Monday, March 24, 2025

प्राणायाम (Pranayam)

प्राणों के संग्रह का विज्ञान 
अष्टांग योग के पहले तीन चरणों यम, नियम, आसन के बाद चौथा चरण है प्राणायाम। प्राणायाम के माध्यम से चित्त की शुद्धि की जाती है। चित्त की शुद्धि का अर्थ है हमारे मन-मस्तिष्क में कोई बुरे विचार नहीं हों। आइए जानें प्राणायाम की क्रिया क्या है-अष्टांग योग में प्राणायाम चौथा चरण है। प्राण मतलब श्वास और आयाम का मतलब है उसका नियंत्रण। अर्थात जिस क्रिया से हम श्वास लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से मन-मस्तिष्क की सफाई की जाती है। हमारी इंद्रियों द्वारा उत्पन्न दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्राणायाम करने से हमारे मन और मस्तिष्क में आने वाले बुरे विचार समाप्त हो जाते हैं और मन में शांति का अनुभव होता है। प्राणायाम से जब चित्त शुद्ध होता है तो योग की क्रियाएं आसान हो जाती हैं।

प्राणायाम की विधितस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। योगदर्शन 2/४९अर्थात् आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास और प्रश्वास की गति के नियंत्रित और संतुलित हो जाने का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का भीतर प्रवेश करना श्वास कहलाता है और भीतर की वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। इन दोनों के नियंत्रण का नाम प्राणायाम है।प्राणायाम में हम पहले श्वास को अंदर खींचते हैं, जिसे पूरक कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में श्वास की पूर्ति करना। श्वास लेने के बाद कुछ देर के लिए श्वास को फेफड़ों में ही रोका जाता है, जिसे कुंभक कहते हैं। इसके बाद जब श्वास को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है।

प्राणायाम के अंगयोगदर्शन में प्राणायाम के तीन अंग बताए गए हैं- १. भीतर की श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना बाह्यकुंभक कहलाता है। २. श्वास को भीतर खींचकर भीतर रोकने रखने को आभ्यंतरकुंभक कहते हैं। ३. बाहर या भीतर कहीं भी सुखपूर्वक श्वासों को रोकने का नाम स्तंभवृत्ति प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम को किसी जानकार योगी की देखरेख में ही सीखना चाहिए। प्राणायाम का एक और प्रकार केवल कुंभक है। बाहरी और भीतर के विषयों के त्याग से केवल कुंभक होता है। शब्द, स्पर्श आदि इंद्रियों के बाहरी विषय हैं तथा संकल्प, विकल्प आदि आंतरिक विषय हैं। उनका त्याग करना चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है।

प्राणायाम के लाभ-योग में प्राणायाम क्रिया सिद्ध होने पर पाप और अज्ञानता का नाश होता है। -प्राणायाम की सिद्धि से मन स्थिर होकर योग के लिए समर्थ और सुपात्र हो जाता है। -प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।-प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है। -प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे मन हमारे नियंत्रण में आ जाता है। -प्राणायाम से श्वास संबंधी रोग तथा अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।

प्राणों के संचार की विधि प्राणायाम 
अष्टांग योग के पहले तीन चरणों यम, नियम, आसन के बाद चौथा चरण है प्राणायाम। प्राणायाम के माध्यम से चित्त की शुद्धि की जाती है। चित्त की शुद्धि का अर्थ है हमारे मन-मस्तिष्क में कोई बुरे विचार नहीं हों। आइए जानें प्राणायाम की क्रिया क्या है- अष्टांग योग में प्राणायाम चौथा चरण है। प्राण मतलब श्वास और आयाम का मतलब है उसका नियंत्रण। अर्थात जिस क्रिया से हम श्वास लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से मन-मस्तिष्क की सफाई की जाती है। हमारी इंद्रियों द्वारा उत्पन्न दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्राणायाम करने से हमारे मन और मस्तिष्क में आने वाले बुरे विचार समाप्त हो जाते हैं और मन में शांति का अनुभव होता है। प्राणायाम से जब चित्त शुद्ध होता है तो योग की क्रियाएं आसान हो जाती हैं।

इस तरह करें प्राणायाम
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। योगदर्शन 2/४९
अर्थात् आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास और प्रश्वास की गति के नियंत्रित और संतुलित हो जाने का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का भीतर प्रवेश करना श्वास कहलाता है और भीतर की वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। इन दोनों के नियंत्रण का नाम प्राणायाम है।प्राणायाम में हम पहले श्वास को अंदर खींचते हैं, जिसे पूरक कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में श्वास की पूर्ति करना। श्वास लेने के बाद कुछ देर के लिए श्वास को फेफड़ों में ही रोका जाता है, जिसे कुंभक कहते हैं। इसके बाद जब श्वास को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है।

ये हैं प्राणायाम के अंग :योगदर्शन में प्राणायाम के तीन अंग बताए गए हैं-
१. भीतर की श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना बाह्यकुंभक कहलाता है।
२. श्वास को भीतर खींचकर भीतर रोकने रखने को आभ्यंतरकुंभक कहते हैं।
३. बाहर या भीतर कहीं भी सुखपूर्वक श्वासों को रोकने का नाम स्तंभवृत्ति प्राणायाम कहलाता है।

प्राणायाम को किसी जानकार योगी की देखरेख में ही सीखना चाहिए। 
प्राणायाम का एक और प्रकार केवल कुंभक है। बाहरी और भीतर के विषयों के त्याग से केवल कुंभक होता है। शब्द, स्पर्श आदि इंद्रियों के बाहरी विषय हैं तथा संकल्प, विकल्प आदि आंतरिक विषय हैं। उनका त्याग करना चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है। कई तरह से होते हैं प्राणायाम के लाभ:-

-योग में प्राणायाम क्रिया सिद्ध होने पर पाप और अज्ञानता का नाश होता है।
-प्राणायाम की सिद्धि से मन स्थिर होकर योग के लिए समर्थ और सुपात्र हो जाता है।
-प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।
-प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
-प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे मन हमारे नियंत्रण में आ जाता है।
-प्राणायाम से श्वास संबंधी रोग तथा अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।

मोटापा कम होता है कपाल भाति से 
अव्यवस्थित दिनचर्या और असंतुलित खाने की वजह से अधिकांश लोगों को मोटापे की समस्या से जूझना पड़ रहा है। मोटापे की वजह से हमारे स्वास्थ्य को कई खतरनाक बीमारियों का खतरा सदैव बना रहता है। मोटापे को जल्द से जल्द कम करने के लिए योग क्रिया की मदद ली जा सकती है। ऐसी ही एक क्रिया है कपाल भाति, जिससे निश्चित ही मोटापे पर नियंत्रण किया जा सकता है।

कपाल भाति क्रिया करने की विधि:समतल स्थान पर साफ टॉवेल या अन्य कपड़ा बिछाकर अपनी सुविधानुसार आसन में बैठ जाएं। बैठने के बाद पेट को ढीला छोड़ दें। अब तेजी से सांस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। सांस को बाहर निकालने और पेट को पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें। प्रारंभ में दस बार यह क्रिया करें, धीरे-धीरे 60 तक बढ़ा दें। बीच-बीच में विश्राम ले सकते हैं। इस क्रिया से फेफड़े के निचले हिस्से की प्रयुक्त हवा एवं कार्बन डाइ ऑक्साइड बाहर निकल जाती है और सायनस साफ हो जाती है साथ ही पेट पर जमी फालतू चर्बी खत्म हो जाती है।

सावधानियां:
- श्वास संबंधी बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति इस क्रिया को ना करें।
- कपाल भाति क्रिया प्रात: काल खाली पेट ही करें।
- किसी योग विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही करें।

शरीर स्वस्थ, दिमाग तेज और शक्तिशाली मन 
मुद्राओं में अश्विनी मुद्रा और योग में प्राणायाम लम्बी उम्र के लिये १०० प्रतिशत कारगर विद्याएं हैं। प्राणायाम को सर्व उपलब्ध अमृत की संज्ञा दी जा सकती है। इस ब्रह्मांड में सहज-सुलभ होकर सिर्फ लाभकारी होने की कोई क्रिया योग में है तो वह है प्राणायाम।इसके नित उपयोग से शारीरिक ऊर्जा की वृद्धि, रोग प्रतिरोध क्षमता की बढ़ोतरी, आध्यात्मिक अनुभूति, मानसिक विकारों का समापन आदि अनेक लाभ प्रकृति के इस वरदान से मिल सकते हैं। इस यौगिक क्रिया में आवश्यकता सिर्फ समय व लगन की रहती है, जिसकी जरूरत भी सामान्यत: प्रारंभ में ही अधिक होती है। कुछ समय उपरांत इसके लाभ का ज्ञान व अनुभव, इसे करने वाले पर इतना प्रभाव छोड़ते हैं कि फिर उसे नहीं करने का मन बनना ईश्वरीय प्रकोप अथवा दुर्भाग्य के सूचक के अतिरिक्त संभव नहीं है।अन्यथा बिना कीमत चुकाए मिलने वाले इस सर्व सुलभ अमृत को पाने के लिये कोई प्रयास न करना इंसान का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है ?

