Monday, April 4, 2016

श्रीमद् भागवत Srimdbhagwat Part (8)

इसीलिए कहते हैं, जो होता है अच्छे के लिए होता है
यह मानव स्वभाव होता है कि जब हम पर कोई विपत्ति आती है तो हम पहले भगवान की ओर दौड़ते हैं। उसके समाधान की विनती करने लगते हैं। समस्या हल हो जाए तो भगवान को प्रसाद चढ़ाकर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं, लेकिन अगर समस्या हल नहीं हुई तो फिर हम परमात्मा को ही घेर लेते हैं, उसकी कृपाओं पर तो सवाल उठाते ही हैं साथ ही उस पर अनर्गल आरोप भी गढ़ देते हैं।यहां ब्राम्हण ने अपनी संतानों के न जीने का आरोप श्रीकृष्ण पर मढ़ दिया। भगवान ने जितने शुभ कर्म किए उन सभी को अषुभ बता दिया। भगवान के चरित्र को किसी, पापी राक्षस का चरित्र बता दिया, लेकिन भगवान मौन हैं। भगवान की यही शैली है कि जब मनुष्य खुद अपने से निर्मित परिस्थितियों के कारण दु:ख में फंसता है और फिर उस दु:ख का क्रोध भगवान पर मढ़ता है तो भगवान मौन धारण कर लेते हैं। वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते। श्रीकृष्ण भी यही कर रहे हैं। वे शांत हैं, ब्राह्मण के विरोध और कुप्रचार का उन पर कोई प्रभाव नहीं है।

ब्राह्मण की हर संतान एक के बाद एक जन्म लेते ही मर रही थी। ब्राम्हण का क्रोध हर संतान की मृत्यु के बाद और ज्यादा बढ़ जाता। वह और अधिक उग्रता से श्रीकृष्ण का विरोध करने निकल पड़ता। द्वारिका में तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं। लोग ब्राम्हण और कृष्ण के बारे में बातें करने लगे। लेकिन भगवान मौन हैं। उनका मौन भी लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है।इसी प्रकार अपने दूसरे और तीसरे बालक के भी पैदा होते ही मर जाने पर वह ब्राह्यण लड़के की लाष राजमहल के दरवाजे पर डाल गया और वही बात कह गया। नवें बालक के मरने पर जब वह वहां आया, तब उस समय भगवान श्रीकृष्ण के पास अर्जुन भी बैठे हुए थे। अर्जुन ने देखा भगवान मौन हैं, ब्राम्हण अपने पुत्रों की असामयिक मृत्यु से विचलित है लेकिन कोई उसकी मदद नहीं कर रहा है। अर्जुन से रहा नहीं गया वह ब्राम्हण से बोल पड़ा। यह भगवान की लीला भी है। खुद भगवान कुछ नहीं कर रहे हैं लेकिन वे अर्जुन के निमित्त अपनी लीला दिखाएंगे। भगवान अर्जुन की बात पर भी अभी मौन हैं लेकिन अर्जुन ने जो प्रतिज्ञा कर ली है उसे भगवान पूरा करेंगे।

भगवान की यह कृपा है कि वे बुरा करने पर भी आपका भला ही करते हैं। वही कार्य करते हैं जिसके अंत में आपका भला हो जाए। इसलिए कहा जाता है कि आपका सोचा हो तो अच्छा, नहीं हो तो और अच्छा क्योंकि वह परमात्मा का सोचा होता है। भगवान जो भी करें उसे आप स्वीकार कर लें तो फिर जीवन में कोई परेशानी नहीं आएगी। एक दिन भगवान आपको उसका सुखद परिणाम देगा। सारी परिस्थितियां आपके अनुकूल होगी।उन्होंने ब्राह्यण की बात सुनकर उससे कहा-ब्रह्यन! आपके निवासस्थान द्वारका में कोई धनुषधारी क्षत्रिय नहीं है क्या? मालूम होता है कि ये यदुवंशी ब्राह्यण हैं और प्रजापालन का परित्याग करके किसी यज्ञ में बैठे हुए हैं! जिनके राज्य में धन, स्त्री अथवा पुत्रों से वियुक्त होकर ब्राह्यण दुखी होते हैं, वे क्षत्रिय नहीं हैं। उनका जीवन व्यर्थ है।मैं समझता हूं कि आप स्त्री-पुरुष अपने पुत्रों की मृत्यु से दीन हो रहे हैं। मैं आपकी सन्तान की रक्षा करूंगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका तो आग में कूदकर जल मरूंगा और इस प्रकार मेरे पाप का प्रायश्चित हो जाएगा। अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली। जल मरने की भीषण प्रतिज्ञा और पूरी सभा सन्न रह गई।

अगर सब कुछ ठीक नहीं है तो कोई बात नहीं क्योंकि....
कृष्ण ने एक और सबक दुनिया को सिखाया है कि आप जितने शक्तिशाली होते हैं, उतनी ही दुनिया के प्रति आपकी जवाबदेही होती है। शक्ति और सामथ्र्य से परिपूर्ण होने के बाद भी आप अधर्म, जुर्म का प्रतिकार न करें। केवल स्वहित में ही लगे रहे तो आपकी शक्ति व्यर्थ है।

द्वारिका में एक ऐसी ही घटना घट रही है जिसमें कृष्ण का सम्पूर्ण चरित्र संदेह के घेरे में आ गया है। एक दिन की बात है। द्वारकापुरी में किसी ब्राम्हण की पत्नी के गर्भ से एक पुत्र पैदा हुआ, परन्तु वह उसी समय मर गया, ब्राह्यण अपने पुत्र का मृत शरीर लेकर राजमहल के द्वार पर गया और वहां उसे रखकर दुखी मन से रोता हुआ कहने लगा- इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्यणद्रोही, धूर्त, कृपण और विषयी राजा के कर्मदोष से ही मेरे बालक की मृत्यु हुई है। जो राजा हिंसापरायण, दु:शील और अजितेन्द्रिय होता है, उसे राजा मानकर सेवा करने वाली प्रजा दरिद्र होकर दुख पर दुख भोगती रहती है और उसके सामने संकट पर संकट आते रहते हैं। यह मानव स्वभाव होता है कि जब हम पर कोई विपत्ति आती है तो हम पहले भगवान की ओर दौड़ते हैं। उसके समाधान की विनती करने लगते हैं। समस्या हल हो जाए तो भगवान को प्रसाद चढ़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन अगर समस्या हल नहीं हुई तो फिर हम परमात्मा को ही घेर लेते हैं, उसकी कृपाओं पर तो सवाल उठाते ही हैं साथ ही उस पर अनर्गल आरोप भी गढ़ देते हैं।

यहां ब्राह्यण ने अपनी संतानों के न जीने का आरोप श्रीकृष्ण पर मढ़ दिया। भगवान ने जितने शुभ कर्म किए उन सभी को अशुभ बता दिया। भगवान के चरित्र को किसी, पापी राक्षस का चरित्र बता दिया, लेकिन भगवान मौन हैं। भगवान की यही शैली है कि जब मनुष्य खुद अपने से निर्मित परिस्थितियों के कारण दु:ख में फंसता है और फिर उस दु:ख का क्रोध भगवान पर मढ़ता है तो भगवान मौन धारण कर लेते हैं। वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते। श्रीकृष्ण भी यही कर रहे हैं। वे शांत हैं, ब्राह्मण के विरोध और कुप्रचार का उन पर कोई प्रभाव नहीं है।

ब्राह्मण की हर संतान एक के बाद एक जन्म लेते ही मर रही थी। ब्राह्मण का क्रोध हर संतान की मृत्यु के बाद और ज्यादा बढ़ जाता। वह और अधिक उग्रता से कृश्ण का विरोध करने निकल पड़ता। द्वारिका में तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं। लोग ब्राह्मण और कृष्ण के बारे में बातें करने लगे। लेकिन भगवान मौन हैं। उनका मौन भी लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है।

इसी प्रकार अपने दूसरे और तीसरे बालक के भी पैदा होते ही मर जाने पर वह ब्राह्यण लड़के की लाश राजमहल के दरवाजे पर डाल गया और वही बात कह गया। नवें बालक के मरने पर जब वह वहां आया, तब उस समय भगवान श्रीकृष्ण के पास अर्जुन भी बैठे हुए थे। अर्जुन ने देखा भगवान मौन हैं, ब्राह्मण अपने पुत्रों की असामयिक मृत्यु से विचलित है लेकिन कोई उसकी मदद नहीं कर रहा है। अर्जुन से रहा नहीं गया वह ब्राह्मण से बोल पड़ा। यह भगवान की लीला भी है। खुद भगवान कुछ नहीं कर रहे हैं लेकिन वे अर्जुन के निमित्त अपनी लीला दिखाएंगे। भगवान अर्जुन की बात पर भी अभी मौन हैं लेकिन अर्जुन ने जो प्रतिज्ञा कर ली है उसे भगवान पूरा करेंगे।भगवान की यह कृपा है कि वे बुरा करने पर भी आपका भला ही करते हैं। वही कार्य करते हैं जिसके अंत में आपका भला हो जाए।

कृष्ण सिखाते हैं, जिंदगी जीएं तो कुछ इस तरह....
महाभारत की कथा गति पकड़ रही है। इस कथा के केन्द्र में कृष्ण ही हैं। उनकी विभिन्न लीलाएं हैं। कृष्ण की शिक्षा, उनके उपदेश सभी हमारे काम आने वाले हैं। महाभारत की पूरी कथा अब कृष्ण के ईर्द-गिर्द ही घूमने वाली है, संचालित भी वही करते हैं और उसके केन्द्र में भी वही हैं। पाण्डवों के लिए सबसे बड़े हितैशी और कौरवों के लिए शत्रु।

सारी बातें या तो कृष्ण के लिए कही जा रही हैं या कृष्ण द्वारा कही जा रही हैं। कृष्ण के अलावा महाभारत का कोई पात्र नहीं है जो इस कथा को आगे बढ़ाता है। कृष्ण अपनी गृहस्थी में भी उतने ही रमे हैं जितने वे महाभारत यानी हस्तिनापुर के पात्रों को लेकर सोच रहे हैं। गृहस्थी और दुनियादारी में कैसे जीया जाए यह कृष्ण से सीखा जा सकता है।

कृष्ण ने दुनिया और दांम्पत्य के बीच में जो तालमेल बनाया है वह अद्भुत है।महाभारत में अब भगवान व्यस्त हो जाएंगे। बार-बार द्वारका से इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर जाना होगा। इसीलिए भागवत ग्रंथकार ने भगवान की द्वारकालीला का भी वर्णन दसवें स्कंध के अंतिम 90वें अध्याय में किया है।

द्वारकानगरी की छटा अद्भुत थी। जिधर देखिये, उधर ही हरे-भरे उपवन और उद्यान लहरा रहे हैं। वह नगरी सब प्रकार की सम्पत्तियों से भरपुर थी। भगवान श्रीकृष्ण सोलह हजार से अधिक पत्नियों के एकमात्र प्राणाधार थे। उन पत्नियों के अलग-अलग महल भी परम ऐश्वर्य से सम्पन्न थे। जितनी पत्नियां थीं, उतने ही अद्भुत रूप धारण करके वे उनके साथ विहार करते थे।

गृहस्थी चलाने का यह तरीका केवल कृष्ण के पास ही था। वे किसी भी पत्नी को नाराज नहीं करते। सबको बराबर स्नेह, प्रेम, आदर और समय दिया करते थे। कई ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी भी उनकी इस लीला को समझ नहीं पाए। जो छोटी बुद्धि के थे उन्होंने कृष्ण को कामी-विलासी की संज्ञा भी दी। आज भी कई लोग उनकी रासलीला, राधा प्रसंग और 16108 विवाहों को केवल दैहिक दृष्टि से ही देखते हैं। ऐसे लोगों के लिए कृष्ण न केवल दुर्लभ हैं बल्कि उन्हें कभी भी शांति नहीं मिल सकती।

कृष्ण तो तर्क से परे हैं। वे सभी तर्कों-कुतर्कों से ऊपर स्वयं एक सत्ता है। वे अविचल और परम धर्म के समतुल्य हैं। कृष्ण ने अपनी शक्ति के कई चमत्कार शिशुकाल से ही दिखाए। अब वे अपनी गृहस्थी की लीलाएं, अपने परिवार और कुटुम्ब के जरिए भी हमें जीवन के कई सूत्र दे रहे हैं। इन सूत्रों में ही मानव जीवन छिपा है।

इस जीवन का यही है रंग रूप क्योंकि...

भगवान के हर एक रानी से दस पुत्र थे। भगवान के परम्पराक्रमी पुत्रों में अठारह तो महारथी थे, जिनका यश सारे जगत् में फैला हुआ था। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान, भानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि और न्यग्रोध। इन पुत्रों में भी सबसे श्रेष्ठ रुक्मिणी नन्दन प्रद्युम्नजी थे। यदुवंश के बालकों को शिक्षा देने के लिए तीन करोड़ अठ्ठासी लाख आचार्य थे।

जो लोग भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा का अधिकार प्राप्त करना चाहे, उन्हें उनकी लीलाओं का ही श्रवण करना चाहिए। जब मनुष्य निरंतर श्रीकृष्ण की लीला-कथाओं का अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करने लगता है, तब उसकी यही भक्ति उसे भगवान के परमधाम में पहुंचा देती है। यद्यपि काल की गति के परे पहुंच जाना बहुत ही कठिन है, परन्तु भगवान के धाम में काल की दाल नहीं गलती। वह वहां तक पहुंच ही नहीं पाता।

यहां दसवें स्कंध के समापन पर शुकदेवजी ने भक्ति के सामने काल को भी छोटा बताया। यही भागवत का प्रमुख संदेश है। भागवत मरने की कला सिखाती है। मृत्यु तो सबकी निश्चित है, परन्तु काल को किस कला से स्वीकार करें यही भागवत का संदेश है।जिसने भी देह धारण की है उसे जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त यात्रा करनी ही है। उसमें कई पड़ाव आते हैं, उनमें वह रुकता नहीं, बढ़ता जाता है। दैहिक पड़ाव है-गर्भ अवस्था, शिशु अवस्था, किशोर अवस्था, युवा अवस्था, वृद्धावस्था और जरा-अवस्था।

इन अवस्थाओं में सुख का भी अनुभव होता है और दु:ख का भी। सुख-दु:ख कर्मों के फल कहे जाते हैं।इस तथ्य को पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए उजागर किया-मनुष्य जो शुभ कर्म करता तथा दूसरों से कराता है-इन दोनों प्रकार के कर्म का अनुष्ठान करके प्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि इनका फल सुख है और अशुभ कर्म हो जाने पर उससे अच्छे फल की आशा नहीं करनी चाहिए।
यहां आकर दसवां स्कंध समाप्त होता है।

पांडव क्यों मान लेते थे श्रीकृष्ण की हर बात?
दसवें स्कंध समापन तक भगवान की विभिन्न लीलाओं का वर्णन हम पढ़ चुके हैं। भगवान की प्रत्येक लीला में एक संदेश छुपा है। धीरे-धीरे भगवान अपनी जीवन यात्रा को समेटेंगे। इसी के साथ भागवत में गहरे दर्शन के प्रसंग आएंगे। भगवान के भक्त अब तक परिपक्व हो चुके हैं, अब जिन पात्रों में आपस में वार्तालाप होगा उसका स्तर बड़ा ऊंचा और अर्थ बड़े गहरे होंगे। इक्कतीस अध्यायों का है एकादश स्कंध। इसके समापन पर भगवान स्वधाम गमन करेंगे। स्कंध का आरम्भ महाभारत की घटना की चर्चा से होगा। वसुदेव और नारदजी की चर्चा आएगी।

भागवत का दसवां स्कंध भगवान के बचपन और जवानी लिए हुए है। अब भगवान बड़े हो गए हैं। पूर्ण रूप से परिपक्व पुरुष हो गए हैं। दुनिया में उनका नाम और महिमा फैल चुकी है। अधिकांश राजवंश उनकी नीतियों पर पकड़, धर्म का ज्ञान और शक्ति का चमत्कार देख चुके हैं। अब भगवान उस लीला में प्रवेश कर रहे हैं जो दुनिया में आज भी हर जगह पढ़ी-सुनी और मानी जाती है। भगवान महाभारत के उस ऐतिहासिक युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे हैं। यह भूमिका केवल कृष्ण ही निभा सकते हैं, बिना हथियार, बिना लड़े दुनिया के सबसे बड़े युद्ध के नायक, मार्गदर्शक और निर्णायक बनेंगे भगवान। यह युद्ध हमारे भीतर भी है और बाहर भी। महाभारत युद्ध अपनों का अपनों से ही कड़ा संग्राम है, लडऩे वाले कौरव-पाण्डव हैं लेकिन इसके केन्द्र में भगवान हैं। भगवान पाण्डवों के पक्ष में हैं।

भगवान वहां हैं जहां धर्म है और धर्म इस समय पाण्डवों के साथ है। पाण्डव जानते हैं कि उनके साथ षडयंत्र हो रहा है। फिर भी वे चुपचाप हर निर्णय मान रहे हैं, क्योंकि उन्हें भगवान के होने पर विश्वास है।अर्जुन भगवान का प्रिय पात्र है। पांचों पाण्डव, कुंती और द्रौपदी सभी भगवान के आसरे ही हैं। इसलिए भगवान उनके साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में विराजित हैं। उनके हर सुख-दु:ख में साथ हैं। हम भी पूरी तरह भगवान पर टिक जाएं हर चीज उनकी ओर कर दें तो फिर भगवान को आते देर नहीं लगेगी। आपको हर मुसीबत से बचाने के लिए भगवान तैयार हैं। शर्त है आप पहल करें, भगवान को पुकारें, उसकी आराधना करें। फिर भगवान क्या करते हैं यह आपको सोचना भी नहीं पड़ेगा।

भगवान हर तरह की मुसीबत से बचाने को तैयार पर शर्त है!
अर्जुन भगवान का प्रिय पात्र है। पांचों पाण्डव, कुंती और द्रौपदी सभी भगवान के आसरे ही हैं। इसलिए भगवान उनके साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में विराजित हैं। उनके हर सुख-दु:ख में साथ हैं। हम भी पूरी तरह भगवान पर टिक जाएं हर चीज उनकी ओर कर दें तो फिर भगवान को आते देर नहीं लगेगी। आपको हर मुसीबत से बचाने के लिए भगवान तैयार हैं। शर्त है आप पहल करें, भगवान को पुकारें, उसकी आराधना करें। फिर भगवान क्या करते हैं यह आपको सोचना भी नहीं पड़ेगा।

चलिए एकादश स्कंध में प्रवेश करते हैं। जीवन के अनेक उलझे प्रश्नों का उत्तर यहां मिलेगा। इसका आरम्भ महाभारत की चर्चा से होता है। ग्रंथकार ने महाभारत पर विस्तृत चर्चा नहीं की है संक्षेप में संकेत दिया है।भगवान श्रीकृष्ण ने बलरामजी तथा अन्य यदुवंशियों के साथ मिलकर बहुत से दैत्यों का संहार किया तथा कौरव और पाण्डवों में भी शीघ्र मारकाट मचाने वाला अत्यन्त प्रबल कलह उत्पन्न करके पृथ्वी का भार उतार दिया। कौरवों ने कपटपूर्ण जूए से, तरह-तरह के अपमानों से तथा द्रौपदी के केश खींचने आदि अत्याचारों से पाण्डवों को अत्यन्त क्रोधित कर दिया था। उन्हीं पाण्डवों को निमित्त बनाकर भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों पक्षों में एकत्र हुए राजाओं को मरवा डाला और इस प्रकार पृथ्वी का भार हल्का कर दिया।

भगवान हर संकट को पहले भांप लेते हैं। वे रहे कहीं भी उनका ध्यान हमेशा अपने प्रिय लोगों में लगा रहता है। वे पल-पल कई खबर रखते हैं, फिर जब भी जरूरत पड़े वे भक्त के पास तत्काल पहुंच जाते हैं। पाण्डवों के साथ भी यही हुआ है। भगवान द्वारका में हैं और कौरवों ने उनके साथ शडयंत्र रचा है। भगवान ने युधिष्ठिर को पहले ही संकेत भी किया था कि जुआ नहीं खेलना चाहिए, राजा में एक भी कुसंस्कार हो तो वह उससे राज छिनने का कारण बन जाता है। फिर भी युधिष्ठिर जुआ खेलने के लिए राजी हो गए। बस अब भगवान चुप हैं। बड़ा संकट आने वाला है, भगवान सब देख रहे हैं। वे अधर्मियों को भी धर्म के रास्ते पर आने का एक मौका देते हैं, फिर भी अगर लोग न सुधरें तो आगे निर्णय खुद भगवान करते हैं। कुछ लोग महाभारत के घटनाक्रम पर सवाल उठाते हैं कि कृष्ण को जब सब पता था तो उन्होंने सीधे राजसभा में पहुंच कर जुआ क्यों नहीं रुकवाया, क्यों द्रौपदी के चीरहरण को पहले ही नहीं रोक दिया। इसका जवाब है कि भगवान एक बार सबको मौका देते हैं, एक बार सबकी परीक्षा लेते हैं।

तो इसलिए तैयार हो गए युधिष्ठिर जुआ खेलने को
अपने बाहुबल से सुरक्षित यदुवंशियों के द्वारा पृथ्वी के भार-राजा और उनकी सेना का विनाश करके, प्रमाणों के द्वारा ज्ञान के विषय न होने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि लोकदृष्टि से पृथ्वी का भार दूर हो जाने पर भी वस्तुत: मेरी दृष्टि से अभी तक दूर नहीं हुआ, क्योंकि जिस पर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह यदुवंश अभी पृथ्वी पर विद्यमान है। यह यदुवंश मेरे आश्रित हैं और विशाल वैभव के कारण उच्छल हो रहा है। अन्य किसी देवता आदि से भी इसकी किसी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। बांस के वन में परस्पर संघर्ष से उत्पन्न अग्नि के समान इस यदुवंश में भी परस्पर कलह खड़ा करके मैं शान्ति प्राप्त कर सकूंगा और इसके बाद अपने धाम में जाऊंगा।

चलिए थोड़ा महाभारत की कथा को जान लें। भगवान का नया रूप आने वाला है। जब भगवान की लीला चल रही थी तब पाण्डव इंद्रप्रस्थ में राजा बनकर अपना राज चला रहे थे। सबकुछ ठीक चल रहा था और एक दिन पाण्डव से बड़ी भूल हो गई। पाण्डवों का वैभव देखकर दुर्योधन विचलित था, उसने अपने मामा से कहा मैं आत्महत्या कर लूंगा। मामा ने कहा मेरे जीवित रहते आत्महत्या करने की आवश्यकता नहीं है। मैं पाण्डव का यह वैभव नहीं देख सकता। किसी भी तरह पाण्डव को पराजित करिये। हमारी हस्तिनापुर से ज्यादा अच्छी राजधानी इंद्रप्रस्थ। मैं मरना चाहता हूं। शकुनी समझाता है कि जब शस्त्र से न लड़ा जाए तो षडय़ंत्र से लडऩा चाहिए। एक काम करो मैं जानता हूं धर्मराज है युधिष्ठिर पर उसकी एक बहुत बड़ी कमजोरी है कि वो जुआ खेलने में मना नहीं करता। उसको द्युत का आमंत्रण दो और पिता से स्वीकृति लो। उस समय द्यूत राजक्रीड़ा मानी जाती थी।

सूचना मिली तो चारों भाई और द्रौपदी ने कहा कि आप यह आमंत्रण स्वीकार मत करिए। जुआ खेलना ठीक नहीं है लेकिन बस एक कमी थी युधिष्ठिर में और तर्क दिया युधिष्ठिर ने कि यदि राजा के पास यदि किसी दूसरे राजा का आमंत्रण आए तो उसको स्वीकार करना ही पड़ता है, यह राजधर्म है, नीति है इसलिए जाना ही पड़ेगा। राजमहल में अलग से द्यूतकक्ष बनाया गया। और जब पांचों पाण्डव सामने बैठे, कौरव बैठे सब लोग मौजूद थे तब यह सूचना दी गई कि आप तो युधिष्ठिर जुआ खेलना जानते हैं, दुर्योधन नहीं जानता तो दुर्योधन की ओर से शकुनी जुआं खेलेगा, पासे शकुनी फेंकेगा।

ऐसी एक आदत आपकी जिदंगी बना या बिगाड़ सकती है
कृष्ण ने मन ही मन कहा जब दाऊ ने कंधे पर हाथ रखकर पूछा तो कृष्ण कहते हैं कि ये पांच बच्चे जीवन में बिना मुझसे पूछे कोई काम नहीं करेंगे, पर उन्होंने ऐसा काम कर लिया मुझसे पूछा तो होता। मैं संभाल लेता स्थिति को। कृष्ण आंगीरस के आश्रम में चले गए। ये क्या किया पाण्डवों ने मैं इनके भरोसे इतना बड़ा अभियान कर रहा था।याद रखिए एक बुराई, कभी हमारे व्यक्तित्व में एक बुराई आ जाए तो हम सोचते हैं चलेगी एक बुराई तो पर एक बुराई थी धर्मराज युधिष्ठिर की और देखिए क्या स्थिति बन गई।

एक भी दुर्गुण हो तो अतिरिक्त रूप से सावधान हो जाइए। एक दुर्गुण पूरे जीवन की तपस्या को खंडित कर सकता है। भगवान को बहुत दुख हुआ। भगवान सोचते हैं पर याद तो पाण्डव ही आते हैं। मेरी आंखों को ये कौन बताने देगा ख्वाब जिसके हैं वो ही नींद न आने देगा। सब अंधरों से कोई वादा किए बैठे हैं कौन ऐसे में मुझको शमा जलाने देगा। भगवान कह रहे हैं जिस पर भरोसा था वो ही यह कर गया। पाण्डव वन में चले गए तब भगवान पाण्डवों से मिलने वन में जाते हैं। धीरे-धीरे भागवत हमें बताती और जब वनवास पूरा होता है, लौटकर आते हैं। कौरव उनको अपना अधिकार नहीं लौटाते तब भगवान एक बार फिर वहां दूत बनकर गए हैं।

भागवत में प्रसंग आया है भगवान ने विचार किया मुझे अब महाभारत करते हुए इनका समापन करना है तो भागवत लिख रही है कथा। भगवान ने विचार किया कि अब मैं पाण्डवों को निमित्त बनाकर दोनों पक्षों के राजाओं को खत्म करूं, इनको समाप्त करूं। भगवान दूत बनकर गए हैं कौरवों की सभा में। भगवान की प्रतीक्षा की जा रही थी। भगवान ने पाण्डवों की ओर से पक्ष रखा। कभी आप महाभारत पढि़ए तो उसमें भाषण कला क्या होती है यह देखना हो तो कृष्णजी ने पाण्डवों की ओर से दूत बनकर कौरवों की सभा में अधिकार, राजनीति, नैतिकता, धर्म के ऊपर सुंदर व्याख्यान दिया और अंत में कहा पाण्डवों को उनका इंदप्रस्थ लौटा दीजिए तब दुर्योधन ने कहा सुनो ग्वाले सुई की नोंक से नाप ली जाए, पृथ्वी का इतना सा टुकड़ा भी नहीं दूंगा। या तो लड़कर ले लें या फिर जंगल में रहें। भगवान ने कहा दुर्योधन यह बात ठीक नहीं कह रहे हो।

