Monday, September 5, 2011

Dharm Gyan( धर्म ज्ञान) Part 5

रातों-रात बनेंगे धनी भी, बलवान भी..करें नौ रात इन 9 देवियों की भक्ति
शक्ति के बिना जीवन की कल्पना असंभव है। पौराणिक मान्यता है कि शक्ति ही संसार का कारण है, जो अनेक रूपों में हमारे अंदर और आस-पास चर-अचर, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव सभी में अनेक रूपों में समाई है। शक्ति के इसी महत्व को जानते हुए हिन्दू धर्म के शास्त्र-पुराणों में शक्ति उपासना व जागरण की महिमा बताई गई है। जिससे मर्यादा और संयम के द्वारा शक्ति संचय व सदुपयोग का संदेश जुड़ा है।

धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध इस विशेष घड़ी में शक्ति की देवी के रूप में पूजा होती है। जिनमें शक्ति के 3 स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती प्रमुख रूप से पूजनीय है। जिनको बल, वैभव और ज्ञान की देवी माना गया है।

इसी तरह धर्मग्रंथों में सांसारिक जीवन में अलग-अलग रूपों में शक्ति संपन्नता के लिए शक्ति के नौ स्वरूपों यानी नवदुर्गा की पूजा का महत्व बताया गया है। नवदुर्गा का अर्थ है दुर्गा के नौ स्वरूप। दुर्गा को दुर्गति का नाश करने वाली कहा जाता है।

चूंकि नवरात्रि में रात में शक्ति पूजा का महत्व है। इसी कारण मान्यता है कि नवरात्रि की नौ रातों में नौ शक्तियों वाली दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा अलग-अलग कामनाओं को पूरा कर रातों-रात बलवान, बुद्धिमान और धनवान बना देती है। जानें, नवरात्रि की नौ रात किस देवी के अद्भुत स्वरुप की भक्ति पूरी करती है कौन-सी इच्छा?

1. शैलपुत्री - नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की उपासना की जाती है। यह कल्याणी भी कही जाती है। इनकी उपासना से सुखी और निरोगी जीवन मिलता है।

2. ब्रह्मचारिणी- नवरात्रि के दूसरे दिन तपस्विनी रूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना से पुरूषार्थ, अध्यात्मिक सुख और मोक्ष देने वाली होती है। सरल शब्दों में प्रसन्नता, आनंद और सुख के लिए इस शक्ति की साधना का महत्व है।

3. चंद्रघंटा - नवरात्रि की तीसरे दिन नवदुर्गा के तीसरी शक्ति चंद्रघंटा को पूजा जाता है। इनकी भक्ति जीवन से सभी भय दूर करने वाली मानी गई है।

4. कूष्मांडा - नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की उपासना का महत्व है। यह उपासना भक्त के जीवन से कलह, शोक का अंत कर लंबी उम्र और सम्मान देने वाली होती है।

5. स्कंदमाता - नवरात्रि के पांचवे दिन स्कन्दमाता की पूजा की जाती है। माता की उपासना जीवन में प्रेम, स्नेह और शांति लाने वाली मानी गई है।

6. कात्यायनी - नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का महत्व है। माता की पूजा व्यावहारिक जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ तन और मन को ऊर्जा और बल देने वाली मानी गई है।

7. कालरात्रि - नवरात्रि के सातवें दिन दुर्गा के तामसी स्वरूप मां कालरात्रि की उपासना की जाती है, किंतु सांसारिक जीवों के लिये यह स्वरूप शुभ और काल से रक्षा करने वाला है। इनकी उपासना पराक्रम और विपरीत हालात में भी शक्ति देने वाला होता है।

8. महागौरी - नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है। मां का यह करूणामयी रूप है। इनकी उपासना भक्त को अक्षय सुख देने वाली मानी गई है।

9. सिद्धिदात्री - नवरात्रि के अंतिम या नौवे दिन मां सिद्धिदात्री की उपासना का महत्व है। इनकी उपासना समस्त सिद्धि देने वाली होती है। व्यावहारिक जीवन के नजरिए से ज्ञान, विद्या, कौशल, बल, विचार, बुद्धि में पारंगत होने के लिए माता सिद्धिदात्री की उपासना बहुत ही प्रभावी होती है।

शिखर छूना है तो काम में हो ऐसा समर्पण और जज्बा
शिखर पर पहुंचने की आस हर कोई करता है, लेकिन सभी उस ऊंचाई को छू नहीं पाते। क्योंकि बिरले ही लोग उसके लिये जरूरी काबिलियत, गुण रखते हैं। चूंकि सफलता की बुलंदियों की ओर जाने का यह सफर परिवार और कार्यक्षेत्र से होकर ही गुजरता है। इसलिए हर इंसान को इस दौरान कुछ आसान सूत्रों को ध्यान रखना चाहिए। जिसे यहां हिन्दू धर्मग्रंथ में आई प्रथम पूज्य गणेश जन्म की कथा से ही समझते है -

पौराणिक मान्यता है कि देवी पार्वती ने स्नान के वक्त अपने उबटन की बत्तियों से एक शिशु बनाया। तपोबल से उसमें प्राण फूंक कर पुत्र मान आदेश दिया कि मेरे स्नान करने तक वह किसी को भी भीतर न आने दे।

इसी दौरान वहां भगवान शंकर पहुंच गए। किंतु द्वार पर खड़े बालक के द्वारा उनको अंदर प्रवेश से रोका गया और वह अपनी बात से टस से मस न हुआ। तब इस बात से अनजान कि वह उनका ही पुत्र है, शिव ने आवेशित होकर उसका सिर त्रिशूल से काट दिया। तब पार्वती के दु:खी होने पर भगवान शंकर ने हाथी का कटा सिर उस बालक के धड़ पर लगाया। साथ ही उसे जगत में हर कार्य में सबसे पहले पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया। वह बालक ही गजानन पुकारा गया। जिसे हम भगवान के गणेश नाम से भी सबसे पहले पूजते हैं।

इस छोटी-सी कथा में संकेत यही है कि मानव जीवन की सफलता परिवार हो या कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारियों को ईमानदारी और समर्पण से पूरा करने में ही छुपी है। परिवार के बीच या किसी कार्यक्षेत्र से जुडऩे के बाद वक्त आगे बढऩे के साथ कर्तव्य भी जुड़ते चले जाते हैं। कर्तव्यों को पूरा करने के प्रति सच्चाई व जज्बा ही नई जिम्मेदारी, पद व सम्मान के काबिल बनाता है। देवी पार्वती द्वारा गणेश का जन्म और द्वार पर पहरेदारी का जिम्मा इसी बात का संकेत है।

वहीं गणेश की द्वार पर पहरेदारी और भगवान शंकर को रोकने के पीछे यह संदेश है कि किसी भी वक्त मिली किसी भी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए कमर कसकर तैयार रहना चाहिए। साथ ही उसे निर्भय व निष्पक्षता के साथ पूरा करना चाहिए, फिर चाहे उसमें किसी वक्त अपनों के ही अनुचित दबाव, दखल या खलल का ही क्यों न सामना करना पड़े।

आपका कर्तव्यों को पूरा करने का ऐसा जज्बा और समर्पण ही आपकी शख्सियत को साफ-सुथरा, विश्वसनीय बनाकर भगवान गणेश की तरह ही नई पहचान, यश, सम्मान और प्रतिष्ठा देकर निश्चित रूप से शिखर पहुंचा देगा।

श्री गणेश से सीखें यह खास खूबी लीडरशिप की..
परिवार का मुखिया हो या कार्यक्षेत्र में शीर्ष पद दोनों ही स्थानों पर बेहतर नेतृत्व क्षमता ही पारिवारिक सदस्यों या कार्यदल यानी टीम पर बेहतर नियंत्रण व तालमेल से सुखद नतीजों के लिए निर्णायक होती है। किंतु किसी भी शीर्ष पर पहुंचकर उससे जुड़ी जिम्मेदारियां और कार्य को अंजाम देना कुछ खास खूबियों के बिना संभव नहीं।

हिन्दू धर्म पंरपराओं में चूंकि सही शुरूआत और अंजाम के लिए भगवान गणेश का स्मरण ही किया जाता है। इसलिए श्री गणेश स्वरूप में मौजूद सही नेतृत्व के लिए जरूरी गुणों में से ही एक खास और अहम गुण को व्यवहार में उतार लिया जाए तो यशस्वी जीवन को आसानी से पाया जा सकता है। जानते हैं क्या है यह खास खूबी?..

श्री गणेश का एक नाम गणपति है। जिसका शाब्दिक अर्थ निकाले तो गण यानी समूह व पति यानी स्वामी। इस तरह इस शब्द में नेतृत्व का ही भाव छुपा है। चूंकि श्री गणेश का बाहरी स्वरूप तो अनूठा है, जिसका संबंध गजमुख या गजानन यानी हाथी के मुख से है। किंतु वह अनेक गुणों के स्वामी होने से गुणपति भी पुकारे जाते हैं।

श्री गणेश के इस अनूठे हाथी मुख में ही नेतृत्व क्षमता का बेजोड़ सूत्र छूपा है। जिसके मुताबिक चूंकि हाथी को बलवान ही नहीं बुद्धिमान प्राणी भी माना गया है। जिसमें साफ संकेत है कि अगर कोई भी इंसान ऊंचाई, शीर्ष या नेतृत्व की कामना रखता है तो उसे तेज बुद्धि का मालिक जरूर बनना चाहिए। बुद्धिमानी के बिना नेतृत्व करना या सक्षम होना मुश्किल है। जिसके लिए वक्त रहते सजग और जागरूक रहकर अधिक से अधिक ज्ञान, अनुभव व कुशलता को पाने से नहीं चूकना चाहिए।

बुद्धिमानी ही श्री गणेश की तरह गुणवान बनाकर प्रथम पूज्य व्यावहारिक अर्थों मे आगे रखकर प्रतिष्ठा, सम्मान व सफलता में अहम भूमिका निभाएगी।

जानें, श्रीगणेश के प्रमुख गणों के नाम
गणेशजी का उल्लेख ऋग्वेद के एक मंत्र (2-23-1) से मिलता है। चाहे कोई सा अनुष्ठान हो, इस मंत्र का जाप तो होता ही है...गणनां त्वा गणति हवामहे..। इस मंत्र में ब्रह्मणस्पति शब्द आया है। यह बृहस्पति देव के लिए प्रयुक्त हुआ है। बृहस्पति देव बुद्धि और ज्ञान के देव हैं इसलिए गणपति देव को भी बुद्धि और विवेक का देव माना गया है। किसी भी कार्य की सिद्धि बिना बुद्धि और विवेक के नहीं हो सकती। अस्तु, हर कार्य की सिद्धि के लिए बृहस्पतिदेव के प्रतीकात्मक रूप से गणेशजी की पूजा होती है। गणेश पुराण में गणेशजी के अनेकानेक रूप कहे गए हैं। सतयुग में कश्यप ऋषि पुत्र के रूप में वह विनायक हुए और सिंह पर सवार होकर देवातंक -निरांतक का वध किया। त्रेता में मयूरेश्वर के रूप में वह अवतरित हुए।

गणेश के 21 गण हैं- गजास्य, विघ्नराज, लंबोदर, शिवात्मज, वक्रतुंड, शूर्पकर्ण, कुब्ज, विनायक, विघ्ननाश, वामन, विकट, सर्वदैवत, सर्वाॢतनाशी, विघ्नहर्ता, ध्रूमक, सर्वदेवाधिदेव, एकदंत, कृष्णपिंड्:ग, भालचंद्र, गणेश्वर और गणप। ये २१ गण हैं और गणेशजी की पूजा के भी 21 ही विधान हैं।

अगर क्रोध किया तो भुगतने पड़ेगें ये घातक नतीजे..
अक्सर देखा जाता है कि इंसान अच्छाई का श्रेय स्वयं लेना चाहता है, वहीं बुराई का दूसरों के माथे मढ़ता है। जबकि सच यह भी है कि इंसान के स्वभाव और व्यवहार के दोष भी अपयश या निंदा का कारण बनते हैं। शास्त्रों में भी ऐसे ही छ: दोष बताए गए हैं, जिनमें क्रोध भी एक है।

धर्मग्रंथों की बातों का सार समझें तो क्रोध बर्बादी का अहम कारणों में एक है। क्रोध से न केवल सही या गलत की समझ खो जाती है, बल्कि अनेक सद्गुण भी ढंक जाते है। गुस्सा किस तरह से नुकसानदायक व घात का कारण बनता है, जानते हैं शास्त्रों में लिखी बात से-

क्रोध: प्राणहर: शत्रु: क्रोधोमित्रमुखो रिपु:।

क्रोधोसि महातीक्ष्ण: सर्वं क्रोधोपकर्षति।।

तपते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति।

क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत।।

जिसका आसान शब्दों में मतलब है कि क्रोध प्राणघातक है, क्रोध शत्रु है, क्रोध घाव देने वाली तलवार है, जिससे सारा तप, धीरज, दान आदि निरर्थक हो जाते हैं। इसलिए क्रोध का साथ छोडऩा ही बेहतर व सुखी जीवन का सरल उपाय है।

साफ है कि क्रोध से न केवल स्वयं के गुण, स्वभाव व व्यवहार पर बुरा असर डालता है, जबकि उससे दूसरों पर हुए नकारात्मक प्रभाव से हुई प्रतिक्रिया बुरे और घातक परिणाम का कारण बनती है।

ये काम भी हैं सच्ची भक्ति.. जो लाते हैं सुख और शांति
भक्ति भी मन, तन और कर्म को साधकर सुख और शांति का श्रेष्ठ उपाय है, जो अलग-अलग रूपों में ईश्वर और दैवीय भावों के निकट ले जाती है। अच्छे भावों के विचार और व्यवहार में आते ही उसके सुखद नतीजे भी जीवन में दिखाई देते हैं।

अक्सर ईश भक्ति के लिए देव उपासना-पूजा आसान मार्ग समझा जाता है। लेकिन अनेक लोग इन धार्मिक कर्मकाण्डों में ऐसे उलझ जाते हैं कि वह अंधविश्वास का रूप भी ले लेते हैं। जिससे व्यावहारिक दोष पैदा होते हैं। असल में वह भक्ति के मूल भाव से दूर हो जाते हैं।

धर्मग्रंथ गीता में भक्ति और कर्म के इसी तालमेल को बनाने का एक सूत्र बताया गया है। जो संकेत करता है कि काम के साथ भक्ति कैसे की जा सकती है?

लिखा गया है कि -

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।

जिसका सरल शब्दों में शाब्दिक अर्थ है कि ईश्वर से ही सभी जन्मे हैं, जिनसे सारे जगत का अस्तित्व है। इस तरह हर जगह भगवान मौजूद है। इसलिए अगर मानव स्वाभाविक कामों को ही करता रहे तो वह ईश्वर पूजा के समान है। जिनके द्वारा वह सिद्ध बन सकता है।

साफ संकेत है कि इंसान कर्म में भी ईश्वर का भाव रख पूजा के समान कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को बिना बेचैनी और अशांत भाव के पूरा करता चले तो उसे असीम सुख और शांति मिल सकती है।

भक्त की इस एक बात के भगवान भी हो जाते है कायल!
व्यावहारिक जीवन में सुख और आनंद के लिए पद, प्रतिष्ठा और सम्मान और ऐश्वर्य अहम माने जाते हैं। किंतु ये सभी एक साथ या समान रूप से नहीं मिलते। तो क्या कोई ऐसा तरीका हो संभव है, जो स्थायी और अपार सुख दे सके?

धर्मग्रंथों के मुताबिक सभी सुख और आनंद पाने का एक सरल उपाय है और वह है - भक्ति। जी हां, भगवान की भक्ति भगवान के स्मरण में लगाया मन कुछ ही पलों में ऐसा सुख, खुशी और आनंद दे देता है, जिनके आगे तमाम भौतिक सुख भी कमतर लगते हैं।

ऐसी सुखदायी भक्ति के लिये भाव जरूरी है। क्योंकि भक्ति में भाव अहम माना गया है। इस संबंध में श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि -

भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।

गन्धो धूप: सुमनसो दीपोन्नाद्यं च किं पुन:।।

जिसका सरल शब्दों अर्थ है कि मुझे कोई अनेक तरह की भोग सामग्रियां चढ़ाएं तो मैं उनसे संतुष्ट नहीं हो पाता, बल्कि कोई भक्ति भाव से मात्र जल अर्पित कर दे तो प्रसन्न हो जाता हूं और अगर कोई इसी भावना से गंध, फूल, धूप, दीप और भोग लगाए तो फिर वह मेरा कृपा पात्र ही हो जाता है।

इस बात से यही सूत्र मिलता है कि सांसारिक जीवन में सुकून से जीवन जीने के लिए कर्म के साथ भाव भरी भक्ति भी एक बेहतर उपाय साबित। क्योंकि माना जाता है कि इससे मिली शांति धन से पाई सुख-सुविधाओं से भी नहीं मिल पाती।

ये हैं भारतीय इतिहास के युगनायक शिक्षक
भारतीय इतिहास में एक से बढ़कर एक शिक्षक रहे हैं। राम से लेकर विवेकानंद तक जितने भी युगनायक हुए हैं, उनके पीछे किसी महान गुरु का आशीर्वाद और शिक्षा रही है। आइए जानते हैं कि कौन-कौन से ऐसे महान गुरु हैं जिन्होंने युगनायकों को जन्म दिया है।

सांदीपनि - भगवान श्रीकृष्ण के गुरु आचार्य सांदीपनि थे। उज्जैयिनी वर्तमान में उज्जैन में अपने आश्रम में आचार्य सांदीपनि ने भगवान श्रीकृष्ण को 64 कलाओं की शिक्षा दी थी। भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण ने सर्वज्ञानी होने के बाद भी सांदीपनि ऋषि से शिक्षा ग्रहण की और ये साबित किया कि कोई इंसान कितना भी प्रतिभाशाली या गुणी क्यों न हो, उसे जीवन में फिर भी एक गुरु की आवश्यकता होती ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने 64 दिन में ये कलाएं सीखीं थी। सांदीपनि ऋषि परम तपस्वी भी थे, उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त किया था कि उज्जैयिनी में कभी अकाल नहीं पड़ेगा।

वशिष्ठ - त्रैतायुग में भगवान राम के गुरु रहे श्री वशिष्ठ भी भारतीय गुरुओं में उच्च स्थान पर हैं। भगवान राम की प्रतिभा और उनके सद्व्यवहार को सबसे पहले श्री वशिष्ठ ने ही पहचाना। उन्होंने भगवान राम के व्यक्तित्व को देखते हुए पहले ही घोषणा कर दी थी कि ये भविष्य में सूर्यवंश राम के नाम से ही जाना जाएगा। भगवान राम ने सारी वेद-वेदांगों की शिक्षा वशिष्ठ ऋषि से ही प्राप्त की थी।

विश्वामित्र - भगवान राम को परम योद्धा बनाने का श्रेय विश्वामित्र ऋषि को जाता है। एक क्षत्रिय राजा से ऋषि बने विश्वामित्र भृगु ऋषि के वंशज थे। भगवान राम के पास जितने भी दिव्यास्त्र थे, वे सब विश्वामित्र ऋषि के दिए हुए थे। विश्वामित्र को अपने जमाने का सबसे बड़ा आयुध अविष्कारक माना जाता है। उन्होंने ब्रह्मा के समकक्ष एक और सृष्टि की रचना कर डाली थी।

द्रोणाचार्य - द्वापरयुग में कौरवों और पांडवों के गुरु रहे द्रोणाचार्य भी श्रेष्ठ शिक्षकों की श्रेणी में काफी सम्मान से गिने जाते हैं। द्रोणाचार्य ने अर्जुन जैसे योद्धा को शिक्षित किया, जिसने पूरे महाभारत युद्ध का परिणाम अपने पराक्रम के बल पर बदल दिया। द्रोणाचार्य अपने युग के श्रेष्ठतम शिक्षक थे।

चाणक्य - आचार्य विष्णु गुप्त यानी चाणक्य कलयुग के पहले युगनायक माने गए हैं। दुनिया के सबसे पहले राजनीतिक षडयंत्र के रचयिता आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य जैसे साधारण भारतीय युवक को सिकंदर और धनानंद जैसे महान सम्राटों के सामने खड़ाकर कूटनीतिक युद्ध कराए। चंद्रगुप्त मौर्य को अखंड भारत का सम्राट बनाया। पहली बार छोटे-छोटे जनपदों और राज्यों में बंटे भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य आचार्य चाणक्य ने किया था। वे मूलत: अर्थशास्त्र के शिक्षक थे लेकिन उनकी असाधारण राजनीतिक समझ के कारण वे बहुत बड़े रणनीतिकार माने गए।

रामकृष्ण परमहंस - स्वामी विवेकानंद के गुरु आचार्य रामकृष्ण परमहंस भक्तों की श्रेणी में श्रेष्ठ माने गए हैं। मां काली के भक्त श्री परमहंस प्रेममार्गी भक्ति के समर्थक थे। ऐसा माना जाता है कि समाधि की अवस्था में वे मां काली से साक्षात वार्तालाप किया करते थे। उन्हीं की शिक्षा और ज्ञान से स्वामी विवेकानंद ने दुनिया में हिंदू धर्म की पताका फहराई।

जानिए, गणपति हैं सबसे बड़े टीचर! सिखाते हैं जीवन के ये सूत्र
टीचर्स-डे यानी 5 सितंबर को हम अपने-अपने शिक्षकों को नमन करते हैं। जो केवल पढ़ता है वो ही शिक्षक नहीं है। किसी से भी हम कुछ भी सीख सकते हैं। भारत विश्व गुरु है और हमारे धर्म में हर चीज को जीवन से जोड़कर देखा गया है। गणेशोत्सव में हम सबसे बड़े मैनेजमेंट गुरु गणपति की खास बातों को जानेंगे। गणपति एकमात्र ऐसे देवता है जिनका हर रूप कोई शिक्षा देता है, जीवन जीने का सलीका सिखाता है।

भगवान गणपति बुद्धि के देवता है। वे जीवन को मैनेजमेंट के तरीके से जीना सिखाते हैं। गणपति का हर रूप, उनसे जुड़ी हर बात कोई संकेत करती है, मैनेजमेंट के सूत्र बताती है। आइए जानते हैं कि गणपति से हम क्या-क्या सीख सकते हैं:-

बड़ा सिर - गणपति का बड़ा सिर बड़े दिमाग की ओर संकेत करती है। मैनेजमेंट का पहला सूत्र ही यही है कि आपकी सोचने, याद रखने और बातों को रखने के लिए बड़ी बुद्धि की आवश्यकता होती है। हमेशा अपना दिमाग खुला और विस्तृत रखें, संकीर्ण या छोटी सोच से जीत नहीं मिल सकती।

बड़ी और झुकी आंखें - गणपति की आंखें इशारा करती हैं हमारे दृष्टिकोण की ओर। हाथी की आंखों की बनावट इस तरह की होती है कि उसे हर चीज खुद के बराबर नजर आती है। हम किसी को छोटा या कम नहीं आकें। हर इंसान की अपनी खूबी और महत्व होता है।

सूंड या लंबी नाक - यह हमारी दूरदर्शिता की ओर इंगित करती है। लंबी नाक यानी परिस्थितियों को दूर से ही सूंघ कर उसके मुताबिक अपनी योजना बनाना।

बड़े कान - बड़े कान कहते हैं अपने से जुड़े हर व्यक्ति की बात सुनिए। कोई छोटा व्यक्ति भी आपको महत्वपूर्ण सलाह दे सकता है। सबकी सुनिए।

बड़ा पेट - बड़ा पेट संकेत है कि आप अपनी बातों को, योजनाओं को, महत्वपूर्ण और गुप्त मुद्दों को कितना पचा पाते हैं। कई लोग अपने पेट में कोई भी बात नहीं टिका पाते हैं। गणपति कहते हैं कि अगर आप को सफल टीम लीडर बनना है तो आप अपनी बातों को गुप्त रखना सीखें।

चूहा - गणपति का वाहन चूहा है। हाथी जैसे शरीर चूहे पर कैसे बैठ सकता है, यह अजीब लगता है लेकिन यह सच है। गणपति बुद्धि के देवता है, बुद्धि कितनी भी बड़ी हो लेकिन उसे चलाने के लिए तर्क का सहारा चाहिए। चूहा तर्क का प्रतीक है। ज्ञान वही सफल होता है, जिसके पास अपना सही तर्क हो। तर्क छोटा लेकिन महत्वपूर्ण होता है।

पत्नी रिद्धि-सिद्धि - भगवान गणपति की दो पत्नियां हैं रिद्धि और सिद्धि। रिद्धि का अर्थ है हमारी कार्यकुशलता को सहेज कर रखना। सिद्धि का अर्थ है कार्यकुशलता। अगर आपके पास बुद्धि है तो कार्यकुशलता भी आएगी, और यह कार्यकुशलता हमेशा बनी रहेगी।

पुत्र योग और क्षेम - गणपति के दो पुत्र हैं योग और क्षेम। योग का अर्थ होता है जोड़। जिसका अर्थ आर्थिक लाभ से लगाया जाता है। बुद्धि हो तो कार्यकुशलता और कार्यकशलता हो तो आर्थिक लाभ मिलता है। क्षेम का अर्थ है जो भी आर्थिक लाभ है वह सुरक्षित रहे।


राधाजन्माष्टमी 5 को, सुख-समृद्धि देता है यह व्रत

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाजन्माष्टमी का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इसी दिन श्रीकृष्णप्रिया श्रीराधिकाजी का जन्म वृषभानुपुरी नामक नगर में हुआ था। शास्त्रों के अनुसार वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु शास्त्रों के ज्ञाता तथा श्रीकृष्ण के आराधक थे। उनकी पत्नी श्रीकीर्तिदा के गर्भ से भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मध्याह्न काल में श्रीराधिकाजी का जन्म हुआ था। इस बार यह पर्व 5 सितंबर, सोमवार को है।

व्रत विधान
श्रीराधाजन्माष्टमी के दिन व्रत रखकर उनकी पूजा करें। श्रीराधाकृष्ण के मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाला, वस्त्र, तोरण आदि अर्पित करें तथा श्रीराधाकृष्ण की प्रतिमा को सुगंधित पुष्प, धूप, गंध आदि से सुसज्जित करें। मंदिर के बीच में पांच रंगों से मंडप बनाकर उसके अंदर सोलह दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं। उस कमलयंत्र के बीच में श्रीराधाकृष्ण की युगल मूर्ति पश्चिम दिशा में मुख कर स्थापित करें तत्पश्चात अपनी शक्ति के अनुसार पूजा की सामग्री से उनकी पूजा अर्चना कर नैवेद्य चढ़ाएं। दिन में इस प्रकार पूजा करने के पश्चात रात में जागरण करें। जागरण के दौरान भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण व राधा के भजनों को सुनें।

शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य इस प्रकार श्रीराधाष्टमी का व्रत करता है उसके घर सदा लक्ष्मी निवास करती है। यह व्रत सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला है। जो भक्त इस व्रत को करते हैं उसे विष्णुलोक में स्थान मिलता है।