तीन बंध जिनसे जागती है कुंडलिनी 
मुद्राओं के अभ्यास के बिना योग में सिद्धि प्राप्त नहीं होती और मुद्राओं की सिद्धि के बिना कुण्डलिनी जागृत नहीं होती। मुद्राएं नाडिय़ों की बीमारियां दूर करने में काफी फायदेमंद होती हैं। असंतुलित खान-पान और अव्यवस्थित दिनचर्या के चलते हमारे शरीर का सिस्टम बिगड़ जाता है। जिससे कई बीमारियां होने की संभावना बन जाती है। हमारे शरीर की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए योगिक मुद्राओं का सहारा लिया जा सकता है। इन्हीं मुद्राओं में तीन प्रकार के बंध होते हैं। ये मल-विसर्जन की क्रिया को नियमित तो करते ही हैं साथ ही कुछ चक्रों पर भी उनका अद्भुत प्रभाव पड़ता है। यह तीन बंध इस प्रकार हैं-
- उड्डीयान बंध
- जालंधर बंध
- मूल बंध

यह तीनों बंध हठयोग से संबंधित हैं। यह काफी सरल होने के साथ-साथ बहुत लाभदायक भी है। इनके नियमित अभ्यास से हमारा स्वास्थ्य हमेशा ठीक रहता है। मानसिक शक्ति बढ़ती है। पाचन तंत्र सही रहता है। यह तीनों कुण्डलिनी जागरण में सहायक होते हैं।
पेट साफ रहता है और भूख बढ़ती है इस क्रिया से

किसी भी व्यायाम में ऐसी व्यवस्था नहीं है कि पेट के सभी तंत्रों को कुछ क्षण के लिए आराम दिया जा सके। पेट की संपूर्ण पेशियों की मालिश भी प्राकृत रूप से हो जाती है। जिनका कब्ज रहता हो, उनके लिए यह उड्डीयन बन्ध सबसे अधिक फायदेमंद है।

उड्डीयन बंध की विधि सबसे पहले कंबल या दरी बिछाकर पद्मासन में बैठ जाएं। पेट के अंदर की सारी वायु निकाल दें और पेट को अंदर की ओर खलाएं। जब पेट अंदर चला जाए, तो नाभि के नीचे के के भाग को सिकोड़ें। इसप्रकार महाप्राचीरा ऊपर को उठेगी और नाभि के अंग पेडू और गुप्तांग के आसपास की पेशियों का शिथलीकरण हो जाए। घुटनों को थोड़ा मोड़ें और दोनों घुटनों पर रखें। सांस बाहर निकाल दें।अब घुटनों पर जोर देते हुए पेट को अंदर खलाएं जिससे पेट में गड्ढा सा बन जाए। इस स्थिति के बाद नाभि के नीचे के भाग पेडू और गुप्तांग के चारों ओर की पेशियों को ऊपर की ओर तानें। इस प्रकार उदर, पेडू और नीचे की पेशियों का शिथलिकरण हो जाएगा। इसी स्थिति में रहकर पेट का तनाव कम कर दें और धीरे-धीरे सांस अंदर जाने दें। यह पूर्ण उड्डीयन की स्थिति होगी। जबतक सांस सरलता से रोक सके, उतनी ही देर खलाने की क्रिया जारी रखें। जब यह महसूस होने लगे की अब सांस नहीं रुकेगी तो धीरे-धीरे अंदर की ओर सांस भरना शुरू करें।
सावधानी: हाई ब्लड प्रेशर के रोगी इस बंध को ना करें।

उड्डीयन बंध के फायदे इस बंध से पेट के सभी तंत्रों की मालिश हो जाती है। पाचन शक्ति बढ़ती है। कुण्डलिनी जागरण में यह बंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि किसी व्यक्ति को कब्ज की समस्या है तो उसे यह बंध नियमित करना चाहिए। साथ ही इस बंध से भूख बढ़ती है एवं पेट संबंधी कई रोग दूर होते हैं।

पूरे सिर का व्यायाम होता है जालंधर बंध से 
हमारे सिर में कई वात-नाडिय़ों का एक जाल सा फैला हुआ है। इन्हीं से हमारे पूरे शरीर का संचालन होता है। इसी वजह से इस हिस्से का पूर्ण स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। इसके लिए जालंधर बंध सबसे अच्छा उपाय है जिससे सिर का अच्छे से व्यायाम होता है और हम स्वस्थ रहते हैं।

जालंधर बंध की विधि कंबल या दरी बिछाकर पद्मासन में बैठ जाएं। शरीर को एकदम सीधा रखें। गर्दन में स्थित मेरुदंड का भाग झुकेगा। गला और ठोड़ी स्पर्श करेगी। कुछ योगियों के अनुसार सिर और गर्दन को इतना झुकाना चाहिए कि ठोड़ी की हड्डी के नीचे छाती के भाग को स्पर्श करे और ठोड़ी में चार-पांच अंगुल का अंतर रह जाए।

जालंधर बंध के लाभ इस क्रिया से हमारे सिर, मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, गले की नाड़ी का संचालन नियंत्रित रहता है। जालंधर बंध इन सभी अंगों के नाड़ी जाल और धमनियों आदि को स्वस्थ रखता है।

मानसिक शांति मिलती है सूर्य भेदन कुंभक प्राणायम से दिनभर की दौड़-धूप के बाद सभी को मानसिक अशांति महसूस होने लगती है। मन को शांत करने के लिए प्राणायाम सबसे सरल और सहज उपाय है। सूर्य भेदन कुंभक प्राणायाम के कुछ ही समय अभ्यास करने से लाभ प्राप्त होने लगता है।

प्राणायाम की विधि किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ जाएं। जिस पर बैठने में किसी कष्ट का आभास तक ना हो। वैसे इसके लिए पद्मासन, सुखासन या सिद्धासन लगाकर बैठना अधिक उपयुक्त रहता है और उनमें बैठकर प्राणायाम करना अधिक सुविधाजनक भी रहता है। कोई भी आसन लगाकर बायां नासारंध्र दबाकर बंद कर लें और दक्षिण नासारंध्र से या सूर्य नाड़ी से पूरक करें।

जब सांस पूरी भर जाए, तब जालंधर बंध लगाकर कुंभक करें। इस कुंभक की पूर्ण अवस्था को कुंभक थोड़ा ही करना चाहिए। जिससे किसी भी अंग पर दबाव न पड़े। अब धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते जाएं और उस अवस्था तक कुंभक को पहुंचाएं, जब तक कि शरीर पसीना न बहने लगे।फिर जालंधर बंध खोलकर बाएं नासारंध्र से रेचक करें और रेचक करते समय उड्डीयन बंध लगा लें। उड्डीयन बंध लगाने की विधि यह है कि नाभि को अंदर इतना खींचे कि रीढ़ की अस्थि तक नाभि पहुंच जाए और पेट में गड्ढा सा पड़ जाए। सभी योग ग्रंथों से यह बताया गया है कि यह प्राणायाम में बाएं नासारंध्र से रेचक किया जाए।

