैंने मूंगफली के छिलके जमीन पर
नहीं फेंके, इसलिए मैं मार नहीं खाऊंगा।’ तब अध्यापक ने उसे उन छात्रों के नाम बताने को कहा, जिन्होंने मूंगफली खाई
थी।
उसने स्पष्ट रूप से कहा - ‘मैं किसी की चुगली नहीं करूंगा और न ही बेंत खाऊंगा।’
छात्र के हठ के कारण
उसे स्कूल से निष्कासित कर दिया गया, जिसे उसने स्वीकार किया, किंतु बिना अपराध दंड नहीं
भुगता। न्याय के लिए कष्ट सहने वाले इस छात्र का नाम था - बाल गंगाधर तिलक।
वस्तुत: न्याय का मार्ग पथरीला होता है, किंतु उसकी लक्ष्य प्राप्ति अलौकिक शांति और
प्रतिष्ठा देती है।
मंत्री होकर भी शास्त्रीजी ने सुविधा लेने से किया इनकार
यह प्रसंग उस समय का है, जब देश को आजाद हुए कुछ ही समय हुआ था। लालबहादुर शास्त्री
उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री थे। शास्त्रीजी अपनी सादगी के लिए विख्यात थे और उच्च
पद प्राप्त होने के बाद भी उन्होंने इसे कायम रखा था। वे कम से कम साधनों में अपना
और परिवार का काम चलाते थे तथा किसी भी प्रकार की सुख-सुविधा पर धन का अपव्यय पसंद
नहीं करते थे।
गृहमंत्री बनने के बाद एक दिन जब वे कार्यालय में थे, तो उनके घर पीडब्ल्यूडी विभाग के
कर्मचारी आए। शास्त्रीजी की पत्नी ललिताजी को उन लोगों ने बताया कि वे कूलर लगाने
आए हैं। यह सुनकर शास्त्रीजी के बच्चे ऐसा सोचकर बड़े प्रसन्न हुए कि इस बार गर्मी
का मौसम बहुत अच्छा कटेगा। जब शाम को शास्त्रीजी घर आए, तो उन्हें यह बात मालूम हुई।
उन्होंने तत्काल पीडब्ल्यूडी विभाग में फोन लगाकर कूलर लेने से इनकार कर दिया।
ललिताजी ने कहा कि यदि बिना मांगे कोई सुविधा मिल रही है, तो हम क्यों मना करें?
तब शास्त्रीजी ने
जवाब दिया कि यह जरूरी नहीं कि मैं हमेशा मंत्री पद पर ही रहूंगा। फिर हमें
सुविधाओं में जीने की आदत पड़ जाएगी, तो उस समय परेशानी होगी। यदि लड़कियों को शादी के
बाद ये सुविधाएं नहीं मिलीं, तो उन्हें कष्ट होगा। इसलिए सादगी से जीवन जीने में ही हम
सबकी भलाई है। कथा का सार यह है कि मोह के नाश से निस्पृहता आती है, जो प्रत्येक परिस्थिति
में व्यक्ति को सुखी बनाए रखती है।
बिना धन के स्वामी रामतीर्थ ने किया अमेरिका प्रवास
स्वामी रामतीर्थ जहाज से अमेरिका जा रहे थे। जब जहाज सेन फ्रांसिस्को बंदरगाह
पर पहुंचा, तो स्वामीजी जहाज के डेक पर टहलने लगे। उनकी संन्यासियों वाली वेशभूषा से
आकर्षित होकर एक अमेरिकी उनके पास आया और बोला -‘स्वामीजी! क्या आप यहां उतरेंगे?
आपका सामान कहां
है?’ स्वामीजी
ने अपने थैले में रखी पुस्तकों व वस्त्रों की ओर संकेत करते हुए कहा - ‘मेरे साथ बस यही सामान
है और मैं यहीं उतरूंगा।’
अमेरिकी चकित रह गया कि इतने से सामान से किसी का निर्वाह कैसे हो सकता है?