जानिए, कैसा होता है यमलोक?
धर्मनगर में नारदादि ऋषियों के जाने योग्य मार्ग बड़े पुण्य से प्राप्त होता है। वह तुमसे कहता हूं। दक्षिण और नैऋत्यकोण के मध्य में यमराजपुर है, वह हीरा आदि मणियों से निर्मित देव दानव में अभेद्य है। वह नगर चतुष्कोण है, उसके चार दरवाजे है, रास्ता चार सौ कौस लंबा और चौड़ा है। उस पुर में चित्रगुप्त का सुंदर मंदिर है। जो पच्चीस योजन लंबा और चौड़ा है। अढ़ाई सौ योजन ऊंचा और बहुत सुंदर है।उद्यान आदि भी बहुत रमणीय है। वहां अनेक तरह के पक्षी हैं। जिसके चारो ओर गंधर्व, अप्सराएं गान कर रही हैं।

ऐसा वह चित्रगुप्त का भवन है। उस सभा में अपने आसान पर चित्रगुप्त बैठे हुए सब प्राणियों की आयु की ठीक-ठीक गणना करते है। जीवों के अच्छे या बुरे कर्म के हिसाब में मोहित नहीं होते हुए जिसने शुभ या अशुभ कर्म किया है। उसको उस यमलोक में चित्रगुप्त के शासन से भोगना पड़ता है। चित्रगुप्त के गृह से पूर्वदिशा में ज्वर का महागृह है। दक्षिण दिशा में शूलरोग, मकड़ीरोग, विस्फोटकादि रोग गृह हैं। पश्चिम दिशा में कालपाश अजीर्ण और अरूचि घर है। उत्तर दिशा में राजरोग, पाण्डुरोग का गृह है, ईशानकोण में शिर के रोग है, अग्रिकोण में मूर्छारोग है, नैऋत्यकोण में अतिसार रोग, वायव्य कोण में शीतज्वर, दाहज्वर इस प्रकार अनेक व्याधिया रहती हैं। चित्रगुप्त सब प्राणियों का शुभ-अशुभ लिखते हैं। चित्रगुप्त के गृह से बीस योजन आगे बड़ा सुंदर धर्मराज मंदिर है।

शरदऋतु के अभ्र जैसी शोभा और स्वर्ण कलश द्वारा सुमनोहर चित्र स्फटिक मणि की साढिय़ां ही मणि और सुशोभित हो लाल है। मोतियों की जालियों से जडि़त खिड़कियां है। ध्वजा पताका, घंटिया और फूलों से लदी बैले हैं। इस मंदिर में एक सभा है जहां का मौसम न अधिक गर्म है ना अधिक सर्द है। उस सभा में मनोकामना पूरी करने वाले भी कई वृक्ष है। वहां किसी को भी दुख नहीं होता। वहां किसी को भी व्यथा नहीं होती। सभी के इच्छानुकूल सभा है। जिसको बहुत समय तक तपस्या कर विश्वकर्मा ने रचा है।

उग्र तपस्वी, सुव्रती, सत्यव्रती, शांतस्वरूपी, सन्यासी, सिद्ध पवित्र कर्म करने वाले ऐसे जीव वहां जाते हैं। वस्त्र अलंकार सहित स्वकर्म पुण्य से वहां शोभित होते हुए रहते है। उस सभा के मध्य में अनुपमा युक्त भगवान सिंहासन पर विराजमान है। वह दशयोजन सब रत्नो से अलंकृत है। नीलमेघ धर्मराज के समान है कांति जिसकी अलंकार युक्त तथा हाथों में पंखा लेकर अप्सराएं हवा कर रही है। गंधर्वों का झुण्ड अप्सराओं का समूह गीत और नृत्य से धर्मराज की सेवा कर रही है।

घर के इन 5 स्थानों पर हर रोज होती है हिंसा! जानें, कैसे बचें?
धर्म का पालन जीवन में संयम, अनुशासन लाकर सुख, शांति लाता है। जो व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके लिए धर्म परंपराओं में आस्था और विश्वास बहुत जरूरी है। इसी कड़ी में शास्त्रों की मानें तो हर घर में हिंसा के ऐसे पांच स्थान होते हैं। जहां न चाहकर भी कुछ जीवों की हिंसा हो जाती है। लिखा गया है कि -

पञ्चसूना गृहस्थस्य चुल्की पेषण्युपुष्कर:।

कण्डनी चोदकुम्भश्च वध्यते वास्तु वाहयन्।।

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभि:।

पञ्च क्लृप्ता महायज्ञा: प्रत्यहं गृहमेधिनाम्।।

मनुस्मृति के इस श्लोक के मुताबिक नीचे बताएं घर के पांच स्थानों पर हर रोज हिंसा होती है। इस हिंसा शांति के लिए पञ्च महायज्ञों को जरूर करना चाहिए। खासतौर पर द्विज यानी जनेऊधारी या ब्राह्मण को ये कर्म नहीं भूलना चाहिए। जानते हैं वह पांच स्थान और पंच महायज्ञों के नाम -

- चूल्हा या रसोई बनाने का साधन व स्थान।

- चक्की यानी अनाज पीसने या आटा तैयार करने का यंत्र।

- झाडू या वे स्थान, जहां-जहां सफाई की जाए

- ओखली या अन्न या अन्य खाद्य सामग्री कूटने का पात्र या स्थान

- पानी का घड़ा या जल पात्र और जल रखने या भरने का स्थान

इन स्थानों पर कार्य के दौरान अन्न, जल या भूमि में रहने वाले छोटे-छोटे, सूक्ष्म जीवों की मृत्यु हो जाती है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से पाप या दोष शमन का उपाय नीचे बताए पांच महायज्ञ है -

- ब्रह्मयज्ञ -

- देवयज्ञ

- भूतयज्ञ

- पितृयज्ञ

- मनुष्य यज्ञ

करें ये 5 चमत्कारी धार्मिक काम.. घर में रहेगा सुख और वैभव
हिन्दू धर्म परंपराओं में यज्ञ-हवन के पीछे त्याग और विश्व कल्याण का भाव जुड़ा है। अनेक तरह के यज्ञ से जुड़ी त्याग की भावना हर इंसान को स्वार्थ, अहं की भावना से मुक्त कर दोष और पापरहित बना देता है।

शास्त्रों में यज्ञों के अलग-अलग स्वरूपों में पांच यज्ञ ऐसे बताए गए हैं, जो घर में हुए अनचाहे-अनजाने पाप और दोष का नाश करते हैं। ये कर्म, विचार और व्यवहार को पवित्र बनाकर जीवन और गृहस्थी में अपार सुख-शांति लाने वाले माने गए हैं। इसलिए इनको महायज्ञ भी पुकारा जाता है। धार्मिक दृष्टि से ये हर रोज दिनचर्या के दौरान ही संपन्न होते हैं।

जानें कौन से और कैसे होते हैं ये पांच महायज्ञ? -

ब्रह्मयज्ञ - हर रोज वेदों का अध्ययन करने से ब्रह्मयज्ञ होता है। वेदों के अलावा पुराण, उपनिषद, महाभारत, गीता या अध्यात्म विद्याओं के पाठ से भी यह यज्ञ पूरा हो जाता है। यह न हो तो मात्र गायत्री साधना भी ब्रह्मयज्ञ संपूर्ण कर देती है। धार्मिक दृष्टि से इस यज्ञ से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। इसलिए इसे ऋषियज्ञ या स्वाध्याय यज्ञ भी कहा जाता है।

देवयज्ञ - देवी-देवताओं की प्रसन्नता के लिए हवन करना देवयज्ञ कहलाता है।

भूतयज्ञ - कीट-पतंगों, पशु-पक्षी, कृमि या धाता-विधाता स्वरूप भूतादि देवताओं के लिए अन्न या भोजन अर्पित करना भूतयज्ञ कहलाता है।

पितृयज्ञ - मृत पितरों की संतुष्टि व तृप्ति के लिये अन्न-जल समर्पित करना पितृयज्ञ कहलाता है। जिससे पितरों की असीम कृपा से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। अमावस्या, श्राद्धपक्ष आदि इसके लिये विशेष दिन है।

मनुष्य यज्ञ - घर के दरवाजे पर आए अतिथि को अन्न, वस्त्र, धन से तृप्त करना या दिव्य पुरुषो के लिए अन्न दान आदि मनुष्य यज्ञ कहलाता है।

जानें, कौन-सी है दुर्लभ नवनिधियां और उनसे मिलता है कैसा वैभव?
धर्मग्रंथों में चमत्कारी अष्टसिद्धि और अद्भुत नवनिधियों की शक्तियां व गुण विलक्षण बनाने वाली बताई गई है। इस बात का प्रमाण बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान हैं। मान्यता है कि श्री हनुमान माता सीता के आशीर्वाद से इन अष्टनिधि व नवनिधियों के स्वामी बने।

कलयुग की बात करें तो हर इंसान धन, ऐश्वर्य की चाहत रखता है। किंतु उसके लिए ऐसी नवनिधि आज दुर्लभ है। धर्मग्रंथों में इन दुर्लभ नवनिधियों के लक्षणों को ही मनुष्य स्वभाव से जोड़कर उस इंसान के वैभव व स्वभाव के बारे में लिखा गया है।

शास्त्रों के मुताबिक भगवान विष्णु द्वारा ब्रह्मदेव को बताया गया कि अलग-अलग नवनिधियोंं के लक्षणों वाले इंसान का स्वभाव और ऐश्वर्य कैसा होता है? जानते हैं -

नवनिधि यानी नो निधियां। ये हैं - पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द या नन्द, नील, शंख और मिश्र।

पद्म - इस नवनिधि के स्वभाव वाला इंसान दानी और पवित्र आचरण वाला होता है। वह सोने-चांदी और अनमोल वस्तुओं को कमाता है। जिनको वह देव, साधुओं, यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों को दान भी करता है।

महापद्म - इस निधि के लक्षण वाला इंसान भी पद्मनिधि की भांति सात्विक व अपार धन संग्रह कर दान करने वाला होता है।

मकर - इस निधि के लक्षणों के प्रभाव से इंसान अस्त्र-शस्त्र संग्रह करता है। उसका राजा और शासन में संपर्क होता है। ब्राह्मणों को दान करता है। वह शत्रुओं पर भारी पड़ता है और युद्ध की लिये तैयार रहता है।

कच्छप - ऐसा इंसान तामसी यानी क्रूर या बुरे स्वभाव का होता है। वह किसी पर भरोसा नहीं करता। न वह अपने धन-संपदा का स्वयं उपयोग करता है और न दान। इसलिए ऐसे इंसान की धन संपदा एक पीढ़ी तक ही सुरक्षित रहती है।

मुकुन्द - ऐसा इंसान राजसी गुणों वाला यानी सत्ता और धन बंटोरकर सुख-सुविधाओं का भरपूर उपभोग करता है।

नन्द - ऐसे मनुष्य में रज और तम दोनों गुण होते हैं। जिसके चलते वह कुटुंब की नींव होता है। तारीफ से खुश होता है। अनेक स्त्रियों का जीवनसाथी बनता है। पुराने मित्र छोड़कर नए मित्र बनाता रहता है।

नील - ऐसा इंसान मधुर स्वभाव वाला व परोपकारी होता है। वह वस्त्र, धन व अन्न का दान कमजोर व गरीबों को करता है। जनहित के काम करता है। उसकी तीन पीढ़ी उसकी धन-संपत्ति का सुख भोगती है।

शंख - ऐसा इंसान धन का उपयोग स्वयं के सुख-भोग करता है। जिससे उसका परिवार दरिद्रता में जीवन गुजारता है। ऐसा इंसान अनुपयोगी वस्तुओं का दान करता है।

मिश्र - नाम के अनुरूप ही ऐसा इंसान अन्य आठ निधियों के मिले-जुले स्वभाव वाला होता है। जिससे उसका जीवन व व्यवहार उतार-चढ़ाव भरा होता है।

ये 3 बुरे काम कर देते हैं जीवन का बेड़ा गर्क
अक्सर जीवन में असफलता व दु:खों के पीछे स्वयं के बुरे काम, सोच और व्यवहार होते हैं। शास्त्र भी यही कहते हैं कि कर्म के मुताबिक ही नतीजे मिलते हैं। हालांकि व्यावहारिक रूप से अनेक अवसरों पर ऐसा लगता है कि दूसरों के द्वारा हानि पहुंचाई गई। किंतु असल में स्वयं के व्यक्तित्व, चरित्र की कोई न कोई कमजोरी से विरोधी या शत्रु नुकसान करने में सफल हो जाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में कर्म और व्यवहार ऐसे ही 3 दोष बताए गए हैं, जो न केवल मन, बुद्धि, स्वभाव और आचरण में विकृति लाते हैं, बल्कि इनसे मिले बुरे परिणाम व्यवहारिक जीवन में भी उथल-पुथल मचा सकते हैं। इसलिए सुखी जीवन की कामना है तो यहां बताए जा रहे 3 कामों से जरूर दूरी बनाए रखना चाहिए-

लिखा गया है कि -

हरणं च परस्वानां परदारभिमर्शनम्।

सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषा: क्षयावहा:।।

सरल शब्दो में अर्थ यही है कि जीवन में तीन काम या दोष निश्चित रूप से पतन या नाश का कारण बन जाते हैं। ये हैं -

दूसरों की धन-संपत्ति हड़पना - यह कर्म में लालच, लोभ या स्वार्थ के वशीभूत होता है। धर्म के नजरिए से ये भाव दूषित और जीवन के लिये घातक होते हैं।

दूसरों की स्त्री से संबंध बनाना - संयम, संकल्प और अच्छे विचारों का अभाव इस बुरे कर्म में लिप्त करता है और भारी कलह, रोग और अपयश का कारण बनता है।

सज्जन व गुणी मित्र को छोड़ देना - अच्छी और बुरी संगति जीवन की दिशा तय करती है। ऐसे में सज्जन और गुणी मित्र, जो निस्वार्थ प्रेम, सहयोग और भावना से भरा हो, की उपेक्षा या अपमान किसी भी रूप में हानि ही करता है।

हमेशा हाथ मलते रहेंगे..अगर न बदली ये 2 आदतें
जीवन में हमेशा बुरा वक्त ही दु:ख, असंतोष या पीड़ा का कारण नहीं होता। बल्कि सच यह है कि इंसान की सोच ही उसके सुख-दु:ख को काफी हद तक नियत करते हैं। सही सोच सही दिशा और सही नतीजे तक पहुंचाने में मददगार होती है। वहीं गलत नजरिया भटकाव व असफलता का मुंह दिखाता है।

अच्छे विचार, व्यवहार और कर्म की राह जानने के लिए धर्मग्रंथों की बातें श्रेष्ठ उपाय है। क्योंकि इनमें जीवन से जुड़े वही सूत्र हैं, जिनसे अनजान होने पर इंसान ठोकरें खाता है। हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में भी यशस्वी व सफल जीवन के लिये सही सोच और आदतों की अहमियत बताते हुए कुछ खास सूत्रों बताए गए हैं।

ऐसे ही एक सूत्र में सुखी जीवन के लिये दो गलत सोच या आदतों को छोडऩे के संकेत दिए गए हैं। जिससे जीवन में हमेशा सुखी भी रहा जा सकता है। जानते हैं क्या है ये सूत्र -

लिखा गया है कि -

द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बध्वा दृढां शिलाम्।

धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातस्विनम्।।

इस श्लोक के संकेत को सरल शब्दों में समझें तो नीचे बताई दो आदतें या विचार जीवन में दु:ख कारण बताई गई है। यहां तक कि ऐसे दोषी मुनष्य को पत्थर बांधकर पानी में डूबो देने की बात कही गई है। जिसमें गुढ़ता यही है कि गलत सोच का इंसान निजी और दूसरों के जीवन में कलह घोलता है। जानें, क्या है यह 2 गलत सोच?

धनवान होने पर भी दान न देना - धर्म पालन का अहम अंग दान माना गया है। दान स्वार्थ, अहं जैसे दोष दूर कर परोपकार, दया व प्रेम के भाव पैदा करता है। किंतु सक्षम होने पर भी ऐसा न करना वैचारिक व व्यावहारिक दोषों की पहचान है, जो अपयश का कारण भी बनते हैं।

दरिद्रता में दु:ख न सह सके - अगर कर्महीनता या वक्त की मार से भी दरिद्रता या अभाव देखना पड़े तो उसे पूरी सहनशीलता और सकारात्मक सोच से स्वीकार करना चाहिए। किंतु ऐसा न करने वाले मनुष्य के जीवन में व्यर्थ अंसतोष व बेचैनी मुश्किलें पैदा करती है। इसलिए कर्मप्रधान जीवन ही श्रेष्ठ बताया गया है।

सार यही है कि उदारता, धैर्य व सहनशीलता में यश व सफलता के नायाब सूत्र छुपे हैं। जिनको समझ कोई भी इंसान यशस्वी व कामयाब जीवन बिता सकता है।

नजरों का ऐसा कमाल भी बना देता है यशस्वी व सफल
कहा जाता है कि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। दृष्टि ही मन व विचार पर असर डालती है। दृष्ष्टि से बने विचार ही आपके व्यक्ति, वस्तु, स्थान या विषय से नजदीकी या दूरी बनाते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में इंद्रिय संयम द्वारा आंख या दृष्टि की पवित्रता को भी स्वस्थ्य व सुखी जीवन के लिये अहम बताया है। क्योंकि नजरों की पावनता ही आपके देखने और सोचने के ढंग को सही दिशा देती है।

दृष्टि, बुद्धि व विचारों के संबंध को बेहतर तरीके से समझना है तो भगवान गणेश के दर्शन के वक्त उनके बड़े नेत्र यानी आंखों पर जरूर गौर करें। क्योंकि ये अच्छी नजर से ही जीवन में यशस्वी व सफल बनने के बहुत ही बेहतर सूत्र सिखाती हैं। जानते हैं क्या है बुद्धिदाता श्री गणेश के नेत्रों में सफलता का सूत्र?

श्री गणेश बुद्धिदाता देवता है। गजमुख उनके स्वरूप की विशेषता है। गज यानी हाथी बुद्धिमान माना जाता है। उसकी आंखों की भी खासियत मानी जाती है कि वे दृश्यों को सामान्य से अधिक बड़े आकार में देखती है। ऐसी विलक्षणता के पीछे दर्शन यही नजर आता है कि हाथी जैसा बलवान व विशाल प्राणी अपनी शक्तियों से दूसरों को हानि न पहुंचाए। क्योंकि उसे सारे वस्तु या प्राणी खुद से बड़े ही नजर आते हैं।

इस तरह गणेश के मुख पर सुंदर नेत्र भी संकेत देते हैं कि व्यावहारिक रूप में भी अगर शांत, सुखी जीवन जीना है तो दूसरों के लिए सम्मान की दृष्टि रखें। किसी भी तरह से शक्तिसंपन्न होने पर दूसरों के साथ यह नजरिया रख व्यवहार न करें कि वह कमजोर या कमतर है। बल्कि पूरी विनम्रता, बड़प्पन रख दूसरों को भरपूर मान दे। दृष्टि, बुद्धि, विवेक और विचार का ऐसा गठबंधन अपार यश, प्रेम, मदद, सफलता और प्रतिष्ठा लेकर आता है।

यही नहीं हर व्यक्ति अगर अपनी दृष्टि में इतनी पावनता रखें कि जो भी वह देखे, उसके लिए बना विचार सुंदर व बेजोड़ होने के साथ जगत के लिये हितकारी हो, तो व्यक्ति को आम से खास बनने में देर नहीं लगती। सरल शब्दों में कहें तो नज़रों का जादू भी यशस्वी और सफलता देने वाला होता है। खासतौर पर गजानन का दृष्टिपात तो शुभ व मंगलकारी ही होता है।

पकडें सिर्फ यह 1 सूत्र..और लक्ष्मी कृपा बना देगी सबसे बड़ा धनी
अक्सर लक्ष्मी का संबंध मात्र धन-दौलत, संपत्ति के अर्थ में लिया जाता है। जबकि जीवन में लक्ष्मी की अहमियत अनेक रूपो में है। किंतु भौतिक सुख-सुविधाओं के इस दौर में हर इंसान धन रूपी लक्ष्मी के दर्शन व कृपा को ही पसंद करता है। चाहे फिर वह किसी भी तरीके या रूप में आए। जबकि शास्त्रों की बातों को निचोड़ समझें तो लक्ष्मी कृपा के लिए अगर एक बात ही जीवन में संकल्प के साथ अपना ली जाए तो लक्ष्मी अपने पूर्ण स्वरूप में इंसान पर मेहरबान हो जाती है। क्या है लक्ष्मी कृपा यह अहम सूत्र? जानते हैं..

दरअसल, लक्ष्मी का संबंध शुद्धता, पवित्रता या शुचिता से है। पावनता का यही भाव जीवन के हर कर्म, व्यवहार और विचार में उतारने वाला ही लक्ष्मी की संपूर्ण कृपा का पात्र बन जाता है। लक्ष्मी उपासना के विशेष अवसरों पर सफाई या स्वच्छता की पीछे भी यही संदेश व भाव होता है।

असल में मन और विचारों की शुद्धता भी लक्ष्मी का रूप है। क्योंकि ऐसा होने पर ही इंसान के जीवन में तमाम सद्गुण जैसे सत्य, प्रेम, दया, संकल्प, इच्छाशक्ति, परोपकार और संस्कार प्रवेश करते हैं। जिनके द्वारा ही कोई भी व्यक्ति कर्म और सेवा से धन, ऐश्वर्य के साथ सुख-शांति रूपी महालक्ष्मी का स्वामी बन सकता है। यहां तक कि इतना सबल बन सकता है कि नामुमकिन को भी मुमकिन करने में समर्थ हो जाता है।

लक्ष्मी की प्रसन्नता का एकमात्र यही सूत्र जन्म ही नहीं मृत्यु को भी सुधार कर शास्त्रों की इस बात को सार्थक साबित कर देता है -

ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।।

यानी ईश्वर असत्य से सत्य की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर ले चले और मृत्यु से मुक्त कर अमरत्व प्रदान करे। यह सभी भाव पावनता को अपनाए बिना संभव नहीं।

सुबह मां गायत्री का होता है यह दिव्य रूप, जिसके दर्शन से मिले यह शक्ति
मां गायत्री वेदमाता पुकारी जाती है। वेद ज्ञान रूपी शक्ति है। मान्यता है कि यह ज्ञानरूपी शक्ति ही ब्रह्मदेव के रूप में प्रकट हुई। ब्रह्मदेव द्वारा ही अलग-अलग लोक रचकर उनको चार वेदों के रूप में बांटी गई ज्ञान शक्ति से संपन्न किया। संसार व धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष भी यही शक्ति समाई है। इसलिए पूरा जगत ही गायत्री शक्ति का स्वरूप माना जाता है।

यही कारण है कि गायत्री साधना देव भाव से करना अहम माना गया है। किंतु अगर गायत्री के साकार रूप में उपासना की बात आती है तो शास्त्रों में मां गायत्री के तीन अलग-अलग काल में तीन रूप बताए गए हैं, जिनके दर्शन अलग-अलग शक्तियां देने वाले माने गए हैं। जानते हैं सुबह मां गायत्री के दिव्य रूप को -

सुबह का वक्त ब्रह्ममुहूर्त भी पुकारा जाता है। इसलिए इस काल में मां गायत्री ब्राह्मी नाम से पूजनीय है। इसे कुमारिका रूप भी पुकारा जाता है। जिसमें उनका तेज उगते सूर्य के लाल रंग की भांति ही होता है। वह हंस पर बैठी तीन नेत्रों वाली होती है। साथ ही वह पाश, अंकुश, अक्षमाला, कमण्डलु, ऋग्वेद और ब्रह्मशक्ति से संपन्न होती है।

मां गायत्री का यह दिव्य स्वरूप जीवन को प्रेरणा और शक्ति देता है। उनकी तरुणाई बचपन की तरह शुद्ध भाव व चंचलता, लाल आभा खून की तरह गति, हंस पर बैठना प्राणों पर नियंत्रण, पाश - बंधन, अंकुश - नियंत्रण, ऋग्वेद - ज्ञान शक्ति का प्रतीक है।

यही कारण है कि कि सुबह गायत्री साधना से ये सभी शक्तियां साधक को प्राप्त होती हैं। चूंकि गायत्री के इस रूप का निवास पृथ्वी लोक माना जाता है। प्रतीकात्मक रूप से शरीर भी आधार या भूलोक के समान है। इसलिए सूर्य उदय के काल में ब्राह्मी यानी गायत्री की साधना सूर्य की भांति ही शरीर को स्वस्थ्य, सुंदर व ऊर्जावान रख प्राणशक्ति देने वाली मानी गई है।

जानें, कैसे पहुंचता है पितरों तक श्राद्ध का भोजन?
हिन्दू धर्म शास्त्रों के मुताबिक इंसान के जीवन में तीन ऋण ऋषि ऋण, देव ऋण व पित ऋण का उतारना अहम माना गया है। इनमें पितृऋण से मुक्ति के लिए ही श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों का विशेष महत्व बताया गया है। खासतौर पर मृत परिजन की मृत्यु के बाद साल भर और उसके आगे भी मृतात्मा या पुरखों की शांति और तृप्ति या मोक्ष के लिए श्राद्धकर्म बहुत ही जरूरी बताया गया है।

शास्त्रों में यह पितृयज्ञ भी पुकारा जाता है किंतु इसमें किए जाने वाले कर्म में मूल भाव पितृगण यानि पितरों के लिए श्रद्धा होने से यह श्राद्ध भी कहलाते हैं। किंतु धर्म से परे नजरिए से अनेक लोगों के मन में यह जिज्ञासा होती है कि श्राद्ध कर्म में तर्पण, भोजन या ग्रास द्वारा पूर्वज कैसे तृप्त होते हैं या भोजन प्राप्त करते हैं? इसी जिज्ञासा को शास्त्रों में बताई बातें हल करती हैं -

शास्त्रों के मुताबिक देह पंचभूतों या पांच तत्वों - जल, अग्रि, पृथ्वी, वायु, व आकाश के अलावा पांच कर्मेन्द्रियों यानी हाथ-पैर आदि मिलाकर कुल 27 अन्य तत्वों से बनी है। परंतु मृत्यु होने पर देह पंचभूतों और कर्मेंन्द्रियों को छोड़ देती है। किंतु बाकी 17 तत्वों से बना अदृश्य और सूक्ष्म शरीर इसी संसार में बना रहता है।

मान्यता है कि यही सूक्ष्म देह सांसारिक आसक्ति की वजह से साल भर तक अपने मूल स्थान, घर और परिवार के निकट ही रहता है। किंतु स्थूल शरीर न होने से उसे किसी भी सुख का आनंद नहीं मिलता और कामनाएं पूरी न होने से वह असंतुष्ट रहता है। यह समय बीतने पर वह अपने कर्म के मुताबिक अलग-अलग योनियों को प्राप्त करता है, जो जनम-मरण केचक्र से गुजरती हैं।

यही कारण है कि जब पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म द्वारा पूर्वजों को स्मरण कर धूप, तर्पण, ब्रह्मभोज किया जाता है तो मंत्र, गंध, रस व भाव के रूप में भोजन व हर सुख सूक्ष्म रूप में सूक्ष्म शरीर या अलग-अलग योनि में घूम रहे पूर्वजों को मिलते हैं और वह तृप्त होते हैं। इसके लिए पितृपक्ष काल बहुत ही शुभ माना गया है। क्योंकि माना जाता है इस काल में वह भूलोक में परिजनों के करीब आते हैं।

जानें, किन कामों से होती है कैसी मृत्यु?
मृत्यु अटल सत्य है। इसलिए शास्त्रों में न केवल जीवन के रहते अच्छे या बुरे कर्मों को सुख और दु:ख का कारण बताया गया है, बल्कि इन सद्कर्मों व दुष्कर्मों को सुखद व दु:खद मृत्यु नियत करने वाला भी बताया गया है। जिसे दूसरे शब्दों में सद्गति व दुर्गति भी पुकारा जाता है। इसलिए हर ग्रंथ में हमेशा अच्छे गुण, विचार व आचरण को अपनाने की सीख दी गई है।

हिन्दू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में जीवन में किए अच्छे-बुरे कामों के मुताबिक मृत्यु के वक्त कैसे हालात बनते हैं? के बारे में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं बताया है। जानते हैं किस काम से कैसी मौत मिलती है?..