मैं नहीं चाहता युद्ध हो। जब भगवान ने कहा तो दुर्योधन ने कहा- पकड़ लो ग्वाले को और दुर्योधन के सैनिक दौड़े तो भगवान एकदम से खड़े हुए और उन्होंने एकदम गर्जिली वाणी में कहा कि पूरे कुरूवंश के सैनिक की श्रृंखला बना लाओ और मुझे पकड़ लो तो मैं यहीं युद्ध हार जाता हूं। देखता हूं कौन पकड़ता है। भगवान सामान्य रूप से रौद्र रूप में आते नहीं, पर उस दिन क्या गरजे हैं और जैसे ही भगवान गरजे तो पूरी राजसभा कांपी, दो लोग नहीं हिले एक स्वयं कृष्ण और दूसरे भीष्म। भीष्म आंख बंद करके बैठे थे। भीष्म जान रहे थे बहुत बड़ा अपराध दुर्योधन लगातार करता जा रहा है। भगवान बाहर निकले और जाने लगे। चलिए महाभारत युद्ध पूर्व भगवान के चिंतन को जान लें।

जब समझ ना आए कौन सा रास्ता चुने तो...
भगवान शान्ति के संवाहक हैं। वे हमेशा शान्ति ही चाहते हैं। भगवान ने महाभारत में हर युद्ध के पहले शान्ति की ही कोशिशें की। जरासंध से युद्ध हो या कंस के साथ, भगवान ने हर बार पहले युद्ध टालने का प्रयास किया। भगवान कहते हैं कि शान्ति किसी भी कीमत पर मिले वह सस्ती ही है। महाभारत युद्ध के आसार मंडरा रहे हैं। हर कोई अपने हथियारों को धार देने में लगा है। केवल एक ही है जो शान्ति के प्रयास में जुटे हैं, कैसे भी हो बस शन्ति मिले तो वह प्रयास किया जाए। भगवान शन्ति का कोई भी अवसर खोना नहीं चाहते। भगवान शन्ति के दूत हैं।

अगर देखा जाए तो इन्सान की जिन्दगी में दो ही चीजों का सबसे ज्यादा महत्व है, सुख और शान्ति। जीवन में जब दोनों का संतुलन हो तो आनन्द मिलता है। सुख तो हम अपने पुरुषार्थ से कमा लेते हैं लेकिन शान्ति ऐसे ही नहीं मिलती। षान्ति के लिए मन को, इच्छाओं को, अभिलाशाओं को, महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करने, परम शक्ति के प्रतिपूर्ण समर्पण से ही शान्ति मिलती है। जीवन में शान्ति न हो तो सारे सुख बेकार हैं, वे सुख भी आनन्द नहीं देते। भगवान अपने भक्तों के जीवन में सुख और शान्ति दोनों के प्रयास करते हैं, पहले शान्ति देते हैं, फिर सुख। जीवन में शान्ति की अहमियत समझिए। अगर शान्ति मिल जाए तो सुख खुद आ जाता है। जीवन में पहले शन्ति का प्रयास करें। आसपास के वातावरण में, परिवार में, समाज में, देश में और स्वयं के भीतर, हर कहीं पहले शान्ति स्थापित की जाए। सुख स्वत: चला जाएगा।

मेरा माना तो राग हुआ और दूसरे का माना तो द्वेष हुआ। राग-द्वेष वृत्तियां हैं। वृत्तियों की निर्माता परिस्थितियां होती हैं और मनुष्य भी अपने में निर्माण करता है। परिस्थिति को हम एक उदाहरण से ले सकते हैं। एक शिशु व्रत्तिविहीन होता है। न अच्छी और न बुरी वृत्ति वाला-परिवार में वह बड़ा होता है। परिवार के संस्कार उसमें वृत्तियों का निर्माण करते हैं। किशोरवय में उसे समाज का विद्यालय, माता-पिता सहित शिक्षकों का साथ मिलता है, अधिक वृत्तियां उसमें संचित होती हैं। विवाह होता है, बाल-बच्चे होते हैं- मोह जनित संस्कार उसमें उदय होते हैं-राग, द्वेष, ईष्र्या, सेवा, सद्भावना, सद्विचार वाली वृत्तियां उसके मानस पटल पर अंकित होती हैं। वह दु:खी और सुखी होता है। तदनुसार वह जगत में कार्य करने लगता है। इस बीच यदि श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष, महात्मा, संत, ज्ञानी व दिव्य दृष्टि का साथ मिल जाए तो दिशा बदल जाती है।

यह दिशा हर किसी को नहीं मिलती। इसके लिए आपको श्रीकृष्ण जैसा सारथी चाहिए। श्रीकृष्ण आपके भी सारथी बन सकते हैं लेकिन इसके लिए आपको अर्जुन जैसा बनना पड़ेगा। जो नर है लेकिन जिसके हृदय में हमेशा नारायण बसते हैं। नारायण को अपने मन में बसाएं फिर वह खुद आपके जीवन रथ का सारथी बन जाएगा। नारायण का होने का मतलब है सबकुछ का समर्पण। अपने आपको उसके चरणों में लगा देना। जब आप नारायण के हो जाएंगे तो फिर किसी अन्य गुरु की आवश्यकता नहीं होगी। भगवान खुद ही आपको सारे रास्ते दिखाएंगे।

इसीलिए कहते है जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे
कर्मों के फल भी निश्चित है। कर्म बीज है जो बोया गया तो वृक्ष बनेगा, फूल व फल लगेंगे ही, तब क्या? फल भोगना है या उनका त्याग कर निद्र्वंद्व होना है। यह निश्चयात्मकता तब ही हो सकती है जब सद्कर्म किए जाएं।

अन्यथा कर्म बंधन के कारण हैं। उनके बंधन में न आना ही कुशलता है। पाप और पुण्य कर्म दोनों फल देते हैं जो दु:ख व सुख के रूप में प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, इसी जीवन में और अतिशेष भावी जन्मों में।व्यक्ति फल की इच्छा त्यागकर कर्म ईश्वर अर्पण करके करता है, स्मरण रहे ईश्वर को सद्कर्म-सद्वस्तु या श्रेष्ठ कर्म या श्रेष्ठ वस्तु ही अर्पण की जाती है। जिसमें किसी को हानि नहीं, किसी की हिंसा नहीं, किसी से राग नहीं, द्वेष नहीं होता है। ईश्वर-अर्पण में पूर्ण शुद्धता होती है। फल की कामना भी नहीं।

'कर्मव्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन। मा कर्मफल हेतु र्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।

तेरा अधिकार कर्म करने मात्र तक सीमित है, फल के लिए कदापि नहीं। तू स्वयं कर्म के फल हेतु क्यों बनता है और कर्म छोड़कर अकर्मण्य होने की भी इच्छा मत कर। अकर्मण्य बनना नहीं है, व्यक्ति बन भी नहीं सकता तो फिर सद्कर्म कर ईश्वर के ऊपर उसके फल छोडऩे के अतिरिक्त कोई अन्य बुद्धिमत्ता नहीं। व्यक्ति के जीवन में अकर्मण्यता जैसी कोई अवस्था नहीं होती है। क्योंकि वह कुछ न कुछ कर्म तो करेगा ही। अगर कर्म नहीं करेगा तो सांस कैसे लेगा, जल कैसे पिएगा, भोजन कैसे करेगा? व्यक्ति जब तक जीवित रहता है तब तक कर्म जारी रहता है। भगवान कहते हैं कि जब कर्म करने ही हैं तो कुछ अच्छे ही करो।

सद्कर्मों से लाभ होगा, धन-ऐश्वर्य, सम्पन्नता और मेरा सान्निध्य भी मिलेगा। बिना सद्कर्म के कोई गति नहीं है। अच्छे काम करोगे तो आगे भी अच्छी गति पाओगे। किन्तु ऐसी बुद्धि आए कैसे, बने कैसे? यह बुद्धि बुद्धि-योग का विषय है, बुद्धि सदैव तर्क करती है। बुद्धि ही वास्तव में मन की नियन्ता है। मोह इसे कलुशित करता है। विभिन्न अर्थवादों से अस्थिर बुद्धि जब स्थिर होगी तब समाहित अवस्था में बुद्धि आ सकेगी, इस समाहित स्थिति में संकल्प-विकल्प रहित शान्त-मन वाला मनुष्य हो सकेगा।

इसीलिए कहते हैं किस्मत का लिखा कोई नहीं मिटा सकता...
हे शुकदेवजी यदुवंशी बड़े ब्राम्हण भक्त थे। उनमें बड़ी उदारता भी थी तो उनका चित्त भगवान श्रीकृष्ण में लगा रहता था, फिर उनसे ब्राम्हणों का अपराध कैसे बन गया? और क्यों ब्राम्हणों ने उन्हें षाप दिया? उनमें फूट कैसे हुई? यह सब आप कृपा करके मुझे बतलाइये। भगवान श्रीकृष्ण ने वह शरीर धारण कर द्वारकाधाम में रहकर क्रीडा करते रहे और उन्होंने अपनी उदार कीर्ति की स्थापना की।अन्त में श्रीहरि ने अपने कुल के संहार-उपसंहार की इच्छा की, क्योंकि अब पृथ्वी का भार उतरने में इतना ही कार्य रह गया था। भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे परम मंगलमय और पुण्य-प्रापक कर्म किए। अब भगवान श्रीकृष्ण महाराज उग्रसेन की राजधानी द्वारकापुरी में वसुदेवजी घर यादवों का संहार करने के लिए कालरूप से ही निवास कर रहे थे। उस समय उनके बिदा कर देने पर विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कष्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास ही पिण्डारक क्षेत्र में जाकर निवास करने लगे थे।

एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते उनके पास जा निकले। उन्होंने बनावटी नम्रता से प्रणाम करके प्रश्न किया। वे जाम्बवतीनन्दन साम्ब को स्त्री के वेश में सजाकर ले गए और कहने लगे, ब्राम्हणों! यह गर्भवती है। यह आपसे एक बात पूछना चाहती है। आप लोगों का ज्ञान अमोघ है, आप सर्वज्ञ हैं। इसे पुत्र की बड़ी लालसा है और अब प्रसव का समय निकट आ गया है। आप लोग बताइये, यह कन्या जनेगी या पुत्र? जब उन कुमारों ने इस प्रकार उन ऋषि-मुनियों को धोखा देना चाहा, तब वे भगवत्प्रेरणा से क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा-मूर्खों! यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी, जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा। मुनियों की यह बात सुनकर वे बालक बहुत ही डर गए।

उन्होंने तुरंत साम्ब का पेट खोलकर देखा तो सचमुच उसमें एक लोहे का मूसल मिला। अब तो वे पछताने लगे। इस प्रकार वे बहुत ही घबरा गए तथा मूसल लेकर अपने निवास स्थान में गए। उस समय उनके चेहरे के रंग फीके पड़ गए थे। उन्होंने भरी सभा में सब यादवों के सामने ले जाकर वह मूसल रख दिया और राजा उग्रसेन से सारी घटना कह सुनाई। राजन जब सब लोगों ने ब्राम्हणों के शाप की बात सुनी और अपनी आंखों से उस मूसल को देखा, तब सब के सब द्वारकावासी विस्मित और भयभीत हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि ब्राम्हणों का शाप कभी झूठा नहीं होता।

यदुराज उग्रसेन ने उस मूसल को चूरा-चूरा करा डाला और उस चूरे तथा लोहे के बचे हुए छोटे टुकड़े को समुद्र में फेंकवा दिया। इसके संबंध में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कोई सलाह न ली। फिर भी भगवान सब जानते थे, कुछ भी उनसे छिपा नहीं था। वे मौन थे। सब कुछ जानकर भी अनजान थे। ऐसा दर्शा रहे थे मानो वे कुछ भी जानते ही नहीं। मूसल को समुद्र में फैंकने के बाद उन्होंने फिर ऐसे जीना शुरू कर दिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं लेकिन नियति ने उनका भाग्य तय कर दिया था। यदुकुमारों को मन में चिंता सता रही थी, कृष्ण से कैसे कहें, ब्राम्हणों ने कैसा कोप दिखाया है। वे सामान्य रहने का प्रयास करने लगे। उस लोहे के टुकड़े को एक मछली निगल गई और चूरा किनारे आ लगा।

वह थोड़े दिनों में एरक के रूप में उग आया। मछली मारने वाले मछुओं ने समुद्र में दूसरी मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकड़ा था, उसको जरा नामक व्याध ने अपने बाण की नोक में लगा लिया। भगवान सबकुछ जानते थे। वे इस शाप को उल्टा भी सकते थे। फिर भी उन्होंने ऐसा करना उचित न समझा। कालरूपधारी प्रभु ने ब्राम्हणों के शाप का अनुमोदन ही किया। यह प्रसंग सिखा रहा है सबुद्धि खो देने का क्या दुष्परिणाम होता है।

प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय
अब भागवत के ग्यारहवें स्कंध के दूसरे अध्याय से एक नया प्रसंग आरम्भ हो रहा है। भागवत के समापन के पृष्ठों पर जीवन की फिलोसाफी पर बहुत अच्छा प्रकाश डाला है।देवर्षि नारद के मन में भगवान श्रीकृष्ण की सन्निधि में रहने की बड़ी लालसा थी। इसलिए वे श्रीकृष्ण के सुरक्षित द्वारका में जहां दक्ष आदि के शाप का कोई भय नहीं था, बिदा कर देने पर भी पुन: आकर प्राय: रहा करते थे।नारदजी को द्वारका में अच्छा लगता था। दक्ष का शाप था उन्हें, एक जगह स्थित नहीं रह सकेंगे। लेकिन द्वारका में वे रुकते थे। भगवान का सान्निध्य संतों को आनन्द ही देता है। जीवन में जब भी मौका लगे भगवान का सान्निध्य कर लेना चाहिए।

एक दिन की बात है नारदमुनि वसुदेवजी के यहां पधारे। यहां वसुदेवजी और नारदजी का एक महत्वपूर्ण वार्तालाप होता है। वसुदेवजी ने नारदजी से कहा-संसार में माता-पिता का आगमन पुत्रों के लिए और भगवान की ओर अग्रसर होने वाले साधु-संतों का पदार्पण प्रपन्च में उलझे हुए दीन-दुखियों के लिए बड़ा ही सुखकर और बड़ा ही मंगलमय होता है।

संत हमारे घर आते रहें यह हमारी गृहस्थी के लिए शुभ होगा। वसुदेव बोले पहले जन्म में मैंने मुक्ति देने वाले भगवान की आराधना तो की थी, परन्तु इसलिए नहीं कि मुझे मुक्ति मिले। मेरी आराधना का उद्देश्य था कि वे मुझे पुत्र रूप में प्राप्त हों। उस समय मैं भगवान की लीला से मुग्ध हो रहा था। अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मैं इस जन्म-मृत्युरूप भयावह संसार से ही पार हो जाऊँ।

नारदजी ने कहा-आपने मुझसे जो प्रश्न किया है, इसके सम्बन्ध में संत पुरुष एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास है ऋ षभ के पुत्र नौ योगीश्वरों और महात्मा विदेह का शुभ संवाद। स्वायम्भुव मनु के एक पुत्र थे प्रियव्रत। प्रियव्रत के आग्नीध्र। आग्नीध्र के नाभि और नाभि के पुत्र हुए ऋषभ। मोक्षधर्म का उपदेश करने के लिए उन्होंने अवतार ग्रहण किया था। उनके सौ पुत्र थे और सब के सब वेदों के पारदर्शी विद्वान थे। उनमें सबसे बड़े थे राजर्षि भरत। उभक्ति-स्वामी श्री रामदासजी के शब्दों में कहा जाए तो जो विभक्त नहीं, वही भक्त है। जिसके हृदय में विभाजन है वह जीव है। ईश्वर तथा जीव का विभाजन, पुरुष तथा प्रकृति का विभाजन, गुणों का विभाजन, अपने-पराए, मेरे-तेरे, अच्छे बुरे का विभाजन। भक्त को सब एक दिखाई देता है। विभिन्न नामों में एक ही प्रभु। विभिन्न सम्प्रदायों-सिद्धांतों में एक ही लक्ष्य। कोई झगड़ा नहीं मित्र, शत्रुभाव सब मन का विकार है। भक्त सभी से एक समान प्रेम करता है। परम प्रेम-रूपा भक्ति इस दिशा में, आन्तरिक यात्रा है।

''प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय अर्थात- ईश्वर और जगत दोनों नहीं समा सकते। ईश्वर के प्रति प्रेम भक्ति है और जगत के प्रति प्रेम मोह होता है। अमृत स्वरूपा च भक्ति अमृत स्वरूप है। जन्म-मरण के खेल से मुक्ति ही अमृतत्व कहा जा सकता है और ''मोह सब व्याधिन के मूला..मोह से सब व्याधियां आती है।

उसके इशारे को समझे तो कुछ भी पाने में देर नहीं लगेगी
वे दिगम्बर ही रहते थे और अधिकारियों को उपदेश किया करते थे। उनके नाम हैं कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्लायन, आविर्होत्र, दु्रमिल, चमस और करभाजन। वे पृथ्वी पर स्व'छंद विचरण करते थे।एक बार की बात है। इस अजनाभ (भारत) वर्ष में विदेहराज महात्मा निमि बड़े-बड़े ऋषियों के द्वारा एक महान यज्ञ करा रहे थे। ये नौ योगीश्वर उनके यज्ञ में जा पहुंचे। राजा निमि ने विनय से झुककर परम प्रेम के साथ उनसे प्रश्न किया।

राजा निमि ने कहा-हम आप लोगों से यह प्रश्न करते हैं कि परम कल्याण का स्वरूप क्या है? और उसका साधन क्या है? इस संसार में आधे क्षण का सत्संग भी मनुष्यों के लिए परम निधि है। आप कृपा करके भागवत धर्मों का उपदेश कीजिए।

देवर्षि नारद ने कहा-वसुदेवजी! जब राजा निमि ने उन भगवतप्रेमी संतों से यह प्रश्न किया। तब नौ योगीश्वरों में से कवि ने कहा-राजन! भक्तजनों के हृदय से कभी दूर न होने वाले अ'युत भगवान के चरणों की नित्य निरन्तर उपासना ही इस संसार में परम कल्याण है।

भगवान ने भोले-भाले अज्ञानी पुरुषों को भी सुगमता से साक्षात् अपनी प्राप्ति के लिए जो उपाय स्वयं श्रीमुख से बतलाए हैं-भागवत धर्म है। राजन इन भागवत धर्मों का अवलम्बन करके मनुष्य कभी विघ्नों से पीडित नहीं होता।ईश्वर से विमुख पुरुष को उनकी माया से अपने स्वरूप की विस्मृति हो जाती है और इस विस्मृति से ही मैं देवता हूं, मैं मनुष्य हूं, इस प्रकार का भ्रम-विपर्यय हो जाता है। इस देह आदि अन्य वस्तु में अभिनिवेश, तन्मयता होने के कारण ही बुढ़ापा, मृत्यु रोग आदि अनेकों भय होते हैं। इसलिए अपने गुरु को ही आराध्यदेव मानकर भक्ति के द्वारा उस ईश्वर का भजन करना चाहिए।

संसार में भगवान के जन्म की और लीला की बहुत सी मंगलमयी कथाएं प्रसिद्ध हैं। उनको सुनते रहना चाहिए। राजन इस प्रकार जो प्रतिक्षण एक-एक वृत्ति के द्वारा भगवान के चरणकमलों का ही भजन करता है, उसे भगवान के प्रति प्रेममयी भक्ति, संसार के प्रति वैराग्य। ये सब अवश्य ही प्राप्त होते हैं। तब वह स्वयं शान्ति का अनुभव करने लगता है।

यहां पहला प्रश्न और पहला उत्तर ब्रम्ह की अनुभूति के संदर्भ में है। इस पर गहरा चिंतन करना होगा।

यदि साधक ने इन्द्रिय यज्ञ की पूर्णाहुति ब्रम्ह की प्राप्ति की कामना से की, तो ब्रम्ह का मिलना तो दूर न तो उसका आभास होगा, न उनकी समीपता का अनुभव होगा। ऐसे अनेक भाव मन में साधक, पाठक या जिज्ञासु के उठ सकते हैं। जिस ब्रम्ह की धारण को ऋषि, मुनियों, देवदूतों (पैगम्बरों), योगियों, भक्तों आदि ने पुश्ट किया, क्या उन्हें ब्रम्हानुभूति हुई? इन प्रश्नों का उत्तर अन्तर्यामी के अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। पहली बात तो यह कि इस प्रश्न की योग्यता भी हासिल हुई है या यूं ही मनोविलास के लिए जिज्ञासा उत्पन्न कर ली गई। यदि योग्यता प्राप्त कर ली हो तो अन्तर्यामी से बढ़कर कोई गुरु नहीं है जो समाधान कर सके।

यहां हम परमात्मा की अनुभूति की चर्चा कर रहे हैं। परमात्मा को केवल महसूस किया जा सकता है, उसे देखा या छुआ जाना आम आदमी के वश में नहीं है। परमात्मा किसी भी रूप में आकर आपको संकेत कर सकता है, तैयारी आपकी होनी चाहिए उन संकेतों को समझने की। हम उसके संकेत ही नहीं समझ पाते हैं, बस इसीलिए अपनी साधना और परमात्मा दोनों को कौसते रहते हैं। परमात्मा के इशारे को समझने लगेंगे तो फिर उसे पाने में देर नहीं लगेगी।

भागवत हमें सीखाती है कि काम करना है जरूरी क्योंकि...

भगवान श्रीकृष्ण ने स्थित प्रज्ञ की परिभाषा करते हुए स्पष्ट कहा कि मन में आने वाली सब कामनाओं का त्याग करके अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहने वाली स्थिति प्राप्त स्थित प्रज्ञ कहा जाता है।किसी भी कर्म में बिना स्थित प्रज्ञता के कुशलता नहीं आ सकती और न ही उस कर्म का सकारात्मक और नकारात्मक ही समझ में आ सकता। हम मानते हैं कि भगवत अर्पित क्रियाकलाप शुद्ध बुद्धि के प्रमाण हैं। कोई यदि विचारे और उस पथ पर चल दे कि कर्म किया न जावे तो सुफल या कुफल कहां और कैसे मिलेगी, जो जगत में रहता है फिर वह संन्यासी ही क्यों न हो, कौन सा कर्म करना हैऔर कौन सा त्यागना है उसकी प्रज्ञा निश्चित करेगी। निष्कर्मता हो ही नहीं सकती। मन, वाणी और शरीर से प्रकृति से उत्पन्न हुए गुण बलात् प्रत्येक मनुष्य से कर्म कराते हैं। इन्द्रियों से कर्म होते हैं। मन से चिन्तन होता है। इन्द्रियों को रोक लें और मन से संबंधित कर्म का चिन्तन किया जाए इसे मूर्खतापूर्ण कार्य भगवान श्रीकृष्ण ने मिथ्याचार यानी अखंड कहा।

वाणी से प्रशंसा की जाए और मन से गाली दी जाए। सामान्य जगत में यह होता है, बड़ा भारी मिथ्याचार है, इसका कुफल ही मिलता है। कुफल मिलने पर हम नियति, भाग्य को कोसते हैं। वाणी से प्रशंसा भी न करें लेकिन मन में हानि पहुंचाए तो भी सुफल प्राप्त नहीं होगा। मनसा, बाचा व कर्मणा शुद्धता आए बिना कर्म सुकर्म हो नहीं सकते। सुकर्म के सुफल और कुकर्म और कुफल यह शाश्वत नियम कहा जा सकता है।

मनुष्य की उत्पत्ति प्रकृति व पुरुष के संयोग से हुई स्वीकार करते हैं-प्रकृति तीन प्रकार की वर्णित है-सतोगुणि प्रकृति, रजोगुणी प्रकृति और तमोगुणी प्रकृति और 'प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वष:। अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।सब प्रकार के कर्म प्रकृति के सात्विक, राजसिक एवं तामसिक तीनों गुणों के कारण होते हैं। जिसे यह भान रहता है कि कार्य प्रकृति अनुसार हो रहे हैं तो वह कर्मानुष्ठान में आसक्ति छोड़कर कर्म करता है।

तो इसलिए रावण और कुंभकर्ण तब भी थे और आज भी हैं
कर्म भी रजोगुणी हो जाता है। इन्द्रियां, मन, बुद्धि-काम, क्रोध के निवास हैं। इन्हें गीतकार ने नित्य का महान शत्रु कहा है।तमोगुणी कर्म तो शुद्ध रूप से हिंसक, पापपूर्ण, सामाजिक व शास्त्रीय नियमों के विरुद्ध होते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, प्रसाद प्रभुति प्रगट या अप्रगट रूप से इन्द्रियों, मन व बुद्धि तो विकृत किए ही रहते हैं। कंस, दुर्योधन, कृष्ण युग के तामसिक व्यक्ति थे। राम युग में रावण, कुंभकर्ण व राक्षस समुदाय इस श्रेणी के पुरुष थे। आधुनिक युग में तामसिक मनुष्यों की कमी नहीं है।
मिश्रित गुणों वाले सामान्यत: दिखावे के साथ ही, ईश्वरानुरागी होते हैं। इस आशा पर कर्म करते रहते हैं कि कभी तो ईश्वरीय शक्ति की कृपा होगी और सत्वगुण का अंश बढ़ते हुए पूर्ण सात्विक जीवन हो जाएगा। प्रत्येक कर्म सात्विक ही होगा क्योंकि राजसिक का भी पुनर्जन्म निश्चित है। फिर चाहे वह श्रेष्ठ परिवार में ही क्यों न हो।

इन कार्य पद्धति में इन्द्रियों का बड़ा योगदान है। इनकी गति बड़ी सूक्ष्म व तार्किक है। आंखें देखती हैं - कान सुनते हैं, मुख बोलता है व खाता है किन्तु क्या देखती है, क्या सुना जाता है, क्या बोला और खाया जाता है- मन पीछे लगा रहता है। क्योंकि वह इन्द्रियों से सूक्ष्म है, बुद्धि जो मन से भी सूक्ष्म है, बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा है इसलिए आत्मा के निर्देश पर बुद्धि चलाई जावे तात्पर्य यह कि इन्द्रियों को वश में रखा जावे तो काम, क्रोध आदि तामसिक वृत्तियों, शत्रुओं को जीतना सहज हो जाएगा।

सामान्यत: वृत्तियों के पीछे मन भागता है आंखों के माध्यम से सौन्दर्य को कुदृश्टि से देखता है, कानों से निन्दा सुनता है, वाणी से निन्दा करता है, झूठ बोलता है ये सब तामस क्रियाकलाप हैं। सब देह के द्वारा सम्पादित होते हैं। मनुष्य अपना कर्म हरि भजन को बिसार देता है। जिसकी कृपा से सद्कर्म हुए और बड़े भाग से नर-तन पाया। यह भगवान का परम उपकार है। प्रति-उपकार मनुष्य भजन करके ही कर सकता है, किन्तु तामस कर्म करके तामस देह जब बन जाता है, तब सहज ही रावण के द्वारा व्यक्त ये शब्द याद आते हैं ''होइहि भजनु न तामस शक्ति आराधना के लिए तामसी वृत्तियों से बचा जावे। आधुनिक समय में विष्व के लगभग अधिकांश लोगों की तामसिक वृत्तियां, तामसिक आचरण, तामसिक