सूर्य भेदन कुंभक प्राणायम के लाभ इस प्राणायाम से मस्तिष्क शुद्ध होता है। वातदोष का नाश होता है। साथ ही कृमि दोष नष्ट होते हैं। यह सूर्य भेदन कुंभक बार-बार करना चाहिए। इससे सभी उदर-विकार दूर होते हैं और जठराग्नि बढ़ती है। कुंडलिनी जागरण में यह सहायक होता है। यह एक श्रेष्ठ व्यायाम है।

10 प्रकार की वायु देती हैं स्वस्थ जीवन जब से हम जन्म लेते हैं तभी से हम सांस लेना शुरू कर देते हैं और अंत समय तक सांस लेते रहते हैं। इस बात से यह स्पष्ट होता है कि सांस का हमारा जीवन से कितना गहरा संबंध है। सांस लेने की क्रिया पर ही हमारा अच्छा स्वास्थ्य निर्भर करता है।

सांस लेने की क्रिया के संबंध में योगशास्त्र के अनुसार 10 प्रकार की वायु बताई गई है। यह 10 प्रकार की वायु इस प्रकार है- प्राण, अपान, समान, उदान, ज्ञान, नाग, कूर्म, क्रीकल, देवदत्त और धनन्जय। अच्छे स्वास्थ्य में इन सभी प्रकार की वायु पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। प्राणायाम से ही इन दसों वायु पर नियंत्रण होता है। प्राणायाम मन को एकाग्र करने में सर्वश्रेष्ठ उपाय है। साथ ही इससे चित्त की शुद्धि होती है।

हम हर पल करते हैं पूरक और रेचक क्रिया योग शास्त्र में प्राणायाम की क्रियाएं अच्छे स्वास्थ्य के लिए काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। प्राणायाम में दो क्रियाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है, पहली क्रिया है प्राण वायु को अंदर खींचते हैं या भरते हैं, दूसरी क्रिया है सांस द्वारा अंदर की वायु को बाहर की ओर निकालना।

योग भी भाषा में सांस लेने की क्रिया को पूरक और श्वास छोडऩे की क्रिया को रेचक कहा जाता है। इसका यही मतलब है कि हम जन्म के समय लेकर मृत्यु के समय तक पूरक और रेचक क्रिया करते हैं। प्राणायाम में सांस रोकने की क्रिया पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। सांस रोकने की इस क्रिया को कुंभक कहा जाता है। कुंभक दो प्रकार के होते हैं- पहला है आभ्यांतर कुंभक, दूसरा है बाह्य कुंभक।

उज्जायी प्राणायाम: सर्दी रहेगी दूर...ठंड का मौसम शुरू हो गया है, सभी के गर्म कपड़े बाहर निकल आए हैं, फिर भी कई बार ठंड इतनी अधिक रहती है कि उससे बच पाना मुश्किल हो जाता है। ठंड का प्रभाव कम करने के लिए प्रतिदिन उज्जायी प्राणायाम करें तो कुछ ही दिनों में कड़ाके ठंड भी आपको पर ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाएगी।

उज्जायी प्राणायाम के विधि सुविधाजनक स्थान पर कंबल या दरी बिछाकर बैठ जाएं। अब गहरी सांस लें। कोशिश करें कि पेट की मांसपेशियां प्रभावित न हो। गला, छाती, हृदय से सांस अंदर खींचे। जब सांस पूरी भर जाएं तो जालंधर बंध लगाकर कुंभक करें। (जालंधर बंध और कुंभक के संबंध में लेख पूर्व में प्रकाशित किया जा चुका है।) अब बाएं नासिका के छिद्र को खोलकर सांस धीरे-धीरे बाहर निकालें। सांस भरते समय श्वांस नली का मार्ग हाथ से दबाकर रखें। जिससे सांस अंदर लेते समय सिसकने का स्वर सुनाई दे। उसी प्रकार सांस छोड़ते समय भी करें।

उज्जायी प्राणायाम को बैठकर या खड़े होकर भी किया जा सकता है। कुंभक के बाद नासिका के दोनों छिद्रों से सांस छोड़ी जाती है। प्रारंभ में इस प्राणायाम को एक मिनिटि में चार बार करें। अभ्यास के साथ ही इस प्राणायाम की संख्या बढ़ाई जाना चाहिए।

प्राणायाम के लाभ यह प्राणायाम सर्दी में काफी लाभदायक सिद्ध होता है। इस प्राणायाम के अभ्यास कफ रोग, अजीर्ण, गैस की समस्या दूर होती है। साथ ही हृदय संबंधी बीमारियों में यह आसन बेहद फायदेमंद है। इस प्राणायम को नियमित करने से ठंड के मौसम का भी ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है।

चेहरे की झुर्रियां खत्म होती है सीत्कारी प्राणायम से...आकर्षक व्यक्तित्व में चेहरे पर चमक का सबसे अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में चेहरे का ठीक से ध्यान रखने के लिए अच्छे खाने के साथ-साथ प्राणायाम फायदेमंद रहता है। सीत्कारी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से कुछ ही दिन में आपका चेहरा चमक उठेगा।

सीत्कारी प्राणायाम की विधि सीत्कारी प्राणायाम में सीत्कार का शब्द करते हुए सांस लेने की क्रिया होती है। इस प्राणायम में नासिका से सांस नहीं ली जाती है बल्कि मुंह के होठों को गोलाकार बना लेते हैं और जीभ के दाएं और बाएं के दोनों किनारों को इस प्रकार मोड़ते हैं कि जीभ का का आकार गोलाकार हो जाए। इस गोलाकार जीभ को गोल किए गए होठों से मिलाकर इसके छोर को तालू से लगा लिया जाता है। अब सीत्कार के समान आवाज करते हुए मुख से सांस लें। फिर कुंभक करके नासिका के दोनों छिद्रों से सांस छोड़ी जाती है। पुन: इस क्रिया को दोहराएं। इसे बैठकर या खड़े होकर भी किया जा सकता है।

सीत्कारी प्राणायाम के लाभ
इस प्राणायाम से आपके चेहरे पर चमक उत्पन्न हो जाती है। दिनभर स्फूर्ति और उत्साह बना रहता है। इसके नियमित अभ्यास से अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती है। असंयमित नींद, आलस्य और भूख-प्यास की समस्या खत्म हो जाती है। चेहरे की झुर्रियां समाप्त होकर त्वचा सुंदर बन जाती है।

जहर से बचाता है शीतली प्राणायाम प्राणायाम ऐसी क्रिया है जिसके नियमित अभ्यास से बड़ी-बड़ी बीमारियां साधक से दूर रहती है। साथ ही व्यक्ति का रंग-रूप भी निखर जाता है। शीतली प्राणायाम के संबंध में ऐसा माना जाता है कि इसका नियमित अभ्यास करने वाले व्यक्ति को कभी जहर भी नहीं चढ़ता।

शीतली प्राणायाम की विधि शीतली प्राणायाम और सीत्कारी प्राणायाम लगभग एक जैसे ही हैं। अंतर केवल इतना है कि सीत्कारी प्राणायाम में जीभ गोलकर तालु से लगा ली जाती है और शीतली में जीभ को गोलाकार बना लेते हैं और सीत्कार करते हुए मुंह द्वारा वायु को पेट में भर लेते हैं। इस प्राणायाम को खड़े होकर, चलते हुए अथवा बैठकर भी कर सकते हैं। इसमें मुंह को गोल करके जीभ को भी गोल कर लिया जाता है और होंठ को बाहर निकालकर सांस लेते हैं। जितना संभव हो उतना समय सांस रोककर फिर सांस को बाहर निकाल दिया जाता है।

शीतली प्राणायाम के लाभ इस प्राणायाम से पित्त, कफ, अपच जैसी बीमारियां बहुत जल्द समाप्त हो जाती है। योग शास्त्र के अनुसार लंबे समय तक इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से व्यक्ति पर जहर का भी असर नहीं होता।