- जो लोग सत्य बोलते हैं, ईश्वर में आस्था और विश्वास रखते हैं, विश्वासघाती नहीं होते, उनकी मृत्यु सुखद होती है।

- जो लोग आसक्ति, मोह का उपदेश और अविद्या या अज्ञानता फैलाते हैं, वे मृत्यु के समय बहुत ही कष्ट उठाते हैं।

- झूठ बोलने वाला, झूठी गवाही देने वाला, भरोसा तोडऩे वाला, शास्त्र व वेदों की बुराई करने वालों की दुर्गति सबसे अधिक होती है। वह बेहोशी में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही नहीं उनको लेने के लिये भयानक रूप और गंध वाले यमदूत आते हैं। जिसे देखकर जीव कांपने लगता है। तब वह माता-पिता व पुत्र को याद कर रोता है। ऐसी हालात में वह चाहकर भी मुंह से साफ नहीं बोल पाता। उसकी आंखे घूमने लगती है। मुंह का पानी सूख जाता है, सांस बढ़ जाती है और अंत में कष्ट से दु:खी होकर प्राण त्याग देता है। मृत्यु को प्राप्त होते ही उसका शरीर सभी के लिए न छूने और घृणा का पात्र बन जाता है।

श्राद्ध में क्यों खिलाया जाता है गो ग्रास?
हिन्दू धर्म में श्राद्धपक्ष का समय पितृऋण से मुक्ति के लिए विशेष काल है। असल में यह परंपरा संस्कार, मर्यादाओं और भावनाओं और जीवन मूल्यों से ओतप्रोत हैं। इसी श्राद्ध परंपरा से जुड़े कुछ विशेष कर्म सुखी जीवन के लिए बहुत ही अच्छे संदेश देते हैं। इनमें से ही एक है - गाय को ग्रास यानी भोजन से पहले उसका कुछ हिस्सा गाय को खिलाना।

श्राद्धपक्ष में गाय को ग्रास देना सिर्फ धार्मिक परंपरा ही नहीं है, बल्कि इसके द्वारा व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए एक अहम जीवन सूत्र है। जानते हैं क्या है गाय को ग्रास देने के पीछे खास संदेश -

सनातन धर्म में गाय पवित्र और पूजनीय प्राणी है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता भी हैं, जिनमें समुद्र मंथन से निकली कामधेनु की महिमा हो या गाय में करोड़ों देवी-देवताओं का वास प्रमुख हैं। व्यावहारिक सत्य भी है कि गाय के दूध से लेकर मूत्र तक शरीर को निरोगी रखने वाले होते हैं।

इस तरह देखा जाए तो पावनता ही गाय का सबसे विशेष गुण है। श्राद्धपक्ष में गो ग्रास भी गाय की तरह कर्म, स्वभाव, चरित्र और आचरण की पवित्रता का अहम संदेश देता है। क्योंकि ऐसा होने पर ही किसी व्यक्ति की परिवार या समाज में मान, प्रतिष्ठा, महत्व और समर्थन बढ़ाएगी।

यही नहीं गाय स्वभाव से अहिंसक प्राणी है। जो सिखाता है कि स्वभाव से भद्र बने। भद्र यानी विनम्र, निडर, खुले और सीधी सोच का इंसान। जिसकी संगति हर कोई पसंद करता है।

इस तरह सार यही है कि गो ग्रास से चरित्र और स्वभाव की पावनता का सूत्र अपनाएं। जिससे मिला यशस्वी और सफल जीवन आपके साथ पूर्वजों का मान-सम्मान बरकरार रखेगा। वैसे ही जैसे गाय और उसकी देह का हर अंश अपेक्षित और पूजनीय है।

इन 2 आसान मंत्रों से दूर करें पितृदोष..मिलेगी भरपूर सुख-शांति
श्राद्धपक्ष में पूर्वजों की प्रसन्नता से सुख बंटोरने का महत्व है। इसके पीछे संदेश यही है कि माता-पिता या पूर्वजों द्वारा जिस भावना और त्याग से संतान का लालन-पालन किया गया, संतान भी उन आदर्शों के साथ माता-पिता की वृद्धावस्था में सेवा और कुंटुब के लिए जिम्मेदारियों का पालन करे। जिससे अगली पीढिय़ों में भी ये जीवन मूल्य जिंदा रहें।

व्यावहारिक रूप से ऐसा न होना अशांति व कलह पैदा करता है। जिसे पितृदोष के रूप में भी देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्रों के नजरिए से कुण्डली में कुछ विशेष ग्रहों की स्थिति या बुरा प्रभाव इसी पितृदोष की पहचान है। इसमें सूर्य के साथ शनि, राहु व केतु आदि भी शामिल होते हैं। जिससे इंसान मानसिक, आर्थिक व शारीरिक रूप से दुर्गति का शिकार हो सकता है।

यही कारण है कि पितृदोष शांति के आसान उपायों में शास्त्रों में 2 आसान व विशेष मंत्र प्रभावी असरदार माने गए हैं। जिनको श्राद्धपक्ष में नियमित रूप से बोलना सुख व शांति लाता है..

हर रोज सूर्योदय से पहले जागकर तांबे के जल भर कलश में सफेद आंकड़े के फूल डालकर उदय होते सूर्य को नीचे लिखे मंत्र का 5, 11 या 21 बार जप करते हुए अर्घ्य दें -

ॐ सूर्याय नम:
सूर्य अर्घ्य के बाद सूर्य प्रतिमा या तस्वीर के साथ पूर्वजों की तस्वीर की भी लाल चंदन, फूल से पूजा व खीर का भोग लगाकर समीप ही पितरों की प्रसन्नता के लिए धूप व दीप लगाएं। उसके बाद पितरों का स्मरण कर नीचे लिखे आसान मंत्रों से कम से कम 21 बार जप कर दीप सूर्य आरती या पितृस्त्रोत का पाठ करें-

ॐ पितराय नम:
अंत में पितरों से प्रसन्नता व खुशहाली की प्रार्थना कर प्रसाद ग्रहण करें।

जब निकलते हैं प्राण तो तन में होता है ऐसा हाहाकार..!
जीवन में रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द के रूप में इंसान अनेक सुखों व आनंद को भोगता है। हालांकि इस दौरान वह दु:ख, संकट यहां तक कि ऐसे कष्टों को सामना करता या दूसरों के जीवन में देखता है जो मृत्यु के समान कहे जाते हैं। लेकिन स्वाभाविक मृत्यु के समय या यूं कहें कि जब शरीर प्राण छोड़ता है तब कैसा अनुभव होता है? यह प्राणी व शरीर विशेष ही जान सकता है। जिससे हर प्राणी गुजरता है।

यही कारण है कि शास्त्रों में सुखी जीवन के लिए अहं का त्याग और अहं से दूर होने के लिए मृत्यु को याद रखना एक बेहतर उपाय बताया गया है। खासतौर पर मृत्यु के वक्त होने वाली पीड़ा हर शरीर भोगता है। जिसे हिन्दू धर्मग्रंथ गरूड़ पुराण में बताया गया है। जानते है जब तन से प्राण निकलते हैं तो क्या-क्या होता है?

मृत्यु काल का ही रूप है। मृत्यु के वक्त शरीर और प्राण अलग हो जाते हैं और यह नियत समय पर ही आती है। मृत्यु पीड़ा से प्राणी सभी कर्म भूल जाता है। सूर्य, चन्द्र, शिव, पंच तत्व, इन्द्र देवादि, प्रकृति, रज, तम, सत्व गुण सभी काल के वश में होकर प्राणी के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं, किंतु मृत्यु के समय यह प्रभावहीन हो जाते हैं।

यही कारण है कि मृत्यु का समय करीब आने पर शरीर में कोई रोग पैदा होता है। इन्द्रियां कमजोर या निष्क्रिय हो जाती हैं। शरीर शक्ति व तेजहीन हो जाता है। यहीं नहीं शरीर में अनेक बिच्छुओं के डंक लगने की पीड़ा जैसा अनुभव होता है। मुंह लार से भर जाता है। इसके बाद ही शरीर जड़ और विकृत रूप ले लेता है।

काल प्राणों को अपनी ओर खींचता है। जिससे प्राण कण्ठ में आते हैं और अंत में अंगुठे के आकार का माना गया प्राण पुरुष बेचैन होकर अपने निवास को देखता हुआ यमदूतों द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।

स्त्री के इन 3 गुणों से खुशहाल हो जाती है गृहस्थी
हिन्दू धर्म में स्त्री शक्ति रूपा मानी गई है। क्योंकि स्त्री जननी या मां की भूमिका में संसार और परिवार को शक्ति संपन्न ही बनाती है। यही कारण है कि शास्त्रों में बताए जीवन यात्रा के चार चरणों में एक गृहस्थ जीवन के लिए स्त्री को ही धुरी माना गया है।

यही कारण है कि जिस तरह शास्त्रों में शिव-शक्ति को एक-दूसरे के बिना अधूरा माना गया है। ठीक उसी तरह गृहस्थ जीवन में स्त्री शक्ति का पुरुष के पुरुषार्थ के साथ बेहतर तालमेल गृहस्थ जीवन को सुखी और शांत रखता है।

इसी कड़ी में गरुड़ पुराण में बताए गए स्त्री धर्म का सकारात्मक पक्ष समझें तो यहां बताए जा रहे गृहस्थ जीवन के सूत्रों को अपनाना आधुनिक समय में भी हर स्त्री के लिये सार्थक साबित हो सकता है। जानते हैं इस धर्मग्रंथ में लिखे स्त्री धर्म के निचोड़ से निकले तीन खास सूत्र -

आज्ञा पालन - स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए यानी हर स्त्री जीवनसाथी की बातों की अनदेखी न करे। बल्कि किसी बात या विषय से सहमत न होनें पर अपने विचार रखकर आपसी तालमेल से गृहस्थी से जुड़े निर्णय ले।

पति का विरोध न करे - सुखद समय में महत्वाकांक्षा या विपरीत विचार या हालात के चलते पैदा मतभेद, अभाव या तनाव में संयम खोकर पति का विरोध करने के बजाए विवेक का उपयोग कर निस्वार्थ भाव से पति के साथ खड़ी रहे। शास्त्र कहते हैं कि जब पति-पत्नी में आपसी कटुता या मतभेद न हो तो गृहस्थी धर्म, अर्थ व काम से सुख-समृद्ध हो जाती है।

चरित्र शुद्धि - पति के जीवित रहते या मृत्यु के बाद पर-पुरुष का आश्रय न लें। यहां संकेत चरित्र की पावनता का है। चूंकि विश्वास और प्रेम गृहस्थी का मूल है। जो पति के साथ रहते और उसके बाद कुटुंब की खुशहाली के लिए भी अहम है। शास्त्रों के मुताबिक ऐसी स्त्री न केवल यशस्वी जीवन को प्राप्त करती है, बल्कि शक्ति और प्रेरणा बन जाती है।

हर उम्र में यश और सफलता देती हैं ये 5 बातें
यश और सफलता ऐसी संजीवनी बूटी है, जिसके मिलते ही इंसान उत्साह, जोश, उमंग व ऊर्जा रूपी प्राणशक्ति से लबरेज हो जाता है। इससे इंसान के कर्म, विचार और व्यवहार को सकारात्मक दिशा मिलती है।

हिन्दू धर्म ग्रंथों में सफल और यशस्वी जीवन के लिए ही इंसान की उम्र को चार भागों में बांट कर चार आश्रम धर्म बताए गए हैं। उम्र की एक नियत अवस्था व कर्म इन आश्रम धर्मों को निभाने के लिये नियत है, जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम के रूप में जाने जाते हैं।

शास्त्रों में अलग-अलग उम्र और कर्म से संबंध होने पर भी पांच बातें ऐसी बताई गई जो हर आश्रम का सामान्य धर्म मानी गई है। आधुनिक जीवन के नजरिए से उम्र के हर पड़ाव पर ये विशेष बातें यश व सफलता सुनिश्चित कर देती हैं। जानते हैं ये 5 बातें -

लिखा गया है कि -

अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशौचे क्षमा दया।

वर्णिनां लिंगिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते।।

इस श्लोक में सीख यही है कि हर अवस्था और स्थान में सुखी रहने के लिए नीचे लिखी पांच बातें अपनाना जरूरी है -

अहिंसा - वाणी, विचार और कर्म से अहिंसा

मधुर और सत्य वाणी - मीठा और सच बोलना

पवित्रता - तन, मन, विचार, व्यवहार व आचरण में शुद्धता का स्थान।

क्षमा - कटु व्यवहार, अपमान या हानि से प्रतिशोध का भाव न आने देना यानी माफ कर देना।

दया - सभी के लिए संवेदना व भावनाओं को मन-मस्तिष्क, कर्म में स्थान देना।

स्त्री के इन 3 गुणों से खुशहाल हो जाती है गृहस्थी
हिन्दू धर्म में स्त्री शक्ति रूपा मानी गई है। क्योंकि स्त्री जननी या मां की भूमिका में संसार और परिवार को शक्ति संपन्न ही बनाती है। यही कारण है कि शास्त्रों में बताए जीवन यात्रा के चार चरणों में एक गृहस्थ जीवन के लिए स्त्री को ही धुरी माना गया है।

यही कारण है कि जिस तरह शास्त्रों में शिव-शक्ति को एक-दूसरे के बिना अधूरा माना गया है। ठीक उसी तरह गृहस्थ जीवन में स्त्री शक्ति का पुरुष के पुरुषार्थ के साथ बेहतर तालमेल गृहस्थ जीवन को सुखी और शांत रखता है।

इसी कड़ी में गरुड़ पुराण में बताए गए स्त्री धर्म का सकारात्मक पक्ष समझें तो यहां बताए जा रहे गृहस्थ जीवन के सूत्रों को अपनाना आधुनिक समय में भी हर स्त्री के लिये सार्थक साबित हो सकता है। जानते हैं इस धर्मग्रंथ में लिखे स्त्री धर्म के निचोड़ से निकले तीन खास सूत्र -

आज्ञा पालन - स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए यानी हर स्त्री जीवनसाथी की बातों की अनदेखी न करे। बल्कि किसी बात या विषय से सहमत न होनें पर अपने विचार रखकर आपसी तालमेल से गृहस्थी से जुड़े निर्णय ले।

पति का विरोध न करे - सुखद समय में महत्वाकांक्षा या विपरीत विचार या हालात के चलते पैदा मतभेद, अभाव या तनाव में संयम खोकर पति का विरोध करने के बजाए विवेक का उपयोग कर निस्वार्थ भाव से पति के साथ खड़ी रहे। शास्त्र कहते हैं कि जब पति-पत्नी में आपसी कटुता या मतभेद न हो तो गृहस्थी धर्म, अर्थ व काम से सुख-समृद्ध हो जाती है।

चरित्र शुद्धि - पति के जीवित रहते या मृत्यु के बाद पर-पुरुष का आश्रय न लें। यहां संकेत चरित्र की पावनता का है। चूंकि विश्वास और प्रेम गृहस्थी का मूल है। जो पति के साथ रहते और उसके बाद कुटुंब की खुशहाली के लिए भी अहम है। शास्त्रों के मुताबिक ऐसी स्त्री न केवल यशस्वी जीवन को प्राप्त करती है, बल्कि शक्ति और प्रेरणा बन जाती है।

पढ़ें ये सवाल..फौरन पता चलेगा जीवन में कहां हो रही है चूक?
आज का समय रफ्तार और भाग-दौड़ से भरा है। शास्त्रों में युगों पहले लिखी बातों का भी सार यही है कि कलियुग में कामनाओं का वर्चस्व होगा। देखा भी जाता है कि जरूरत, अपेक्षा, महत्वाकांक्षा, स्वार्थ अनेक रूपों में इच्छाएं मन-मस्तिष्क पर सवार होती हैं। इन कामनाओं को पूरा करने के लिए ही तन व मन गतिशील रहते हैं। इच्छापूर्ति सुखी व शांत रखती है, तो अभाव दोष पैदा करते हैं।

बहरहाल, आज के जीवन पर गौर करें तो अधूरी इच्छाओं से पैदा कुंठा या कलह ही इंसान पर हावी दिखाई देता है। जिससे निराशा और असफलता में डूबा इंसान खुद को सबसे बदनसीब या दु:खी मानने लगता है। ऐसी मनोदशा से बचने या बाहर निकलने के लिए शास्त्रों में कुछ ऐसे सवाल बताए गए हैं, जिनको पढ़कर कोई भी इंसान व्यावहारिक जीवन को समझने और जीने के तरीके में हो रही चूक को जान सकता है। जानें और सीखें क्या हो जीवन के प्रति नजरिया?

लिखा गया है कि -

कस्य दोष: कुले नास्ति व्याधिना को न पीडित:।

केन न व्यसनं प्राप्तं श्रिय: कस्य निरन्तरा:।।

कोर्थं प्राप्य न गर्वितो भुवि नर: कस्यापदो नागता:

स्त्रीभि: कस्य न खण्डितं भुवि मन: को नाम राज्ञां प्रिय:।

क: कालस्य न गोचरान्तरगत: कोर्थी गतो गौरवं

को वा दुर्जनवागुरानिपतित: क्षेमेण यात: पुमान्।।

इन श्लोको में बताए सवाल व्यर्थ तनाव व दबावों से बाहर निकाल जीने का हौंसला देते हैं, जो ये हैं -

- किसका कुल दोषरहित है?

- कौन रोगमुक्त है?

- किसका धन-संपदा स्थायी है?

- कौन धनवान बनने पर अहं से बचा रहता है?

- किस पर संकट नहीं आए?

- स्त्रियां किसके मन को विचलित करने या कलह का कारण नहीं बनी?

- राजाओं या सत्ता का कौन प्यारा रहा?

- कौन काल से बचा रहता है?

- किसका स्वाभिमान नष्ट नहीं हुआ?

- कौन दुर्जन के अधीन रहकर आसानी से और दक्षतापूर्वक आजीविका प्राप्त कर सकता है?

पाप करने वालों को मां के गर्भ में कौन से दुख झेलने पड़ते हैं?
मरने के बाद यमनगरी में प्रताडऩा झेलने के बाद भी आत्माओं की मुक्ति नहीं होती है। वे जब किसी गर्भ में भी पहुंचती हैं तब भी उन्हें बहुत तरह के दुख झेलने पड़ते हैं। आइए जानते हैं कि किस तरह के दुख मरने के बाद आत्माओं को मां के गर्भ में झेलने पड़ते हैं।

स्त्री के ऋतु मध्य में पापी पुरुष के शरीर की उत्पति होती है, विश्वरूप को मारने में इंद्र को हत्या लगी, उसका इंद्र ने चार विभाग कर पृथ्वी, जल, वृक्ष, और स्त्रियों को क्रम से दे दिया। स्त्रियों में ऋतु आने से पुत्रादि की उत्पति होती है। इस कारण तीन दिन स्त्रियां अपवित्र रहती है। ऋतुकाल में प्रथम दिन स्त्री चांडाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के तुल्य, तृतीय दिन धोबिन, इन तीन दिनों में नरक से आए।

ईश्वर से पे्रित हुए, कर्मों से शरीर धारण करने के लिए पुरुष के वीर्य विंदु के आश्रय से स्त्री के उदर में जीव प्रवेश करता है। एक महीने में मस्तक , दूसरे महीने में भुजा आदि अंग की रचना होती है, तीसरे महीने में नख, रोम, हड्डी, चर्म, लिंग, दसद्वार के छिद्र, चौथे महीने में त्वचा, मांस, रक्त, रुधिर, रज्जा पांचवें महीने में क्षुधा, तुषा उत्पन्न होती है।

छटे महीने गर्भ की झिल्ली में अच्छादित होकर दाहिने कुक्षि में गर्भ भ्रमण करने लग जाता है। माता के भक्षण किए हुए अन्न पानादि से बढ़ता हुआ गर्भ का जीव विष्ठा, मूत्र आदि का स्थान तथा जहां अनेक जीवों की उत्पति होती है। ऐसे उदर में शयन करता है। वहां कृमि जीव के काटने से सब अंग कष्ट पाते हैं, वह बारम्बार मूच्छित भी होता है।

माता जो-जो कड़वा, तीक्ष्ण, लवणयुक्त रूखा, कसैला आदि भोजन करती है। उसके स्पर्श होने से कोमल अंगों को बहुत तकलीफ होता है। फिर भीतर से ऊपर आंत से वेष्टित है। नीचे मस्तक ऊंचा पैर और ग्रीवा जिसकी हो गई है। इधर-उधर हिल नहीं सकता। जिस प्रकार से पिंजरे में रुका हुआ पक्षी रहता है। वैसे ही गर्भ उदर में दुख से रहता है। वहां वह अपने कामों को याद करता हुआ सुख से सांस नहीं ले पाता है।

सातवें महीने ज्ञानप्राप्ति होने से भय होने लगता है, वह सोचता है मैं इस गर्भ से बाहर जाऊंगा, ऐसे व्यापार से कम्पन के कारण इधर-उधर घूमता एक जगह स्थिर नहीं रहता जैसे- विष्टा में पैदा हुए जीव। सातवें महीने में जीव अत्यंत दुख से वैराग्ययुक्त हो ईश्वर की स्तुति करता है, लक्ष्मी के पति जगत का आधार, अशुभ, के कामों के करने वाले और तेरी शरण आवें तब वे अपने द्वारा किए गए सारे शुभ व अशुभ कर्मों की व्याख्या करते हैं।

जब इस तरह जीव लगातार प्रार्थना करता है तब जाकर वह दसवें महीने में गर्भ से बाहर निकलता है।

जानें, नरक की 1 अनोखी खासियत..!
हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नरक की धारणा खासतौर पर पाप और पुण्यों से जुड़ी हैं। जिसके मुताबिक अच्छे और पुण्य कर्म से आत्मा स्वर्ग में वास करती है। वहीं पाप या बुरे कर्म से आत्मा नरक भोगती है। व्यावहारिक जीवन के नजरिए से स्वर्ग-नरक का दर्शन क्रमश: सुख व दु:ख के रूप में देखा जाता है। सुखी जीवन स्वर्ग की तरह वहीं दु:ख-अभावों की घड़ी नारकीय मानी जाती है।

अगर शास्त्रों में लिखी कुछ बातों पर गौर करें तो इसी धारणा के रोचक पहलू भी सामने आते हैं। जिसके मुताबिक नरक भी अच्छा और बेहतर स्थान बताया गया है। यह बात व्यावहारिक जीवन के लिये सुखी रहने का भी अच्छा सूत्र हैं। जानते हैं गरुड़ पुराण की यह रोचक बात -

लिखा गया है कि -

वरं हि नरके वासो न तु दुश्चरिते गृहे।

नरकात् क्षीयते पापं कुगृहान्न निवर्तते।।

इस श्लोक के अर्थ में न केवल नरक से जुड़ा कुछ सकारात्मक पक्ष उजागर होता है, बल्कि उसके द्वारा सीख दी गई है कि अच्छाई को अपनाना ही बेहतर जीवन का सूत्र है। श्लोक में कहा गया है कि -

दुश्चरित्र यानी मन, वचन, कर्म से बुरे व पापी इंसान के साथ निवास करने के बजाए नरक में रहना बेहतर है। क्योंकि नरक में रहने से पापों का नाश तो होता है, किंतु पापी व्यक्ति के साथ रहने से पापों का अंत नहीं बल्कि पाप बढ़ते हैं। पाप ही दु:ख, पतन और दुर्गति का कारण है, जो जीवन के रहते नरक से भी बदतर महसूस होते हैं।

पाप से दूर रखे नौ दरवाजों के इस अद्भुत घर का रहस्य!
दु:ख व पाप से भरा जीवन कोई नहीं चाहता। लेकिन चाहकर भी ऐसा संभव नहीं हो पाता। क्योंकि शास्त्रों के मुताबिक जीवन में सुख व दु:ख का सिलसिला मनोभावों में बदलाव लाता है। जिससे इंसान के विचार और कर्म में कभी हित पूर्ति तो कभी अस्तित्व को बचाने के लिये दोष पैदा होते हैं, जो जीवन पर अनेक तरह से बुरा असर डालते हैं।

ऐसे दु:खद नतीजों व पापकर्मों से बचने के लिये ही हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में नौ दरवाजों वाले एक ऐसे घर का रहस्य बताया गया है। जिसे जानकर कोई भी इंसान स्वस्थ व पापमुक्त जीवन गुजार सकता है। जानते हैं यह रोचक बात -

लिखा गया है कि -

नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्।

क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स पर: कवि:।।

इस श्लोक का अर्थ समझें तो इंसानी शरीर को ही नौ दरवाजे वाला घर बताया गया है। इन नौ दरवाजों में तीन वात, पित्त, कफ प्रकृति, पांच ज्ञानेन्द्रियां यानीं नाक, कान, मुंह, नेत्र, त्वचा व एक आत्मा शामिल है, जो इन पर नियंत्रण व संतुलन पा लेता है, वहीं सबसे बड़ा विद्वान, सबल और बुद्धिमान होता है।

इसमें संकेत साफ है कि वात, पित्त, कफ यानी उचित खान-पान, रहन-सहन के साथ पांचों इंदियों पर संयम और अनुशासन द्वारा यानी रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श के प्रभाव में आकर आचरण अपवित्र न कर आत्मा को पावन रखें। जिनके शुभ प्रभाव से बने पवित्र विचार और कर्मों से ही जीवन पापमुक्त, निरोगी व लंबा होता है।

इसलिए शिव हैं निराले और करिश्माई देवता!
भक्त और भक्ति की महिमा में शास्त्र कहते हैं भक्त की जैसी भावना व कामना से ईश्वर का स्मरण करता है, ईश्वर वैसे ही स्वरूप में उसे कृपा और सिद्धि देता है। हिन्दू धर्म में ईश्वर का ऐसा ही कृपालु और विलक्षण स्वरूप भगवान शिव को माना जाता है। वह अनादि, अनंत और सर्वव्यापी माने जाते हैं। इसलिए शिव के शक्ति स्वरूपों की शास्त्रों में तरह-तरह के नामों से महिमा गाई गई है।

शिव के ये विशेष स्वरूप और नाम चमत्कारिक रूप से दैहिक, दैविक और आध्यात्मिक सिद्धि देने वाले माने गए हैं। शिव भक्ति के विशेष अवसरों पर इन नाम स्वरूपों का स्मरण बहुत ही मंगलकारी होता है। जानते हैं इनमें से ही कुछ प्रसिद्ध नामों की भक्ति की महिमा और फल -

- शिव को महादेव पुकारा जाता है और शिवलिंग अध्यात्मिक ऊर्जा का भंडार होता है। इसलिए शिवलिंग पूजा हर कमी, कमजोरी और रुकावटों का अंत कर देती है। जिससे नया विश्वास, साहस और शक्ति मिलती है।

- शिव महामृत्युंजय है। इस स्वरूप की उपासना काल, भय और रोग से मुक्त रखती है।

- भगवान शिव वैद्यनाथ के रूप में पूजनीय हैं। इसलिए इस स्वरूप की भक्ति निरोग बना देती है।