खान-पान आदि अभिवृद्धि पर हैं, अशान्त वातावरण बना हुआ है लगता है मनुष्य, मनुष्य नहीं रहा, आसुरी वृत्तियों से सम्पन्न अहंकारी असुरों का समुदाय है। मिथ्याचारियों का जमघट हो गया लगता है। ज्ञान व बुद्धि लुप्तप्राय लगते हैं। भौतिक ज्ञान-ज्ञान नहीं, ईष्वरीय षक्ति का अनुभव ज्ञान होता है। बुद्धि तार्किक लगती है किन्तु स्वार्थमय चिन्तन करती है। इस अन्ध कुंए से निकलने का मार्ग क्रम से सात्विकता की ओर भगवत् स्मरण करते हुए बढ़ते रहना है। प्रथम कर्म कहें या कर्तव्य, ईश्वर आराधना या साधन है। इसी से 'तमसो मा ज्योर्तिगमय अंधकार में प्रकाश के दर्शन होंगे और आगे पथ सुगम होगा।नौ योगेश्वर संवाद-भगवान वसुदेव के दर्शनों और अभिलाषा से नारदजी अधिकांशत: द्वारकापुरी में ही में निवास किया करते थे। एक बार नारदजी भगवान के दर्शनों के लिए उनके भवन में पधारे।अब भागवत के ग्यारहवें स्कंध के दूसरे अध्याय से एक नया प्रसंग आरम्भ हो रहा है।

इसीलिए जरूरी है मन की शांति
माया को सहन कर पाना, उससे बच पाना और उसके भीतर रहकर भी दुनिया और परमात्मा के बीच समन्वय न बनाना बहुत कठिन है। परमात्मा को पकड़ेंगे तो माया छूटती दिखेगी और माया के पीछे दौड़ेंगे तो परमात्मा पीछे रह जाएगा। कुशल लोग वे होते हैं जो दोनों में समन्वय बनाकर चलते हैं। वे ही लोग असली मुमुक्षु होते हैं।

माया हमारी जिम्मेदारी, हमारी इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं, हमारी प्यास और भौतिकवादिता के प्रति हमारा आकर्षण है। यही माया है। इस माया के इर्द-गिर्द ही हमारी सारी दुनिया घूम रही है। इस माया के मोह में ही अधिकांश काम रुक जाता है। हमारी भक्ति थम जाती है, आध्यात्मिक पहुंच घट जाती है। माया का यही जाल तमाम उम्र हमारे आसपास बना रहता है। इसी माया से ही दुनिया चल रही है। माया भी जरूरी है और परमात्मा भी, अब इन दोनों में तालमेल कैसे बैठाएं। यह तालमेल ही हमें मोक्ष तक ले जाएगा।

बुद्धि की समत्व स्थिति चित्त को शुद्ध करती है। चित्त को चिंतन का केन्द्र मानकर चल रहे हैं क्योंकि चित्त सदा अपना ही चिंतन करता रहता है। इसलिए हम जो सदा अपना ही चिंतन करें वही चित्त है। चित्त को परिभाषित कर सकते हैं। चिंतन करना व्यक्ति का स्वभाव होता है। जागते व सोते व्यक्ति चिंतन करता है। कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है-''एकाकी रहने पर भी जन-मन मौन नहीं रहता। अपनी-अपनी कहता है, अपनी-अपनी सुनता है वह। चिंतन में यह आवश्यक है कि चिंतन स्वस्थ हो, सार्थक हो, सकारात्मक हो क्योंकि चिंतन से वृत्तियों का निर्माण होता है। दसों इन्द्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार की पृष्ठभूमि चित्त होता है। जल पर लहरों की भांति इन सबके व्यवहारों की प्रतिक्रिया चित्त पर होती रहती है। ये सब सूक्ष्म रूप से चित्त पर अंकित होते रहते हैं। उनका अंकन जब स्थाई भाव बन जाता है तब कार्य दैहिक और मानसिक दोनों चित्त द्वारा संस्कारों की परिणति हो जाते हैं।

चित्त वृत्ति का निरोध योग के रूप में महर्षि पातंजल ने वर्णन किया है चित्त वृत्ति निरोध: योग योग भगवत् मिलन या आत्मदर्शन के योग्य योगीजन संशयरहित हो आत्मस्थित हो पाते हैं। स्पष्ट है कि चित्त वृत्ति को रोकने से ही आत्मदर्शन होते हैं अन्यथा नहीं। जल में लहरों के शांत होने पर ही अपना मुख दर्पण मानिन्द देखा जा सकता है। इसलिए चित्तवृत्तियों को शांत करना आवश्यक है। मन बुद्धि के पश्चात चित्त का या चेतन शक्ति की क्रिया आरम्भ होती है। निर्मल मन, षुद्ध सम बुद्धि वृत्तियों को शांत बनाती है। जिनके मन में मल होता है वे सामान्य बेचैन पाए जाते हैं उनकी बुद्धि अस्थिर होती है, एक विषय या स्थान पर टिकती नहीं उनके द्वारा संपादित कार्य भी आधे-अधूरे रहते हैं।

ऐसे आते हैं भगवान आपसे मिलने बस पहचानने की देर है
यहां हम परमात्मा की अनुभूति की चर्चा कर रहे हैं। परमात्मा को केवल महसूस किया जा सकता है, उसे देखा या छुआ जाना आम आदमी के व में नहीं है। परमात्मा किसी भी रूप में आकर आपको संकेत कर सकता है, तैयारी आपकी होनी चाहिए उन संकेतों को समझने की। हम उसके संकेत ही नहीं समझ पाते हैं, बस इसीलिए अपनी साधना और परमात्मा दोनों को कौसते रहते हैं। परमात्मा के इशारे को समझने लगेंगे तो फिर उसे पाने में देर नहीं लगेगी। एक छोटी सी कथा है, इससे हम आसानी से समझ जाएंगे कि कैसे भगवान हमारी साधना से प्रसन्न होकर दर्शन देने आता है लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते।

एक ब्राम्हण था, कृष्ण के मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था। उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता। भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता। एक दिन घर में लड्डू बने। ब्राम्हण ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। पत्नी इससे नाराज हो गई, कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं। बस ब्राम्हण ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। मंदिर में जाकर धूनि लगा ली। भगवान के सामने लड्डू रखकर विनती करने लगा। एक घड़ी बीती। आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न ब्राम्हण हटा। आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई। सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है।

मक्खियां भिनभिनाने लगी ब्राम्हण उन्हें उड़ाता रहा। मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं। ब्राम्हण ने उन्हें भी हटाया, फिर मंदिर के बाहर खड़े आवारा कुत्ते भी ललचाकर आने लगे। ब्राम्हण ने उनको भी खदेड़ा। लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो ब्राम्हण ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। दिन ढल गया, शाम हो गई। न भगवान आए, न ब्राम्हण उठा। शाम से रात हो गई। लोगों ने सोचा ब्राम्हण देवता पागल हो गए हैं, भगवान तो आने से रहे। धीरे-धीरे सब घर चले गए। ब्राम्हण को भी गुस्सा आ गया।लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। भिखारी, कुत्ते, चीटी, मक्खी तो दिनभर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े। उदास ब्राम्हण भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। इतने सालों की सेवा बेकार चली गई। कोई फल नहीं मिला। ब्राम्हण पत्नी के ताने सुनकर सो गया।

रात को सपने में भगवान आए। बोले-तेरे लड्डू खाए थे मैंने। बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता। कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए। मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी। पर तुने हाथ नहीं धरने दिया। दिनभर इंतजार करना पड़ा। आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट््टी लग गई थी। अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना। भगवान चले गए। ब्राम्हण की नींद खुल गई। उसे एहसास हो गया। भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया।

बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।

सारे मंत्र ऊँ से ही क्यों शुरू होते हैं?
बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते हैं।महाभारत के अश्वमेधिक पर्व में उल्लेख है कि ''हृदयस्थित परमात्मा ही गुर है दूसरा नहीं, उसी के अनुशासन में सब प्राणी कार्यरत हैं, एक ही बन्धु है, एक ही श्रोता है और एक ही देव है।'एक बार देवता, ऋषि, नाग और असुरों ने ब्रम्हाजी से पूछा-भगवन कल्याण का उपाय क्या है? ब्रम्हाजी ने एकाक्षर ऊँ का उच्चरण किया। उनका प्रणवनाद सुनकर सब अपनी अपनी-दिशाओं में चल दिए और विचार किया। सबसे पहले सर्पों के मन में दूसरों का डसने का भाव पैदा हुआ, असुरों में दम्भ का आविर्भाव हुआ, देवताओं ने दान को और महर्षियों ने दम को अपनाने का निश्चय किया।

सर्प उन प्राणियों के प्रतीक हैं जिनसे हानि की सम्भावना रहती ही है। असुर चाहे जो हों अभिमानी मनुष्य के प्रतीक हैं। देवता अर्थात् सात्विक वृत्ति के प्राणी, देते रहने में प्रवृत्त रहते हैं और महर्षि अर्थात् साधक अपनी इन्द्रियों के दमन में सुख का अनुभव करते हैं।

साधन, भजन, पूजन में सब मंत्र ऊँ से आरम्भ होते हैं गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-''तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञ दान तप: क्रिया:। प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रम्हवादिना:।। 24/17।

ब्रम्हवादी जन यज्ञ, दान और तप की क्रियाओं का विधानोक्त रीति से सदा ऊँ का उच्चारण कर आरम्भ करते हैं।ऊँ ब्रम्ह का वाचक है तथा पूर्णता का प्रतीक है। परमात्मा चैतन्य स्वरूप है तथा जीवात्मा चैतन्य का अंश है 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी....तुलसीदास ने रामायण में स्पष्ट किया है। इसे प्रथम तो जाने कैसे? कठोपनिषद् में-'इन्द्रियेभ्य: पराह्यर्था अर्थेभ्यश्व मन:। मनस्तु परा बुद्धि बुद्धित्मा महान परा:।।10 एश सर्वेषु भूतेषुगुढोऽउत्मा न प्रकाशते। दृश्य ते तव्ग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।।12।।

इन्द्रियों से परे (सूक्ष्म, अधिक बलवान) उनके विषय शब्दादि होते हैं और विषयों से परे मन होता है तथा मन से भी परे बुद्धि होती है, जो बुद्धि से प्रबल एवं सूक्ष्म है वह जीवात्मा होता है। जीवात्मा मूलरूप में (शुद्ध रूप में) परमात्मा ही है।

यह आत्मा (परमात्मा) सब प्राणियों में स्थित होता है, किन्तु गूढ़ (छिपा हुआ) रहता है और प्रत्यक्ष नहीं होता। सूक्ष्म दृष्टि वाले पुरुष सूक्ष्म बुद्धि से उसका अनुभव करते हैं।

यहां एक पौराणिक दृष्टान्त हमें मिलता है। जहां सूक्ष्म दृष्टि से अन्तर में ब्रम्ह अनुभव किया उसे प्रत्यक्ष नेत्र खोलने पर सामने पाया यह दृष्टान्त सुतीक्ष्णजी का है जिन्होंने हृदय में अनुभव किया। वे बेचैन हो गए और नेत्र खोलकर देखा तो ब्रम्ह राम उनके सम्मुख थे। तात्पर्य यह कि जब साधक ब्रम्ह को जगत् मय देखता है और उन्हें अन्तर में देखता है तब एकाकार हो जाता है-साधना की स्थिति के विषय में चिन्तन के लिए गीता में स्पष्ट निदेश है-''यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति, तस्याहं न प्रणश्यामि सच मे न प्रणश्यति।।30/6जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है वह मेरी दृष्टि से ओझल नहीं होता और मैं उसकी दृष्टि से ओझल नहीं होता।

ये वो चीजें है जो इंसान को अंधा बना देती है...
काम केवल एक स्त्री पुरुष संबंधी ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण कामनाओं को प्रेरित करने वाला सक्रिय तत्व है जो मनोविकार का कारण है। इसी प्रकार क्रोध, ईष्र्या, द्वेष का कारण बनकर हिंसक बनाता है, इतना ही नहीं यह न मिटने वाले नाना प्रकार के दम्भ को जन्म देता है। समग्र रूप में ये सब मन को दायें-बायें घुमाते रहते हैं। घूमता हुआ मन अपनी चंचल प्रकृति के कारण शुद्ध बुद्धि को भी भ्रमित रखता हुआ उसे नष्ट करने का सारा उपक्रम जुटा लेता है। साधक मनुष्य विनष्यति की स्थिति में पहुंच जाता है और वह स्थित प्रज्ञ नहीं हो पाता। स्थित प्रज्ञ बने बिना काम बनता नहीं। सबकुछ विस्मृत हो जाता है। पूर्ण गीता का उपदेश सुनने के बाद और महाभारत का पूरा कर्म श्रीकृष्ण कहे अनुसार करने के पश्चात अर्जुन उपदेश भूल गया। वैसे तो वह भूला ही हुआ था, इसीलिए श्रीकृष्ण को कहना पड़ा था।''बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।।हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म बीत चुके हैं। सबको मैं जानता हूं, हे परन्त तू नहीं जानता। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि वृत्तियों से जन्म जन्मान्तर से चला आ रहा साथ छूटता नहीं। ये सब वृत्तियां अन्धा बनाए रखती हैं।

भूतकाल भुलाने में व्यतीत होता जाता है। मोह धृतराष्ट्र की भांति अंधा बनाए रखता है जो बुद्धि को न्यायोचित कार्य नहीं करने देता। महाभारत के पात्र भी किसी न किसी वृत्ति के प्रतीक के रूप में लिए जा सकते हैं किन्तु यह एक अलग विषय है। जन्म-जन्म की कौन जाने? साधारणत: एक ही वर्तमान जन्म की अनेक विस्मृतियां हमें घेरे रहती हैं। वैसे देखा जाए तो विस्मृति वरदान है, किन्तु दैवी शक्ति-परमात्मा की विस्मृति अभिशाप है, यह हमें अपने गन्तव्य से विमुख कर देती है और आवागमन का चक्र अनन्तकाल तक चलता रहता है।

मन के जीते जीत है मन के हारे हार

इसीलिए विचारणीय धारणा है कि ब्रम्ह या परमात्मा को समझा जावे। वह अनन्त है। उसके द्वारा अत्यन्त विस्तृत अनन्त आकानिर्मित है-चिदाकाश, चित्ताकाश और भूताकाश। जो सर्वत्र परिपूर्ण जगत की उत्पत्ति-विनाश का ज्ञाता, साक्षी और समस्त चराचर भूत प्राणियों में व्यापक है, वही प्रथम चिदाकाश है। जो इन्द्रियां और महाभूतों से श्रेष्ठ है, काल की गणना करना जिसका स्वभाव है और जिसने अपने संकल्प के द्वारा इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपन्च का विस्तार किया है, समस्त प्राणियों का हितकारी यह संकल्पात्मक मन ही चित्ताकाश कहा जाता है। दसों दिशाओं के विस्तार से जो भी सीमित नहीं होता और वायु, मेघ आदि का आश्रय है, वह असीम भूतात्मक आकाश ही भूताकाश कहलाता है। चित्ताकाश और भूताकाश दोनों चिदाकाश से ही उत्पन्न हुए हैं अत: उसी के रूपान्तर मात्र हैं।

विभिन्न तत्वों के विचार करने का कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि मन के विलय से संसार निवृत्तिरूप मोक्ष मिलता है। कहा गया है-मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। मन जीता कि बुद्धि स्थिर हुई। इससे बम्हज्ञान के निकट पहुंचा जा सकता है।अब हम क्रम से चलें। पहले तो सद्कर्मों से, सद्विचारों से, महापुरुषों के आशीर्वाद से, प्रायश्चित से, पापों को नष्ट किया जाए। रजोगुण से उत्पन्न महापापी क्रोध, काम आदि है इन पर विजय पाई जाए।

तत्पश्चात शंकाओं को निवृत्त किया जाए। शंकाओं का निवारण सद्गुरु, महात्मा या जिन्होंने ब्रम्हज्ञान प्राप्त कर लिया हो के द्वारा ही हो सकता है। वे ज्ञान का अविर्भाव करें, शक्तिपात करें, कृपा करें और साधक उनके बताए पक्ष पर चले तो वही उत्तर मिलेंगे जो वसुदेवजी के नारदजी से प्राप्त हो रहे थे।

राजा निमि ने पूछा-योगीश्वर! अब आप कृपा करके भगवद्क्त का लक्षण वर्णन कीजिए। किन लक्षणों के कारण भगवान का प्यारा होता है। नौ योगीश्वररों में से दूसरे हरिजी बोले-राजन आत्मस्वरूप भगवान समस्त प्राणियों में आत्मारूप से स्थित हैं।

इस प्रकार का जिसका अनुभव है, ऐसी जिसकी सिद्ध दृष्टि है, उसे भगवान का परमप्रेमी उत्तम भागवत समझना चाहिए। जो भगवान से प्रेम, उनके भक्तों से मित्रता, दुखी और अज्ञानियों पर कृपा तथा भगवान से द्वेष करने वालों की उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटि का भक्त है। जो भगवान के मूर्ति आदि की

पूजा तो श्रद्धा से करता है, परन्तु भगवान के भक्तों या दूसरे लोगों की सेवा नहीं करता, वह साधारण श्रेणी का भक्त है। जो कान, आंख आदि इन्द्रियों के द्वारा विषयों का ग्रहण तो करता है, परन्तु अपनी इच्छा के प्रतिकूल विषयों से द्वेश नहीं करता और अनुकूल विषयों के मिलने पर प्रसन्न नहीं होता। उसकी यह सोच बनी रहती है कि यह सब हमारे भगवान की माया है। वह पुरुष उत्तम भक्त है। संसार के कर्म हैं-जन्म, मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा। राजन! बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि भी अपने अन्त:करण को भगवन्मय बनाते हुए जिन्हें ढूंढते रहते हैं-भगवान के ऐसे चरणकमलों से आधे क्षण, आधे पल के लिए भी जो नहीं हटता, निरन्तर उन चरणों की सन्निधि और सेवा में ही संलग्न रहता है।

बस एक बार ये अनुभव करके तो देखिए...
यहां तक कि कोई स्वयं उसे त्रिभुवन की लक्ष्मी दे तो भी वह भगवत्स्मृति नहीं तोड़ता, उस लक्ष्मी की ओर ध्यान ही नहीं देता, वही पुरुष वास्तव में भगवद्क्त वैष्णवों में अंग्रगण्य है, सबसे श्रेष्ठ है।

इन्हीं प्रश्नोत्तरों में दूसरा अध्याय समाप्त होकर तीसरा अध्याय आरम्भ होता है। तीसरा प्रश्न राजा निमि ने तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्ष से पूछा जो माया के संबंध में था। परन्तु उसके पूर्व माया के साथ चित्र को थोड़ा समझ लें। माया क्या है? माया भगवान का ही एक रूप है, एक अंश है। माया एक आवरण है। यह माया ही है जो हमारे आसपास है। जो जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे बीच में ही रहती है। माया का अर्थ है यह नहीं है। जो होकर भी हमारे बीच नहीं है। वह सब माया है। जो हमारे पास जीवनभर रहती है लेकिन दिखाई नहीं देती। माया ऐसी ही चीज है। माया जो साथ न जाए वह होती है।

इसलिए धन, दौलत, रिश्तेदार और इस दुनिया को माया कहा गया है। यह सब यहीं छूट जाएगा। साथ में केवल उन कर्मों का फल जाता है जो हमने किए हैं। लेकिन वे दिखाई नहीं देते। उन्हें सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। इसी अनुभव में परमात्मा का वास है। बस आप अनुभव करके देखिए। आपको माया और भगवान में अन्तर नजर आ जाएगा।

सुख के बदले हमेशा ही दुख मिले तो समझो...
राजा निमि ने पूछा-भगवन विष्णु भगवान की माया बड़े-बड़े मायावियों को भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता। मैं उस माया का स्वरूप जानना चाहता हूं। संसार के तरह-तरह के तापों ने मुझे बहुत दिनों से तपा रखा है। आप लोग जो भगवत् कथा रूप अमृत का पान करा रहे हैं, वह उन तापों को मिटाने की एकमात्र औष है।

तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्षजी ने कहा-राजन! भगवान की माया का स्वरूप शब्दों में नहीं बताया जा सकता। इसलिए उसके कार्यों द्वारा ही उसका निरूपण होता है। पंचमहाभूतों के द्वारा बने हुए प्राणि-शरीर में उन्होंने अन्तर्यामी रूप से प्रवेश किया और अपने को ही पहले एक मन के रूप में और इसके बाद पांच ज्ञानेन्द्रिय तथा पांच कर्मेन्द्रिय, इन दस रूपों में विभक्त कर दिया तथा उन्हीं के द्वारा विषयों का भोग कराने लगे। वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामी के द्वारा प्रकाशित इन्द्रियों के द्वारा विषयों का भोग करता है और इस पंचभूतों के द्वारा निर्मित शरीर को आत्मा अपना स्वरूप मानकर उसी में आसक्त हो जाता है।

यह भगवान की माया है। अब वह कमेन्द्रियों से सकाम कर्म करता है और उसके अनुसार शुभ कर्म का फल सुख और अषुभ कर्म का दु:ख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसार में भटकने लगता है। यह भगवान की माया है। यह सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे संहार करने वाली त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? राजा निमि ने पूछा-इस भगवान् की माया को पार करना उन लोगों के लिए तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं कर पाए हैं। अब आप कृपा करके यह बताइये कि जो लोग षरीर आदि में आत्मबुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ मोटी है, वे भी अनायास ही इसे कैसे पार कर सकते हैं?

अब चौथे योगीश्वर प्रबुद्धजी बोले-राजन स्त्री-पुरुष संबंध आदि बन्धनों में बंधे हुए संसारी मनुष्य सुख की प्राप्ति और दु:ख की निवृत्ति के लिए बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। जो पुरुष माया के पार जाना चाहता है, उसको विचार करना चाहिए कि उनके कर्मों का फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है। वे सुख के बदले दु:ख पाते हैं और दु:ख निवृत्ति के स्थान पर दिनोंदिन दु:ख बढ़ता ही जाता है।

जब ये दुनिया आपको सपना लगने लगे तो समझो...
इसलिए जो परम कल्याण का जिज्ञासु हो, उसे गुरुदेव को शरण लेनी चाहिए। गुरुदेव ऐसे हों, जो शब्दब्रम्ह-वेदों के पारदर्शी विद्वान हों, जिससे वे ठीक-ठीक समझा सकें और साथ ही परब्रम्ह में परिनिष्ठित तत्वज्ञानी भी हों, ताकि अपने अनुभव के द्वारा प्राप्त हुई रहस्य की बातों को बता सकें। उनका चित्त शान्त हो, व्यवहार के प्रपंच में विषेश प्रवृत्त न हो।राजन भगवन् की लीलाएं अद्भुत हैं। उनके जन्म, कर्म और गुण दिव्य हैं। उन्हीं का श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना तथा शरीर से जितनी भी चेष्टाएं हों, सब भगवान के लिए करना सीखे।

यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचार का पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपने को प्रिय लगता हो, सब का सब भगवान के चरणों में निवेदन करना, उन्हें सौंप देना सीखें। राजन जो इस प्रकार भागवत धर्मों की शिक्षा ग्रहण करता है, उसे उनके द्वारा प्रेमभक्ति की प्राप्ति हो जाती है और वह भगवान् नारायण के परायण होकर उस माया को अनायास ही पार कर जाता है, जिसके पंजे से निकलना बहुत ही कठिन है। माया से पार जाने के लिए साधन करना पड़ेगा यही सार है पूर्व में दिए गए उपदेशों का। चलिए थोड़ा साधना को समझलें।जाग्रत अवस्था में मन को एकाग्र करके बर्हिजगत से हटाकर, ध्यान द्वारा संकल्प विकल्पों को शान्त करता हुआ और ध्यानावस्थित चित्त को निद्रा से बचाता हुआ तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठा ले जा तो समाधि की अवस्था आवेगी। उसका बार-बार होने वाला सहज अनुभव ही तुरीयावस्था है-ब्रम्ही सहजावस्था है तब यह जगत स्वप्नवत प्रतीत होने लगेगा।

इस साधन से प्रति नित्य दृढ़ निष्ठा और विश्वास के साथ साधक/भक्त या योगी को सतत तेल धारावत् अपने अभ्यास को जारी रखना एक सत्य प्रतीत होता है। जब जगत स्वप्नवत् लगने लगे तब ही वैराग्यवान पुरुष जो सत्य है अनुभव में आने लगता है। यह परम पुरु ष ही ईश्वर है। उसका सहज सतत चिन्तन ही ब्राम्ही सहजावस्था है। फिर अन्य चिन्तन में आवे ही नहीं, यह अभ्यास है। जगत के प्रति उदासीन भाव अर्थात सब कर्म करते हुए अनासक्त रहते हुए कर्म से प्राप्त हुए फल की कामना न रखना ही वैराग्य वृत्ति है, जगत में जगत के विभिन्न कार्य करते हुए उनमें रागानुभूति न होना ही वैराग्य है, वह सबकुछ करते हुए चिन्तन मनन में मस्त रहे कि वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा है कोई शक्ति, कोई ईश्वर, कोई इष्ट, कोई गुरु करा रहा है जो सबमें विद्यमान है। यह गीता के इस श्लोक से स्पष्ट होता है।

''ईश्वर सर्वभूतानां ह्नद्दशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मामया।।18।।

ईश्वर सब प्राणियों के हृदय देश में स्थित रहकर अपनी माया से सबको ऐसा भ्रम (करा) रहा है, जैसे मंत्र पर बैठकर घुमाया जाता है। दुनिया चक्र की भांति गोल है, घूम रही है अपनी धुरी पर, घुमाने वाली शक्ति ईश्वरीय शक्ति है, प्रत्येक जड़-चेतन में वह विद्यमान है, प्रत्येक में न्यूनाधिक रूप में उसकी अपनी सामथ्र्य के हिसाब से वह कार्यरत है, यही जीवनक्रम है जो घूम रहा है। यहां भूल ही उसे अहंकार के दलदल में धकेल देती है मन भटक जाता है। मन की एकाग्रता छिन्न-भिन्न हो जाती है और 'पुर्नरपि जननम् पुर्नरपि मरणम सतत अबाधगति से चलता रहता है यह गति तब ही टूटती है जब अनुभवजन्य किसी महापुरुष/सद्गुरु या ईश्वर की महती कृपा हो। भगवान श्रीकृष्ण अनुभवों के अक्षुण्ण भंडार थे।

इंसान को दुख क्यों भोगना पड़ता है?
बन्दीघर में जन्म! क्या जन्म किसी महल में नहीं हो सकता था! नन्द बाबा के घर में यशोदा की गोद में खेलकर अपनी तथा बाल अवस्था एक साधारण गोप बालक की भांति बिताई। गायें चराना वन विहार करना, गोपियों का नवनीत चुराना सब देखा जाए तो कथाकार द्वारा कहानी के रूप में अत्यन्त गूढ़ रूपक प्रस्तुत किया गया है। गायें चराना-इन्द्रियों को उनके शुुद्ध सात्विक भोजन देना अर्थात् नैत्र प्रभु के सौन्दर्य को देखें, कान प्रेम भरे सत्य वचन सुने, मुख से शुद्ध सात्विक नवनीत (मक्खन) ग्रहण किया जाए यानी सार-सार ही लिया जाए और व्यक्त किया जाए। गोपियां अर्थात् इन्द्रियों की वृत्तियों का प्रेम मक्खन चुराना, प्रेम वृत्तियों का नवनीत होता है। जहां प्रेम होता है वहां घृणा नहीं होती, हिंसा नहीं होती। भगवान कृष्ण ने प्रेमी की अद्भुत लीला की और उदाहरण आदि से अन्त तक प्रस्तुत किया कि प्रेम करना कोई भगवान श्रीकृष्ण से सीखें। प्रेम भी ऐसा कि उसमें तनिक भी असक्ति नहीं। ब्रज मण्डल छोड़ा कि वापस पलटकर नहीं देखा कि कहां रहे वे गोपगण व गोपियां वे भले कही-कहती रहीं निशि दिन बरसत नैन हमारे, जबते श्याम सिधारे...रासलीला भी रसिक को उलझा नहीं सकीं।

