Tuesday, July 3, 2012

धर्म ज्ञान (Dharm Gyan)






श्री हनुमान को गुरु बना सीखें सफलता के ये 6 गुरू मंत्र
हिन्दू संस्कृति रिश्तों और जीवन मूल्यों के प्रति विश्वास, समर्पण व सम्मान का जज्बा बनाए रखने वाले सूत्रों और महान आदर्शों का खजाना है। इसी खजाने का एक अनमोल सूत्र है - गुरु पूर्णिमा उत्सव। गुरु भक्ति और वंदना से गुरु कृपा पाकर जीवन को शांत, सुखी और सफल बनाने के मकसद से गुरु पूर्णिमा बहुत शुभ घड़ी मानी गई है।

गुरु और शिष्य का संबंध तमाम सांसारिक रिश्तों में श्रेष्ठ और ऊपर माना गया है। क्योंकि धर्म, अध्यात्म या व्यावहारिक जीवन, किसी भी रूप में गुरु की ज्ञान शक्ति की ऊर्जा व रोशनी शिष्य के चरित्र, व्यक्तित्व और व्यवहार को उजाला बनाकर जीवन के तमाम दोष, दुर्गण और विकार रूपी अंधकार को मिटाती है।

भौतिक सुख-सुविधाओं से भरे आज के माहौल में अनेक लोग अंदर और बाहरी द्वंद्व या संघर्ष से आहत हो सुख की राह पाने के लिये जूझते हैं। ऐसी मानसिक और व्यावहारिक मुश्किलों में एक श्रेष्ठ गुरु मिलना मुश्किल हो जाता है। अगर आप भी संकटमोचक गुरु की आस रखते हैं तो गुरु पूर्णिमा की शुभ घड़ी में यहां बताए जा रहे सूत्र से आप एक श्रेष्ठ गुरु पा सकते हैं।

यह अनमोल सूत्र है - संकटमोचक श्री हनुमान को इष्ट बनाकर गुरु के समान सेवा, भक्ति। पूर्णिमा तिथि पर श्री हनुमान उपासना शुभ मानी जाती है। क्योंकि श्री हनुमान का जन्म भी पूर्णिमा तिथि पर माना गया है। श्री हनुमान को गुरु मानकर उनके चरित्र का स्मरण सफल जीवन के लिए मार्गदर्शन ही नहीं करता है, बल्कि संकटमोचक भी साबित होता है। सीखें श्री हनुमान के चरित्र से कामयाबी के कुछ खास गुरु मंत्र  -

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा श्री हनुमान भक्ति के रची गई श्री हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु स्मरण से ही होती है। जिसमें श्री हनुमान के प्रति भी गुरु भक्ति का भाव छुपा है। ऐसे ही गुरु भाव से श्री हनुमान का स्मरण कर

विनम्रता - गुणी और ताकतवर होने पर भी हनुमान घमण्ड से दूर रहे। सीख है कि किसी भी रूप में अहं (Ego) को जगह न दें। हमेशा नम्रता और सीखने का भाव मन में कायम रखें।

मान और समर्पण - श्री हनुमान ने हर रिश्तों को मान दिया और उसके प्रति समर्पित रहे, फिर चाहे वह माता हो, वानर राज सुग्रीव या अपने इष्ट भगवान राम । संदेश है कि परिवार और अपने क्षेत्र से जुड़े हर संबंध में मिठास बनाए रखें। क्योंकि इन रिश्तों के प्रेम, सहयोग और विश्वास से मिली ऊर्जा, उत्साह और दुआएं आपकी सफलता तय कर देती है।

धैर्य और निर्भयता - श्री हनुमान से धैर्य और निडरता का सूत्र जीवन की तमाम मुश्किल हालातों में भी मनोबल देता है। इसके बूते ही लंका में जाकर हनुमान ने रावण राज के अंत का बिगुल बजाया।

कृतज्ञता - जीवन में दंभ रहित या आत्म प्रशंसा का भाव पतन का कारण होती है। श्री हनुमान से कृतज्ञता के भाव सीख जीवन में उतारे। अपनी हर सफलता में परिजनों, इष्टजनों और बड़ों का योगदान न भूलें। जैसे हनुमान ने अपनी तमाम सफलता का कारण श्रीराम को ही बताया।

विवेक और निर्णय क्षमता - श्री हनुमान ने सीता खोज में समुद्र पार करते वक्त सुरसा, सिंहिका, मेनाक पर्वत जैसी अनेक बाधाओं का सामना किया। किंतु लालसाओं में न उलझ बुद्धि व विवेक से सही फैसला लेकर बगैर डावांडोल हुए अपने लक्ष्य की ओर बढें। आप भी जीवन में सही और गलत की पहचान कर अपने मकसद से कभी न भटकें।

तालमेल की क्षमता - श्री हनुमान ने अपने स्वभाव व व्यवहार से हर स्थिति, काल और अवसर से तालमेल बैठाया। इससे ही वे हर युग और काल में सबके प्रिय बने रहे। हनुमान के इस सूत्र से आप भी अपने बोल, व्यवहार और स्वभाव में सेवा व प्रेम के रूप में मिठास घोलें। इन सूत्रों से आप सभी का भरोसा और दिल जीतकर सफलता की ऊंचाइयों को पा सकते हैं, ठीक श्री हनुमान की तरह।

भगवान से अगर कुछ मांगना ही है तो श्रेष्ठ गुरु मांगिए
वे सौभाग्यशाली होते हैं, जिनके जीवन में गुरु आ जाते हैं। सभी लोग अपनी पूजा में परमात्मा से कुछ न कुछ मांगते हैं। भगवान से मांगें या न मांगें ये एक अलग विषय है, लेकिन यदि कुछ मांगना है तो गुरु मांगिए, क्योंकि हम लोग बाजार के युग के प्रोडक्ट हैं।

हर चीज वारंटी और गारंटी से लाते हैं, लेन-देन हिसाब से करते हैं, इसीलिए गुरु भी ठोंक-बजाकर बनाते हैं। सोमवार को हम गुरुजी बनाते हैं, मंगलवार को उनमें खोट ढूंढ़ना शुरू कर देते हैं, बुधवार को गुरुजी रवाना कर दिए जाते हैं और गुरुवार से फिर नए गुरु की तलाश शुरू हो जाती है। इस चक्कर में गुरु नहीं मिल पाते। हम गुरु बनाएंगे तो अपनी पसंद खाली कर देंगे और यदि भगवान से मांगा और उन्होंने दिया तो आप पाएंगे कि एक दिन चलकर कोई गुरु आपके द्वार, आपके जीवन में आ जाएगा। परमात्मा तक सीधे छलांग लग भी नहीं पाती।

गुरु के झरोखे से ही ईश्वर में झांका जा सकता है। तुलसीदासजी ने श्रीहनुमानचालीसा में चौपाई लिखकर यह घोषणा कर दी कि यदि कोई गुरु न मिले तो हनुमानजी को गुरु बना लें - जै जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं। अब देखिए गुरु क्या करते हैं। सुंदरकांड में रावण ने हनुमानजी की पूंछ जलाने की आज्ञा दे दी थी। हनुमानजी लंका जला चुके थे, लेकिन विभीषण का घर बच गया था। हनुमानजी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। एक विभीषण का घर नहीं जलाया। गुरु जीवन में होते हैं तो चाहे सारी दुनिया में विपरीत स्थिति हो, हम सुरक्षित रहेंगे विभीषण की तरह। विभीषण के जीवन में हनुमानजी गुरु ही बनकर आए थे।

गुरु पूर्णिमा 3 को, करें गुरु का सम्मान व पूजा
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। कौरव, पाण्डव आदि सभी इन्हें गुरु मानते थे इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। इस बार गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई, मंगलवार को है।

इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है इसलिए यह कहा गया है-

गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरु के पूजन का पर्व। गुरु की पूजा, गुरु का आदर किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है अपितु गुरु के देह के अंदर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा है उसका आदर है, ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरु की कृपा पाने का दिन है गुरु पूर्णिमा
हिंदू धर्म में सदैव गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को नवजीवन प्रदान करता है उन्हें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु के महात्मय को समझने के लिए ही प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस बार गुरु पूर्णिमा का पर्व 3 जुलाई, मंगलवार को है।

गुरु शब्द में ही गुरु का महिमा का वर्णन है। गु का अर्थ है अंधकार और रु का अर्थ है प्रकाश। इसलिए गुरु का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला यानी गुरु ही शिष्य को जीवन में सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करता है उसका जीवन सफल हो जाता है। महर्षि वेदव्यास ने भविष्योत्तर पुराण में गुरु पूर्णिमा के बारे में लिखा है, उसके अनुसार -

मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय: प्रयत्नत:। आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा।।

पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:। फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै:।।

दक्षिणाभि: सुपुष्टाभिर्मत्स्वरूप प्रपूजयेत। एवं कृते त्वया विप्र मत्स्वरूपस्य दर्शनम्।।

अर्थात- आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्म दिवस है। इसे गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन पूरी श्रृद्धा के साथ गुरु को सुंदर वस्त्र, आभूषण, गाय, फल, पुष्प, रत्न, स्वर्ण मुद्रा आदि समर्पित कर उनका पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं।

जानिए, जीवन में गुरु का होना क्यों जरुरी है
हिन्दू धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा ( इस वर्ष 3 जुलाई, मंगलवार) गुरु भक्ति को समर्पित गुरु पूर्णिमा का पवित्र दिन भी है। भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु को सर्वोपरि माना है। वास्तव में यह दिन गुरु के रुप में ज्ञान की पूजा का है। गुरु का जीवन में उतना ही महत्व है, जितना माता-पिता का।

माता-पिता के कारण इस संसार में हमारा अस्तित्व होता है। किंतु जन्म के बाद एक सद्गुरु ही व्यक्ति को ज्ञान और अनुशासन का ऐसा महत्व सिखाता है, जिससे व्यक्ति अपने सद्कर्मों और सद्विचारों से जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद भी अमर हो जाता है। यह अमरत्व गुरु ही दे सकता है। सद्गुरु ने ही भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बना दिया इसलिए गुरुपूर्णिमा को अनुशासन पर्व के रुप में भी मनाया जाता है।

इस प्रकार व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास गुरु ही करता है। जिससे जीवन की कठिन राह को आसान हो जाती है। सार यह है कि गुरु शिष्य के बुरे गुणों को नष्ट कर उसके चरित्र, व्यवहार और जीवन को ऐसे सद्गुणों से भर देता है। जिससे शिष्य का जीवन संसार के लिए एक आदर्श बन जाता है। ऐसे गुरु को ही साक्षात ईश्वर कहा गया है इसलिए जीवन में गुरु का होना जरुरी है।

गुरु पूर्णिमा पर 1 आसान गुरु मंत्र बोल करें तमाम मुश्किलों का सफाया
हिन्दू पंचांग के आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि (3 जुलाई) गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। गुरु पूर्णिमा खासतौर पर गुरु भक्ति का पुण्य काल है। दरअसल, जिस ज्ञान, बुद्धि, बल के द्वारा इंसान जीवन को सफल बनाता है, वह गुरु की ही देन होती है।

जीवन यात्रा में यह जरूरी नहीं कि यह गुरु मात्र धर्म, अध्यात्म क्षेत्र या पहनावे से जुड़ा हो या कोई एक ही व्यक्तित्व हो, बल्कि हर वह इंसान, जो दु:ख के दलदल से दूर रख खुशहाली की राह बताने का ज्ञान, कौशल, सीख और भरोसा दे, गुरु माना गया है।

धर्मशास्त्रों में गुरु भक्ति के लिए ही एक आसान किंतु अपार गुरु और देव कृपा देने वाला मंत्र बताया गया है। इसमें गुरु को साक्षात् ईश्वर बताया गया है। गुरु को त्रिदेव रूपी 3 शक्तियों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ही स्वरूप माना गया है और उजागर किया गया है कि गुरु का ज्ञान बल त्रिदेवों की रचना, पालन व संहार शक्तियों के समान ही होता है। इस मंत्र के स्मरण से शिष्य या गुरु भक्त श्री, यश, प्रतिष्ठा, सुख और वैभव पाता है।

इस मंत्र का इष्ट देव, धार्मिक या आध्यात्मिक गुरु की पूजा के वक्त स्मरण करें। जानिए गुरु पूजा का आसान तरीका और यह खास मंत्र

गुरु पूर्णिमा के दिन पहले खासतौर पर इष्टदेव की प्रतिमा पूजा चंदन, अक्षत, फूल, वस्त्र, श्रीफल यानी नारियल और वस्त्र समर्पित कर करें और आगे बताए जा रहे सरल मंत्र का ध्यान करें। भोग लगाकर धूप, दीप से आरती कर मंगल कामना करें। - धार्मिक या आध्यात्मिक गुरु की पूजा में गुरुदेव को मस्तक व चरणों में नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए अष्टगंध या केसर चंदन लगाएं। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

जानिए गुरु मंत्र स्मरण के बाद गुरु भक्ति या सेवा के लिए और क्या करें- गुरु मंत्र स्मरण के बाद इस तरह गुरु पूजा करें - - अक्षत व सुगंधित फूल या फूलों की माला अर्पित करें। - वस्त्र, शाल, दुपट्टा व नारियल व यथाशक्ति दक्षिणा भेंट करें। - मिठाई, फल आदि नैवेद्य समर्पित करें। - गुरु की कर्पूर या दीप आरती करें। गुरु के श्री चरणों में वंदन करें सुखी, शांत और सफल जीवन की कामना करें।

गुरु पूर्णिमा, इन उपायों से चमकाएं किस्मत
3 जुलाई, मंगलवार को गुरु पूर्णिमा है। हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन सभी लोग अपने-अपने गुरु की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु की कृपा के बिना कहीं भी सफलता नहीं मिलती। ज्योतिष के अनुसार भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। जिन लोगों की कुंडली में गुरु प्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है। यह उपाय इस प्रकार हैं-

उपाय

1- भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं।

2- साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें।

3- गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें।

4- पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें।

5- केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं।

6- गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें।

7- शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें।

8- जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं।

गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ कहते हैं, क्यों?
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताए।।

कबीर द्वारा रचित उक्त पंक्तियों में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है तथा गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया गया है। हिंदू धर्म में गुरु का स्थान प्रारंभ से श्रेष्ठ है। धार्मिक ग्रंथों में गुरु की महिमा का वर्णन कई बार पढऩे में आता है। भविष्यपुराण के ब्राह्मपर्व में भी गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है।

उसके अनुसार गुरु के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े रहें, गुरु की आज्ञा हो तो बैठे परंतु आसन पर नहीं। वाहन पर हों तो गुरु का अभिवादन न करें, वाहन से उतर कर प्रणाम करें। शरीर त्याग पर्यंत जो गुरु की सेवा करता है, वह श्रेष्ठ ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ दर्शाने के पीछे तर्क है कि आध्यात्मिक ज्ञान सिर्फ गुरु के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है। यह ईश्वरीय ज्ञान है जो गुरु के माध्यम से पृथ्वी पर उतरा है।

सिर्फ हिंदू धर्म में ही नहीं इस्लाम में भी गुरु की महिमा का वर्णन है इसीलिए गुरु को पैगंबर कहा गया है। भारत का संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान गुरु-शिष्य सम्वाद के रूप में ही है जैसे- कृष्ण-अर्जुन संवाद, यम-नचिकेता संवाद, जनक-अष्टावक्र संवाद, जनक-याज्ञवल्क्य संवाद आदि। गुरु वह होता है जिसने पूर्णत्व को प्राप्त कर लिया है। धर्म के गोपनीय गुर वही बता सकता है। ऐसे गुरु को ही ज्ञानी कहते हैं।

गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। आज गुरु पूर्णिमा यानी गुरु के पूजन का पर्व है। गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का सबसे पुरातन पहलू है। भारतीय वैदिक परंपरा का तो आधार ही गुरु-शिष्य थे। वेदों को श्रुति कहा जाता है, यानी जो गुरु के मुख से सुन कर शिष्यों ने आत्मसात किया और पीढ़ी दर पीढ़ी उसे आगे बढ़ाया। लिहाजा गुरु पर्व का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व है। आज भी आध्यात्मिक गुरु-शिष्य परंपरा बड़े पैमाने पर हमारे यहां प्रचलित है। गुरुपूर्णिमा के दिन पूरे भारत में लोगो अपने गुरु की आराधना करते हैं। संतों के आश्रमों में शिष्यों का तांता लग जाता है। दान, स्नान और पूजापाठ का इस दिन विशेष महत्व बताया गया है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरुपूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शाति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

हिन्दू पंचाग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने की परंपरा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व आत्मस्वरूप का ज्ञान पाने के अपने कर्तव्य की याद दिलाने वाला, मन में दैवी गुणों से विभूषित करनेवाला, सद्गुरु के प्रेम और ज्ञान की गंगा में बारंबार डूबकी लगाने हेतु प्रोत्साहन देने वाला है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भगवान वेद व्यास ने पंचम वेद महाभारत की रचना इसी पूर्णिमा के दिन की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्य ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेद व्यास जी का पूजन किया और तभी से व्यास पूर्णिमा मनाई जा रही है।

आज भी है उतना ही महत्व
भारत भर में गुरुपूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हर धर्मावलंबी अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और आस्था प्रगट करता है। जीवन में सफलता के लिए हर व्यक्ति गुरु के रुप में श्रेष्ठ मार्गदर्शक, सलाहकार, समर्थक और गुणी व्यक्ति के संग की चाहत रखता है। इसलिए वह गुरु के रुप में किसी संत, अध्यात्मिक व्यक्तित्व या किसी कार्य विशेष में दक्ष और गुणी व्यक्ति को चुनना चाहता है। किंतु इस धारणा के विपरीत पुराणों में आए प्रसंग यह संदेश देते है कि अगर मन में लगन हो, इच्छा शक्ति हो, कुछ जानने, सीखने का दृढ संकल्प हो तो कोई भी व्यक्ति गुरु को कहीं भी पा सकता है। क्योंकि गुरु की महिमा ही ऐसी है कि ईश्वर की तरह गुरु हर जगह मौजूद है। सिर्फ चाहत और दृष्टि चाहिए गुरु को पाने और देखने की।

जगत की हर रचना में गुरु मौजूद है
जगद्गुरु दत्तात्रेय ऐसे ही शिष्य के रुप में भी प्रसिद्ध हैं। जिनके अनेक गुरु हुए। जबकि उन्होनें किसी से गुरु दीक्षा नहीं पाई थी। आखिर यह कैसे संभव हुआ। बात वही थी-ज्ञान पाने की ललक। गुरु दत्तात्रेय ने समस्त जगत में मौजूद हर वनस्पति, प्राणियों, ग्रह-नक्षत्रों को अपना गुरु माना। जिनकी प्रकृति और गुणों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इनकी संख्या 24 थी। इनमें प्रमुख रुप से पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, सूर्य, चंद्र, कबूतर, मधुमक्खी, हाथी, अजगर, पतंगा, हिरण, मछली, गरुड़, मकड़ी, बालक, वेश्या, कन्या, बाण प्रमुख थे। जिनसे उन्होंने कोई गुरु मंत्र और शिक्षा नहीं ली। मात्र इनकी गति, प्रकृति, गुणों को देखकर अपनी दृष्टि और विचार से शिक्षा पाई और आत्म ज्ञान पा लिया। इससे ही श्री दत्तात्रेय जगद्गुरु बन गए। गुरु दत्तात्रेय ने जगत को बताया कि मात्र देहधारी कोई मनुष्य या देवता ही गुरु नहीं होता। बल्कि पूरे जगत की हर रचना में गुरु मौजूद है। यहा तक कि स्वयं के अंदर भी। जिनको देखना और जानना बहुत जरुरी है।

गुरु कृपा बिन सब सून
यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकाड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानाजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

इस 1 बात की बांध लें गांठ!..तो न आएगी 100 झूठ बोलने की नौबत
किसी भी रूप से भरोसा कमजोर होते ही व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में उथल-पुथल मच जाती है। क्योंकि असल में हर रिश्ता विश्वास की मजबूत नींव पर खड़ा रहता है। यही विश्वास भक्त और भगवान के संबंधों में भी बहुत अहमियत रखता है।

शास्त्रों में रिश्तों में विश्वास को कायम रखने के लिए ही जिस सूत्र को जीवन में उतारने, अपनाने के लिए सबसे जरूरी माना गया है। वह सूत्र चरित्र, व्यक्तित्व, व्यवहार और विचार को इतना पावन बना देता है कि इंसान को शक्ति और आत्मविश्वास से भर हमेशा निर्भय रखता है। शास्त्रों में बताया यह बेजोड़ सूत्र है -

सत्य को अपनाना।

शास्त्रों के मुताबिक सत्य ही भगवान है। इसलिए आचरण, विचार, वाणी, कर्म, संकल्प सभी में सत्य का होना ईश्वर का जप ही है। फिर इंसान अगर देव उपासना के धार्मिक कर्मकाण्डों से चूक भी जाए तो भी वह भगवान का कृपा पात्र बना रहता है। हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में भी सत्य की अहमियत बताते हुए लिखा गया है कि - नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।

सरल अर्थ है कि असत्य नाशवान होता है, बल्कि सत्य का कभी नाश नहीं होता, न ही कोई बदलाव नहीं होता है।

सांसारिक जीवन में नष्ट होने वाली चीजों या विषयों से इंसान मोह करता है, किंतु सत्य जैसे अमरत्व का सूत्र अपनाने में बहुत विचार और तर्क करता है। जबकि सत्य को संकल्प के साथ अपनाने की कोशिश करे तो वह इंसान की ताकत बन जीवन में शांति व सुख लाकर प्रतिष्ठा और यश का कारण बनता है।

3 खास शक्तियां!..जो शिव को बनाती है देवों का देव
हिन्दू धर्मशास्त्रों में शिव को 'गुणातीत' कहकर भी पुकारा गया है। यानी शिव अनगिनत गुण व शक्तियों के स्वामी है। इन शक्तियों की महिमा भी अपार है। शिव का ऐसा बेजोड़ चरित्र ही शिव को देवों का देव यानी महादेव बनाता है। शास्त्रों में उजागर शिव के बेजोड़ चरित्र पर सांसारिक और व्यावहारिक नजरिए से गौर करें तो पता चलता है कि शिव के देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के पीछे कुछ खास खूबियां अहमियत रखती हैं। जानिए शिव की ऐसी ही 3 अहम शक्तियां -

दरअसल, जीवन में दो बातें बड़ी अहमियत रखती हैं - पहली रचना, उत्पत्ति या सृजन चक्र और दूसरा आजीविका। इन दोनों लक्ष्य को पाने और कायम रखने के लिए यहां बताए तीन गुण अहम हैं या यूं कहें कि इनके बिना न सृजन करना, न ही जीवन को चलाना संभव है। इन तीन बेजोड़ गुणों से संपन्नता शिव चरित्र की भी खासियत है।

पावनता - शुद्धता, पावनता या पवित्रता के अभाव में मानव जन्म हो या किसी वस्तु की रचना दोषपूर्ण हो जाती है। शिव चरित्र व उनका निराकार स्वरूप शिवलिंग भी सृजन का प्रतीक होकर जीवन व व्यवहार में पावनता और संयम का संदेश देता है। शिव का संयम और वैराग्य दोनों ही तन-मन की पवित्रता की सीख है।

ज्ञान - शिक्षा या ज्ञान के अभाव में जीवनयापन संघर्ष और संकट भरा हो जाता है। यही कारण है कि ज्ञान व बुद्धि के मेलजोल से बेहतर आजीविका के रास्ते खुल जाते हैं। भगवान शिव भी जीवन के लिए जरूरी ज्ञान, कलाओं, गुण और शक्तियों के स्वामी होने से जगतगुरु भी पुकारे जाते हैं, जो धर्मशास्त्र, तंत्र-मंत्र और नृत्य के रूप में जगत को मिले।

पुरुषार्थ - जीवन के लक्ष्यों को पाने के लिए संकल्पों के साथ पूरी तरह डूबकर परिश्रम को अपनाना ही पुरुषार्थ का भाव है। जिसे धर्म या अध्यात्म क्षेत्र में साधना या तप के रूप में भी जाना जाता है। भगवान भी शिव महायोगी, तपस्वी माने गए हैं। शिव का योग व तप जीवन में सुख, सफलता व शांति के लिये पुरुषार्थ की अहमियत बताता है। मन, तन के आलस्य से परे श्रम के द्वारा जीवन को साधना ही शिव के बेजोड़ तप और योग का संदेश है। शिव चरित्र की ये तीन खासियत इंसानी जीवन में गहरी अहमियत रखने से भक्तों के मन में श्रद्धा और आस्था पैदा कर शिव भक्ति और उपासना को सर्वोपरि बनाती है। साथ ही शिव के महादेव स्वरूप को हृदय में बसाए रखती है।

'नमः शिवाय' बोलने या जपने में रखें इन बातों का खास ख्याल
शिव कृपानिधी यानी बेहद करुणा से भरे देवता के रूप में पूजनीय है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक शिव का करुणा भाव ही सांसारिक जीवन में सुखों की वजह है। शिव की ऐसी ही प्रसन्नता और कृपा के लिए शिव उपासना में पंचाक्षरी मंत्र यानी नम: शिवाय का ध्यान भी बहुत ही शुभ और असरदार माना गया है।

शास्त्रों के मुताबिक पंचाक्षरी मंत्र का स्मरण व्यक्ति के जीवन में हर काम और इच्छा को पूरा करने वाला होता है। इस मंत्र के ध्यान मात्र से ही शिव भक्त के जीवन से सारे कलह मिट जाते हैं।

शिव की महिमा उजागर करता शिव महापुराण में पंचाक्षरी मंत्र के जप व स्मरण से जल्द और मनचाहे नतीजों के लिए कुछ खास नियमों का पालन जरूरी बताया गया है। जानिए ये खास वक्त, नियम और संयम क्या है-

- इस मंत्र को गुरु से प्राप्त करें। इससे यह मंत्र जप ज्यादा असरदार और मंगलकारी होता है।

- देवालय, तीर्थ या घर में साफ, शांत व एकांत जगह बैठकर मंत्र जप करें।

- पंचाक्षरी मंत्र यानी नम: शिवाय के आगे हमेशा ऊँ लगाकर जप करें। यह षडाक्षरी मंत्र बन जाता है।

- किसी भी हिन्दू माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी पहले दिन से कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि यानी चौदहवें दिन तक मंत्र जप करें।

- नियत संख्या में पंचाक्षरी मंत्र जप की अवधि में व्यक्ति खान-पान, वाणी और इंद्रियों पर पूरा संयम रखें।

- गुरु, पति, माता-पिता के प्रति सेवाभाव और सम्मान मंत्र जप काल के दौरान न भूलें।

- हिन्दू पंचांग के सावन, माघ माह और भाद्रपद माह में मंत्र जप बहुत शुभ और जल्द मनोरथ पूर्ति करने वाला वाला माना गया है।

अमीर बनने की चाह है तो इस मंत्र से शिव पर चढ़ाएं बिल्वपत्र
सावन में भगवान शिव के स्मरण का महत्व है। सांसारिक नजरिए से इस शुभ काल में शिव ध्यान जीवन से जुड़ी जरूरतों और जिम्मेदारियों को पूरा करने में आने वाली हर परेशानी दूर करता है।

जीवन में धन की भूमिका भी अहम हैं, जिसे लक्ष्मी का भौतिक रूप भी माना गया है। किंतु शास्त्र कहते हैं कि लक्ष्मी का वास पाप, दरिद्रता और बुराई से भरे स्थानों पर नहीं होता। किंतु छोटे-बड़े पाप किसी न किसी रूप में हर इंसान से हो जाते हैं।

शिव उपासना से ऐसे पापों को दूर करने के उपाय भी शास्त्रों में बताए गए हैं। इन पूजा उपायों में एक है - शिव पूजा में बेलपत्र या बिल्वपत्र का चढ़ावा। धार्मिक मान्यता है कि सावन में शिव को तीन पत्ती वाले बिल्वपत्र चढ़ाना न केवल पाप का नाश करता है, बल्कि पाप नाश होने से घर में धनलक्ष्मी आती है, जो सभी काम और मनोरथ पूरे कर देती है। अगर आप भी ऐसी सुखद कामना पूरी करना चाहते हैं तो सावन में शिव पूजा में नीचे बताए पूजा के तरीके व मंत्र से बिल्वपत्र चढ़ाएं-