- शिव शम्भु कहलाते हैं। यह स्वरूप हर सांसारिक सुख का प्रदान करता है। जिनमें गृहस्थ जीवन व संतान सुख खास तौर पर पुत्र की कामना पूरी होती है।

- शिव आशुतोष यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसलिए यह भी तय है कि इस स्वरूप का स्मरण जल्दी ही इच्छा पूरी कर हमेशा प्रसन्न रखता है।

- शिव शर्व भी पुकारे जाते हैं यानी सभी कष्टों को हरने वाले। जिनमें बुरे कर्म और दुष्टों का नाश प्रमुख है। यही कारण है कि शिवभक्ति शत्रु बाधा के अंत के लिये अचूक मानी गई है।

- शिव त्रिलोकेश यानी तीनों लोकों के स्वामी के रूप में भी पूजनीय है। जिनकी आराधना जनम-मरण के बंधन से मुक्त करती है।

- शिव भक्तवत्सल है इसलिए भगवान शिव की पूजा से सौभाग्यवृद्धि करती है।

- भगवान शिव कुबेर के स्वामी माने गए हैं। इसलिए शिव भक्ति धन कुबेर बना देगी।

सीधी बातें..जो पल में सुलझा देगी मन व जीवन की हर उलझन
हर इंसान के स्वभाव व व्यवहार में गुण व दोष होते हैं। यही कारण है दैनिक जीवन में उठते-बैठते अक्सर किसी भी रूप में हमारी खामियां दूसरों का जीवन तो कभी दूसरों की कमियां हमारे जीवन पर बुरा असर डालती है। किंतु जो इंसान अपन दोषों को नजरअंदाज कर दूसरों की कमियां ढूंढने की कवायद में लगा रहता है, वह अक्सर कलह, संताप, आरोप-प्रत्योराप के जाल में जीवन को उलझाकर कुण्ठा या निराशा का शिकार होता है।

ऐसी स्थिति किसी भी इंसान को विवेकहीन बनाती है यानी सही-गलत की समझ से दूर कर सकती है। जीवन को ऐसी नकारात्मकता दशा से बचाने या बाहर आने के लिए धर्मग्रंथों में लिखी सीधी और साफ बातों पर गौर करें तो पल में जीवन की सारी मुश्किलों का हल मिल सकता है। जानते हैं यह खास बातें -

गरुड पुराण में लिखा गया है कि -

सद्भिरासीत सततं सद्भि: कुर्वीत संगतिम्।

सद्भिर्विवाद मैत्रीं च नासद्भि: किंचिदाचरेत्।।

पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञै: सत्यवादिभि:।

बन्धनस्थोपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलै: सह।।

इस श्लोक में व्यावहारिक जीवन को साधने के कुछ बेहतरीन सूत्र प्रकट किए गए हैं, जो हर इंसान के व्यावहारिक भ्रम व संशय को दूर कर देते हैं। जानें ये सूत्र -

- लगातार सज्जनों यानी गुणी, ज्ञानी, दक्ष व सरल स्वभाव के इंसानों की संगति में रहें।

- दोस्ती व विवाद भी करें तो सज्जनों से, क्योंकि उसमें भी ज्ञान की बातों से हल सामने आते हैं।

- दुर्जन यानी कुटिल, व्यसनी दुर्गणी व बुरे स्वभाव के व्यक्ति के साथ न मित्रता करें न शत्रुता।

- पण्डित यानी दक्ष, विनम्र, धर्म में आस्थावान, मन, वचन व कर्म से सच्चे इंसान हो तो उसके साथ बंधन में भी रहना अनुचित नहीं होगा, क्योंकि ऐसा संग यश, लक्ष्मी व सफलता

- वहीं दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति के साथ शाही व आलीशान जीवन भी मिले तो उनको छोड़ देना चाहिए। क्योंकि अंतत वे अपयश, दु:ख या कलह का कारण बनते हैं।


इसलिए न चूकें श्राद्ध में कुत्ते के लिए ग्रास निकालना!
हिन्दू धर्म में श्राद्धपक्ष सांसारिक रिश्तों से जुड़े संस्कार, भावनाओं और मर्यादाओं को कर्म, विचार और व्यवहार में उतारकर हर तरह से संपन्न बनाने वाली एक श्रेष्ठ धार्मिक परंपरा है। क्योंकि यह मात्र मानवीय धरातल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा जीव व प्रकृति जगत इस अद्भुत परंपरा का हिस्सा होता है।

श्राद्ध की इन खास परंपराओं में ही भूतयज्ञ प्रमुख है। अलग-अलग योनियों को प्राप्त आत्माओं की तृप्ति के लिए भूतयज्ञ का महत्व है। जिसमें पंचबलि कर्म किया जाता है। पंचबलि में भोजन के पांच अलग-अलग हिस्से गाय, कुक्कुर यानी कुत्ता, कौआ, देवता व चींटियों के निमित्त निकाल समर्पित किए जाते हैं। श्राद्धपक्ष में भी इसी पंरपरा के मुताबिक श्वान यानी कुत्ते के लिए भोजन का ग्रास निकाला जाता है।

व्यावहारिक जीवन के नजरिए से विचार करें तो कुक्कुर बलि या कुत्ते को ग्रास की इस पंरपरा में गृहस्थ जीवन ही नहीं बल्कि कार्यक्षेत्र में सफलता के बेहतरीन सूत्र छुपे हैं। कुक्कुर यानी श्वान जिसे लोक भाषा में कुत्ता भी पुकारा जाता है, के धार्मिक पहलू पर नजर डालें तो श्वान भी देव प्राणी माना जाता है। अनेक पौराणिक प्रसंग इस बात का प्रमाण है- जैसे पाण्डवों के स्वर्गारोहण के वक्त धर्म स्वरूप में धर्मराज युधिष्ठिर के साथ श्वान का रहना या महायोगी श्री दत्तात्रेय व रुद्रअवतार भैरव का वाहन।

श्राद्धकर्म में कुक्कुर बलि के साथ देव प्राणी के रूप में श्वान के स्वभाव व आदतों से जुड़ी कुछ खूबियों को जीवन में उतारें तो सफल और कलहमुक्त जीवन जीना आसान हो सकता है। जिसकी कामना पितरों से भी की जाती है।

असल में श्वान के स्वभाव की सबसे अहम खूबी कर्तव्यनिष्ठा है यानी वफादारी, जिसमें निष्ठा, समर्पण, विश्वास, सजगता व प्रेम का भाव प्रमुख है। बस, अगर यही एक गुण व भावों को गृहस्थ जीवन में रिश्तों व जिम्मेदारियों से जोड़े तो परिवार में अंतहीन खुशहाली संभव होती है। वहीं कार्यक्षेत्र में भी कार्य व सहयोगियों के साथ तालमेल बनाने में समर्पण, भरोसा, सहयोग व आत्मीयता के भाव के साथ कार्य के प्रति जागरूकता तरक्की और सफलता के सपने साकार करने की राह आसान बना सकती है।

अद्भुत शक्ति..! जो है हर बुरे वक्त की काट
सांसारिक जीवन में वक्त का उतार-चढ़ाव शरीर या धन की शक्ति को कमजोर या असरदार बनाता है। यह भी सच है कि शरीर और धन की ताकत बाहरी तौर पर दूसरों को प्रभावित कर शक्ति संपन्न बनाने में अहम भूमिका निभाती है। किंतु अगर शास्त्रों की बात पर गौर करें तो तन और धन की यह ताकत एक ओर आंतरिक शक्ति के कारण ही कारगर और असरदार बनती है।

यह शक्ति है - मानसिक शक्ति या मनोबल। कहा भी गया है कि - मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। ये पंक्तियां स्वयं मन की शक्ति की अहमियत उजागर करती है। मन की ताकत असीम मानी गई है। यही कारण है कि व्यावहारिक जीवन में मजबूत मनोबल रोग या अभावों से छुटकारा देता है। किंतु टूटा मनोबल बलवान या धनवान व्यक्ति का भी पतन कर देता है।

मन की इस ताकत का ही महत्व महाभारत में उजागर किया गया है। जिसके मुताबिक इंसान का मजबूत मनोबल ही उसे हर स्थिति में निर्भय और सफल बना देता है।

महाभारत में लिखा गया है कि -

कान्तारे वनदुर्गेषु कृच्छ्राखापत्सु सम्भ्रमे।

उद्यतेषु च शस्त्रेषु नास्ति सत्ववतां भयम्।।

इस श्लोक में मानसिक बल को श्रेष्ठ बताकर व्यावहारिक जीवन की कठिनाईयों पर जीत का मंत्र बताया गया है। जिसे आधुनिक संदर्भों में विचार कर अपनाएं तो यह निडर, सफल व्यक्तित्व का स्वामी भी बना सकती है।

अर्थ है कि जो व्यक्ति सत्वगुणी या मजबूत मनोबल वाला होता वह गहरे संकट, घबराहट, कठिन रास्तों, घने जंगलों या फिर शस्त्रों व हथियारों के आक्रमण के वक्त भी भयभीत नहीं होता।

संकेत यही है कि मन को संयम, सत्य और पवित्रता से जोड़कर रखें तो कर्म, आचरण और विचारों की पावनता भी इंसान को हर हालात में निर्भय व निश्चिंत रखती है।

इन 5 की सेवा-पूजा सुनिश्चित कर देती है यश व सफलता
जीवन में कर्म, वचन और व्यवहार से पाई सफलता ही सुख नहीं देती। बल्कि उसके साथ मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी अहम है। दूसरे शब्दों में कहें तो यश के बिना कामयाबी बेमानी हो जाती है। शास्त्रों के मुताबिक यशस्वी न बनने का कारण दंभ होता है। जो इंसान सफलता पाकर अहं में डूब जाता है, वह गुणी होने पर भी अंतत: अपयश का पात्र बनता है।
यही कारण है कि अहंकार से बच सफल और यशस्वी जीवन के लिये शास्त्रों में विनम्रता को स्वभाव में उतारने का महत्व बताया गया है। जिसके लिये सेवा और सम्मान से जुडऩा श्रेष्ठ उपाय माना गया है। वैसे किसी भी प्राणी की किसी भी रूप में सेवा सुयश ही देती है। किंतु हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में मानवीय जीवन से जुड़े ऐसे 5 देवता व देव रूपों की विशेष की सेवा व आदर का महत्व बताया गया है, जो सुनिश्चित सफलता और तुरंत यश देने वाली बताई गई है।

जानें, किसकी सेवा व पूजा यशस्वी और सफल जीवन तय करती है?
लिखा गया है कि -

पञ्चैव पूजयंल्लोके यश: प्राप्रोति केवलम्।
देवान् पितृन् मनुष्यांश्च भिक्षूनतिथिपञ्चामान्।।

इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि इन ५ की पूजा-सेवा यशस्वी व सफल जीवन बनाने वाली होती है -

देवता - देव पूजा धार्मिक मान्यताओं में कार्य व कामनासिद्धि करने वाली मानी जाती है। वहीं जीवन में आत्मविश्वास कायम रखने के साथ सद्कर्मों से जोड़ती है।

पितर - पितृ स्मरण या पूजा धार्मिक नजरिए से दु:ख-दारिद्रय दूर करने वाली मानी जाती है। वहीं व्यावहारिक रूप से यह पितरों द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों और जीवन मूल्यों अच्छे कार्य की प्रेरणा देकर यश दिलाते हैं।

मनुष्य - मानव सेवा सबसे बड़ा धर्म माना गया है। दूसरों को अपना ही रूप मानकर की गई सेवा प्रेम, परोपकार, दया आदि द्वारा धर्म से जोड़कर यशस्वी बनाता है।

संन्यासी - शास्त्रों में सन्यासी देव रूप कहा गया है। संयम और तप की मूर्ति सन्यासी सेवा देव पूजा का फल ही नहीं देती, बल्कि श्री व सुयश तय करती है।

अतिथि - अतिथि भगवान के समान माना गया है। दरअसल, इसके पीछे मानवीय रिश्तों, भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़े रहने का संदेश है। जिसके बिना प्रेम, सेवा, दया, अहिंसा के धर्म भावों से जुडऩा व यशस्वी जीवन संभव नहीं होता।

यह है सबसे बड़ा पाप.! जिससे बचकर ही संभव है सुख-शांति
हम सभी जानते हैं कि धर्मग्रंथ ज्ञान का भण्डार है। यह ज्ञान जीवन से लेकर मृत्यु तक कर्म या व्यवहार आदि से जुड़ी हर बात का सही तरीका व नजरिया उजागर करता है। जिसके द्वारा हर इंसान सुखी और शांत जीवन बिता सकता है। हिन्दू धर्म में भी ऐसे ही अनेक वेद, पुराण व शास्त्र जीवन मे धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य और अच्छाई-बुराई को सुख-दु:ख नियत करने वाला बताते हैं।

यह भी व्यावहारिक सत्य है कि धर्मग्रंथों का यह असीम ज्ञान आसानी से समझ जीवन में उतारना साधारण इंसान के लिए कठिन होता है। ऊपर से अनेक पुराण व धर्मग्रंथों में अलग-अलग देवी-देवता विशेष को सर्वोपरि बताकर की गई पाप-पुण्य कर्मों की व्याख्या सुन या पढ़ अनेक अवसरों पर साधारण बुद्धि का इंसान कुतर्कों द्वारा इस ज्ञान को विरोधाभासी साबित करने की चेष्टा भी करता है। क्योंकि वह इस सत्य को समझने में चूक करता है कि हर देव ग्रंथ परब्रह्म की एकात्मता को ही बताते हैं।

धर्मग्रंथों खासतौर पर भगवान वेदव्यास द्वारा रचे 18 पुराणों में जीवन में जुड़े असीम ज्ञान को समझने या भ्रम-संशय को दूर रखने करने के लिए ही पाप-पुण्य कर्मों का निचोड़ बताते हुए मात्र एक श्लोक द्वारा स्पष्ट किया गया है कि कौन-सा काम सबसे बड़ा पुण्य है और कौन-सा सबसे बड़ा पाप? जिसे सामान्य बुद्धि का इंसान भी समझ पापमुक्त और खुशहाल जीवन गुजार सकता है। जानते हैं यह सार -

लिखा गया है कि -

परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडऩम्।
अष्टादश पुराणानि व्यासस्य वचन।।

इस श्लोक द्वारा साफ कहा गया है कि व्यास मुनि द्वारा रचे गए 18 पुराणों में बताए ज्ञान का सार यही है कि जीवन में सबसे बड़ा पाप दूसरों को किसी भी रूप में कष्ट या पीड़ा पहुंचाना है और सबसे बड़ा पुण्य परोपकार यानी भलाई यानी दूसरों को सुख पहुंचाना ही है।

इंसान के अमर होने का ये है सही रास्ता...
अमरत्व, जिसे ये तत्व मिल जाए वह व्यक्ति इस दुनिया में सभी अलग हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार अमरत्व प्राप्त करने वाला व्यक्ति कभी भी मरता नहीं है। कई ऐसे प्रसंग बताए गए हैं जहां असुरों द्वारा अमरत्व प्राप्त करने के लिए कठोर तप किए हैं, लेकिन सभी के प्रयास असफल ही हुए।

अमरत्व प्राप्त करने का सबसे सटीक मार्ग स्वामी विवेकानंद द्वारा बताया गया है। सामान्य व्यक्ति भी अमरत्व प्राप्त कर सकता है। स्वामीजी के अनुसार अमरत्व प्राप्त करना है तो सबसे पहले सभी सांसारिक वस्तुओं का मोह छोडऩा होगा। जिस व्यक्ति ने इन वस्तुओं से अपना ध्यान हटा लिया और इनके लिए व्याकुल होना बंद कर दिया वह निश्चित रूप से अमरत्व प्राप्त कर लेगा।

जब कोई भी व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं, सुख-सुविधाओं, इच्छाओं से मोह त्यागता है तो वह ईश्वर को अवश्य ही प्राप्त कर लेता है। ईश्वर को प्राप्त करने का अर्थ यही है कि वह व्यक्ति अमर हो जाएगा। जब तक किसी भी व्यक्ति के मन में इच्छाएं रहती हैं वह भगवान का चिंतन, ध्यान नहीं कर सकता। उसका मन हमेशा से सांसारिक वस्तुओं में ही उलझा रहता है और वह कभी भी जीवन और मृत्यु के चक्र से बाहर नहीं आ पाता।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार जिस पल व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं, सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह को छोड़ते हुए परमात्मा का ध्यान करेगा, दीन-दुखियों की मदद करेगा वह अवश्य ही अमरत्व प्राप्त कर लेगा।

जानें, क्या होता है? जब लक्ष्मी आती है इन 8 रूपों में..
ईश भक्ति सुख-समृद्धि, वैभव, धन और ऐश्वर्य देने वाली है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि मात्र ईश्वर भक्ति के लिए किए जाने वाले धार्मिक कर्मों से ही ऐसी सुख-संपन्नता प्राप्त हो जाती है? नहीं, बल्कि यह सब पाने के लिए व्यावहारिक जीवन में कर्म, विचार और स्वभाव में पावनता बहुत जरूरी है।

शास्त्र भी कहते हैं कि देवी लक्ष्मी भी वहीं वास करती है, जहां पवित्रता और सत्य का पालन होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो देवी लक्ष्मी धन ही नहीं जीवन में गुण, आचरण, संस्कार लाकर समृद्ध बनाती है। यही कारण है कि देवी लक्ष्मी भी शक्ति स्वरूपा होकर ऐश्वर्य और गुण की देवी के रूप में पूजनीय है।

शास्त्रों के मुताबिक स्वभाव और आचरण को पवित्र बनाने के साथ व्यावहारिक जीवन के अनेक सुखों को देने वाली महालक्ष्मी के 8 स्वरूप हैं, जो अष्टलक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि में अष्टलक्ष्मी स्मरण या उपासना आयु, स्वास्थ्य, संतान, संपत्ति, धन, अन्न, सद्गुण, समृद्धि, सफलता देने वाली मानी गई है। जानें महालक्ष्मी के ये 8 स्वरूप-

महालक्ष्मी
चार भुजाधारी महालक्ष्मी का अलंकारों से सजा यह दिव्य रूप है। जिनके चार हाथों में कमल, पात्र, गदा और श्रीफल यानी नारियल होता है। इनकी उपासना धन-धान्य से समृद्ध करती है।

गजलक्ष्मी
यह लक्ष्मी का चार भुजाधारी स्वरूप है। नाम के मुताबिक ही यह गज यानी हाथी पर आठ कमल की पत्तियों के समान आकार वाले सिंहासन विराजित होती है। इनके दोनों ओर भी हाथी खड़े होते हैं। चार हाथों में कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख होते हैं। इनकी उपासना संपत्ति और संतान देने वाली मानी गई है।

प्रसन्न लक्ष्मी
महालक्ष्मी का यह स्वरूप सोने के समान तेजस्वी है। वह सोने के अलंकार और वस्त्रों में दिव्य दिखाई देती हैं। वह चार भुजाधारी है, जिनमें नीबू, सोने का कलश, सोने का कमल, बिजौरा होता है। इनकी उपासना जीवन के समस्त दु:खो का अंत कर घर-परिवार में हर खुशहाली लाती है।

वीरलक्ष्मी
माता इस स्वरूप में चार भुजाधारी कमल पर पद्मासन मुद्रा में विराजमान रहती हैं। दो हाथों में कमल व दो हाथ क्रमश: वरद और अभयमुद्रा में होते हैं। इनकी उपासना सौभाग्यवान बना देती है।

द्विभुजा वीरलक्ष्मी
यह लक्ष्मी का दो भुजाधारी स्वरूप है। जिनका एक हाथ अभय मुद्रा में और दूसरा बायां वरद मुद्रा में होता है। इनकी उपासना सौभाग्य के साथ स्वास्थ्य भी देने वाली होती है।

अष्टभुजा वीरलक्ष्मी
महालक्ष्मी का यह स्वरूप आठ भुजाधारी है। आठ भुजाओं में पाश, गदा, कमल वरद मुद्रा, अभय मुद्रा, अंकुश, अक्ष सूत्र और पात्र होते हैं। यह स्वरूप आयु, संपत्ति, ऐश्वर्य और सभी सुख देने वाला माना गया है।

द्विभुजा लक्ष्मी -
महालक्ष्मी का यह स्वरूप दो भुजाधारी है। वह दिव्य अलंकारों से सजी दोनों हाथों में कमल थामें होती है। इनकी उपासना अकूत धन, ऐश्वर्य व सद्गुण लाती है।

श्रीदेवी
चार भुजाधारी कमल पर विराजित महालक्ष्मी के इस स्वरूप के चार हाथों में पाश, अक्षमाला, कमल और अंकुश होते हैं। इनकी उपासना तन, मन और धन की दरिद्रता का अंत करती है।

कहीं दुर्गति की ओर तो नहीं बढ़ रहे आपके कदम..! इन लक्षणों से जानें
जीवन में अच्छे और बुरे कर्म ही इंसान की पहचान बन जाते हैं। शास्त्रों में भी पुण्य और पाप कर्मों को सद्गति और दुर्गति का कारण बताते हैं। अच्छाई-बुराई के पीछे अक्सर यह कारण भी होता है कि इंसानी स्वभाव स्वयं के साथ दूसरों के गुणों की अनदेखी करता है और ध्यान व विचारों को दोषों पर अधिक टिकाता है। नतीजतन वह दूसरों के गुणों से प्रेरित नही हो पाता और साथ ही अपने गुण व शक्तियों से भी अनजान रहता है।

दूसरी ओर दोषदर्शन बुद्धि और विवेक पर बुरा असर डालते हैं। जिससे दुर्गुण या निंदा से पैदा अनेक विकार कर्म, विचार और व्यवहार पर हावी होने लगते हैं। फिर भी अनेक लोग तर्क या दलीलों के द्वारा अपने ऐसी सोच, वाणी या कामों को सही ठहराने की कवायद में लगे रहते हैं और बुरे नतीजे मिलने तक यह पता नहीं चलता कि वह पतन के रास्ते चल रहे हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथ गणेश पुराण में भगवान गणेश द्वारा स्वयं इंसान के स्वभाव और कर्म से जुड़े ऐसे ही लक्षणों को बताया गया है। इन लक्षणों के आधार पर तीन प्रकृतियां और उससे मिलने वाले नतीजे भी उजागर किए गए हैं। जिसे जानकर कोई भी इंसान व्यावहारिक जीवन में अनचाही दुर्गति को टाल सकता है।

गणेश पुराण के मुताबिक प्रकृति के आधार पर तीन तरह के लोग होते हैं- पहला दैवीय, दूसरा आसुरी और तीसरा राक्षसी। जानें इनके लक्षण और परिणाम क्या होते हैं -

देवीय स्वभाव - ऐसा इंसान क्रोध से दूर, संयम और धैर्य रखने वाला, तेजस्वी, निडर और मान-सम्मान की आंकाक्षा से दूर कर्मशील होता है। जिससे वह आजीवन सुख-सौभाग्य के साथ बिताकर अंत में मुक्ति भी प्राप्त करता है।

आसुरी स्वभाव - ऐसा व्यक्ति अहंकारी, कामना और वासनाओं की पूर्ति की लालसा रखने वाला, प्रमादी और पाखण्डी या बढ़-चढ़कर काम और बातें करने वाला होता है। जिससे वह जीवन में पहले भोग और कामनापूर्ति तो करता है, किंतु अंत में वहीं उसके घोर दु:ख का कारण बनते हैं।

राक्षसी स्वभाव - राक्षसी प्रकृति का व्यक्ति संवेदना व भावनाहीन या कठोर, दुष्ट, अपवित्र कर्म बुराई या निंदा करने वाला, ईष्र्यालु, द्वेषी, मोह और मद में लिप्त, तंत्र-मंत्र के मारक प्रयोग करने वाला किंतु अंदर से भयभीत रहने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में घोर दु:ख ही प्राप्त नहीं करता बल्कि दु:खद मृत्यु और नरक भी पाता है।

यही नहीं यह भी बताया गया है कि आसुरी या राक्षसी स्वभाव के लोग पिछले जन्मों के बुरे कामों से मिले नरक भोगकर अगले जन्म में भी दीन-हीन, अंधे, लंगड़े या कुबड़े होकर जन्म लेते हैं।

धर्म-कर्म में आस्थावान कोई भी इंसान इन बातों के मूल संदेश यानी अच्छाई को अपनाकर जीवन को सही दिशा देकर बदहाली या दुर्गति से बच सकता है। जिसे ही शास्त्रों में नरक का नाम दिया गया है।

वासना को हवा देते हैं ये स्थान..! रहें सावधान
हिन्दू धर्मग्रंथो में जीवन में चार पुरुषार्थ का महत्व बताया गया है। ये हैं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। इनमें काम या भोग्य विषय-वस्तु के पीछे सकारात्मक पक्ष सृजन और गति है। इसलिए काम को योग के समान संयम और अनुशासन से अपनाने पर जीवन में यशस्वी और सफल बनाने वाला माना गया है। किंतु भोग के रूप में असंयमित काम अपयश व असफलता देने वाला बताया गया है।

वहीं पौराणिक मान्यताओं में काम के स्वामी कामदेव को माना गया है। जिसे जगत के सृजन चक्र और गति को नियत करने की कामना से भगवान शंकर के तप भंग के लिये देवताओं द्वारा तैयार किया गया। जिसके परिणामस्वरूप भगवान शंकर द्वारा कामदेव भस्म हुआ। तब कामदेव की पत्नी रति की विनती पर भगवान शंकर ने कामदेव को भाव रूप में प्रकृति और जीवो ंमें वास करने की गति नियत की गई।

मुद्गल पुराण में इसी से जुड़े प्रसंग के मुताबिक जब शंकर के कोप से कामदेव जलकर शापित हुआ तो शापमुक्त होने के लिए कामदेव द्वारा श्री गणेश के ज्ञान-ब्रह्म स्वरूप महोदर का तप किया गया। तब भगवान महोदर द्वारा शिव के शाप की काट को असंभव बताया गया। लेकिन प्रकृति और जीव जगत में रहने के लिये कामदेव के लिए स्थान नियत किया गया।

भगवान महोदर द्वारा कामना या वासनाओं के प्रतीक कामदेव के रहने के लिये जिन विशेष स्थानों को बताया गया, वे इस प्रकार हैं -

लिखा गया है कि -

यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:।

गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।।

उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:।

सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।

वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै।

भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।।

इस श्लोक के मुताबिक इन स्थानों पर कामदेव वास करते हैं यानी इनके संपर्क में कामनाएं जागती हैं। ये हैं -

यौवन या सौंदर्य, स्त्री, फूल, गाना, परागकण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचा, बसन्त ऋतु, चन्दन, वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंगों के दर्शन, सुहानी और मन्द हवा, रहने का सुन्दर स्थान, नए कपड़े और आभूषण।

इस पौराणिक बात के पीछे व्यावहारिक जीवन के लिये संकेत भी है कि चूंकि कामनाओं की अति मन को भटकाती है, इसलिए इन स्थान विशेष के संपर्क में आने पर संयम और अनुशासन बनाए रख मन को कमजोर होने से बचाएं। अन्यथा जीवन पतन की ओर जा सकता है।

इन 3 शक्तियों के बूते ही जमती है धाक
धर्मग्रंथों में धर्मयुद्धों से जुड़े प्रसंग हों या विज्ञान की अवधारणाएं, अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष की अहमियत उजागर करते हैं। वजूद के लिये यह जद्दोजहद जीवन, मान-सम्मान या जीवन से जुड़े किसी भी विषय से जुड़ी हो सकती है। किंतु संघर्ष चाहे जैसा हो, शक्ति के बिना संभव नहीं।