अवंतिका में ऋ षि सांदीपनि के यहां शिक्षा ग्रहण की, सखा सुदामाजी बने। सुदामाजी को उनके कर्मफल भोगने के लिए छोड़ दिया कि मित्र से थोड़ा भी छल दरिद्रता का दु:ख भोगने के लिए पर्याप्त होता है।नहीं कोई दु:ख दरिद्र समाना बाद में सुदामाजी पर कृपा की, लेकिन कर्मफल भुगत लेने के बाद। दया करके कर्मफल काट सकते थे किन्तु नहीं, कर्मफल भोग इसी में भविष्य ठीक रहता है अन्यथा सुफल और कुफल में परिणित हो सकता है, फिर कहीं अगले जन्म में भोगना पड़ता। गुरु सांदीपनि से वेद, उपनिषद, स्मृति, शास्त्र, तर्क विद्या, राजनीति, संधि विग्रह, यान, शासन, आश्रय-चौसठ कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया- सर्वज्ञाता ने अज्ञाता बन सीख उदाहरण प्रस्तुत किया कि ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने अहं को प्रगट न होने दिया जाए। मथुरा का त्याग एक उच्च कोटि की मन:स्थिति को प्रगट करती है, जो मधुर है व मथुरा है। संघर्ष अन्तहीन होता यदि से भिड़ते रहते-संघर्ष में सृजन नहीं किया जा सकता।

संघर्ष के दायरे: रासलीला एक अद्भुत आत्म प्रकाश है। इसमें सम्पूर्ण जीवन वृत्तियां अपने आराध्य के साथ आनन्दोत्सव मनाते हुए नाच-नाच कर अपने को एकाकार कर देती हैं। यह लीला श्रीकृष्ण के द्वारा मात्र 10 वर्ष की बाल-शिशु की संधि अवस्था में की गई। प्रत्येक लीला में गूढ़ तत्व निहित है। इस आनंद की अनुभूति करने के लिए योगी योग साधना करते हैं। तपस्वी तप करते हैं। वैश्णव कीर्तन करते हैं। कर्मयोगी निष्काम कर्म करते हैं।शास्त्रोक्त, पुराणोक्त इतिहास, रसापान, युद्धकला आदि सब अतिअल्प समय में ही सीख लिए-वेद, उपनिषद के अधिष्ठाता बन गए।

जीवन में इसके विपरित सब कुछ शुन्य है...
उन्होंने यंत्र रूढ़ानि यूं ही नहीं कहा। स्वयं अनुभव किया और लीला करके लोगों को अनुभव कराने के लिए उसके माध्यम से श्रीकृष्ण जैसे महान योगी की 16 हजार 108 रानियों वाली कथा अतिश्योक्ति युक्त अलंकार प्रतीत होती है। उनका विवाह लक्ष्मी अवतार रुक्मिणी के साथ सम्पन्न हुआ था, जिनके पुत्र प्रद्युम्न, पौत्र अनिरुद्ध, प्रपौत्र ब्रज और पड़पौत्र पद्नाभ थे। यह हो सकता है कि रुक्मिणी इतनी सुंदर हों कि उनके सामने 16 हजार 108 रानियों का सौंदर्य कुछ भी न हो, अर्थात् वे बहुत-बहुत सुंदर थीं, उनके सामने सुंदरता भी लज्जित होती थीं। देवर्र्षि नारद श्रीकृष्ण की दिनचर्या देखने के उद्देश्य से एक बार द्वारका गए। उन्होंने देखा कि यज्ञों के स्वामी यज्ञ कर रहे हैं।

ध्यान में आने वाले भगवान ध्यानस्थ हो आत्मदर्शन कर रहे हैं उन्हें विस्मय हुआ श्रीकृष्ण के वचन- ''ब्रम्हन धर्मस्य वत्माहं कर्ता तद्नुमोदिता। तच्छिक्षत्यं श्लोक मिममास्थित: पुत्र मा दिवद:।। देवर्षि नारद! मैं ही धर्म का, उपदेश का, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वालों का अनुमोदनकर्ता भी हूं। इसलिए संसार को धर्म की शिक्षा देने के उद्देश्य से मैं इस प्रकार धर्म का आचरण करता हूं। मेरी यह योगमाया देख मोहित मत होना। अपने लौकिक जीवन में स्थित हो श्रीकृष्ण ने लोकरंजन का भारत के क्षत्रपों को सूत्र में पिरोने का कार्य हाथ में लिया। युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ का सूत्रपात इसी उद्देश्य से कराया। भीष्म, द्रोण, व्यास आदि योग्य पुरुषों के होने के बाद भी भीष्मजी, व्यासजी की सम्मति से श्रीकृष्ण का अग्रपूजा के लिए चयन किया गया। शिशुपाल ने न केवल विरोध किया बल्कि अपशब्दों की बौछार लगा दी।

श्रीकृष्ण ने कष्टपूर्वक उसके जीवन की लीला समाप्त की। तो तत्कालीन राज्य व्यवस्था में आगे भी लोक संग्रह का वातावरण महाभारत से भी अधिक कठिन वीभत्सकारी हिंसक होता और असंगठित हिंसा बराबर चलती रहती। महाभारत युद्ध को संचालित करते हुए श्रीकृष्ण ने अहिंसा को ही दैवी गुण बताते हुए श्रेष्ठ बताया है। ''अमानित्वमदम्यित्व हिंसाक्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासन शौच स्थैम्मित्मविनिग्रह:।।7।।3 1. अमानित्व, 2. अदंमित्व, 3. अहिंसा, 4. भय, 5. सरलता, 6. आचार्य सेवा, 7. शुद्धता, 8. स्थिरता, 9. आत्म संयम...आगे इन्द्रियां विशयों में वैराग्य अहंकार रहितता-पुत्र, स्त्री, गृह आदि में मोह तथा ममता का अभाव ईश्वर में अनन्य एकनिष्ठ ध्यानपूर्वक भक्ति, एकान्त स्थान का सेवन, आध्यात्मिक ज्ञान की नित्यता का भान और आत्मदर्शन सब ज्ञान कहलाता है।

अहिंसा तक पहुंचने के लिए अमान, अदंभ सीढिय़ां हैं फिर अहिंसात्मक जीवन पद्धति में क्षमा, सरलता, सेवा, शुद्धता व आत्मसंयम आने से अहिंसा सिद्ध होती है। अहिंसा सिद्धता परम प्रेम में प्रगट होती है। तब कहीं आत्म दर्शन हो पाता है। इसे प्रेमानुभूति कह सकते हैं। प्रेमानुभूति होने पर हमारे कर्म द्वेष, घृणा, ईष्र्या से परे होंगे। इनसे परे होने पर कर्म सात्विक होंगे क्योंकि प्रेमी अपने प्रेमास्पदमय जगत देखता है फिर अहिंसा ही सहज गति है। इसके विपरीत सब कुछ शून्य है।

तो इसलिए पिता ने दिया बेटे को मृत्यु का दान
राजा निमि ने पूछा-महर्षियों! आप लोग परमात्मा का वास्तविक स्वरूप जानने वालों में हैं। मुझे यह बतलाइये कि जिस परमात्मा का नारायण नाम से वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है?यहां विदेहजी परमात्मा का स्वरूप पूछ रहे हैं योगीश्वरों से। स्वरूप से तात्पर्य है कि वह परमात्मा कैसा है? वह कैसा दिखता है? उसके क्या-क्या लक्षण हैं? वह क्या-क्या करता है?आदि-आदि। इस प्रश्न में बड़ी गहराई है।

यहां पर नारायण से तात्पर्य उस परब्रह्म परमात्मा से है। पांचवे योगीश्वर पिप्लायन ने कहा- राजन जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों ही है, बनने वाला भी है और बनाने वाला भी। जिसकी सत्ता से ही सत्तावान होकर शरीर, इन्द्रिय, प्राण और अनत:करण अपना-अपना काम करने में समर्थ होते हैं, उसी परम सत्य वस्तु को आप नारायण समझिये।

वास्तव में जितनी भी शक्तियां हैं चाहे वे इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं के रूप में हों, चाहे इन्द्रियों के, उनके विषयों के अथवा विषयों के प्रकाश के रूप में हों, सब-का-सब वह ब्रह्म ही है। क्योंकि ब्रह्म की शक्ति अनन्त है। कहां तक कहूं? जो कुछ दृश्य-अदृश्य, कार्य-कारण, सत्य और असत्य है सब कुछ ब्रह्म है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्व का साक्षात्कार हो जाता है जैसे नेत्रों के निर्विकार हो जाने पर सूर्य के प्रकाश की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है।

जब राजा निमि ने पूछा- योगीश्वरो! अब आपलोग हमें कर्मयोग का उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रतिशीघ्र परम नैष्कम्र्य अर्थात कर्तत्व, कर्म और कर्मफल को निवृत्त करने वाला ज्ञान प्राप्त करता है। एक बार यही प्रश्न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकु के सामने ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों से पूछा था, परन्तु उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था?

तब छठे योगीश्वर आविर्होत्रजी ने कहा- राजन कर्म (शास्त्रविहित), अकर्म (निषिद्ध) और विकर्म (विहित का उल्लंघन) - ये तीनों एकमात्र वेद के द्वारा जाने जाते हैं, इनकी व्यवस्था लौकिक रीति से नहीं होती। वेद अपौरुषेय हैं- ईश्वररूप हैं, इसलिए उनके तात्पर्य का निश्चय करना बहुत कठिन है। इसी से बड़े-बड़े विद्वान भी उनके अभिप्राय का निर्णय करने में भूल कर बैठते हैं। (इसी से तुम्हारे बचपन की ओर देखकर तुम्हें अनधिकारी समझकर सनकादि ऋषियों ने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया)।कुछ ऐसी ही जिज्ञासा ऋषि उद्दालक के पुत्र बालक नचिकेता के मन में उठी थी। ऋ षि उद्दालक ने सर्वमेघ यज्ञ किया। इस यज्ञ में अपनी सारी सम्पत्ति दान करनी होती है। ऋषि ने ऐसा ही किया। सबकुछ दान हो चुकने पर बालक नचिकेता ने पिता से बार-बार आग्रह किया कि मैं भी आपकी सम्पत्ति हूं, मुझे भी किसी को दान करिए। पहले तो ऋषि ने उपेक्षा की किन्तु बालक की जिद से क्रोधित हो उनके मुख से निकल गया - ठीक है, जा तुझे मृत्यु (यम) को दान दिया।

प्रेम करो पर ये बात हमेशा याद रखो...
यमराज ने संभाषण समाप्त किया तो उसी सरलता के साथ नचिकेता ने जवाब दिया-देव, बहुत सुखोपभोग प्राप्त कर लेने पर भी क्या मेरा यह जीवन बना रहेगा? फि र भोगों से तृप्ति भी तो नहीं होती। इसलिए अपना धन, अपना ऐश्वर्य, राजसिंहासन तथा नाच-गान आप अपने ही पास रखें। मुझे पर यदि प्रसन्न हों, तो वही उपदेश दें, जिससे मेरा आत्म-कल्याण हो।

यमराज बालक की दृढ़ता और विनम्रता पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने नचिकेता को ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान कराया। राजा निमि ने भी यहां बड़ी विनम्रता से योगीश्वरों से नारायण नाम से प्रसिद्ध परम तत्व को जानने की जिज्ञासा प्रकट की है।योगीश्वर आर्विर्होत्रजी ने विदेहराज के प्रश्न के अंतिम भाग का उत्तर यहां पहले दिया। अब, वे आगे राजा को कर्मयोग के विषय में बताएंगे। आइये, इससे पहले हम योग को थोड़ा समझ लें। भागवत में यह चर्चा बड़ी गूढ़ है।

श्रीकृष्ण ने गीता में दिशा दी थी कि - ''मय्यासक्त मत: प्रार्थ योगं युंजन्मदाश्रय। असंषयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु य।17।। हे पार्थ! तू मेरे में आसक्तमना होकर योग का साधन करता हुआ मेरे आश्रय पर रहते हुए, जिस प्रकार संशय रहित अच्छी तरह पूर्ण रूप मुझे जानेगा, भगवान का जानना ही परम ज्ञान है। आसक्ति मनुष्य का स्वभाव है इस सहज स्वभाव को ईश्वर के प्रति प्रत्यावर्तित करना है। जगत की आसक्ति को भागवंतीय बनाने की आवश्यकता है। इसको तीन प्रकार से करना शक्य है- ''योग साधन युक्त, मन सदा भगवदच्चिन्तन में लगा रहे और अन्य साधनों से विमुख होकर एकमात्र भगवदाश्रय पर रहे।अनिश्वरवादी भी योगी हो सकता है। अपनी अंतरआत्मा को भगवान में लगाकर श्रद्धापूर्वक भजन करने वाला युक्ततम योगी ही भगवान को जान सकता है, अर्थात् ज्ञानी हो सकता है।

ज्ञानी संसार को क्षर समझता है, ईश्वर को अक्षर उसके प्रयत्न क्षर देह में आत्मा को अक्षर परमात्मा की ओर जगत से पलटा कर लाने का प्रयत्न करता है, यह प्रयत्न साधना है, जिसमें गुरुप्रदत्त शिक्षा-दीक्षा सुयोग प्रदान करती है। कृष्णलीला के दो उदाहरण हम अनासक्त मन:स्थिति के लें-गोपियों से-यशोदा मां से कृष्ण ने खूब प्यार किया, उनमें पूर्ण आसक्ति बनाई, मथुरा गए तो पलटकर नहीं देखा कि वंृदावन किधर है, कुरील कुंजे कहा है, यमुना तट कहां है, गोपियां रोती हैं, गाती हैं कोई ध्यान नहीं गया। प्रेम किया तो इतना कि उसकी कोई सीमा नहीं और छोड़ा तो मानों कभी प्रेम भी किया था?

बाललीला में संत विनोबा भावे का विश्लेशण उपयुक्त लगता है, हम बालकों का लालन-पालन जगत की दृष्टि से करते हैं-निन्दा और प्रशंसा का भाव मन में रहता है, कितना अच्छा है कि बालकृष्ण की सेवा कर रहे यह भाव लालन-पालन में रहे तो पालकों और बालकों दोनों का कल्याण है।

जब भी कोई काम करें तो शुरुआत ऐसे करें....
योगीश्वर आगे कहते हैं फल की अभिलाषा छोड़कर और विश्वात्मा भगवान को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्म का ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मों की निवृत्ति से प्राप्त होने वाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है। जो वेदों में स्वर्गादिरूप फल का वर्णन है, उसका तात्पर्य फल की सत्यता में नहीं है, वह तो कर्मों में रुचि उत्पन्न कराने के लिए है।

जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र से शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्मा की हृदय ग्रन्थि-मैं और मेरे की कल्पित गांठ खुल जाए, उसे चाहिए कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियों से भगवान की आराधना करे। पहले सेवा आदि के द्वारा गुरुदेव की दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठान की विधि सीखे, अपने को भगवान की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसी के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करे। पहले स्नानादि से शरीर और संतोष आदि से अन्त:करण को शुद्ध करे, इसके बाद भगवान की मूर्ति के सामने बैठकर प्राणायाम आदि के द्वारा भूत-शुद्धि, नाड़ी-शोधन करे, तत्पश्चात विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदि के न्यास से अंगरक्षा करके भगवान की पूजा करे। पूजा सामग्री से प्रतिमा आदि में अथवा हृदय में भगवान की पूजा करे। इस प्रकार जो पुरुष अग्नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदय में आत्मरूप श्रीहरि की पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

यह कर्मयोग में भक्ति का मार्ग है। यह परम प्रेम गोपियों से पूछा जाए। गोपी बन नहीं सकते, किन्तु परम भागवत देवर्षि नारद के सूत्र हमारे समक्ष हैं। भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम जो लीला संवरण के पश्चात परम प्रेम भक्ति को अपने में अवतरित करने की क्रिया आधार माने जा सकते हैं। अर्थात् भगवान का सतत स्मरण चाहे गाकर किया जाए, कीर्तन करके किया जाए, जप करते हुए किया जाए, यज्ञ कर्म करते हुए किया जाए या जगत के कर्म करते हुए कर्म भगवान के मानते हुए किए जाएं, समय पर ध्यान करके किया जाए, यहां तक कि सोने के पश्चात स्वप्न में भी स्मरण होता रहे यह तेलधारावत् प्रत्येक सांस के साथ स्थिति बनी रहे फिर सांगोपांग पूजन ही क्यों न हो, इन सबमें भाव प्रधान हैं कि किस भाव से क्रिया हो रही है। जगतीय भाव यदि नि:स्वार्थ है, कामना है और सबकुछ किया-कराया शून्य होता है। वर्णित क्रियाएं जब स्वभाव में कामना रहित हो जाती हैं तब गुरुकृपा या प्रभुकृपा से साधक - परम प्रेमरूपा भक्ति का अधिकारी हो जाएगा।

भक्ति की ऐसी स्थिति आ जाती है कि भक्ति उसे करनी नहीं पड़ती, स्वाभाविक, अनायास प्रकट होने लगती है। तो समझो कि परम प्रेम रूप भक्ति उदय हो गई है। जब ईश्वर कल्पना का अथवा बौद्धिक विलास का विषय मात्र नहीं रहकर, प्रत्यक्ष निश्चित अनुभवगम्य हो जाता है। जब भक्ति में किसी भी प्रकार का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहे, स्वत: ही स्वभाव तथा संस्कारों के अनुसार, भक्ति के भाव, यौगिक क्रियाएं तथा ज्ञानात्मक भाव अंतर से ही उदय होने लगे, तो समझो परम प्रेम रूपा भक्ति जाग्रत हो गई है।

परमात्मा कैसे होते हैं?
राजा निमि ने पूछा-महर्षियों! आप लोग परमात्मा का वास्तविक स्वरूप जानने वालों में हैं। मुझे यह बतलाइये कि जिस परमात्मा का नारायण नाम से वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है? यहां विदेहजी परमात्मा का स्वरूप पूछ रहे हैं योगीश्वरों से। स्वरूप से तात्पर्य है कि वह परमात्मा कैसा है? वह कैसा दिखता है? उसके क्या-क्या लक्षण हैं? वह क्या-क्या करता है? आदि-आदि। इस प्रश्न में बड़ी गहराई है।

यहां पर नारायण से तात्पर्य उस परब्रह्म परमात्मा से है। पांचवे योगीश्वर पिप्लायन ने कहा- राजन जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का निमित्त कारण और उपादान कारण दोनों ही है, बनने वाला भी है और बनाने वाला भी। जिसकी सत्ता से ही सत्तावान होकर शरीर, इन्द्रिय, प्राण और अनत:करण अपना-अपना काम करने में समर्थ होते हैं, उसी परम सत्य वस्तु को आप नारायण समझिये।

वास्तव में जितनी भी शक्तियां हैं चाहे वे इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं के रूप में हों, चाहे इन्द्रियों के, उनके विषयों के अथवा विषयों के प्रकाश के रूप में हों, सब-का-सब वह ब्रह्म ही है। क्योंकि ब्रह्म की शक्ति अनन्त है। कहां तक कहूं? जो कुछ दृश्य-अदृश्य, कार्य-कारण, सत्य और असत्य है सब कुछ ब्रह्म है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्व का साक्षात्कार हो जाता है जैसे नेत्रों के निर्विकार हो जाने पर सूर्य के प्रकाश की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है।जब राजा निमि ने पूछा- योगीश्वरो! अब आपलोग हमें कर्मयोग का उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रतिशीघ्र परम नैषकम्र्य अर्थात कर्तत्व, कर्म और कर्मफल को निवृत्त करने वाला ज्ञान प्राप्त करता है। एक बार यही प्रश्न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकु के सामने ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों से पूछा था, परन्तु उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था?

भगवान को पाना है तो ये करें
योगीश्वर आगे कहते हैं फल की अभिलाषा छोड़कर और विश्वात्मा भगवान को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्म का ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मों की निवृत्ति से प्राप्त होने वाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है। जो वेदों में स्वर्गादिरूप फल का वर्णन है, उसका तात्पर्य फल की सत्यता में नहीं है, वह तो कर्मों में रुचि उत्पन्न कराने के लिए है।

जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र से शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्मा की हृदय ग्रन्थि-मैं और मेरे की कल्पित गांठ खुल जाए, उसे चाहिए कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियों से भगवान की आराधना करे। पहले सेवा आदि के द्वारा गुरुदेव की दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठान की विधि सीखे, अपने को भगवान की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसी के द्वारा पुरुषोत्तम भगवान की पूजा करे। पहले स्नानादि से शरीर और संतोष आदि से अन्त:करण को शुद्ध करे, इसके बाद भगवान की मूर्ति के सामने बैठकर प्राणायाम आदि के द्वारा भूत-शुद्धि, नाड़ी-शोधन करे, तत्पश्चात विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदि के न्यास से अंगरक्षा करके भगवान की पूजा करे। पूजा सामग्री से प्रतिमा आदि में अथवा हृदय में भगवान की पूजा करे। इस प्रकार जो पुरुष अग्नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदय में आत्मरूप श्रीहरि की पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है।

यह कर्मयोग में भक्ति का मार्ग है।
यह परम प्रेम गोपियों से पूछा जाए। गोपी बन नहीं सकते, किन्तु परम भागवत देवर्षि नारद के सूत्र हमारे समक्ष हैं। भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम जो लीला संवरण के पश्चात परम प्रेम भक्ति को अपने में अवतरित करने की क्रिया आधार माने जा सकते हैं। अर्थात् भगवान का सतत स्मरण चाहे गाकर किया जाए, कीर्तन करके किया जाए, जप करते हुए किया जाए, यज्ञ कर्म करते हुए किया जाए या जगत के कर्म करते हुए कर्म भगवान के मानते हुए किए जाएं, समय पर ध्यान करके किया जाए, यहां तक कि सोने के पश्चात स्वप्न में भी स्मरण होता रहे यह तेलधारावत् प्रत्येक सांस के साथ स्थिति बनी रहे फिर सांगोपांग पूजन ही क्यों न हो, इन सबमें भाव प्रधान हैं कि किस भाव से क्रिया हो रही है।

जगतीय भाव यदि नि:स्वार्थ है, कामना है और सबकुछ किया-कराया शून्य होता है। वर्णित क्रियाएं जब स्वभाव में कामना रहित हो जाती हैं तब गुरुकृपा या प्रभुकृपा से साधक - परम प्रेमरूपा भक्ति का अधिकारी हो जाएगा। भक्ति की ऐसी स्थिति आ जाती है कि भक्ति उसे करनी नहीं पड़ती, स्वाभाविक, अनायास प्रकट होने लगती है। तो समझो कि परम प्रेम रूप भक्ति उदय हो गई है। जब ईश्वर कल्पना का अथवा बौद्धिक विलास का विशय मात्र नहीं रहकर, प्रत्यक्ष निष्चित अनुभवगम्य हो जाता है। जब भक्ति में किसी भी प्रकार का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहे, स्वत: ही स्वभाव तथा संस्कारों के अनुसार, भक्ति के भाव, यौगिक क्रियाएं तथा ज्ञानात्मक भाव अंतर से ही उदय होने लगे, तो समझो परम प्रेम रूपा भक्ति जाग्रत हो गई है।

भगवान की भक्ति कैसे करें?
प्रार्थना करने के पश्चात गुरु प्रदत्त मंत्र या इष्ट मंत्र का जप करें। जप के लिए माला का सहारा लें। प्रारंभ में माला से गणना ठीक रहती है। नियत ले लें कि माला नित्य पूरी करें। वैसे नियम यह है कि मंत्र में जितने अक्षर हों उतनी माला कम से कम नित्य पूरी की जावे। जप करते समय सुखासन ठीक रहता है। जप के पश्चात अपने इष्ट भगवान का ध्यान करें। आंख बंद करके चिंतन करें, अपने प्रिय भगवत् स्वरूप का। वह स्वरूप विष्णु, शिव, देवी, राम, कृष्ण या अन्य किसी देव का हो सकता है। कोशिश करें कि ध्यान केन्द्रित हो।

मन भटके तो उसे बार-बार अपने ध्येय तक लावें। चिंतन करें कि ये आराध्य पास ही खड़े हैं। इस प्रकार प्रारंभिक अवस्था में अभ्यास करना ठीक रहता है। अभ्यास करते-करते ध्यान सहज होने लगता है और यदि भगवत् कृपा से सन्त या गुरु मिल जावें तो यह कार्य अतिशीघ्र होने लगता है। अनेक जन्मों के पड़े संस्कार क्षीण हुए बिना भगवान में ध्यान लगाना कठिन होता है। ध्यान की उच्चतम स्थिति ही समाधि होती है। गुरु कृपा से ही सहज तथा नित अभ्यास से यह स्थिति आ जाती है।

ध्यान के उपरांत भगवान या अपने इष्ट को धन्यवाद देवें कि उसने उसका स्मरण कराया। जो निराकार ब्रह्म के उपासक हैं वे ऊँ का जप करके स्वच्छ धवल प्रकाश को अपने अन्तर में देखें। भगवत् स्वरूप को अपने अन्तर में प्रकट होता हुआ देखने से एकाकार होने में मदद मिलती है। त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें।

सुबह शाम या जैसा समय हो गीता, रामायण, भागवत, गुरु ग्रंथ या अन्य किसी ग्रंथ का निर्धारित पाठ करें। इस स्वाध्याय से भगवान के कथा-प्रसंग में रुचि बढ़ती है। अपने आवास के आसपास नगर या गांव में कोई महात्मा का प्रवचन चलता हो तो समय निकाल कर वहां जाएं। किन्तु सावधान रहें कि मतमतान्तर के चक्कर में न आवें। उनके प्रवचन को सावधानी पूर्वक सुनें। अपने विश्वास को दृढ़ करने वाली बात स्वीकार करें, शेष को वहां छोड़ आवें। निरर्थक वाद-विवाद को टालें। सार-सार ग्रहण करके आगे बढ़ें।

सांगोपांग पूजन-अर्चन, भजन का अपना महत्व है। इसमें हम भगवान की सेवा में अपने शरीर के विग्रह को स्नान करावें। वस्त्र धारण करावें, चन्दन लगावें, पुष्प चढ़ावें, नैवेद्य लगावें, आरती करें, पत्र, पुश्प, फल तोयं की भावना से भगवान का पूजन-अर्चन करें। संध्या करें सूक्ष्म से लेकर जितनी हो सके, जप करें इत्यादि।

सायंकाल समय हो तो स्वाध्याय को समय दें। तत्पश्चात प्रार्थना, जो भी उपलब्ध व रुचिकर हो करें, आरती करें। रात्रि में सोते समय पुन: हरि स्मरण करें। दिनभर के कृत्यों पर संक्षेप में विचार करके विपरीत कर्मों के लिए भगवान से क्षमा मांगें और आगे न करने का संकल्प करें।