- स्नान के बाद शिवालय में जाकर शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाएं।

- पंचोपचार पूजा में चंदन, अक्षत के बाद तीन पत्ती वाले 11, 21, 51 या श्रद्धानुसार ज्यादा से ज्यादा बिल्वपत्र शिवलिंग पर इस मंत्र को बोलते हुए चढ़ाएं-

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं त्रयायुधम।

त्रिजन्म पापसंहारं मेकबिल्वं शिवार्पणम।।

- पूजा करने, नैवेद्य व बिल्वपत्र चढ़ाने के बाद शिव मंत्र जप या स्तुति कर शिव आरती करें।

- आखिर में शिव से खुशहाल, धनी और सेहतमंद रहने की कामना करें।

बिल्वपत्र से जुड़ी 1 बात! कहीं अनजाने तो नहीं हो रही दरकिनार
शिव उपासना में बिल्वपत्र का चढ़ावा पाप मिटाने व सांसारिक सुखों को पाने के नजरिए से बहुत महत्व रखता है। खासतौर पर सावन माह में बिल्वपत्र का चढ़ावा मनोरथ सिद्धि का श्रेष्ठ उपाय भी है।

शास्त्रों में देव उपासना की नियत मर्यादाओं की कड़ी में कुछ खास दिनों पर बिल्वपत्र तोड़ना भी शुभ नहीं माना गया है। हिन्दू पंचांग के मुताबिक ये दिन शिव-शक्ति या गणेश उपासना के खास दिन है। बिल्ववृक्ष शिव व शक्ति स्वरूपा देवी लक्ष्मी का वास माना गया है और शिव-शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे माने गए हैं। श्री गणेश भी शिव-शक्ति के पुत्र हैं। इसलिए बताया गया है कि अनजाने में नीचे बताए जा रहे दिनों में बिल्वपत्र न तोड़कर देव दोष से बचना चाहिए। जानिए, किन खास दिनों या तिथियों पर बिल्वपत्र न तोड़े और बिल्वपत्र न होने की स्थिति में शिव पूजा में क्या उपाय करें -

- चतुर्थी

- अष्टमी

- नवमी

- चतुर्दशी

- अमावस्या- संक्राति (सूर्य का राशि बदल दूसरी राशि में प्रवेश)

- सोमवार

चूंकि बिल्वपत्र शिव पूजा का अहम अंग है, इसलिए इन दिनों में बिल्वपत्र न तोड़ने के नियम के कारण बिल्वपत्र न होने पर नए बिल्वपत्रों की जगह पर पुराने बिल्वपत्रों को जल से पवित्र कर शिव पर चढ़ाए जा सकते हैं या इन तिथियों के पहले तोड़ा बिल्वपत्र चढ़ाएं।

इसलिए शिव भक्ति का अहम हिस्सा है बिल्वपत्र
इंसानी जीवन के नजरिए से कुदरत की सकारात्मक शक्ति हवा, पानी, भोजन और प्राकृतिक सौंदर्य के जरिए तरह-तरह से तन व मन को मजबूत बनाती है। दूसरी तरफ प्रकृति का कोप भी विनाश के रूप में भी सामने आता है। हिन्दू धर्मग्रंथों में भी भगवान शिव को भी प्रकृति रूप ही माना जाकर उनकी रचना, पालन, संहार व कल्याणकारी शक्तियों की वंदना की गई है।

भगवान शिव की उपासना में भी प्राकृतिक फूल-पत्र, फल के चढ़ावे का विशेष महत्व है। इसी कड़ी में शिव को बेलपत्र या बिल्वपत्र का चढ़ावा बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। शिवपुराण में बिल्वपत्र के वृक्ष की जड़ में शिव का वास माना गया है। इसलिए बिल्वपत्र की जड़ में गंगाजल के अर्पण का महत्व है, जो शिव पूजा व तीर्थ दर्शन, यात्रा व स्नान का पुण्य देने वाला बताया गया है।  मान्यता है कि शिव को तीन पत्तियों के बिल्वपत्र अर्पण से तीन जन्मों के पाप मिटने के साथ सुख-वैभव की हर कामना पूरी हो जाती है।

शिव की बिल्वपत्र से पूजा का व्यावहारिक पहलू यही है कि यह शिव पूजा के जरिए धर्म के रास्ते प्रकृति के प्रति प्रेम जगाने और उसे सहेजने की सीख है, क्योंकि कुदरत के नियमों या उसकी किसी भी रूप में अनदेखी या उपेक्षा जीवन के लिए खतरा है।

इसी तरह विज्ञान के नजरिए से सावन में बारिश के मौसम के साथ तालमेल बैठाने के जरियों में बिल्वपत्र भी बड़ा फायदेमंद है, जिसका सेवन सूर्य की रोशनी के अभाव में त्रिदोष यानी वात (वायु), पित्त (ताप), कफ (शीत) व पाचन क्रिया के दोषों से पैदा बीमारियों से रक्षा करता है। यह त्वचा रोग और डायबिटीज के बुरे प्रभाव बढऩे से भी रोकता है व तन के साथ मन को भी चुस्त-दुरुस्त रखता है। इस तरह सावन में शिव भक्ति में बिल्वपत्र न केवल धार्मिक बल्कि जीवन के नजरिए से भी मंगलकारी है।

किस मंत्र से शिव का ध्यान कर शुरू होती है शिव पूजा?
धार्मिक आस्था है कि भगवान की शरणागति जीवन के सारे दु:खों को फौरन ही दूर कर देती है। असल में भक्ति का यह रूप भक्त को भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और विश्वास से इतना भर देता है कि उसका सारे दु:खों से ही नाता टूट जाता है। भक्ति में शरणागति का ही एक पायदान है - देव पूजा। इसकी शुरुआत में देव विशेष के ध्यान का महत्व है, जो देव पूजा के संकल्प और लक्ष्य को साधने वाला माना गया है।

इसी कड़ी में सावन में शिव पूजा की शुरुआत शिव के अनादि व अनंत (जिनकी शुरुआत है, न अंत) स्वरूप का ध्यान भी मन को साधकर शिव कृपा से जीवन की सभी कामनाओं को बगैर रुकावट के पूरा करने वाला माना गया है।

जानिए शिव स्वरुप व महिमा का ध्यान मंत्र, जिसे आप शिव की हर तरह की उपासना या पूजा की शुरुआत में जरूर स्मरण करें -

ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं

रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।

पद्मासीनं समंतात् स्तुतममरगर्णै व्याघ्रकृत्तिंवसानं

विश्वाद्यं विश्ववद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥

किस तरफ बैठ करना चाहिए शिवलिंग पूजा?
शिवलिंग पूजा जीवन व मन से सारे कलह मिटाकर हर सुख देने वाली मानी गई है। हर देव पूजा के समान शिवलिंग पूजा में भी श्रद्धा और आस्था की अहमियत है। इसके साथ ही शास्त्रोक्त नियम व संयम के मुताबिक शिवलिंग पूजा जल्द शुभ फल देने वाली मानी गई है। इन नियमों में एक है शिवलिंग पूजा के समय भक्त के बैठने की दिशा। जानिए शिवलिंग पूजा के समय किस दिशा और जगह पर बैठना कामनाओं को पूरा करने के नजरिए से विशेष फलदायी है।

- जहां शिवलिंग स्थापित हो, उससे पूर्व दिशा की ओर चेहरा करके नहीं बैठना चाहिये। क्योंकि यह दिशा भगवान शिव के आगे या सामने होती है और धार्मिक दृष्टि से देव मूर्ति या प्रतिमा का सामना या रोक ठीक नहीं मानी गई है।

- शिवलिंग से उत्तर दिशा में भी न बैठे क्योंकि माना जाता है कि इस दिशा में भगवान शंकर का बायां अंग होता है, जो शक्तिरुपा देवी उमा का स्थान है।

- पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा की ओर नहीं बैठना चाहिए। क्योंकि वह भगवान शंकर की पीठ मानी जाती है। इसलिए पीछे से देवपूजा करना शुभ फल नहीं देती।

- इस प्रकार एक दिशा बचती है - वह है दक्षिण दिशा। इस दिशा में बैठकर पूजा फल और इच्छापूर्ति की दृष्टि से श्रेष्ठ मानी जाती है। सरल अर्थ में शिवलिंग के दक्षिण दिशा की ओर बैठकर यानि उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पूजा और अभिषेक शीघ्र फल देने वाला माना गया है।

इसलिए उज्जैन के दक्षिणामुखी महाकाल और अन्य दक्षिणमुखी शिवलिंग पूजा का बहुत धार्मिक महत्व है। शिवलिंग पूजा में सही दिशा में बैठक के साथ ही भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड़् लगाना, रुद्राक्ष की माला पहनना और बिल्वपत्र अवश्य चढ़ाना चाहिए। अगर भस्म उपलब्ध न हो तो मिट्टी से भी मस्तक पर त्रिपुण्ड्र लगाने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।

क्यों करते हैं शिवलिंग की आधी परिक्रमा?
हिन्दू धर्म पंचांग के पांचवे माह श्रावन यानी सावन में शिव पूजा का विशेष महत्व है। हर शिव भक्त अपनी श्रद्धा, आस्था और शक्ति से शिव पूजा कर अपनी कामनाओं को पूरा करना चाहता है। लेकिन शास्त्रों में शिव उपासना के लिए शिवलिंग पूजा की मर्यादाएं भी नियत है। इसकी जानकारी के अभाव में कुछ देव अपराध हो जाते हैं। शिवलिंग परिक्रमा भी शिव पूजा विधि का एक अंग है। यहां जानिए क्या है शिवलिंग परिक्रमा की मर्यादाएं -

- भगवान शिव की पूजा के बाद शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी स्त्रोत (जहां से भगवान शिव को चढ़ाया जल बाहर निकलता है) तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करे। इसे शिवलिंग की आधी परिक्रमा भी कहा जाता है।

- जलाधारी या अरघा के स्त्रोत को लांघना नहीं चाहिये। क्योंकि माना जाता है कि उस स्थान पर ऊर्जा और शक्ति का भंडार होता है। माना जाता है कि अगर शिवलिंग की परिक्रमा के दौरान जलाधारी को लांघा जाए, तो लांघते वक्त पैर फैलने से वीर्य या रज और इनसे जुड़ी शारीरिक क्रियाओं पर इस शक्तिशाली ऊर्जा का बुरा असर हो सकता है। इसलिए जब भी शिवलिंग पूजा करें, इस बात का ध्यान रखकर अनजाने में होने वाले इस देव दोष से बचें।

जानिए क्यों शिवलिंग की ओर होता है नंदी का मुंह?
हम कई बार भगवान शिव के दर्शन के लिए शिव मंदिर जाते हैं। वहां जाकर हम भक्ति भाव और धार्मिक विधि-विधान से शिव पूजा भी करते हैं। शिव मंदिर में शिव परिवार के साथ उनके वाहन सहित दर्शन होते हैं। लेकिन क्या कभी आप धर्म भाव के अलावा यह सोचते हैं कि शिव मंदिर में विराजित यह मूर्तियां व्यावहारिक जीवन की नजर से क्या संदेश देती हैं। डालिए इसी पर एक नजर -

शिव मंदिर में जाते ही सबसे पहले हमें शिव के वाहन नंदी के दर्शन होते हैं। नंदी के बारे में यह भी माना जाता है कि यह पुरुषार्थ का प्रतीक है। यह तर्क ठीक है, किंतु हर विषय और वस्तु का संबंध आखिरकार पुरुषार्थ से ही जुड़ता है। शिव मंदिर में नंदी की खासियत होती है कि उसका मुंह शिवलिंग की ओर होता है। आखिर नंदी शिवलिंग की ओर ही मुख करके क्यों बैठा होता है? जानिए नंदी की इसी मुद्रा का व्यावहारिक जीवन के नजरिए से क्या महत्व है -

नंदी का संदेश है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की नजर शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी नजर भी आत्मा की ओर हो। इस बात का सरल शब्दों में मतलब यही है कि हर व्यक्ति को अपने मानसिक, व्यावहारिक और वाणी के गुण-दोषों की परख करते रहना चाहिए। मन में हमेशा मंगल और कल्याण करने वाले देवता शिव की तरह दूसरों के हित, परोपकार और भलाई का भाव रखना चाहिए। नंदी का इशारा यही होता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति, चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही आम भाषा में मन का साफ होना कहते हैं। इससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के सेहतमंद रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाता है।

इस तरह अब जब भी मंदिर में जाएं शिव के साथ नंदी की पूजा कर शिव के कल्याण भाव को मन में रखकर वापस आएं। इसी को शिवतत्व को जीवन में उतारना कहा जाता हैं।

सज्जनों का साथ देता है इतना बड़ा मुनाफ़ा!
जीवन में सफलता की कवायद हो या बुरे वक्त से संघर्ष, परेशानियों से छुटकारा पाना हो या फिर भावनात्मक सहयोग की जरूरत, हर हालात में इंसान की संगत बड़ी निर्णायक साबित होती है। अच्छी संगत इंसान को गलत दिशा में भटकने से बचाती है, वहीं बुरे लोगों के साथ से सोच और व्यवहार में पैदा हुए दोष पतन का कारण बन जाते हैं।

अच्छी संगत किस तरह से जीवन के बुरे समय में सफलता, सहयोग और सुख लाती है, इस बात की अहमियत संत कबीर द्वारा अपने दोहों में उजागर किए गए जीवन के व्यावहारिक पहलू से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। लिखा है कि -

सज्जन सो सज्जन मिले, होवे दो-दो बात।

गदहा सो गदहा मिले, खावे दो-दो लात।।

सरल शब्दों में अर्थ  यही है कि जब सज्जन, गुणी या साधु जन एक-दूसरे से मिलते हैं तो ज्ञान, सद्विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, किंतु अज्ञानी या नासमझ  का संग या संपर्क, वैसे ही बातों-बातों में विवाद, कलह या बुराई पैदा करता है, जिस तरह दो गधे आमने-सामने होने पर एक-दूसरे पर लात बरसाते हैं।

संत कबीर के इस दोहे में सीधे और सरल शब्दों में यही संदेश है कि अच्छे लोगों का साथ मन, बोल और कामों में सुधार लाकर ताउम्र भरपूर सुख-शांति देता है, किंतु बुरे लोगों के साथ रहने से उसकी बुराईयां जीवन के अनेक तरह से प्रवेश कर बड़े दु:ख, संताप व अशांति का कारण बनती है।

निचोड़ यही है कि संग और सोच बेहतर बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित रहें तो जीवन को बेहतर बनाना भी बेहद आसान है। अन्यथा बुरा संग, सोच या दृष्टि छवि को तार-तार करने के साथ बुरे फल भुगतने को विवश कर देंगे।

श्री हनुमान चरित्र में है ताकतवर बनने का यह बेहतरीन सबक
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी श्री हनुमान चालीसा की हर चौपाई संकटमोचक श्री हनुमान और उनकी भक्ति के करिश्माई नतीजों की महिमा उजागर करती है। धर्मग्रंथों में बताए श्री हनुमान के ऐसे दिव्य चरित्र, गुण और अतुलनीय शक्तियां ही धर्मावलंबियों के मन में श्री हनुमान भक्ति के लिए श्रद्धा, भक्ति और विश्वास जगाती है। यह भरोसा ही सारे शोक, संताप व रोग दूर करने में भी निर्णायक साबित होता है।

दरअसल, हनुमान चरित्र भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम माना गया है। इसलिए जानिए कैसे हनुमान की भक्ति और शक्ति का प्रभाव सांसारिक व्यक्ति को स्वस्थ्य और सुखद जीवन देने वाला होता है? इसका जवाब भी श्री हनुमान चरित्र और गुणों में मिल जाता है। जानिए, यह रहस्य -

शास्त्रों के मुताबिक श्री हनुमान जितेन्द्रिय और ब्रह्मचारी है। श्री हनुमान का यह बेजोड़ गुण ही सांसारिक प्राणी के लिए हमेशा रोग और दु:ख से मुक्त रहने का बेहतरीन सूत्र माना गया है। इस बेजोड़ गुण के कारण ही श्री हनुमान भक्ति और उपासना के नियमों में पवित्रता, मर्यादा और संयम का पालन अहम माना गया है।

श्री हनुमान के इन गुणों और भक्ति के नियम किसी भी इंसान को इंद्रिय संयम के संकल्प से जोड़ते हैं। इंद्रिय संयम द्वारा इंसान बुरे संग, गलत खान-पान, कुविचार, बुरे व्यवहार के साथ बुरा बोलने, सुनने और देखने से दूर रहता है।

दूसरी ओर केवल शरीर द्वारा ही नहीं बल्कि मन और विचारों के द्वारा भी ब्रह्मचर्य व्रत पालन, सरल शब्दों में समझें तो संयम करने से सद्भभावों, सद्गुणों व अच्छी आदतों को जीवन में उतरने से जीवनशैली व दिनचर्या अनुशासित होती है। सेहतमंद रहने के लिए यही बातें अहम होती हैं। जब इंसान तन और मन से स्वस्थ व दोषरहित होता है तो जाहिर है वह शारीरिक, मानसिक व व्यावहारिक जीवन के कष्टों से बचा रहेगा।

इसी कारण माना जाता है कि हनुमान का स्मरण रख संयम और अनुशासन को अपनाना निरोगी, सुखी और शांत जीवन के लिए बहुत ही मंगलकारी है।

जानिए किस तिथि के स्वामी हैं शिव और क्यों?
हिंदू पंचांग के अनुसार एक हिंदू महीने में 15-15 दिनों के दो पक्ष होते हैं जिन्हें कृष्ण व शुक्ल पक्ष कहा जाता है। इन दोनों में प्रतिपदा से चतुर्दशी तक की तिथि समान होती है। कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या तथा शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा कहते हैं। इस प्रकार कुल सोलह तिथियां होती हैं और हर तिथि का एक स्वामी होता है। जिस तिथि का जो स्वामी होता है, उसका उस तिथि को व्रत-पूजन करने से विशेष कृपा मिलती है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी इसलिए हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव के लिए व्रत रखने का विधान है। इसे मासशिवरात्रि व्रत कहते हैं।

ईशान संहिता के वचन (शिवलिंगतयोद्भुत: कोटिसूर्यसमप्रभ:) के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को अर्धरात्रि में ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था इसलिए इस तिथि को महाशिवरात्रि कहते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन सभी को भगवान शंकर के निमित्त महाशिवरात्रि का व्रत करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार योग्य होते हुए भी जो यह व्रत नहीं करता उसे दोष लगता है।

शिव-गणेश पूजन से मिलती है सुख-समृद्धि
श्रावण कृष्ण चतुर्थी (इस बार 7 जुलाई, शनिवार) तिथि के देवता शंकर पुत्र गणेश हैं। इस दिन भगवान शंकर तथा गणेश की पूजा से बुद्धि तथा ऐश्वर्य प्राप्त होता है। भगवान शंकर को धतूरा व बिल्व तथा श्रीगणेश को दूर्वा अर्पण कर शिव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। मूंगा मोती का दान करने से सभी संकटों का निवारण हो जाता है।

इस तिथि को गणेश चतुर्थी का व्रत भी किया जाता है। विधिपूर्वक श्रीगणेश की स्थापना कर पूजा में दूर्वा चढ़ाई जाती है। प्रत्येक माह यह व्रत करने पर संकटों से मुक्ति के साथ सुख-सौभाग्य और समृद्धि मिलती है। सुयोग्य वर और अखंड सौभाग्य की कामना से भी यह व्रत किया जाता है।

जानिए क्या है शिव के गले में नागों के हार का रहस्य
भगवान शिव के विराट स्वरूप की महिमा बताते शिव पञ्चाक्षरी स्त्रोत की शुरुआत में शिव को नागेन्द्रहाराय कहकर स्तुति की गई है। जिसका सरल शब्दों में अर्थ है ऐसे देवता जिनके गले में सर्प का हार है। यह शब्द शिव के दिव्य और विलक्षण चरित्र को उजागर ही नहीं करता बल्कि जीवन से जुड़ा एक सूत्र भी सिखाता है। जानिए यह सूत्र -

शास्त्रों के मुताबिक शिव नागों के अधिपति है। दरअसल, नाग या सर्प कालरूप माना गया है। क्योंकि वह विषैला व तामसी स्वभाव का जीव है। नागों का शिव के अधीन होना यही संकेत है कि शिव तमोगुण, दोष, विकारों के नियंत्रक व संहारक हैं, जो कलह का कारण ही नहीं बल्कि जीवन के लिये घातक भी होते हैं। इसलिए वह प्रतीक रूप में कालों के काल भी पुकारे जाते हैं और शिव भक्ति ऐसे ही दोषों का शमन करती है।

इस तरह शिव का नागों का हार पहनना व्यावहारिक जीवन के लिये भी यही संदेश देता है कि जीवन को तबाह करने वाले कलह और कड़वाहट रूपी घातक जहर से बचाना है तो मन, वचन व कर्म से द्वेष, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद जैसे तमोगुण व बुरी आदत रूपी नागों पर काबू रखें। सरल शब्दों में कहें तो साफ, स्वच्छ और संयम भरी जीवनशैली से जीवन को शिव की तरह निर्भय, निश्चिंत व सुखी बनाएं।

सावन: मन में आत्मविश्वास जगाती है कांवड़ यात्रा
सावन भगवान शिव की भक्ति का महीना है। इस महीने में विभिन्न साधनों से भगवान शंकर को प्रसन्न किया जाता है। सावन के महीने में भगवान शंकर के जलाभिषेक का भी विशेष महत्व है। जलाभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कांवड़ यात्रा भी एक श्रेष्ठ माध्यम है।

कांवड़ यात्रा का एक महत्व यह भी है कि यह हमारे व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती है। लंबी कांवड़ यात्रा से हमारे मन में संकल्प शक्ति और आत्मविश्वास जागता है। हम अपनी क्षमताओं को पहचान सकते हैं, अपनी शक्ति का अनुमान भी लगा सकते हैं। एक तरह से कांवड़ यात्रा शिव भक्ति का एक रास्ता तो है ही साथ ही यह हमारे व्यक्तिगत विकास में भी सहायक है। यही वजह है कि श्रावण में लाखों श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब सारे देवता सावन में शयन करते हैं तो भोलेनाथ का अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य जागृत हो जाता है। कांवड़ का जल केवल 12 ज्योतिर्लिंगों और स्वयंभू शिवलिंगों (जो स्वयं प्रकट हुए हैं) पर ही चढ़ाया जाता है। प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों और शिवलिंगों पर कांवड़ का जल नहीं चढ़ाया जाता।

सावन: पंचमी को करें शिव के साथ नागदेवता का पूजन
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक तिथि के अलग स्वामी होते हैं। जिस दिन जिनकी तिथि हो उस दिन उनकी पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। सावन में भी प्रत्येक तिथि को उस तिथि के स्वामी का पूजन करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी (8 जुलाई, रविवार) तिथि के स्वामी नागदेव हैं अत: इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ नागदेव की पूजा भी करनी चाहिए। कुछ स्थानों पर इस दिन नाग मरुस्थले व मौना पंचमी के नाम से नागदेवता की पूजा की जाती है। नाग को भगवान शिव का ही एक आभूषण माना गया है। श्रावण में नागदेवता की पूजा करने से सर्पदंश के भय से मुक्ति मिलती है।

कर्म का प्रतीक है भगवान शिव का नंदी अवतार
भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। इस अवतार में भगवान शंकर का स्वरूप वानर व नंदी (बैल) के समान माना जाता था, जो इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति ने सभी जीवों को समान अधिकार दिए हैं। प्रकृति के संतुलन के लिए सभी जीवों का होना अतिआवश्यक है। इनके अभाव में प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक भी है जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। अत: हमें भी समान जीवों से दयाभाव रखते हुए अपने कर्म पथ पर बढ़ना चाहिए।

शिलाद पुत्र के रूप में जन्में नंदीश्वर
शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर अयोनिज व मृत्युहीन पुत्र मांगा। इंद्र ने कहा ऐसा वरदान तो शिव ही दे सकते है। तब शिलाद ने शिव को प्रसन्न कर उनके समान मृत्युहीन व अयोनिज पुत्र का वरदान मांगा। भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। नंदी जब बढ़े हुए तो शिलाद ने नंदी को शास्त्रों का ज्ञान दिया।

एक दिन भगवान शंकर द्वारा भेजे गए मित्रा-वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। नंदी को यह ज्ञात हुआ तो उसने वन में जाकर महादेव की आराधना आरंभ कर दी। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन देकर कहा-वत्स नंदी, तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? मेरे अनुग्रह से तुम्हे बुढ़ापा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष भी बनाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ।

जानिए, क्या है भगवान शंकर की तीसरी आंख का रहस्य
भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं क्योंकि धर्म ग्रंथों के अनुसार शिव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनका तीसरा नेत्र भी है। यह तीसरा नेत्र भगवान शिव की और भी रहस्यमय बनाता है। इसलिए कहते हैं कि भगवान शिव अपने कर्मों से तो अद्भुत हैं ही; अपने स्वरूप से भी रहस्यमय हैं।

शिव अनोखेपन और विचित्रताओं का भंडार हैं। शिव की तीसरी आंख भी ऐसी ही है। दरअसल शिव की तीसरी आंख प्रतीकात्मक नेत्र है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में पढऩे वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं; जिन्हें हम अपनी दोनों आंखों से भी नहीं देख पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है।

यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र का स्थान है। यह आज्ञाचक्र ही विवेकबुद्धि का स्रोत है।

शिव-कार्तिकेय का पूजन, होगी संतान प्राप्ति
सावन का महीना भगवान शंकर को विशेष प्रिय है। हमारे धर्मशास्त्रों में सावन को विशेष फलदाई बताया गया है। इस महीने में हर दिन भगवान शिव का विशेष तरीके से पूजन करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। अगर कोई भी इन पूजा विधियों का पूरी तरह से पालन करे तो भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं।

धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रावण (सावन) कृष्ण षष्ठी तिथि (इस बार 9 जुलाई, सोमवार) भगवान कार्तिकेय से संबंधित है। अत: श्रावण कृष्ण पक्ष के छठे दिन भगवान शंकर एवं कार्तिकेय का संयुक्त रूप से पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से धन, वैभव व पुत्र की प्राप्ति होती है। संभव हो तो इस दिन जितना संभव हो वस्त्र का दान करें, इससे मनवांछित फल की प्राप्ति शीघ्र होती है।

क्यों शिवलिंग पर चढ़ाएं धतूरा?
भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए पूजा में कुछ विशेष पूजा सामग्री को चढ़ाने का महत्व है। इनमें बेलपत्र, सफेद फूल के साथ धतूरा चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। बेलपत्र की तरह धतूरा भी शिव को प्रिय बताया गया है। हालांकि धतूरा जहरीला फल होता है। लेकिन सनातन धर्म से जुड़ा हर जन यह जानता है कि शिव ने समुद्र मंथन से निकले गरल यानी जहर को पीकर ही जगत की रक्षा की।

शिव ने विषपान कर ही जगत को परोपकार, उदारता और सहनशीलता का संदेश दिया। शिव पूजा में धतूरे जैसा जहरीला फल चढ़ाने के पीछे भी भाव यही है कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में कटु व्यवहार और वाणी से बचें। स्वार्थ की भावना न रखकर दूसरों के हित का भाव रखें। तभी अपने साथ दूसरों का जीवन सुखी हो सकता है।

शिव को धतूरा प्यारा होने की बात में भी संदेश यही है कि शिवालय में जाकर शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाकर मन और विचारों की कड़वाहट निकालने और मिठास को अपनाने का संकल्प लें। ऐसा करना ही शिव की प्रसन्नता के लिए सच्ची पूजा होगी क्योंकि शिव शब्द के साथ सुख, कल्याण व अपनत्व भाव ही जुड़े हैं।