सांस की बीमारियों का श्रेष्ठ निदान सुबह-सुबह थोड़ा सा व्यायाम या योगासन करने से हमारा पूरा दिन स्फूर्ति और ताजगीभरा बना रहता है। यदि आपको दिनभर अत्यधिक मानसिक तनाव झेलना पड़ता है तो यह क्रिया करें, दिनभर चुस्त रहेंगे। इस क्रिया को करने वाले व्यक्ति से फेफड़े और सांस से संबंधित बीमारियां सदैव दूर रहेंगी।

क्रिया की विधि:समतल और हवादार स्थान पर किसी भी आसन जैसे पदमासन या सुखापन में बैठकर इस क्रिया को किया जाता है। दोनों हाथ को दोनों घुटनों पर रखें। अब नाक के दोनों छिद्र से तेजी से गहरी सांस लें। फिर सांस को बिना रोकें, बाहर छोड़ दें। इस तरह कई बार तेज गति से सांस लें और फिर उसी तेज गति से सांस छोड़ते हुए इस क्रिया को करें। इस क्रिया में पहले कम और बाद में धीरे-धीरे इसकी संख्या को बढ़ाएं।

इस क्रिया से लाभ इस क्रिया के अभ्यास से फेफड़े में स्वच्छ वायु भरने से फेफड़े स्वस्थ्य और रोग दूर होते हैं। यह आमाशय तथा पाचक अंग को स्वस्थ्य रखता है। इससे पाचन शक्ति और वायु में वृद्धि होती है तथा शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आती है। इस क्रिया से सांस संबंधी कई बीमारियां दूर ही रहती हैं।

सावधानी यदि किसी व्यक्ति को दमा या सांस संबंधी कोई बीमारी हो तो वह अपने डॉक्टर से परामर्श कर ही इस क्रिया को करें। ब्रह्म, विष्णु और रुद्र ग्रंथि ठीक रहती है प्राणायाम से... कुण्डलिनी जागरण में तीन ग्रंथियों का भेदन होना अत्यंत आवश्यक है। यह तीन ग्रंथियां है ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और रुद्र ग्रंथि। इनके बिना कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। इन्हें जागृत करने के लिए भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से करना होता है।

भस्त्रिका प्राणायाम की विधि किसी सुविधाजनक स्थान पर पद्मासन में बैठ जाएं। रीढ़, गर्दन और सिर को स्थिर रखें। मुंह को अच्छे से बंद कर लें। नाक के किसी एक छिद्र से प्रयत्न पूर्वक सांस बाहर निकाल दें। सांस निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं और सांस लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। रेचक करने में इस बात का ध्यान रखें कि शब्द करती हुई प्राण-वायु कपाल, कंठ और हृदय पर्यंत भर लें। इस प्रकार बार-बार पूरक और रेचक करें। जिसमें ऐसा लगे, जैसे लुहार की धौकनी चल रही हो। लुहार क धौकनी को ही भस्त्रिका कहते हैं। बार-बार तेजी से पूरक और रेचक क्रिया करें। यही भस्त्रिका प्राणायाम की विधि है।

कई बार रेचक और पूरक के करके नाक के दाएं छिद्र से कुंभक करें। कुंभक में जालंधर बंध और मूल बंध करना आवश्यक होता है। कुंभक करते समय नासिका के दोनों छिद्रों को उंगलियों से दबा कर बंद कर देना चाहिए। दाहिने हाथ में अंगूठे से दाहिने छिद्र और उसी की कनिष्ठा और अनामिका अंगुली से नाक का बायां छिद्र और उसी की कनिष्ठा और अनामिका से नाक के बाएं छिद्र को बंद करके कुंभक करें। जब ऐसा लगे की सांस अब ना रुकेगी तो नासिका के बाएं छिद्र से सांस छोड़ दें।

इस प्राणायाम के दिनों में साधक को घी-दूध का सेवन भी खूब करना चाहिए। इससे शरीर को बल मिलता है और अच्छा स्वास्थ्य बना रहता है।

प्राणायाम के लाभ:
इससे पित्त-कफ की बीमारियों में लाभ होता है। साथ कुण्डलिनी जागरण में अहम भूमिका निभाने वाली ब्रह्म, विष्णु और रुद्र गंथि का भेदन होता है। इस प्राणायाम मदद से ही कुण्डलिनी जागृत होती है।

आधी रात के बाद करें यह प्राणायामप्राणायाम मन को शांत रखने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। साथ ही इससे किसी भी कार्य को करने की एकाग्रता बढ़ती है। भ्रामरी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से यह लाभ सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

भ्रामरी प्राणायाम की विधि योगियों के अनुसार यह प्राणायाम रात्रि के समय किया जाना चाहिए। जब आधी रात व्यतीत हो जाए और किसी भी जीव-जंतु का कोई स्वर सुनाई ना दे। उस समय किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठकर दोनों हाथों की उंगलियों को दोनों कानों में लगाकर सांस अंदर खींचे और कुंभक द्वारा सांस को रोकें। इसमें कान बंद होने पर भौरों के समान शब्द सुनाई देने लगता है। यह शब्द दाएं कान में अनुभव होता है।

भ्रामरी प्राणायाम के लाभ योगियों के अनुसार इस आसन से मन की चंचलता दूर होती है। मन एकाग्र होता है। जो व्यक्ति अत्यधिक तनाव महसूस करते हैं उन्हें यह प्राणायाम अवश्य करना चाहिए।

प्राणायाम: छोटी सी विधि, बड़े लाभ प्रतिस्पर्धा के युग में सभी के पास इतना समय नहीं होता कि वे प्रतिदिन योगा कर सके। अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि प्रतिदिन कुछ समय योग अवश्य करें। एक प्राणायाम ऐसा है जिसमें न तो समय का बंधन है और ना ही इसकी विधि लंबी है। यह प्राणायाम है लघुश्वासी प्राणायाम।

प्राणायाम की विधि- किसी भी सुविधाजनक स्थान पर बैठ जाएं। अब मन शांत करके धीरे-धीरे सांस लें और तुरंत ही छोड़ दें। बस यही विधि है लघुश्वासी प्राणायाम की।

प्राणायाम के लाभ- इस प्राणायाम से खून शुद्ध होता है। फेफड़ों को बल मिलता है और शरीर हष्ट-पुष्ट होता है। साथ ही इससे कई श्वांस संबंधी रोगों में लाभ प्राप्त होता है।

बुरे सपने नहीं आएंगे...आजकल अधिकांश लोगों का मन स्थिर नहीं रहता साथ ही कई बुरे विचार हमेशा दिमाग में चलते रहते हैं। इसी वजह से इन्हें सपने भी वैसे ही आते हैं। जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि आपका मन भी शुद्ध रहे। मन का शुद्ध रखने के लिए ओंकार जप प्राणायाम सबसे अच्छा उपाय है।

प्राणायाम की विधिशांत एवं शुद्ध वातावरण वाले स्थान पर कंबल या दरी बिछाकर किसी भी आसन में बैठ जाएं। अब अपनी आंखों को बंद करें। गहरी सांस भरकर ओम शब्द का आवाज के साथ उच्चारण करें। इस क्रिया को कम से कम 11 बार करें।

प्राणायाम के लाभ ओम शब्द की पवित्रता और महत्व से सभी भलीभांति परिचित हैं। यह शिवजी का प्रतीक है। इसके निरंतर जप से मन शांत और शुद्ध होता है। मानसिक विकार यानि बुरे विचार दूर होते हैं। मन स्थिर रहता है। पूरे दिन कार्य में मन लगता है। आवाज का आकर्षण बढ़ता है और आनंद की अनुभूति होती है। अनिद्रा की बीमारी दूर होती और नींद अच्छे से आती है। साथ ही जिन लोगों को बुरे सपने परेशान करते हैं उन्हें भी प्राणायाम से लाभ प्राप्त होता है।

कैसे कंट्रोल करें बढ़ता वजन? असंयमित दिनचर्या और असमय खान-पान के चलते बहुत अधिक संख्या में ऐसे लोग देखे जा सकते हैं जो मोटापे से त्रस्त हैं। मोटापा एक ऐसी समस्या है जिस पर लगाम लगाना काफी मुश्किल होता है। सही समय पर इसे कंट्रोल न किया जाए तो कई घातक परिणाम भोगने पड़ सकते हैं।
इसे कंट्रोल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है प्राणायाम। प्रतिदिन कपाल भाति प्राणायाम इस बीमारी से आपको निजात अवश्य दिला देगा।