भगवान ने दस अवतारों में से कौन सा अवतार क्यों लिया?
परम प्रेम में न कामना, न लौकिक कर्मों का त्याग सहज भाव से शुद्ध सात्विक जीवन यापन, निराभिमानी मन:स्थिति और दृढ़मति तब कहीं बुद्धि से भगवान को जानना शक्य होगा और साधन से उनका अनुभव किया जा सकता है। साधन में कीर्तन, ध्यान, जप जो बिन प्रयास स्वत: हो आते हैं।इतना जो अत्यन्त दुष्कर और सरल है हो जाए तो कर्म-कर्तव्य पथ सिद्ध हो गया माना जा सकता है किन्तु अन्त: चाहिए भगवतीय शक्ति कृपा किंवा गुरु कृपा। चलना तो कर्म पथ पर पथिक को अर्थात् साधक को ही है। चलिए वहां चलें जहां राजा निमि ने अगला प्रश्न पूछा था योगीश्वरों से। राजा निमि ने पूछा- योगीश्वरों! भगवान स्वतंत्रता से अपने भक्तों की भक्ति के वश होकर अनेकों प्रकार के अवतार ग्रहण करते हैं और अनेकों लीलाएं करते हैं। कृपा करके भगवान की उन लीलाओं का वर्णन कीजिए। सातवें योगीश्वर द्रुमिलजी बोलते हैं- भगवान अनन्त हैं। उनके गुण भी अनन्त हैं। भगवान ने ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पांच भूतों की अपने आपसे, आपने आपमें सृष्टि की है। जब वे इनके द्वारा विराट शरीर, ब्रह्माण्ड का निर्माण करके उसमें लीला से अपने अंश अन्तर्यामीरूप से प्रवेश करते हैं।

दक्ष प्रजापति की एक कन्या का नाम था मूर्ति। वह धर्म की पत्नी थी। उसके गर्भ से भगवान ने ऋषिश्रेष्ठ शान्तात्मा नर और नारायण के रूप में अवतार लिया था। भगवान विष्णु ने अपने स्वरूप में एकरस स्थित रहते हुए भी सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए बहुत से कलावतार ग्रहण किए हैं। विदेहराज! हंस, दत्तात्रेय, सनक-सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार और हमारे पिता ऋ षभ के रूप में अवतीर्ण होकर उन्होंने आत्मसाक्षात्कार के साधनों का उपदेश किया है। उन्होंने ही सुग्रीव अवतार लेकर मधु-कैटभ नामक असुरों का संहार करके उन लोगों द्वारा चुराये हुए वेदों का उद्धार किया है। प्रलय के समय मत्स्यावतार लेकर उन्होंने भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी और औषधियों की, धान्यादि की रक्षा की और वराहावतार ग्रहण करके पृथ्वी का रसातल से उद्धार करते समय हिरण्याक्ष का संहार किया।

कूर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान ने अमृत-मन्थन का कार्य सम्पन्न करने के लिए अपनी पीठ पर मन्दराचल धारण किया और उन्हीं भगवान विष्णु ने अपने शरणागत एवं आर्त भक्त गजेन्द्र को ग्राह से छुड़ाया। भगवान ने नृसिंहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपु को मार डाला। फिर वामन अवतार ग्रहण करके उन्होंने याचना के बहाने इस पृथ्वी को दैत्यराज बलि से छीन लिया और अदितिनन्दन देवताओं को दे दिया।परशुराम अवतार ग्रहण करके उन्होंने ही पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन किया। उन्हीं भगवान ने रामावतार में समुद्र पर पुल बांधा एवं रावण और उसकी राजधानी लंका को समाप्त कर दिया। अजन्मा होने पर भी पृथ्वी का भार उतारने के लिए वे ही भगवान यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते। फिर आगे चलकर भगवान ही बुद्ध के रूप में प्रकट होंगे और यज्ञ के अनधिकारियों को यज्ञ करते देखकर अनेक प्रकार के तर्क-वितर्कों से मोहित कर लेंगे और कलियुग के अन्त में कल्कि-अवतार लेकर वे ही शुद्र राजाओं का वध करेंगे।

छ: बातें ऐसी जो सभी के जीवन को सुखी बना सकती है
अवतार हमें जीवन के प्रति नई दृष्टि देते हैं। हम मनुष्यों को जिन संकटों का सामना करना पड़ता है, वे सब अवतार में भगवान के सामने भी आते हैं और तब वे अपने आचरण से हमें शिक्षा देते हैं।अवतार एक तरह से आध्यात्मिक उपचार है। जीवन में कई दु:ख हैं। उनका निदान आध्यात्मिक तरीके से किया जाए। हम सुख-दु:ख की कल्पना करते हैं। वस्तुत: यह मन की अवस्था के प्रतीक हैं। महाभारत के उद्योग पर्व में महात्मा विदुर ने इस लोक में छ: प्रकार के सुख गिनाए हैं।''अर्थगमो नित्यमरोगिता च। वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या शड जीवलोकस्य सुखानि राजन।।धन की आय, नित्य निरोग, स्त्री का अनुकूल तथा प्रियवादिनी, पुत्र का आज्ञाकारी और धन पैदा करने विद्या का ज्ञान- ये छ: बातें इस लोक में मनुष्य को सुख देती हैं। हम यहां इन छहों का विवेचन करते हुए नित्य निरोग का विषय लेते हैं। लोकोक्ति है-प्रथम सुख निरोगी काया, दूसरा सुख हाथ में माया आदि।

नित्य निरोगी कैसे रहें? आज के विशाक्त वातावरण में एक बड़ा प्रश्न है। कोई न कोई रोग हम पर आक्रमण करते रहते हैं और हम डॉक्टर, वैद्य, हकीम आदि के पास जाकर अपनी आय का एक बड़ा भाग व्यय करते हैं। रोगी दु:खी होता और आय का रोग पर व्यय उसके दु:ख को और बढ़ा देता है। भगवान बुद्ध ने कहा था कि दु:ख है, दु:ख होगा और दु:ख अटूट है। हमारे महापुरुषों ने यह संसार दु:खमय माना है।

पूर्व इसके कि हम रोगों के उपचार की ओर ध्यान दें, यह आवश्यक हो जाता है कि हम रोगों को उत्पन्न करने वाले कारणों को संक्षेप में जानने का प्रयास करें। प्रकटत कारण - 1. असंयम-आहार व विहार, 2. दूषित वातावरण-आवास, जलवायु, 3. वंशानुगत स्थिति, 4. छूतग्रस्त, 5. स्वास्थ्य के प्रति अनभिज्ञता और उदासीनता-अनियमित जीवन यापन आदि।

अप्रकटत: कारण - 1. दैवी प्रकाप या ग्रह स्थिति, 2. प्रारब्ध योग या प्रारब्ध जनित रोग, 3. निसर्ग या प्रकृति की कार्यरतता।

इनमें प्रथम पांच पर मनुष्य अपने क्रियाकलाप से काबू पा सकता है किन्तु उसे प्रकृति को अनुकूल बनाकर चलना होगा।अत: हम प्राकृतिक उपचार या चिकित्सा की ओर अपना लक्ष्य बनाकर कुछ विचार करें।मनुष्य प्रकृति जन्य है। उसकी अवस्थाएं हैं। उसकी रुचियां होती हैं-स्वजनित और परिवारजनित। उसके विपरीत क्रियाकलाप उसे रोग के निकट ले आते हैं, चाहे वे जाने हों या अनजाने।

इन बातों को ध्यान रखें तो संभव है बीमारियों का बिना दवाई इलाज
हम प्राकृतिक जीवन पद्धति अपनाकर या तो रोग को आने से रोक सकते हैं या रोग यदि किसी कारण से आ जाए तो उससे लड़ सकते हैं। लडऩे के लिए चाहिए आत्मबल, साहस और प्रतिरोधात्मक शक्ति।इसलिए हम इन दोनों पक्षों को (प्राकृतिक और आध्यात्मिक) को लेते हैं। विषय विषद है। प्राकृतिक जीवन पद्धति के निम्न सोपान हो सकते हैं- खुली हवा में रहना सूर्यप्रकाश की पूरी व्यवस्था सहित, अल्प आहार यथासंभव पौष्टिक व सादा सात्विक दूध युक्त, व्यसन मुक्त जीवन, शराब, तम्बाकू, नशा देने वाली वस्तुओं का त्याग, नित्य नियमित शरीर का त्याग की अवस्थानुसार व्यायाम या यौगिक क्रियाएं, शारीरिक स्वच्छता-स्नान और सफाई, कार्यरत बने रहना-योग्यता एवं क्षमता के अनुसार, विश्राम यथा आवश्यकतानुसार और स्वच्छ जल पान तथा पाचन प्रणाली...रक्त परिभ्रमण प्रणाली....तथा श्वसन प्रणाली को प्रयासों से ठीक बनाए रखना।

अधिकांश रोग इनके विपरीत कार्य करने से होते हैं। इन तीनों का संबंध सम्यक आहार एवं विहार है। सम्यक आहार के निर्देश हमें समय-समय सद साहित्य से मिलते रहते हैं। अस्तु आधुनिक रोग जैसे उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदयरोग, मानसिक दुर्बलता आदि प्राणलेवा हैं का संबंध जहां असंतुलित आहार आदि प्राण लेवा हैं का संबंध जहां आहार तथा अनियमित जीवन है वहीं इनका संबंध मनोदौर्बल्य से भी है। चिंता दुर्बल मन का प्रतीक है, तनाव दुर्बल मन की क्रिया है, चिंता व तनाव का संयुक्त प्रतिफल इन रोगों के रूप में प्रकट होता है।

मन की दुर्बलता का इलाज नींद की गोलियों में नहीं, न ही चिकित्सा के अनान्य उपायों में है बल्कि यह आध्त्मिकता के माध्यम से किया जा सकता है। आध्यात्मिक उपायों से आत्मबल बढ़ता है और मन रोग से संघर्श करने योग्य हो जाता है तथा उपचार कारगर साबित होने लगते हैं।आध्यात्मिक उपाय या उपचार क्या हो सकते हैं, इसका हम अत्यंत संक्षेप में विश्लेषण करने का प्रयास यहां कर रहे हैं।अध्यात्म का सार है मन को भगवान में लगाना। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है ''मन्मना भव मग्दक्तों....18/65

मन को मुझ में लगा दो औरमामेकं शरणं ब्रज मेरी शरण में आ जाओ। 'अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।। 18/66 मैं तुम्हें पापों से छुड़ा दूंगा। चिंता मत करो। अर्थात् पाप हमारे चिंता के कारण हैं। पाप मुक्ति ही हमारे मन को चिंता मुक्त कर सकती है। हमें विष्वास करना होगा कि वासनायुक्त मन ही पाप का जनक और अस्थिर बुद्धि उसकी जननी है। पाप की पहचान हम कैसे करें?वासनायुक्त मन बार-बार दु:खी करता है और दु:ख पाप का परिणाम है। हम आत्म चिंतन करें तो पायेंगे कि हमारा किया हुआ पाप या पाप करने की हमारी इच्छा या वृत्ति हमें दु:ख के सागर में धकेल रही है और जब हम या कोई बार-बार दु:खी होते हैं तो निश्चित बात है कि भूतकाल या पूर्व जन्म में जो पाप कर्म हमसे हो गए हैं और जो प्रारब्ध बनकर हमारे दु:खों के कारण हैं- चाहे वे गरीबी के रूप में हों या शारीरिक दृष्टि से रोग के रूप में हो या बौद्धिक दृष्टि से अविद्या के रूप में हों।

इसका स्थाई उपचार आध्यात्मिक चिकित्सा प्रणाली में है जो वर्तमान में आत्मबल, मनोबल या मन शक्ति से बढ़ाकर दु:ख विषेशत: रोग रूपी दु:ख से लडऩे में सहायक हो सकती है। दु:ख वहन करने की एक बार शक्ति आ जाती है तो बड़े से बड़ा दु:ख बहुत छोटा हो जाता है।

आध्यात्मिक चिकित्सा प्रणाली के तिपय आयाम इस प्रकार हम ले सकते हैं।

मौत से करो मोहब्बत जिंदगी का सच यही है

1. यौगिक दृष्टि से यम-नियम का पालन। 2. भक्ति योग की दृष्टि से समर्पण युक्त भगवत् आराधना-नियमित प्रार्थना छलकपट विहीन जीवन, क्योंकि कपट मनुष्य ईश्वराभिमुख नहीं हो सकता। बिना भक्ति के पाप नहीं कट सकते और बिना पाप कटे मन की स्थिरता नहीं। मन को स्थिर बनाने के लिए प्रज्ञा (बुद्धि) को प्रतिष्ठित करना होगा और बुद्धि की प्रतिष्ठा इन्द्रिय निग्रह से ही संभव है। 3. कर्मकाण्ड संबंधी उपचार-इन्द्रिय निग्रह का बाहरी रूप है जप यज्ञ करना। गीता में भगवान ने कहा है कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूं। नित्य जप करने वाले भूतभावन भगवान शंकर महाकाल और महामृत्युंजय हैं। जिनके मंत्र का जप उस रोगी के लिये बनाया जाता है जिसका रोग चिकित्सक की क्षमता से बाहर हो जाता है। अत: उस स्थिति के आने के पूर्व ही जप क्यों न किया जाए, ताकि मन: स्थिति यह बन जाए।

मनुष्य का आयुष्य उसके जन्म के साथ निश्चित हुआ करता है। उसमें कोई हेर-फेर नहीं कर सकता। मरण
तो मोक्ष का द्वार है। मूर्ख मनुष्य मौत को पहचानते नहीं, इसलिए डरते हैं। मौत से मोहब्बत संसार का सार है। और साधना की स्थिति यहां पहुंच जाए कि बुद्धि तथा बुद्धि का चिंतन, मन तथा मन के संकल्प और क्रिया ये तीनों - ईश्वर अर्पण कर दिए जाएं। भगवान करते हैं 'सत्यम कि मामे वैश्यति मुझे ही प्राप्त करोगे। यही भौतिक एवं भवरोगों का सही आध्यात्मिक उपचार है। अत: हम प्राकृतिकस्थ हो अध्यात्म जीवन पद्धति स्वीकार करें तो कल्याण है और सुख है।

भगवान से हमेशा ऐसे मांगना भी तो ठीक नहीं
इस संबंध में पुराणों में एक कथा आती है। देवर्षि नारदजी को ही यह अधिकार था कि वे भगवान श्रीकृष्ण के अन्त:पुर तक जा सकते थे। उन्हें टोकने का किसी को साहस ही न होता था।एक बार ऐसे ही वे जब द्वारकापुरी पहुंचे तो भगवान श्रीकृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिए, नारदजी सीधे रुक्मिणीजी के पास पहुंचे और पूछा- आज यजमान के दर्शन नहीं हो रहे हैं, कहां हैं वे?रुक्मिणीजी ने पूजागृह की ओर इशारा करते हुए कहा- वहां बैठे जप कर रहे हैं।

नारदजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पूजागृह में पहुंचे तो देखा भगवान श्रीकृष्ण सचमुच ध्यान लगाए बैठे हैं। भगवान जो सर्वज्ञ हैं। नारदजी की आहट पाते ही उन्होंने आंखें खोल दी और हंसकर उनका स्वागत किया।

नारदमुनि ने आश्चर्य से पूछा - हे भगवन! सारी दुनिया आपका स्मरण करती है, आपका ध्यान करती है, आपके भजन गाती है परंतु आप किसका ध्यान करते हैं?भगवान श्रीकृष्ण ने गम्भीर होकर उत्तर दिया- मुनिवर! जो मेरा ध्यान करते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, मुझे भी उनका स्मरण-ध्यान करना पड़ता है।तो निश्चित है कि जब हम भगवान का स्मरण करेंगे तब वे भी हमारा ध्यान जरूर रखेंगे।

इसलिए जब समय मिले, जितना समय मिले, प्रभु का स्मरण आवश्य करें।एक बात और समझ लें कि भगवान को अपनी कामनाओं की पूर्ति का साधन न समझ लें। आज हमारे मन में अनेक और बड़ी-बड़ी इच्छाएं उठती रहती हैं और जब हम भगवान का स्मरण करते हैं, उनका ध्यान करते हैं या उनके दर्शन के लिए मंदिर जाते हैं तो अपनी इच्छाओं की एक गठरी भी उनके सामने खोलकर रख देते हैं।

तो इसलिए सबको नहीं मिलते भगवान

भक्त भगवान को अत्यन्त प्रिय होता है। उसका स्वभाव सम हो जाता है। वह ''सम दृष्टवा समे कृत्वा लाभो लाऽभे जयाऽजये। वह लाभ, हानि, जय-अविजय में सम रहता है। भगवान पर सब छोड़कर भगवान की शरण में जाता है।अब सवाल यह उठता है कि हम भक्ति प्राप्ति हेतु प्रारम्भ कैसे करें?

कुछ नियम बनावें। उनका पालन दृढ़ता से करें। प्रात: उठें, नित्य कर्म से निपटकर, एकान्त स्थान में बैठें और गुरु स्मरण करें। यदि गुरु न किया हो तो चिन्ता की कोई बात नहीं। पांच देवों गणेश, शिव, विष्णु, दुर्गा तथा सूर्य में से किसी का स्मरण करके भगवान से उसकी रुचि की प्रार्थना करें। प्रार्थना भाव यह रहे कि भगवान की अनन्त कृपा की वृष्टि हो रही है और हम अखण्ड आनन्द में डूबे हुए हैं। भगवान हमारे समस्त कष्टों को दूर कर रहे हें। हमारी मनोकामनाएं पूरी करने में वे सदैव तत्पर हैं। वे हमें शुद्ध बुद्ध बना रहे हैं। सबको सुखी करने वाले प्रभु सबका भला कर रहे हैं। सबके भले में ही हमारा भला है। भगवान समष्टि प्रार्थना प्रिय होती है। हम कोई भी संतों द्वारा प्रतिपादित प्रार्थना को ले सकते हैं।

प्रार्थना करने के पश्चात गुरु प्रदत्त मंत्र या इष्ट मंत्र का जप करें। जप के लिए माला का सहारा लें। प्रारंभ में माला से गणना ठीक रहती है। नियत ले लें कि माला नित्य पूरी करें। वैसे नियम यह है कि मंत्र में जितने अक्षर हों उतनी माला कम से कम नित्य पूरी की जावे। जप करते समय सुखासन ठीक रहता है। जप के पश्चात अपने इष्ट भगवान का ध्यान करें। आंख बंद करके चिंतन करें, अपने प्रिय भगवत् स्वरूप का। वह स्वरूप विष्णु, शिव, देवी, राम, कृष्ण या अन्य किसी देव का हो सकता है। कोशिश करें कि ध्यान केन्द्रित हो। मन भटके तो उसे बार-बार अपने ध्येय तक लावें। चिंतन करें कि ये आराध्य पास ही खड़े हैं। इस प्रकार प्रारंभिक अवस्था में अभ्यास करना ठीक रहता है। अभ्यास करते-करते ध्यान सहज होने लगता है और यदि भगवत् कृपा से सन्त या गुरु मिल जावें तो यह कार्य अतिशीघ्र होने लगता है। अनेक जन्मों के पड़े संस्कार क्षीण हुए बिना भगवान में ध्यान लगाना कठिन होता है। ध्यान की उच्चतम स्थिति ही समाधि होती है। गुरु कृपा से ही सहज तथा नित अभ्यास से यह स्थिति आ जाती है।ध्यान के उपरांत भगवान या अपने इष्ट को धन्यवाद देवें कि उसने उसका स्मरण कराया। जो निराकार ब्रह्म के उपासक हैं वे ऊँ का जप करके स्वच्छ धवल प्रकाश को अपने अन्तर में देखें। भगवत् स्वरूप को अपने अन्तर में प्रकट होता हुआ देखने से एकाकार होने में मदद मिलती है। त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें।

सुबह शाम या जैसा समय हो गीता, रामायण, भागवत, गुरु ग्रंथ या अन्य किसी ग्रंथ का निर्धारित पाठ करें। इस स्वाध्याय से भगवान के कथा-प्रसंग में रुचि बढ़ती है। अपने आवास के आसपास नगर या गांव में कोई महात्मा का प्रवचन चलता हो तो समय निकाल कर वहां जाएं। किन्तु सावधान रहें कि मतमतान्तर के चक्कर में न आवें। उनके प्रवचन को सावधानी पूर्वक सुनें। अपने विश्वास को दृढ़ करने वाली बात स्वीकार करें, शेष को वहां छोड़ आवें। निरर्थक वाद-विवाद को टालें। सार-सार ग्रहण करके आगे बढ़ें। सांसारिक कर्मों को भगवान की सेवा मानकर सम्पादित करें। कार्य करते समय सावधान रहें कि इसमें किसी की हानि तो नहीं होती है।भक्ति मार्ग या भगवान को पाने के लिए चलना इतना ही आसान होता तो सबके सब चल पड़ते। तलवार की धार पर चलना होता है वह भी दुधारी तलवार।

पाप से बचना है तो ये है सबसे सरल तरीका
जीवन में सत्संग का बड़ा महत्व है। परिवार में रहकर तो सत्संग करना ही चाहिए। हम भागवत में चर्चा कर रहे हैं नौ योगीश्वर और जनकराज के संवादों की। यह संवाद श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी को नारद सुना रहे हैं।नारदजी वसुदेवजी के महल में पधारे थे। संतों का हमारे घर में आवागमन होते रहना चाहिए। संत से संसारी चर्चा न कर आध्यात्मिक संवाद करना चाहिए। नारदजी, वसुदेवजी को अब नवें योगीश्वर का संवाद सुना रहे हैं। इन वार्तालापों से हमें एक नया जीवन-दर्शन प्राप्त होगा।

चलिए राजा नीमि और योगीश्वर कर भाजनजी के पास चलते हैं।राजा निमि ने पूछा-आप लोग कृपा करके यह बतलाइए कि भगवान किस समय किस रंग का, कौन सा आकार स्वीकार करते हैं और मनुष्य द्वारा कौन से नामों और विधियों से उनकी उपासना की जाती है। नवें योगीश्वर कर भाजनजी ने कहा- युग चार हैं-सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। इन युगों में भगवान के अनेकों रंग, नाम और आकृतियां होती हैं तथा अलग-अलग विधियों से उनकी पूजा की जाती है। सत्ययुग में भगवान के विग्रह का रंग श्वेत होता है, चार भुजाएं और सिर पर जटा होती है तथा वे वल्कल का वस्त्र पहनते हैं।

सत्ययुग के मनुष्य बड़े शान्त, सबके हितैषी और समदर्शी होते हैं। लोग इन्द्रियों और मन को वश में रखकर ध्यानरूप तपस्या के द्वारा सबके प्रकाशक परमात्मा की आराधना करते हैं। त्रेता युग में भगवान के विग्रह का रंग होता है लाल। चार भुजाएं होती हैं और कटिभाग में वे तीन मेखला धारण करते हैं।

द्वापर युग में भगवान के विग्रह का रंग सांवला होता है। वे पीताम्बर तथा शंख, चक्र, गदा आदि अपने आयुध धारण करते हैं। लोग इस प्रकार भगवान की स्तुति करते हैं-हे ज्ञानस्वरूप भगवान वसुदेव एवं क्रियाशक्ति रूप संकर्षण! हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं। द्वापर युग में इस प्रकार लोग जगदीश्वर भगवान की स्तुति करते हैं। कलियुग में भगवान का विग्रह होता है काले रंग का। इस युग में श्रेष्ठ बुद्धि सम्पन्न पुरुष यज्ञों के द्वारा उनकी आराधना करते हैं, जिनमें नाम, गुण, लीला आदि के कीर्तन की प्रधानता रहती है।विभिन्न युगों के लोग अपने-अपने युग के अनुरूप नाम-रूपों द्वारा विभिन्न प्रकार से भगवान की आराधना करते हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी पुरुषार्थों के एकमात्र स्वामी भगवान श्रीहरि ही हैं। कलियुग में केवल संकीर्तन से ही सारे स्वार्थ और परमार्थ बन जाते हैं। संकीर्तन का एक और अर्थ है उस परमात्मा की शरण में जाना। चलिए इस बात को गीता के प्रसंग से समझें।

''सर्वधर्मान्परित्य मामेकं शरणं व्रज। अहंत्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिश्यामि मा शुच:।। (गीता 18-66)

सब धर्मों का त्याग करके एक मेरी ही शरण ले। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूंगा। शोक मत कर। भगवान श्रीकृष्ण का यह अत्यंत महत्वपूर्ण आश्वासन है। यहां यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि जो भगवान की शरण ले लेता है, उससे पाप होता ही नहीं। पाप सामान्यत: तब होता है जब भगवत् शरणागति में कहीं कोई चूक हो जाती है। शरणागति साधक, भक्त या योगी की एक ऐसी जाग्रत अवस्था है जिसमें उसकी चेतन शक्ति उसे न केवल चैतन्य रखती है वरन् उसे न तो स्थित प्रज्ञ से विमुख होने देती है और न ही वृत्तियों की द्वन्दात्मक स्थिति में पुन: उलझाती है। वैसे स्थित प्रज्ञ निद्र्वन्द होता है। उसका विवेक सोते, जागते या अन्यान्य क्रिया-कलाप करते समय विस्मृत नहीं होने देता है, यह परम श्रेष्ठ गुरु भगवान का अर्जुन को मिला हुआ महती कृपा रूपात्मक महाप्रसाद था।

जब लक्ष्य हो कुछ पाने का तो ....
यह स्थिति कैसे बनी रहे यह गीता प्रदत्त उपदेश व निदेश जिन्हें शक्ति जागरण की संज्ञा दी जा सकती है, में मिलती है। जीव की प्रज्ञा के अभ्यास या साधन करने के लिए जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के अनुगीता में दिए गए उपदेश माननीय हैं।महाभारत में शत्रुओं का नाश हो चुका था। जीवन संघर्ष में साधनत साधक के शत्रु-काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर आदि का नाश हो जाता है। वह निश्चन्त हो अपने आत्म तत्व गुरु से पुन: विचार मंथन करता है। यह मंथन सामान्यत: जीवन के उत्तराद्र्ध में होता है।

आध्यात्मिक उपलब्धियों की कुछ-कुछ विस्मृति होती है, ज्ञान विलुप्त सा प्रतीत होता है। यह मोह के पुन: उभरने का उपक्रम कहा जा सकता है। अपनापन बढ़ता हुआ नजर आने लगता है और आत्मा देह त्यागने में कष्ट पाने लगती है। देह जर्जन किले के मानिन्द टूट-टूट कर गिरने की अवस्था में पहुंचने लगता है। गीता में वर्णित मोहजनित विशाद को भगवान ने भंग किया। अर्जुन जैसे ज्ञानी को इसका विस्मरण होना, जीव का यथार्थ चित्रण उत्तराद्र्ध में देखने को मिलता है।

आश्वमेधिक पर्व में वर्णन आया है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने परिजनों से घिरे सभा मण्डप में आए। आनन्दित अवस्था थी। आनन्द अवस्था में अर्जुन का प्रश्न सहज था-केशव! आपने स्नेहवश पहले युद्ध भूमि में मुझे ज्ञान का उपदेश दिया था, वह इस समय बुद्धि दोष से भूल गया हूं। उन विषयों को सुनने की बारम्बार मेरे मन में उत्कण्ठा होती है, अत: वह सब विषय मुझे सुना दीजिए।