महादेव को चढ़ाएं ये 6 अनाज, हर मुराद होगी पूरी
शिवमहापुराण में ऐसे अनेक उपाय बताए गए हैं जिनहे करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों की हर मुराद पूरी कर देते हैं। यह उपाय यदि सावन के महीने में किए जाएं तो और भी जल्दी इनका प्रभाव होता है। शिवमहापुराण में भगवान शिव को विभिन्न प्रकार के अनाज अर्पित करने तथा उनसे प्राप्त होने वाले फलों के बारे में भी बताया गया है, जो इस प्रकार है-

1- शिवमहापुराण के अनुसार भगवान शिव को चावल चढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से भी धन की प्राप्ति होती है। यदि कोई गरीब विधि-विधान से भगवान शिव को चावल अर्पित करे तो वह भी धनवान बन सकता है।

2- भगवान शिव को तिल चढ़ाने से रोगों का नाश हो जाता है। यानी किसी भी तरह का रोग वह ठीक हो जाता है।

3- भगवान महादेव को जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। जो व्यक्ति अपने जीवन में सुख चाहता है उसे यही उपाय करना चाहिए।

4- भगवान शिव को गेहूं चढ़ाने का भी विधान धर्म ग्रंथों में बताया गया है। भगवान शंकर को गेहूं चढ़ाने से संतान में वृद्धि होती है।

5- ज्वार अर्पित करने से भगवान शिव सभी पापों का नाश कर देते हैं।

6- धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस व्यक्ति की शादी नहीं हो रही है वह यदि भगवान शिव को मक्का अर्पित करे तो उसका विवाह जल्दी ही हो जाता है।

यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने पश्चात गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।

क्यों रखना चाहिए सावन सोमवार के व्रत?
हिन्दू धर्म में सोमवार के दिन व्रत रखने का महत्व बताया गया है। यह शिव उपासना से कामनासिद्धि के लिए प्रसिद्ध है। खासतौर पर शिव भक्ति के विशेष काल सावन माह के सोमवार साल भर के सोमवार व्रतों का पुण्य देने वाले माने गए हैं।  किंतु सोमवार व्रत रखने की एक ओर खास वजह भी है, जानिए -

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक यह दिन कुण्डली में चंद्र ग्रह के बुरे योग से जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए भी अहम है। दरअसल, चंद्र मानव जीवन और प्रकृति पर असर डालता है और चंद्र के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए ही सोमवार को चंद्र पूजा और व्रत का महत्व बताया गया है। डालिए चंद्रमा के होने वाले प्रभावों पर एक नजर -

विज्ञान के मुताबिक पृथ्वी समेत अन्य सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं। वहीं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, क्योंकि वह ग्रह न होकर एक उपग्रह है। व्यावहारिक जीवन में भी हम देखते हैं कि चन्द्रमा मानव जीवन के साथ-साथ साथ-साथ पूरे जगत पर ही प्रभाव डालता है।  इसका प्रमाण है पूर्णिमा की रात जब चन्द्रमा पूर्ण आकार में दिखाई देता है, तब समुद्र में आता है ज्वार। वहीं जब अमावस्या के आस-पास चन्द्रमा अदृश्य होता है, तब समुद्र पूरी तरह शांत रहता है। इस प्रकार आकाश में चन्द्रमा के आकार घटने-बढऩे के साथ-साथ पानी और अन्य तरल पदार्थों में हलचल भी कम-ज्यादा होने लगती है।

ज्योतिष विज्ञान कहता है कि चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीक है और अपनी निकटता के कारण ही हमारे जीवन के हर कार्य व्यवहार पर सबसे अधिक असर डालता है। यही वजह है कि जिन लोगों में जल तत्व की प्रधानता होती है, वे पूर्णिमा के आस-पास अधिक आक्रामक, क्रोधित और उद्दण्ड बने रहते हैं। जबकि अमावस्या के आस-पास एकदम शांत और गंभीर देखे जाते हैं।

खासतौर पर जलतत्व राशि जैसे मीन, कर्क, वृश्चिक वाले स्त्री-पुरुषों को सोमवार का व्रत और चन्द्रदेव का पूजन तो जरूर करना ही चाहिए। मानसिक शांति, मन की चंचलता को रोकने और दिमाग को संतुलित रखने के लिए तो चन्द्रदेव के निमित्त किए जाने वाला सोमवार का व्रत ही श्रेष्ठ उपाय है। चंद्रदोष शांत के लिए स्फटिक की माला पहनना तथा मोती का धारण करना शुभ होता है।

धार्मिक दृष्टि से चूंकि शास्त्रों में भगवान शिव चन्द्रमौलेश्वर यानी दूज के चांद को मस्तक पर धारण करने वाले बताए गए हैं। शिव कृपा से ही चंद्रदेव ने फिर से सौंदर्य को पाया। इसलिए सोमवार को व्रत रख शिव पूजा से चंद्र पूजा होने के साथ चंद्र दोष और रोग भी दूर हो जाते हैं।

सावन का पहला सोमवार - किन खास उपायों से करें शिव पूजा?
सावन में हर सोमवार को व्रत बहुत शुभ फल देने वाला होता है। भगवान शिव की उपासना को समर्पित इस व्रत को करने से शिव कृपा से हर व्रती की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इस बार सावन में चार सोमवार दिनांक 9, 16, 23 और 30 जुलाई को आएंगे। इस वर्ष इसी व्रत परंपरा में पहला सावन सोमवार का व्रत कल यानी 9 जुलाई को रखा जाएगा। इस बार सावन के पहले सोमवार के साथ षष्ठी तिथि का भी दुर्लभ योग बना है। इस तिथि के देवता शिव पुत्र भगवान कार्तिकेय हैं। इसलिए धार्मिक दृष्टि से इस बार यह दिन संतान कामना और खुशहाल दाम्पत्य जीवन की कामना पूरी करने के लिए बहुत पुण्यदायी बन गया है। जानिए सावन के पहले सोमवार को शिव पूजा में क्या विशेष उपाय करें -

- सावन के पहले सोमवार की सरल व्रत विधि के अनुसार शिव के साथ माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी जी की पूजा होती है।

- यह पूजा पूर्व दिशा की ओर या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करें।

- गंध, फूल, धूप, दीप, दूध, जल, शहद, घी, गुड, जनेऊ, चंदन, रोली, कपूर से पूजा और अभिषेक करें या विद्वान ब्राह्मण से कराएं।

- शिवालय में शिव पर जलधारा और अभिषेक बहुत फलदायी माना जाता है।

- सावन के पहले सोमवार को खासतौर पर कच्चे चावल पूजा में भगवान शिव को चढ़ाने का महत्व है।

- इसके अलावा सफेद फूल, बेलपत्र, भांग-धतूरा भी शिव पूजा में चढ़ाएं।

- शिव मंत्र स्तोत्र या स्तुति का पाठ करें।

सावन में शिव को इस मंत्र से चढ़ाएं भांग..बरसेंगे सुख
भक्ति से प्रसन्न भोलेनाथ अपने भक्त के मनमुताबिक अनेक तरह से कृपा बरसाते हैं। इसलिए भगवान शिव को कृपानिधान भी पुकारा जाता है। सोमवार शिव भक्ति का ऐसा ही दिन है, जिसमें शिव भक्ति के लिए ऐसे उपाय किए जाते हैं, जिनको शास्त्र और परंपराओं में भी शिव को बहुत प्रिय बताया गया है।

ऐसी ही मान्यताओं में शिव को भांग प्रेमी भी बताया गया है। वैसे शिव चरित्र में अनेक निराली बातें दिखाई देती है, किंतु उनमें छुपे असाधारण संदेश से ही शिव महादेव के रूप में पूजनीय है। खासतौर पर शिव के श्मसान में रहने, नागों का हार पहनने, विषपान करने या फिर भांग, धतूरा, बिल्वपत्र जैसी कटु चीजों के प्रेमी होने के पीछे असल में सबक यही है कि विपरीत हालात में भी निराश न हो, बल्कि संयम, त्याग और परोपकार के भावों के साथ शक्ति का उपयोग करें तो हर सुख और प्रसन्नता को कायम रखना संभव हो सकता है।

यही कारण है कि सोमवार को शिवलिंग को भांग, धतूरे और आंकड़े जैसे नशीले या विषैली चीजों का विशेष मंत्रों से चढ़ावा असफलता रूपी दु:खों का सफर थाम सुख व सफलता का सिलसिला शुरू करने वाला माना गया है। इसी कड़ी में जानिए शिव के भांग स्नान के साथ बोले जाने वाला मंत्र -

- सावन सोमवार को शिव मंदिर में सबसे पहले शिव का जल या पंचामृत स्नान के बाद जल में भांग मिलाकर शिवलिंग को नीचे लिखे मंत्र से सुख व सफलता की कामना के साथ भांग मिली जल धारा अर्पित करें -

शिवप्रीतिकरं रम्यं दिव्यभावसमन्वितम्।

विजयाख्यं च स्नानार्थं भक्तया दतं प्रगृह्यताम्।।

- इसके बाद शिव को चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र चढ़ाकर मिठाई का भोग व धूप, दीप लगाकर पूजा व शिव आरती करें।

- जाने-अनजाने बुरे कर्मों की क्षमा मांग शिव कृपा के लिए प्रार्थना करें।

सावन: मंगलवार को करें भगवान शिव व सूर्य की पूजा
श्रावण मास का हर दिन अपने आप में विशेष है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस तरह हर दिन के एक देवता निश्चित हैं उसी तरह हर तिथि के भी देवता निश्चित हैं। उस दिन उस देवता की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। शिवमहापुराण के अनुसार सभी देवता भगवान शिव का ही स्वरूप है। उनका पूजन करने से वास्तव में भगवान शिव ही पूजा हमारे द्वारा होती है। श्रावण मास में यदि तिथि के अनुसार भगवान शिव की पूजा करें तो श्रेष्ठ फल मिलता है।

उसी के अनुसार श्रावण कृष्ण सप्तमी (इस बार 10 जुलाई, मंगलवार) तिथि सूर्य को समर्पित है अत: सप्तमी को सूर्य के रूप में भगवान शंकर का पूजन विधि-विधान से करने पर तेज की प्राप्ति होती है। इस दिन प्रात:काल सूर्य को जल चढ़ाने से आरोग्य तो मिलता ही है साथ ही यह प्रक्रिया निरंतर करने से आंखों एवं सिरदर्द का निदान भी होता है। इस दिन तांबे से निर्मित वस्तुओं का दान करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।

सावन में इन मंत्रों से शिव व मंगल पूजा दूर करे परेशानियां
शास्त्रों के मुताबिक मंगल ग्रह शिव के तेज से पैदा हुए। इनका पालन-पोषण भूमि द्वारा किया गया। इससे वह भूमिपुत्र के नाम से भी पूजनीय है। शिव भी पृथ्वी तत्व के अधिपति देवता भी है। यही वजह है कि ज्योतिष शास्त्रों में मंगल दोष शांति के लिए सावन माह में शिव भक्ति के साथ मंगल उपासना बहुत मंगलकारी मानी गई है।

खासतौर पर लिंग स्वरूप मंगल पूजा मंगलदोष से आ रही वैवाहिक, सेहत से जुड़ी व आर्थिक परेशानियां दूर कर देती है। जानिए मंगल पूजा की सरल विधि के साथ खास शिव व मंगल मंत्र -

- मंगलवार को देवालय में लिंग स्वरूप मंगल देव (उज्जैन का मंगलनाथ मंदिर) की पूजा लाल चन्दन, लाल फूल और अक्षत नीचे लिखे मंगल मंत्रों से ध्यान व जप कर अर्पित करें -

ध्यान मंत्र -

धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च भौममावाह्यम्।

मंगल मंत्र -

ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:

ऊँ धरात्मजाय नम:

इन मंगल मंत्रों के साथ देवालय में शिव को जल व बिल्वपत्र चढ़ाकर नीचे लिखें मंत्रों से शिव का स्मरण कर मंगल दोष से रक्षा की कामना करें -

ऊँ त्रिलोकेशाय नम:

ऊँ अम्बिकानाथाय नम:

- पूजा व मंत्र जप के बाद मंगल व शिव को यथाशक्ति नैवेद्य अर्पित कर धूप, दीप व कर्पूर आरती करें।

रात में शिव साधना का यह उपाय देगा मनचाही सिद्धि
सनातन धर्म की मान्यताओं में संसार पंचभूतों यानी पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्रि से बना है। ये पंच तत्व भी कहलाते हैं। हर तत्व का एक देवता स्वामी है, जो पंच देवों के रूप में पूजनीय है। भगवान शिव इन पांच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के देवता माने जाते हैं। यही कारण है कि सांसारिक सुखों और कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान शिव की उपासना का महत्व है।

शास्त्रों के मुताबिक शिव ज्योर्तिलिंग अर्द्धरात्रि के समय प्रकट हुआ। इसलिए रात के समय शिव साधना बहुत ही असरदार मानी जाती है। इसी कड़ी में सावन माह व इसके हर दिन या तिथियों जैसे अष्टमी, चतुर्दशी, प्रदोष व सोमवार आदि की रात में शिव साधना मनोरथ पूरे करने और इष्टसिद्धि के लिए बहुत ही अचूक मानी गई है।

अगर आपके भी इष्ट भगवान शिव हैं। साथ ही सुख, शांति और सफलता की चाहत रखते हैं तो शिव भक्ति के इस विशेष काल में यहां बताए जा रहे शिव साधना के खास उपाय को अपनाएं। इसके शुभ प्रभाव आप जीवन में दृश्य और अदृश्य रूप से सुख, शांति व सफलता के रूप में देखेंगे।

- पूरे सावन माह या विशेष तिथियों पर रात में लगभग दस से दो बजे के बीच किसी नदी या तीर्थ के किनारे किसी सुरक्षित स्थान पर ईशान दिशा यानी उत्तर-पूर्व दिशा में मुंह रखकर शिव के पंचाक्षरी 'नम: शिवाय' या षडाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जप करें।

- मंत्र जप के दौरान पैरों को नदी या तीर्थ के जल में रखकर करना इष्टसिद्धि के नजरिए से बहुत ही असरदार होता है। मंत्रों का अधिक से अधिक जप करें।

- यह शिव साधना यथाशक्ति नित्य भी करना शुभ होता है।

बिल्वपत्र से भी ज्यादा शुभ है शिव पूजा में इस फूल को चढ़ाना
शिव की उपासना में बिल्वपत्र का चढ़ावा बहुत ही शुभ और पुण्य देने वाला माना जाता है। धार्मिक आस्था है कि बिल्वपत्र का शिव का चढ़ावा जन्म-जन्मान्तर के पाप और दोषों का नाश करता है। वैसे भी शिव की पूजा में कुदरती सामग्रियों के चढ़ावे का महत्व है। इनमें तरह-तरह के पेड़-पौधों के पत्ते, फूल और फल शामिल होते हैं।

शास्त्रों के मुताबिक इन फूल-पत्तों में कुछ ऐसे भी हैं, जिनको शिव पूजा में चढ़ाना बिल्वपत्र से भी ज्यादा पुण्य और फल देने वाला माना गया है। धार्मिक महत्व के नजरिए से जानिए शिव को चढ़ाए जाने वाले कौन से हैं ये फूल और पत्ते -

- एक आंकडे का फूल चढ़ाना सोने के दान के बराबर फल देता है,

- एक हजार आंकड़े के फूल के बराबर एक कनेर का फूल फलदायी,

- एक हजार कनेर के फूल के बराबर एक बिल्वपत्र फल देता है,

- हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी,

- हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा,

- हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल,

- हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता,

- हजार शमी के पत्तो के बराकर एक नीलकमल,

- हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और

- हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

इस तरह शमी का फूल शिव को चढ़ाना शिव भक्ति से तमाम मनचाही कामनाओं को पाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है।

स्त्री-पुरुष की समानता का प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर अवतार
भगवान शिव आदि व अनंत है। इनकी पूजा करने से तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। भगवान शंकर ने जगत कल्याण के लिए कई अवतार लिए। भगवान शिव के इन अवतारों में कई संदेश भी छिपे हैं । उन्हीं में से कुछ अवतारों की कथा तथा उनमें छुपे संदेश की जानकारी संक्षिप्त में इस प्रकार है-

अर्धनारीश्वर अवतार
भगवान शंकर के अर्धनारीश्वर अवतार में हम देखते हैं कि भगवान शंकर का आधा शरीर स्त्री का तथा आधा शरीर पुरुष का है। यह अवतार महिला व पुरुष दोनों की समानता का संदेश देता है। समाज, परिवार व सृष्टि के संचालन में पुरुष की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है उतना ही स्त्री की भी है। स्त्री तथा पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे के बिना इनका जीवन निरर्थक है। अर्धनारीश्वर लेकर भगवान ने यह संदेश दिया है कि समाज तथा परिवार में महिलाओं को भी पुरुषों के समान ही आदर व प्रतिष्ठा मिले। उनके साथ किसी प्रकार का भेद-भाव न किया जाए।

क्यों हुआ अर्धनारीश्वर अवतार?
शिवपुराण के अनुसार सृष्टि में प्रजा की वृद्धि न होने पर ब्रह्माजी ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। ब्रह्मा की तपस्या से परमात्मा शिव संतुष्ट हो अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर उनके समीप गए और जगत कल्याण के लिए शिव ने अपने शरीर में स्थित देवी शिवा/शक्ति के अंश को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने उस परम शक्ति की स्तुति की और कहा- माता। मैं मैथुनी सृष्टि उत्पन्न कर अपनी प्रजा की वृद्धि करना चाहता हूं अत: आप मुझे नारीकुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान करें।

ब्रह्माजी की प्रार्थना स्वीकार कर देवी शिवा ने उन्हें स्त्री-सर्ग-शक्ति प्रदान की और अपनी ललाट के मध्य से अपने ही समान कांति वाली एक शक्ति की सृष्टि की जिसने दक्ष के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। शक्ति का यह अवतार आंशिक कहा गया है। शक्ति पुन: शिव के शरीर में प्रविष्ट हो गई। उसी समय से मैथुनी सृष्टि का प्रारंभ हुआ। तभी से बराबर प्रजा की वृद्धि होने लगी।

किन परेशानियों में करें या कराएं महामृत्युञ्जय मंत्र जप?
भगवान शिव कल्याणकारी देवता माने जाते हैं। चूंकि सावन माह शिव की भक्ति और साधना का ही काल है, इसलिए शास्त्रों में भगवान शिव की उपासना कर दु:ख, रोग और मृत्यु के भय से छुटकारा पाने का सबसे असरदार उपाय बताया गया है - महामृत्युंजय मंत्र का जप। शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र के जप से व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र पर आने वाले हर संकट, बाधा, विपदा और त्रासदी का अंत हो सकता है।
किसी लाइलाज गंभीर रोग की पीड़ा से मुक्ति के लिए। - महामारी के प्रकोप से बचने के लिए। - वात(वायु),पित्त(ताप)और कफ(शीत) के दोष से पैदा हुए रोगों से छुटकारे के लिए। - दुर्घटना या बीमारी से जीवन पर आए संकट से मुक्ति के लिए।
जन्म कुण्डली में ग्रह दोष, ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा के बुरे प्रभावों की शांति के लिए।
अभाव व दरिद्रता दूर कर धन लाभ व खुशहाली के लिए।
मानसिक क्लेश और संताप के कारण धर्म और अध्यात्म से बनी दूरी को खत्म करने के लिए। - परिवार, समाज और करीबी संबंधों में घुले कलह को दूर करने के लिए। - देश में अशांति और अलगाव की स्थिति बनी हो।
संपत्ति विवाद सुलझाने के लिए। - प्रशासनिक परेशानी दूर करने के लिए।
विवाह संबंधों में बाधक नाड़ी दोष या अन्य कोई बाधक योग को दूर करने में।

पिछले जन्म में आप क्या थे? इतनी बार महामृत्युञ्जय मंत्र बोलने से आता है याद
भक्ति में अविश्वास का कोई स्थान नहीं होता। आस्था और विश्वास ही वह कारण है जिनके बूते ही भक्त और भगवान का मिलन हो जाता है। धर्मशास्त्र भी यही कहते हैं कि प्रेम और भावना ईश्वर को भी भक्त के पास आने को मजबूर करती है। भगवान शिव भी ऐसे ही देवता माने जाते हैं, जो भक्तो की थोड़ी ही उपासना से प्रसन्न हो जाते हैं।

शिव की प्रसन्नता के ही इन उपायों में महामृत्युञ्जय मंत्र को बहुत ही अचूक माना जाता है। शिवपुराण में तो शिव भक्ति के काल जैसे सोमवार, चतुर्दशी, सावन या हर रोज भी महादेव के इस मंत्र का अलग-अलग रूप और संख्या में जप तन, मन और धन का हर सुख देने वाला बताया गया है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि भक्त बिना किसी कामना के शिव का ध्यान करे। पूरी पवित्रता व निष्काम यानी बिना स्वार्थ के नियत संख्या में मंत्र जप तो जन्म-जन्मान्तर के कर्मों का स्मरण कराने के साथ शिव के साक्षात दर्शन कराने वाला माना गया है।

यहां जानिए, कितनी संख्या में शिव के इस महामंत्र को बोलने या जप करने क्या-क्या घट जाता है-

- महामृत्युञ्जय मंत्र के एक लाख जप करने पर शरीर पवित्र हो जाता है।

- महामृत्युञ्जय मंत्र के दो लाख जप पूरे होने पर पूर्वजन्म की बातें याद आ जाती हैं।

- महामृत्युञ्जय मंत्र के तीन लाख  जप पूरे होने पर सभी मनचाही सुख-सुविधा और वस्तुएं मिल जाती है।

- महामृत्युञ्जय मंत्र चार लाख जप पूरे होने पर भगवान शिव सपनों में दर्शन देते हैं।

- पांच लाख महामृत्युंजय मंत्र जप पूरे होते ही भगवान शिव फौरन ही भक्त के सामने प्रकट हो जाते हैं।

ताकत बढ़ाता है इस सरल श्लोक से शिव का ध्यान
शिव महान योगी हैं। उनका योग स्वरूप संसार के सुख और आनंद का कारण माना गया है। शास्त्रों में आए प्रसंग बताते हैं कि शिव की विष्णु और विष्णु की शिव भक्ति जगत कल्याण का कारण बनी। रुद्र अवतार श्री हनुमान द्वारा विष्णु अवतार श्रीराम की सेवाभक्ति और श्रीराम द्वारा शिव भक्ति कर अधर्म के नाश के लिये लंका पर चढ़ाई से पहले शिवलिंग पूजा इसका प्रमाण भी है।

सांसारिक जीवन में सफलता के सूत्रों से भरे गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महान धर्मग्रंथ रामचरितमानस में भी भगवान शंकर के अद्भुत स्वरूप का स्मरण मिलता है। यह शिव की प्रेरणा से ही रचित और प्रमाणित ग्रंथ माना गया है। इस ग्रंथ के अयोध्याकाण्ड की शुरुआत में आया शिव के दिव्य स्वरूप का नियमित पाठ सभी सांसारिक कष्टों का तुरंत नाश करने वाला माना गया है।

खासतौर पर सावन के माह में सुबह शिव को आंकड़े के फूल, बिल्वपत्र, सफेद चंदन, अक्षत चढ़ाकर इस श्लोक का स्मरण करें। यह शिव भक्ति का बेहद आसान उपाय भी है, जो जीवन में हर रूप में शक्ति बंटोरने और कायम रखने के लिए शुभ माना गया है।

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवपगा मस्तके

भाले बालविधुर्गे च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।

सोयं भूमिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा।

शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशङ्कर पातु माम्।।

सरल शब्दों में मतलब है कि जिनकी गोद मे हिमालय की पुत्री पार्वती, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीय यानी दूज का चांद, कण्ठ में भयंकर विष, वक्षस्थल पर नागराज शेष सुशोभित हैं। भस्म से रमे, देवताओं में भी श्रेष्ठ, भक्तों के पापों के संहारक, सर्वव्यापी यानी हर जगह मौजूद, कल्याणकारी, चन्द्रमा की तरह उजली आभा वाले भगवान शंकर मेरी रक्षा करे।

बड़े भाग्यशाली साबित होते हैं शिव पूजा के ये चंद उपाय
शिव का चरित्र और परिवार कठिन हालात में भी संतुलन और जीने की कला सिखाता है। शिव का वाहन बैल है तो पार्वती का शेर। शिव पुत्रों श्रीगणेश का वाहन चूहा और भगवान कार्तिकेय का मोर है। शिव का जीवन ओघड़ या संन्यासी की तरह है, जबकि माता सती या पार्वती राजसी सुखों के बीच पली-बढ़ी राजकन्या थी। इतने विरोधाभास के बाद भी शिव और उनका परिवार गृहस्थ जीवन के लिए आदर्श है। इसलिए शिव पूजा गृहस्थ के लिए ही नहीं बल्कि उन लोगों के लिए भी फलदायी मानी जाती है, जो निराशा और परेशानियों से जूझ रहे हैं।

इस तरह सावन का माह न केवल कुदरती खुबसूरती के लिए जाना जाता है बल्कि धार्मिक दृष्टि से यह काल शिव भक्ति कर उनकी प्रसन्नता से जीवन में आने वाली सभी परेशानियों को दूर करने के लिए बड़ा शुभ माना गया है। सावन में शिवभक्त अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए खासतौर पर व्रत और पूजा करते हैं। अगर किसी व्यक्ति के लिए व्रत कर पाना संभव न हो तो यहां बताए जा रहे है शिवलिंग पूजा के कुछ ऐसे उपाय, जो हर भक्त के जीवन के लिए बड़े भाग्यशाली साबित होने वाले माने गए हैं -

- दु:ख और कष्टों के कारण बुरी हालात से गुजर रहा व्यक्ति शिवलिंग को लाल चंदन या चंदन मिले जल की धारा अर्पित करे। इसके साथ रोली का उपयोग कतई न करे।

- सोमवार को पंचमुखी शिवलिंग पर तीर्थ का जल लाकर चढ़ाए। इससे गंभीर रोग से परेशान व्यक्ति भी रोगमुक्त हो जाता है।

- कालसर्प दोष शांति के लिए शिवालय में राहु मंत्र 'ऊँ रां राहवे नम' के 18000 संख्या में जप करने चाहिए।

- दूध में भांग मिलाकर चढ़ाने से जीवन में किसी समस्या से हो रही उथल-पुथल थम जाती है।

- सोमवार के दिन शिवलिंग का शहद से अभिषेक करने पर रोजगार और धन की इच्छा पूरी होती है।

- शिवलिंग पर आंकड़े का फूल और धतूरा चढ़ाने से व्यर्थ के विवाद या शासकीय बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

- परिवार में कलह फैला हो तो सोमवार के दिन गाय के दुध से शिव का अभिषेक करें।

- अंत में सबसे आसान उपाय जो जीवन को तनावमुक्त और शांत रखेगा, वह सोमवार और सावन माह में शिव को पवित्र जल और बेलपत्र चढ़ाएं।

शिव का यह अवतार सीखाता है प्रकृति से प्रेम करना
भगवान शंकर का पिप्पलाद अवतार हमें प्रकृति से प्रेम करना सीखाता है। शिव प्रकृति के देवता है। भगवान पिप्पलाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ। उन्होंने तप भी पीपल के वृक्ष के नीच ही किया तथा पीपल के पत्तों को ही भोजन बनाया। इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें प्रकृति से हमेशा जुड़ा रहना चाहिए। प्रकृति की गोद में रहने से हमें विद्या तथा तप दोनों की प्राप्ति होगी।

महर्षि दधीचि के पुत्र हैं पिप्पलाद
महर्षि दधीचि भगवान शंकर के परम भक्त थे। उन्होंने वृत्रासुर आदि दैत्यों के वध के लिए अपनी हड्डियां देवताओं को दान कर दी। जब उनकी पत्नी सुवर्चा को यह मालूम हुआ तो उन्होंने देवताओं को पुत्रहीन होने का शाप दिया तथा सती होने के लिए चिता की ओर जाने लगीं तभी आकाशवाणी हुई- सगर्भा (गर्भवती) के लिए देह-त्याग करना शास्त्रविरुद्ध है। तुम्हारे गर्भ में महर्षि दधीचि का ब्रह्मतेज है जो भगवान शंकर का अवतार रूप है। आकाशवाणी को सुन सुवर्चा पास ही पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गईं। वहीं उन्होंने पुत्र को जन्म दिया जो शिव का अवतार था। पुत्र को जन्म देने के बाद सुवर्चा पीपल के समीप ही सती हो गईं।