यही कारण है कि शक्ति अस्तित्व का ही प्रतीक मानी गई है। चूंकि यह शक्ति मोटे तौर पर संसार में रचना, पालन व संहार रूप मे दिखाई देती है। प्राकृतिक व व्यावहारिक रूप से स्त्री भी सृजन व पालन शक्ति की ही साक्षात् मूर्ति है। इसी शक्ति की अहमियत को जानकर ही सनातन संस्कृति में स्त्री स्वरूपा देवी शक्तियां पूजनीय और सम्माननीय है।

नवरात्रि शक्ति स्वरूप की पूजा का विशेष काल है। शक्ति पूजा में खासतौर पर महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती का विधान है, जो क्रमश: शक्ति, ऐश्वर्य और ज्ञान की देवी मानी जाती है।

व्यावहारिक जीवन की नजर से तीन शक्तियों का महत्व यही है कि तरक्की और सफलता के लिए सबल व दृढ़ संकल्पित होना जरूरी है। जिसके लिये सबसे पहले विचारों को सही दिशा देना यानी नकारात्मकता, अवगुणों व मानसिक कलह से दूर होना जरूरी है। महाकाली पूजा के पीछे यही भाव है।

इसी तरह महालक्ष्मी पावनता और महासरस्वती विवेक शक्ति का प्रतीक है, जो मन और तन को सशक्त बनाती है। ऐसी दशा ज्ञान, संस्कार आत्मविश्वास, सद्गगुणों, कुशलता और दक्षता पाने के लिये अनुकूल होती है। जिसके द्वारा कोई भी इंसान मनचाहा धन, वैभव बंटोरने के साथ ही सुखी और शांत जीवन की कामनाओं को सिद्ध कर सकता है।

इस तरह आज के दौर में इन तीन शक्तियों की पूजा का संदेश यही है कि जीवन में निरोगी, चरित्रवान, आत्म-अनुशासित, कार्य-कुशल व दक्ष बनकर शक्ति संपन्न बने और कामयाबी की ऊंचाईयों को छूकर परिवार, समाज व कायक्षेत्र में वजूद, साख और रुतबे को कायम रखें।

लक्ष्य तक तेजी से पहुंचा देगा श्री हनुमान का यह एक सूत्र
श्री हनुमान भक्त शिरोमणि यानी ऐसे भक्त जिनकी भक्ति सर्वश्रेष्ठ, विलक्षण और अतुलनीय है। हालांकि युग-युगान्तर से धर्मशास्त्रों में अनेक भक्त और उनकी ईश भक्ति के अनेक रूपों की अपार महिमा बताई गई है। किंतु श्री हनुमान की रामभक्ति की एक खासियत उनको श्रेष्ठ व सर्वोपरि बनाती है। वह है - शरणागति।

शरणागति यानी शरण में चले जाना। हालांकि शरणागति भी अलग-अलग रूपों में देखी जाती है। कमजोरी, भय या स्वार्थ से सबल का आसरा क्षणिक लाभ दे सकता है, किंतु लंबे वक्त के लिए नकारात्मक नतीजे भी देने वाला भी होता है। किंतु यश और सफलता के लिए गुण, शक्ति संपन्न होने पर भी निर्भयता के साथ अपनाई शरणागति ही सार्थक होती है। यह शरण देने वाले और शरणागत दोनों को ही बलवान और सुखी करती है।

शक्तिधर श्रीराम और बल, बुद्धि, विद्या संपन्न श्री हनुमान के भक्त और भगवान के गठजोड़ में भी शरणागति का ऐसा ही आदर्श छुपा है। जिसका संबंध श्री हनुमान द्वारा राम की शरणागति से है, जो व्यावहारिक जीवन में लक्ष्य प्राप्ति का एक बेहतरीन सूत्र सिखाता है।

असल में शरणागति के पीछे समर्पण और निष्ठा के भाव अहम होते हंै। जिससे किया गया हर कार्य स्वार्थसिद्धि या हित की भावना से परे होता है। यहीं नहीं इससे कर्तव्य में अहं का भाव यानी मैं या मेरा का विचार नदारद हो जाता है। नतीजतन दोषरहित बुद्धि व विचार पूरी ऊर्जा के साथ कर्म करने में सहायक बनकर असंभव लक्ष्य को भी पाने की राह आसान कर देते हैं। श्री हनुमान लीला इस बात का प्रमाण भी है।

बस, द्वेष-ईर्ष्या, स्वार्थ से परे, अहंकार रहित, समर्पित, सच्चा व निष्ठावान बनाने वाला शरणागति का यही एक सूत्र अगर परिवार हो या कार्यक्षेत्र, में अपने कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा करने के लिये कर्म में उतार लें तो जीवन से जुड़े किसी भी मकसद को जल्द पूरा करना संभव हो जाएगा। अधिक सरल शब्दों में कहें तो श्री हनुमान की भांति हर काम लक्ष्य पर ध्यान टिकाकर, डूबकर और मन लगाकर हो।

सीखें बापू की 2 बातें.. हो जाएंगे सफल लोगों की गिनती में शुमार
जब योद्धा की बात हो तो दिमाग में एक छबि भारी-भरकम अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध के लिये तैयार वीर पुरुष की बनती है। किंतु जब कोई शस्त्र नहीं बल्कि शास्त्रों में बताई 2 बातों की शक्ति से ही बड़ी फौज को झुकने पर विवश कर दे तो यह किसी विलक्षण या महान आत्मा के लिए ही संभव हो सकता है। जी हां, इस बात के जरिए यहां आज भी करोड़ों दिलों में बसने वाले उस महात्मा का ही स्मरण किया जा रहा है, जिनको सारी दुनिया बापू यानी महात्मा गांधी के रूप में जानती है।

साबरमती के संत के रूप में मशहूर महात्मा गांधी द्वारा जीवन में अपनाई मात्र 2 बातों के आगे सारी दुनिया आज भी नतमस्तक होती है। जिनको आचरण में उतारना धर्मशास्त्रों में भी जीवन की सफलता के लिये अहम माना है। यहीं नहीं हर तरह की अशांति हो या भय का अंत ये 2 बातें आसानी से कर देती हैं।

ये 2 बातें हैं - सत्य और अहिंसा। हालांकि शास्त्रों में इनसे जुड़ी अनेक सीखें दी गई हैं, किंतु अपनाकर सार्थक करना किसी महात्मा के वश में ही है, जिसे गांधीजी ने कर दिखाया। आधुनिक पीढ़ी इसे गांधीगिरी के नाम से जीवन में अपनाने की कोशिशें कर रही हैं।

बहरहाल, जानते हैं बापू की ये 2 बातें कैसे जीवन में शांति और सफलता लाती है -

- सत्य बोलने वाला वास्तविक रूप से सफल होता है। क्योंकि वचन, कर्म, व्यवहार और विचार से सच्चा इंसान हमेशा सरल, शांत और आत्मविश्वास से भरा व प्रेरणादायी होता है।

- इसी तरह अहिंसा का भाव कलह या मानसिक दोषों से दूर और निर्भय रखता है, जिससे बेचैनी और व्यर्थ की उलझनों से बचकर मन लक्ष्य के प्रति स्थिर और एकाग्र रहता है।

- सत्य का प्रभाव परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में छबि विश्वसनीय बनाता है। साफ-सुथरा व्यक्तित्व व छबि होना मान-सम्मान और कद ही नहीं बढ़ाता बल्कि लोगों को आपसे जोड़ता है।

- वहीं अहिंसा में प्रतिशोध की भावना का अभाव होता है, जो व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के साथ पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर प्रेम, विश्वास और मेलजोल बढ़ाता है।

गांधी के सपनों का भारत बनाने की सार्थकता तभी संभव होगी, जब मात्र इन 2 बातों को ही हर इंसान खुद से शुरुआत कर नैतिकता के साथ कर्म, वचन, आचरण और व्यवहार में उतारने का दृढ संकल्प कर लें। न कि मात्र खास अवसरों पर लोगों की भीड़ के साथ बापू की बातों को याद कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ले।

सिर्फ यह 1 खामी..! कर देती है रावण की तरह चारों खाने चित
हिन्दू धर्म में विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि की नौ रातों में शक्ति पूजा द्वारा शक्ति संचय की भाव के साथ विजयादशमी पर शक्तिधर श्रीराम का स्मरण किया जाता है और बुराई और अहंकार के प्रतीक रावण का दहन किया जाता है।

राम-रावण युद्ध से जुड़ी यह मान्यता प्रचलित है कि भगवान राम ने रावण का वध कर अहंकार के अंत से ही तमाम सुख को पाने की राह दिखाई। किंतु राम और रावण के चरित्र और व्यक्तित्व को व्यावहारिक नजरिए से तुलना कर विचार करें तो रावण का अहंकार ही नहीं बल्कि उसके चरित्र की एक ओर बड़ी खामी दुर्गति का कारण बनी।

यह दोष अगर किसी भी इंसान के चरित्र में मौजूद हो तो उसका हर गुण, योग्यता, क्षमता निरर्थक होकर असफल और दु:खी जीवन का कारण बन सकती है। क्या हैं यह दोष? जानते हैं -

दरअसल, अक्सर रावण के दस सिर चरित्र दोषों के प्रतीक माने जाते हैं। किंतु रावण के चरित्र का सकारात्मक पक्ष यह भी था कि वह वेद, शास्त्रों, अनेक कलाओं व विद्याओं के साथ ज्योतिष व कालगणना का ज्ञाता था।

लिहाजा राम व रावण के व्यक्तित्व व चरित्र से जुड़ा एक दर्शन यह भी माना जाता है कि अगर राम बुद्धि संपन्न थे, तो रावण, राम से दस गुना बुद्धिमान था। बावजूद इसके वह राम के सामने परास्त हुआ। ऐसा इसलिए कि बुद्धि व ज्ञान संपन्नता के बावजूद रावण विवेक हीन था। जबकि सिर्फ एक सिर वाले राम बुद्धि के साथ विवेकवान भी थे यानी, सही और गलत, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म के बीच फर्क करने की अद्भुत क्षमता भगवान राम के पास थी, किंतु रावण के पास अभाव।

बस, राम की यही खूबी जीत का और रावण की खामी हार का कारण बनी। इस प्रसंग में सार यही है बुद्धि के साथ वक्त, हालात के मुताबिक सही और गलत को चुनने की सही निर्णय क्षमता भी सफल और सुखी जीवन के लिए अहम होती है। अन्यथा रावण की भांति दंभ भरा और विवेकहीन स्वभाव व व्यवहार जीवन में कुंठा, निराशा और असफलता लाता है।

इन स्त्रियों के लिए न हो मन में पाप..!
नवरात्रि में शक्ति की उपासना के साथ ही शारदीय नवरात्र में भगवान राम की भी आराधना की जाती है। असल में शक्ति और श्रीराम उपासना के पीछे संदेश यह भी है कि जीवन में कामयाबी को छूने के लिए बेहतर व मर्यादित चरित्र व व्यक्तित्व की शक्ति भी जरूरी है।

इस तरह नवरात्रि व विजयादशमी शक्ति के साथ मर्यादा के महत्व की ओर इशारा करती है। खासतौर पर शक्ति के मद में रिश्तों, संबंधों और पद की मर्यादा न भूलकर दुर्गति से बचना ही दुर्गा पूजा की सार्थकता भी है। जगतजननी का यही स्वरूप व्यावहारिक जीवन में स्त्री को माना जाता है।

यही कारण है कि वेद-पुराणों में 16 स्त्रियों को माता की तरह सम्मान देने का महत्व बताया गया है। कौन हैं ये स्त्रियां जानते हैं-

स्तनदायी गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।

अभीष्टदेवपत्नी च पितु: पत्नी च कन्यका।।

सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्त्नी प्रियाप्रसू:।

मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा।।

मातु: पितुश्र्च भगिनी मातुलानी तथैव च।

जनानां वेदविहिता मातर: षोडश स्मृता:।।

जिसका अर्थ है कि वेद में नीचे बताई 16 स्त्रियां मनुष्य के लिए माताएं हैं-

स्तन या दूध पिलाने वाली, गर्भधारण करने वाली, भोजन देने वाली, गुरुमाता, यानी गुरु की पत्नी, इष्टदेव की पत्नी, पिता की पत्नी यानी सौतेली मां, पितृकन्या यानी सौतेली बहिन, सगी बहन, पुत्रवधू या बहू, सासु, नानी, दादी, भाई की पत्नी, मौसी, बुआ और मामी।

मात्र 4 पंक्तियां..! देती है कमाल की दिमागी ताकत व कामयाबी
आज के युग में इंसान के जीवन पर भौतिकतावाद यानी सुख-सुविधाओं, वैभव की लालसा, अति महत्वाकांक्षाएं इतनी हावी है कि चाहे-अनचाहे हर इंसान इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। जिससे जीवन से जुड़ा भावनात्मक पक्ष दरकिनार हो जाता है। जबकि धर्म के नजरिए से सुखी और शांत जीवन के लिए भावनाओं और भौतिकता के बीच सही तालमेल बहुत जरूरी है।

इंसान चाहे परिवार में रहे, समाज में या कार्यक्षेत्र में सुख-सुविधाओं के मोह, स्वार्थ, या अति महत्वाकांक्षाओं के चलते संवेदनाओं व भावनाओं से दूर न जाए। क्योंकि भावनाएं जोडऩे वाली होती है, जिससे पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों और कार्य के लक्ष्यों को पूरा करना बेहद आसान हो जाता है।

अच्छे-बुरे विचारों के निरंतर उतार-चढ़ाव लाने वाले प्रतियोगिता के इस दौर में भी भावनाओं को ऐसी ही ताकत देती हैं, धार्मिक कर्म के आखिर में बोले जाने वाली विशेष 4 पंक्तियां। धर्म भावों से ओतप्रोत ये मात्र 4 पंक्तियां व्यावहारिक जीवन में आने वाले हर मुश्किल वक्त, दुविधा और बुरे विचारों से छुटकारे का बेहद ही सरल उपाय भी है, जो असफलताओं का कारण भी है। जानते हैं ये 4 पंक्तियां -

धर्म की जय हो,

अधर्म का नाश हो,

प्राणियों में सद्भाव हो,

विश्व का कल्याण हो।

ये पंक्तियां धर्म की महिमा उजागर ही नहीं करती, बल्कि सफलता के लिए मनोबल को ऊंचा भी करती है। क्योंकि इसमें धर्म का जयकारा कार्य के प्रति सत्य, निष्ठा, समर्पण तो अधर्म से दूरी ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ से परे होने के लिए संकल्पित करती है। तीसरी पंक्ति सद्भाव यानी मेलजोल व तालमेल से कार्य व जीवन को साधने का सूत्र। कार्यक्षेत्र में इसे टीम वर्क भी पुकारा जाता है। कल्याण यानी, पहली तीन बातों को संकल्प के साथ अपनाने पर लक्ष्य को जोरदार तरीके से भेदना व सफलता की ऊंचाईयों को छूना तय है।

संकट निवारक है यह हनुमान मंत्र
जीवन में संकट आते रहते हैं। संकटों के निवारण के लिए भगवान हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वे ही संकटमोचन अर्थात संकटों को दूर करने वाले हैं। नीचे लिखे इस हनुमान मंत्र का यदि विधि-विधान से जप किया जाए तो हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सभी संकट दूर हो जाते हैं।

मंत्र

ऊँ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा

जप विधि
सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें। हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करें। जप के लिए लाल हकीक की माला का प्रयोग करें।

बस, 1 छोटी-सी बात..! बेहद खुशनुमा रखेगी घर-परिवार व कार्यक्षेत्र का माहौल
जीवन में कर्म की राह को सरल बनाने के लिए जरूरी है कि उसे बेहद रुचि, समर्पण, निष्ठा और एकाग्रता से किया जाए। सरल शब्दों में कर्मयोग के पीछे भी यही भाव है। किंतु परिवार और कार्यक्षेत्र या जीवन में किसी भी जिम्मेदारी को पूरा करने के दौरान कार्य में तरह-तरह की कठिनाईयों भी आती है। समय, साधन या आपसी संबंधों में तालमेल का अभाव भी तनाव पैदा कर कार्यक्षमता पर असर डालता है। इससे अनेक अवसरों पर मन-मस्तिष्क में बुरे विचार हावी होते हैं।

अंदर और बाहरी तौर पर ऐसी अशांत स्थिति से छुटकारा ही परिवार के लिये जरूरतों की पूर्ति व कार्यक्षेत्र में लक्ष्य पाने में सफल बनाता है। कर्म के दौरान अशांति और तनावों से बचने के लिए हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भवदगीता में बताया एक सूत्र बेहद अहम साबित हो सकता है। जिसे जेहन में रखकर कार्य संपादन किया जाए तो न केवल व्यक्तिगत तनावों से बचा जा सकता है, बल्कि रिश्तों और संबंधों में नजदीकियां कायम रखी जा सकती हैं।

लिखा गया है कि -

मात्रस्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।

आगमापायिनो नित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।

इस श्लोक का अर्थ है कि इन्द्रिय और विषयों द्वारा मिलने वाले सर्दी-गर्मी व सुख-दुख स्थायी नहीं, बल्कि आते-जाते रहते हैं। इसलिए उनको सहन करना चाहिए। इस बात में व्यावहारिक जीवन के लिये सीधा संकेत यही है कि सहिष्णुता, यानी सहनशीलता ही वह सूत्र है, जिससे हर तनावभरे व अप्रिय स्थितियों से आसानी से निकला जा सकता है। साथ ही यह समझ लें कि वक्त हमेशा एक समान नहीं रहता, यानी बदलाव प्रकृति का नियम है, इसे स्वीकार कर आगे बढ़ते रहें।

सीखें, कैसे शांत रहकर आसानी से चढ़ें सफलता की सीढियां?
शांति में भी सौंदर्य छुपा होता है। सुंदरता की भांति शांति के संपर्क में आते ही मन को सुख व सुकून प्राप्त होता है। शांति मन की चंचलता में ठहराव लाती है। जिससे विचार और कर्म नई ऊर्जा व उमंग से भर जाते हैं। अच्छे-बुरे के बीच फर्क को समझने की विचार शक्ति शांति से संभव है। व्यावहारिक रूप से भी शांत स्थान, वातावरण हो या सहज व संयमित इंसान का साथ मनोबल व आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला होता है।

हिन्दू धर्मगंथ श्रीमद्भगवद्गीता में भी शांत व सहज रहकर सफलता तक का सफर तय करने के बेहतर सूत्र मिलते हैं। अगर आप भी अशांत स्वभाव व व्यवहार के कारण मिले असहयोग, दुर्भाव, उपेक्षा से बार-बार असफलता का सामना कर रहे हैं, तो यहां बताई एक अहम बात पर गौर करें -

लिखा गया है कि -

मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।

सिद्धयसिद्धयोनिर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते।।

गीता के इस श्लोक में जीवन में सात्विक ता सरल शब्दों में कहें तो कर्म, विचार, स्वभाव में सरलता, पवित्रा, सहजता और शांति को उतारने की अहमियत बताई गई है। अर्थ के मुताबिक जिस इंसान में 4 बातें हो, वह सात्विक माना गया है। इन बातों की जीवन में सफलता में निर्णायक भूमिका होती है। ये हैं -

- संगरहित कर्ता, यानी स्वयं के पुरुषार्थ, गुण व शक्तियों पर विश्वास करने वाला, अपेक्षारहित इंसान। अपेक्षा व उम्मीदें मन को कमजोर कर अशांत करती है।

- अहंकार के बोल न बोलने वाला, यानी जो विनम्र रहे व बोल-बोलकर अपनी श्रेष्ठता का बखान न करता रहे या दूसरों को कमतर समझ उपेक्षा न करे। वहीं अहंकारी स्वभाव सबल होने पर भी अशांति का कारण बनता है।

- उत्साह से भरा, यानी अपने कार्य व लक्ष्य के प्रति कभी भी उदासीन न रहे। हमेशा उसको पाने की चेष्टा करता रहे। इसके विपरीत निराशा इंसान को अशांत व तनावग्रस्त रखती है।

- कार्य में सफलता पर ज्यादा हर्ष या असफलता पर शोक में न डूबने वाला, यानी हर स्थिति में संतुलित, संयमित रहने वाला इंसान। वहीं सफलता का ज्यादा मद या नाकामी पर हताशा होना जीवन की गति में बड़ी बाधा बन सकता है।

आज के चांद में होंगी ये 2 अनूठी बातें..! गौर करनेवाले पर बरसेगी लक्ष्मी
धन और पुण्य का गहरा संबंध है, यानी धनवान बनने का सकारात्मक पक्ष विद्या, शील व कुल के रूप में सामने आता है। वहीं धनहीन होने पर ये तीनों गुण नष्ट हो सकते हैं। धर्मशास्त्र भी पिछले जन्म के सद्कर्म वर्तमान में धन प्राप्ति का कारण बताते हैं और ऐसा धन ही पुण्य कर्मों की प्रेरणा भी।

इस तरह जीवन में सारे कर्म-धर्म और कलाओं में दक्षता के पीछे धन की भूमिका अहम होती है। जीवन में धन की इसी अहमियत को जानते हुए धर्मशास्त्रों में अच्छे कर्म से धन संचय के उद्देश्य से कुछ खास घडिय़ों पर विशेष देव उपासना का महत्व बताया गया है। इसी कड़ी में शरद पूर्णिमा (आज रात) पर चंद्रदर्शन व देवी लक्ष्मी की उपासना का महत्व है।

असल में देवी लक्ष्मी धन का देवीय स्वरूप ही है। धार्मिक दृष्टि से भी देवी लक्ष्मी की उपासना दरिद्रता का नाश कर वैभव संपन्न बनाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शरद पूर्णिमा पर दिखाई देने वाले पूर्ण कलाओं युक्त चंद्रमा में मौजूद 2 अनूठी बातें किसी भी इंसान को लक्ष्मी की अपार कृपा का पात्र बना सकती हैं? यह दो बातें शास्त्रों में अच्छे कर्मों से धन संचय के लक्ष्य को भी सार्थक करती है। जानते हैं शरद पूर्णिमा के चांद की ये 2 विशेष बातें -

लक्ष्मी कृपा देने वाले शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की दो खासियत है - रोशनी और शीतलता। रोशनी, यानी प्रकाश ज्ञान स्वरूप माना जाता है। संकेत है कि व्यावहारिक जीवन में अधिक से अधिक ज्ञान अर्जन ही दक्ष, कुशल व माहिर बनाता है, यानी ज्ञान, गुणी बनने के साथ धनी बनने का मार्ग आसान करता है।

दूधिया रोशनी के साथ चंद्रमा की एक ओर विशेषता - शीतलता, यानी ठंडक यही संकेत करती है कि स्वभाव से शांत, वाणी से मधुर बने व व्यवहार मे विनम्रता को अपनाए। प्रतीकात्कात्मक रूप से लक्ष्मी का आनंद और शांत स्वरूप भगवान विष्णु का संग भी इस बात की ओर इशारा है। क्योंकि शांत, सरल, सौम्य, सात्विक और सहज रहने से न केवल तन व मन भी निरोगी, ऊर्जावान और दोष रहित होते हैं। बल्कि चंद्रमा की शीतलता की तरह दूसरों को भी प्रेम, सेवा, परोपकार व दया के रूप में बेहद राहत दी जा सकती है। ये गुण ही जीवन में सफल और वैभवशाली बनने के सूत्र हैं।

शरद पूर्णिमा की चांदनी पर नजर डालकर इन दो बातो को संकल्प के साथ जीवन में उतार लिया जाए तो धन ही नहीं तमाम सांसारिक सुखों को पाना भी बेहद आसान हो सकता है।

बस, इनकी कर लें सेवा..! ताउम्र मिलेगा भरपूर सुखों का मेवा
जीवन का सत्य यह भी है कि इंसान धर्म से परे नहीं हो सकता। ईश्वर में विश्वास रखने वाला आस्तिक ही नहीं, बल्कि ईश्वर को नकारने वाला नास्तिक भी जीवन से जुड़े कर्तव्य और जिम्मेदारियों के रूप में धर्म पालन करता ही है। किंतु फिर भी धर्म शब्द सुनते ही अनेक लोग कोई खास या भारी समझ का विषय मान धर्म से जुड़ी बातों से दूर या अलग रहना पसंद करते हैं।

दरअसल, धर्म को सबसे आसान तरीके से समझ जीवन में उतारना है तो बस इतना समझना ही काफी है कि जो बातों और व्यवहार किसी इंसान को स्वयं के अनुकूल नहीं लगते, वह दूसरों के साथ भी न करे। बेहतर जीवन वही माना गया है, जिसके द्वारा दूसरों का जीवन सार्थक बनाया जा सके।

ऐसी ही पवित्र भावनाओं से धर्म पालन के लिए जीवन में कुछ खास लोगों की सेवा या पालन-पोषण को सभी सुखों का सूत्र माना गया है। फिर चाहे आप धार्मिक विधानों से परे ही क्यों न रहें। जानते है किन-किन लोगों का पालन-पोषण स्वर्ग-सा सुख देता है?