कपाल भाति प्राणायाम की विधिकपाल भाति प्राणायाम के लिए किसी शांत एवं शुद्ध वातावरण वाले स्थान का चयन करें। किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ जाएं। इस प्राणायाम में पूरक अर्थात सांस लेने की गति धीमी और रेचक यानि सांस छोडऩे की गति तेज होती है। सामान्य गति से सांस लें और शक्तिपूर्वक सांस बाहर निकालें। प्रतिदिन इस क्रिया को कम से कम पांच बार अवश्य करें।

कपाल भाति के लाभ इस प्राणायाम से चेहरे पर हमेशा ताजगी, प्रसन्नता और शांति दिखाई देगी। कब्ज और डाइबिटिज की बीमारी से परेशान लोगों के लिए यह काफी फायदेमंद है। दिमाग से संबंधित रोगों में लाभदायक है। वजन को कंट्रोल करता है, जो लोग ज्यादा वजन से परेशान है वे इस प्राणायाम से बहुत कम समय में ही फायदा प्राप्त कर सकते हैं। इससे हमारा वजन संतुलित रहता है। कैंसर में भी इससे लाभ प्राप्त होता है।

सावधानी जो लोग नेत्र रोग से पीडि़त हैं, कान से पीप आता हो, तो वे इस प्राणायाम को किसी योग प्रशिक्षण से सलाह लेकर ही करें। ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो भी इस प्राणायाम को न करें।

पांच प्रकार के होते हैं प्राण अष्टांग योग में प्राणायाम का विशेष स्थान है। प्राणायाम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है प्राण और आयाम। प्राण का अर्थ है जीवन शक्ति। चरक संहिता के अनुसार यह प्राण पांच प्रकार के बताए गए हैं।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान

श्वास पर नियंत्रण रखता है प्राण प्रथम प्राण हमारी सांस की क्रिया पर नियंत्रण रखता है। यह वह शक्ति से जिससे हम सांस अंदर की ओर खींचते हैं और वक्षीय क्षेत्रों में गतिशीलता प्रदान करती है। नाभि स्थान के नीचे क्रियाशील रहता है अपान अपान उदर क्षेत्र के नीचे अर्थात् नाभि क्षेत्र के नीचे सक्रीय रहता है। मूत्र, वीर्य और मल निष्कासन को नियंत्रित करता है।

पाचन क्रिया में मदद करता है समान उदर अथवा पेट स्थान को गतिशील करता है समान। यह पाचन क्रिया में मदद करता है। पेट के अवयवों को ठीक ढंग से काम करने के लिए सुरक्षा प्रदान करता है। उदान वाणी और भोजन को व्यवस्थित करता है उदान जीह्वा द्वारा कार्य करता है। यह वाणी और भोजन को व्यवस्थित करता है। उदान रीढ़ की हड्डी के नीचले हिस्से से ऊर्जा को मस्तिष्क तक पहुंचाता है। नस-नस तक ऊर्जा पहुंचाता है व्यान हमारे पूरे शरीर की गतिविधियों को व्यान नियंत्रित करता है। यह भोजन और सांस से मिलने वाली ऊर्जा को धमनियों, शिराओं और नाडिय़ों द्वारा पूरे शरीर में पहुंचाता है।

शरीर में गर्मी बढ़ेगी...ठंड के मौसम में सर्दी-जुकाम की बीमारी बहुत ही सामान्य बात है। कई बार यह समस्या ज्यादा बढ़ जाती है जिससे बहुत से लोग बीमार हो जाते हैं। इस मौसम में ठंड से निपटने के लिए सूर्य-भेदन प्राणायाम श्रेष्ठ है। इसके नियमित अभ्यास से साधक के शरीर में हमेशा गर्मी बनी रहती है और उस पर ठंड का कोई प्रभाव नहीं होता।

सूर्य भेदन प्राणायाम की विधिकिसी साफ एवं स्वच्छ वातावरण वाले सुविधाजनक स्थान पर सुखासन में बैठ जाएं। नाक के बाएं छिद्र को दाएं हाथ से बंद कर दाहिने नासिका द्वार से गहन (दीर्घ) सांस लीजिए। नाक बंद करें। कुछ देर सांस अंदर ही रोकें। जालंधर और मूलबंध लगाइए। बंध शिथिल करते हुए बाएं द्वार से धीरे-धीरे रेचक क्रिया करें (सांस छोड़ें)। यह एक चक्र हुआ। इस प्रकार क्रमश: 10 चक्र तक बढ़ाइएं।

सूर्य भेदन प्राणायाम के लाभ पाचन तंत्र मजबूत करता है क्योंकि दाहिना स्वर इस कार्य में सहायक होता है। शरीर में गर्मी बढ़ती है। इसका लाभ ठंड दिनों में मिलता है। सर्दी-जुकाम में लाभ होता है। त्वचा विकार ठीक होते हैं। कम ब्लड प्रेशर के रोगियों को फायदा होता है। दिमाग दौडऩे लगेगा...

अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए प्राणायाम सबसे अच्छा उपाय है। अष्टांग योग में प्राणायाम का महत्वपूर्ण स्थान है। मात्र सांस लेने की क्रिया से ही हमारे स्वास्थ्य को बहुत लाभ प्राप्त होता है। प्राणायाम से मन को शांति मिलती है और साथ ही दिमाग तेजी से कार्य करने लगता है। चंद्र भेदन प्राणायाम से हमारे तर्क शक्ति बढ़ती है और दिमाग दौडऩे लगता है।

चंद्र भेदन प्राणायाम की विधिकिसी भी शांत एवं स्वच्छ वातावरण वाले स्थान पर सुखासन में बैठ जाएं। अब नाक के बाएं छिद्र से सांस अंदर खींचें। पूरक अथवा सांस धीरे-धीरे गहराई से लें। अब नाक के दोनों छिद्रों को बंद करें। अब सांस को रोक कर लें (कुंभक करें), जालंधर बंध और मूलबंध लगाएं। बंध शिथिल करें और नाक के दाएं छिद्र से सांस छोड़ दें। यही क्रिया कम से कम 10 बार करें।

सावधानीएक ही दिन में सूर्य भेदन प्राणायाम और चंद्र भेदन प्राणायाम न करें।

प्राणायाम के लाभशरीर में शीतलता आती है और मन प्रसन्न रहता है। पित्त रोग में फायदा होता है। यह प्राणायाम मन को शांत करता है और क्रोध पर नियंत्रण लगाता है। अत्यधिक कार्य होने पर भी मानसिक तनाव महसूस नहीं होता। दिमाग तेजी से कार्य करने लगता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों को इस प्राणायाम से विशेष लाभ प्राप्त होता है।

तीन प्रकार के होते हैं हमारे शरीरयोग शास्त्र और वेदों के अनुसार जिस प्रकार हमारे प्राण 5 प्रकार के होते हैं उसी प्रकार हमारे शरीर 3 प्रकार के बताए गए हैं। वेदों के अनुसार हमारे शरीर तीन प्रकार के होते हैं। जो कि हमारी आत्मा को घेरे रहते हैं। इन तीनों शरीरों का निर्माण 5 कोषों से होता हैं।

यह तीन प्रकार के शरीर इस प्रकार है-
1. स्थूल शरीर:यह हमारा शारीरिक अन्नमय कोष कहलाता है। इसका आकार मोटा होता है।
2. सूक्ष्म शरीर:सूक्ष्म शरीर का निर्माण मनोमय, प्राणमय और विज्ञानमय कोष करते हैं।
3. कारण शरीर:यह हमारे शरीर का आनंदमय कोष है। इसके कारण हमें चेतना का अनुभव होता है।