उसने पूछा - ‘आप धन कहां रखते हैं?’
स्वामीजी ने उत्तर
दिया - ‘मेरे
पास रुपया-पैसा नहीं है, इसलिए मैं आपके जैसा धन नहीं रखता।’ अमेरिकी ने आश्चर्य से पूछा - ‘फिर आपका निर्वाह कैसे
होता है?’ स्वामीजी हंसकर बोले - ‘मैं प्राणिमात्र से प्रेम करता हूं। मैं जब भूखा होता हूं,
तो कोई रोटी खिला
देता है और जब प्यासा होता हूं, तो कोई पानी पिला देता है।’ उस अमेरिकी का आश्चर्य और बढ़
गया।
ऐसा त्यागी पुरुष उसके लिए सर्वथा नई चीज था। उसने फिर प्रश्न किया - ‘अमेरिका में आपका कोई
परिचित मित्र है?’ स्वामीजी ने मुस्कराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और बोले - ‘हां, एक है।’ वह अमेरिकी स्वामीजी के
स्नेहपूर्ण व्यवहार से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्हें अपना अतिथि बना लिया। यह
अमेरिकी थे - डॉक्टर एल्बर्ट हिलर। वह आजीवन स्वामीजी के कृपापात्र बने रहे। सार
यह है कि ‘वसुधव कुटुंबकम्’ का उदात्त भाव प्राणिमात्र के प्रति प्रेम व मित्रता के दिव्य भाव को जन्म
देता है। इसे अपने व्यवहार का स्थायी अंग बनाना चाहिए।
बारह वर्ष कथा सुनने के बाद भी सेठजी को पुण्य नहीं मिला
एक सेठ ने संकल्प लिया कि बारह वर्ष तक वह प्रतिदिन कथा सुनेंगे। उनकी कामना
थी कि उनका धन सतत बढ़ता रहे। ईश्वर के प्रति भक्तिभाव प्रदर्शित करने के लिए
उन्होंने यह मार्ग चुना। संकल्प लेने के बाद कथा सुनाने के लिए ब्राह्मण की खोज
आरंभ हुई।
सेठजी चाहते थे कि अत्यल्प पारिश्रमिक पर यह कार्य हो जाए। इसलिए उन्होंने
अनेक ब्राह्मणों का साक्षात्कार लिया। अंत में उन्हें एक ऐसा सदाचारी धर्मनिष्ठ
ब्राह्मण मिला, जिसने बारह वर्ष तक नि:शुल्क कथा सुनाना स्वीकार कर लिया। सेठजी के हर्ष की
सीमा न रही। ब्राह्मण तय समय पर प्रतिदिन आता और सेठजी को कथा सुना जाता। बारह
वर्ष होने ही वाले थे कि अचानक सेठजी को किसी जरूरी व्यापारिक कार्य से बाहर जाना
पड़ा।
जाने के पूर्व जब उन्होंने ब्राह्मण को यह बात बताई, तो वह बोला - ‘आपके स्थान पर आपका
पुत्र कथा सुन लेगा। यह धर्मानुसार ही है।’ सेठजी ने शंका व्यक्त की - ‘कथा सुनकर मेरा पुत्र
वैरागी तो नहीं हो जाएगा?’ ब्राह्मण ने कहा - ‘इतने वर्षो तक कथा सुनने के बाद आप संन्यासी नहीं
बने, तो
दो-चार दिन में पुत्र कैसे संन्यासी बन जाएगा?’ तब सेठ ने कहा- ‘मैं तो यह सोचकर कथा
सुनता था कि धार्मिकता का पुण्य मिले, किंतु कथा के प्रभाव से मैं वैरागी न बनूं।’ यह सुनकर ब्राह्मण बोला
- ‘क्षमा
करें सेठजी! आपको कथा का कोई पुण्य नहीं मिलेगा, क्योंकि आपकी धार्मिकता हार्दिक नहीं,
दिखावटी थी और आप
इसे स्वार्थवश कर रहे थे।’ सेठजी निरुत्तर हो गए। वस्तुत: सच्ची ईशभक्ति निष्काम होती
है और तभी वह फलती भी है।
हज़ारों साल पहले ही इन्होंने कह दी थी ऐसी बातें, जो आज भी हैं कारगर