लिखा गया है कि -

माता पिता गुरुर्भ्राता प्रजा दीना: समाश्रिता:।

अभ्यागतोतिथिश्र्चचाग्रि: पोष्यवर्गा स्वर्गसाधनम्।।

भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम्।

भरणं पोष्यवर्गस्य तस्माद् यत्नेन कारयेत्।।

अर्थ है कि माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा या अधीन जन, गरीब, दु:खी, शरणागत, अभ्यागत, अतिथि और अग्रि का यथासंभव भरण-पोषण करना स्वर्ग की राह पर बनाते हैं। यह श्लोक मूल रूप से व्यावहारिक जीवन के लिये भी निस्वार्थ सेवा और परोपकार द्वारा सुख-शांति पाने के सूत्र बताता है।

2 खास तिथियां..जिनमें गृहस्थ का भी कायम रहता है ब्रह्मचर्य!
अक्सर बोला और सुना जाता है कि पति-पत्नी का साथ एक नहीं सात जन्मों का होता है। यह बात भावनात्मक अधिक और व्यावहारिक कम लगती है। किंतु धर्मशास्त्रों में बताई विवाह परंपरा से जुड़ी कुछ खास बातें इस बात को सार्थक साबित करती है।

दरअसल, हिन्दू धर्म में विवाह एक संस्कार और गृहस्थी को धर्म माना गया है। धर्म के नजरिए से इसके पीछे पितृऋण और कुटुंब रक्षा के लिए संतान उत्पत्ति, खासतौर पर पुत्र प्राप्ति ही प्रमुख उद्देश्य है। जिसके द्वारा मृत्यु उपरांत भी पीढ़ी दर पीढ़ी श्राद्ध, यज्ञ, दान आदि द्वारा धर्म व पुण्य कर्म संचित किए जाते रहें।

वहीं इसमें मानवीय जीवन के व्यावहारिक पक्ष से जुड़ा पहलू भी साफ हैं। जिसके मुताबिक प्रेम को केन्द्र में रखकर मर्यादा के साथ स्त्री-पुरुष की इन्द्रिया कामनाओं को पूरा किया जा सके। जिससे भावनाओं में पवित्रता बनी रहे और वे पशुओं के समान व्यवहार से दूर रहें।

इस तरह विवाह संस्कार भाव शुद्धि के नजरिए से आध्यात्मिक तप के समान भी है। यही कारण है कि इसके तहत स्त्री-पुरुष के लिए विकार नहीं बल्कि शुद्ध विचार, संयम व त्याग भाव की प्रधानता के साथ संतान उत्पत्ति के लिये विशेष घडिय़ा नियत भी की गई है। जिसे गर्भाधान काल के रूप में शास्त्र सम्मत भोग भी माना गया है।

महाराज मनु के मुताबिक इन घडिय़ों के तहत कुछ विशेष रात्रियां और तिथियां नियत हैं। यहीं नहीं इनमें से भी दो विशेष रात्रियों या तिथियों में स्त्री से मिलन करने वाला गृहस्थ पुरुष भी ब्रह्मचारी माना गया है, यानी उसका ब्रह्मचर्य सुरक्षित रहता है। जानते हैं ये शास्त्रोक्त तिथियां -

यह दो खास तिथियां या रात्रि स्त्रियों के ऋतुकाल यानी रजोदर्शन के पहले दिन से 16वीं रात्रि तक के काल में आती हैं। इन 16 में से पहली 4 रातें व ग्यारहवीं, तेरहवीं रात यानी कुल छ: रातें मिलन के लिए निषेध है। शेष 10 रातें मान्य हैं। इन गर्भाधान के लिए अमान्य 6 रातों व शेष मान्य 10 रातों में से भी 8 रातों को छोड़कर बाकी बची कोई भी 2 रातों (जिनमें भी पर्व यानी अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा एकादशी शामिल न हो) पर स्त्री से मिलन या सहवास करने वाले का ब्रह्मचर्य भंग नहीं माना जाता है।

स्त्री की यह खूबी बन जाती है पुरुष की भी शक्ति..!
हिन्दू धर्मशास्त्रों में जीवन यात्रा के चार पड़ाव बताए गए हैं। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम व्यवस्था रूपी चार चरणों में जीवन में संयम व अनुशासन अपनाकर जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को पाने का लक्ष्य नियत किया गया है। जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही गृहस्थाश्रम अहम होता है।

शास्त्रों में शिव-शक्ति, प्रकृति-पुरुष या अर्द्धनारीश्वर के रूप में स्त्री-पुरुष को एक दूसरे की शक्ति या पर्याय बताया गया है। यही भाव सांसारिक जीवन में, खासतौर पर गृहस्थ जीवन में स्त्री-पुरुष के लिए एक-दूसरे के प्रति बनाए रखना सुख का सूत्र है। चूंकि गृहस्थी का मूल स्त्री होती है। जिसमें हर कार्य में स्त्री की प्रधानता होती है। इसलिए स्त्री की योग्यता और अयोग्यता पुरुष के जीवन की भी दिशा नियत करने वाली होती है।

यही कारण है कि भविष्य पुराण में सुखी गृहस्थ जीवन के लिए पुरुष का कुछ विशेष लक्षणों वाली स्त्री के साथ विवाह करना जरूरी बताया गया है, जो मात्र स्त्री ही नहीं बल्कि पुरूष की भी शक्ति बन उसे सिद्धि, समृद्धि और ख्याति दिलाने वाले साबित होते हैं।

लिखा गया है कि -

लक्षणेभ्य: प्रशस्तं तु स्त्रीणां सद्वृत्तमुच्यते।

सद्वृत्तयुक्ता या स्त्री सा प्रशस्ता न च लक्षणै:।।

इस श्लोक में साफ संदेश है कि स्त्री के लक्षण, यानी सौंदर्य या रंग-रूप की तुलना में उसका सदाचार यानी अच्छा आचरण श्रेष्ठ है। अगर स्त्री के आचरण मर्यादित और गरिमामय नहीं है तो ऐसी स्त्री का रूपवती होना भी व्यर्थ या अपयश देने वाला होता है। इस तरह मर्यादित आचरण को स्त्री की शक्ति बताया गया है, जिसका संग पाकर पुरुष भी अपार मान-सम्मान, यश व सफलता पाता है।

इन आंकड़ों से जानें कि कलियुग के अंत में कितने साल हैं बाकी..!
जब-जब धर्म की हानि होती है ईश्वर अवतार लेकर अधर्म का अंत करते हैं। इस बात से सत्य और अच्छे कर्मों को अपनाने के सूत्र के साथ पौराणिक मान्यताओं में अलग-अलग युगों में जगत को दु:ख और भय से मुक्त करने वाले ईश्वर के अनेक अवतारों के प्रसंग बताए गए हैं। शास्त्रों की इन बातों में युग के बदलाव के साथ प्राणियों के कर्म, विचार व व्यवहार में अधर्म और पापकर्मों के बढऩे के भी संकेत दिए गए हैं।

इसी कड़ी में सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद बताया गया है कि कलियुग में अधर्म का ज्यादा बोलबाला होगा। जिसके अंत के लिए भगवान विष्णु का कल्कि रूप में दसवां अवतार होगा। रामचरित मानस में भी कलियुग में फैलने वाले अधर्म का वर्णन मिलता है।

आज के दौर में भी व्यावहारिक जीवन में आचरण, विचार और वचनों में दिखाई दे रहे सत्य, संवेदना, दया या परोपकार जैसे भावों के अभाव से आहत मन अनेक अवसरों पर कलियुग के अंत और कल्कि अवतार से जुड़ी जिज्ञासा को और बढ़ाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ भविष्य पुराण में अलग-अलग युगों की गणना व अवधि बताई गई है। इस आधार पर जानते हैं कलियुग की अवधि कितनी लंबी या शेष है?

पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र, यानी दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि इस तरह है -

सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)

त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)

द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)

कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)

इस तरह सभी दिव्य वर्ष मिलाकर 12000 दिव्य वर्ष देवताओं का एक युग या महायुग कहलाता है, जो चार युगों के सौर वर्षों के योग 43,200,000 वर्षों के बराबर होता है।

3 खास वजहें..! जो सिर्फ दीप लगाने से लक्ष्मी को जल्द करती हैं प्रसन्न?
घोर अंधकार से भरी रात में जीवन को सुख-समृद्धि व शांति रूपी उजाले से रोशन करने के संकल्प व चाहत से दीप उत्सव दीपावली पर श्री, वैभव, ऐश्वर्य और तमाम संसारिक सुखों की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी का स्मरण किया जाता है। इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत रोशनी है। क्योंकि इस पर्व पर तन, मन व आत्मा को भी रोशन करने के महत्व से दीपों की जोत जलाई जाती है। इसलिए यह प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है।

दरअसल, शास्त्र व परंपराओं के मुताबिक जीवन के लिए अर्थ यानी, धन व भोग्य वस्तुओं की बहुत अहमियत बताई गई है। खासतौर पर धन को लक्ष्मी स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि अक्सर लक्ष्मी के पीछे दुनिया भागती दिखाई देती है। चूंकि लक्ष्मी का स्वभाव चंचल माना जाता है। इसलिए लक्ष्मी कहां जाना और रहना चाहती है? अगर यह जान लें तो संभवत: धन ही नहीं इच्छा पूर्ति व सुख-शांति की कवायद में चल रही दौड़-भाग कम या खत्म भी हो सकती है। क्योंकि फिर लक्ष्मी आप से कभी मुंह न मोड़ेगी।

इस पर्व की अंदर और बाहरी जीवन को रोशनी से सराबोर करने वाली दीपज्योति परंपरा में इस जिज्ञासा का हल मिलता है। जिसके पीछे लक्ष्मी की जल्द प्रसन्नता के 3 अलग-अलग पहलू जुड़े हैं। जानते हैं -

धर्म पालन के नजरिए से पहली दृष्टि यही है कि यह उत्सव अंधकार से उजाले की ओर बढऩे का सूत्र सिखाता है। यहां इशारा काम, क्रोध, मोह, मद, दंभ, कपट, छल रूपी अंधकार की ओर है। जिनसे अलग होने पर ही किसी इंसान को जीवन में रोशनी और खूबसूरत रंगों में नजर आ सकते हैं। ज्ञान, प्रेम, स्नेह, सद्भाव, भाईचारे, मेलजोल की भावना ही ये रंग और रोशनी हैं। ऐसा उजाला ही रिश्तों और सफलता से नजदीकियां बनाए रखता है।

दूसरी पौराणिक महत्व की दृष्टि से यह दिन समुद्र मंथन से लक्ष्मी के प्राकट्य का है। मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या की अर्द्धरात्रि के वक्त देवी लक्ष्मी सदाचारी गृहस्थों के निवास पर भ्रमण करती है। यही कारण है कि घर को साफ-सुथरा व पवित्र कर दीप लगाने से लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न ही नहीं होती, बल्कि उस स्थान को स्थायी वास बना लेती है।

वहीं तीसरे विज्ञान व व्यवहारिक नजरिए से मौसम के बदलाव यानी, बारिश के मौसम में नमी से बने अस्वच्छ वातावरण, वायु, व इनसे पैदा हुए रोग-रोगाणु, गंदगी, जो अक्ष्मी का रूप है, को दूर करने के लिए शीत ऋतु की शुरुआत में दीपों की ऊष्मा, ऊर्जा व रोशनी हितकारी होती है और सुख-स्वास्थ्य व शांति रूपी शुभ लक्ष्मी को बुलावा भी।

दीपावली के 5 दिन हैं ये 5 दुर्लभ संपत्तियां पाने का अचूक मौका
दीपावली पर्व खासतौर पर धन स्वरूपा देवी लक्ष्मी की साधना का पर्व है। जिसमें अमावस्या के अंधकार को चीरती दीपों की जोत से निकली रोशनी की किरणें इशारा करती हैं कि जीवन में असफलता के अंधकार से बाहर आना तभी संभव है जब दीपज्योति की तरह चरित्र व व्यक्तित्व की चमक चारों ओर बिखरे। यह कैसे संभव है? यहां जानते हैं -

जीवन व चरित्र को उजला व समृद्ध बनाने के नजरिए से दीपावली के पांच दिन यानी, धनतेरस से भाई-दूज की परंपराएं जीवन के लिए अहम 5 सूत्र सिखाती हैं, जो अनमोल सपंत्तियों या दौलत का रूप माने गए हैं। कौन-सी है यह बेशकीमती दौलत? जानें..

दरअसल, दीपावली महापर्व का पहला दिन यानी, धनतेरस - भगवान धनवन्तरि की पूजा द्वारा निरोगी जीवन रूपी धन की कामना की जाती है। जिसमें अच्छी सेहत के लिए संयम व अनुशासन का संदेश है।

दूसरे दिन नरक या रूप चतुर्दशी की परंपराओं में सौंदर्य रूपी धन की अहमियत है, जिसमें द्वारा समृद्ध जीवन के लिए तन ही नहीं बल्कि मन व व्यवहार की भी सुंदरता व पावनता कायम रखने का संदेश है।

तीसरे दिन यानी दीपावली पर लक्ष्मी व कुबेर के साथ गणेश, सरस्वती पूजा द्वारा सुखी व शांत जीवन के लिए धन के साथ ज्ञान, विवेक व बुद्धि की अहमियत बताई गई है।

चौथे दिन यानी, गोर्वधन पूजा द्वारा गोधन के साथ जुड़ा प्रतीकात्मक संदेश श्रीकृष्ण का स्मरण कर सफल जीवन के लिए कर्म व पुरुषार्थ के साथ प्रकृति और अन्य प्राणियों का महत्व भी उजागर करता है।

पांचवे दिन, यम द्वितीया या भाई-दूज रिश्तों के धन को सहेजने का संदेश है। जिसमें भाई-बहन के पवित्र रिश्तों को सामने रख हर संबंध में सच्चाई, पावनता, संस्कार और मर्यादा द्वारा कलहमुक्त जीवन बिताने का सूत्र है।

दीपावली के पांच दिनों से जुड़ी धन रूपी इस शक्ति साधना का संदेश जीवन में उतार लें तो महालक्ष्मी की कृपा ताउम्र बनी रहना संभव है।

इन 6 लतों से कर लें किनारा तो फौरन लक्ष्मी थाम लेगी हाथ
'तमसो मा ज्योर्तिगमय' यानी, ईश्वर अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें। इस भावना से सराबोर है दीप महोत्सव दीपावली। इस शुभ घड़ी में दरिद्रता से दूरी व संपन्नता से नजदीकियों क कामना ही सर्वोपरि होती है। जिनमें भी धन की चाहत अहम है।

धर्मग्रंथ महाभारत धन संपन्नता या लक्ष्मी का साया सिर पर बनाए रखने की ऐसी ही चाहत पूरी करने के लिए व्यावहारिक जीवन में कर्म व स्वभाव में कुछ गलत आदतों को पूरी तरह से दूर रहने की ओर साफ इशारा करता है। जिसके रहते लक्ष्मी की प्रसन्नता कठिन मानी गई है।

जानत हैं वैभवशाली, प्रतिष्ठित व सफल जीवन के लिए बेताब इंसान को बुरी आदतों से किनारा करना चाहिए -

महाभारत में लिखा है कि -

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

इस श्लोक मे कर्म, स्वभाव व व्यवहार से जुड़ी इन छ: आदतों से यथासंभव मुक्त रहने की सीख है -

नींद - अधिक सोना समय को खोना माना जाता है, साथ ही यह दरिद्रता का कारण बनता है, इसलिए नींद भी संयमित, नियमित और वक्त के मुताबिक हो। यानी वक्त और कर्म को महत्व देने वाला धन पाने का पात्र बनता है।

तन्द्रा - तन्द्रा यानि ऊँघना निष्क्रियता की पहचान है। यह कर्म और कामयाबी में सबसे बड़ी बाधा है। कर्महीनता से लक्ष्मी तक पहुंच संभव नहीं।

डर - भय व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करता है। जिसके बिना सफलता संभव नहीं। निर्भय व पावन चरित्र लक्ष्मी की प्रसन्नता का एक कारण है।

क्रोध - क्रोध व्यक्ति के स्वभाव, गुणों और चरित्र पर बुरा असर डालता है। यह दोष सभी पापों का मूल है, जिससे लक्ष्मी दूर रहती है।

आलस्य - आलस्य मकसद को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। संकल्पों को पूरा करने के लिए जरूरी है आलस्य को दूर ही रखें। यह अलक्ष्मी का रूप है।

दीर्घसूत्रता - जल्दी हो जाने वाले काम में अधिक देर करना, टालमटोल या विलंब करना।

अगर ठान लें यह बात..तो जल्द बन जाएंगे धनवान
धनतेरस यह धन की उपासना का पर्व है। जो द्रव्य लक्ष्मी ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य रूपी धन साधना का भी संदेश है। खासतौर पर धन अर्जन अच्छी सेहत की कामना से इस दिन धन के देवता कुबेर, स्वास्थ्य के देवता धनवन्तरि व धन, संपत्ति, व्यवसाय की पूजा की जाती है।

दरअसल, सनातन परंपरा में धन को लक्ष्मी स्वरूप माना गया है। इसलिए इससे जुड़ा संकेत यही है कि लक्ष्मी की भांति ही धन का स्वभाव भी चंचल होता है। यानी, वह चलता रहता है। इस तरह धन गतिशील, ऊर्जावान रहने की प्रेरणा देता है।

लिहाजा धनवान बनने की चाहत है तो इस शुभ दिन हम देव पूजा के साथ ही यह ठान ले कि धन अर्जन से जुड़े लक्ष्य को पाने के लिए हमेशा जीवन में सक्रियता, ऊर्जा व गति बनाए रखेंगे।

इस संकल्प को पूरा करने के लिए निरोगी होना भी अहम है। शास्त्रों के मुताबिक जीवनशैली में परिश्रम और अनुशासन को महत्व देकर स्वास्थ्य रूपी धन व पुरुषार्थ के जरिए आसानी से दीर्घायु और धनवान बन तनावमुक्त हो तमाम सांसारिक सुखों को पाया जा सकता है।

तो सिर्फ खूबसूरती से मिलेगी सीढ़ी दर सीढ़ी जोरदार सफलता
दीपोत्सव का दूसरा दिन नरक, रूप चतुर्दशी या छोटी दीवाली के रूप में मनाया जाता है। जीवन के सौंदर्य के अनेक पहलूओं को उजागर करने वाले इस महोत्सव का दूसरा दिन देह के सौंदर्य निखार के लिए विशेष महत्व रखता है।

असल में, इस दिन सौंदर्य पाने और कायम रखने की इस परंपरा के साथ नारकीय जीवन से बचने का भी संदेश है। इसलिए पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन नरक चतुर्दशी भी मनाई जाती है। इन मान्यताओं और पंरपराओं में ही छुपे है जीवन को बेहतर बनाने के सूत्र और संकल्पित होने की प्रेरणा। जानते हैं -

दरअसल, इस दिन शरीर शुद्धि के साथ विचार और आचरण को भी सुंदर व पावन बनाने का भी इशारा है, जो जीवन में सुख-दु:ख नियत करने वाले होते हैं। ऐसे सुखों को स्वर्ग और दु:खों को नरक के समान माना जाता है।

इस तरह साफ है कि जीवन को स्वर्ग या नरक बनाना इंसान के हाथों में है। चूंकि तन या मन की मलीनता ही नारकीय हालात पैदा करती हैं। इसलिए इस दिन यह दृढसंकल्प कर लें कि शरीर की पवित्रता के साथ बुद्धि, विवेक और ज्ञान द्वारा सोच को भी सुंदर बनाएंगें। जिससे कि दु:ख रूपी नरक से दूरी और मनचाहे सुखों का स्वर्ग पाना आसान हो सके। यानी सूरत के साथ सीरत भी निखरेगी।

अगर लें ऐसी जिम्मेदारी..तो जल्द दुनिया होगी मुट्ठी में
बेहतर स्वास्थ्य, सौंदर्य और धन का सुख तभी सार्थक है, जब इनका कर्म से बेहतर गठजोड़ कायम रहे। कर्म जिम्मेदारियों से जोड़कर रखता है और तीनों सुखों में इजाफा भी करता है। दीप महोत्सव का चौथा दिन कर्मयोगी श्री कृष्ण के स्मरण के साथ यही संदेश लाता है।

वैसे तो श्री कृष्ण चरित्र में जीवन को सही दिशा देने के अहम सूत्र समाए हैं। किंतु गोवर्धन लीला का प्रसंग उम्र के हर पड़ाव पर सुख पाने के लिए विशेष संकल्पों की प्रेरणा देता है। जानते हैं -

गोवर्धन लीला द्वारा जहां भगवान श्री कृष्ण ने मात्र गोवर्धन पर्वत पर पाए जाने वाले प्राकृतिक धन से पुरुषार्थ के अभाव में वंचित हो रहे गोकुलवासियों को कर्म और दायित्वों का महत्व समझाकर आलस्य से परे रहने की सीख दी। वहीं इंद्र के व्यर्थ दंभ को तोड़ा।

इस प्रसंग में व्यावहारिक नजरिए से इशारा है कि श्री सुख और संपन्नता के लिए आलस्य, कर्महीनता या अहंकार को मन, वचन और कर्म में स्थान न देने के प्रति दृढ संकल्पित रहें।

यही नहीं श्रीकृष्ण द्वारा अंगुली पर गोवर्धन को उठाना अच्छे बदलावों के लिये जिम्मेदारियों को निडरता के साथ उठाने का संकल्प लेने की प्रेरणा है। तभी योग्यताओं के सदुपयोग से प्रतिष्ठा, यश व सफलता पाकर दुनिया को अपना बनाया जा सकता है, भगवान श्रीकृष्ण की तरह।

पाप और दुर्गति की जड़ हैं ये 5 बातें..!
धर्मशास्त्रों की बातों पर गौर करें तो मोटे तौर पर कर्मों के दो परिणाम बताए गए हैं - पाप और पुण्य। जहां पाप सुखों से वंचित कर दु:ख का कारण बनते हैं, वहीं पुण्य, पापों को कम या मुक्त करने वाले माने गए हैं।

अक्सर देखा जाता है कि इंसान पाप कर्मों से तो जल्द जुड़ता है, वहीं सद्कर्मों और पुण्य कर्मों को लेकर अधिक सोच-विचार करता और वक्त लेता है। शास्त्रों में ऐसी प्रवृत्ति के पीछे 5 खास बातें बताई गई हैं, जिनके चलते सांसारिक जीवन में हर कोई जाने-अनजाने पाप कर बैठता है। इसलिए पापों से बचने के लिए इन बातों को सामने रख कर्म, विचारों और व्यवहार पर हमेशा ध्यान व मंथन जरूरी बताया गया है। जानते हैं ये 5 बातें -

लिखा गया है कि -

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:।।

संदेश है कि इन पांच कलह के वश में होने से पाप होते हैं। ये पांच क्लेश हैं-

अविद्या - अज्ञान का रूप है। सरल शब्दों में समझें तो हर स्थिति और विषय को लेकर सही समझ का अभाव। जिससे बुरे कर्म या सोच में भी सुख और अच्छा लगता है, जिसके नतीजे पाप के रूप में सामने आते हैं।

अस्मिता - मैं या अहं भाव। जिसे मन, मस्तिष्क व विचारों को जकडऩे वाला माना गया है। रावण, हिरण्यकशिपु या कंस भी इस दोष के कारण पाप कर्म में लिप्त होकर दुर्गति को प्राप्त हुए।

राग - आसक्ति का ही एक नाम, जो अच्छे-बुरे की समझ से दूर कर इंद्रिय असंयम का कारण बन पाप करवाती है।

द्वेष - मनचाहा न होने पर दु:खी और क्रोधित होने का भाव, जिससे कर्म, विचार और व्यवहार में दोष पैदा होता है।

अभिनिवेश - मौत का भय। हर इंसान यह जानते हुए भी कि मृत्यु अटल है, इससे बचने के लिए किसी न किसी रूप में तन, मन या धन का दुरुपयोग कर पाप कर्म करता है।

है प्रेम और निकटता की आस..तो पढ़ें यह काम की बात
जीवन में सुख और सफलता के लिए हर धर्मशास्त्र की बातों का सार सरल शब्दों में यही है कि जीवन को सही तरीकों से गुजारें। इन तरीकों का सीधा संबंध स्वभाव, व्यवहार और कर्म से जुड़ा है। इनमें गुण और दोष सुख और दु:ख नियत करते हैं।

शास्त्रों के मुताबिक प्रेम का भाव न केवल हमेशा सुखी रहने बल्कि रिश्तों और ईश्वर से निकटता की चाहत को पूरा करने का भी अहम जरिया है। किंतु एक स्वाभाविक दोष से यह सुख छिन जाता है। यह दोष या कमी है - क्रोध यानी गुस्सा। कैसे क्रोध प्रेम से वंचित रखता है? और क्या है इससे निजात पाने का तरीका। जानते हैं -

द्वेषता, अहं और मोह सभी क्रोध की जड़ है। ऐसी मनोदशा में मनचाहा न होना क्रोध पैदा करता है। यही गुस्सा प्रेम व रिश्तों में बाधा बनता है। मन भी मैला होता है। जिससे इंसान के लिए सही और गलत के बीच का फर्क करना संभव नहीं हो पाता यानी विवेकहीन हो जाता है। क्रोध के कारण पैदा प्रेम व विवेक की कमी अलगाव व पतन तय कर देती है।

यही कारण है कि क्रोध पर विजय के लिए भी एक सीधी राह बताई गई है। जिसको अपनाकर हर संबंधों में प्रेम और निकटता की मिठास पाई जा सकती है। महाभारत में लिखा गया है कि -

अक्रोधेन जयते क्रोधम्

यानी क्रोध न करके क्रोध पर जीत हासिल करो। जिसके लिए शांत रहने का अभ्यास जरूरी है और अंदर व बाहरी शांति पाने का बेहतर उपाय क्षमा करना बताया गया है।

सांई के इन 5 सूत्रों से पाएं बड़ी कामयाबी और ऊंचा मुकाम
धर्मशास्त्रों में गुरु को साक्षात् ईश्वर का दर्जा दिया गया है। क्योंकि गुरु ही ज्ञान, बुद्धि और विवेक द्वारा शिष्य को उसकी गुण और शक्तियों से पहचान कराते हैं। जिसके द्वारा बेहतर, सफल व आदर्श जीवन बनाना संभव होता है। धर्म व आध्यात्मिक नजरिए से भी गुरु कृपा ही मन, वचन व कर्म में देवीय गुणों को जगाकर ईश्वर से मिलन की शक्ति भी देती है।

सांई बाबा ऐसे ही जगतगुरु के रूप में पूजनीय है। हिन्दू धर्म मान्यताओं में वह गुरु दत्तात्रेय का अवतार भी माने जाते हैं, जिन्होंने प्रकृति की हर रचना में गुरु के दर्शन किए और 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की, जिनमें प्राणी, वनस्पति शामिल थे।

ऐसे ही महायोगी और महागुरु स्वरूप सांई चरित्र में जीवन में सफलता और ऊंचा मुकाम पाने के अनेक सूत्र हैं, जो धर्म पालन के नजरिए से भी अहम माने गए हैं। जानते हैं ये सूत्र -

प्रेम - सांई बाबा ने सुखी जीवन के लिए प्रेम भाव को सबसे अहम माना। यही कारण है कि धर्म, छोटे-बड़े, ऊंच-नीच की भावना से परे रहकर बोल, कार्य और व्यवहार प्रेम को स्थान देने की सीख दी। क्योंकि प्रेम ही विश्वास का आधार है, जो मन ही नहीं, व्यक्तियों को भी जोड़कर रखता है।

संयम - सांई के श्रद्धा-सबूरी के अहम सूत्रों में संयम और समर्पण का सूत्र छुपा है, जो सांसारिक जीवन की सफलता के लिए बहुत जरूरी है। धर्मशास्त्र भी धर्म पालन के लिए इंद्रिय संयम का महत्व बताते हैं। सांई के इन सूत्रों में संकेत हैं हर कार्य में श्रद्धा या समर्पण और धैर्य के साथ शक्ति व ऊर्जा का उपयोग कर सफलता की राह आसान बनाई जा सकती है।

ईश्वर के प्रति प्रेम व विश्वास - सबका मालिक एक का सूत्र ईश्वर की एकात्मता का ही संदेश ही नहीं देता बल्कि इसमें धर्म के बंधनों से मुक्त होकर इंसानी भावनाओं व रिश्तों को सर्वोपरि रखने की सीख है। इसमें सफलता के लिए कर्म के साथ ईश्वर भक्ति और शक्ति पर विश्वास रखने की प्रेरणा है।

परोपकार व दया - सांई चरित्र में मानवता का भाव धर्म की राह पर चलने के लिए अहम दया व परोपकार की सीख देता है। सीख है कि किसी भी रूप में छोटे या कमजोर की उपेक्षा नहीं बल्कि प्रेम के साथ सहायता और मदद के लिए तैयार रहें। इस तरह सांई द्वारा संवेदना भी सफलता का एक सूत्र बताया गया है।

दूसरों का सम्मान - गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। जगतगुरु सांई बाबा ने भी बड़ा बनने का ऐसा ही अहम सूत्र सिखाया। सांई ने अहं को छोड़ खासतौर पर ईश्वर, गुरु और उम्र में बड़े लोगों के साथ ही सभी के प्रति सम्मान और विश्वास का भाव रखने की सीख दी। जिसके द्वारा कोई इंसान स्वयं भी मान, प्रतिष्ठा, कृपा व सहायता पाकर ऊंचा पद व मनचाही सफलता पा सकता है।

जानें, कब धन और ज्ञान देते हैं भारी फायदा और नुकसान..!
ज्ञान, धन और बल सफल जीवन के प्रमुख आधार है। जहां ज्ञान धन अर्जन की राह बनाता है, वहीं धन व बल, ज्ञान के साथ ही यश, प्रतिष्ठा और सुखों को पाने में आने वाली तमाम कठिनाईयों को दूर कर देते हैं। इसलिए जीवन के बेहतर प्रबंधन के लिए यह समझ भी जरूरी है कि कब और कैसे ज्ञान, धन व शक्ति का उपयोग या दुरुपयोग लाभ व हानि दे सकता है?