इसलिए नाम पड़ा पिप्पलाद
भगवान पिप्पलाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ। पीपल के नीचे ही तप किया और पीपल के पत्तों को ही भोजन के रूप में ग्रहण किया था इसलिए शिव के इस इस अवतार का नाम पिप्पलाद पड़ा। कहते हैं स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।

करें शिव का रुद्राभिषेक, मिलेगा मनचाहा फल
वैसे तो पूरा श्रावण मास ही शिव की आराधना के लिए उत्तम माना गया है लेकिन फिर भी यदि कुछ विशेष तिथि को खास विधि द्वारा शिव का पूजन किया जाए तो साधक को अतिशीघ्र उसका फल मिलता है। ऐसा धर्म शास्त्रों में भी उल्लेखित है।

श्रावण कृष्ण अष्टमी तिथि (इस बार 11 जुलाई, बुधवार) के स्वामी स्वयं भगवान शिव हैं। इस दिन शिव का रुद्राभिषेक द्वारा पूजन करने से तीनों लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो शिव प्रदान नहीं करते। इस तिथि को लाल वस्त्रों तथा अन्य लाल वस्तुओं का दान करने से शिव मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

कैसे पाएं यादगार सफलताएं? सिखाए शिव से जुड़ा यह रहस्य
हर कोई जीवन में असफलता का सामना करने से बचना चाहता है। इसके पीछे नाकामी से जुड़ा नकारात्मक नजरिया भी है। जबकि असफलता से सबक लेना ही जोरदार कामयाबी का एक बड़ा सूत्र है। सफलता के ऐसे ही सूत्र धर्मग्रंथों में देव चरित्रों में भी छुपे हैं। यहां बताया जा रहा है शिव स्वरूप में छुपा सुखी और सफल जीवन का रहस्य जीवन में कामयाब ही नहीं बनाता बल्कि सफलताओं को यादगार भी बना सकता है। जानिए -

शिव दिव्य स्वरूप का अहम अंग है- त्रिशूल। त्रिशूल का शाब्दिक मतलब है 'त्रि' यानी तीन और 'शूल' यानी कांटा। त्रिशूल धारण करने से ही भगवान शिव, शूलपाणि यानी त्रिशूल धारण करने वाले देवता के रूप में भी वंदनीय हैं। इसके पीछे धार्मिक दर्शन है कि शिव का त्रिशूल घातक और अचूक शस्त्र जरूर है किंतु सांसारिक नजरिए से यह कल्याणकारी है। त्रिशूल के तीन कांटे जगत में फैले रज (राजसी), तम (तामसी) और सत्व (सात्विक या सौम्य) गुणों का प्रतीक हैं।

शिव के हाथों में त्रिशूल संकेत है कि महादेव इन तीन गुणों पर नियंत्रण करते हैं। शिव त्रिशूल धारण कर यही संदेश देते हैं कि इन तीन गुणों में संतुलन और तालमेल के जरिए ही व्यक्तिगत और सांसारिक जीवन और उसका हर पल सुखी, सफल, समृद्ध और यादगार बन सकता है।

शास्त्रो के मुताबिक इन तीन गुणों में दोष आने पर ही काम, सोच और स्वभाव भी बिगड़ते हैं। इससे अनेक तरह की शारीरिक, मानसिक और व्यावहारिक परेशानियां पैदा होती हैं जो शूल यानी कांटे की तरह चुभती हैं और कलह से भरे नाकाम ज़िंदगी की वजह बनती है।

शिव का रौद्र रूप है वीरभद्र, ये सीखें इस अवतार से
भगवान शिव के वीरभद्र अवतार का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यह अवतार हमें संदेश देता है कि शक्ति का प्रयोग वहीं करें जहां उसका सदुपयोग हो। वीरों को दो वर्ग होते हैं- भद्र एवं अभद्र वीर। राम, अर्जुन और भीम वीर थे। रावण, दुर्योधन और कर्ण भी वीर थे लेकिन पहला भद्र (सभ्य) वीर वर्ग है और दूसरा अभद्र (असभ्य) वीर वर्ग। सभ्य वीरों का काम होता है हमेशा धर्म के पथ पर चलना तथा नि:सहायों की सहायता करना। जबकि असभ्य वीर वर्ग सदैव अधर्म के मार्ग पर चलते हैं तथा नि:शक्तों को परेशान करते हैं। भद्र का अर्थ होता है कल्याणकारी। अत: वीरता के साथ भद्रता की अनिवार्यता इस अवतार से प्रतिपादित होती है।

कैसे हुआ वीरभद्रावतार
यह अवतार तब हुआ था जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन भगवान शिव को उसमें नहीं बुलाया। जबकि दक्ष की पुत्री सती का विवाह शिव से हुआ था। यज्ञ की बात ज्ञात होने पर सती ने भी वहां चलने को कहा लेकिन शिव ने बिना आमंत्रण के जाने से मना कर दिया। फिर भी सती जिद कर अकेली ही वहां चली गई। अपने पिता के घर जब उन्होंने शिव का और स्वयं का अपमान अनुभव किया तो उन्हें क्रोध भी हुआ और उन्होंने यज्ञवेदी में कूदकर अपनी देह त्याग दी। जब भगवान शिव को यह पता हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

क्रुद्ध: सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्वह्लिसटोग्ररोचिषम्।

उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥

ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवं। - श्रीमद् भागवत -4/5/1

अर्थात सती के प्राण त्यागने से दु:खी भगवान शिव ने उग्र रूप धारण कर क्रोध में अपने होंठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ली, जो बिजली और आग की लपट के समान दीप्त हो रही थी। सहसा खड़े होकर उन्होंने गंभीर अठ्ठाहस के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया। इसी से महाभयंकर वीरभद्र प्रगट हुए।

शिव-शक्ति की पूजा, मिलेगा मनचाहा जीवनसाथी
श्रावण कृष्ण नवमी (इस बार 12 जुलाई, गुरुवार) तिथि की आराध्य शक्तिस्वरूपा देवी मां पार्वती हैं। जो इस तिथि को शिव व शक्ति की संयुक्त रूप से विधि-विधान पूर्वक पूजा करता है उसे शिव लोक प्राप्त होता है। इस तिथि को पीले वस्त्र दान करने से धन, वैभव व ऐश्वर्य प्राप्त होता है। युवतियां अगर इस दिन शिव-शक्ति की पूजा करे तो मनचाहा वर मिलता है।

श्रावण कृष्ण नवमी को कुमारी पूजा का भी विधान है। मान्यता के अनुसार कन्याओं को सम्मान देने के लिए यह व्रत किया जाता है। कुमारी पूजा के साथ कुमारी कन्याओं को भोजन भी करवाया जाता है।

किसी भी देवता की पूजा से हो जाती है शिव पूजा! क्योंकि..
हिन्दू धार्मिक परंपराओं में अनेक देवी-देवताओं की उपासना की जाती है। अलग-अलग दिन, तिथि, व्रत, त्योहार खास इच्छाओं को पूरा करने के लिये नियत है। पंचदेव यानी शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य को मानने वाले अलग-अलग भक्त अपनी-अपनी परंपराओं के मुताबिक भक्ति करते हैं।

दरअसल, धर्मशास्त्रों में लिखी कुछ बातों पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि सारे देवी-देवता एक ही ईश्वर के अलग-अलग शक्ति स्वरूप हैं। इन देवी-देवताओं से जुड़े पुराण और शास्त्रों में देव विशेष के साथ अन्य देवताओं की भी महिमा बताई गई है। जैसे शैव पुराणों में भगवान विष्णु और वैष्णव पुराणों में शिव की स्तुति की गई है। इसलिए इनकी भक्ति में भेद या अन्तर नहीं रखने की भी सीख दी गई है।

सूर्य भक्ति के सौरपुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर से कही बात इसका प्रमाण भी है। भगवान श्रीकृष्ण के मुताबिक पूरा जगत ही शिव-शक्ति से पूर्ण है और सभी देवी-देवता इस शक्ति के ही अलग-अलग रूप हैं। लिखा गया है कि -

यो ब्रह्मा स हरि: प्रोक्तो यो हरि: स महेश्वर:। महेश्वर: स्मृत: सूर्य: सूर्य: पावक उच्यते।।

पावक: कार्तिकेयोसौ कार्तिकेयो विनायक:। गौरी लक्ष्मीश्च सावित्री शक्तिभेदा: प्रकीर्तिता:।।

देवं देवीं समुद्दिश्य य: करोति व्रतं नर:। न भेदस्तत्र मन्तव्य: शिवशक्तिमयं जगत्।।

सरल शब्दों में अर्थ है कि ब्रह्मा ही विष्णु, विष्णु ही शिव, शिव ही सूर्य, सूर्य ही कार्तिकेय, कार्तिकेय ही गणेश हैं। इसी तरह गौरी, लक्ष्मी और शक्ति भी एक ही हैं। इसलिए जिस भी देवी-देवता की उपासना, व्रत या पूजा करें तो भेदभाव और बुद्धि न रखें क्योंकि पूरा जगत ही शिव-शक्ति से पूर्ण है।

क्यों शिवलिंग पर चढ़ाएं धतूरा?
भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए पूजा में कुछ विशेष पूजा सामग्री को चढ़ाने का महत्व है। इनमें बेलपत्र, सफेद फूल के साथ धतूरा चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है। बेलपत्र की तरह धतूरा भी शिव को प्रिय बताया गया है। हालांकि धतूरा जहरीला फल होता है। लेकिन सनातन धर्म से जुड़ा हर जन यह जानता है कि शिव ने समुद्र मंथन से निकले गरल यानी जहर को पीकर ही जगत की रक्षा की।

शिव ने विषपान कर ही जगत को परोपकार, उदारता और सहनशीलता का संदेश दिया। शिव पूजा में धतूरे जैसा जहरीला फल चढ़ाने के पीछे भी भाव यही है कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में कटु व्यवहार और वाणी से बचें। स्वार्थ की भावना न रखकर दूसरों के हित का भाव रखें। तभी अपने साथ दूसरों का जीवन सुखी हो सकता है।

शिव को धतूरा प्यारा होने की बात में भी संदेश यही है कि शिवालय में जाकर शिवलिंग पर धतूरा चढ़ाकर मन और विचारों की कड़वाहट निकालने और मिठास को अपनाने का संकल्प लें। ऐसा करना ही शिव की प्रसन्नता के लिए सच्ची पूजा होगी क्योंकि शिव शब्द के साथ सुख, कल्याण व अपनत्व भाव ही जुड़े हैं।

जानिए क्या हैं शिव भक्ति के 5 सही तरीके
क्या आप जानते हैं कि तन, मन और वचन के स्तर पर सच्ची शिव भक्ति, उपासना, साधना और सेवा के सही तरीके या विधान क्या हैं? इसका जवाब शिवपुराण में मिलता है, जिसमें शिव सेवा को शिव धर्म भी कहा गया है। जानिए, शिव भक्ति और सेवा के ये खास रूप -

शिव पुराण के मुताबिक भक्ति के तीन रूप हैं। यह है मानसिक या मन से, वाचिक या बोल से और शारीरिक। सरल शब्दों में कहें तो तन, मन और वचन से भक्ति।

इनमें भगवान शिव के स्वरूप का चिन्तन मन से, मंत्र और जप वचन से और पूजा परंपरा शरीर से सेवा मानी गई है। इन तीनों तरीकों से की जाने वाली सेवा ही शिव धर्म कहलाती है। इस शिव धर्म या शिव की सेवा के भी पांच रूप हैं। ये हैं -

कर्म - लिंगपूजा सहित अन्य शिव पूजन परंपरा कर्म कहलाते हैं।

तप - चान्द्रायण व्रत सहित अन्य शिव व्रत विधान तप कहलाते हैं।

जप - शब्द, मन आदि द्वारा शिव मंत्र का अभ्यास या दोहराव जप कहलाता है।

ध्यान - शिव के रूप में लीन होना या चिन्तन करना ध्यान कहलाता है।

ज्ञान - भगवान शिव की स्तुति, महिमा और शक्ति बताने वाले शास्त्रों की शिक्षा ज्ञान कही जाती है।

इस तरह शिव धर्म का पालन या शिव की सेवा हर शिव भक्त को बुरे कर्मों, विचारों व इच्छाओं से दूर कर शांति और सुख की ओर ले जाती है।

खास बातें! जो पुरुष को रखती हैं बेहद खुश
शास्त्र जीवन में कर्म की अहमियत उजागर करते हैं। असल में कर्म यानी काम ही जीवन की गति और सद्गति नियत करने वाला होता है। खासतौर पर गृहस्थ जीवन की बात करें तो स्त्री-पुरुष दोनों ही गृहस्थी की धुरी होते हैं। किंतु गृहस्थी में अगर पुरुष कर्महीन हो जाए तो उसके निजी जीवन के साथ पूरा परिवार भी कलह और मुश्किलों से घिर सकता है।

दरअसल, काम से दूरी या अभाव ही शरीर, मन और कर्म से जुड़े दोष पैदा करता है। इनके कारण जीवन में भय, चिंता और अशांति प्रवेश करती है। इनसे बचकर निश्चिंत और असुरक्षा के भाव से मुक्त जीवन गुजारने के लिए धर्मशास्त्रों में पुरुषों को कुछ खास सूत्र अपनाने की सीख दी गई है।पौराणिक मान्यता है कि ये बातें स्वयं ब्रह्मदेव ने भगवान शिव के सामने उजागर कीं। जानिए पुरुषों को खुश रखने वाली ये खास बातें -

लिखा गया है कि -

यो धर्मशीलो जितमानरोषो विद्याविनीतो न परोपतापी।

स्वदारतुष्ट: परदारवर्जितो न तस्य लोके भवमस्ति किंचित्।।

न तथा शशी न सलिलं न चन्दनं नैव शीतलच्छाया।

प्रह्लादयति पुरुषं यथा हिता मधुरभाषिणी वाणी।।

धर्मशास्त्र की इस बात के मुताबिक भयमुक्त जीवन के लिए पुरुष इन बातों का पालन करें -

- सम्मान मिलने और क्रोध आने पर खुद को काबू में रखे।

- विनम्र रहे, ज्ञान और विद्या में माहिर बने।

- दूसरों को भारी पीड़ा और दु:ख देने से बचें।

- अपने जीवनसाथी यानी स्त्री के प्रति सम्मान और समर्पण का भाव रखें।

- परायी स्त्री का त्याग करें।

- धर्म का पालन करे। जैसे सत्य, परोपकार, दया, भक्ति आदि भाव चरित्र और स्वभाव में बनाए रखे।

यह भी कहा गया है कि पुरुष को परिजनों, इष्टमित्रों या किसी सज्जन द्वारा भलाई और हित के भाव से बोले गए मीठे बोल इतनी शांति, प्रसन्नता और सुकून देते हैं कि जिनके आगे चन्द्रमा, जल, चन्दन और छाया की ठंडक भी कमतर होती है।

इन बातों में छुपे संयम और धर्म पालन के संकेत पुरुष के अलावा कोई भी इंसान जीवन में उतारे तो सुखी और सफल जीवन बिता सकता है।

शिव के इस अवतार ने काटा था ब्रह्मा का सिर
धर्म ग्रंथों के अनुसार भैरव भी भगवान शंकर के ही अवतार हैं। भगवान शंकर के इस अवतार से हमें अवगुणों को त्यागना सीखना चाहिए। भैरव के बारे में प्रचलित है कि ये अति क्रोधी, तामसिक गुणों वाले तथा मदिरा के सेवन करने वाले हैं। इस अवतार का मूल उद्देश्य है कि मनुष्य अपने सारे अवगुण जैसे- मदिरापान, तामसिक भोजन, क्रोधी स्वभाव आदि भैरव को समर्पित कर पूर्णत: धर्ममय आचरण करें। भैरव अवतार से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि हर कार्य सोच-विचार कर करना ही ठीक रहता है। बिना विचारे कार्य करने से पद व प्रतिष्ठा धूमिल होती है।

काशी के अधिपति हैं भैरव
शिव महापुराण में भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप बताया है। इनके अवतार की कथा इस प्रकार है- एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु में स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। इस विषय में जब वेदों से पूछा गया तब उन्होंने शिव को सर्वश्रेष्ठ एवं परमतत्व कहा। किंतु ब्रह्मा व विष्णु ने उनकी बात का खंडन कर दिया। तभी वहां भगवान शंकर प्रकट हुए। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उनके क्रोध से वहां एक तेज-पुंज प्रकट हुआ और उसमें एक पुरुष दिखलाई पड़ा।

भगवान शिव ने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण तुम साक्षात कालराज हो। तुम से काल भी भयभीत रहेगा, अत: तुम कालभैरव भी हो। मुक्तिपुरी काशी का आधिपत्य तुमको सर्वदा प्राप्त रहेगा। उस नगरी के पापियों के शासक भी तुम ही होंगे। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का एक सिर काट दिया।

गायत्री मंत्र से करें भगवान शिव का पूजन
श्रावण महीना आते ही मन में धर्म व अध्यात्म का प्रकाश फैल जाता है। श्रावण महीने में सत्संग सुनने का विशेष लाभ मिलता है। यह महीना शिव की आराधना के लिए अति उत्तम माना गया है।
पुराणों में वर्णित है कि इस मास में सच्चे मन से शिव की आराधना से शिव प्रसन्न होते हैं। इस महीने की हर तिथि का भी अपना विशेष महत्व है। विशेष तिथि को शिव का विशेष पूजन-अर्चन करने से सभी सुखों का लाभ मिलता है।
श्रावण कृष्ण दशमी (इस बार 13 जुलाई, शुक्रवार) तिथि मां गायत्री को समर्पित है। इस दिन भगवान शिव का सामने गायत्री मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन सफेद वस्त्र दान करने से भगवान शिव व मां गायत्री प्रसन्न होते हैं।

इन वजहों से सवेरे नहाकर करें पूजा-पाठ!
हिन्दू धर्म परंपराओं में देव उपासना या धार्मिक कार्यों के पहले पवित्रता के लिहाज से स्नान करना अहम क्रिया मानी गई है। खासतौर पर सुबह देवपूजा के पहले तीर्थ या पवित्र जल से स्नान को धर्मशास्त्रों ने पापनाशक कहा है। सुबह पाठ-पूजा से पहले नहाने के धार्मिक महत्व के साथ-साथ व्यावहारिक व वैज्ञानिक कारण भी हैं, जो तन के साथ मन को भी स्वस्थ रखते हैं।

दरअसल, रात में आराम से सोने के दौरान शरीर के अलग-अलग अंगों से तरह-तरह के दूषित पदार्थ जैसे लार, पसीना आदि निकलते हैं, इनसे शरीर अपवित्र हो जाता है। सुबह उठने पर शरीर की सफाई न करना, गंदगी से त्वचा छिद्रों के बंद होने या संक्रमण से रोग का कारण बन सकते हैं। इससे बचाव के लिए ही सुबह उठने के बाद स्नान जरूरी है। इससे शरीर सेहतमंद व चुस्त बने रहने के साथ त्वचा की खूबसूरती भी बरकरार रहती है

धार्मिक नजरिए से सवेरे स्नान से जब तन स्वस्थ रहता है तो मन पर भी बुरे विचार हावी नहीं होते। स्वस्थ मन व विचार के आगे दरिद्रता व कमजोरियां टिक नहीं पाती। शास्त्रों में इसे मानसिक पापों का अंत कहा गया है। क्योंकि पवित्र व शुद्ध बुद्धि हर परेशानी का तोड़ निकाल लेती है। चूंकि देव भक्ति में भी तन के साथ मन की पावनता और संयम अहम माने गए हैं, जो सुबह उठने के बाद स्नान द्वारा प्राप्त होते हैं। प्राचीन तपोबली ऋषि-मुनियों ने शरीर को स्वस्थ और जीवन को अनुशासित रखने के मकसद से भी धर्म से जोड़कर स्नान की अहमियत उजागर की। अगर किसी मजबूरी के कारण स्नान करना संभव न हो, तो शास्त्रों में सिर या शरीर पर बिना जल डाले या गीले कपड़े से शरीर को पोंछकर भी स्नान किया जा सकता है, जो 'कायिक स्नान'के नाम से भी जाना जाता है।


कामिका एकादशी इस विधि से करें व्रत, मिलेगी पापों से मुक्ति
14 जुलाई, शनिवार को कामिका एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत करने का विधान है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है। कामिका एकादशी का व्रत इस प्रकार करें-

व्रत विधि

कामिका एकादशी में साफ-सफाई का विशेष महत्व है। व्रती (व्रत करने वाला) व्यक्ति सुबह स्नाना आदि काम निपटा कर सबसे पहले भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद विष्णु प्रतिमा को पंचामृत स्नान कराएं। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और शक्कर शामिल है। इसके बाद पुन: पानी से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान को गंध (अबीर, गुलाल, इत्र आदि सुगंधित वस्तु), चावल, जौ तथा फूल अर्पित करें।

इसके बाद धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु को मक्खन-मिश्री का भोग लगाएं साथ में तुलसी दल अवश्य  चढ़ाएं और अन्त में क्षमा याचना करते हुए भगवान को नमस्कार करें। विष्णु सहस्त्रनाम पाठ का जप अवश्य करना चाहिए।

इस व्रत में क्या खाएं

चावल व चावल से बनी किसी भी चीज कोखाना पूर्णतया वर्जित होता है। व्रत के दूसरे दिन चावल से बनी हुई वस्तुओं का भोग भगवान को लगाकर ग्रहण करना चाहिए। इसमें नमक रहित फलाहार करें। फलाहार भी केवल दो समय ही करें। फलाहार में तुलसी दल का अवश्य ही प्रयोग करना चाहिए। पीने के पानी में भी तुलसी दल का प्रयोग करना उचित होता है।

जानिए, क्या है कामिका एकादशी व्रत की कथा
हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत महत्व है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 14 जुलाई, शनिवार को है। इस व्रत से जुड़ी कथा इस प्रकार है-

एक गांव में एक वीर श्रत्रिय रहता था। एक दिन किसी कारणवश उसकी ब्राह्मण से हाथापाई हो गई और ब्राह्मण की मृत्य हो गई। अपने हाथों मारे गए ब्राह्मण की क्रिया उस श्रत्रिय ने करनी चाही। परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में शामिल होने से मना कर दिया। ब्राह्मणों ने बताया कि तुम पर ब्रह्म हत्या का दोष है। पहले तुम इस पाप का प्रायश्चित करो और इस पाप से मुक्त हो जाओ तब हम तुम्हारे घर भोजन करेंगे।

इस पर श्रत्रिय ने पूछा कि इस पाप से मुक्त होने के क्या उपाय है। तब ब्राह्मणों ने बताया कि श्रावण माह के कृष्ण पश्र की एकादशी को भक्तिभाव से भगवान श्रीविष्णु का व्रत एवं पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराके सदक्षिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति मिलेगी। पंडितों के बताए हुए तरीके से व्रत करने पर रात में भगवान विष्णु ने क्षत्रिय को दर्शन देकर कहा कि तुम्हें ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई है।

इस तरह कामिका एकादशी व्रत करने से क्षत्रिय को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई।

श्रावण कृष्ण एकादशी को ऐसे करें शिव की पूजा
वैसे तो पूरा श्रावण मास ही शिव को समर्पित है। लेकिन पुराणों में आए उल्लेख के अनुसार श्रावण कृष्ण एकादशी (14 जुलाई, शनिवार) के प्रमुख देव विश्वेदेवा हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रावण कृष्ण एकादशी को भगवान शिव का विधि-विधान पूर्वक पूजन करने से समस्त देवताओं का पूजन हो जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को यदि शिव का बिल्वपत्र, धतूरा व आंकड़े के फूल से पूजन किया जाए तो व्यापार-व्यवसाय में उन्नति होती है। इस दिन पीले वस्त्र दान करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

इस तिथि को कामिका एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रत रख कर भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान भी धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है। इस दिन भगवान विष्णु को तुलसीदल चढ़ाते हैं।

जानिए कैसी है कुदरत में समाई शिव की खूबसूरती
हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में पूरी प्रकृति शिव का ही स्वरूप मानी गई है। खासतौर पर वेद भगवान शिव की विराट शक्तियों और महिमा का रहस्य उजागर करते हैं। वेदों में शिव को अनादि, अनंत, जगत की हर रचना का कारण, पालनहार और विनाशक मानकर स्तुति की गई है। वेदों में भी प्रकृति पूजा का ही महत्व व गुणगान है। इसलिए माना भी गया है कि वेद ही शिव है और शिव ही वेद हैं। इस तरह वेद प्रकृति प्रेम के रूप में शिव भक्ति का ज्ञान भी देते हैं।

वैसे शिव शब्द का अर्थ भी कल्याण ही है और व्यावहारिक नजरिए से विचार करें तो जगत के जीवों का कल्याण प्रकृति से जुड़े बिना संभव नहीं है। प्रकृति और जगत का मूल पंचतत्व जल, वायु, आकाश, अग्नि, पृथ्वी माने गए हैं। इन तत्वों में किसी भी रूप और स्तर पर आया दोष संसार के लिए घातक होते हैं। यही कारण है कि शिव के बिना हर जीव शव के समान भी माना गया है। इसलिए मंगल की कामना से ही शिव की साकार और निराकार दोनों ही रूप में उपासना का महत्व भी है।

दूसरी ओर धर्मग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं में बताए शिव के प्रसंगों, शक्ति, स्वरूप, भक्ति और उपासना के उपायों पर विचार करें तो यह साफ हो जाता है कि प्रकृति और शिव एक-दूसरे की ही पर्याय हैं। मसलन शिव और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के वाहनों में चूहे, शेर, सर्प, मोर, नंदी जैसे कमजोर से लेकर ताकतवर और खूबसूरत से लेकर जहरीले जीव प्राकृतिक शत्रुता के बाद भी कल्याणकारी शिव कृपा से जगत के लिए पूजनीय हैं। यह प्रकृति मे रहने वाले जीवों के प्रति प्रेम का संदेश है।

इसी तरह शिव का निवास कैलास पर्वत, गंगा को जटा में धारण करना, शिव उपासना में खासतौर पर वनस्पतियों, फूल, पत्तों, जल यहां तक कि नशीले या विषैले फल-फूलों का चढ़ावा प्रकृति से जुड़ी हर रचना पर्वत, सागर, वन, वृक्ष, जल, वायु आदि को सहेजने और प्रेम का संदेश है। यहीं नहीं शिव भक्ति का महत्व सावन माह के उस विशेष काल में है, जबकि वर्षा ऋतु में प्रकृति की सुंदरता चरम पर होती है।

सार यही है कि मात्र व्यक्तिगत कामनाओं की पूर्ति से शिव भक्ति के धार्मिक उपायों को अपना लेना ही सच्ची शिव उपासना नहीं, बल्कि शिव शब्द के ही मूल भाव कल्याण को जीवन में उतारकर नि:स्वार्थ बन प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा द्वारा प्रकृति और प्राणियों के बीच अटूट संबंध और संतुलन को कायम रखना ही सच्ची शिव भक्ति होगी।


भगवान विष्णु को किसने दिया था सुदर्शन चक्र
भगवान विष्णु के हर चित्र व मूर्ति में उन्हें सुदर्शन चक्र धारण किए दिखाया जाता है। यह सुदर्शन चक्र भगवान शंकर ने ही जगत कल्याण के लिए भगवान विष्णु को दिया था। इस संबंध में शिवमहापुराण के कोटिरुद्रसंहिता में एक कथा का उल्लेख है।

एक बार जब दैत्यों के अत्याचार बहुत बढ़ गए तब सभी देवता श्रीहरि विष्णु के पास आए। तब भगवान विष्णु ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की विधिपूर्वक आराधना की। वे हजार नामों से शिव की स्तुति करने लगे। वे प्रत्येक नाम पर एक कमल पुष्प भगवान शिव को चढ़ाते।