आंखों की बढ़ेगी चमक...आंखों की चमक में आत्मविश्वास की झलक होती है। जिस व्यक्ति में आत्म विश्वास होता है वह समाज में एक अलग मुकाम बना लेता है। लोगों को आकर्षित करने के लिए आंखों में आत्मविश्वास दिखाई दे यह बहुत जरूरी है। आंखों की चमक बढ़ाने के लिए यह शांभवी मुद्रा करें-

शांभवी मुद्रा की विधिशांत एवं शुद्ध हवा वाले स्थान पर सुखासन में बैठ जाएं। मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी), गर्दन एवं सिर एक सीध में रखें। हाथों को एक दूसरे के ऊपर रख लें या घुटनों पर रखकर ज्ञान मुद्रा बना लें। अब पूर्ण एकाग्रचित होकर दृष्टि दोनों भौंहों के बीच करें और ध्यान लगाएं।

शांभवी मुद्रा के लाभइस मुद्रा से आज्ञा चक्र जो कि दोनों भौंहों के मध्य स्थित है, विकसित हो जाता है। दिमाग तेजी से कार्य करना शुरू कर देता है। आंखों की चमक बढ़ती है, आत्मविश्वास की झलक दिखाई देती है। इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है। याददाश्त में गजब की बढ़ोतरी होती है।

जाने-अनजाने सभी करते हैं प्राणायाम अष्टांग योग में प्राणायाम विशेष स्थान है। सांस लेने और छोडऩे की क्रिया ही प्राणायाम कहलाती है। योग शास्त्र में प्राणायाम के तीन प्रकार बताए गए हैं-
1. भीतर की श्वास को बाहर निकालकर बाहर ही रोके रखना बाह्यïकुंभक कहलाता है।
2. श्वास को भीतर खींचकर भीतर रोकने रखने को आभ्यंतरकुंभक कहते हैं।
3. बाहर या भीतर कहीं भी सुखपूर्वक श्वासों को रोकने का नाम स्तंभवृत्ति प्राणायाम कहलाता है।
उक्त तीनों प्रकार के प्राणायाम की पृथक-पृथक विधियां हैं। प्राणायाम को किसी जानकार योगी की देखरेख में ही सीखना चाहिए।

प्राणायाम का एक और प्रकार केवल कुंभक है। बाहरी और भीतर के विषयों के त्याग से केवल कुंभक होता है। शब्द, स्पर्श आदि इंद्रियों के बाहरी विषय है तथा संकल्प, विकल्प आदि आंतरिक विषय है। उनका त्याग करना चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है।

सांस की बीमारियां दूर होती है...अष्टाग योग में प्राणायाम का विशेष महत्व है। प्राणायाम का कई बीमारियों में सीधा फायदा मिलता है। प्राणायाम से सांस से संबंधित सभी बीमारियां दूर हो जाती है।
-योग में प्राणायाम क्रिया सिद्ध होने पर पाप और अज्ञान का नाश होता है।
-प्राणायाम की सिद्धि से मन स्थिर होकर योग के लिए समर्थ और पात्र हो जाता है।
-प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।
-प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
-प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे मन हमारे नियंत्रण में आ जाता है।
-प्राणायाम से श्वास संबंधी रोग तथा अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।

पॉजीटिव एनर्जी मिलने लगेगी...एनर्जी दो प्रकार की होती है, एक पॉजीटिव और दूसरी नेगेटिव एनर्जी। सकारात्मक ऊर्जा हमारे विचारों को भी ऐसा बना देती है जिससे कि हम कई मुश्किल कार्य भी आसानी से कर लेते हैं। जबकि नेगेटिव एनर्जी हमें तनाव और अशांति देती है जिससे कई बार हम सही कार्य भी गलत ढंग से कर बैठते हैं। हमेशा हमारी सोच पॉजीटिव रहे इसके लिए जरूरी है कि हम वातावरण से हमेशा सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करते रहे। पॉजीटिव एजर्नी ग्रहण करने के लिए प्रणव प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

प्रणव प्राणायाम की विधि
किसी शांत एवं शुद्ध वातावरण वाले स्थान पर कंबल या अन्य कोई आसन बिछाकर सुखासन में बैठ जाएं। अब आंखें बंद कर लें। ध्यान लगाएं। ध्यान के साथ ही ऊँ का जप करें।

प्रणव प्राणायाम के लाभ वातावरण में पॉजीटिव और नेगेटिव एनर्जी दोनों सक्रिय रहती हैं। इस प्राणायाम से हमारा शरीर सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण कर लेता है। जिससे हमारा मन शांत और विचार शुद्ध होते हैं। सिर दर्द, माइग्रेन, डीप्रेशन और मस्तिष्क के संबंधित सभी रोगों में लाभ प्राप्त होता है। मन और मस्तिष्क की शांति मिलती है। एकाग्रता बढ़ती है।

मुद्रा से तनाव होता है दूर आज की भागमभाग वाली जिंदगी में हम अपने शरीर के लिए समय नहीं निकाल पा रहे है। इस व्यस्तता भरी दिनचर्या से शरीर के साथ ही साथ दिमाग पर भी असर पड़ रहा जिससे कई प्रकार की बीमारियां उत्पन्न हो रही है। जैसे अनिद्रा, सिरदर्द, अनावश्यक क्रोध, विद्यार्थी भी प्रतियोगिता के युग में तनाव झेल रहें है।

मानसिक तनाव को कम करने के लिए योग से अच्छा अन्य कोई उपाय नहीं है। योग में ज्ञान मुद्रा बताई गई है। इस मुद्रा से मन को शांति मिलती है और मानसिक तनाव कम होता है।

मुद्रा की विधि- किसी भी सुविधाजनक स्थान पर शांति से सुखासन में बैठ जाएं। अब दोनों हाथों को लंबाकर दोनों घुटनों पर रखकर अंगुठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगा दें। शेष तीनों उंगली सीधी रखें इसको ज्ञान मुद्रा कहते है। योग का यह एक आसान उपाय है। प्रतिदिन पन्द्रह मिनट ऐसा करने से आप सात दिनों में लाभ महसूस करेगें।

मन-मस्तिष्क को नियंत्रित करता है...अष्टांग योग में प्राणायाम चौथा चरण है। प्राण मतलब श्वास और आयाम का मतलब है उसका नियंत्रण। अर्थात जिस क्रिया से हम श्वास लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से मन-मस्तिष्क की सफाई की जाती है। हमारी इंद्रियों द्वारा उत्पन्न दोष प्राणायाम से दूर हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्राणायाम करने से हमारे मन और मस्तिष्क में आने वाले बुरे विचार समाप्त हो जाते हैं और मन में शांति का अनुभव होता है। प्राणायाम से जब चित्त शुद्ध होता है तो योग की क्रियाएं आसान हो जाती हैं।

आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास और प्रश्वास की गति के अवरोध हो जाने का नाम प्राणायाम है। बाहरी वायु का भीतर प्रवेश करना श्वास कहलाता है और भीतर की वायु का बाहर निकालना प्रश्वास कहलाता है। इन दोनों के रुकने का नाम प्राणायाम है।

प्राणायाम में हम पहले श्वास को अंदर खींचते हैं, जिसे पूरक कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में श्वास की पूर्ति करना। श्वास लेने के बाद कुछ देर के लिए श्वास को फेफड़ों में ही रोका जाता है, जिसे कुंभक कहते हैं। इसके बाद जब श्वास को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है।

कैसे करें प्राणायाम?