अबुद्धिमत्ता पूर्ण प्रश्न पर किस योग्य गुरु को विस्मय नहीं होगा, फिर श्रीकृष्ण तो योग्यतम गुरु थे। उनका उत्तर निश्चित रूप से साधक, भक्त, योगी का मार्गदर्शक है। गुरु के समीप प्रथम दृष्टया ही चेतन होकर ज्ञान ग्रहण करना ठीक रहता है, क्योंकि पुन: दिया गया उपदेश वही नहीं होता, या तो वह पहले से श्रेष्ठ होता है या पहले से इतर होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- अर्जुन! उस समय मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय विषय को सुनाया था, अपने स्वरूप भूत धर्म-सनातन पुरुषोत्तम तत्व का परिचय कराया था और नित्य लोकों का वर्णन किया था, किन्तु तुमने जो अपनी नासमझी से उस उपदेश को याद नहीं रखा, यह जानकर मुझे अत्यंत खेद हुआ है। उन बातों का अब पूरा-पूरा स्मरण होना सम्भव जान नहीं पड़ता। हे पाण्डुनन्दन निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि अच्छी जान नहीं पड़ती। श्रद्धा के अभाव में विस्मृति संभव है। बुद्धि का लक्ष्य यदि कुछ प्राप्ति का है, जैसे अर्जुन युद्ध जीतने और राज्य पाने में अपनी बुद्धि को लगाए हुए था, तो सुनकर वह याद रख नहीं पाया।

इसी प्रकार गुरु के उपदेश चित्त-बुद्धि को एकाकार बनाकर नहीं सुने जाएं तो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ उपदेश भी उड़ जाता है, वह निष्कर्ष श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद से निकाला जा सकता है। यदि ऐसी स्थिति बन जाए जो स्वाभाविक है, तो अपने गुरु से नि:संकोच चर्चा करके अपनी बुद्धि का परिमार्जन करने में कोई आपत्ति नहीं है।

अर्जुन के प्रश्न करने पर भगवान ने अपने चरित्र की एक घटना उदाहरणार्थ सुनाई। एक समय एक दुद्र्धर्श ब्राम्हण ब्रम्हलोक से श्रीकृष्ण के पास आए। श्रीकृष्ण ने उनसे मोक्ष-धर्म संबंधी प्रश्न किया। ब्राम्हण ने कश्यप नामक एक धर्मात्मा और तपस्वी तथा सिद्ध ब्रम्हर्षि के बीच हुई चर्चा का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के प्रश्न का उत्तर दिया।नाना प्रकार के शुभकर्मों के अनुष्ठान करके केवल पुण्य के संयोग से इस लोक में उत्तम फल और देवलोक में स्थान प्राप्त करते हैं। ऊंचे-ऊंचे तपस्या के द्वारा प्राप्त किए स्थान से बार-बार नीचे आना पड़ता है।

क्षीणे पुण्ये मत्र्य लोके... बार-बार जन्म लेने से शुभ व अशुभ गतियों से गुजरना होता है। मृत्यु का क्लेश भी बार-बार भोगना पड़ता है। अनेक जन्मों (विविध प्रकार के मनुष्य, पशु, कीट-पतंग आदि) में उनके स्तनों का दूध पिया। बहुत से पिता और बहुत सी माताएं देखी हैं। विचित्र सुख-दु:ख का अनुभव किया। दु:ख सुख का आभास होता रहा। बुढ़ापा, रोग, राग, द्वेश में उलझा जीव भटकता है। सिद्ध आगे कहते हैं: दु:खों से घबराकर परमात्मा की शरण ली, समस्त लोक व्यवहार त्याग दिया।

जो भी इस कहानी को सुनता है वो करने लगता है मौत का इंतजार
तात्पर्य यह है कि साधक या भक्त मनुष्य शरणागति और भगवत कृपा से साधन करते-करते उस स्थिति में पहुंच सकता है जहां वह सम्पूर्ण जगत व्यवहार में एक तटस्थ दृष्टा भाव लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करता है। ऐसी स्थिति में मोह के बंधन कट जाते हैं। मोह बंधन कटने से जन्म-मरण की प्रक्रिया विलुप्त हो जाती है। अवलोकन से भी लगाव नहीं रहता। इसी शरणागति को यौगिक भाशा में ईष्वर प्रणिधान की संज्ञा दी गई है।

नवम योगीश्वर यही बात समझा रहे थे। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर की प्रजा चाहती है कि हमारा जन्म कलियुग में हो, क्योंकि कलियुग में कहीं-कहीं भगवान नारायण के शरणागत उन्हीं के आश्रय में रहने वाले बहुत से भक्त उत्पन्न होंगे। अब कथा वापस नारदजी पर आती है।

नारदजी कहते हैं-वसुदेवजी! मिथिलानरेश राजा निमि नौ योगीश्वर से इस प्रकार भागवत धर्मों का वर्णन सुनकर बहुत ही आनन्दित हुए। इसके बाद सब लोगों के सामने ही वे सिद्ध अन्तर्धान हो गए। विदेहराज निमि ने भी उनसे सुने हुए भागवत धर्मों का आचरण किया और परमगति प्राप्त की। वसुदेवजी! मैंने आपको जिन भागवतधर्मों का वर्णन किया है यदि श्रद्धा के साथ आप भी इनका आचरण करेंगे तो अन्त में सब आसक्तियों से छूटकर भगवान का परमपद प्राप्त कर लोगे।

नारदजी कहते हैं-वसुदेवजी! आप श्रीकृष्ण को अपना पुत्र ही न समझें। वे अविनाशी हैं। उन्होंने लीला के लिए मनुष्य रूप प्रकट करके अपना ऐश्वर्य छिपा रखा है। वे जीवों पर परमशान्ति और मुक्ति देने के लिए ही अवतीर्ण हुए हैं और इसी के लिए जगत् में उनकी कीर्ति भी गाई जाती है। नारदजी की बात सुनकर वसुदेव और देवकीजी को बड़ा विस्मय हुआ। उनमें जो कुछ माया-मोह था, उसे उन्होंने छोड़ दिया। जो वसुदेवजी और देवकीजी के जीवन में हुआ वह साधन की यह उच्चतम स्थिति है। कहा गया है-''सीय राम मय सब जग जानी। करऊं प्रणाम जोरि युग पानी।।

सब जग में प्राणिमात्र जड़ चेतन सबकुछ आ जाता है। उनमें सिया अर्थात शक्ति, भवानी, जगदंबिका, माया पृभति हैं और ब्रम्ह, परमात्मा, , भगवान जो भी नाम दें, हैं। राममय सब जग (पूरा ब्रम्हाण्ड) है और राम में सब है और सब में राम हैं। गीता में इस चिन्तन का स्पष्ट संकेत है। ''योमां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यचि।। 16-30।।

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मारूप मुझ वसुदेव को ही देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वसुदेव के अंतर्गत देखता है। उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूं और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है।

जो बुद्धिमान होता है वो कभी इस पचड़े में नहीं पड़ता

इष्ट को पता है कि साधक का कल्याण किसमें है। यदि सकाम जप या अनुष्ठान से उपलब्धि नहीं होती है तो जपकर्ता मिथ्या दोष लगाकर अविश्वासी बनकर नास्तिकता के पथ पर चल पड़ता है। इस प्रकार के उदाहरण देखने में आते हैं ''श्रद्धावान लभते ज्ञानं...ज्ञानी इस पचड़े में नहीं पड़ता है, ज्ञान उसे श्रद्धा से प्राप्त होता है। वह जपकर्ता है, इष्ट के लिए निष्काम किया गया जप कालान्तर में साधक का वह मंत्र सिद्ध मंत्र बन जाता है और जब वही मंत्र संस्कारों के उदय होने पर गुरु प्रदत्त हो जाता है तो साधक की आध्यात्मिक जीवन यात्रा सुलभ, उद्देश्यपूर्ण और तीव्र हो जाती है। मंत्र चैतन्य की स्थिति निर्मित हो जाती है।किन्तु इसके लिए गुरु कृपा चाहिए। सद् और समर्थ गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र चैतन्य और सिद्धमंत्र होता है।

इससे आदिशक्ति, कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। मन-प्राण का लय साधित होता है, तन्मयता आती है। साधक हो समाधि लग जाती है। आत्मा परमात्मा का एकत्व होता है। अत: मंत्र की शक्ति को साधारण नहीं समझना चाहिए। दैवी शक्ति सम्पन्न मंत्र होते हैं। परम्परानुसार इनका स्वरूप व गठन भिन्न होता है। आवश्यकता है कि मंत्र का अर्थ समझते हुए जप किया जाए। श्रद्धा विश्वास और भक्ति इसके त्रिपादी आधार हैं। इनके सिद्धावस्था में निराकारी साकार होते पाए जाते हैं। उच्च स्थिति में साकार-निराकार का भेद शेष नहीं रहता। अन्तत: भजन, पूजन, जप, तप, प्रार्थना आदि में परमात्मा में विलय ही एकमात्र लक्ष्य रहता है।उद्धव को वह लक्ष्य अब प्राप्त होगा। शुकदेवजी राजा परीक्षित को आगे की कथा सुना रहे हैं।जब देवर्षि नारदजी वसुदेवजी को उपदेश करके चले गए, तब अपने पुत्र सनकादिकों, देवताओं और प्रजापतियों के साथ ब्रम्हाजी, शंकरजी, इन्द्र द्वारकानगरी में आए। साथ ही सभी अन्य देवता भी थे। सभी ने उनकी स्तुति की।

देवताओं ने प्रार्थना की-स्वामी! कर्मों के विकट फंदों से छूटने की इच्छावाले मुमुक्षुजन भक्तिभाव से अपने हृदय में जिसका चिन्तन करते रहते हैं, आपके उसी चरणकमल को हम लोगों ने अपनी बुद्धि, इन्द्रिय, प्राण, मन और वाणी से साक्षात् नमस्कार किया है। माया के द्वारा अपने आपमें ही रचना करते हैं, पालन करते और संहार करते हैं। यह सब करते हुए भी इन कर्मों से आप लिप्त नहीं होते हैं, क्योंकि आप राग-द्वेश आदि दोशों से सर्वथा मुक्त हैं। इस स्तुति का उद्देश्य यह है कि भगवान अपनी माया की जानकारी हमें दे रहे हैं। माया की समझ ही माया का हटना है। देवतागण भगवान की जो स्तुति कर रहे थे वही रूप तो गीता में हमने देखा था। भागवत के श्रीकृष्ण हमें ऐसे ही आचरण से शिक्षा देते हैं। चलिए, देवताओं की बात पूरी हो इसके पहले एकबार गीता का चिंतन कर लें।

मन को शांति तब तक नहीं मिल सकती जब तक....
योगीश्वर कवि ने और स्पष्ट किया- सांसारिक कर्मों के संबंध में संकल्प-विकल्प करने वाले मन को रोक दें, ऐसा करते ही अभय-पद की (परमात्मा की) प्राप्ति हो जाएगी। निष्चय ही मन के संकल्प-विकल्प साधक को उलझाए रखते हैं। वस्तुत: देखा जाए तो ये मूर्त लेकर भी नष्ट हो जाते हैं और कालान्तर में स्वप्नवत लगने लगते हैं।

आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएं, वृक्ष, वनस्पति, नदी आदि सबके-सब भगवान के अंग हैं। सभी रूपों में भगवान प्रकट हैं। यह समझकर साधक अनन्य भाव से भगवद्भाव से प्रणाम करता है। (करऊं प्रणाम जोरि युग पानी...) फिर जैसे भोजन करने से तुष्टि (तृप्ति अथवा सुख), पुष्टि (जीवन शक्ति का संचार) और क्षुधा-निवृत्ति होती है, उसी प्रकार भगवान के शरणागति हो भजन करने से उनके प्रति प्रेम, प्रेमास्पद प्रभु के स्वरूप का अनुभव और उनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के प्रति वैराग्य तीनों की प्राप्ति एक साथ होती है। साधक परम भागवत हो स्वयं परम शान्ति का अनुभव करने लगता है।

भगवत भक्त के लक्षण राजा निमि ने जानना चाहे, तब दूसरे योगीश्वर हरि ने स्पष्ट किया कि भगवान को समस्त प्राणियों के परिपूर्ण भगवत्सत्ता साधक भक्त देखता है। उसकी दृष्टि सिद्ध होती है अर्थात भगवान से प्रेम, भक्तों से मित्रता, दु:खी व अज्ञानियों पर कृपा जो श्रोत-नेत्र आदि इन्द्रियों द्वारा शब्द रूप विषयों को ग्रहण तो करता है, परन्तु इच्छा के प्रतिकूल विशयों से द्वेश नहीं करता और विषयों के मिलने पर हर्र्षित नहीं होता, उसकी समदृष्टि बनी रहती है। मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, धन-सम्पत्ति में अपना-पराये का भेद नहीं रखता आदि-आदि। ये वैष्णव के लक्षण गीता में विषद रूप में वर्णित हैं।

''सम दृष्टवा समें कृत्वा लाभो लाभ: जया जयै...हानि-लाभ, सुख-दु:ख में सम रहता हुआ साधक आगे बढ़ता जाता है। भगवान श्रीराम मनुष्य रूप में इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं, राजतिलक होता है तो क्या? वन जाने का आदेश हुआ तो क्या? उनके चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। समभाव लिए मानसी लीला भगवान राम के रूप में करके प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया जो आए उसका सामना परम पुरुषार्थ के साथ किया जाए। साधारण मनुष्य की भांति मरीच के पीछे जाना, सीता की खोज करना, सुग्रीव से मित्रता करना, सेतु निर्माण करना, रावण का वध करके सीता हरण का प्रतिकार चुकाना और इन सबके बाद भी न सुख, न दु:ख की भावना। तात्पर्य यह कि साधक पुरुषार्थ करने में पीछे नहीं रहता है।

तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्ष ने मन को सात्विक कर्मों की ओर प्रेरित करने का उपदेश दिया। मन अपना कार्य करता है वह अहंकार रहित हो कुमार्गगामी न बनें, उसको कर्म में लगाने का उपाय है कि वह सात्विक-कर्मों में लगाया जाए। इससे वृत्तियां शुद्ध बनी रहती है। शुद्ध-वृत्ति, सात्विक-कर्म माया को विच्छिन्न कर भगवान के निकट लाते हैं। भगवान राम ने भक्त सेवक लक्ष्मण के सन्मुख ज्ञान का अक्षुण्ण भण्डार लाकर उपस्थित कर दिया।''तात तीनि अति प्रबल खल काम, क्रोध अरूं लोभ। मुनि विग्यान धाम मन करहिं निमिश महुँ छोय, लोभ के इच्छा दंभ बल कामके केवल नारि, क्रोध के पुरुष वचन मुनिवर कहहिं विचारि

क्यों हर व्यक्ति की किस्मत नहीं चमकती?
क्यों हर व्यक्ति की किस्मत नहीं चमकती? क्यों हर व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता या सभी अपराधी क्यों नहीं होते? ऐसे सभी सवालों का उत्तर यदि हम अध्यात्मि दृष्टि से सोचें तो सिर्फ एक है। उसके प्रारब्ध जैसा किसी का प्रारब्ध होता है। उसी के अनुसार वंशागुत स्वभाव व संस्कार मनुष्य में अवतरित होते हैं। यही कारण है कि सबकी किस्मत एक जैसी नहीं होती है। निमि वंश की सीता, उर्मिला, माण्डवी, श्रुति-कीर्ति थीं। राजा जनक इन संस्कारों से ओतप्रोत थे। उनकी उपस्थिति मात्र से चित्रकूट का सारा वातावरण द्वंद्वमुक्त हो गया था। श्रीराम यह कहने की स्थिति में आ गए कि विद्यमान आपुनि मिथिलेसु, मोर कहब सब भांति भदेसु।

''राउर राम रजायसु होई, राउरि सपथ सही

सिर सोई।। 4/296/3

आपके और जनकजी के विद्यमान रहते, मेरा सबकुछ कहना भद्दा है। आपकी ओर महाराज की जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूं वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी।

यहां श्रीराम ने सत्य को पूर्ण दृढ़ता के साथ स्थापित किया।

''राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुरु प्रभावु पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।। 505

राज्य सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन सबका पालन गुरुजी का सामथ्र्य करेगा, परिणाम शुभ होगा। गुरु की निष्ठा का यह सूत्र न केवल रामकालिक है बल्कि सर्वकालिक और सबके लिए है। गुरु तत्व की सामथ्र्य का अनुभव जिन्हें होता है वे धन्य हैं।

अब हम उन प्रसंगों की ओर चलेंगे जहां श्रीकृष्ण गुरु रूप लेकर उद्धव की शंकाओं का निवारण करेंगे। वे स्वधाम पूर्व एक नई भूमिका में नजर आएंगे। अभी हम पढ़ रहे थे वसुदेवजी को नारदजी द्वारा दिया गया उपदेश। इसमें जीवन का गहरा दर्शन छिपा था। अब कथा भगवान की ओर जा रही है। अब हम भगवान के श्रीमुख से जीवन-दर्शन जानेंगे। भगवान अब गुरु की भूमिका में होंगे और शिष्य के रूप में रहेंगे उद्धव। इन दोनों के बीच हर संवाद एक मंत्र बन गया है।

गुरु-प्रदत्त मंत्र या पंथानुसार होते हैं या समर्थ गुरु शिष्य की योग्यतानुसार शक्ति सम्पन्न हो मंत्र प्रदान करते हैं। इससे शिष्य के लिए प्रदत्त मंत्र शक्ति सम्पन्न हो जाता है, जिसे जागृत या सिद्धमंत्र की संज्ञा दी गई है। ऐसे मंत्र के जप से शिष्य या साधक की कल्याणकारी (आध्यात्मिक) मनोकामना पूरी होती है। उसमें ज्ञान की गंगा प्रस्फुटित हो जाती है तब वह मंत्र का उपयोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं करता। उसकी मान्यता दृढ़ हो जाती है कि उसकी सांसारिक आवश्यकताएं प्रारब्धानुसार पूरी होगी ही, उसके इष्ट जानते हैं कि उसका कल्याण किसमें है।

किन्तु, जिन्हें ज्ञान प्राप्त में देरी संस्कार वश लगती है वे साधक मंत्र-सिद्धि के उपाय करते हैं। शास्त्रकारों ने मंत्र सिद्धि के उपाय कहीं स्पष्ट तथा कहीं संकेत रूप में बताए हैं।

मैं और मेरा, तू और तेरा क्या यही जिंदगी है?
काम एश क्रोध एश रजो गुण समुत्र्व: महाशनो महापाप्मा वित्र्यिनमिह वैरिणम। -37/3 रजोगुण से उत्पन्न हुआ काम ही क्रोध है, भोगों से कभी न अघाने वाला पापी है, इसे बैरी जान। वैसे यह प्रसंग हम पूर्व में पढ़ चुके हैं, लेकिन इस अद्भुत वार्तालाप को नई दृष्टि से भी जान लें।काम, क्रोध, मोह आदि रजोगुणी या तमोगुणी वृत्तियों पर विजित हुए बिना साधक आगे नहीं बढ़ सकता। इस साधना के मनुष्य रूपी राम और लक्ष्मण के उदाहरण हैं। श्रीराम कथा इस परम पुरुषार्थ का आदि सत्य है। श्रीराम ने अपना ईश्वरत्व अनुज लक्ष्मण के समक्ष तब प्रकट किया जब लक्ष्मण ने स्वयं कहा-सुर नर मुनि सचराचर स्वामी। मैं पूछऊँ निज प्रभु की नाईं।। यहां भी स्पष्ट है, सब तजि करौ। चरण रज सेवा...सेवा, पूजा, उपासना, साधन आदि ईश्वर निमित्त किया जाए तो भजन ही होता है। श्रीराम ने लक्ष्मण के पूछने पर वैदिक, उपनिषदिक, शास्त्र-समंत, मुक्ति-प्रदाता ज्ञान दिया। जिसका वर्णन रामचरित मानस में संत तुलसीदासजी ने अत्यंत सरल शब्दों में किया, सारांश इस प्रकार है।

मैं और मेरा, तू और तेरा यही माया है। जिसने सब जीवों को वश में कर रखा है।

इन्द्रियों के विषयों को और जहां तक मन जाता है, सबको माया जाना जाए। इसके दो भेद विद्या और अविद्या है। विद्या में गुण हैं, जगत की रचना करती है, ईश्वर से प्रेरित है और अविद्या, दोषयुक्त और अत्यंत दु:ख रूप है जिसके वष होकर जीवन संसार रूपी कुंए में पड़ा हुआ है। ज्ञान, वह है, जिसमें मान आदि एक भी दोष नहीं है और जो समान रूप से सबमें ब्रम्ह देखता है। जो कर्मानुसार बन्धन और मोक्ष देने वाला है, सबसे परे और माया का प्रेरक है- वह ईश्वर है, धर्म से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है, ज्ञान मोक्ष प्रदाता है। जिसमें ईश्वर शीघ्र प्रसन्न होता है। वह भक्ति है। भक्ति के लिए ज्ञान-विज्ञान के सहारे की आवश्यकता नहीं, वह स्वतंत्र है। यह तब ही प्राप्त होती है, जब गुरु प्रसन्न हों। भक्ति मार्ग

अत्यंत सुगम है-ब्राम्हण के चरणों में प्रीति, वेदाक्त शास्त्रोक्त आचरण पालते हुए अपने-अपने कर्मों में लगे रहने से वैराग्य होगा तब भागवत धर्म में प्रेम उत्पन्न होगा तथा नौ प्रकार की भक्ति दृढ़ होगी। गुरु के चरणों में प्रेम, मन, वचन और कर्म से भजन साधन का दृढ़ नियम हो और ईश्वर को ही गुरु, माता, पिता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने।

गुण गाते समय शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गद्गद हो जाए और नेत्रों से जल बहने लगे (साधक-साधन में ये विभिन्न क्रियाओं के विषेश लक्षण, प्रगट होते हैं) और जगत व्यवहार में काम, मद, क्रोध, दंभ आदि विलोपित हो जाए। फिर कर्म, वचन और मन से ईश्वर में ही गति हो जाए, तब सदा भगवान, ईश्वर, इष्ट साधक भक्त के हृदय कमल में विश्राम करते हैं। मन मंदिर हो जाता है।

कभी दुखी नहीं होना चाहते तो ये एक बात हमेशा याद रखें
भगवत भक्त के लक्षण राजा निमि ने जानना चाहे, तब दूसरे योगीश्वर हरी ने स्पष्ट किया कि भगवान को समस्त प्राणियों के परिपूर्ण भगवत्सत्ता साधक भक्त देखता है। उसकी दृष्टि सिद्ध होती है अर्थात भगवान से प्रेम, भक्तों से मित्रता, दु:खी व अज्ञानियों पर कृपा जो श्रोत-नेत्र आदि इन्द्रियों द्वारा शब्द रूप विषयों को ग्रहण तो करता है, परन्तु इच्छा के प्रतिकूल विषयों से द्वेष नहीं करता और विषयों के मिलने पर हर्षित नहीं होता, उसकी समदृष्टि बनी रहती है। मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, उसमें वासनाओं का उदय नहीं होता, धन-सम्पत्ति में अपना-पराये का भेद नहीं रखता आदि-आदि। ये वैष्णव के लक्षण गीता में विषद रूप में वर्णित हैं।

''सम दृष्टवा समें कृत्वा लाभो लाभ: जया जयै... हानि-लाभ, सुख-दु:ख में सम रहता हुआ साधक आगे बढ़ता जाता है। भगवान श्रीराम मनुष्य रूप में इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं, राजतिलक होता है तो क्या? वन जाने का आदेश हुआ तो क्या? उनके चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। समभाव लिए मानसी लीला भगवान राम के रूप में करके प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया जो आए उसका सामना परम पुरुषार्थ के साथ किया जाए। साधारण मनुष्य की भांति मरीच के पीछे जाना, सीता की खोज करना, सुग्रीव से मित्रता करना, सेतु निर्माण करना, रावण का वध करके सीता हरण का प्रतिकार चुकाना और इन सबके बाद भी न सुख, न दु:ख की भावना। तात्पर्य यह कि साधक पुरुषार्थ करने में पीछे नहीं रहता है।

तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्ष ने मन को सात्विक कर्मों की ओर प्रेरित करने का उपदेश दिया। मन अपना कार्य करता है वह अहंकार रहित हो कुमार्गगामी न बनें, उसको कर्म में लगाने का उपाय है कि वह सात्विक-कर्मों में लगाया जाए। इससे वृत्तियां शुद्ध बनी रहती है। शुद्ध-वृत्ति, सात्विक-कर्म माया को विच्छिन्न कर भगवान के निकट लाते हैं। भगवान राम ने भक्त सेवक लक्ष्मण के सन्मुख ज्ञान का अक्षुण्ण भण्डार लाकर उपस्थित कर दिया।

ये तीन कारण थे जिनके कारण कृष्ण ने बचाई थी द्रोपदी की लाज

परम मोह त्यागी श्रीकृष्ण आत्मा है जो शरीरस्थ होते हुए भी असंग है। मन, अर्जुन है जो शरीर रथ में रथी है। हम द्रौपदी को मन द्वारा विजित चित्त वृत्ति मानते हुए भगवान श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित तत्व मानते हुए महाभारत की सूत्रधार मान लें। द्रौपदी को दुर्योधन, कर्ण, शल्य आदि राजा जीतना चाहते थे। उनकी असफलता, विद्वेष ने पग-पग पर द्रौपदी को लज्जित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

धु्रपद तथा उनके चचेरे भाइयों की पांच पुत्रियों का जिनके पृथक-पृथक नाम थे तथा जिन सभी को द्रौपदी भी कहा जाता था, पांचों पाण्डवों के साथ विवाह हुआ था, जैसे-राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ जनक और उनके भाइयों की पुत्रियों सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रतुकीर्ति का विवाह हुआ था किन्तु अर्जुन के साथ विवाहित भव्या को ही प्रमुख द्रौपदी कहा जाता था।

अन्य कन्याएं महत्वपूर्ण भूमिका न होने के कारण चर्चित न हो सकी। संत परंपरा के अनुसार उनके नाम इस प्रकार हैं-भौम्या, मणिका, भव्या, सुललिता, सुरम्या च ता:, द्रौपदीपदाख्यात: पंचैत: हि सुकन्य कां।

कुन्ती विवेकपूर्ण थीं तथा धर्म के तत्व को जानती थीं। बहुपतिवाद सभ्य समाज में प्रचलित नहीं था। द्रौपदी का पंचपति का होना न व्यावहारिक है और न उसके तथा पाण्डवों के अनुरूप ही। वाममार्गियों द्वारा प्रक्षिप्त धर्म प्रतिकुल अंशों को स्वीकार करने के बजाए परवर्ती विद्वानों ने महाभारत तथा पुराणों में वरदानों, शापों पर आधारित पुनर्जन्म की कथाओं को जोड़कर उनको समाधान करने का विफल प्रयास किया। संत परम्परा का आदर करते हुए भगवान श्रीकृष्ण को धर्म संस्थापना के लिए अवतार ग्रहण करना पड़ा। महाभारत युग में धर्म-कर्म रूप विकृत हो चुका था।