तब भगवान शंकर ने विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनके द्वारा लाए एक हजार कमल में से एक कमल का फूल छिपा दिया। शिव की माया के कारण विष्णु को यह पता न चला। एक फूल कम पाकर भगवान विष्णु उसे ढूंढने लगे। परंतु फूल नहीं मिला। तब विष्णु ने एक फूल की पूर्ति के लिए अपना एक नेत्र निकालकर शिव को अर्पित कर दिया। विष्णु की भक्ति देखकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हुए और श्रीहरि के समक्ष प्रकट होकर वरदान मांगने के लिए कहा।

तब विष्णु ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान मांगा। तब भगवान शंकर ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। विष्णु ने उस चक्र से दैत्यों का संहार कर दिया। इस प्रकार देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली तथा सुदर्शन चक्र उनके स्वरूप के साथ सदैव के लिए जुड़ गया।

भगवान शिव और विष्णु का पूजन
वैसे तो पूरा श्रावण मास ही भगवान शिव की आराधना के लिए उत्तम माना गया है। लेकिन फिर भी यदि कुछ विशेष तिथि को खास विधि द्वारा शिव का पूजन किया जाए तो साधक को अतिशीघ्र उसका फल मिलता है। ऐसा धर्म शास्त्रों में भी उल्लेखित है।

धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रावण कृष्ण द्वादशी (इस बार 15 जुलाई, रविवार) के देवता सच्चिदानंद भगवान विष्णु हैं। इस दिन भगवान शिव के साथ विष्णु का भी पूजन करने से विशेष फल मिलता है। इस तिथि को श्वेत वस्त्र दान करने का विधान भी है। इस दिन भगवान शिव को बिल्वपत्र तथा विष्णु को तुलसीदल चढ़ाने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है।

सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का शुभ योग, ऐसे करें शिव को प्रसन्न
सावन के महीने में इस बार प्रदोष व्रत और सोमवार का शुभ योग बन रहा है। इस शुभ योग के कारण 16 जुलाई को आने वाले सावन सोमवार का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है क्योंकि प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ही किया जाता है और वहीं सावन सोमवार के दिन भी भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। 16 जुलाई, सोमवार को प्रदोष व्रत इस विधि से करें-

- प्रदोष व्रत में बिना जल पीए व्रत रखना होता है। सुबह स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर बेलपत्रगंध, चावल, फूल, धूप, दीप, भोग, फल, पान, सुपारी, लौंग और इलायची भगवान शिव को चढ़ाएं।

- शाम के समय पुन: स्नान करके इसी तरह शिवजी की पूजा करें। शिवजी का षोडशोपचार पूजन करें, जिसमें भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजा करें।

- भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं।

- आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। आठ बार दीपक रखते समय प्रणाम करें। शिव आरती करें। शिव स्त्रोत, मंत्र का जप करें ।

- रात्रि में जागरण करें।

इस प्रकार सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और कष्टों से मुक्ति के लिए प्रदोष व्रत करना चाहिए।

सावन सोमवार: ऐसे करें भगवान महादेव का पूजन
श्रावण कृष्ण त्रयोदशी के देवता कामदेव हैं जो हमारे मन में काम भाव का संचार करते हैं। इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन करने से काम भाव से हमारी रक्षा होती है। इस तिथि को स्वर्ण दान करने का विधान बताया गया है जिससे मनचाहे फलों की प्राप्ति होती है।

इस तिथि को भगवान शिव के निमित्त प्रदोष व्रत भी किया जाता है। सोमवार को त्रयोदशी तिथि होने से इस बार इस व्रत का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सोम प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा भक्त के जीवन से सभी परेशानियां अपने आप ही समाप्त हो जाती है।

जानिए सोम प्रदोष व्रत की कथा
इस बार सावन का महीना बहुत ही खास है क्योंकि इस बार 16 जुलाई को सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का शुभ योग बन रहा है। सोमवार को होने के कारण इसे सोम प्रदोष व्रत भी कहते हैं। सोम प्रदोष से जुड़ी एक कथा भी है जो इस प्रकार है-

व्रत कथा
किसी नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति मर चुका था। उसका एक बेटा भी था। अपना व अपने बेटे के गुजर-बसर के लिए वह सुबह होते ही अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। एक दिन ब्राह्मणी जब घर आ रही थी तब उसे एक घायल लड़का मिला। ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ नगर का राजकुमार था।

शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बन्दी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार उस ब्राह्मणी के घर रहने लगा। जब वह राजकुमार युवा हो गया तब एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने सपने में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया।

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुन: प्राप्त कर आनन्दपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के प्रभाव से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, उसी प्रकार सोम प्रदोष व्रत करने से भगवान शंकर अपने अन्य भक्तों की भी सभी मनोकामना पूरी करते हैं।
भांग का दूध चढ़ाएं भगवान शिव को
सभी देवों के अधिपति भगवान शंकर हैं इसमें कोई संदेह नहीं है। सभी दिन, तिथि, माह, वर्ष आदि भगवान शंकर के ही हैं। भगवान शंकर की आराधना करने के लिए सर्वोत्तम महीना सावन भी इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह शिव को समर्पित है। सावन के हर दिन शिव की अलग-अलग प्रकार की पूजा का विधान धर्म शास्त्रों में लिखा है।

उसी के अनुसार श्रावण कृष्ण चतुर्दशी ( इस बार 17 जुलाई, मंगलवार) तिथि के देवता स्वयं परब्रह्म शंकर हैं। यह तिथि शिव को विशेष प्रिय है। ऐसा उल्लेख है कि इस दिन भगवान शंकर को भांग का दूध चढ़ाने से सभी सुख मिलते हैं। यदि भांग के दूध का प्रसाद के रूप में वितरण किया जाए तो शिव अति प्रसन्न होते हैं।

नागपंचमी को करें यह उपाय, मिलेगी कालसर्प दोष से मुक्ति
जिस किसी भी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष होता है वह जीवन भर किसी न किसी कारण से परेशान रहता है। अधिक मेहनत करने के बाद भी उसे उचित फल नहीं मिलता। नागपंचमी(इस बार 23 जुलाई, सोमवार) के दिन यदि इस दोष के निवारण के लिए उपाय किया जाए तो इस दोष का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है। इसका उपाय इस प्रकार है-

उपाय
नागपंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर किसी शिव मंदिर में जाकर या घर पर ही एकांत में भगवान शिव की प्रतिमा के सामने महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जप करें। प्रत्येक मंत्रजप के साथ एक बिल्वपत्र भगवान शिव पर चढ़ाते रहें।

मंत्र

ऊँ हौं ऊँ जूं स: भूर्भुव: स्व: त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवद्र्धनम्।

उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् भूर्भुव: स्वरों जूं स: हौं ऊँ।।

नागपंचमी के बाद 21 दिन तक इस मंत्र का जप 108 बार करें। इस उपाय से कालसर्पदोष का असर कम होने लगेगा तथा हर कार्य में सफलता मिलने लगेगी।

गीता की यह बात बताए जाने-अनजाने पाप धोने का आसान रास्ता!
हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात साफ करती है साधारण इंसान भी भगवान की विराट स्वरूप के दर्शन कर सभी पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। जानिए यह खास बात -

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय के महात्म्य के मुताबिक जब देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्री हरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक-

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि बुद्धिमान इंसान हर रोज अगर गीता के अध्याय या श्लोक के एक, आधा या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।


कौन थे अश्वत्थामा, क्या वे आज भी जीवित हैं?
महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक अश्वत्थामा भी थे। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार थे। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वह आज भी धरती पर ही निवास करते हैं। भगवान शंकर का यह अवतार हमें संदेश देता है कि हमें सदैव अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि क्रोध ही सभी दु:खों का कारण है। यह गुण अश्वत्थामा में नहीं था। साथ ही एक और बात जो हमें अश्वत्थामा से सीखनी चाहिए वह यह कि जो भी ज्ञान प्राप्त करें उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करें, अधूरा ज्ञान सदैव हानिकारक रहता है। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानते थे लेकिन उसका उपसंहार करना नहीं। फिर भी उन्होंने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिसके कारण संपूर्ण सृष्टि के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। इस तथ्य से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध तथा अपूर्ण ज्ञान से कभी सफलता नहीं मिलती।

द्रोणाचार्य के पुत्र थे अश्वत्थामा
अश्वत्थामा महादेव, यम, काल व क्रोध के अंशावतार थे। महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अश्वत्थामा द्रोणाचार्य के पुत्र थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। महाभारत संग्राम में अश्वत्थामा ने कौरवों की सहायता की थी। हनुमानजी आदि आठ अमर लोगों में अश्वत्थामा का नाम भी आता है। इस विषय में एक श्लोक प्रचलित है-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।

कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।

शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है।

कांवड़ यात्रा में रखें इन बातों का ध्यान क्योंकि...
हमारे देश में प्राचीन काल से कांवड़ यात्राएं निकाली जा रही है। कुछ लोग कांवड़ यात्रा के सिर्फ धार्मिक पक्ष को ही जानते हैं जबकि कांवड़ यात्रा का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। कांवड यात्रा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं-

- कांवड़ यात्रा वास्तव में एक संकल्प होती है, जो श्रद्धालु द्वारा लिया जाता है। कांवड़ यात्रा के दौरान यात्रियों द्वारा नियमों का पालन सख्ती से किया जाता है।

- कांवड़ यात्रियों के लिए किसी भी प्रकार का नशा वर्जित रहता है।

- इस दौरान तामसी भोजन यानी मांस, मदिरा आदि का सेवन भी नहीं किया जाता।

- बिना स्नान किए कांवड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते।

- तेल, साबुन, कंघी करने व अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता।

- कावड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना एवं किसी भी वाहन पर चढऩा भी निषेध है।

- चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कांवर रखने की भी मनाही है।

इस तरह कठिन नियमों का पालन कर कांवड़ यात्री अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं। इन नियमों का पालन करने से मन में संकल्प शक्ति का जन्म होता है।

ये उपाय करने से होगा धन लाभ
कुछ लोग हमेशा धन के अभाव में ही जीते हैं क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि छोटे-छोटे तंत्र उपाय भी बड़ा फायदा दे सकते हैं। सावन के महीने को टोने-टोटके के लिए उपयुक्त माना गया है क्योंकि श्रावण मास भगवान शिव को प्रिय है और तंत्र के देवता भी शिव ही हैं। इसलिए इस समय किए गए टोटके विशेष लाभकारी होते हैं। सावन महीने के किसी भी बुधवार को नीचे लिखा टोटका करने से धन संबंधी समस्याएं दूर हो जाती हैं।

टोटका
सावन महीने के किसी भी बुधवार के दिन शाम के समय सात कौडिय़ां व एक लघु शंख को मसूर की दाल की ढेरी पर स्थापित कर पूर्व दिशा में मुंह रख कर बैठ जाएं। अब मूंगे की माला से निम्न मंत्र का जप करें। पांच माला जप होने पर समस्त सामग्री को किसी निर्जन स्थान पर गड्ढा खोदकर दबा दें। यह पूरी क्रिया ठीक से होने पर आपको धन लाभ होगा।

मंत्र
ऊँ गं गणपतये नम:।

नागपंचमी जानिए महत्व व क्यों पूजते हैं नागों को
श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म के लोग इस दिन नाग को देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं। यह बार यह पर्व 23 जुलाई, सोमवार को है। सोमवार चूंकि भगवान शिव का दिन माना गया है इसलिए इस बार नागपंचमी का महत्व और भी बढ़ गया है।

पुराणों के अनुसार इस दिन नाग के दर्शन व पूजन का विशेष फल मिलता है। जो भी इस दिन नागों की पूजा करता है उसे कभी सर्प भय नहीं होता और न ही उसके परिवार में किसी को नागों द्वारा काटे जाने का भय सताता है। नागपंचमी का पर्व मनाए जाने के पीछे एक कथा भी प्रचलित है जो इस प्रकार है-

किसी नगर में एक किसान परिवार रहता था। एक दिन वह किसान अपने खेत में हल चलाने गया। हल जोतते समय नागिन के बच्चे हल से कुचल कर मर गए। नागिन अपने बच्चों को मरा देखकर दु:खी हुई। उसने क्रोध में आकर किसान, उसकी पत्नी और लड़कों को डस लिया। जब वह किसान की कन्या को डसने गई। तब उसने देखा किसान की कन्या दूध का कटोरा रखकर नागपंचमी का व्रत कर रही है।

यह देख नागिन प्रसन्न हो गई। उसने कन्या से वर मांगने को कहा। किसान कन्या ने अपने माता-पिता और भाइयों को जीवित करने का वर मांगा। नागिन ने प्रसन्न होकर किसान परिवार को जीवित कर दिया। तभी से ऐसी मान्यता है कि श्रावण शुक्ल पंचमी को नागदेवता का पूजन करने से नागों द्वारा किसी प्रकार का कष्ट और भय नहीं रहता।

क्यों बीन बजते ही नाच उठते हैं नाग?
नाग पूजा उसी प्रकृति पूजा का ही अंग है, जिसके तहत कुदरत के रोम-रोम में ईश्वर का वास माना जाता है। ईश्वर का यह प्राकृतिक स्वरूप भगवान शिव के रूप में पूजनीय है। यही कारण है कि सावन माह में आने वाली नागपंचमी (23 जुलाई) की शुभ घड़ी पर नाग पूजा साक्षात् शिव पूजा भी मानी जाती है।

वैसे भी भगवान शंकर को नागों का स्वामी माना गया है। नाग उनके गहने माने गऐ हैं। इसलिए नाग पूजा बहुत शुभ और मंगलकारी मानी गई है। दरअसल, नाग पूजा में पेड़-पौधों, जल, वायु, अन्न, जीव-जन्तुओं आदि के द्वारा मानव पर मेहरबान कुदरत के सम्मान और उसके साथ तालमेल बैठाकर सुखी जीवन जीने का संदेश है।

श्रद्धा और आस्था से भरपूर इस धार्मिक परंपरा के दौरान एक रोचक बात भी देखी जाती है, जिसमें नाग पूजा कर बीन बजाकर नागों को नचाया जाता है। माना जाता है नाग प्रसन्न होकर नाचते हैं जबकि नागों के नृत्य के पीछे जुड़े व्यावहारिक कारण कुछ और होते हैं। आखिर क्या है नाग नृत्य के पीछे छुपा विज्ञान? जानिए-

असल में, नागों के इंसान की तरह कर्णछिद्र सरल शब्दों में कहें तो कान नहीं होते, बल्कि उनकी नज़र बहुत तेज होती है। साथ ही धरती और हवा में होने वाले कंपन, हलचल या फैली गंध को भी वह संवेदनशील त्वचा और नाक के द्वारा ली जाने वाली सांस द्वारा पकड़ लेते हैं। इस तरह उनकी आंखें व अन्य अंग कान का काम करते हैं।

यही वजह है कि जब सपेरे द्वारा बीन बजाने के दौरान घुमाई भी जाती है तो सांप उसकी आवाज सुनकर नहीं, बल्कि उसे देखकर इधर-उधर हिलता-डुलता है, जिसे श्रद्धा और आस्था से यह मान लिया जाता है कि नागदेवता प्रसन्न होकर नृत्य कर रहे हैं।

सार यही है कि सर्प पूजा से जुड़े प्रकृति संरक्षण के मूल भाव व संदेश को समझ व्यवहार में अपनाए न कि मात्र धार्मिक कर्मकाण्ड की खानापूर्ति कर इस उत्सव की इतिश्री कर लें।


श्रावण अमावस्या इस रूप में करें शिव की पूजा
श्रावण कृष्ण अमावस्या (इस बार 19 जुलाई, गुरुवार) का दिन बहुत शुभ होता है। इस समय प्रकृति अपने चरम पर होती है तथा भोले के भक्तों का उत्साह भी देखते ही बनता है। इस दिन हरियाली अमावस्या का पर्व भी मनाया जाता है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार श्रावण कृष्ण अमावस्या की तिथि पितरों को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भूखे को भोजन कराने से पितरों के साथ देवता भी तृप्त हो जाते हैं तथा सभी सुख प्रदान करते हैं। इस दिन शिव का पितृ रूप में विधि-विधान पूर्वक पूजन करने तथा अपने सामथ्र्य के अनुसार भोग लगाने से शिव प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान देते हैं। इस दिन तीर्थ में स्नान-दान का भी विशेष महत्व है, जिससे पितृगण प्रसन्न होते हैं।

हरियाली अमावस्या प्रकृति के करीब जाने का उत्सव
हरियाली अमावस्या का त्योहार श्रावण महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार 19 जुलाई, गुरुवार को है। हरियाली अमावस्या का पर्व मनाने के पीछे कोई धार्मिक कारण तो नहीं है लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष अवश्य है। हरियाली अमावस्या का मूल उद्देश्य लोगों को प्रकृति के निकट लाना है।

हरियाली अमावस्या का पर्व सावन में प्रकृति पर आई बहार की खुशी में मनाया जाता है। छोटे-छोटे गांवों में यह त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। गांवों में इस दिन मेले लगाए जाते हैं तो कहीं दंगल का आयोजन भी किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस दिन पीपल के वृक्ष की पूजा कर उसके फेरे लगाने तथा मालपुए का भोग लगाने की परंपरा भी है। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन हर व्यक्ति को एक पौधा अवश्य रोपना चाहिए ताकि प्रकृति से हमारा आत्मीय संबंध स्थापित हो।

महत्व
हमारी संस्कृति में वृक्षों को देवता स्वरूप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार वृक्ष योनी पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप मानी गई है। परमात्मा द्वारा वृक्षों की रचना परोपकार एवं जनकल्याण के लिए की गई है। हरियाली अमावस्या का पर्व इन वृक्षों व पेड़-पौधों को धन्यवाद प्रेषित करने का त्योहार है।

अवश्य करें पौधारोपण
हमारे धर्म शास्त्रों में पौधारोपण के लिए भी शुभ मुहूर्त बताए गए हैं जैसे- उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद, रोहिणी, चित्रा, अनुराधा, मूल, विशाखा, पुष्य, श्रवण, अश्विनी, हस्त इत्यादि नक्षत्रों में किए गए पौधारोपण शुभ फलदायी होते हैं। लेकिन ऐसी भी मान्यता है कि हरियाली अमावस्या के दिन कभी भी पौधारोपण कर सकते हैं।

देखिए नागों से जुड़ी चमत्कारी देव लीलाएं
पौराणिक मान्यताओं में नाग को देव प्राणी और चमत्कारी शक्तियों से पूर्ण माना गया है। शास्त्रों में नागलोक, इच्छाधारी और मणिधर नागों से जुड़ी रोचक बातें उजागर हैं। सर्प से जुड़ी इन अनूठी बातों के पीछे पुराणों में आए अलग-अलग देवताओं के साथ अद्भुत नाग प्रसंग और व्यावहारिक वजह भी हैं, जिनसे नाग जाति पूजनीय रही है। तस्वीरों के साथ जानिए पुराणों में आए अलग-अलग युग और काल में नागों से जुड़ी कुछ ऐसी ही चमत्कारी देव लीलाओं के साथ नाग पूजा से जुड़ा व्यावहारिक पहलू

नाग भगवान शंकर को प्रिय और उनके स्वामी माने गए हैं। यही कारण है शास्त्रों में 'तनौ सर्पजालं' यानी शरीर पर नागों का जाल, इन शब्दों के साथ भगवान शंकर की महिमा गाई है। माना जाता है कि भगवान शंकर के गले, मस्तक, कान, कमर आदि अंगों पर सर्प आभूषण की तरह लिपटे होते हैं।

शेषनाग को जगतपालक भगवान विष्णु की शैय्या बताया गया है। विष्णु मंत्र में पंक्ति भी आती है कि - 'शांताकारम भुजग शयनं'। माना जाता है कि पृथ्वी भी शेषनाग के सिर पर टिकी है। साथ ही धरती में होने वाले कंपन व हलचल के पीछे भी पाप कर्मों के बढ़ने से शेषनाग का कोप माना जाता है।

समुद्र-मंथन प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग है,जिसमें देव-दानवों द्वारा मंदराचल पर्वत के आस-पास वासुकी नाग लपेटकर मंथन करने पर हलाहल यानी जहर के साथ अमूल्य निधियां निकली।

पौराणिक मान्यताओं में भगवान श्री कृष्ण ने कालिय नाग का मद चूर किया था। यह प्रसंग कालिय
मर्दन के नाम से प्रसिद्ध है।

त्रेतायुग में भगवान श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण और द्वापर युग में श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम भी शेषनाग का अवतार माने गए हैं।

माना जाता है कि रामायण में श्री हनुमान की बुद्धि व ताकत के आगे पराजित हुई सुरसा राक्षसी का संबंध भी नागवंश से था। इसी तरह महाभारत में अर्जुन द्वारा भी नागकन्या से विवाह का प्रसंग है। - यही नहीं वेदों में सर्प को 'अहि' नाम से पुकारा गया है। व्यावहारिक नजरिए से भी सर्प ऐसी जाति है जो पृथ्वी पर सागर से लेकर रेगिस्तान तक और पहाड़ों व जंगलों से लेकर मैदानी इलाको तक में पाई जाती है व मानव जीवन को अनेक तरह से लाभ पहुंचाती है। इस बात को प्राचीन ऋषि-मुनियों ने समझबूझ कर नाग पूजा को धर्म परंपराओं के साथ जोड़ा, जिससे नाग और मानव एक-दूसरे के रक्षक बने रहे और प्रकृति-मानव की कड़ी भी जुड़ी रहे।

नाग को न पिलाएं दूध! क्योंकि..
अक्सर देखा जाता है कि इंसान अपने फायदे के लिए कुदरत के नियमों की अनदेखी करता है या उनमें खलल डालता है। इनका घातक असर आखिरकार इंसानी ज़िंदगी पर ही होता है। खासतौर पर जब बात धर्म परंपराओं के साथ जुड़ी हो तो देव श्रद्धा और आस्था से बंधे मन और भावों को समझाना और उससे बाहर आना कठिन हो जाता है। जानिए ऐसी ही एक धर्म परंपरा से जुड़े मिथक को, जिसे दूर कर धर्म पालन द्वारा हम अपने साथ जगत के हित में सहभागी बन भरपूर सुख व सुकून महसूस करेंगे। तस्वीरों के साथ जानिए नागपंचमी पर नागों को दूध पिलाने की परंपरा कितनी सही है



धार्मिक नजरिए से नागपंचमी का उत्सव नाग पूजा द्वारा सुख, शांति और खुशहाली पाने का माना जाता है। वहीं व्यावहारिक रूप से यह जीवों पर दया और कुदरत से स्नेह का संदेश देता है। इस पवित्र परंपरा का सिलसिला युगों से चला आ रहा है। किंतु कालान्तर में इसी परंपरा का अहम अंग माने जाने लगा - नाग को दूध पिलाना। लोक मान्यता में नाग पूजा की यह रस्म बहुत ही मंगलकारी मानी जाती है, जिसके चलते इस उत्सव पर बड़ी संख्या में सांपों को पकड़कर श्रद्धालुओं द्वारा दूध पिलाया जाता है। लेकिन इस बात के पीछे का सच जानें तो यह साफ हो जाता है कि वरदान की उम्मीद से निभाई जाने वाली यह परंपरा असल में शाप का कारण साबित हो सकती है। इसलिए यहां बताई जा रही इस परंपरा से जुड़ी बातों पर संजीदगी से गौर करें और दूसरों को भी समझाएं

दरअसल, सांप स्वाभाविक रूप से मांसाहारी प्राणी है। उसकी शरीर रचना और अंग भी मांसाहार को पचाने की ही क्षमता रखते हैं। किंतु नागपंचमी पर धार्मिक पुण्य लाभ के भाव से पकड़े गए सांप को दूध पिलाना प्रकृति के खिलाफ होने से नाग जाति के जीवन के लिए संकट का कारण बन जाता है। क्योंकि अलग-अलग तरह के दूध का पाचन न होने या सांप की सूंघने और सांस लेने की अहम शक्ति का प्रमुख अंग नाक के छिद्रों में दूध चले जाने से सांस में बाधा आना नाग की मौत का कारण बन जाता है।

इस तरह इस पुण्य अवसर पर अज्ञानता या अनजाने में उस नाग की मृत्यु का दोष लग सकता है, जिसे हम देवता मानकर सुख और कल्याण का वर चाहते हैं। जीव हत्या के दोष से बचने के लिए नाग पूजा में दूध की कुछ बूंदे नाग पर छिड़कें या शास्त्रों में बताए अन्य उपायों से धर्म लाभ कमा सकते हैं जो पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। इनमें से ही एक उपाय है - शिवलिंग का दूध से अभिषेक यानी दूध की धारा अर्पित करना। शिव नागों के ही देवता है। शिव स्वयं नाग को आभूषण के रूप में अपने अंगों पर धारण करते हैं। इसलिए शिवलिंग पर दूध चढ़ाना नागदेवता के दूध स्नान या पूजा के समान ही है। यहीं नहीं इससे शिव के साथ नाग पूजा का दोहरा पुण्य भी मिलता है।

सांप की इन 3 खूबियों से इंसान को है फायदा
बुराई में अच्छाई, दोष में गुण, नकारात्त्मकता में सकारात्मकता ढूंढ कर बुरे वक्त को अच्छे समय में बदल लेना ही मजबूत और महान चरित्र की पहचान है। जीवन से जुड़े हर पल, बातों और घटनाओं से सबक और प्रेरणा लेने से जीवन को सफल बनाना बहुत आसान हो जाता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में ऐसा ही एक मौका है - नागपंचमी। यह शुभ घड़ी नाग पूजा से जुड़ी है। हालांकि नाग क्रूर, जहरीला और काल का रूप माना गया है, किंतु सर्प के स्वभाव, व्यवहार में भी ऐसी खूबियां हैं, जिनसे इंसानी जीवन को बेहतर तरीकों से साधा जा सकता है। जानिए ये सांप की 3 खास खूबियां के साथ जुड़े जीवन सूत्र -

शक्ति का सदुपयोग - सांप विषैला होता है। उसकी ताकत जहर ही होती है। माना जाता है कि लंबे समय में बना यह थोड़ा-सा जहर भी वह प्राण रक्षा के उद्देश्य से ही उगलता है। इसमें मानव जीवन के लिये सकारात्मक सूत्र खोजे तो वह यही है कि मेहनत के बूते ही शक्ति बटोरें व उसका सही उपयोग करें। अपनी इस क्षमता व कुशलता का अपने और दूसरों के हित के लिए सही वक्त पर इस्तेमाल बेहद कारगर साबित होगा।

भूल सुधार - सांप स्वभाव से एकांतप्रिय माना गया है। यही वजह है कि अक्सर वह सुनसान और निर्जन जगहों पर पाया जाता है। इस बात से यही सकारात्मक सीख लें कि दु:खों, कष्टों या विपत्तियों से घबराकर तनाव व निराशा के साथ अकेलेपन में जीवन गुजारने के बजाय एकांत में अपनी चूक, त्रुटियों पर विचार, मनन करें, उनको स्वीकार करें और अंत में सुधार कर फिर से अपने मकसद की ओर बढ़ चलें, जो एक बुद्धिमान इंसान की ताकत व पहचान भी है।

अच्छाई को अपनाना - शास्त्रों में मणिधर सांपों का जिक्र मिलता है। माना जाता है कि इनके सिर पर दिव्य, चमकदार और बेहद असरदार मणि मौजूद होती है। असल में सिर यानी मस्तिष्क बुद्धि केन्द्र है, जिसका ताकतवर व पवित्र होना बेहद जरूरी है। इसलिए सांप के सिर पर मणि में भी प्रतीकात्मक संदेश है कि हमेशा अच्छे व्यक्ति, विचार और व्यवहार के बारे में चिंतन, मनन और ध्यान कर दिमाग में अच्छाई को स्थान दे। इससे मिली मानसिक शक्ति और ऊर्जा जीवन को सही दिशा से नहीं भटकने देगी।

सर्प स्वभाव व व्यवहार से जुडे़ ये तीन सूत्र जीवन में उतारने पर फौरन ही सुख के साथ शांति और सफलता जीवन में चली आएगी।

जानिए, क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा
सावन में कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा काफी पुरानी है। कई बार लोगों के मन में सहज ही यह प्रश्न उठता है कि कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है? भगवान आशुतोष के जलाभिषेक का क्या महत्व है?