महानता जन्म से नहीं कर्मों से होती है।‘ भारत में यूं तो बहुत से महान व्यक्तियों ने जन्म लिया है पर यदि बुद्दि कौशल की बात की जाए तो ज़बान पर पहला नाम चाणक्य का ही आता है। कौटिल्य यानी चाणक्य प्राचीन भारत में अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र के ज्ञाता थे। महान चंद्रगुप्त भी चाणक्य का ही शिष्य था।
चाणक्य एक दूरदर्शी और विचारशील व्यक्तित्व के मालिक थे। यही वजह है कि हज़ारों साल पहले दी हुई उनकी शिक्षाएं आज भी कारगर जान पड़ती हैं। आज के समय में ज़िंदगी कितनी भी उलझ चुकी हो पर चाणक्य की नीति इसका सटीक जवाब देती है। जीवन का कोई भी कठिनतम पहलू हो कौटिल्य की समक्ष उसमें किसी गर्म सलाख़ की तरह समा जाती है और समाधान खोज लाती है। हर विषय पर चाणक्य की समझ अद्भुत है।
जानिए राजनीति, व्यक्तित्व, ईमानदारी, कर्म, शिक्षा और महिलाओं के बारे में चाणक्य ने कौन सी महान शिक्षाएं दी हैं।
वेश्याएं निर्धनों के साथ नहीं रहतीं , नागरिक दुर्बलों की संगती में नहीं रहते , और पक्षी उस पेड़ पर घोंसला नहीं बनाते जिसपे फल ना हों।
दुनिए की सबसे बड़ी शक्ति नौजवानी और औरत की सुन्दरता है।
हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है.ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो. यह कड़वा सच है।
सर्प , नृप , शेर, डंक मारने वाले ततैया, छोटे बच्चे , दूसरों के कुत्तों , और एक मूर्ख: इन सातों को नीद से नहीं उठाना चाहिए।
आदमी को दूसरों की गलतियों से ही सीखना चाहिए। उसकी ज़िंदगी इतनी नहीं कि वह सारी गलतियों को खुद करके उनसे सीख ले सके।
वह जो हमारे चिंतन में रहता है वह करीब है, भले ही वास्तविकता में वह बहुत दूर ही क्यों ना हो, लेकिन जो हमारे ह्रदय में नहीं है वो करीब होते हुए भी बहुत दूर होता है।
कभी भी उनसे मित्रता मत कीजिये जो आपसे कम या ज्यादा प्रतिष्ठा के हों, ऐसी मित्रता कभी आपको ख़ुशी नहीं देगी।
सेवक को तब परखें जब वह काम ना कर रहा हो, रिश्तेदार को किसी कठिनाई में, मित्र को संकट में, और पत्नी को घोर विपत्ति में।
संतुलित दिमाग से जैसी कोई सादगी नहीं है, संतोष जैसा कोई सुख नहीं है, लोभ जैसी कोई बीमारी नहीं है, और दया जैसा कोई पुण्य नहीं है।
सारस की तरह एक बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए और अपने उद्देश्य को स्थान की जानकारी, समय और योग्यता के अनुसार प्राप्त करना चाहिए।
सबसे बड़ा गुरु मन्त्र है: कभी भी अपने राज़ दूसरों को मत बताएं. ये आपको बर्वाद कर देगा।
शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है,एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पता है।
जैसे ही भय आपके करीब आये, उसपर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये।
मूर्खता दुखदायी है, जवानी भी दुखदायी है, लेकिन इससे कही ज्यादा दुखदायी किसी दूसरे के घर जाकर उससे अहसान लेना है।
जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK
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