महाभारत की कथा में द्रौपदी को जुंए में हारना, उसका वस्त्र हरण करके लज्जित करना, पांचों पाण्डवों को कील्व की भांति निहारते रहना, युद्ध भूमि के पूर्व वचनबद्धता, जुंए के कारण 12 वर्ष वन-वन भटकना, एक वर्ष अज्ञात रहना, कथा को अत्यंत रोचक बनाने की दृष्टि से ग्रंथकार महर्षि वेदव्यास ने सम्पूर्ण दर्शन (पुराण, उपनिषद, वेद) को एक सूत्र में गूंथ दिया। प्रकरण में भीम की प्रतिज्ञा, दु:शासन की भुजा उखाडऩा, उसके हृदय को चीर रक्त से द्रौपदी के केश धोना, दुर्योधन की जंघा (गदा युद्ध के विरुद्ध), रात्रि में सोते हुए अस्वत्थामा के द्वारा पाण्डवों के पांचों पुत्रों को पाण्डव समझकर मारना। अर्जुन-अस्वत्थामा के युद्ध में ब्रम्हास्त्र का प्रयोग कर अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में मारने का प्रयास और श्रीकृष्ण का अपने योग/आध्यात्मिक ईश्वरीय शक्ति का प्रयोग कर परीक्षित की रक्षा करना-कथा के मार्मिक व रोचक प्रसंग हैं। रोचक तथा शिक्षाप्रद प्रसंगों में कर्म-योग की धारा प्रवाहित करके महर्षि वेदव्यास ने एक अद्वितीय ग्रंथ मानव समाज को आशीर्वाद स्वरूप प्रदान किया है।कथा प्रसंग में दुर्योधन तथा उसके साथियों का द्वेषपूर्ण अभद्र व्यवहार जिसमें छल भी था।

द्रौपदी की करूण पुकार-हे गोविंद! हे द्वारकावासी! हे सच्चिदानंद स्वरूप प्रेमघन! हे गोपी वल्लभ! हे सर्वशक्तिमान प्रभो! कौरव मुझे अपमानित कर रहे हैं, क्या यह बात आपको मालूम नहीं है। हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे अर्तिनाषन जनार्दन! मैं कौरवों के समुद्र में डूब रही हूं, मेरी रक्षा कीजिए। हे श्रीकृष्ण! आप सच्चिदानंद स्वरूप महायोगी हैं। आप सर्वस्वरूप एवं सबके जीवनदाता हैं। हे गोविंद! मैं कौरवों से घिरकर बड़े संकट में पड़ गई हूं। आपकी शरण में हूं। आप मेरी रक्षा कीजिए। इस पुकार में पूर्ण समर्पण है।

गोपीजन वल्लभ अर्थात् इन्द्रियों को जीतने वाले योगियों के प्रिय हैं। द्रौपदी ने पाण्डवों की वनवास अवधि में श्रीकृष्ण को रक्षा के लिए कारण गिनाए। एक तो तुम मेरे संबंधी हो, दूसरे अग्निकुंड से उत्पन्न होने के कारण गौरवशाली हूं, तीसरे तुम्हारी सच्ची प्रेमिका हूं और तुम मेरी रक्षा करने में समर्थ हो। जीव की पुकार प्रतीत होती है।

वही लोग समझदार होते हैं जो इस राज को जानते हैं!
महाभारत के सम्पूर्ण पात्रों में केवल अर्जुन ही निकटतम और प्रिय सखा हैं, उन्हें दिए गए उपदेश सर्वदेशीय, सर्वकालीन और सर्वजनीय अद्वितीय हैं। इनका अवलोकन ही कर्मपथ में दिशा बोध कराता है। इसे समर्पण युक्त प्रेम मार्ग की संज्ञा देना उचित प्रतीत होता है। सम्पूर्ण कर्मों का समर्पण या कर्म फलों का समर्पण और अपने ईश्वर के प्रति अनन्य भाव पथ के दोनों छोर हैं, जिनके बीच जीवन का रथ चलता हुआ अबाध गति से अपने गंतव्य (मोक्ष या भगवत् प्राप्ति) तक पहुंचे, वे ही कर्म करते जाएं। इन कर्मों को करते हुए ही महात्मा, महर्र्षि, भक्त, योगी प्रभृति पार लगते गए। सवाल है क्या करें-''किं कर्म किम कर्मेति क्वयोऽव्यय मोहित:, तत्ते कर्म प्रवस्यामि यंज्ञात्वा मोक्षसेऽषुमात।।

कर्म क्या है? अकर्म क्या है? श्रीकृष्ण बताते हैं इस विषय को समझने में समझदार लोग भी मोह में पड़े हैं। कर्म निषिद्ध कर्म और अकर्म का भेद जानना चाहिए। कर्म की गति गूढ़ है। कर्म में जो अकर्म देखता है और अकर्म में जो कर्म देखता है, वह लोगों में बुद्धिमान गिना जाता है। वह योगी है, सम्पूर्ण कर्म करने वाला है। महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग में इस प्रसंग की व्याख्या इस प्रकार की है-कर्म करते हुए भी कर्ता का अभिमान नहीं रखता उसका कर्म अकर्म है और जो बाहर से कर्म का त्याग करते हुए मन के महल बनाता रहता है उसका अकर्म कर्म है। जिसे लकवा हो गया है, वह जब इरादा करके अभिमानपूर्वक बेकार हुए अंग को हिलाता है तब वह गुण अकर्ता का है जो मोहग्रस्त होकर अपने को कर्ता मानता है। उस आत्मा को माने लकवा हो गया है और वह अभिमानी होकर कर्म करता है।

इस भांति जो कर्म की गति को जानता है वह बुद्धिमान योगी, कर्तव्य परायण गिना जाता है। मैं करता हूं मानने वाला कर्म-विकर्म का भेद भूल जाता है और साधन के भले बुरे का विचार नहीं करता। आत्मा की स्वाभाविक गति उदर्व है। इसलिए जब मनुष्य नीति मार्ग से हटता है तब उसमें अहंकार अवश्य है, कहा जा सकता है। अभिमान रहित मनुष्य के कर्म स्वभाव से सात्विक होते हैं। विहित कर्म अर्थात करने योग्य कर्म का निर्णय अभिमान रहित होकर किया जा सकता है। फल की इच्छा छोड़कर कर्म किया जाता है तो कर्म अकर्म हो जाता है। निशिद्ध कर्म (असत्य, कपट, हिंसा या अनुचित कर्म विकर्म) है। भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट मत रहा कि कर्म का स्वरूपत: छोडऩा नहीं है। गीता-315 संतश्री विनोबाभावे ने गीता प्रवचन में कहा है कि हमारा खाना, पीना, सोना ये कर्म ही हैं, परन्तु गीता का कर्म स्वधर्माचरण है। कर्म, विकर्म और अकर्म तीनों शब्द महत्व के हैं। कर्म का अर्थ है स्वधर्माचरण बाहरी स्थूल क्रिया- इस बाहरी क्रिया में चित्त को लगाना विकर्म है। यहां परमार्थ की दृष्टि से कर्म जग-प्रपंच के कर्म तथा अकर्म का अर्थ ब्रम्ह अथवा आत्मतत्व भी किया जाना शक्य है। कोई कर्म किया जाए आसक्ति रहित यदि नहीं है तो प्रत्येक कर्म कर्मण बध्यते जन्तु: कर्म से मनुष्य बंधन में पड़ जाता है।


हर काम में आपकी जीत तभी संभव है जब....
पाण्डव व उनके पक्ष के लोग अर्जुन के पीछे थे। सब लोगों में परम योगी भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र ऐसे परमपुरुष थे जिनकी मन:स्थिति एकदम सम्यक थी। साम्य मन:स्थिति में ही मनुष्य व स्वस्थ चिन्तन की धारा गीत बनकर प्रवाहित होती है।

गीता-अर्थात गाई गई, भगवान ने तन्मय हो तत्वदर्षन को गाकर अर्जुन को सुनाया-नरदेह में अर्जुन मन संयुक्त चित्त है, आत्मा परमपिता परमात्मा श्रीकृष्ण हैं। जीवन प्राणवायु प्रदत्त रथ है, जिस पर पवनपुत्र विराजमान हैं। नित्य प्रतिफल दैवी और आसुरी वृत्तियां आमने-सामने हो युद्धरत हैं। दैवी वृत्तियों को विजयी होना है। कर्मपथ का अंतिम लक्ष्य है मुक्त होना। ऐसे रथ का वर्णन रामायण में भगवान श्रीराम ने किया।

रामरथ के वर्णन में सम्पूर्ण गीता के उपदेश समाये दिखते हैं। विवेचन करें-साधक का मन बुद्धि, चित्त स्थिर होना चाहिए। उसकी स्थिति स्थित: प्रज्ञ ही हो, फिर शक्ति कर्म करती है और स्वयं भगवान कृष्ण ईश-भजन के रूप में विराजमान हैं यम-नियमों को पालकर साधक शुद्ध हो गुरुपूजन ज्ञानाग्नि में संचित कर्मों को भस्म करते हुए नए कर्मों के संस्कार न निर्मित होने दे तब ही विजय सफलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती है।

आगे देवता कहते हैं। वामनावतार में दैत्यराज बलि की दी हुई पृथ्वी को नापने के लिए जब आपने अपना पग उठाया था और वह सत्यलोक में पहुंच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो। ब्रम्हाजी के पखारने के बाद उससे गिरती हुई। गंगाजी के जल की तीन धाराएं ऐसी जान पड़ती थीं मानो उसमें लगी हुई तीन पताकाएं फहरा रही हों। उसे देखकर असुरों की सेना भयभीत हो गई थी और देवसेना निर्भय।

आप इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं। क्योंकि शास्त्रों ने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्त्त्व के भी नियंत्रण करने वाले काल हैं। पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता है और फिर माया के साथ संयुक्त होकर विश्व के महत्तत्वरूप गर्भ का स्थापन करता है। इसके बाद वह महत्त्त्व त्रिगुणमयी माया का अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और मनरूप सात आवरणों वाले इस सुवर्णवर्ण ब्रम्हाण्ड की रचना करता है।ब्रम्हाजी ने कहा- हे प्रभो! पहले हम लोगों ने आपसे अवतार लेकर पृथ्वी का भार उतारने के लिए प्रार्थना की थी। वह काम आपने हमारी प्रार्थना के अनुसार पूरा कर दिया। आपने स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओं में कीर्ति फैला दी।

बस ये बात समझ लें तो जिंदगी में सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा
जब भगवान ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब यदुवंशियों ने एक मत से प्रभास जाने का निष्चय कर लिया। उद्धवजी भगवान श्रीकृष्ण के बड़े प्रेमी और सेवक थे। उन्होंने जब यदुवंशियों को यात्रा की तैयारी करते देखा, भगवान की आज्ञा सुनी और अत्यंत घोर अपशकुन देखे, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास गए, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगे।

सज्जनों और देवियों भागवत का यह प्रसंग पढ़कर हम इतना समझ लें कि हर बात की अपनी उम्र होती है। वंश और कुल की आयु रहती है। श्रीकृष्ण ने लालन-पालन में क्या कमी रखी थी, फिर भी उनकी संतानें आचरण से चूक गई। हर नई पीढ़ी में उत्थान और पतन की संभावना बनी ही रहती है, जिसका सामना सबको करना पड़ता है।

उद्धवजी भगवान के बहुत निकट थे। जबसे श्रीकृष्ण मथुरा आए थे तब से उद्धव उनके साथ थे। भगवान भी उन पर बहुत भरोसा रखते थे। हर सुख-दु:ख में दोनों एक-दूसरे के साथ रहे थे।

उद्धवजी ने कहा- हे भगवन! आप देवाधिदेवों के प्रमुख हैं। आप सर्वशक्तिमान परमेष्वर हैं। आप चाहते तो ब्राम्हणों के शाप को मिटा सकते थे, परन्तु आपने वैसा किया नहीं। इससे मैं यह समझ गया कि अब आप यदुवंश का संहार करके, इसे समेट कर अवश्य ही इस लोक का परित्याग कर देंगे। परन्तु मैं आधे क्षण के लिए भी आपके त्याग की बात सोच भी नहीं सकता। आप मुझे भी अपने धाम में ले चलिए। हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया, कहां तक गिनावें। हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही।

हमने आपकी धारण की हुई माला पहनी, आपके लगाए हुए चन्दन लगाए, आपके उतारे हुए वस्त्र पहने और आपके धारण किए हुए गहनों से अपने-आपको सजाते रहे। हम आपकी जूठन खाने वाले सेवक हैं। आप हमें छोडिय़े नहीं, साथ ले चलिये।परीक्षित से शुकदेव बोले तब भगवान श्रीकष्ण ने कहा- उद्धव! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं वही करना चाहता हूं। पृथ्वी पर देवताओं का जितना काम करना था, उसे मैं पूरा कर चुका। अब यह यदुवंश जो ब्राम्हणों के शाप से भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्ध से नष्ट हो जाएगा।

उस परिवार में नहीं होता कलह जहां....
गुरु शिष्य के लक्षणों के वर्णन से अनेक ग्रन्थ भरे पड़े हैं। इन लक्षणों को हम यहां सार रूप में लेने का प्रयत्न करते हैं ताकि परस्पर साधन से शक्ति सम्पन्न हो निर्लिप्तता की ओर बढ़ा जा सके। लिप्त स्थिति में तुलसीदासजी की यह चौपाई स्मरण हो आती है- ''भूमि परत भा डाबर पानी, जिमि जीवहिं माया लपटानी।भूमि पर पानी गिरता है-मिट्टी मिश्रित हो एममेक हो जाता है। मिट्टी कैसे छनकर नीचे बैठ जाए और स्वच्छ जल पीने योग्य हो जाए? हम निर्लिप्त स्थिति इसे ही कह सकते हैं। यह व्यक्ति के आध्यात्मिक व्यक्तित्व का परिछालन माना जा सकता है।

शिष्य यम, नियम को पालन करने वाले हों। शुद्ध मन वाले अर्थात् निष्कपट हों, श्रद्धा-भक्ति युक्त हों। विचारपूर्वक कर्म करने वाला, उदारचित्त गंभीर हों। अल्प भोजन करने वाला मिताहारी हो। दक्ष, निराभिमानी तथा निष्काम सेवा करने वाला। कृतज्ञ, पापकर्मों से भय मानने वाला, सबका हित साधन करने वाला तथा अपने क्रियाकलापों में प्रमाद रहित संलग्न हो। आनन्द प्रद सत्य भाशण करने वाला, सुसंतुष्ट, रोग रहित, संशय मुक्त, गुरु कार्य में प्रसन्नतापूर्वक रत, ईश-शक्ति परायण हो और जो जप, तप, ध्यान में लगा रहता हो, शिष्य बनने या बनाए जाने के योग्य होता है।

इसके विपरीत दीक्षा गुरु और शिष्य दोनों के लिए फलहीन होती है।यदि गुरु को बाधाओं से गुजरना पड़ता है तो बनाया गया या बने हुए शिष्य को भी अपने कर्मों का पाप लगता है। सावधानीपूर्वक श्ष्यि को भीतर-बाहर से पवित्र रहते हुए दीक्षा या शिष्यत्व स्वीकार करने की कामना करना चाहिए।

उद्धव समझ गए कि आज अवसर है उपदेश को आत्मसात करने का। भगवान कह रहे हैं-उद्धव! तुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथ में ले लो और केवल इन्द्रियों को ही नहीं, चित्त की समस्त वृत्तियों को भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपनी आत्मा में ही फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रम्ह से एक है, अभिन्न है।

भगवान की बातें सुनकर उद्धवजी तत्वज्ञान के प्रष्न पूछने को तत्पर हो गए। यूं तो हमेशा इन लोगों में गहरी चर्चाएं होती रहती थीं, परन्तु आज अवसर अलग ही था।हम इस प्रसंग से एक बात सीखें। परिवार में आपस में वार्तालाप आध्यात्मिक स्तर पर होते रहने चाहिए। हम लोग परिवार के सदस्य ज्यादातर मौकों पर सांसारिक चर्चा करते हैं। इसी कारण आपस में क्लेश, निंदा के अवसर ज्यादा हो जाते हैं।

सिर्फ इस छोटे से बदलाव से बदल जाएगा भविष्य
हमें प्रसंगों से ही शिक्षा लेनी चाहिए। कई छोटे-छोटे प्रसंग जीवन भर के लिए अमूल्य शिक्षा दे देते हैं। प्रसंगों से सीख लेने के लिए कई लोग महापुरुषों के जीवन ग्रंथ खंगाल डालते हैं लेकिन उन्हें वह नहीं मिलता। जीवन के प्रति सजग-सतर्क रहिए। दैनंदिनी की घटनाएं ही हमको कई बातें सिखा देती हैं। जर्मनी की एक कथा बहुत मशहूर है जो जीवन की छोटी घटनाओं के सबक के लिए आज भी याद की जाती है। ऐसा कहते हैं कि जर्मनी के कुछ दर्शक पहले तक चोरी करना बहुत बड़ा अपराध था और छोटी सी चोरी को भी बहुत बड़ी सजा मिलती थी। एक बेघर भूखे बच्चे ने डबल रोटी का एक टूकड़ा चुरा लिया। दुर्भाग्य से वह चोरी करते पकड़ा गया और पुलिस ने उसे जेल में डाल दिया। कुछ सालों बाद जब वह जेल से छूटा तो बदल चुका था लेकिन पुलिस उस पर हमेशा निगाह रखती थी। नौकरी नहीं मिली, भूखे मरने की नौबत आ गई तो युवक ने फिर अपराध की राह पकड़ ली। एक चर्च में चोरी की, बुरी किस्मत थी सो फिर पकड़ा गया लेकिन इस बार एक पादरी ने उसे यह कह कर बचा लिया कि जो मूर्तियां इसके पास हैं वे मैंने इसे भेंट की हैं, इसने चुराई नहीं। पुलिस पादरी की बात को मानते हुए युवक को छोड़ देती है। लेकिन एक पुलिस इंस्पेक्टर उस पर फिर भी शक ही करता रहा। लगातार पीछा करता। युवक उससे कहता था कि मैं चोर नहीं हूं लेकिन इंस्पेक्टर मानने को तैयार नहीं था। युवक ने वह शहर ही छोड़ दिया। दूसरे शहर जाकर्र मानदारी से काम करने लगा।

कई साल बीत गए। वो इंस्पेक्टर फिर भी उस युवक को खोजता रहा। एक दिन आखिरकार उसने उसे ढूंढ ही लिया। युवक अब शहर का एक नामी व्यापारी था। कई अस्पताल, धर्मशालाएं और अनाथाश्रम चलाता था। उस दिन उसी युवक का सम्मान समारोह था, इंस्पेक्टर ने सोचा यही बढिय़ा मौका है इस युवक का राज खोलने का। उसे भरे समारोह में बेनकाब करने का। इंस्पेक्टर उस जगह पहुंचा जहां उस युवक का सम्मान हो रहा था। जाते ही उसने युवक को पकड़ा और कहा- चोर आखिर मैंने तुम्हें पकड़ ही लिया। इंस्पेक्टर ने इतना ही कहा कि लोगों ने इंस्पेक्टर को घेर लिया। कहने लगे ये चोर नहीं है। यह तो शहर का सबसे बड़ा धर्मात्मा है। कई लोगों की जिंदगी इसी से पल रही है। इंस्पेक्टर चुप था।

लोगों का विरोध हुआ तो वह उसे छोड़कर चला गया। लेकिन अब भी वह मानने को तैयार नहीं था कि वह युवक चोर नहीं है।अकेले में बैठे-बैठे उसे अचानक ख्याल आया कि जो युवक कुछ सालों पहले तक एक मामूली चोर था अब वह एक धर्मात्मा माना जाने वाला इन्सान हो गया है। इतने सालों में उसने कितना बड़ा परिवर्तन खुद के भीतर कर लिया लेकिन मैं अब भी वैसा ही हूं। मैंने कभी खुद को नहीं बदला, ना मेरी सोच ही बदली। मैं पहले भी उसे चोर समझता था और अब भी उसे चोर ही समझता हूं। बस यह बात उसके दिल में घर कर गई। अपनी ही जिंदगी को उसने जब टटोल कर देखा तो उसे कई कमियां नजर आईं। उसे खुद से ग्लानि होने लगी। वह आदमी सभी चीजों से विरक्त हो गया। साधु जैसा जीवन जीने लगा। यह कहानी हमें बताती है कि अपनी ही जिंदगी से हम कितना कुछ सीख सकते हैं।

इस आइने को साफ कर लें सब अपने आप ठीक हो जाएगा
पहले आइना साफ करना होगा, मन निर्मल बनाना होगा। ''कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पीछे-पीछे हरि फिरे कहत कबीर-कबीर।। तब शान्ताकारं की छवि दिखाई देगी। मन की निर्मलता के लिए योग- तात्पर्य यह है कि वृत्तियों को दिषा-भ्रम से रोकें, अभ्यास करें और इसी क्षण से श्रीगणेश करें, क्योंकि दूसरे क्षण का कुछ पता नहीं।

आपने मेरे परम कल्याण के लिए उस संन्यास रूप त्याग का उपदेश किया है। परन्तु अनन्त! जो लोग विषयों के चिंतन और सेवन में घुलमिल गए हैं, विषयात्मा हो गए हैं, उनके लिए विशय भोगों और कामनाओं का त्याग अत्यंत कठिन है। यह मैं हूं, यह मेरा है, इस भाव से मैं आपकी माया के खेल, देह और देह के संबंधी स्त्री, पुत्र, धन आदि में डूब रहा हूं। अत: भगवन! आपने जिस संन्यास का उपदेष किया है, उसका तत्व मुझ सेवक को इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूं। इसलिए आप मुझे उपदेश दीजिए।

भगवान ने कहा- उद्धव! संसार में जो मनुष्य 'यह जगत क्या है? इसमें क्या हो रहा है? इत्यादि बातों का विचार करने में निपुण है, वे चित्त में भरी हुई अशुभ वासनाओं से अपने आपको स्वयं अपनी विवेक शक्ति से ही प्राय: बचा लेते हैं।

मैंने एक पैर वाले, दो पैर वाले, तीन पैर वाले, चार पैर वाले, चार से अधिक पैर वाले और बिना पैर के इत्यादि अनेक प्रकार के शरीरों का निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्य का ही शरीर है। इस विशय में महात्मा लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदु के संवाद के रूप में है।

राजा यदु ने अवधूतजी से पूछा- ब्रम्हन! आप कर्म तो करते नहीं, फिर आपको यह अत्यंत निपुण बुद्धि कहां से प्राप्त हुई? संसार के अधिकांश लोग काम और लोभ के दावानल से जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आप तक उसकी आंच भी नहीं पहुंच पाती।

हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मा में ही ऐसे अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव कैसे होता है? आप कृपा करके अवश्य बतलाइए। भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा-हमारे पूर्वज महाराज यदु की बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदय में ब्राम्हण भक्ति थी। उन्होंने परम भाग्यवान दत्तात्रेयजी का अत्यंत सत्कार करके यह प्रश्न पूछा था।राजा यदु और दत्तात्रेय का संवाद भागवत का चर्चित प्रसंग है। अपने गुरुओं पर अलग ही ढंग से व्याख्या की है। आइये पहले 24 गुरुओं को संक्षेप में जान लें, फिर विस्तार से समझेंगे। दत्तात्रेय के जीवन से सीखें कि हमें गुरु कभी भी, कहीं भी मिल सकते हैं। बस हमारा नजरिया होना चाहिए।

कृष्ण की द्वारका में भी होने लगे बड़े-बड़े अपशकुन जब...
पाण्डव व उनके पक्ष के लोग अर्जुन के पीछे थे। सब लोगों में परम योगी भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र ऐसे परमपुरुष थे जिनकी मन:स्थिति एकदम सम्यक थी। साम्य मन:स्थिति में ही मनुष्य व स्वस्थ चिन्तन की धारा गीत बनकर प्रवाहित होती है।

गीता अर्थात गाई गईए भगवान ने तन्मय हो तत्वदर्शन को गाकर अर्जुन को सुनाया। नरदेह में अर्जुन मन संयुक्त चित्त है, आत्मा परमपिता परमात्मा श्रीकृष्ण हैं। जीवन प्राणवायु प्रदत्त रथ है, जिस पर पवनपुत्र विराजमान हैं। नित्य प्रतिफल दैवी और आसुरी वृत्तियां आमने-सामने हो युद्धरत हैं। दैवी वृत्तियों को विजयी होना है। कर्मपथ का अंतिम लक्ष्य है मुक्त होना। ऐसे रथ का वर्णन रामायण में भगवान श्रीराम ने किया।

रामरथ के वर्णन में सम्पूर्ण गीता के उपदेश समाए दिखते हैं। विवेचन करें।साधक का मन बुद्धि। चित्त स्थिर होना चाहिए। उसकी स्थिति स्थित: प्रज्ञ ही हो। फिर शक्ति कर्म करती है और स्वयं भगवान कृष्ण ईश भजन के रूप में विराजमान हैं यम-नियमों को पालकर साधक शुद्ध हो गुरुपूजन ज्ञानाग्नि में संचित कर्मों को भस्म करते हुए नए कर्मों के संस्कार न निर्मित होने दे तब ही विजय सफलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती है।

आगे देवता कहते हैं। वामनावतार में दैत्यराज बलि की दी हुई पृथ्वी को नापने के लिए जब आपने अपना पग उठाया था और वह सत्यलोक में पहुंच गया था, तब यह ऐसा जान पड़ता थाए मानो कोई बहुत बड़ा विजयध्वज हो। ब्रम्हाजी के पखारने के बाद उससे गिरती के जल की तीन धाराएं ऐसी जान पड़ती थीं मानो उसमें लगी हुई तीन पताकाएं फहरा रही हों। उसे देखकर असुरों की सेना भयभीत हो गई थी और देवसेना निर्भय।

आप इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं। क्योंकि शास्त्रों ने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्व के भी नियंत्रण करने वाले काल हैं। पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता है और फिर माया के साथ संयुक्त होकर विश्व के महत्तत्वरूप गर्भ का स्थापन करता है। इसके बाद वह महत्तत्व त्रिगुणमयी माया का अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और मनरूप सात आवरणों वाले इस सुवर्णवर्ण ब्रम्हाण्ड की रचना करता है।

ब्रम्हाजी ने कहा। हे प्रभो! पहले हम लोगों ने आपसे अवतार लेकर पृथ्वी का भार उतारने के लिए प्रार्थना की थी। वह काम आपने हमारी प्रार्थना के अनुसार पूरा कर दिया। आपने स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओं में कीर्ति फैला दी।

आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किए एक सौ पच्चीस वर्ष बीत गए हैं। ऐसा कोई काम नहीं है जिसे पूर्ण करने के लिए आपको यहां रहने की आवश्यकता हो। ब्राम्हणों के शाप के कारण आपका यह यदुकुल भी एक प्रकार से नष्ट हो ही चुका है। इसलिए अपने परमधाम में पधारिए।

भगवान अब यहां भी लीला बता रहे हैं।
श्रीकृष्ण बोले ब्रम्हाजी! आप जैसा कहते हैं, मैं पहले से ही वैसा निष्चय कर चुका हूं। मैंने आप लोगों का सब काम पूरा करके पृथ्वी का भार उतार दिया। परन्तु अभी एक काम बाकी है वह यह कि यदुवंशी बल। विक्रम, वीरता, शूरता और धन-सम्पत्ति से उन्मत्त हो रहे हैं। ये सारी पृथ्वी को निगलने पर तुले हुए हैं। यदि मैं उच्छल यदुवंशियों का यह विशाल वंश नष्ट किए बिना ही चला जाऊंगा तो ये सब मर्यादा का उल्लंघन करके सारे लोकों का संहार कर डालेंगे।जब श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा, तब ब्रम्हाजी ने उन्हें प्रणाम किया और देवताओं के साथ वे अपने धाम को चले गए। उनके जाते ही द्वारकापुरी में बड़े-बड़े अपशकुन बड़े उत्पात उठ खड़े हुए। यदुवंश के वृद्धजन श्रीकृष्ण के पास आए।