यूं तो कांवड़ यात्रा का कोई पौराणिक संदर्भ नहीं मिलता लेकिन कुछ किवंदतियां हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम, दिग्विजय (पूरी पृथ्वी को जीतने के बाद) के बाद जब मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ) से होकर निकले तो उन्होंने पुरा में विश्राम किया और वह स्थल उनको अत्यंत मनमोहक लगा। उन्होंने वहां पर शिव मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वह हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे । उन्होंने मां गंगा की आराधना की और मंतव्य बताते हुए उनसे एक पत्थर प्रदान करने का अनुरोध किया। यह अनुरोध सुनकर पत्थर रुदन करने लगे। वह देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे। तब भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि जो पत्थर वह ले जाएंगे, उसका चिरकाल तक गंगा जल से अभिषेक किया जाएगा । हरिद्वार के गंगातट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया ।

ऐसी मान्यता है कि जब से भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से कांवड़ यात्रा की शुरूआत हुई। इसी मान्यता के कारण शिवभक्त तमाम कष्टों को सहते हुए हरिद्वार से गंगाजल लाकर पुरेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं । श्रावण मास में यहां कांवड़ियों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

शिव की ऐसी पूजा से मिलते हैं सभी सुख
हिंदू पंचांग का पांचवा महीना यानी श्रावण (सावन) पूरी तरह से भगवान शंकर को समर्पित है। इस महीने में की गई शिव पूजा जीवन भर की गई पूजा से भी श्रेष्ठ फल देती है, ऐसा धर्म ग्रंथों में लिखा है। सावन में हर दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करने का विधान है। इस प्रकार की गई पूजा से भगवान शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। श्रावण मास की शुक्ल प्रतिपदा (इस बार 20 जुलाई, शुक्रवार) के दिन भगवान शिव की पूजा इस प्रकार करना चाहिए-

श्रावण शुक्ल प्रतिपदा
धर्म शास्त्रों के अनुसार प्रतिपदा तिथि के स्वामी अग्निदेव हैं। अत: श्रावण शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को भगवान शिव का पूजन दीप मालाओं तथा धूप से करना चाहिए। पूजन में चावल, फूल, धतूरा, आंकडा, बिल्व पत्र आदि पूजन सामग्री का उपयोग करने से भी शिव प्रसन्न होते हैं। श्रावण मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को शिव मंदिर में शाम को दीपक लगाने से अगले जन्म में सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं भगवान शिव
भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं उतने ही रहस्यमय भी हैं। उनका रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से भिन्न हैं।

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृगचर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी यही है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। संतों का भी एक मात्र वस्त्र भस्म ही है। अघोरी, संन्यासी और अन्य साधु भी अपने शरीर पर भस्म रमाते हैं। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यामित्क कारण भी हैं।

भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्म धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।


स्त्री हो या पुरुष, इस शिव नाम से सीखें सक्सेसफुल लाइफ के 2 फण्डे
शिव के नाम हो या लीला, जीवन जीने की अनेक कलाएं और भरपूर ज्ञान सिखाते हैं। शिव भक्ति में रमकर ही शिव चरित्र में जीवन से जुड़े ज्ञान व रहस्य को समझा और उतारा जा सकता है। शिव के ज्ञान स्वरूप की महिमा को पुराणों में लिखी बात उजागर भी करती हैं। लिखा गया है कि -

शंकराज्ज्ञानमिच्छेतु

यानी शिव से ज्ञान की कामना करनी चाहिए।

शिव के एक अनूठे नाम में सफल जीवन का ऐसा ही ज्ञान छुपा है। अक्सर घर, स्त्री, पुत्र या पैसों की उलझनों में इंसान की सारी उम्र निकलती है और अंत में आ धमकती है मृत्यु। किंतु जीवन का यह सफर अज्ञानता की कमी से अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ थमता है। इसलिए शिव स्वरूप से जुड़े इस नाम में छुपे 2 सूत्र उन सारी इच्छाओं को आसानी से पूरा करने में मदद कर सकते हैं, जिनको पाने के लिए ज्ञान की कमी से जूझना पड़ता है। जानिए यह अनोखा शिव नाम -

शिव का यह नाम व अवतार है- वीरभद्र। शिव के इस नाम में वीर और भद्र, ये दो शब्द ही ऐसे नायाब सूत्र हैं, जिनके बूते जीवन के हर चरण में मनचाही सफलता को पाना आसान बनाया जा सकता है।

दरअसल, यहां वीरता का संबंध तन, मन व वचन तीनों से है, जो पराक्रम व साहस के साथ सत्य, पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प के रूप में उजागर होती है। इसी तरह भद्र होने के पीछे भी संदेश है कि चरित्र और आचरण को पवित्र रखें। तन, मन व बोल में संयम, अनुशासन व विनम्रता कायम रखें। अहंकार से बचें।

इस तरह वीरभद्र शब्द जुड़कर सीख यही देते हैं कि हर इंसान शिव की तरह शक्ति संपन्न यानी बलवान होने पर भी मन, वचन व कर्म में संयम, शांति व नम्रता को भी स्थान दे तो मनचाही सफलता और यशस्वी जीवन की कामना पूरी करना बेहद आसान है।

करें अनाज का दान, होगी हर मुराद पूरी
सावन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि (इस बार 21 जुलाई, शनिवार) के स्वामी स्वयं परमपिता ब्रह्मा हैं। इस तिथि को भगवान शंकर के साथ ब्रह्मा की भी पूजा करने से अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है। शिव को बिल्वपत्र चढ़ाकर यथा शक्ति अन्न का दान करने से शिव प्रसन्न होते हैं। यह विधि पांच दिन तक करनी चाहिए।

जो भी व्यक्ति इस दिन अन्न दान करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है तथा ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। भगवान शिव के निमित्त व्रत भी इस तिथि को रखना चाहिए।
करें शिव-पार्वती व गणेश का पूजन
श्रावण महीने में प्रत्येक दिन भगवान शिव की पूजा का अलग विधान है। इस बार 22 जुलाई, रविवार को श्रावण शुक्ल तृतीया व चतुर्थी का विशेष योग बन रहा है। तृतीया तिथि के दिन माता पार्वती की पूजा का विधान है उसी प्रकार चतुर्थी के देवता भगवान गणेश हैं। इसलिए इस दिन भगवान शिव-पार्वती और गणेश का पूजन करना विशेष लाभकारी रहेगा।

इस दिन हरियाली तीज का योग भी बन रहा है साथ ही दोपहर बाद चतुर्थी तिथि प्रारंभ होने से विनायकी चतुर्थी का व्रत भी इस दिन किया जाएगा। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव-पार्वती और गणेश की संयुक्त रूप से पूजा करने से सभी दु:खों का नाश हो जाता है और हर मनोकामना पूरी होती है। रविवार को भगवान शिव को बिल्प पत्र और धतूरा अर्पित करें। माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें व गणेशजी को लड्डू तथा दूर्वा चढ़ाएं। इस प्रकार पूजन से आपकी हर मनोकामना पूरी होगी।

जब शिव का यह अवतार नृसिंह भगवान को पूंछ में लपेट उड़ गया
भगवान शंकर का ही एक और रूप है शरभ अवतार। शरभ अवतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (धर्म शास्त्रों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। भगवान शंकर का यह अवतार चपलता, शक्ति तथा बुद्धि का प्रतीक है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम किसी बलशाली से युद्ध करने जा रहे हैं तो स्वयं को परिपक्व कर लें तभी हमारी विजय सुनिश्चित होगी। शरभावतार के स्वरूप में विद्यमान मृग फुर्ती तथा शरभ पक्षी बुद्धि तथा शक्ति का परिचायक है। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था।

ऐसे हुआ शरभावतार
लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है। इसके अनुसार हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। नृसिंह भगवान जब प्रकट हुए तब सब भयभीत हो गए। हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। देवताओं का भय दूर करने के लिए शिवजी ने अपने अंश भैरवरूप वीरभद्र को आज्ञा दी कि भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि को शांत करो। वीरभद्र भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई और उनके बीच विवाद हो गया। अंतत: शिवकृपा से वीरभद्र का रूप अत्यंत भयंकर, व्यापक एवं विस्तृत हो गया। शरभरूप शिव अपनी पूंछ में नृसिंह को लपेटकर छाती में चोंच का प्रहार करते हुए ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की। इस प्रकार शरभावतार लेकर भगवान शिव ने नृसिंह को शांत किया।

इस नदी का नाम लेते ही भाग जाते हैं सांप!
हिन्दू महीना सावन कालों के काल महाकाल यानी भगवान शिव की भक्ति का शुभ काल है। इसका एक व्यावहारिक पहलू तब सामने आता है जब शिव को ही प्रिय काल रूप नाग जाति इस काल में ज्यादा सक्रिय होती है। इसमें नागपंचमी के रूप में नाग पूजा का भी विशेष दिन नियत हैं।

हिन्दू धर्म पंचांग के मुताबिक सावन से शुरू चातुर्मास के चार माह नाग जाति का प्रजनन या मिलन काल भी माना जाता है। वहीं इस दौरान बारिश के पानी से उनके प्राकृतिक आवास खत्म जाते हैं और वहां से बाहर निकलने पर उनका सामना इंसान व अन्य जीवों के साथ होता है।

इस दौरान होने वाले टकराव के दौरान संकोची और संवेदनशील मानी जाने वाली नाग जाति का आत्मरक्षा के लिए आक्रामक होकर डंसना मनुष्य और अन्य जीवों के लिए प्राणघातक होता है।

शास्त्रों में इस विशेष काल में सांपों के काटने से बचने के लिए अहम सावधानियां और उपचार बताए गए हैं। किंतु कुछ ऐसे धार्मिक उपाय भी उजागर किए गए हैं जो आसान होने के साथ सर्प और उसके भय से छुटकारा देने में असरदार भी हैं। माना जाता है कि इनको अपनाने से सांप आस-पास भी नहीं फटकते।

विष्णु पुराण में ऐसा ही एक सरल उपाय बताया गया है। लिखा गया है कि -

नर्मदायै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो: निशि।

नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि माँ त्राहि मां विषसर्पत:।।

इसका सरल शब्दों में मतलब है कि नर्मदा नदी का नाम लेनेभर से सांप भाग जाते हैं। क्योंकि पौराणिक मान्यताओं में नर्मदा नदी को भगवान शिव की पुत्री भी माना गया है और नागों के स्वामी भगवान शंकर ही हैं।


इस आसान विधि से करें नागदेवता का पूजन
श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 23 जुलाई, सोमवार को है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने का विधान है। पूजा की विधि इस प्रकार है-

नागपंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें इसके बाद नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह मंत्र बोलें-

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।

शंखपाल धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।

एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।

सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।।

तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

इसके बाद व्रत-उपवास एवं पूजा-उपासना का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, पुष्प, धूप, दीप से पूजन करें तथा सफेद मिठाई का भोग लगाएं। तत्पश्चात यह प्रार्थना करें-

सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।।

ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।

ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।

ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।

प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जप करें-

ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

इसके पश्चात सर्प सूक्त का पाठ करें-

ब्रह्मलोकुषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।

नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

इसके बाद नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें। इस प्रकार पूजन करने से नागदेवता प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं।

शिव के साथ करें शेषनाग का पूजन
सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी (इस बार 23 जुलाई, सोमवार) का पर्व मनाया जाता है। इस तिथि के देवता भगवान शेषनाग हैं।

इस दिन शिव तथा शेषनाग का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक का महत्व है। शिव-शेषनाग की पूजा से काल का भय और कष्ट दूर होते हैं। सरल अर्थ में विपरीत समय भी अनुकूल हो जाता है।

नागपंचमी कापर्व हमें सीखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर चीज चाहे वह कोई प्राणी हो या कोई वनस्पति, का हमें आदर व सम्मान करना चाहिए। क्योंकि यह सब ईश्वर का ही रचना है। ऐसा करके हम ईश्वर की ही आराधना करते हैं।

सूर्य की इन अद्भुत शक्तियों से बनता, चलता और मिट जाता है संसार
हिन्दू धर्म के प्रमुख पांच देवताओं में एक भगवान सूर्य की शक्ति व स्वरूप की महिमा बताने वाले भविष्य पुराण में सूर्यदेव को ही परब्रह्म यानी जगत की बनाने, पालने और मिटाने वाली शक्तियों का स्वामी माना गया है।

पौराणिक मान्यता के मुताबिक ये तीन काम सूर्यदेव अपने 12 शक्ति स्वरूपों के जरिए पूरा करते हैं, जो सूर्यदेव की 12 मूर्तियों के रूप में भी पूजनीय है। ये जगत में अलग-अलग रूपों में स्थित हैं। इसलिए सूर्य उपासना में सूर्य के साथ इन 12 मूर्तियों का स्मरण सभी सांसारिक सुख और जबर्दस्त सफलता देने वाला माना गया है। जानिए सूर्य की इन 12 मूर्तियों के नाम, काम व स्थिति -

इन्द्र - यह देवराज होकर सभी दानव रूपी दुष्ट शक्तियों का नाश करती है।

धाता - यह प्रजापति होकर सृष्टि की रचना करती है।

पर्जन्य - यह सूर्य की किरणों में बसकर वर्षा करती है।

पूषा - यह मंत्रों में स्थित होकर जगत का पोषण व कल्याण करती है।

त्वष्टा - यह पेड-पौधों, जड़ी-बूटियों में बसती है।

अर्यमा - पूरे जगत में ही बसती है व जगत रक्षक है।

भग - यह धरती और पर्वतों में स्थित है।

विवस्वान् - अग्रि में स्थित हो जीवों के खाए अन्न का पाचन करती है।

अंशु - चन्द्रमा में बसकर पूरे जगत को शीतलता प्रदान करती है।

विष्णु - यह अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लेती है।

वरुण - यह समुद्र में बसकर जल द्वारा जगत को जीवन देती है। यही वजह है कि समुद्र का एक नाम वरुणालय भी है।

मित्र - यह चन्द्रभागा नदी के तट पर मित्रवन नामक स्थान पर स्थित है। मान्यता है कि सूर्यदेव ने यहां मात्र वायु ग्रहण कर तपस्या की। यह मूर्ति जगत के जीवों को मनचाहे वर प्रदान करती है।

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक सूर्यदेव की उपासना द्वारा इन 12 मूर्तियों का स्मरण और भक्ति न केवल सभी पापों से मुक्त करती है, बल्कि पद, प्रतिष्ठा, समृद्धि और वैभव प्रदान करती है। इसके लिए रविवार, संक्रांति और सप्तमी तिथि का विशेष महत्व है।

कल्कि जयंती कलयुग के अंत में होगा भगवान विष्णु का यह अवतार
पुराणों में भगवान विष्णु के दशावतारों का वर्णन है। इनमें से नौ अवतार हो चुके हैं, दसवें अवतार का आना अभी शेष है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु का यह अवतार कल्कि अवतार कहलाएगा। पुराणों के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (इस बार 24 जुलाई, मंगलवार) को यह अवतार होगा, इसलिए इस दिन कल्कि जयंती का पर्व मनाया जाता है।

धर्म ग्रंथों में भगवान विष्णु के कल्कि अवतार के बारे में विस्तृत वर्णन है। उसके अनुसार कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।

भारत में कल्कि अवतार के कई मंदिर भी हैं, जहां भगवान कल्कि की पूजा होती है। यह भगवान विष्णु का पहला अवतार है जो अपनी लीला से पूर्व ही पूजे जाने लगे हैं। जयपुर में हवा महल के सामने भगवान कल्कि का प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान कल्कि के साथ ही उनके घोड़े की प्रतिमा भी स्थापित है।

पुत्र प्राप्ति के लिए करें शिव-कार्तिकेय पूजन
धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रत्येक दिवस तथा तिथि किसी विशेष देवता को समर्पित रहती है। उस तिथि को उस देव की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से विशेष लाभ होता है तथा मनोवांछित फल मिलता है। ग्रंथों के अनुसार यह सभी देवता भगवान शंकर के ही रूप हैं। इस तरह यह पूजा भगवान शंकर को ही अर्पित रहती है।

सभी दिवसों तथा तिथियों के स्वामी भगवान शंकर को श्रावण मास विशेष प्रिय है। इस मास में हर दिन शिव का विशेष तरीके से पूजन करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। श्रावण शुक्ल षष्ठी तिथि (इस बार 24 जुलाई, मंगलवार) शिव पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। अत: श्रावण शुक्ल पक्ष  के छठे दिन भगवान शंकर एवं कार्तिकेय का पूजा एक साथ करने से जन्मों-जन्मों का पापों से मुक्ति मिल जाती है। ऐसा करने से धन, वैभव व पुत्र की प्राप्ति होती है।

श्रीरामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जयंती
श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। इस बार उनकी जयंती 25 जुलाई, बुधवार को है। तुलसीदासजी एक महान कवि थे। उनका जन्म राजापुर गाँव (वर्तमान बाँदा जिला) उत्तर प्रदेश में हुआ था।

अपने जीवनकाल में तुलसीदास जी ने 12 ग्रंथ लिखे और उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है जो मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता थे। श्रीराम जी को समर्पित ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस वाल्मीकि रामायण का ऐसा अवधी रुपांतरण है जिसमें अन्य भी कई रचनाओं से महत्वपूर्ण सामग्री समाहित की गयी थी। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।

ऐसा माना जाता है कि तुलसीदासजी ने हनुमान तथा राम-लक्ष्मण के साथ ही भगवान शिव-पार्वती के साक्षात दर्शन प्राप्त किए थे। इस संबंध में एक दोहा भी प्रचलित है-

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।

तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

भगवान श्रीराम की महिमा का वर्णन जिस प्रकार श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने किया है, वैसा वर्णन किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता। यही कारण है श्रीरामचरितमानस को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास को भी हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

करें शिव-सूर्य पूजन, मिलेगी बुद्धि व बल
धर्म शास्त्रों के अनुसार सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्यदेव हैं। अत: इस तिथि को सूर्य की उपासना करना चाहिए। इस प्रकार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में पडऩे वाली सप्तमी तिथि (इस बार 25 जुलाई, बुधवार)) को भगवान शिव व सूर्य का संयुक्त रूप से पूजन करने का विधान है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर सूर्यदेव को अध्र्य अर्पित करें तथा लाल रंग के फूल चढ़ाएं। इसके बाद भगवान शिव की विधि-विधान पूर्वक पूजा करें, उन्हें धतूरा व बिल्वपत्र चढ़ाएं। ऐसा करने से सभी प्रकार के रोगों का नाश हो जाता है। यदि नित्य इस विधि को करें तो बल, बुद्धि, वीर्य व तेज की वृद्धि भी होती है।

किस व्यक्ति से किस तरह बनाएं तालमेल?
इंसान तन और धन से कितना ही सबल और सक्षम हो, किंतु जीवन को सफल और सुखी बनाने के लिए मात्र किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी बहुत ही जरूरी है। इसके तहत मानवीय व्यवहार को समझना और पहचानना भी अहम होता है। इंसान के स्वभाव को जानने की इस कला से जीवन के लक्ष्यों को पाना आसान हो सकता है।

अगर आप भी सामाजिक या कार्यक्षेत्र में इसी व्यवहार कुशलता की कमी से असहज महसूस करते हैं तो यहां बताई जा रही शास्त्रों में लिखी बातों से आप भी सीख सकते हैं कि किस व्यक्ति से कैसा व्यवहार कर तालमेल बनाना चाहिए?

लिखा गया है कि - लुब्धमर्थप्रदानेन श्लाघ्यमञ्जलिकर्मणा। मूर्खं छन्दानुवृत्या च याथातथ्येन पण्डितम्।। सद्भावेन हि तुष्यन्ति देवा: सत्पुरुषा द्विजा:। इतरे खाद्यापानेन मानदानेन पण्डिता:।। इस श्लोक के मुताबिक पहली बात यह उजागर करती है कि सज्जन या उदार व्यक्ति को हाथ जोड़कर प्रणाम कर अपना बनाएं।

लालची या कंजूस व्यक्ति अर्थ यानी धन देकर मदद को तैयार हो जाता है।

अज्ञानी, किसी विषय की समझ न रखने वाला या मूर्ख व्यक्ति तारीफ करने से खुश हो जाता है।

ज्ञान की बातों द्वारा विद्वान लोगों की सहायता व कृपा मिल जाती है।

पवित्र व सद्भावों से देव पूजा व भक्ति भगवान की अपार कृपा बरसाने वाली होती है।
भला इंसान या साधारण व्यक्ति खान-पान से प्रसन्न होकर मददगार बन जाता है।

सेवा व मान-सम्मान द्वारा पण्डित व गुणीजन संतुष्ट होते हैं। व्यावहारिक जीवन का सफर भी ऐसे लोगों के संपर्क में आकर ही आगे बढ़ता है। इसलिए इन बातों में नकारात्मक या कुतर्क पर विचार न कर व्यवहार कुशलता का मूल भाव अपनाकर जिंदगी में आने वाली हर बाधा को पार करते चले।


साईं की इन 3 बातों से लाइफ को करें बेहतर ढंग से मैनेज
हिन्दू धर्म मान्यताओं में जगद्गुरु साईं बाबा को महायोगी भगवान दत्तात्रेय का अवतार भी माना जाता है। दत्तात्रेय भक्ति की तरह ही सांई भक्ति और नाम स्मरण जीवन पर मण्डराए संकट का फौरन अंत करने वाला और मनोरथ सिद्ध करने वाला माना गया है।

गुरुवार का दिन साईं बाबा की पूजा व स्मरण का विशेष व शुभ दिन माना जाता है। धार्मिक आस्था है कि साईं बाबा का किसी भी रूप में स्मरण मंगलकारी ही है। किंतु हर भक्त का भी यह कर्तव्य बनता है कि साईं बाबा की बताई तीन बातों को हमेशा जेहन में रखें। अन्यथा साईं भक्ति की सार्थकता कहीं खो जाती है। क्या हैं वे तीन बातें? जानिए -

श्रद्धा - साईं का यह सूत्र मात्र धार्मिक अर्थों में ही नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अहम है। श्रद्धा के पीछे यही संदेश है कि जीवन में आप जिस भी रिश्ते या काम से जुड़ें उसके प्रति समर्पण, निष्ठा और ईमान के साथ-साथ त्याग भाव रखें।

सबूरी - साईं का एक ओर सूत्र जीवन में सुखी रहने का श्रेष्ठ उपाय है। यह  है - सबूरी। इसके पीछे भाव यही है कि संतोष, धैर्य या संयम द्वारा जीवन में स्थिरता और आनंद लाएं। असंतोष या असंयम बैचेनी, कलह या संताप का ही कारण बनते हैं।

एकता - साईं बाबा का यह सूत्र बताता है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। धर्म की कट्टरता व संकीर्णता से बचकर हर धर्म का सम्मान व अलग-अलग ईश्वर के रूपों को एक मानकर दर्शन और विश्वास प्रेम, परोपकार, दया, त्याग जैसी धर्म भावों को बनाए रखता है। साईं बाबा ने इसी भावना को 'सबका मालिक एक' बोलकर एक सूत्र में पिरोया।


महज इस छोटे से तरीके से करें चिंताओं को चित
जीवन अनिश्चिताओं से भरा माना जाता है। वक्त कब, किस तरफ करवट लेगा, यह कोई नहीं जानता। यही वजह है कि कई मौकों पर हर इंसान बीते समय की अच्छी-बुरी बातों से सबक सीख अच्छे भविष्य की आशाओं के साथ कोशिशें करता है। किंतु वक्त के उतार-चढ़ाव से उसका मन समय-समय पर चिंताओं से भी घिर जाता है, जो अच्छी सोच पर सीधे असर डालती है। डावांडोल मन से काम भी बिगड़ जाते हैं।

शास्त्रों में चिंता और दु:ख से घिरी ऐसी मानसिक स्थिति के लिए एक छोटी-सी बात की समझ न रखना भी कारण माना गया है। इसे अनेक मौकों पर समझदार या विद्वान व्यक्ति भी भूलकर बेचैन और चिंतित हो जाता है। जानिए क्या है शास्त्रों में बताया चिंताओं को दूर करने का बेहतरीन और आसान सूत्र?