प्राणायाम का नियमित अभ्यास हमें सभी बीमारियों से हमेशा दूर रखता है। जो भी व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय प्राणायाम करता है वह हमेशा स्वस्थ रहता है, उसका मन शांत रहता है, हर कार्य अच्छे से करता है। प्राणायाम मन को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा उपाय है।

प्राणायाम के लिए किसी शांत और अच्छे वातावरण वाले स्थान का चयन करना चाहिए। सांस लेने और छोडऩे की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है। सांस लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं और छोडऩे की क्रिया को रेचक कहा जाता है। इन दोनों का सही नियंत्रण ही प्राणायाम है।

प्राणायाम में हम सांस लेते हैं जिसे पूरक कहते हैं। पूरक मतलब फेफड़ों में सांस की पूर्ति करना। सांस लेने के बाद कुछ देर के लिए सांस को अंदर ही रोका जाता है, जिसे कुंभक कहते हैं। इसके बाद जब सांस को बाहर छोड़ा जाता है तो उसे रेचक कहते हैं। इस तरह प्राणायाम की सामान्य विधि पूर्ण होती है।

हर बीमारी दूर रहती प्राणायाम से खान-पान में थोड़ी सी लापरवाही होने पर हमारा शरीर कई छोटी-बड़ी बीमारियों का शिकार हो जाता है। इसलिए खान के संबंध में हमें पूरी सावधानी रखने की आवश्कयता है। इस सावधानी के साथ-साथ हमें नियमित रूप से प्राणायाम का अभ्यास भी करना चाहिए।
- प्राणायाम से हमारे शरीर को कई स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते हैं।
- प्राणायाम के नियमित अभ्यास के कई धार्मिक लाभ बताए गए हैं।
- प्राणायाम से मन स्थिर होता है जिससे भगवान की भक्ति अच्छे हो पाती हैं।
-प्राणायाम के माध्यम से ही हम अष्टांग योग की प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और अंत में समाधि की अवस्था तक पहुंचते हैं।
- प्राणायाम से हमारे शरीर का संपूर्ण विकास होता है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में शुद्ध हवा जाने से शरीर स्वस्थ रहता है।
- प्राणायाम से हमारा मानसिक विकास भी होता है। प्राणायाम करते हुए हम मन को एकाग्र करते हैं। इससे हमारा मन नियंत्रित होता है।
- प्राणायाम से श्वास संबंधी रोग तथा अन्य बीमारियां दूर हो जाती हैं।

प्रार्थना भी है एक योग योग शास्त्र द्वारा हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यायाम बताए गए हैं। इनमें कई ऐसी क्रियाएं शामिल हैं जो हम प्रतिदिन कई बार करते हैं। ऐसी ही एक क्रिया है प्रार्थना। मंदिर में या घर में या कहीं भगवान का ध्यान करते समय हम प्रार्थना करते हैं। इस प्रार्थना को विधिवत रूप से किया जाए तो इसका लाभ हमारे स्वास्थ्य को मिलता है।

प्रार्थना की विधि सामान्य स्थिति में खड़े हो जाए। अब दोनों हाथों को नमस्कार की स्थिति में ले आए जैसे में भगवान के सामने प्रार्थना करते हैं। अब मन को एकदम शांत कर लें और अपना ध्यान अपने इष्ट भगवान में लगाएं। आंखे बंद रखें। कुछ देर एकदम शांत इसी तरह खड़े रहें। सांस की क्रिया सामान्य रखें।

प्रार्थना के लाभ इस क्रिया से मन को स्थिरता मिलती है, मन शांत रहता है। क्रोध पर नियंत्रण होता है। स्मरण शक्ति बढ़ती हैं और चेहरे की चमक बढ़ जाती है। साथ ही इस तरह प्रार्थना करने पर जल्दी ही भगवान की कृपा भी प्राप्त होती है।

ठंड से परेशान हैं? लगातार गिरते तापमान ने सभी को बुरी तरह प्रभावित कर रखा है। इसके प्रभाव से बड़ी संख्या में लोग बीमार भी हो रहे हैं। इस ठंड का प्रभाव कम करने के लिए प्रतिदिन उज्जायी प्राणायाम करें तो कुछ ही दिनों में कड़ाके ठंड भी आपको पर ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाएगी।

उज्जायी प्राणायाम के विधि सुविधाजनक स्थान पर कंबल या दरी बिछाकर बैठ जाएं। अब गहरी सांस लें। कोशिश करें कि पेट की मांसपेशियां प्रभावित न हो। गला, छाती, हृदय से सांस अंदर खींचे। जब सांस पूरी भर जाएं तो जालंधर बंध लगाकर कुंभक करें। (जालंधर बंध और कुंभक के संबंध में लेख पूर्व में प्रकाशित किया जा चुका है।) अब बाएं नासिका के छिद्र को खोलकर सांस धीरे-धीरे बाहर निकालें। सांस भरते समय श्वांस नली का मार्ग हाथ से दबाकर रखें। जिससे सांस अंदर लेते समय सिसकने का स्वर सुनाई दे। उसी प्रकार सांस छोड़ते समय भी करें।

उज्जायी प्राणायाम को बैठकर या खड़े होकर भी किया जा सकता है। कुंभक के बाद नासिका के दोनों छिद्रों से सांस छोड़ी जाती है। प्रारंभ में इस प्राणायाम को एक मिनिटि में चार बार करें। अभ्यास के साथ ही इस प्राणायाम की संख्या बढ़ाई जाना चाहिए।

प्राणायाम के लाभ यह प्राणायाम सर्दी में काफी लाभदायक सिद्ध होता है। इस प्राणायाम के अभ्यास कफ रोग, अजीर्ण, गैस की समस्या दूर होती है। साथ ही हृदय संबंधी बीमारियों में यह आसन बेहद फायदेमंद है। इस प्राणायम को नियमित करने से ठंड के मौसम का भी ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है।

रंग-रूप भी निखरता है प्राणायाम से प्राणायाम ऐसी क्रिया है जिसके नियमित अभ्यास से बड़ी-बड़ी बीमारियां साधक से दूर रहती है। साथ ही व्यक्ति का रंग-रूप भी निखर जाता है। शीतली प्राणायाम के संबंध में ऐसा माना जाता है कि इसका नियमित अभ्यास करने वाले व्यक्ति को कभी जहर भी नहीं चढ़ता।

शीतली प्राणायाम की विधि शीतली प्राणायाम और सीत्कारी प्राणायाम लगभग एक जैसे ही हैं। अंतर केवल इतना है कि सीत्कारी प्राणायाम में जीभ गोलकर तालु से लगा ली जाती है और शीतली में जीभ को गोलाकार बना लेते हैं और सीत्कार करते हुए मुंह द्वारा वायु को पेट में भर लेते हैं। इस प्राणायाम को खड़े होकर, चलते हुए अथवा बैठकर भी कर सकते हैं। इसमें मुंह को गोल करके जीभ को भी गोल कर लिया जाता है और होंठ को बाहर निकालकर सांस लेते हैं। जितना संभव हो उतना समय सांस रोककर फिर सांस को बाहर निकाल दिया जाता है।

शीतली प्राणायाम के लाभ इस प्राणायाम से पित्त, कफ, अपच जैसी बीमारियां बहुत जल्द समाप्त हो जाती है। योग शास्त्र के अनुसार लंबे समय तक इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से व्यक्ति पर जहर का भी असर नहीं होता।

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है....मनीष
ॐ शिव हरि....जय गुरुदेव..जय गुरुदेव कल्याणदेव जी....

Wednesday, March 19, 2025

गुरु गोरखनाथ जी (Guru Gorakhnath ji)



महायोगी गुरु गोरखनाथजीजी
महायोगी गोरखनाथजी मध्ययुग के एक विशिष्ट महापुरुष है। गोरखनाथजी के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी (मछंदरनाथ) थे। इन दोनों ने नाथ सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित कर इसका विस्तार किया। इस सम्प्रदाय के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है।

गुरु गोरखनाथजी हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथजी समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर माँ पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथजी के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथजी को शिव का अवतार भी माना जाता है। इन्हें चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इनके उपदेशों में योग और शैव तंत्रों का सामंजस्य है। ये नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथजी की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय प्राप्त है।

इनकी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को अधिक महत्व दिया है। गोरखनाथजी का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात् समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

गोरखनाथजी के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथजी आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथजी जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथजी के पास आकर पूछा, 'महाराज, आप क्यों रो रहे हैं?' गोरखनाथजी ने उसी तरह रोते हुए कहा, 'क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी।' इस पर राजा ने कहा, 'हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं।' गोरखनाथजी बोले, 'तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं तुम तो मरने के लिए तैयार बैठे हो।' गोरखनाथजी की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया।

कहा जाता है कि राजकुमार बप्पा रावल जब किशोर अवस्था में अपने साथियों के साथ राजस्थान के जंगलों में शिकार करने के लिए गए थे, तब उन्होंने जंगल में संत गुरू गोरखनाथजी को ध्यान में बैठे हुए पाया। बप्पा रावल ने संत के नजदीक ही रहना शुरू कर दिया और उनकी सेवा करते रहे। गोरखनाथजी जी जब ध्यान से जागे तो बप्पा की सेवा से खुश होकर उन्हें एक तलवार दी जिसके बल पर ही चित्तौड़ राज्य की स्थापना हुई।

गोरखनाथजी जी ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे राँझा ने गोरखनाथजी से योग दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथजी से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम गोरखनाथजी जी के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ पर स्थित गोरखनाथजी जी का मंदिर दर्शनीय है।

गोरखनाथजी जी से सम्बंधित एक कथा राजस्थान में बहुत प्रचलित है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथजी के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथजी 'गोगामेडी' के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथजी ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ।

गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ हैइसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक  उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना  रही है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया। यहाँ सभी धर्मो के भक्तगण गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादौं (भाद्रपदमास में उमड़ पडते हैं।
  
जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है... मनीष
 शिव हरि....जय गुरुदेव..जय गुरुदेव कल्याणदेव जी....