हमेशा सुखी रहना चाहते है तो ये बात जरूर याद रखें
जब भगवान ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब यदुवंशियों ने एक मत से प्रभास जाने का निश्चय कर लिया। उद्धवजी भगवान श्रीकृष्ण के बड़े प्रेमी और सेवक थे। उन्होंने जब यदुवंशियों को यात्रा की तैयारी करते देखा, भगवान की आज्ञा सुनी और अत्यंत घोर अपशकुन देखे, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास गए, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगे।

सज्जनों और देवियों भागवत का यह प्रसंग पढ़कर हम इतना समझ लें कि हर बात की अपनी उम्र होती है। वंश और कुल की आयु रहती है। श्रीकृष्ण ने लालन-पालन में क्या कमी रखी थी, फिर भी उनकी संतानें आचरण से चूक गई। हर नई पीढ़ी में उत्थान और पतन की संभावना बनी ही रहती है, जिसका सामना सबको करना पड़ता है। सुख और दुख उतार-चढ़ाव ये सभी के जीवन में आते हैं और जो ये बात याद रखता है वह जीवन में हमेशा सुखी रहता है।

उद्धवजी भगवान के बहुत निकट थे। जब से श्रीकृष्ण मथुरा आए थे तब से उद्धव उनके साथ थे। भगवान भी उन पर बहुत भरोसा रखते थे। हर सुख-दु:ख में दोनों एक-दूसरे के साथ रहे थे।उद्धवजी ने कहा- हे भगवन! आप देवाधिदेवों के प्रमुख हैं। आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। आप चाहते तो ब्राम्हणों के शाप को मिटा सकते थे, परन्तु आपने वैसा किया नहीं। इससे मैं यह समझ गया कि अब आप यदुवंश का संहार करके, इसे समेट कर अवश्य ही इस लोक का परित्याग कर देंगे। परन्तु मैं आधे क्षण के लिए भी आपके त्याग की बात सोच भी नहीं सकता। आप मुझे भी अपने धाम में ले चलिए। हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया, कहां तक गिनावें। हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही।

हमने आपकी धारण की हुई माला पहनी, आपके लगाए हुए चन्दन लगाए, आपके उतारे हुए वस्त्र पहने और आपके धारण किए हुए गहनों से अपने-आपको सजाते रहे। हम आपक

जूठन खाने वाले सेवक हैं। आप हमें छोडिय़े नहीं, साथ ले चलिये। परीक्षित से शुकदेव बोले तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- उद्धव! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं वही करना चाहता हूं। पृथ्वी पर देवताओं का जितना काम करना था, उसे मैं पूरा कर चुका। अब यह यदुवंश जो ब्राम्हणों के शाप से भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्ध से नष्ट हो जाएगा। आज से सातवें दिन समुद्र इस पुरी-द्वारका को डुबो देगा। प्रिय उद्धव! थोड़े ही दिनों में पृथ्वी पर कलियुग का बोलबाला हो जाएगा। जब मैं इस पृथ्वी का त्याग कर दूं, तब तुम इस पर मत रहना। अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवों का स्नेह-संबंध छोड़ दो और अनन्य प्रेम से मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टि से पृथ्वी में स्वच्छंद विचरण करो।

तो इसलिए साधु ने बना लिया वैश्या को गुरु
कई बार हमारे स्तर से छोटे भी हमारे गुरु बन जाते हैं। एक बड़े पहुंचे सिद्ध संत थे। दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैली हुई थी। लोग उन्हें गुरु बनाने, ज्ञान लेने दूर-दूर से आते थे। एक बार, एक वेश्या भी आई। उसने संत से अकेले में मिलने की प्रार्थना की तो संत ने लोकापवाद के डर से मना कर दिया। वेश्या को खाली हाथ लौटना पड़ा। वह फिर गई, संत ने दूसरी बार, फिर तीसरी बार, चौथी बार, इस तरह उसे बार-बार लौटाते रहे। वेष्या ने भी आना बंद नहीं किया। वह नित्य नियम से आती और अकेले में मिलने की प्रार्थना करती। बहुत दिनों तक यह क्रम चलता रहा। एक दिन संत झल्ला गए। गुस्से में आकर उन्होंने वेष्या से कह दिया कि तू अधर्म का कार्य करने वाली तू क्या जाने धर्म क्या होता है? तू वेश्या है, मैं तुझसे अकेले में मिलूंगा तो लोग मेरे ही पास आना बंद कर देंगे। वेश्या बोली मैं तो आपको गुरु बनाना चाहती हूं, इसलिए आपके पास आना चाहती हूं। संत ने कहा- मैं एक वेश्या को अपनी शिष्य नहीं बना सकता। वेश्या ने कहा कोई बात नहीं, आप न बनाएं। मैं तो आपको अकेले में इसलिए बुला रही थी कि शिष्या बनने पर मुझे आपको गुरुदक्षिणा देनी होगी। मेरी पाप की कमाई तो आप लेंगे नहीं लेकिन मेरे पिताजी एक मजदूर थे और मैं भी उनके साथ मजदूरी करने जाती थी। वहां हमारे मालिक ने मेरी मेहनत से खुष होकर मुझे एक रुपया दिया था।

एक बार, एक वैश्या भी आई। उसने संत से अकेले में मिलने की प्रार्थना की तो संत ने लोकापवाद के डर से मना कर दिया। वेश्या को खाली हाथ लौटना पड़ा। वह फिर गई, संत ने दूसरी बार, फिर तीसरी बार, चौथी बार, इस तरह उसे बार-बार लौटाते रहे। वेश्या ने भी आना बंद नहीं किया। वह नित्य नियम से आती और अकेले में मिलने की प्रार्थना करती। बहुत दिनों तक यह क्रम चलता रहा। एक दिन संत झल्ला गए। गुस्से में आकर उन्होंने वेश्या से कह दिया कि तू अधर्म का कार्य करने वाली तू क्या जाने धर्म क्या होता है? तू वेश्या है, मैं तुझसे अकेले में मिलूंगा तो लोग मेरे ही पास आना बंद कर देंगे। वेश्या बोली मैं तो आपको गुरु बनाना चाहती हूं, इसलिए आपके पास आना चाहती हूं। संत ने कहा- मैं एक वेश्या को अपनी शिष्य नहीं बना सकता। वेश्या ने कहा कोई बात नहीं, आप न बनाएं। मैं तो आपको अकेले में इसलिए बुला रही थी कि शिष्या बनने पर मुझे आपको गुरुदक्षिणा देनी होगी। मेरी पाप की कमाई तो आप लेंगे नहीं लेकिन मेरे पिताजी एक मजदूर थे और मैं भी उनके साथ मजदूरी करने जाती थी। वहां हमारे मालिक ने मेरी मेहनत से खुश होकर मुझे एक रुपया दिया था। यह मेरी खरी कमाई है।

बस, यही एक रुपया आपको अर्पण करने आई थी। आपके कई भक्त लाखों का दान कर रहे हैं, उस बीच यह एक रुपया देने में मुझे लज्जा आ रही थी। वेश्या की बात सुन वह संत अवाक रह गया। वेश्या का धैर्य और धर्म के प्रति उसका सम्मान देखकर वे दंग रह गए। वेश्या उन्हें गुरु बनाने आई थी लेकिन संत ने उसे अपना गुरु बना लिया। संत ने कहा- तेरा धैर्य सबसे श्रेष्ठ है। मैं तुझे लौटाते-लौटाते थक गया, गुस्सा हो गया लेकिन तेरा धैर्य नहीं टूटा।

सूर्य पूजा दे सकती है आपको इतने रोगों से मुक्ति
अग्नि में तप का संदेश है। तपस्वी भक्त साधन करते-करते ज्ञानी हो जाता है। भगवतीय शक्ति उस आराधक को सद्पथ पर ले जाती है और उसमें अभिमान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसक वृत्ति, क्षमा करने की वृत्ति, सरलता, गुरु का सम्मान आदि, उपासन, शौच अर्थात् बाह्माभ्यन्तर (अन्दर और बाहर भी) पवित्रता, चित्त की स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, जरा-व्याधि, जन्म-मृत्यु में दु:ख रूपी जीवन के दोष न देखना, आसक्ति न होना, संग दोष मुक्ति, इष्ट व अनिष्ट में चित्त का संतुलन, एकान्त सेवन भगवान में एकात्म अव्यभिचारिणी भक्ति आदि के लक्षण प्रकट हो जाते हैं।

आगे चन्द्रमा से यह शिक्षा ग्रहण की है कि यद्यपि जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस काल के प्रभाव से चन्द्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती रहती हैं, तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है, वह न घटता है और न बढ़ता ही है, वैसे ही जन्म से लेकर मृम्युपर्यन्त जितनी भी अवस्थाएं हैं सब शरीर की हैं, आत्मा से उनका कोई भी संबंध नहीं है। राजन मैंने सूर्य से यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणों से पृथ्वी का जल खींचते और समय पर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियों के द्वारा समय पर विषयों का ग्रहण करता है और समय आने पर उनका त्याग-उनका दान भी कर देता है। किसी भी समय उसे इन्द्रिय के किसी भी विषय में आसक्ति नहीं होती।

संसार एक युद्धभूमि है। प्रतिक्षण युद्ध (संघर्ष) मन, आत्मा, चित्त का होता रहता है। सूर्य, प्रकाश, पुंज, शक्ति जाग्रत अवस्था में शत्रुओं (काम, क्रोध, त्याग, मोह, मत्सर आदि) पर विजयी प्राप्त करने के लिए अन्दर का तिमिर दूर करना होता है। गुरुकृपा से ज्ञान का सूर्य उदय होता है, मोह निशा का तिमिर दूर होता है। यह रहस्य इस स्त्रोत में निहित है, सूर्य के समान साधक को समभाव विकसित करने पर प्रकाश दिखाई देता है। थोड़ा भी पक्षभाव अंधकार की ओर खींचता है। सोना-मिट्टी में समभाव, शत्रु-मित्र में समभाव, हानि-लाभ में समभाव के लक्षण हैं जिसमें रवि के समान दृष्टि मिलती है।

श्रीमद्भागवत में भगवान भास्कर को कालरूपी कहा है। लोगों के व्यवहार को ठीक चलाने के लिए समय चक्र के अनुसार बारह मास (गणों) के साथ भ्रमण किया करते हैं। सूर्य के नामों का ज्योतिष और उपासना हेतु महत्व है। अप्सरा और सर्प बाधक सूचक लिए जा सकते हैं। ऋ षि, संत, गुरु रूप में माने जा सकते हैं। सूर्य नामानुसार संबंधित मास में अपना प्रभाव सात्विक, राजसिक और तामसिक रूप दिखाते हैं। ऋ षिरक्षा करते हैं, कामिनी कामनाएं उत्पन्न करती हैं। सर्प-स्वयं कालरूप ही है। सूर्य कालरूप है। वे प्रतिदिन, क्षतिपथ और प्रतिमास आयुक्षीण करते जाते हैं।सनातन धर्म में पंच महादेवों का वर्णन है-श्री गणेश, श्री सूर्य, श्री विष्णु, श्री शिवशंकर और श्री मां अम्बा। इनमें सूर्य प्रत्यक्ष महादेव है। इनकी आराधना सनातन धर्म में गायत्री मंत्र से भी की जाती है।

सूर्य देव का अगतस्य ऋषि द्वारा श्रीराम को दीक्षा में दिए मंत्र की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। पुराणों में सूर्य उपासना से अतिकष्टप्रद, कुष्ठ रोग, भय रोग के दूर होने का वर्णन पाया जाता है। पौराणिक कथा में ही सूर्यदेव रुद्र अवतार श्री हनुमानजी के गुरु स्वीकार किए गए हैं। हनुमानजी वायु पुत्र हैं। सूर्य गुरु, पवन पुत्र-शिष्य, सूर्यवंशी राम-हनुमानजी के स्वामी, चिन्तन की पर्याप्त विषय वस्तु प्रदान करते हैं। सूर्योपासना से तेज, बुद्धि, बल, सम्पत्ति तो मिलती है और अज्ञान के अंधकार को दूर कर मोक्षदायक ज्ञानियों में श्रेष्ठता भी मिलती है।

ऐसा प्रेम हो सकता है खतरनाक जब....
दत्तात्रेयजी कहते हैं स्नेह और आसक्ति की अति भी बुरी है। इसे समझाने के लिए उन्होंने एक कहानी सुनाई। जंगल में एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़ पर अपना घोंसला बना रखा था। अपनी मादा कबूतरी के साथ वह उसी घोंसले में रहता था। कबूतरी पर कबूतर का इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े से बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता। वह कबूतरी भी अपने कामुक पति की कामनाएं पूर्ण करती। समय आने पर उसने घोसले में अण्डे दिए। अब उन कबूतर-कबूतरी की आंखें अपने बच्चों पर लग गई। वे बड़े प्रेम और आनन्द से अपने बच्चों का लालन-पालन, लाड़-प्यार करते।

सच दखेंगे तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान की माया से मोहित हो रहे थे। एक दिन दोनों नर-मादा अपने बच्चों के लिए चारा लेने जंगल में गए हुए थे। एक शिकारी घूमता-घूमता उनके घोंसले की ओर आ निकला। उसने जाल फैलाकर बच्चों को पकड़ लिया। कबूतरी ने देखा कि उसके नन्हे-नन्हे बच्चे, उनके हृदय के टुकड़े जाल में फंसे हुए हैं और दु:ख से चें-चें कर रहे हैं। उन्हें ऐसी स्थिति में देखकर कबूतरी के दु:ख की सीमा न रही। वह रोती-चिल्लाती उनके पास गई। स्वयं ही जाकर जाल में फंस गई। कबूतर ने देखा कि मेरे प्राणों से भी प्यारे बच्चे जाल में फंस गए और मेरी प्राणप्रिया पत्नी भी उसी दशा में पहुंच गई। तब वह अत्यंत दु:खी होकर रोने लगा।

दत्तात्रेय बोले- कबूतर के बच्चे जाल में फंसकर तडफ़ड़ा रहे थे। स्पष्ट दिख रहा था कि वे मौत के पंजे में हैं, परन्तु वह कबूतर यह सब देखते हुए भी इतना दीन हो रहा था कि स्वयं जान बूझकर जाल में कूद पड़ा। राजन! वह शिकारी बहुत कू्रर था। गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चों के मिल जाने से उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना। जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगों के संग-साथ में ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण में ही जो सारी सुध-बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती। वह उसी कबूतर के समान अपने कुटुम्ब के साथ कष्ट पाता है। यह मनुष्य शरीर मुक्ति का खुला हुआ द्वार है। मनुष्य को संसार में रहना बुरा नहीं है, पर संसार मनुष्य में रहे यह खतरनाक है। आसक्ति मिटाने या उससे बचने के कुछ साधन भी हैं।

जीवन जीएं तो अजगर की तरह क्योंकि....
भागवत अपने समापन की ओर जाते-जाते खूब दार्शनिक होती जाएगी। हम श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच चर्चा को जान रहे हैं। ग्यारहवें स्कंध के सातवें अध्याय में कृष्णजी ने उद्धव को राजा यदु और अवधूत दत्तात्रेय की बातचीत सुनाई। अवधूत दत्तात्रेयजी ने अपने चौबीस गुरुओं की चर्चा सुनाई। हर गुरु के चरित्र पर ध्यान दें तो हम भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।दत्तात्रेयजी कहते हैं-राजन! सुख और दु:ख का रहस्य जानने वाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि इनके लिए इच्छा अथवा किसी प्रकार का प्रयत्न न करे। बिना मांगे, बिना इच्छा किए स्वयं ही अनायास जो कुछ मिल जाए वह चाहे रूखा-सूखा हो, चाहे बहुत मधुर और स्वादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा बुद्धिमान पुरु ष अजगर के समान उसे ही खाकर जीवन निर्वाह कर ले और उदासीन रहे।निद्रारहित होने पर भी सोया हुआ सा रहे और कर्मेन्द्रियों के होने पर भी उनसे कोई चेष्टा न करे। राजा! मैंने अजगर से यही शिक्षा ग्रहण की है।

अजगर का अर्थ आलसी न लिया जाए। फकीर मलूक कह गए थे ''अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम इसे भरोसा माना जाए। निष्कामता यहीं से जन्म लेती है। काम हो रहा है पर कर्ता हम नहीं हैं। करने-कराने वाला वह ऊपर बैठा है। हम कठपुतली हैं। अध्यात्म की भाषा में कहें तो निमित्त है।

निष्कामता का बोध आते ही आत्मा समझना आसान हो जाता है। श्रीराम का उदाहरण लेकर समझें।

स्मरण रखना होगा कि आत्मा न जीता है, न मरता है। वह ईश्वर की भांति अविनाशी है। जीना-मरना या भोगना तो पापात्मा-जीव का क्रिया क्षेत्र है, जो मनुष्य के कर्मानुसार निर्मित होता है। आत्म तत्व को जानना, समझना और इसकी निरन्तर खोज विज्ञान है, तब ही विशेष ज्ञान हो सकता है। विषेश ज्ञान के बिना ईश्वरानुभूति नहीं हो सकती। विज्ञान और अध्यात्म का अटूट संबंध है।विज्ञान सत्य की खोज है। सत्य ईश्वर है। सत्य प्रगट होता है। राम का प्राकट्य हुआ।

राजा हरीशचन्द्र, राजा शिवि, श्रीराम के पिता दशरथ जिनके विषय में कहा गया - रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाय पर वचन न जाई।। भगवान श्रीराम ने सत्य की खोज ही नहीं की बल्कि सत्य पथ पर चलकर उदाहरण प्रस्तुत किया कि साधक को योग साधन में सत्यानुगामी होना ही चाहिए। इसके अभाव में उन्नति न केवल क्षीण होती है, उल्टी रसातल में जाने की स्थिति बन जाती है। सारी साधना शून्य हो जाती है।

साधना में ऋषि पांतन्जल ने अपने योग सूत्रों में यम-नियम की अनिवार्यता प्रतिपादित की है। यम 12 हैं- 1. अहिंसा, 2. सत्य, 3. अस्तेय, 4. असंगता, 5. लज्जा, 6. असंग्रह, 7. आस्तिकता, 8. ब्रम्हचर्य, 9. मौन, 10. स्थिरता, 11. क्षमा और 12. अभय। नियम भी 12 हैं - 1. शौच, 2. जप, 3. तप, 4. हवन, 5. श्रद्धा, 6. अतिथि सेवा, 7. देवपूजा, 8. तीर्थ यात्रा, 9. परोपकार, 10. संतोष, 11. गुरुसेवा और 12. ईश्वर प्रणिधान।

इनमें दस प्रमुखता से लिए जाते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, अपरिग्रह (असंग्रह), तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। अहिंसा के प्रतिष्ठित हो जाने पर बैर त्याग होता है। साधक के मन, हृदय और मस्तिष्क में प्रेम लबालब भर जाता है।

ऐसा होने पर बन जाएंगे आपके सपने ही आपके दुश्मन
यहां साधु के भोजन और अध्ययन दोनों पर टिप्पणी की गई है। माया इन दोनों में रहकर साधु को भी भ्रष्ट कर देती है। भोजन का संबंध केवल स्वाद से ही नहीं है बल्कि शुद्धता से है। जैसा खाएं अन्न वैसा होगा मन। शास्त्रों से सार का तात्पर्य है। अच्छा जहां से भी स्वीकार करें। मैंने मधुमक्खी से यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासी को सायंकाल अथवा दूसरे दिन के लिए भिक्षा का संग्रह नहीं करना चाहिए। उसके पास भिक्षा लेने के लिए कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखने के लिए कोई बर्तन हो तो पेट। वह कहीं संग्रह न कर बैठे।

अति संग्रह की वृत्ति लोभ को जन्म दे देती है। आजकल लोभ को लोग महत्वाकांक्षा से जोड़ देते हैं। घूम फि र कर बात निष्कामता पर आ जाती है। भागवत का प्रमुख विषय ही यही है। सपने देखना अच्छी बात है। लक्ष्य बनाना भी लेकिन सपने या महत्वकांक्षा के लिए अधिक दिवानापन किसी का भी दुश्मन बन सकता है। कहा जाता है लालच बुरी बला है। अति महत्वकांक्षा और लालच की दोस्ती एकदम गहरी और एक के आने पर दूसरे के आने की संभावना प्रबल हो जाती है।

पतंगा, मधुमक्खी तो उदाहरण मात्र हैं।निष्काम कर्म का उपदेश श्रीमद् भगवत में भी भगवान श्रीकृष्ण ने दिया। यहां चित्त शुद्धि और अन्तर्मुखी होने का संकेत बड़े महत्व का है।साधन करते-करते दोनों की प्राप्ति होती है किन्तु इसमें पूर्ण निष्ठा और सातत्य चाहिए। उपासना मार्गों में साधन की अलग-अलग पद्धतियों भक्ति मार्ग, ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग व्यापक रूप में लिए जा सकते हैं। इन्हें भक्ति योग, ज्ञान योग और कर्म योग की संज्ञा ऋषि-मुनियों ने दी है। तीनों में किसी को छोटा-बड़ा नहीं समझना है। भक्ति में मेरा मनन कर, मेरे निमित्त यज्ञ कर (भगवान ने जप यज्ञ को यज्ञों में श्रेश्ठा कहा है....) मुझे नमस्कार कर कीर्तन, भजन, पूजन आदि करने से चित्त शुद्ध होता है।

गीता में यह भक्ति पद्धति दो स्थान पर विशेषत: कही गई है। इसका महत्व इसी से सिद्ध होता है।

ज्ञान मार्ग की बात भक्ति मार्ग से पृथक नहीं। व्यवहार भेद तनिक लगता है-''अथचित्तं समाधातुं न शक्नोशि मयि स्थिरमअभ्यास योगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनन्जय।। 9।12 अर्थात- मेरे में ही अपना चंचल मन स्थिर कर और बुद्धि को मेरे चिन्तन व ध्यान में एकाग्र रख तो तेरा निवास मेरे में हो जाएगा। यदि तू इस प्रकार अपना चित्त मेरे में समाहित न कर सके तो अपने मन में योगाभ्यास द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा जगा।कर्म मनुष्य करता है उसका फल ईश्वर अर्पण करना आसान नहीं। कर्म करने वाला चाहे पारोपकार्थ ही क्यों न करे कर्म करने के अभिमान से युक्त होता है। कर्म का श्रेय लेने का स्वभाव सहज है। बस यहीं से फल भोग आरम्भ हो जाता है। ईश्वर अर्पण में दो पक्ष हैं-ईश्वर जाने और उसका काम जाने अर्थात् पूर्ण समर्पण, दूसरे कर्म फल का भोग नहीं हो पाता।

क्यों बनाई गई मंदिर जाने और तीर्थ यात्रा करने की परंपरा?
अवधूत दत्तात्रेय सुनाते हैं। राजा! प्राचीन काल की बात है। मिथिला में एक वेश्या रहती थी। उसका नाम था पिंगला। मैंने उससे कुछ शिक्षा ग्रहण की। वेश्या को केवल देह से न जोड़ा जाए। यह तो एक वृत्ति है। वेश्या शब्द के आसपास है यह शब्द। वेश्या वह जो व्यवसाय करे। देह को भी व्यापार साधन बनाने के कारण यह शब्द दिया गया। आज के समय में देह का कई तरह से व्यापारिक उपयोग हो रहा है। इस स्त्री के माध्यम से संदेश यह दिया जा रहा है कि शरीर के और भी अच्छे उपयोग हो सकते हैं। चलिए कुछ जानते हैं।

उसे पुरुष की नहीं, धन की कामना थी और उसके मन में यह कामना इतनी दृढ़मूल हो गई कि वह किसी भी पुरुष को उधर से आते-जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करने के लिए ही आ रहा है। राजन! सचमुच आशा और सो भी धन की, बहुत बुरी है। धनी की बाट जोहते-जोहते उसका मुंह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अब उसे इस वृत्ति से बड़ा वैराग्य हुआ। जब पिंगला के चित्त में इस प्रकार वैराग्य की भावना जाग्रत हुई, तब उसने एक गीत गाया। वह मैं तुम्हें सुनाता हूं। पिंगला ने गाया था- मैं इन्द्रियों के अधीन हो गई। भला! मेरे मोह का विस्तार तो देखो, मैं इन दुष्ट पुरुषों से, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, विषय सुख की लालसा करती हूं। मैं मूर्ख हूं। देखो तो सही, मेरे निकट से निकट हृदय में ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान विराजमान हैं। वे वास्तविक प्रेम सुख और परमार्थ का सच्चा धन भी देने वाले हैं।

शरीर परमात्मा से जुड़ जाए तो आत्मा तक पहुंचना सरल हो जाएगा। हिन्दुओं ने मूर्ति पूजा तथा अन्य कर्मकाण्ड इसीलिए रखे हैं कि देह का सद्पयोग होता रहे। शरीर को एक पड़ाव मानें, कुछ लोग पड़ाव को ही मंजिल मान लेते हैं।शरीर क्या है? शरीर एक साधन हो सकता है। यह कभी साध्य नहीं हो सकता। जो लोग देह पर टिक जाते हैं वे परमात्मा तक पहुंच नहीं पाते और जो देह से परे हैं वे ही परमात्मा तक पहुंच पाते हैं। राजा भृतहरि की कथा इसमें सबसे अच्छा उदाहरण हो सकती है। जब तक वे पत्नी की देह और रूप में आसक्त रहे तब तक परमात्मा दूर रहा। जब आसक्ति टूटी तो परम योगी हो गए। देह आपको थोड़ी देर बांधे रख सकती है लेकिन यह आपके लिए मंजिल नहीं हो सकती। मंजिल तो देह से परे आत्मा है।इस देह को पवित्र कामों में लगाना ही श्रेयस्कर होता है। अगर केवल भोग-विलास में ही रमे रहे तो बाद में पछताना भी पड़ सकता है। हिंदू संस्कृति में इस बात को बहुत गंभीरता से लिया और उन्होंने ऐसे नियम, परम्पराएं बनाई जो व्यक्ति की देह को अच्छे कामों में लगा सके। ये मंदिर, मूर्तियां और तीर्थ इसीलिए बनाए गए हैं कि जब व्यक्ति इनमें प्रवेश करे, पूजा शुरू करे तो उसे देह की पवित्रता का एहसास होता रहे।

यह एहसास ही हमारे अंतर्मन को अच्छे कामों के लिए, परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है। जब देह परमात्मा की तलाश में निकल पड़े तो मन और आत्मा खुद उसका साथ देने लगते हैं। इसलिए ध्यान रखें कि मन और आत्मा भी तब तक शुद्ध नहीं हो सकते तब तक शुद्ध नहीं हो सकते हैं जब तक देह पवित्र न हो। देह को भी संभालें, यह परमात्मा का सबसे सुंदर उपहार है। षरीर परमात्मा से जुड़ जाए तो आत्मा तक पहुंचना सरल हो जाएगा। हिन्दुओं ने मूर्ति पूजा तथा अन्य कर्मकाण्ड इसीलिए रखे हैं कि देह का सद्पयोग होता रहे। शरीर को एक पड़ाव मानें, कुछ लोग पड़ाव को ही मंजिल मान लेते हैं।


क्रमश:...

जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है,
और जो भी बुरा लगे वो मेरी न्यूनता है......
मनीष

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