शास्त्रों के मुताबिक अज्ञानता ही दु:ख या चिंता का कारण है। इस संबंध में योगवशिष्ठ नामक ग्रंथ मंन ऋषि वशिष्ठ ने श्रीराम को यह बताते हुए कि ज्ञान के बिना सांसारिक कलह का अंत संभव नहीं, कहा है कि -

ज्ञानान्निदु:खतामेति ज्ञानादज्ञानसंक्षय:।

ज्ञानादेव परासिद्धिर्नान्यस्माद् राम वस्तुत:।।

सवाल यही उठता है कि वह ज्ञान क्या है? इसी ज्ञान को सरल शब्दों में समझें तो शास्त्रों में साफ लिखा है कि चूंकि अच्छे-बुरे काम ही सुख और दु:ख नियत करते हैं, जिनका सामना हर इंसान को करना ही पड़ता है लिहाजा इनसे बचना संभव नहीं। इसलिए चिंता या पीड़ाओं से भयभीत होने के बजाय एक छोटा-सा सूत्र हमेशा ध्यान रखना चाहिए। यह सूत्र है -

यद्भावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा।

इति चिन्ताविषघ्रोयमगद: किन्न पीयते।।

इसका मतलब है जो घटित होना है या होनहार है वह टल नहीं सकती और जो नहीं होना है या होनहार नहीं है, वह बात कभी नहीं होगी। इसलिए व्यर्थ चिंता कर मन को न जलाकर जीवन को चिता की ओर न मोड़ें।

हर इंसान अगर इस सूत्र को मन-मस्तिष्क में उतारकर रखे तो नियत लक्ष्य को पाने के संकल्प के साथ शांत और निश्चिंत जीवन गुजारना आसान हो जाएगा।



करें शिव का रुद्राभिषेक, मिलेगा यश व सम्मान
श्रावण महीने का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। श्रावण का अर्थ है सुनना। अर्थात यह समय सत्संग सुनने का है। इस महीने में भगवान शिव का विभिन्न प्रकार से पूजन करने से विशिष्ठ लाभ प्राप्त होते हैं। ऐसा धर्म शास्त्रों में भी लिखा है। इस महीने में प्रत्येक तिथि को शिव का विशेष प्रकार से पूजन करने से सभी सुख मिलते हैं।

यदि आप चाहते हैं कि आपके यश यानी इज्जत में लगातार वृद्धि हो तो इसके लिए श्रावण शुक्ल अष्टमी (इस बार 26 जुलाई, गुरुवार) के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें। इस तिथि के देवता स्वयं शिव हैं इसलिए इस दिन शिव का रुद्राभिषेक द्वारा पूजन करने से तीनों लोक में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो शिव प्रदान नहीं करते। यश, मान व सम्मान सभी प्रकार से भगवान शंकर अपने भक्तों को प्रसन्न करते हैं।

जानिए कितनी तरह के होते हैं रुद्राक्ष, कब और क्यों पहनें
हिंदू धर्म में रुद्राक्ष का विशेष महत्व है क्योंकि यह भगवान शंकर के स्वरूप से जुड़ा हुआ है। भगवान शंकर के उपासक इन्हें माला के रूप में पहनते हैं। रुद्राक्ष का अर्थ है रुद्र अर्थात शिव की आंख से निकला अक्ष यानी आंसू। शिवमहापुराण के विद्येश्वरसंहिता में रुद्राक्ष के 14 प्रकार बताए गए हैं। सभी का महत्व व धारण करने का मंत्र अलग-अलग हैं। इन्हें पहनने से मिलने वाले फल भी भिन्न ही हैं। सावन में इन्हें पहनने से विशेष लाभ मिलता है। जानिए रुद्राक्ष के प्रकार, उन्हें धारण करने के मंत्र तथा मिलने वाले फलों के बारें में-

1- एक मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप है। यह भोग और मोक्ष प्रदान करता है। जहां इस रूद्राक्ष की पूजा होती है वहां से लक्ष्मी दूर नहीं जाती अर्थात जो भी इसे धारण करता है वह कभी गरीब नहीं होता। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं नम:

2- दो मुख वाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है। यह संपूर्ण कामनाओं और मनोवांछित फल देने वाला है। जो भी व्यक्ति इस रुद्राक्ष को धारण करता है उसकी हर मुराद पूरी होती है। धारण करने का मंत्र- ऊँ नम:

3- तीन मुख वाला रुद्राक्ष सफलता दिलाने वाला होता है। इसके प्रभाव से जीवन में हर कार्य में सफलता मिलती है तथा विद्या प्राप्ति के लिए भी यह रुद्राक्ष बहुत चमत्कारी माना गया है। धारण करने का मंत्र- ऊँ क्लीं नम:

4- चार मुख वाला रुद्राक्ष ब्रह्मा का स्वरूप है। उसके दर्शन तथा स्पर्श से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं नम:

5 - पांच मुख वाला रुद्राक्ष कालाग्नि रुद्र स्वरूप है। वह सब कुछ करने में समर्थ है। सबको मुक्ति देने वाला तथा संपूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। इसको पहनने से अद्भुत मानसिक शक्ति का विकास होता है। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं नम:

6 - छ: मुख वाला रुद्राक्ष भगवान कार्तिकेय का स्वरूप है। इसे धारण करने वाला ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। यानी जो भी इस रुद्राक्ष को पहनता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं हुं नम:

7 - सात मुख वाला रुद्राक्ष अनंगस्वरूप और अनंग नाम से प्रसिद्ध है। इसे धारण करने वाला दरिद्र भी राजा बन जाता है। यानी अगर गरीब भी इस रुद्राक्ष विधिपूर्वक पहने तो वह भी धनवान बन सकता है। धारण करने का मंत्र- ऊँ हुं नम:

8 - आठ मुख वाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरवस्वरूप है। इसे धारण करने वाला मनुष्य पूर्णायु होता है। यानी जो भी अष्टमुखी रुद्राक्ष पहनता है उसकी आयु बढ़ जाती है और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। धारण करने का मंत्र- ऊँ हुं नम:

9 - नौ मुख वाले रुद्राक्ष को भैरव तथा कपिल-मुनि का प्रतीक माना गया है। भैरव क्रोध के प्रतीक हैं और कपिल मुनि ज्ञान के। यानी नौमुखी रुद्राक्ष को धारण करने से क्रोध रखा जा सकता है साथ ही ज्ञान की प्राप्ति भी हो सकती है। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं हुं नम:

10 - दस मुख वाला रुद्राक्ष भगवान विष्णु का रूप है। इसे धारण करने वाले मनुष्य की संपूर्ण कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं नम:

11 - ग्यारह मुखवाला रुद्राक्ष रुद्ररूप है इसे धारण करने वाला सर्वत्र विजयी होता है। यानी जो इस रुद्राक्ष को पहनता है किसी भी क्षेत्र में उसकी कभी हार नहीं होती। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं हुं नम:

12 -बारह मुखवाले रुद्राक्ष को धारण करने पर मानो मस्तक पर बारहों आदित्य विराजमान हो जाते हैं। यानी उसके जीवन में कभी इज्जत, शोहरत, पैसा या अन्य किसी वस्तु की कोई कमी नहीं होती। धारण करने का मंत्र- ऊँक्रौं क्षौं रौं नम:

13 - तेरह मुख वाला रुद्राक्ष विश्वदेवों का रूप है। इसे धारण कर मनुष्य सौभाग्य और मंगल लाभ प्राप्त करता है। धारण करने का मंत्र- ऊँ ह्रीं नम:

14 - चौदह मुख वाला रुद्राक्ष परम शिवरूप है। इसे धारण करने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। धारण करने का मंत्र- ऊँ नम:

रक्षा बंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है ये त्योहार
हर साल श्रावण महीने की पूर्णिमा को रक्षा बंधन का पर्व बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और उसके उज्जवल भविष्य की कामना करती हैं। वहीं भाई भी जीवन भर अपनी बहनों को रक्षा का वचन देते हैं। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का अनुपम उदाहरण है। इस बार यह पर्व 2 अगस्त, गुरुवार को है।

बहनों को इस पर्व का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार रहता है। वहीं भाई भी बहनों के घर आने की बाट जोहते हैं। जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है तो वे यह कामना करती हैं कि उसके भाई के जीवन में कभी को कष्ट न हो, वह उन्नति करें और उसका जीवन सुखमय हो। वहीं भाई भी इस रक्षा सूत्र को बंधवाकर गौरवांवित अनुभव करता है और जीवन भर अपनी बहन की रक्षा करने की कमस खाता है। यही स्नेह व प्यार इस त्योहार की गरिमा को और बढ़ा देता है।

रक्षा बंधन सिर्फ एक त्योहार ही नहीं है बल्कि इसका एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जो भाइयों को उनकी बहनों के प्रति जिम्मेदारी को व्यक्त करता है। यह जिम्मेदारी सिर्फ बहनों की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन भर उसके सुख-दु:ख में साथ देने की है।

जानिए, कैसे हों माता-पिता के साथ बोल-वचन?
हिन्दू धर्मग्रंथ रामचरितमानस में व्यावहारिक जीवन के लिए यही संदेश छुपा है कि मर्यादाओं के पालन से साधारण इंसान भी समाज में ऊंचा दर्जा पा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो यह आम जन को जीने के सलीके सिखाता है। स्वयं भगवान द्वारा अवतरित होकर मानव योनि में जन्म लेना और मानव जीवन की अहमियत और श्रेष्ठता को स्थापित करना भी इस ग्रंथ के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा का कारण है।

आज, जबकि यह देखा जाता है कि जरूरतों व सुविधाओं की पूर्ति या मान-सम्मान के मसले पर दो पीढ़ियों के वैचारिक मतभेद या यूं कहें कि माता-पिता और संतान में भी टकराव के हालात पैदा हो रहे हैं। इससे बनी संवादहीनता की स्थिति रिश्तों में दूरियां और अलगाव पैदा कर दु:खों का सिलसिला शुरू कर देती है। रामचरित मानस में ऐसी ही समस्याओं को दूर करने के सूत्र बताए गए हैं। राम और मानस की गहराई में उतरकर जानिए कुछ ऐसे ही सूत्र। रामचरित मानस में चौपाई है -
प्रात:काल उठि कै रघुनाथ।

मात-पिता-गुरु नावइ माथा।।

इस चौपाई के माध्यम से भगवान राम की माता-पिता और गुरु के लिए गहरी आस्था और सम्मान का भाव बताया गया। किंतु इसके पीछे व्यक्तित्व और चरित्र विकास का सूत्र है। इससे माता-पिता से ही नहीं आपके प्रेरक, मार्गदर्शक से भी गहरे और मधुर संबंध ताउम्र रखे जा सकते हैं।  

इस चौपाई का अर्थ सुबह उठकर माता-पिता और गुरु को प्रणाम करने की परंपरा निभाना मात्र ही नहीं है बल्कि मूल भाव यह है कि आप हमेशा ही माता-पिता और गुरु (जिससे आपने कुछ सीखा या ज्ञान लिया हो) के लिए पूरा सम्मान, प्रेम और भरोसा रखें। इससे उनका आपके प्रति विश्वास और उम्मीदें बनी रहेगी। उनके चेहरे, नजरों और शब्दों में पैदा हुए खुशी और आत्मीयता के भाव हर स्थिति में खासतौर पर मुश्किल हालातों में आपका संबल बनेंगे।

माता-पिता के लिए ऐसी भावना और मधुर रिश्ते आपके आत्मविश्वास को ज़िंदा रखेंगे, जिससे आप खुले दिल और जोश के साथ ज़िंदगी के हर इम्तिहान में सफल होंगे। आपका चरित्र और व्यक्तित्व दिन-ब-दिन बेहतर होगा।

ऐसे स्त्री और पुरुष की होती है दुर्गति
इंसान का स्वभाव होता है कि वह अपनी गलतियों को नजरअंदाज करता है, किंतु दूसरों में बुराई ढूंढने में देर नहीं करता। दरअसल, कड़वा सच यह है कि ऐसा होने के पीछे अपने ही अंदर उन दोषों का होना भी होता है, जो अक्सर हम दूसरों में खोजते रहते हैं। इसमें कभी-कभी अपनी खामियों से ध्यान हटाने की मंशा भी होती है। द्वेषता या स्वार्थपूर्ति न होना भी निंदा का कारण बनता है।

शास्त्रों में इसे परदोष दर्शन पुकारा गया है, जिसको भक्ति मार्ग हो या व्यावहारिक जीवन दोनों के लिये बाधक माना गया है। क्योंकि निंदा, बुराई या दोष दर्शन लत बनकर सोच, व्यवहार और अनेक तरह से कामों को बिगाड़ देती है। भक्ति के पहलू से गौर करें तो इसकी वजह से समर्पण का अभाव हो जाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भभागवत में भी दूसरों की बुराई न करने पर जोर दिया गया है। यही नहीं रामचरितमानस में भी परदोष से बचने का महत्व बताते हुए श्री राम ने शबरी से कहा कि - 'सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा' यानी सपने में भी दोषदर्शन से बचना चाहिए। इन सीखों का निचोड़ यही है कि दूसरों की निंदा जीवन पर बुरा असर ही नहीं डालती बल्कि दुर्गति का बड़ा कारण बन सकती है। इसे इस तरह समझा जा सकता है -

- निंदा से खुद की श्रेष्ठता का अहं भाव पैदा होता है। किसी भी रूप में अहं पतन का बड़ा कारण माना गया है।

- दूसरों में कमी, बुराई के बारे में सोचते रहने, सुनने या देखने पर हमारा साफ मन भी बुरे भावों से भर जाता है, जिससे कहीं न कहीं हमारे बोल, व्यवहार व काम में भी बुरे बदलाव आते हैं।

- धर्मशास्त्रों के मुताबिक भी अगर कोई बुरा है या बुरे काम करता है, तो बार-बार उसके बारे में बोलने या सुनने से सुनने वाला भी उस बुराई या पाप का भागी बन जाता है।

- बुराई करने से दूसरों को सीधे दु:ख पहुंचता है, जो व्यावहारिक रूप से आपके लिए भी असहयोग, द्वेष के रूप में कलह लाता है। दु:ख देना धर्म शास्त्रों में पाप भी माना गया है।

- बार-बार खामियां ढूंढने से किसी के प्रति मन में प्रेम का अभाव होता है और नफरत घर करने लगती है। इससे आखिरकार दोष देखने वाले की ही हानि होती है।

दोष दर्शन की आदत इंसान के मन-मस्तिष्क पर इस तरह हावी हो जाती है कि वह खूबियों में भी दोष निकालकर अपयश और असम्मान का भागी बन जाता है। इससे बचने के लिए इंसान अनेक बुरे रास्तों को अपनाकर अपनी ही दुर्गति का कारण बनता है।

क्या आप जानते हैं हनुमानजी के जन्म से जुडी़ ये रोचक बात?
भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था। शिव का यह अवतार बल, बुद्धि  विद्या, भक्ति व पराक्रम का श्रेष्ठ उदाहरण है। इस अवतार से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि यदि आप अपनी क्षमता को पहचाने तो सब कुछ संभव है। जिस तरह हनुमान ने अपनी क्षमता को जानकर समुद्र पार किया था उसी तरह हमारे लिए भी कुछ भी असंभव नहीं है। धर्म के पथ पर चलते हुए राम का हनुमान ने साथ दिया था उसी तरह यदि हम धर्म के मार्ग पर चलें तो भगवान हमारी सहायता भी अवश्य करेंगे।

ऐसे हुआ हनुमान का जन्म

शिवमहापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते हुए विष्णुजी के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान शिव के वीर्य को वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।

हनुमान सब विद्याओं का अध्ययन कर सुग्रीव के मंत्री बन गए।

हनुमान ने ही पत्नी की खोज में भटकते भगवान श्रीराम व सुग्रीव की मित्रता कराई। हनुमान सीता की खोज में समुद्र को पार कर लंका गए और वहां उन्होंने अद्भुत पराक्रम दिखाए। हनुमान ने राम-रावण युद्ध में भी अपना पराक्रम दिखाया और संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए। अहिरावण को मारकर लक्ष्मण व राम को बंधन से मुक्त कराया। इस प्रकार हनुमान अवतार लेकर भगवान शिव ने अपने परम भक्त श्रीराम की सहायता की।

पवित्रा एकादशी पुत्र प्राप्ति के लिए करें यह व्रत
श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा एकादशी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में इसका नाम पुत्रदा एकादशी भी बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल मिलता है। इस बार यह एकादशी 29 जुलाई, रविवार को है।

पवित्रा एकादशी का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। उसी के अनुसार यदि नि:संतान व्यक्ति यह व्रत पूर्ण विधि-विधान व श्रृद्धा से करता है तो उसे पुत्र प्राप्ति होती है। इसलिए पुत्र सुख की इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।

इस दिन भगवन विष्णु का ध्यान कर व्रत रखना चाहिए। रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास ही सोने का विधान है। अगले दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। इस व्रत को रखने वाले को पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होती है। ऐसा धर्म शास्त्रों में कहा गया है।

सावधान! इन वजहों से जागती हैं कामनाएं
हिन्दू धर्मग्रंथो में जीवन में चार पुरुषार्थ का महत्व बताया गया है। ये हैं, धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। इनमें काम या भोग्य विषय-वस्तु के पीछे सकारात्मक पक्ष सृजन और गति है। इसलिए काम को योग के समान संयम और अनुशासन से अपनाने पर यशस्वी और सफल बनाने वाला माना गया है। किंतु भोग के रूप में असंयमित काम अपयश व असफलता देने वाला बताया गया है।

वहीं पौराणिक मान्यताओं में काम के स्वामी कामदेव को माना गया है। इसे जगत के सृजन चक्र और गति को नियत करने की कामना से भगवान शंकर के तप भंग के लिए देवताओं द्वारा तैयार किया गया। नतीजतन भगवान शंकर द्वारा कामदेव भस्म हुए। तब कामदेव की पत्नी रति की विनती पर भगवान शंकर द्वारा कामदेव को भाव रूप में प्रकृति और जीवो में वास करने की गति नियत की गई।

मुद्गल पुराण में इसी से जुड़े प्रसंग के मुताबिक जब शंकर के कोप से कामदेव जलकर शापित हुए तो शापमुक्त होने के लिए कामदेव द्वारा श्री गणेश के ज्ञान-ब्रह्म स्वरूप महोदर का तप किया गया। तब भगवान महोदर द्वारा शिव के शाप की काट को असंभव बताया गया। लेकिन प्रकृति और जीव जगत में रहने के लिए कामदेव के लिए स्थान नियत किया गया।

भगवान महोदर द्वारा कामना या वासनाओं के प्रतीक कामदेव के रहने के लिए जिन विशेष स्थानों को बताया गया, वे इस प्रकार हैं -

लिखा गया है कि -

यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:।

गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।।

उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:।

सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।

वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै।

भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।।

इस श्लोक के मुताबिक इन स्थानों पर कामदेव वास करते हैं यानी इनके संपर्क में कामनाएं जागती हैं। ये हैं -

यौवन या सौंदर्य, स्त्री, फूल, गाना, परागकण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचा, बसन्त ऋतु, चन्दन, वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंगों के दर्शन, सुहानी और मन्द हवा, रहने का सुन्दर स्थान, नए कपड़े और आभूषण।

इस पौराणिक बात के पीछे व्यावहारिक जीवन के लिए संकेत भी है कि चूंकि कामनाओं की अति मन को भटकाती है, इसलिए इन स्थान विशेष के संपर्क में आने पर संयम और अनुशासन बनाए रख मन को कमजोर होने से बचाएं। अन्यथा जीवन पतन की ओर जा सकता है।



शिव-शक्ति की पूजा, मिलेगा मनचाहा पति
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव, शक्ति के बिना अधूरे हैं। इसीलिए पुराने समय से ही शिव व शक्ति को एक साथ पूजने की परंपरा है। श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी (इस बार 27 जुलाई, शुक्रवार) को भगवान शिव व देवी दुर्गा का एक साथ पूजन करने से विशेष फल मिलता है, क्योंकि इस तिथि की स्वामी मां दुर्गा हैं।

धर्म शास्त्रों के अनुसार जो इस तिथि को शिव व दुर्गा माता की संयुक्त रूप से विधि-विधान पूर्वक पूजा करता है उसे वह सभी कुछ मिलता है जिसकी वह अभिलाषा करता है। युवतियां अगर इस दिन शिव-शक्ति (दुर्गा) की पूजा कर पीले वस्त्रों का दान करें तो उन्हें मनपसंद पति मिलता है।

बिल्व पत्र चढ़ाकर करें शिव का पूजन
श्रावण मास का का हर दिन भगवान शिव को ही समर्पित है। धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रावण शुक्ल एकादशी के प्रमुख देव विश्वेदेवा हैं, जो कि भगवान शिव का ही स्वरूप हैं।

श्रावण शुक्ल एकादशी (इस बार 29 जुलाई, रविवार) को शिव का विधि-विधान पूर्वक पूजन करने से समस्त देवताओं का पूजन अपने आप ही हो जाता है। ज्योतिष के अनुसार इस तिथि को यदि शिव को बिल्व पत्र, धतूरा व आंकड़े के फूल से पूजन किया जाए तो व्यापार-व्यवसाय में उन्नति होती है।

श्रावण शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं। इसे पवित्रा और पापनाशिनी भी कहा जाता है। पुत्र की चाह रखने वाले इस व्रत को विधि विधान से करें तो वांछित फल प्राप्त होता है। इसी दिन भगवान विष्णु को पवित्रक भी चढ़ाया जाता है।

इस चमत्कारी व्रत के प्रभाव से राजा को मिला संतान सुख
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा व पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 29 जुलाई, रविवार को है। इस व्रत को करने से योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है। इस व्रत की कथा इस प्रकार है-

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था। उसका कोई बेटा नहीं था। अपना बुढ़ापा आता देख राजा बहुत चिंतित हुए और उन्होंने अपनी यह समस्या अपने मंत्रियों व प्रजा के प्रतिनिधियों को बताई। राजा की इस बात को विचारने के लिए मंत्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि जंगल में गए। वहाँ एक आश्रम में उन्होंने महात्मा लोमश मुनि को देखा। उन्होंने राजा की समस्या लोमश मुनि को बताई।

उनकी बात सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहा कि यह सब राजा के पूर्व जन्म में किए गए कर्मों का फल है। इसीलिए राजा को आज यह दु:ख सहना पड़ रहा है। लोमश मुनि ने यह भी कहा कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को राजा सहित तुम सब भी व्रत करो और रात्रि को जागरण करो, इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी।

श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया। इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी बेटा पैदा हुआ।

क्यों नहीं चढ़ाते शिव को केतकी का फूल?
भगवान शिव की पूजा उत्तम फूलों से करने पर हर मुराद पूरी हो जाती है। शिव की पूजा में सिर्फ केतकी का ही पुष्प क्यों नहीं चढ़ाया जाता, इसके बारे में एक कथा हमारे धर्म शास्त्रों में है, जो इस प्रकार है-

एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।

अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्मा जी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की।

दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है।  शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।

सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का योग, करें महादेव का पूजन
सावन के महीने में इस बार प्रदोष व्रत और सोमवार का शुभ योग बन रहा है। इस शुभ योग के कारण 30 जुलाई को आने वाले सावन सोमवार का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है क्योंकि प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ही किया जाता है और वहीं सावन सोमवार के दिन भी भगवान शिव की पूजा करने के विशेष फल मिलते हैं। 30 जुलाई, सोमवार को प्रदोष व्रत इस विधि से करें-

- प्रदोष व्रत में बिना जल पीए व्रत रखना होता है। सुबह स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्रगंध, चावल, फूल, धूप, दीप, भोग, फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान शिव को चढ़ाएं।

- शाम के समय पुन: स्नान करके इसी तरह शिवजी की पूजा करें। शिवजी का षोडशोपचार पूजा करें, जिसमें भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजा करें।

- भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं।

- आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। आठ बार दीपक रखते समय प्रणाम करें। शिव आरती करें। शिव स्त्रोत, मंत्र जप करें ।

- रात्रि में जागरण करें।

इस प्रकार सभी मनोकामनाएं की पूर्ति और कष्टों से मुक्ति के लिए प्रदोष व्रत करना चाहिए।

करें शिव-विष्णु का पूजन, मिलेगा हर सुख
जिस प्रकार भगवान शिव सृष्टि के संहारक हैं उसी तरह भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं। मूलत: यह दो शक्तियां ही पूरी सृष्टि का पोषण व संहार करती हैं। श्रावण शुक्ल द्वादशी (इस बार 30 जुलाई, सोमवार) को इन दोनों देवताओं की एक साथ पूजा करने का विधान धर्म शास्त्रों में लिखा है।

इस दिन भगवान शिव को धतूरा और भगवान विष्णु को पंचामृत अर्पित करें। उल्लेखनीय है कि इस तिथि के प्रमुख देव भगवान विष्णु ही हैं। इस दिन भगवान शिव के साथ विष्णु का भी पूजन करने से सभी लोकों का सुख मिलता है।

रक्षा बंधन: रिश्तों का सम्मान करना व निभाना सीखाता है ये त्योहार
हिंदू धर्म में सदियों से विभिन्न त्योहार मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है। रक्षा बंधन भी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार 2 अगस्त, गुरुवार को है।

इस त्योहार का बहन-भाई को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन बहन अपने भाई को रक्षा सूत्र बांधकर जीवन भर रक्षा करने का वचन लेती है। रक्षा बंधन का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जो भाइयों को उनकी बहनों के प्रति जिम्मेदारी को व्यक्त करता है। यह जिम्मेदारी सिर्फ बहनों की रक्षा करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि शादी के बाद बहन के परिवार में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में की जाने वाली भागीदारी का भी अहसास कराती है।

उसी के अनुसार भाई अपनी बहन के परिवार में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में यथा शक्ति तोहफे आदि ले जाता है। इससे वह न सिर्फ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है बल्कि बहन के परिवार में उसका मान भी बढ़ाता है। इसके अलावा भी कई अवसरों पर भाई अपनी बहन के प्रति अपने सामाजिक कर्तव्यों को निभाकर बहन द्वारा अपनी कलाई पर बांधी गई राखी का सम्मान रखता है। अगर यह कहा जाए कि रक्षा बंधन का पर्व हमें रिश्तों का सम्मान करना सीखाता है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

अनोखी परंपरा: यहां भगवान को बांधी जाती है पहली राखी
वैसे तो राखी का त्योहार भाई-बहन के बीच प्यार का त्योहार माना जाता है पर चूंकि भारत विविधताओं भरा देश है, इसलिए यहां की मान्यताएं और रीति-रिवाज सभी अद्भुत हैं। भारत में एक स्थान ऐसा भी जहां भगवान को शहर का राजा माना जाता है और उन्हीं को सबसे पहले रक्षा सूत्र अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही शहरवासी राखी का त्योहार मनाते हैं। यहां हम बात कह रहे हैं मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन की।

उज्जैन में भारत के प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंगो में एकमात्र दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है। उज्जैन के लोग महाकाल को अपना राजा मनाते हैं। बाबा महाकाल को उज्जैन का राजाधिराज भी कहा जाता है। यहां किसी भी त्योहार की शुरुआत सबसे पहले महाकाल मंदिर से ही होती है। इसके बाद ही शहरवासी त्योहार मनाते हैं। रक्षाबंधन पर भी पहली राखी भगवान महाकाल को बांधी जाती है, यह रोज सुबह होने वाली भस्मारती में भगवान को राखी अर्पित की जाती है। इसके बाद ही उसके बाद ही शहरवासी राखी का त्योहार मनाते हैं।

इस दिन बाबा महाकाल को सवा लाख लड्डुओं का भोग भी लगाया जाता है जो बाद में श्रद्धालुओं में ही प्रसाद रूप में बांट दिया जाता है। भगवान को बंधने वाली राखी पुजारी परिवार की महिलाओं द्वारा खासतौर पर तैयार की जाती है। इस अद्भुत प्रसंग को देखने दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।

इस 1 बात से खुश हो मां लक्ष्मी बना देती हैं दौलतमंद
शास्त्रों के मुताबिक जीवन में मां लक्ष्मी की अहमियत अनेक रूपो में है। किंतु भौतिक सुख-सुविधाओं के इस दौर में अक्सर मां लक्ष्मी का संबंध मात्र धन-दौलत और संपत्ति से जोड़ा जाता है।

हर इंसान धन रूपी मां लक्ष्मी के दर्शन व कृपा को पसंद करता है। चाहे फिर वह किसी भी तरीके या रूप में आए। जबकि शास्त्रों की बातों का निचोड़ समझें तो लक्ष्मी कृपा के लिए अगर एक बात ही जीवन में संकल्प के साथ अपना ली जाए तो मां लक्ष्मी अपने पूरे स्वरूप में इंसान पर मेहरबान हो जाती हैं। क्या है लक्ष्मी कृपा का यह अहम सूत्र? जानिए -

दरअसल, लक्ष्मी का संबंध शुद्धता, पवित्रता या शुचिता से है। पावनता का यही भाव जीवन के हर कर्म, व्यवहार और विचार में उतारने वाला ही लक्ष्मी की भरपूर कृपा का पात्र बन जाता है। लक्ष्मी उपासना के खास अवसरों पर सफाई या स्वच्छता के पीछे भी यही संदेश व भाव होता है।

असल में मन और विचारों की शुद्धता भी मां लक्ष्मी का रूप है। क्योंकि ऐसा होने पर ही इंसान के जीवन में तमाम सद्गुण जैसे सत्य, प्रेम, दया, संकल्प, इच्छाशक्ति, परोपकार और संस्कार प्रवेश करते हैं। इनके द्वारा ही कोई भी व्यक्ति कर्म और सेवा से धन, ऐश्वर्य के साथ सुख-शांति रूपी महालक्ष्मी का स्वामी बन सकता है। यहां तक कि इतना सबल बन सकता है कि नामुमकिन को भी मुमकिन करने में कामयाब हो जाता है।

लक्ष्मी की प्रसन्नता का एकमात्र यही सूत्र जन्म ही नहीं मृत्यु को भी सुधार कर शास्त्रों की इस बात को सार्थक साबित कर देता है -

असतो मा सद्गमय,

तमसो मा ज्योर्तिगमय,

मृत्योर्मा अमृतमगमय।।

यानी ईश्वर असत्य से सत्य की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर ले चले और मृत्यु से मुक्त कर अमरत्व प्रदान करे। यह सभी भाव पावनता को अपनाए बिना संभव नहीं।

बहन से राखी बंधवाने से भाई को होते हैं ये 3 फायदे?
हिन्दू धर्म में रक्षाबंधन (2 अगस्त) का त्योहार भाई-बहन के बीच स्नेह व भावनाओं के बंधन को मजूबत रखने वाला माना गया है। इस शुभ परंपरा के धार्मिक महत्व के साथ ही बहन द्वारा कलाइयों पर राखी बांधना भाइयों को देवीय व आध्यात्मिक शक्तियां देने वाला भी माना गया है। ये शक्तियां शरीर और जीवन के लिए मंगलकारी सिद्ध होती हैं। जानिए बहन से राखी बंधवाने से

भाइयों पर 3 तरह से होने वाले देवीय शक्तियों का प्रभाव
भारतीय संस्कृति में स्त्री को शक्ति स्वरूपा दुर्गा का रूप माना जाता है। माना जाता है कि शिव भक्ति के माह सावन की अंतिम तिथि पूर्णिमा पर शक्ति भी पूर्ण रूप से जाग्रत होती है। इसलिए जब बहन अपने भाई को राखी बांधती है तो उसमें समाई देवी शक्ति का शुभ प्रभाव भाई तक पहुंचता है, माना जाता है कि यह शक्ति जीवन के पग-पग पर संकटमोचक साबित होता है।

बहन द्वारा राखी बांधने के बाद भाई की आरती के लिए जलाए गया दीपक अग्नि व सूर्यदेव का स्वरूप माना जाता है। इसमें अग्रि तत्व सक्रिय होता है। यह देवीय ऊर्जा का भण्डार होता है। बहन जब भाई की आरती करती है तो दीपक से निकलने वाली ऊर्जा भाई को स्वस्थ और दीर्घायु बनाने वाली होती है।