इस संबंध में शास्त्रों में इंसान की अच्छाई व बुराई को भी धन, ज्ञान व शक्ति से मिलने वाले फायदे और नुकसान का आधार बताया गया है। जानते हैं अच्छे और बुरे इंसान के पास होने पर धन, शक्ति और ज्ञान का स्वरूप कैसा होता है?

लिखा गया है कि -

विद्यां विवादाय धनं मदाय

शक्ति: परेषां परिपीडानाय

खलस्य साधोर्विपरीतमतेत्

ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

सरल शब्दों में इस बात का निचोड़ यही है कि चूंकि अच्छे और बुरे लोगों का स्वभाव व आचरण समान नहीं होता है। इसलिए धन, शक्ति व ज्ञान का उपयोग भी अलग-अलग तरीकों से होता है, जो लाभ व हानि का कारण बनते हैं। जब दुर्जन के पास ज्ञान होता है तो वह विवाद करता है, धन होने पर व्यर्थ कामों में बर्बाद करता है और शक्ति का उपयोग दूसरों को डराने या कष्ट देने मे करता है।

वहीं सज्जन विद्या का उपयोग ज्ञान, परोपकार व जागरण के लिये, धन का उपयोग दान के रूप में व शक्ति का उपयोग दूसरों का सम्मान बचाने व रक्षा के लिए करता है।

इन बातों में संकेत यही है कि जीवन में ज्ञान, धन व शक्ति सुख और यश का कारण तभी बनते हैं, जब अच्छाई को हर रूप में अपनाया जाए। अन्यथा जीवन पर अपयश व दरिद्रता का साया मण्डराने में देर नहीं लगती है।

इन 4 बातों को रखें याद..तो सही वक्त पर मिलेगा जीवन का हर सुख
हर इंसान सुख-संपन्नता पाने और दु:ख-दरिद्रता से परे रहने की इच्छा रखता है। जिसके लिए शक्ति, सामर्थ्य और साधन के मुताबिक योजना और लक्ष्य नियत भी किए जाते हैं। सोच यही होती है जल्द से जल्द और सही वक्त पर जीवन से जुड़े अहम सुख पा लिये जाएं। शास्त्रों में यह वक्त और सुख चार पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के रुप में भी बांटे गए है।

इन सुखों को पाने की तमाम कोशिशों और सही दिशा में चलने के बावजूद अनेक अवसरों पर मकसद पूरा होने में वक्त लगता है या मनचाहे नतीजे नहीं मिलते। इसके पीछे कर्म और व्यवहार के वे दोष भी जिम्मेदार होते हैं, जो सुख या लक्ष्य को पाने की जल्दबाजी में मन और विचारों को दृढ़ रखने के लिए जरूरी कुछ बातों को भुला देने से पैदा होते हैं।

शास्त्रों की दृष्टि से चार अहम बातों को हमेशा ध्यान रखने पर हर लक्ष्य को प्राप्त करते हुए जीवन को यशस्वी और सफल बनाया जा सकता है। जानते हैं ये चार बातें -

इन बातों में सुखी-संपन्न जीवन के 4 सूत्र हैं -

- पहला यह ध्यान रहे कि लक्ष्मी हमेशा सत्य के साथ रहती है। सत्य के पीछे पवित्रता का भाव जुड़ा है। यही कारण है सच्चाई और स्वच्छता तन, मन और धन में बनाई रखी जाए।

- दूसरा यश और कीर्ति हमेशा पवित्र भाव, त्याग व नम्रता का संग करती है। यही कारण है कि बुरा इंसान भी नाम कमा सकता है कि किंतु उसके बुरे भाव व कर्म ही अपयश का कारण बनते हैं।

- तीसरा निरंतर अभ्यास ही विद्यावान या दक्ष बनने में निर्णायक होता है। अभ्यास के बिना सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।

- चौथा बुद्धि की सार्थकता चेष्टा यानी कर्म के साथ ज्ञान के गठजोड़ में है। जितना कर्म और ज्ञान का संयोग होगा उतनी ही बुद्धि की धार तेज होती जाएगी।

जानें, भगवान विष्णु का 1 अद्भुत गुण..! खुल जाएंगी आंखों के साथ किस्मत भी
हिन्दू धर्म में देवउठनी एकादशी, देव प्रबोधन यानी जागने की शुभ घड़ी मानी जाती है। इस शुभ घड़ी से जुड़ी देव उठने की मान्यता के पीछे देवत्व भाव और आचरण को अपनाने की प्रेरणा है। आसान शब्दों में समझें तो देवत्व यानी अच्छाई से जुडऩा।

अच्छाई का रूप क्या हो और कैसे व्यावहारिक जीवन में अपनाएं? यह भी भगवान विष्णु की इस मंगल तिथि पर उपासना से साफ हो जाता है। भगवान विष्णु का स्वरूप सत्व गुणी है। बस, इसी गुण में सांसारिक जीवन की सफलता का सार छुपा है। जानते हैं कैसे श्री हरि की यह अद्भुत खूबी जीवन के सारे भ्रम, संशय और कलह को दूर रखती है?

दरअसल, सत्व गुण के साथ सत्य, धर्म, शांति, सुख और पावनता के भाव जुड़े हैं। भगवान विष्णु जगत पालक के रूप में पूजनीय है। इन बातों में ही जीवन जीने की प्रेरणा भी है व जज्बा भी।

इसमें व्यावहारिक जीवन का सूत्र यही है कि परिवार, समाज हो या कार्यक्षेत्र पालक या मुखिया के दायित्वों को निभाते वक्त शांति और संयम के साथ किसी भी निर्णय तक पहुंचे। कथनी और करनी में सच्चाई, निष्पक्षता और पवित्रता का ध्यान रहे। मन-मस्तिष्क में हमेशा सकारात्मक विचार और प्रसन्नता को स्थान दें। नम्र और सहयोगी बनकर अहंकार से दूर रहें। ऐसे विचार व आचरण ही हमेशा तनाव, संताप व राग-द्वेष से दूर रख खुद के साथ दूसरों के जीवन में भी आनंद व सुख घोलेंगे।

श्री हरि विष्णु के सत्व रूप में समाए ये पवित्र भाव ही आंखे खोलने वाले यानी जीवन में घुले स्वार्थ, द्वेष से जुड़ी सारी गलत धारणाओं को दूर रख बेहतर, कामयाब और यशस्वी व सौभाग्यशाली जीवन की चाहत पूरी करना सुनिश्चित कर देते हैं। दूसरे शब्दों यह दिन इंसान से भगवान बनने की ओर कदम बढ़ाने के लिए संकल्पित होने की शुभ घड़ी है।

इन शालग्राम शिलाओं को सिर्फ छूने से ही होता ये चमत्कार..!
आज देवउठनी एकादशी है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक यह जगतपालक भगवान विष्णु के शयन से जागने की शुभ घड़ी है। इसी तरह यह तिथि विष्णु स्वरूप शालग्राम व तुलसी विवाह का मंगलकारी अवसर भी है।

पुराण प्रसंग के मुताबिक शंखचूड़ जैसी दानवी शक्तियों से मुक्ति और जगत कल्याण के लिए ही भगवान विष्णु को शालग्राम शिला का स्वरूप प्राप्त हुआ। यही नहीं दानव राज की पत्नी तुलसी ने श्री विष्णु कृपा के साथ देव वृक्ष तुलसी व गण्डकी नदी का रूप प्राप्त किया। इसलिए गण्डकी नदी और उसके आस-पास पाए जानी वाली शालग्राम शिलाएं बहुत ही पुण्यदायी मानी गई है। साथ ही विष्णु और तुलसी का किसी भी स्थान पर होना सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है।

नारायण स्वरूप यही शालग्राम शिलाएं इस पर बनने वाले चक्र के आधार पर विष्णु के अलग-अलग रूप व अवतारों के नाम वाली होती हैं, जो इतनी चमत्कारी भी मानी गई है कि इनकी पूजा ही नहीं बल्कि छूने मात्र से बड़े से बड़े पापों का अंत हो जाता है। जानते हैं कि ऐसी ही विलक्षण शालग्राम शिलाओं का स्वरूप कैसा होता है?

मत्स्य - कमल के आकार वाली शिला।

कूर्म - नीले रंग, तीन रेखा और बिन्दुओं से अंकित शिला।

ह्ययग्रीव शिला - जिस शिला पर पांच रेखाएं व अंकुश का आकार हो।

नृसिंह - जिस शिला के बीच गदा जैसी रेखा, नाभिचक्र और फैले हुए वक्षस्थल का आकार दिखाई दे।

वामन - छोटी और गोलाकार शिला।

वाराह - विषम आकार व बीच में दो चक्रों के चिन्ह वाली शिला।

कृष्ण - गोलाकार और पीछे की ओर का हिस्सा झुका हुआ हो।

दामोदर - नीले रंग व बीच में भी नीले रंग के च्रकवाली शिला।

अनन्तक - अनेक रंग, रूप व जिस पर नाग जैसे फण अंकित हो।

लक्ष्मीनारायण - दो चक्रों वाली शिला।

इसी प्रकार शंख, गदा, पद्म चिन्हों और चक्र अंकित शालग्राम शिलाएं विष्णु के अनेक नामों से जानी जाती है। जिनकी पूजा हर तरह से मंगल व कल्याण करने वाली मानी जाती है।

धनवान के मन में होती है ऐसी हलचल..सुकून के लिए जानें 1 निदान
धन सुखी, शांत व स्थिर जीवन का अहम जरिया है। धर्मग्रंथ भी अर्थ के रूप में जीवन के लिए जरूरी 4 पुरूषार्थ में शामिल कर धन की उपयोगिता को उजागर और प्रमाणित करते हैं। वैभव, ऐश्वर्य, सम्मान, यश, सुविधा जैसे अनेक रूपों में धन सुख का साधन है। जीवन में निराशा और असफलता के वक्त भी धन का संग मिल जाए तो मन और तन को नई जीवन शक्ति प्राप्त होती है।

जीवन में सुख प्राप्ति के लिए धन की इतना अहमियत होने के बावजूद भी यही धन जीवन में अनेक दु:ख व परेशानियों का कारण भी बन जाता है। व्यावहारिक जीवन में धन कैसे और कब धन सुख-चैन छिन लेता है? इन बातों का धर्मग्रंथ साफ करते हैं। जिनका जानकर कोई भी इंसान धनवान हो या धन का अभाव, हर स्थिति में जीवन में संतुलन और संयम बनाए रख सकता है -

लिखा गया है कि -

अर्थस्योपार्जने दु:खमर्जितस्यापि रक्षणे।

आये दु:खं व्यये दु:खमर्थेभ्यश्च कुत: सुखम्।।

चौरेभ्य: सलिलादग्रे: स्वजनात् पार्थिवादपि।

भयमर्थवतां नित्यं मृत्यो: प्राणभृतामिव।।

खे यातं पक्षिभिर्मांसं भक्ष्यते Ÿवापदैर्भुवि।

जले च भक्ष्यते सर्वत्र वित्तवान्।।

विमाहयन्ति सम्पत्सु तापयन्ति विपत्तिषु।

खेदयन्त्र्जनाकाले कदा ह्यर्था: सुखवहा:।।

यथार्थपतिरुद्विग्रो यश्च सर्वार्थनि:स्पृह:।

यतश्चार्थपतिर्दु:खी सुखी सर्वार्थनि:स्पृह:।।

इन बातों में धन के रूप में कामनाओं को दु:ख का कारण बताकर उनसे दूर रहने का संकेत भी है। सरल शब्दों में अर्थ यही है कि धन या दौलत कमाने, फिर उसकी रक्षा करने और उपयोग करने तीनों ही स्थितियों में कष्ट प्राप्त होता है। ठीक उसी तरह जैसे मांस को आसमान, जमीन या पानी में फेंकने पर क्रमश: पक्षी, कुत्ते या मछली खा जाते हैं। क्योंकि धन मिलने पर उससे पैदा मोह ही धन के नाश होने पर दु:ख पैदा करता है। यही नहीं धनवान को चोर, आग, शासन, परिजन या पानी से भी धन नाश का भय बना रहता है।

यही कारण है कि धन हर काल में सुख का कारण नहीं होता। असल में, इस बात के जरिए धन की भांति ही इच्छाओं पर संयम और संयम से सुख का अहम सूत्र भी मिलता है।

ये 5 काम पक्की करते हैं नरक में जगह..! रहें बेहद सावधान
जीवन में सुख और दु:ख के पीछे बोल, कर्म और बर्ताव में अच्छाई-बुराई या गुण-दोष कारण होते हैं। धार्मिक नजरिए से अधर्म या बुरे कर्म पाप तो धर्म या अच्छे कर्म पुण्य देते हैं। जिनके आधार पर प्राणी मृत्यु के बात स्वर्ग और नरक को प्राप्त करता है। इस तरह स्वर्ग सुख और नरक दु:ख के प्रतीक भी है।

यही कारण है कि दु:ख व दरिद्रता से घिरा जीवन नारकीय और सुख-समृद्ध जीवन स्वर्ग सा सुख देने वाला भी माना जाता है। हर इंसान ऐसे वैभव की इच्छा रखता है, किंतु शास्त्रों के मुताबिक कलियुग में हावी कलह राग-द्वेष पैदा करता है। जिससे व्यक्ति सुखों की चाहत में भी जाने-अनजाने गलत काम कर नरक की ओर कदम बढ़ाता है यानी दु:ख के बीज बोता है। जिनसे बचने के लिए कर्म, वचन और व्यवहार से जुड़ी कुछ बातों के प्रति सावधान होना जरूरी बताया गया है। जानते हैं ये बातें -

हिन्दू धर्मग्रंथों में इंसान के ऐसे अनेक दोष भी बताएं गए हैं, जो नरकगामी कहे गए हैं। ऐसे दोषयुक्त व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के अलग-अलग नाम भी बताए गए है। जानें, कैसे होते हैं ये 5 लोग?

विषम - जो सामने मीठे बोल बोले और पीछे कटु वचन। जिनकी कथनी और करनी में फर्क हो।

पिशुन - कपट, झूठ, छल, शक्ति या प्रेम के दिखावा कर ठगने वाला।

अधम - जो गुरु से ऊंचे स्थान पर बैठे, देवता के सामने जूता और छतरी लेकर जाए। आधुनिक संदर्भ में बड़ों का सम्मान न करने वाला या धर्म से विमुख या निंदक।

पशु - व्यावहारिक दृष्टि से मात्र सांसारिक इच्छाओं को पूरा करने की चाहत रख हर काम करने वाला। देव सेवा व शास्त्रों के ज्ञान से दूर। धार्मिक दृष्टि से प्रयाग में रहते हुए भी स्नान न करने वाला।

कृपण - जो क्रोध कर देव पूजा व दान करे। यह नहीं धार्मिक व पितृ कर्मो में अन्न-धन से संपन्न होने पर भी निम्र स्तर का भोजन कराने वाला।

कहा गया है कि ऐसे स्वभाव व दोष वाले व्यक्तियों को न तो स्वर्ग मिलता है न ही मोक्ष। इसलिए ऐसे दोष और व्यक्तियों से बचकर पवित्र भावों से जीवन गुजारने पर ही सुखों के रूप में जीते-जी बैकुण्ठ का आनंद पाया जा सकता है।

इन 4 बातों से फासला...कायम रखता है स्त्री की अस्मिता
धर्मशास्त्रों की बात पर गौर करें तो शक्ति ही हर रचना व सृजन का आधार है। धार्मिक दृष्टि से यह शक्ति जगतजननी दुर्गा के रूप में पूजनीय है, वहीं सांसारिक दृष्टि से सृजन बल प्राप्त स्त्री शक्ति स्वरूपा मानी गई है। प्रकृति रूप ईश्वर से मिला रचना का यह वरदान स्त्री को जननी तो धर्म भावों से देवी दुर्गा को वरदायिनी के रूप में पूजता है।

इस विलक्षण गुण व शक्ति से ही स्त्री संसार व घर का केन्द्र कहलाती है। शास्त्रों के मुताबिक किसी भी शक्ति या बल की कमजोरी हितकारी नहीं होती। खासतौर पर जब बात सृजन व संसार से जुड़ी हो। इसलिए न केवल शक्ति के मूल स्त्री के सम्मान व सुरक्षा पुरुष का कर्तव्य बताया गया है, बल्कि स्वयं स्त्री के लिए भी स्वयं के स्वाभिमान, शील व प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कुछ बातों से दूरी बनाए रखना जरूरी बताया गया है।

गरूड पुराण के मुताबिक आचरण व व्यवहार में नीचे लिखी चार बातों से दूर रहकर स्त्री का सम्मान व शील सुरक्षित रह सकता है। ये बाते हैं -

दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति का संग - ऐसा करना स्त्री के लिए बड़े अपयश का कारण बनता है। क्योंकि बुरी संगति चरित्र में दोष पैदा करती है।

बहुत ज्यादा विरह या सम्मान - किसी बात पर बहुत ज्यादा शोक या दु:ख या फिर किसी का अत्यधिक सम्मान भावनात्मक रूप से कमजोर बनाकर मन व व्यवहार में दोष पैदा कर सकता है, जो स्त्री की साख गिराने वाले साबित हो सकते हैं।

दूसरों के लिए स्नेह - परिजनों या निकट संबंधियों की किसी कारण विशेष या क्षणिक लाभ के लिए उपेक्षा या अपमान कर दूसरों के प्रति स्नेह जताना, अपनों के विरोध, द्वेष या असहयोग से बड़े दु:खों का कारण बन सकता है।

दूसरों के घर में रहना - कामना, स्वार्थ या राग के वशीभूत ऐसा कर्म निश्चित रूप से स्त्री की छबि बिगाडऩे वाला होता है।

इस कारण कोई मृत्यु के बाद बन जाता है भूत-प्रेत!
शास्त्रों की सीख है कि जीवन के रहते सुख-सुकून व मृत्यु के बाद दुर्गति से बचने के लिए के लिए अच्छे कर्म और सोच बहुत जरूरी है। व्यावहारिक रूप से भी किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए सही विचार होने और उसके मुताबिक काम को अंजाम देने पर ही मनचाहे नतीजे संभव है। अन्यथा सोच और क्रिया में तालमेल का अभाव या दोष बुरे परिणामों के रूप में सामने आते हैं।

मृत्यु के संदर्भ यही बात सामने रख शास्त्रों की बात पर गौर करें तो बताया गया है कि कर्म ही नहीं विचारों में गुण-दोष के मुताबिक भी मृत्यु के बाद आत्मा अलग-अलग योनि प्राप्त करती है। जिनमें भूत-प्रेत योनि भी एक है। हालांकि विज्ञान भूत-प्रेत से जुड़े विषयों को वहम या अंधविश्वास भी बताता है। लेकिन यहां बताई जा रही मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनने से जुड़ी बातों में जीवन में सुखी व शांति से भरे जीवन का एक अहम सूत्र भी हैं। जानते हैं किस कारण मृत्यु के बाद प्राप्त होती है भूत-प्रेत योनि और क्या है इससे जुड़ा जीवनसूत्र? -

हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में लिखी ये बातें मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनने का कारण उजागर करती है -

भूतानि यान्ति भूतेज्या:

यानी भूत-प्रेतो की पूजा करने वाले भूत-प्रेत योनि को ही प्राप्त करते हैं। इस बात को एक और श्लोक अधिक स्पष्ट करता है -

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।।

यानी मृत्यु के वक्त प्राणी मन में जिस भाव, विचार या विषय का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव या विषय के अनुसार योनि को प्राप्त हो जाता है।

इन बातों में संकेत यही है कि अगर व्यक्ति ताउम्र बुरे काम व उसका चिंतन करता रहे, तो वह बुराई के रूप में मन में स्थान बना लेते हैं और अन्तकाल में भी वही बातें मन-मस्तिष्क में घूमती हैं। ऐसे बुरे भावों के मुताबिक वह व्यक्ति भूत-प्रेत की नीच योनि को ही प्राप्त हो जाता है।

दरअसल, भूत-प्रेत भी मलीनता या बुराई का प्रतीक भी हैं। इसलिए यहां भूत-प्रेत उपासना का अर्थ बुराई का संग भी है। इसलिए संकेत यही है कि जीवन में बुरे कर्मों से दूरी बनाए रखें, ताकि जीवन रहते भी व जीवन के अंतिम समय में मन के अच्छे भावों के कारण मृत्यु के बाद भी दुर्गति से बचें।

जानें, कैसे बिना पाठ-पूजा शनि को करें प्रसन्न?
शनि न्याय के देवता यानी दण्डाधिकारी माने जाते हैं। न्याय का नाता धर्म पालन से है। क्योंकि अच्छे-बुरे कर्म न्याय का आधार होते हैं। मान्यता है कि शनि भी जगत के प्राणियों पर पाप-पुण्य कर्मों के आधार पर ही कृपा भी करते हैं व दण्डित भी। शनि का यह न्याय शास्त्रों के मुताबिक शनि की ढैय्या, साढ़े साती या महादशा के दौरान सौभाग्य, सफलता या नाकामी और दरिद्रता के रूप में दिखाई देता है।

दरअसल, शनि भक्ति जीवन में अच्छे कार्यों व सोच को अपनाने का सबक ही देती है। सद्कर्म व अच्छे विचार ही धर्म पालन के लिए अहम है। इसलिए शास्त्रों में शनि की प्रसन्नता के लिए धार्मिक कर्मकांड के अलावा बोल, व्यवहार और कर्म से जुड़ी ऐसी बातें भी कारगर बताई गई है, जिनको शनिदेव की बिना पाठ-पूजा के व्यावहारिक जीवन में अपनाना भी आसान है। यहां तक कि नास्तिक यानी ईश्वर भक्ति से दूर रहने वाले इंसान पर भी इन बातों के कारण शनि कृपा कर सफल व सौभाग्यशाली बना देते हैं।

जानते हैं शनि कृपा के लिए दैनिक जीवन में धर्म पालन से जुड़ी ये खास बातें -

सेवा - मान्यता है कि शनिदेव जरावस्था या बुढ़ापें के स्वामी है। इसलिए हमेशा माता-पिता या बड़ों का सम्मान व सेवा करने वाले पर शनि की अपार कृपा होती है। इसके विपरीत वृद्ध माता-पिता या बुजूर्गों को दु:खी या उपेक्षित करने वाला शनि के कोप से बहुत पीड़ा पाता है।

परोपकार - परोपकार धर्म का अहम अंग है। दूसरों की पर दया खासतौर पर गरीब, कमजोर को अन्न, धन या वस्त्र दान या शारीरिक रोग व पीड़ा को दूर करने में सहायता शनि की अपार कृपा देने वाला होता है।

दान - शनि भक्ति में दान का महत्व बताया गया है। दान उदार बनाकर घमण्ड को भी दूर रखता है। इसलिए यथाशक्ति शनि से जुड़ी सामग्रियों या किसी भी रूप में दान धर्म का पालन करें। अहं व विकारों से मुक्त इंसान से शनि प्रसन्न होते हैं।

क्रोध का त्याग - शनि का स्वभाव क्रूर माना गया है। किंतु वह बुराईयों को दण्डित करने के लिए है। इसलिए शनि कृपा पाने व कोप से बचने के लिए क्रोध जैसे विकार से दूर रहना ही उचित माना गया है।

सहिष्णुता - शनि का स्वरूप विकराल है। वहीं शनि को कसैले या कड़वे पदार्थ जैसे सरसों का तेल आदि भी प्रिय माना गया है। किंतु इसके पीछे भी सूत्र यही है कि कटुता चाहे वह वचन या व्यवहार की हो, से दूर रहें व दूसरों के ऐसे ही बोल व बर्ताव को द्वेषता में न बदलें यानी सहनशील बनें।

शिव के इस अनूठे नाम में है सफलता के 2 खास सूत्र..!
शिव के नाम हो या लीला जीवन जीने की अनेक कलाएं और भरपूर ज्ञान सिखाते हैं। शिव भक्ति में रमकर ही शिव चरित्र में जीवन से जुड़े ज्ञान व रहस्य को समझा और उतारा जा सकता है। शिव के ज्ञान स्वरूप की महिमा को पुराणों में लिखी बात उजागर भी करती हैं -

लिखा गया है कि -

शंकराज्ज्ञानमिच्छेतु

यानी शिव से ज्ञान की कामना करनी चाहिए।

शिव के एक अनूठे नाम में सफल जीवन का ऐसा ही ज्ञान छुपा है। अक्सर घर, स्त्री, पुत्र या पैसों की उलझनों में इंसान की सारी उम्र निकलती है। अंत में आ धमकती है मृत्यु। किंतु जीवन का यह सफर अज्ञानता की कमी से अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ थमता है। इसलिए शिव स्वरूप से जुड़े इस नाम में छुपे 2 सूत्र उन सारी इच्छाओं को आसानी से पूरा करने में मदद कर सकते हैं, जिनको पाने के लिए ज्ञान की कमी से जूझना पड़ता है। जानते हैं ये शिव नाम -

शिव का यह नाम व अवतार है- वीरभद्र। शिव के इस नाम में वीर और भद्र, ये दो शब्द ही ऐसे नायाब सूत्र हैं, जिनके बूते जीवन के हर चरण में मनचाही सफलता को पाना आसान बनाया जा सकता है।

दरअसल, यहां वीरता का संबंध तन, मन व वचन तीनों से है, जो पराक्रम व साहस के साथ सत्य, पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प के रूप में उजागर होती है। इसी तरह भद्र होने के पीछे भी संदेश है कि चरित्र और आचरण को पवित्र रखें। तन, मन व बोल में संयम, अनुशासन व विनम्रता कायम रखें। अहंकार से बचें।

इस तरह वीरभद्र शब्द जुड़कर सीख यही देते हैं कि हर इंसान शिव की भांति शक्ति संपन्न या बलवान होने पर भी मन, वचन व कर्म में संयम, शांति व नम्रता को भी स्थान दे तो मनचाही सफलता और यशस्वी जीवन की कामना पूरी करना बेहद आसान है।

बस, सुबह यह 1 अच्छा काम! देता है 10 बड़े फायदे
व्यावहारिक जीवन में अक्सर कर्म की अहमियत ओर इशारा करता एक सबक सुना व बोला जाता है कि जो जागता है व पाता है और जो सोता है वह खोता है। असल में कर्म ही आलस्य रूपी निद्रा से दूर रख हमेशा पुरुषार्थ से जोड़कर मन-मस्तिष्क को जाग्रत रखते हैं। दैनिक जीवन में सुबह भी ऐसी ही सुखद व ऊर्जावान घड़ी होती है, जो शरीर को ही नहीं बल्कि मन, विचारों को हमेशा जागने व उठकर चलने की ही प्रेरणा देती है।