(जाहरवीर गोगाजी जी (Jahar Veer Goga ji)



जय गुरु गोरक्षनाथ जी  उनके शिष्य जाहरवीर गोगाजी जी की. 
राजस्थान के सिद्धों के सम्बन्ध में एक चर्चित दोहा है : ‘‘पाबूहडबूरामदेमाँगलियामेहा। पाँचू पीर पधारज्यों,गोगाजी जेहा'' सिद्ध वीर गोगादेव राजस्थान के लोक देवता हैं जिन्हे जाहरवीर गोगाजी के नाम से भी जाना जाता है  राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक शहर गोगामेड़ी है। यहां भादव शुक्लपक्ष की नवमी को गोगाजी देवता का मेला भरता है। इन्हे हिन्दु और मुस्लिम दोनो पूजते है 

वीर गोगाजी गुरुगोरखनाथ के परमशिस्य थे। चौहान वीर गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था सिद्ध वीर गोगादेव के जन्मस्थानजो राजस्थान के चुरू जिले के दत्तखेड़ा ददरेवा में स्थित है। जहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। कायम खानी मुस्लिम समाज उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

गोरखनाथ जी से सम्बंधित एक कथा राजस्थान में बहुत प्रचलित है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा।

मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदूमुस्लिमसिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। विक्रम संवत 1003 में गोगा जाहरवीर का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरूचौहान वंश के राजपूत शासक जैबर (जेवरसिंहकी पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। जिस समय गोगाजी का जन्म हुआ उसी समय एक ब्राह्मण के घर नाहरसिंह वीर का जन्म हुआ। ठीक उसी समय एक हरिजन के घर भज्जू कोतवाल का जन्म हुआ और एक वाल्मीकि के घर रत्ना जी का जन्म हुआ। यह सभी गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य हुए। गोगाजी का नाम भी गुरु गोरखनाथ जी के नाम के पहले अक्षर से ही रखा गया। यानी गुरु का गु और गोरख का गो यानी की गुगो जिसे बाद में गोगा जी कहा जाने लगा। गोगा जी ने गूरू गोरख नाथ जी से तंत्र की शिक्षा भी प्राप्त की थी।

चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणातक था। जयपुर से लगभग 250 किमी दूर स्थित सादलपुर के पास दत्तखेड़ा (ददरेवामें गोगादेवजी का जन्म स्थान है। दत्तखेड़ा चुरू के अंतर्गत आता है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गएलेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। उक्त जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और वहीं है गोगादेव की घोड़े पर सवार मूर्ति। भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और जन्म स्थान पर बने मंदिर पर मत्था टेककर मन्नत माँगते हैं।

आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती हैगोगाजी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकडी पर सर्प मूर्ती उत्कीर्ण की जाती हैलोक धारणा है कि सर्प दंश से प्रभावित व्यक्ति को यदि गोगाजी की मेडी तक लाया जाये तो वह व्यक्ति सर्प विष से मुक्त हो जाता हैभादवा माह के शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की नवमियों को गोगाजी की स्मृति में मेला लगता हैउत्तर प्रदेश में इन्हें जाहर पीर तथा मुसलमान इन्हें गोगा पीर कहते हैं।

हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगाजी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित हैजो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक हैजहाँ एक हिन्दू  एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगा मेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोगा पीर  जाहिर वीर के जयकारों के साथ गोगाजी तथा गुरु गोरक्षनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है। भक्तजन गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर जाकर शीश नवाते हैंफिर गोगाजी की समाधि पर आकर ढोक देते हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग गोगा जी के मंदिर में मत्था टेक तथा छड़ियों की विशेष पूजा करते हैं।

गोगा जाहरवीर जी की छड़ी का बहुत महत्त्व होता है और जो साधक छड़ी की साधना नहीं करता उसकी साधना अधूरी ही मानी जाती है क्योंकि मान्यता के अनुसार जाहरवीर जी के वीर छड़ी में निवास करते है  सिद्ध छड़ी पर नाहरसिंह वीर , सावल सिंह वीर आदि अनेकों वीरों का पहरा रहता है। छड़ी लोहे की सांकले होती है जिसपर एक मुठा लगा होता है  जब तक गोगा जाहरवीर जी की माड़ी में अथवा उनके जागरण में छड़ी नहीं होती तब तक वीर हाजिर नहीं होते , ऐसी प्राचीन मान्यता है  ठीक इसी प्रकार जब तक गोगा जाहरवीर जी की माड़ी अथवा जागरण में चिमटा नहीं होता तब तक गुरु गोरखनाथ सहित नवनाथ हाजिर नहीं होते।

छड़ी अक्सर घर में ही रखी जाती है और उसकी पूजा की जाती है  केवल सावन और भादो के महीने में छड़ी निकाली जाती है और छड़ी को नगर में फेरी लगवाई जाती है , इससे नगर में आने वाले सभी संकट शांत हो जाते है  जाहरवीर के भक्त दाहिने कन्धे पर छड़ी रखकर फेरी लगवाते है  छड़ी को अक्सर लाल अथवा भगवे रंग के वस्त्र पर रखा जाता है।

यदि किसी पर भूत प्रेत आदि की बाधा हो तो छड़ी को पीड़ित के शरीर को छुवाकर उसे एक बार में ही ठीक कर दिया जाता है ! भादो के महीने में जब भक्त जाहर बाबा के दर्शनों के लिए जाते है तो छड़ी को भी साथ लेकर जाते है और गोरख गंगा में स्नान करवाकर जाहर बाबा की समाधी से छुआते है  ऐसा करने से छड़ी की शक्ति कायम रहती है 

प्रदेश की लोक संस्कृति में गोगाजी के प्रति अपार आदर भाव देखते हुए कहा गया है कि गाँव-गाँव में खेजड़ीगाँव-गाँव में गोगा वीर गोगाजी का आदर्श व्यक्तित्व भक्तजनों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है।गोरखटीला स्थित गुरु गोरक्षनाथ के धूने पर शीश नवाकर भक्तजन मनौतियाँ माँगते हैं। विद्वानों  इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्यधर्मपराक्रम  उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है।

जातरु (जात लगाने वालेददरेवा आकर  केवल धोक आदि लगाते हैं बल्कि वहां समूह में बैठकर गुरु गोरक्षनाथ  उनके शिष्य जाहरवीर गोगाजी की जीवनी के किस्से अपनी-अपनी भाषा में गाकर सुनाते हैं। प्रसंगानुसार जीवनी सुनाते समय वाद्ययंत्रों में डैरूं  कांसी का कचौला विशेष रूप से बजाया जाता है। इस दौरान अखाड़े के जातरुओं में से एक जातरू अपने सिर  शरीर पर पूरे जोर से लोहे की सांकले मारता है। मान्यता है कि गोगाजी की संकलाई आने पर ऐसा किया जाता है।

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है... मनीष
 शिव हरि....जय गुरुदेव..जय गुरुदेव कल्याणदेव जी....