यही कारण है कि प्रात: काल यानी सुबह का वक्त धर्म व विज्ञान दोनों ने ही संयम व अनुशासन से जुड़ी बहुत सी बातों को अपनाकर जीवन में सफलता के हर मकसद को पूरा करने के लिए श्रेष्ठ माना है। क्योंकि शुरुआत बेहतर होने पर ही सटीक नतीजे मिलना संभव है। सुबह की स्वच्छ हवा, शांत वातावरण, सूर्योदय की लालिमा व रोशनी तन-मन को उत्साह व उमंग से भरनेवाली होती है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में सुबह के इसी ही सुकूनभरे वक्त में जीवन को साधने के लिए ही 1 काम को करना बेहद जरूरी बताया है। यहां तक कि रोग या किसी विवशता में भी उस काम को करने के अनेक विकल्प बताए गए हैं। खासतौर पर सुबह धार्मिक कार्य इस काम के बिना दोषपूर्ण ही माने गए हैं और यह काम है - स्नान।

जी हां, धर्म-कर्म के नजरिए से सुबह जप, पूजा-पाठ के पहले स्नान करना चाहिए। शास्त्रों में प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा ज्ञान और अनुभव से ही स्नान से जुड़े 10 अहम फायदे बताए हैं। जिनका संबंध मानव के पूरे जीवन से है। इसलिए इस क्रिया के पूरे लाभ पाने के लिहाज से ही इसे धर्म व सुबह के वक्त से जोड़ा गया। ताकि हर कोई दैनिक क्रियाओं के साथ सरलता से अपना सके। बहरहाल, जानते हैं वे 10 लाभ जो सिर्फ नहाने मात्र से ताउम्र प्राप्त होते हैं -

लिखा गया है कि -

गुणा दश स्नान परस्य साधो रूपञ्च तेजश्च बलं च शौचम्।

आयुष्यमारोग्यमलोलुपत्वं दु:स्वप्रनाशश्च यशश्च मेधा:।।

सरल शब्दों में अर्थ है कि सुबह स्नान करने से 10 गुण प्राप्त होते हैं। ये हैं - रूप यानी सौंदर्य, तेज, बल या शक्ति, पवित्रता, स्वास्थ्य, बुद्धि, बुरे सपनों से मुक्ति, निर्लोभता या लालसा से मुक्ति, आयु व यश।

सार यही है कि स्नान से तन निरोगी होने से मन-मस्तिष्क भी ऊर्जावान और तनावमुक्त रहता है। जिससे न केवल इंसान की उम्र बढ़ती है, बल्कि इनसे मिला मनोबल व पैदा अच्छे विचार सफल और यशस्वी बनाने वाले होते हैं।

जानें, क्या न करें मां-बहन व भाई के साथ! वरना..
भूत-प्रेत दरिद्रता और अपवित्रता के प्रतीक भी हैं। इसलिए जीवित रहते भी तन की अस्वच्छता से लेकर अज्ञानता, कटु बोल और व्यवहार से मिलने वाले बुरे नतीजों से भारी दु:ख व अभाव भी शास्त्रों में बताई मृत्यु उपरांत बुरे कर्मों से मिलने वाली प्रेत योनि भुगतने का प्रत्यक्ष एहसास ही हैं।

दरअसल, धर्मशास्त्र जीवन को साधने की ही सीख देते हैं। इसी कड़ी में हिन्दू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में भी व्यावहारिक जीवन में बुरी कर्मों की सजा प्रेत योनि मिलना भी बताया गया है। जिसके पीछे गूढ़ उद्देश्य यही है कि हर प्राणी सदाचार, संस्कार, मर्यादा व सद्कर्मों से जुड़कर रहे तो सुख-सम्मान भरा जीवन संभव है, अन्यथा भूत-प्रेत की तरह दुर्गति को प्राप्त होता है।

बहरहाल, जानते हैं गरुड़ पुराण के मुताबिक व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन के दौरान किए गए वे गलत काम, जिनका दण्ड मृत्यु उपरांत प्रेत योनि के रूप में प्राप्त होता है -

लिखा गया है कि -

मातरं भगिनीं ये च विष्णुस्मरणवर्जिता:। अदृष्दोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम्।

भ्रातृधुग्ब्रह्महा गोघ्र: सुरापो गुरुतल्पग:। हेमक्षौमहरस्ताक्ष्र्य स वै प्रेतत्वमाप्रुयात्।।

न्यासापहर्ता मित्रधु्रक् परदारतस्तथा। विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।

कुलमार्गांश्चसंत्यज्य परधर्मतस्तथा। विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम्।।

इन बातों को सरल शब्दों में समझे तो प्रेत योनि में जाने के पीछे ऐसे बुरे काम हैं -

- बेकसूर मां, बहन, पत्नी, बहू और कन्या को छोड़ देना।

- भाई के साथ दगाबाजी, गाय को मारने वाला, नशा करने वाला, गुरुपत्नी के प्रति दुर्भाव रखने वाला, किसी भी मनुष्य या ब्राह्मण को मृत्यु तुल्य दु:ख देने वाला व चोर।

- घर में रखी अमानत को हरने वाला, मित्र के साथ धोखा करने वाला, परायी स्त्री से संबंध रखने वाला, विश्वासघाती व दुष्ट।

- वह अज्ञानी व दुराचरण करने वाला, जो कुटुंब या परिवार की अच्छी परंपराओं व धर्म की राह छोड़े।

सावधान! कहीं आप भी इन कमियों से तो नहीं हो रहे असफल
शास्त्रों की बातों पर गौर करें तो कलियुग ऐसा काल है, जिसमें कलह की प्रधानता है, जो सांसारिक जीवन में कामनाओं, आकांक्षा, अपेक्षा के कारण आंतरिक रूप से तनाव, असंतोष, अशांति और बाहरी रूप से शारीरिक कष्टों के रूप में प्राप्त होता है। इससे कोई इंसान अछूता नहीं। लेकिन जीवन की सफलता व सार्थकता बुरे को अच्छा या प्रतिकूल को अनुकूल बनाने में ही है।

शास्त्रों में आजीवन व्यवहार और स्वभाव में ऐसी बातों को अपनाने व बनाए रखने की सीख देते हैं, जिनकी कमी या दोष से ही इंसान असफलता, दु:ख या बाधाओं का सामना करता है। किंतु अहं या स्वार्थवश इन बातों की अनदेखी करता है।

परिवार या कार्यक्षेत्र में मुखिया या किसी छोटे पद पर रहते अगर आप भी कार्यसिद्धि या लक्ष्य को पाने में रुकावटों या असफलता का सामना कर रहें हैं तो सावधान होकर हिन्दू धर्मग्रंथ में बताई इन बातों पर गौर करें -

लिखा गया है कि -

तमुवाच मुनिर्धीमान् दयाधर्मप्रपोषाणम्। निर्भयस्य समं दानं न भूतं न भविष्यति।

अनर्हान् दण्डमादद्यादर्हपूजाफलं भजेत्। मित्रता गोद्विजे नित्यं समता दण्डनिग्रहे।

सत्यता सुरपूजायां दमता गुरुपूजने। मृदुता दानसमये संतष्टिर्निन्द्यकर्मणि।।

इन बातों को सरल रूप में समझें तो नीचे लिखी बातों को जीवन में जरूर स्थान दें -

- दया भाव रखें। जरूरतमंद व आश्रय में आए व्यक्ति का भरपूर साथ दें।

- अधर्म व प्रपंच करने वाले को दण्ड दें, किंतु द्वेष न रखें।

- किसी भी गलती के दण्ड को लेकर पक्षपात से दूर रहें।

- देव पूजा स्वार्थ, कपट छोड़कर श्रद्धा, भक्ति से करें।

- ज्ञानी व बड़ों का सम्मान करें। उनकी सेवा में मन को पवित्र, समर्पित और निस्वार्थ रखें।

- दान में विनम्रता से करें।

- जाने-अनजाने हुए छोटे-से गलत काम को भी बड़ा गलती मान स्वीकार करें व उससे दूर रहें।

- शक्ति या किसी गलती से आपसे भयभीत इंसान को क्षमा कर भयमुक्त करें।

- धार्मिक महत्व की दृष्टि से गाय व ब्राह्मण के साथ ही हर इंसान को ब्रह्म का अंश मान सम्मान करें।

जानें कौन-से भैरव हैं किस अद्भुत शक्ति के स्वामी?
शिव जगदव्यापी यानी जगत में हर कण में बसते हैं। शास्त्र भी कहते हैं कि इस जगत की रचना सत्व, रज और तम गुणों से मिलकर हुई। जगतगुरु होने से शिव भी इन तीन गुणों के नियंत्रण माने जाते हैं। इसलिए शिव को आनंद स्वरूप में शंभू, विकराल स्वरूप में उग्र तो सत्व स्वरूप में सात्विक भी पुकारा जाता है।

शिव के यह त्रिगुण स्वरूप भैरव अवतार में भी प्रकट होता है। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक शिव ने प्रदोषकाल में ही भैरव रूप में काल व कलह रूपी अंधकार से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुए। इसलिए शास्त्रों और धार्मिक परंपराओं में अष्ट भैरव से लेकर 64 भैरव स्वरूप पूजनीय और फलदायी बताए गए हैं।

इसी कड़ी में जानते हैं शिव की रज, तम व सत्व गुणी शक्तियों के आधार पर भैरव स्वरूप कौन है व उनकी साधना किन इच्छाओं को पूरा करती है -

बटुक भैरव - यह भैरव का सात्विक व बाल स्वरूप है। जिनकी उपासना सभी सुख, आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा व मुक्ति प्रदान करने वाला माना गया है।

काल भैरव - यह भैरव का तामस किन्तु कल्याणकारी स्वरूप माना गया है। इनको काल का नियंत्रक भी माना गया है। इनकी उपासना काल भय, संकट, दु:ख व शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।

आनंद भैरव - भैरव का यह राजस स्वरूप माना गया है। दश महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव उपासना ऐसी ही अर्थ, धर्म, काम की सिद्धियां देने वाली मानी गई है। तंत्र शास्त्रों में भी ऐसी भैरव साधना के साथ भैरवी उपासना का भी महत्व बताया गया है।

इस कसौटी पर परखें, प्रेम सच्चा है या..
शास्त्रों के मुताबिक प्रेम जीवन का आधार है। इसलिए जीवन में धर्म पालन के लिए प्रेम अहम अंग माना गया है। चाहे वह ईश्वर भक्ति हो या सांसारिक जीवन रिश्तों का निर्वहन प्रेम में छुपे विश्वास, समर्पण व निष्ठा भाव के बिना निरर्थक है। इस तरह जीवन के अहम लक्ष्यों तक पहुंचने की राह आसान या मुश्किल होना प्रेम की मौजूदगी या अभाव पर भी निर्भर होती है।

यही कारण है कि सच्चा प्रेम ही जीवन की सफलता का सूत्र माना गया है। किंतु शास्त्रों के मुताबिक माया के आवरण से ढंके इस संसार में सच और झूठ में फर्क कठिन होता है। ऐसी अज्ञानता ही असफलता, क्लेश और अशांति लाती है। फिर व्यावहारिक जीवन में आपसी विश्वास और तालमेल बनाए रखने के लिए परिवार, कार्यक्षेत्र में परिजनों व संगी-साथियों के सच्चे प्रेम को कैसे जाना व समझा जाए? इस जिज्ञासा का हल शास्त्रों में बताई इस बात से साधारण व्यक्ति भी आसानी से पता कर सकता है।

इस बात पर सकारात्मक नजरिए से विचार कर संबंधों को बेहतर बनाना व सुखी-शांत जीवन पाना भी बेहद आसान हो सकता है। लिखा गया है कि-

दूरस्थोऽपि समीपस्थो यो यस्य हृदि वर्तते।

यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरगः।।

सरल शब्दों में सार यही है कि अगर परिवार या कार्यक्षेत्र में जिस भी व्यक्ति के साथ रहें या काम करें। अगर एक-दूसरे के बोल, व्यवहार या विचारों से सहमति या प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती और मतभेद या मनमुटाव रहता है, तो ऐसा साथ करीब होकर भी बड़ी दूरी के समान है।

वहीं, एक ही स्थान पर न रहकर या दूरियां होने पर भी जो लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख पर विचार करते हों। एक-दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने की हरसंभव कोशिश व छुपी मदद करते हों। दूर होकर भी आपस में विचारों का आदान-प्रदान व बातचीत मन को प्रसन्न रख मनोबल व संबल देती हो तो ऐसे लोग तन से दूर होकर भी मन के बेहद करीब होते हैं। बस, यही सच्चा प्रेम है।

इस बात का निचोड़ यही है कि मात्र शारीरिक नजदीकियां नहीं बल्कि भावना और निष्ठा सच्चे प्रेम का आधार है। जिनको ऊपर लिखी बातों के आधार पर परख रिश्तों में बनने वाले व्यर्थ फासलों को दूर रखा जा सकता है।

अगर इन खास दिनों पर किया दान..तो कभी न होंगे दीन, न दु:खी
जीवन में सही समय, सही उद्देश्य से किया गया अच्छा काम वास्तविक रूप से धर्म पालन है। क्योंकि ऐसे काम ही हमेशा सुख-शांति और यश की कामना को पूरी करने वाले होते हैं। शास्त्रों के मुताबिक दैहिक, मानसिक और आत्मिक सुख देने वाला ऐसा ही कर्म है-दान।

व्यावहारिक रूप से दान से जुड़ा देने का भाव अहं व स्वार्थ जैसे दोषों को घटाता है। इसलिए दान के लिए त्याग, निस्वार्थ और विनम्रता के भाव ही सार्थक व सुख देने वाले माने गए है। यही कारण है कि जन्म से लेकर मृत्यु कर्मों तक में धार्मिक महत्व की दृष्टि से दान परंपराएं जुड़ी है। चाहे वह पशु दान हो या कन्यादान।

इसी कड़ी में शिवपुराण में लिखा है कि जिसे जिस वस्तु की जरूरत हो, उसे बिना मांगे ही दे दी जाए तो ऐसा दान बहुत फलीभूत होता है। जिसके लिए विशेष दिनों पर किया दान धर्म दीनता व दु:खों से बचाने वाला बताया गया है। जानते हैं वे खास दिन -

दान के लिए वैसे तो चैत्र सहित सभी हिन्दू पंचांग के बारह माह शुभ है, लेकिन इनमें भी आने वाली विशेष घडिय़ां बहुत शुभ मानी गई है। जो ये हैं -

- किसी भी माह की सूर्य संक्रांति के दिन किया गया दान अन्य शुभ दिनों की तुलना में दस गुना पुण्य देता है।

- सूर्य संक्रांति से भी दस गुना पुण्यदायी सूर्य के विषुव योग यानी सूर्य की विषुवत् रेखा पर स्थिति, जो हिन्दू पंचांग के मुताबिक चैत्र नवमी और आश्विन माह की नवमी पर बनता है।

- विषुव योग से दस गुना फल कर्क संक्रांति यानी दक्षिणायन शुरू होने के दिन।

- कर्क संक्रांति से भी दस गुना मकर संक्रांति यानी उत्तरायन शुरू होने के दिन।

- इनसे भी अधिक पुण्य चन्द्रग्रहण और सबसे श्रेष्ठ समय सूर्यग्रहण के दौरान व बाद माना गया है।

घर के इन स्थानों पर धार्मिक कर्म देते हैं जल्द मनचाहा शुभ फल
देवालय या मंदिर पवित्र स्थान माना जाता है। जहां की पावनता जीवन के सभी भय, चिंता, संशय व विकारों को इस तरह दूर करती है कि मन विश्वास, ऊर्जा, सुरक्षा के साथ अच्छे कर्म, वचन और व्यवहार की अद्भुत प्रेरणा से भर जाता है। पवित्रता को अपनाने का संकेत देती इस बात में सूत्र यही है अगर मन को ही पावन बना लिया जाए तो वह मंदिर की तरह स्वयं के साथ दूसरों को भी सुख-सुकून देने वाला होता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में मन को स्वच्छ, ऊर्जावान और मजबूत बनाए रखने के लिए ही देव उपासना व कर्म बेहतर उपाय माने गये हैं। देव मर्यादा, कर्म की पवित्रता और सार्थक फल के लिए इनको करने के लिए स्थान विशेष का महत्व बताया गया है। जानते हैं शिव पुराण में बताए देवकर्म करने के लिए श्रेष्ठ स्थान -

- सबसे पहले अपना घर में पवित्रता के साथ किया गया कर्म शास्त्रोक्त फल देते हैं।

- गोशाला में किया गया कर्म घर से भी दस गुना फलदायी।

- किसी पवित्र सरोवर के किनारे गोशाला से दस गुना पुण्य देता है।

- तुलसी, बिल्वपत्र या पीपल वृक्ष की जड़ के समीप देव कर्म जलाशय से दस गुना अधिक शुभ फल देते हैं।

- इन वृक्षों के तले किए देव कर्म से अधिक फल मंदिर में किए देवकर्म देते हैं।

- मंदिर से अधिक पुण्यदायी तीर्थ भूमि में किए देवकर्म होते हैं

- तीर्थ भूमि से भी अधिक शुभ किसी नदी के तट पर किए देवकर्म देते हैं।

- नदियों में भी सप्तगंगा तीर्थ यानी सात नदियों गंगा, गोदावरी, कावेरी, ताम्रपर्णी, सिंधु, सरयू और नर्मदा के किनारे किया देव कर्म अधिक शुभ फलदायी हैं।

- इनसे अधिक समुद्र के किनारे किया गया देवकर्म पुण्यदायी है।

- वहीं सबसे ज्यादा शुभ और पुण्यदायी फल पर्वत शिखर पर किए देवकर्मों का मिलता है। इस संदर्भ में रावण द्वारा किए गए तप से पाई शिव कृपा उल्लेखनीय है।

इन सब स्थानों के बाद शिवपुराण में मन की पावन बनाने का छुपा संदेश देते हुए लिखा गया है कि जहां मन लग जाए वहीं देवकर्मों क लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान है।

इस बात से मन में न आएगा घर या जीवन छोडऩे का भाव!
मन की कमजोरी पलायन वृत्ति यानी कर्तव्य या जिम्मेदारियों से पीछे हटने, छोडऩे या भागने का विचार पैदा करती है। इससे न उबरने पर यह असफल जीवन या पतन का निश्चित कारण बनती है। इसलिए जीवन व जिम्मेदारियों की बागडोर मजबूती से थामें रखने के लिए मनोबल व सही विचार अहम होते हैं। जिसके लिए हिन्दू धर्मशास्त्रों में सांसारिक जीवन को सामने रख कुछ सूत्र बताए गए हैं। क्या है यह सूत्र, जानते हैं -

आत्मबल व सही सोच कायम रखने के लिए कर्म व मन की गति के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना जरूरी है। जिसके लिए कोई भी व्यक्ति अगर हिन्दू धर्मशास्त्र गरुड पुराण में नीचे लिखा सूत्र जानें तो निराश व हताशा में भागकर नहीं बल्कि जागकर जीवन को सफल बना सकता है -

लिखा गया है कि -

वनेपि दोषा: प्रभवन्ति रागिणां गृहेपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तप:।

अकुस्सिते कर्मणि य: प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम्।।

सरल अर्थ है कि रागी यानी आसक्त या मोह के जाल में उलझे व्यक्ति से जंगल में भी रहे तो दोष हो जाते हैं। किंतु संयमशील व्यक्ति के लिए घर भी तपोवन बन जाता है।

व्यावहारिक जीवन के नजरिए इस श्लोक का निचोड़ सरल शब्दों में यही है कि मन का इच्छा, कामना, मोह व आसक्ति से जुड़ा होना ही इंसान में बुराईयों की जड़ है, जिनसे अशांत मन व्यक्ति को दायित्वों से दूर ले जाता है। उसे रिश्ते व जीवन बोझ लगने लगते है। इससे बचने का सटीक तरीका यही है कि इंसान इच्छाओं व कामनाओं पर काबू रख पक्के इरादों के साथ ऐसे अच्छे कर्मों से जुड़ा रहे, जो यश भी देने वाले हों। इसे शास्त्रों में इन्द्रिय संयम भी कहा गया है।

मन व कर्म पर संयम ही इंसान को सुखी व प्रसन्न रख घर व जीवन की हर जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए संकल्पित रखेंगे। साथ ही जीवन के सकारात्मक पक्ष को भी सामने लाएंगे।

कभी न बोलें ऐसे 5 तरह के बोल, वरना..
मन और कर्म ही नहीं बल्कि उसके साथ वचन यानी बोल या शब्दों में संयम व अनुशासन जीवन में सुख-दु:ख नियत करने वाले माने गए हैं। धर्म और व्यवहार दोनों ही नजरिए से वाणी की पावनता व मधुरता भी इंसान की सफलता का सूत्र माना गया है। क्योंकि वचन में सत्य और मिठास ही विश्वसनीय बनाकर आगे बढऩे के अवसर देती है।

धर्मग्रंथों में भी यशस्वी और कामयाब जीवन के लिए शब्द शक्ति का महत्व बताते हुए सत्य वचन के प्रति हमेशा संकल्पित और वचन दोष से सावधान रखने की सीख दी गई है। किंतु व्यावहारिक जीवन में अक्सर स्वार्थ या हितपूर्ति व असंयम के चलते इंसान ऐसे कटु शब्द व वाणी के उपयोग का अभ्यस्त हो जाता है, जो आखिकार बुरे नतीजों का कारण बनते हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथों में जीवन के लिए बाधक व घातक बनने वाली ऐसी ही पांच तरह की बातों से बचना स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी हितकारी बताया गया है। ये 5 वाचिक पाप भी कहे गए हैं। जानते हैं बातचीत के दौरान कैसे 5 तरह के बोल से किनारा कर लें -

- अनियन्त्रित प्रलाप यानी विषय से हटकर या अनावश्यक रूप से या आपत्ति के बाद भी लगातार अपनी बात ही बोलते चले जाना। ऐसे बोल दूसरों की परेशानी या कष्ट का कारण बनते हैं।

- अप्रिय यानी कटु, कठोर या अपशब्दों से भरे बोल बोलकर दूसरों को आहत करना।

- असत्य यानी किसी भी स्वार्थ, गलत कामों के दुराव-छुपाव या हानि पहुंचाने के लिए झूठ बोलना।

- परनिन्दा यानी ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थसिद्धि या मानहानि के उद्देश्य से दूसरों में दोष दर्शन।

- पिशुनता या चुगली - लक्ष्य व स्वार्थ सिद्धि व किसी की हानि की मंशा से एक व्यक्ति से जुड़ी बातों को तोड़-मरोड़, बढ़ा-चढ़ाकर या शिकायत के रूप में दूसरों तक पहुंचाना।

शास्त्र कहते हैं कि बातचीत के दौरान शब्दों को इन 5 गलत तरीकों व भावनाओं से उजागर करना मन व विचारों में हमेशा दोष व अशांति बनाए रखते हैं। इनसे तत्कालिक या क्षणिक लाभ हो सकता है, किंतु लंबे वक्त के लिए ऐसे शब्द अपयश व पतन का कारण बनते हैं।

सिर्फ चोरी नहीं, ऐसे काम करने वाला भी होता है चोर..!
सामान्यत: चोर शब्द का अर्थ धन या वस्तु की चोरी करने वाले व्यक्ति के संदर्भ में लिया जाता है। किंतु हिन्दू धर्मशास्त्रों में मन व कर्म में पैदा हर दोष को पाप की जड़ मानकर जीवन व मृत्यु के बाद भी पीड़ादायी बताया गया है। इसी कड़ी में चोरी भी मानसिक व व्यावहारिक दोष से हुआ पापकर्म माना गया है, जो खासतौर पर आलस्य, दरिद्रता या कर्महीनता से जन्मे अभाव या स्वार्थ के हावी होने से होता है।

भविष्य पुराण के मुताबिक चोरी के अलावा व्यावहारिक जीवन में आचरण या जिम्मेदारियों व कर्तव्यों की पूर्ति में दोष की दृष्टि से कुछ अन्य कामों को करने वाला भी स्तेयी यानी चोर कहा गया है। यह भी कहा गया है कि ऐसे काम करने वाला व्यक्ति नरक में जाता है। जानते हैं चोरी के अलावा कौन-से हैं वे कर्म, जो चोर बना देते हैं -

- अन्याय या गलत तरीकों से धन अर्जित करने वाला।

- अन्याय या गलत कामों से दूसरों का धन हड़पने वाला।

- देव उपासना, स्मरण या परोपकार से दूर रहने वाला।

- माता-पिता, बुजूर्गों या गुरु की सेवा-सुश्रूषा न करने वाला।

- मदद या उपकार करने वाले के प्रति अच्छा व्यवहार न करने वाला।

- धर्मग्रंथों, रत्न-आभूषण, सोना, जमीन, पशु जैसे घोड़े, गाय को चुराने वाला।

- योग्य या अपात्र होने पर वर्जित धन को भी स्वीकार करने या पाने वाला।

चोर बना देने वाले ऐसे कामों से बचने की सीख के पीछे सुखी जीवन का एक सूत्र यह भी मिलता है कि दुर्भाव व स्वार्थवश वस्तु या धन की चोरी करने के बजाए सेवा, सद्भाव, धर्म पालन व परोपकार से हृदय का हरण करने वाला ही यशस्वी व सफल जीवन को प्राप्त कर सकता है।

अगर घर में न हों ये आसान धर्म-कर्म..तो चला जाएगा सुख-चैन
घर-परिवार के सौंदर्य का पैमाना बाहरी रंग-रोगन या बनावट से नहीं बल्कि सुख-शांति है। सुख-शांति के लिए अहम है सुदृढ व्यवस्था। ऐसे प्रबंधन में परिजनों के कार्य, व्यवहार में सच्चाई के साथ, कर्तव्य व मर्यादा का पालन जरूरी है। इनमें दोष आते ही सुख-चैन छिन जाता है व शांति भी भंग हो जाती है। नतीजतन घर में रहते भी जीवन नारकीय महसूस होने लगता है।

हिन्दू धर्मग्रंथों में जीवन को ऐसी उथल-पुथल या अशांति से दूर रखने के लिए घर में ऐसे छोटे-छोटे धार्मिक कामों को नियमित या विशेष घडिय़ों में करना जरूरी बताया गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा देने के साथ घर के माहौल में सुख-शांति व मेल-जोल बनाए रखते हैं। कौन-से है ये सुखदायी धार्मिक कर्म जानते हैं -

लिखा गया है कि -

न विप्रपादोदककमर्दमानि न वेदशास्त्रप्रतिगर्जितानि।

स्वाहास्वधस्वस्तिविवर्जितानि श्मशानतुल्यानि गृहाणि तानि।।

सरल शब्दों में अर्थ है कि जिस घर में ब्राह्मणों का सेवा-सम्मान न हो, वेद-शास्त्रों का अध्ययन व स्मरण न हो, या स्वाहा, स्वधा और स्वस्ति के स्वर न गूंजे ऐसा घर श्मसान की तरह होता है।

व्यावहारिक नजरिए से इस श्लोक में साफ संकेत है कि घर में किए जाने वाले धर्म-कर्म ईश्वर में आस्था को मजबूत रख मनोबल व आत्मविश्वास ऊंचा रख निर्भय व निश्चिंत रखने के साथ परिवार को जोड़ते हैं। जिसके लिए धार्मिक दृष्टि से ब्रह्म अंश माने गए ब्राह्मण या फिर विद्वान व गुणी लोगों का सम्मान, दान, सेवा, धर्म से जुड़ी ज्ञान की चर्चा, देव महिमा या स्मरण से जुड़ी स्तुतियों व मंत्रों का नित्य पाठ, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति यानी यज्ञ-हवन, पितृपूजा कर्म व विवाह, संस्कारों से जुड़े मंगल कार्यों को करने का महत्व बताया गया है।


क्रमश:...

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......MMK

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