धार्मिक मान्यता है कि सावन की पूर्णिमा पर श्री गणेश और माता सरस्वती पृथ्वीलोक में आते हैं। इसलिए रक्षाबंधन के दिन जब भाई-बहन एक-दूसरे की रक्षा और सुख की कामना करते हैं तो उनको श्री गणेश और माता सरस्वती से सफलता और सुख का आशीर्वाद मिलता है।

सुबह मां गायत्री की मूर्ति पर दें ध्यान, दिखाई देगा ऐसा दिव्य रूप!
मां गायत्री वेदमाता पुकारी जाती है। वेद ज्ञान रूपी शक्ति है। मान्यता है कि यह ज्ञानरूपी शक्ति ही ब्रह्मदेव के रूप में प्रकट हुई। ब्रह्मदेव द्वारा ही अलग-अलग चार वेदों के रूप में ज्ञान शक्ति को जगत में फैलाया गया। माना जाता है कि ज़िंदगी के लिए बताए अहम 4 पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष में भी यही शक्ति समाई है। इसलिए पूरा जगत ही गायत्री शक्ति का स्वरूप माना जाता है।

यही वजह है कि गायत्री साधना देवीय भाव से करना अहम माना गया है। किंतु अगर गायत्री के साकार या मूर्ति रूप में उपासना की बात आती है तो शास्त्रों में मां गायत्री के तीन अलग-अलग काल में तीन रूप बताए गए हैं, जिनके दर्शन अलग-अलग शक्तियां देने वाले भी माने गए हैं। इसी कड़ी में माना जाता है कि सुबह मां गायत्री के इस दिव्य रूप क दर्शन होते हैं-

सुबह का वक्त ब्रह्ममुहूर्त भी पुकारा जाता है। इसलिए इस काल में मां गायत्री ब्राह्मी नाम से पूजनीय है। इसे कुमारिका रूप भी पुकारा जाता है। इसमें उनका तेज उगते सूर्य के लाल रंग की भांति ही होता है। वह हंस पर बैठी तीन नेत्रों वाली होती है। साथ ही वह पाश, अंकुश, अक्षमाला, कमण्डलु, ऋग्वेद और ब्रह्मशक्ति से संपन्न होती है।

मां गायत्री का यह दिव्य स्वरूप जीवन को प्रेरणा और शक्ति देता है। उनकी तरुणाई- बचपन की तरह शुद्ध भाव व चंचलता, लाल आभा - खून की तरह गति, हंस पर बैठना - प्राणों पर नियंत्रण, पाश - बंधन, अंकुश - नियंत्रण, ऋग्वेद - ज्ञान शक्ति का प्रतीक है।

यही वजह है कि सुबह गायत्री साधना से ये सभी शक्तियां साधक को मिलती हैं। चूंकि गायत्री के इस रूप का निवास पृथ्वी लोक माना जाता है। सांकेतिक रूप से शरीर भी आधार या भूमि के समान है। इसलिए सूर्य उदय के काल में ब्राह्मी यानी गायत्री की साधना सूर्य की भांति ही शरीर को स्वस्थ्य, सुंदर व ऊर्जावान रख भरपूर प्राणशक्ति देने वाली मानी गई है।


पत्नी ने पति को बांधी थी पहली राखी!
रक्षा बंधन हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। कालांतर में रक्षा बंधन का पर्व राखी के नाम से जाना जाने लगा। राखी का त्योहार कब से मनाया जा रहा है इसके बारे में कुछ स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता लेकिन भविष्यपुराण में वर्णित एक कथा में इसका एक उदाहरण अवश्य मिलता है। यह कथा इस प्रकार है-

भविष्यपुराण की एक कथा है कि एक बार देवता और दानवों में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ, पर देवता विजयी नहीं हुए। तब इंद्र हार के भय से दु:खी होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए। गुरु बृहस्पति ने कहा - युद्ध रोक देना चाहिए। तब उनक बात सुनकर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने कहा कि कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है, मैं रक्षा सूत्र तैयार करूंगी जिसके प्रभाव से इनकी रक्षा होगी और यह विजयी होंगे। इंद्राणी द्वारा व्रत कर तैयार किए गए रक्षा सूत्र को इंद्र ने मंत्रों के साथ  ब्राह्मण से बंधवाया। इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इन्द्र के साथ समस्त देवताओं की दानवों पर विजय हुई।

रक्षा बंधन: क्या आप जानते हैं क्यों बांधते हैं रक्षा सूत्र? हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहारों के पीछे कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक पक्ष भी होते हैं। रक्षा बंधन का अर्थ सिर्फ भाई-बहन के अटूट रिश्ते तक ही सीमित नहीं है, इसके पीछे विज्ञान व मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है।

शरीर विज्ञान की दृष्टि से रक्षा सूत्र (राखी) से उत्तम स्वास्थ्य भी प्राप्त होता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार रक्षा सूत्र बांधने से त्रिदोष- वात, पित्त तथा कफ का शरीर में सामंजस्य बना रहता है। रक्षा सूत्र का शाब्दिक अर्थ है वह सूत्र (धागा) जो विभिन्न रोगों से शरीर की रक्षा करता है। अत: रक्षा बंधन पर धर्म से जोड़कर रक्षा सूत्र (राखी) बांधने की परंपरा बनाई गई है।

यह मनुष्य के मन में यह विश्वास पैदा करता है कि वेद मंत्रों के साथ बांधा गया यह सूत्र उसकी सभी रोगों, कष्टों से रक्षा करेगा एवं उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा। इस विश्वास एवं भावना से बीमारी की दशा में भी मनुष्य में साहस बना रहता है एवं स्वास्थ्य भी अच्छा होता है। इस प्रकार रक्षा सूत्र में विज्ञान और मनोविज्ञान दोनों का योग है।

इस विधि से मनाएं रक्षा बंधन, घर आएगी खुशहाली
2 अगस्त, गुरुवार को रक्षा बंधन का पर्व है। धर्म शास्त्रों में इस पर्व के बारे में वर्णन मिलता है। उसी के अनुसार रक्षा बंधन पर बहन भाई को, पुरोहित यजमान को व प्रजा राजा को रक्षा सूत्र बांधकर संरक्षण प्राप्ति का वचन लेते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार विधि-विधान पूर्वक रक्षा बंधन करने से मनुष्य वर्ष भर धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। भविष्य पुराण में रक्षा सूत्र के बारे में कहा गया है-

सर्व रोग पशमनं सर्वाशुभ विनाशनम।

सुंकृत्कृते नाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत।।

अर्थात इस पर्व पर धारण किए जाने वाला रक्षा सूत्र समस्त रोगों एवं अशुभ कार्यों को नष्ट करता है तथा इसे धारण करने से मनुष्य वर्ष भर के लिए रक्षित हो जाता है।

रक्षा बंधन की विधि
इस दिन महिलाएं एवं पुरोहित सुबह स्नान करके सूर्य को तांबे केबर्तन से अध्र्य अर्पित करें। दोपहर बाद सूती, रेशमी या पीले कपड़े में चावल, केशर, चंदन, सरसों व दूर्वा रखकर रखकर एक पोटली (रक्षा पोटलिका) बनाएं और उसे एक तांबे के लोटे में रखकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित कर दें। फिर लाल कलावा (पूजा में उपयोग आने वाला पवित्र धागा) लेकर गंगाजल, हल्दी व केशर से पवित्र करें तथा अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए घर के मुख्य द्वार पर बांध दें।

इसके बाद बहनें भाइयों को कुल पंरपरानुसार आरती कर तिलक निकालें तथा मिठाई खिलाकर दाहिने हाथ में रक्षा सूत्र(राखी) बांधें तथा शगुन स्वरूप रूमाल इत्यादि भेंट करें। भाई भी अपनी शक्ति के अनुसार बहनों को उपहार दें। इस प्रकार रक्षा बंधन का पर्व मनाने से घर में खुशहाली आती है।

मन के विकार दूर करती है ऐसी शिव पूजा
श्रावण महीना अध्यात्म की दृष्टि से सर्वोत्तम बताया गया है। इस समय मन पूरी तरह से शिव की भक्ति में डूबा रहता है। मन भटकता भी नहीं है। अगर किसी का मन भटकता है तो उसे श्रावण शुक्ल त्रयोदशी (31 जुलाई, मंगलवार) के दिन भगवान शिव की विशेष विधि से पूजा करनी चाहिए।

श्रावण शुक्ल त्रयोदशी के देवता कामदेव हैं जो हमारे मन में काम भाव का संचार करते हैं। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान कर सच्चे मन से शिव की पूजा की जाए तो काम आदि सभी मनोविकारों से मुक्ति मिल जाती है। इस तिथि को सोना दान करने का विधान भी है जिससे मनचाहे फलों की प्राप्ति होती है।

इस तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शंकर हैं
भगवान शंकर सभी देवों में प्रमुख हैं। सृष्टि का हर परिवर्तन उन्हीं की इच्छा से होता है। इसी प्रकार सभी दिन, तिथि, माह, वर्ष आदि भगवान शंकर के ही हैं। भगवान शंकर की आराधना करने के लिए सर्वोत्तम मास श्रावन भी इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि यह शिव को समर्पित है। सावन के हर दिन शिव की अलग-अलग प्रकार की पूजा का विधान धर्म शास्त्रों में लिखा है।

उसी के अनुसार श्रावण शुक्ल चतुर्दशी (इस बार 1 अगस्त, बुधवार) तिथि के देवता स्वयं भगवान शंकर हैं। यह तिथि शिव को विशेष प्रिय है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान कर भगवान शंकर को बिल्व पत्र, धतूरा, आंकड़ा आदि से विधि-विधान पूर्वक पूजा की जाए तो शिव अति प्रसन्न होते हैं। इस दिन भगवान शंकर को भांग का दूध चढ़ाने का विधान भी है। ऐसा करने से भगवान शंकर भक्तों के सभी रोग दूर कर देते हैं।

श्रीराम के ये नाम लेते ही मुश्किलों को मार-भगाए श्रीहनुमान
धार्मिक आस्था भी है कि जहां श्रीराम का नाम व स्मरण होता है, वहीं उनके परम भक्त श्रीहनुमान किसी न किसी रूप में उपस्थित रहते हैं। श्रीहनुमान के कारण ही युग-युगान्तर से राम भक्ति आस्था को बल और भक्ति को शक्ति देने वाली मानी जाती है। मंगलवार को रुद्र अवतार श्रीहनुमान की कृपा ग्रहदोषों को दूर करने में भी शुभ व अचूक उपाय मानी गई है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा श्रीहनुमान भक्ति को समर्पित श्रीहनुमान चालीसा की ये चौपाई 'रामदूत अतुलित बलधामा, अंजनिपुत्र पवनसुत नामा' श्री हनुमान के राम भक्त होने व भक्त-भगवान के पावन रिश्तों को उजागर ही नहीं करती, बल्कि राम कृपा से ही बेजोड़ गुण व बल का स्वामी होना भी प्रकट करती है। राम की भक्ति और सेवा से ही श्रीहनुमान रामदूत कहलाए।

यही वजह है कि खासतौर पर शनिवार, मंगलवार के अलावा श्रीराम के जन्मदिन यानी रामनवमी पर श्रीराम की प्रतिमा या तस्वीर की गंध, अक्षत, फूल, धूप व दीप से पूजा कर यहां बताई जा रही राम मंत्र स्तुति का ध्यान करें और श्री हनुमान की भी विधिवत पूजा करें। यह श्रीराम मंत्र स्तुति है -
आपदामपहर्तार दातारं सर्वसम्पदाम।

लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय मानसे।

रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम्।।

नीलाम्बुजश्यामल कोमलांङ्गं सीतासमारोपित वामभागम्।

पाणौ महासाकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।

आस्था है कि इस मंत्र स्तुति से श्रीराम का नाम किसी भी संकट में लेने पर रामभक्त श्रीहनुमान संकटमोचक बन सुख-सौभाग्य देते हैं।

राजा बलि को राखी क्यों बांधी मां लक्ष्मी ने?
रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह का प्रतीक है। इस पर्व से संबंधित कई कथाएं व किवदंतियां प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा यह भी है-

जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया तो राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। भगवान वामन ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। तीसरा पैर कहां रखे, इस बात को लेकर बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। अगर वह अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होता। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के सामने कर दिया और कहा तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने वैसा ही किया।

पैर रखते ही बलि सुतल लोक में पहुंच गया। बलि की उदारता से भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे सुतल लोक का राज्य प्रदान किया। बलि ने वर मांगा कि भगवान विष्णु उसके द्वारपाल बनें। तब भगवान को उसे यह वर भी प्रदान करना पड़ा। पर इससे लक्ष्मीजी संकट में आ गईं। वे चिंता में पड़ गईं कि अगर स्वामी सुतल लोक में द्वारपाल बन कर रहेंगे तब बैकुंठ लोक का क्या होगा?

तब देवर्षि नारद ने उपाय बताया कि बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांध दो और उसे अपना भाई बना लो। लक्ष्मीजी ने ऐसा ही किया। उन्होंने बलि की कलाई पर राखी (रक्षासूत्र) बांधी। बलि ने लक्ष्मीजी से वर मांगने को कहा। तब उन्होंने विष्णु को मांग लिया। रक्षासूत्र की बदौलत लक्ष्मी को अपने स्वामी पुन: मिल गए।

करें शिव के चंद्रमौलेश्वर रूप की पूजा
श्रावण पूर्णिमा (इस बार 2 अगस्त, गुरुवार) श्रावण मास का अंतिम दिन होता है। इस दिन रक्षा बंधन का पर्व भी मनाया जाता है। वस्तुत: यह तिथि भगवान चंद्र को समर्पित है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शिव के चंद्रमौलेश्वर स्वरूप का पूजन करना चाहिए।

ऐसा करने से शिव के साथ ही चंद्रदेव का पूजन भी हो जाता है। रक्षा पर्व होने से भगवान शिव को भी रक्षा सूत्र अर्पित करना चाहिए तथा मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस प्रकार पूजा करने से शीघ्र ही मनोकामना पूर्ण हो जाती है। इस दिन पितृ तर्पण और ऋषिपूजन का भी विधान है। साथ ही श्रवण पूजा भी की जाती है।

राजा दशरथ के तीर से इसी दिन श्रवणकुमार की मृत्यु हुई थी। श्रवण पूजा कर हम दूसरों की सुरक्षा के प्रति सचेत होते हैं। इस दिन ऋषिपूजन किया जाता है। किसान आमतौर पर श्रावण के अंत तक खेतों की जुलाई बुवाई से निपट जाते हैं और साधु-संत भी चातुर्मास के लिए पड़ाव डालने लगते हैं। इस दिन से वेद पाठ, उपदेश, प्रवचन की शुरुआत की जाती है। इसी दिन पुराना यज्ञोपवित निकाल कर नया पहना जाता है।

क्या होता है श्रावणी उपाकर्म, ये क्यों किया जाता है, जानिए
रक्षा बंधन (2 अगस्त, गुरुवार) के दिन ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपाकर्म किए जाने का विधान है। यह क्रिया पवित्र नदी के घाट पर सामूहिक रूप से की जाती है। जानिए क्या है श्रावणी उपाकर्म-

श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मïचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।

यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन

भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।

उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है।  इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।

खुशमिजाज व जिंदादिल बना दे श्रीहनुमान की यह सीख
शास्त्रों में भक्ति की अहमियत बताते हुए यह भी कहा गया है कि सांसारिक जीवन में सुख के साथी प्राणी और दु:ख के भगवान होते हैं। इसलिए दु:खों से बचने के लिए भगवान व खुद पर भरोसा रखें तो बुरा वक्त भी भारी न लगेगा और आसानी से कट जाएगा।

श्री हनुमान चरित्र में भी अक्षय सुख-शांति के ऐसे ही सूत्र छिपे हैं, जो सांसारिक जीवन के कलह व संताप को दूर रखते हैं। इनमें समर्पण और भक्ति का सूत्र बड़ा ही असरदार माना गया है। हालांकि धर्मशास्त्रों में उजागर भक्ति के अलग-अलग तरीके व्यावहारिक जीवन में चिंतन, मनन, व्यवहार, ध्यान या उठते-बैठते, चलते-फिरते कर्म, वचन और बोल से भगवान को याद कर जीवन को सुखी और सुरक्षित बनाने के उपाय ही है। श्री हनुमान ने भी गहरी सेवा और समर्पण को सर्वोपरि मानकर राम भक्ति द्वारा सुख पाने की आसान राह बताई।

हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीरामचरितमानस में श्री हनुमान द्वारा कही बात में भक्ति की अहमियत उजागर करती है। इसमें सकारात्मक सोच के साथ सुखी जीवन जीने का खास सूत्र भी है।तस्वीर के साथ जानिए निराशा व परेशानियों को दूर रखने व उबरने का खास सूत्र

श्रीरामचरितमानस में लिखा गया है कि - कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई। जिसका सार यही है कि भगवान का स्मरण करते रहना ही सुख व भूल जाना दु:ख का कारण है। दरअसल, इसमें व्यावहारिक जीवन के लिए यही संकेत है कि इंसान को सुख और दु:ख दोनों में ही समान भाव से जीना चाहिए। क्योंकि जीवन गम और खुशियों का सिलसिला है। दु:ख से बचना ज्ञान से ही संभव है। ज्ञानियों में अग्रणी माने गए श्री हनुमान ने भी यही सबक दिया है कि जिस तरह सुखों को ईश्वर की कृपा मानते हैं, ठीक उसी भाव से दु:ख को भगवान की समीपता की घड़ी मान सकारात्मक रहकर स्वीकार करना चाहिए। ऐसी सोच ही बुरे वक्त की अचूक काट होती है। इस सूत्र को अपनाकर हर इंसान खुशमिजाज व जिंदादिल बना रह सकता है।

भादौ :इस महीने से सीखें जीवन जीने की कला
हिन्दू पंचांग का छठा माह भाद्रपद (भादौ) है। इस बार यह 3 अगस्त, शुक्रवार से शुरु हो रहा है। यह चातुर्मास के चार पवित्र महीनों का दूसरा महीना भी है। चातुर्मास धार्मिक और व्यावहारिक नजरिए से जीवनशैली में संयम और अनुशासन अपनाने का काल है।

भाद्रपद मास में हिन्दू धर्म के अनेक बड़े व्रत, पर्व, उत्सव भी मनाए जाते हैं जैसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हरतालिका तीज, गणेशोत्सव, ऋषि पंचमी, डोल ग्यारस आदि। इन पर्व, उत्सवों ने सदियों से भारतीय धर्म परंपराओं और लोक संस्कृति को समृद्ध किया है। हिंदू धर्म परंपराओं में इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कर्म का संदेश देने वाले भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है तो शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को प्रथम पूज्य देवता श्रीगणेश का जन्मोत्सव होता है।

इस प्रकार यह मास कर्म और बुद्धि के संतुलन और साधना से जीवन में सफलता पाने का संदेश लेकर भी आता है। इस बार मुस्लिम समाज का पवित्र माह रमजान भी इसी माह के अंतर्गत पड़ रहा है इसलिए इस माह का महत्व और अधिक बढ़ गया है।

रमज़ान में 1 अच्छे काम का 70 गुना सबाव मिलता है
हिजरी कैलेंडर का नवां महीना रमज़ान होता है। पूरी दुनिया में फैले इस्लाम धर्म मानने वालों के लिए रमज़ान का पवित्र महीना एक उत्सव होता है। रमज़ान के महीने में किए गए हर नेक काम का पुण्य यानी सबाव 70 गुना मिलता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक मुस्लिम इस पाक महीने में ज्यादा से ज्यादा नेक काम करते हैं।

ज़कात (अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान के रूप में देना) इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलता है इसीलिए मुसलमान इस महीने में ज़कात अदा करते हैं।

रमज़ान के पाक महीने में रोजे भी रखे जाते हैं। रोजा हमें झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी (अभ्यास) पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।

भादौ महीने में ध्यान रखें इन बातों का क्योंकि...
हिन्दू पंचाग का भाद्रपद महीना भादौ, भादवा या भाद्र के नाम से भी जाना जाता है। इस महीने में आकाश में पूर्वा या उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के योग बनने से इस माह का नाम भाद्रपद है। यह योग भाद्रपद पूर्णिमा के दिन बनता है। भाद्रपद महीना हिंदू धर्म के पवित्र चातुर्मास के अंतर्गत आता है इसलिए इसमें कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है जो इस प्रकार हैं-

यह ग्रहण करें

- शारीरिक शुद्धि या सुंदरता के लिए संतुलित मात्रा में पंचगव्य (दूध, दही, घी गोमय, गोबर) का।

- वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का।

- पापों के नाश व पुण्य प्राप्ति के लिए एकभुक्त, नक्तव्रत, अयाचित(बिना मांगा) भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।

इनका त्याग करें

- मधुर स्वर के लिए गुड़ का त्याग करें।

- दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का।

- शत्रु नाश के लिए कड़वे तेल का।

- सौभाग्य के लिए मीठे तेल का।

- स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का।

- पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, हरी सब्जी, मूली एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।

करें बहुला चतुर्थी व्रत, मिलेगा धन और संतान सुख
भादौ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बहुला चतुर्थी व बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश के निमित्त व्रत किया जाता है। वर्ष की प्रमुख चार चतुर्थी में से एक यह भी है। इस बार बहुला चतुर्थी का व्रत 5 अगस्त, रविवार को है।

ऐसे करें व्रत
इस दिन चन्द्रमा के उदय होने तक बहुला चतुर्थी का व्रत करने का महत्व है। महिलाएं इस दिन सुबह स्नान कर पवित्रता के साथ भगवान गणेश की आराधना आरंभ करें। भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लें। धूप, दीप, गंध, पुष्प, प्रसाद आदि सोलह उपचारों से श्रीगणेश का पूजन संपन्न करें। चंद्र उदय होने से पहले जितना हो सके कम बोलें।

शाम होने पर फिर से स्नान कर इसी पूजा विधि से भगवान गणेश की उपासना करें। इसके बाद चन्द्रमा के उदय होने पर शंख में दूध, दुर्वा, सुपारी, गंध, अक्षत से भगवान श्री गणेश, चन्द्रदेव और चतुर्थी तिथि को अघ्र्य दें। इस प्रकार बहुला चतुर्थी व्रत के पालन से सभी मनोकामनाएं पूरी होने के साथ ही व्रती (व्रत करने वाला) के व्यावहारिक व मानसिक जीवन से जुड़े सभी संकट, विघ्न और बाधाएं समूल नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत संतानदाता तथा धन को बढ़ाने वाला है।

कजरी तीज, सुहागिनों का प्रिय त्योहार है ये
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि ( इस बार 4 अगस्त, शनिवार) को कजरी-तीज का त्योहार मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। इसके एक दिन पूर्व यानि भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को 'रतजगा' किया जाता है। महिलाएं रात भर कजरी खेलती तथा गाती हैं। कजरी खेलना और कजरी गाना दोनों अलग बातें हैं। कजरी गीतों में जीवन के विविध पहलुओं का समावेश होता है। इसमें प्रेम, मिलन, विरह, सुख-दु:ख, समाज की कुरीतियों, विसंगतियों से लेकर जन जागरण के स्वर गुंजित होते हैं।

कैसा है स्वरूप
कजरी तीज से कुछ दिन पूर्व सुहागिन महिलाएं नदी-तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बोती हैं। रोज इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को 'जरई खोंसना' कहते हैं।

कजरी का यह स्वरुप केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित है।  यह खेल गायन करते हुए किया जाता है, जो देखने और सुनने में अत्यन्त मनोरम लगता है। कजरी-गायन की परंपरा बहुत ही प्राचीन है। सूरदास, प्रेमधन आदि कवियों ने भी कजरी के मनोहर गीत रचे थे, जो आज भी गाए जाते हैं।

कजरी तीज को सतवा व सातुड़ी तीज भी कहते हैं। यह माहेश्वरी समाज का विशेष पर्व है जिसमें जौ, गेहूं, चावल और चने के सत्तू में घी, मीठा और मेवा डाल कर पकवान बनाते हैं और चंद्रोदय होने पर उसी का भोजन करते हैं।

जन्माष्टमी, जानिए श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े अनछूए पहलुओं को
भगवान विष्णु संसार के पालनकर्ता हैं। संसार में धर्म की स्थापना व अधर्म के नाश के लिए भगवान विष्णु ने कई अवतार लिए। इनमें से कुछ अंशावतार थे तो कुछ पूर्णावतार। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में आठवां अवतार लिया। श्रीकृष्ण का जन्म भादौ मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। हर वर्ष इस तिथि को दुनिया भर में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव धूम-धाम व पूर्ण आस्था के साथ मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 10 अगस्त, शुक्रवार को है।

श्रीकृष्ण का पूरा जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। इनके जीवन चरित्र से हमें जीवन के कई अनमोल सूत्र मिलते हैं, जो वर्तमान समय के लिए बेहद जरुरी है। इन्हीं सूत्रों को अपनेजीवन से जोड़कर हम भी कामयाबी पा सकते हैं। इसके लिए आपको अपने जीवन में श्रीकृष्ण को उतारना होगा। केवल श्रीकृष्ण के आवरण को नहीं उनके आचरण को भी समझना होगा। भगवान श्रीकृष्ण की आराधना सबसे सरल और सीधी मानी गई है, जो शीघ्रफल देती है। श्रीकृष्ण कर्मकांड, जीवन में सफलता के सूत्र से लेकर तंत्र तक हर विधा में उच्च फल देते हैं।

जन्माष्टमी स्पेशल: क्यों लिया भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार
10 अगस्त, शुक्रवार को जन्माष्टमी है। इस दिन भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का जन्म उत्सव बड़ी ही धूम-धाम से पूरे देश में मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार क्यों लिया, धर्म ग्रंथों के अनुसार इसका कारण इस प्रकार है-

द्वापर युग में जह पृथ्वी पर मानव रूपी राक्षसों के अत्याचार बढऩे लगे। तब पृथ्वी दु:खी होकर भगवान विष्णु के पास गईं। तब भगवान विष्णु ने कहा मैं शीघ्र ही पृथ्वी पर जन्म लेकर दुष्टों का सर्वनाश करूंगा। द्वापर युग के अन्त में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करते थे। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक कारागार में डाल स्वयं राजा बन गया थी।

कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ तय हुआ। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए जा रहा था तो आकाशवाणी हुई कि- देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा । यह सुनकर कंस डर गया और उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया। और एक-एक कर देवकी की होने वाली संतानों का वध करने लगा।

आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ लेकिन माया के प्रभाव से किसी को इस बात का पता नहीं चला कि देवकी की आठवी संतान गोकुल में नंदबाबा के यहां पल रही है। यहां भी श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से कई राक्षसों का वध किया और अंत में कंस का वध कर राजा उग्रसेन को सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पाण्डवों का साथ दिया और अधर्म का नाश कर धर्म रूपी युधिष्ठिर को सिंहासन पर बैठाया।

जानिए, क्या है भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाओं का रहस्य
भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक रूपों में हमें जीवन के गूढ़ रहस्य समझाए हैं लेकिन श्रीकृष्ण की कुछ बातें आज भी हमें हमारी बुद्धि से परे हैं। हम सभी ने कभी न कभी यह जरुर सुना होगा कि भगवान श्रीकृष्ण 16 कलाओं से पूर्ण थे। किंतु यह कलाओं के पीछे क्या तथ्य हैं, यह बहुत कम लोगों को मालूम है। यहां हम आपको बता रहे हैं श्रीकृष्ण की इन्हीं 16 कलाओं का रहस्य-

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात को 12 बजे वृषभ लग्न में हुआ। अष्टमी के चंद्रमा को पूर्ण बली कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रमा की 16 कलाएं होती हैं जो प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक दिखाई देती है। रोहिणी चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी है। इस काल में चंद्रमा उच्च पर होता है। ऐसे ही काल में चंद्रवंशी होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण चंद्रवंश के संपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में 16 कलाओं से युक्त कहलाएं।

हलछट को, संतान प्राप्ति के लिए करें ये व्रत
भादौ (भाद्रपद) महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि (इस बार 8 अगस्त, बुधवार) को हलषष्ठी पर्व मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनाग द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में अवतरित हुए थे। बलरामजी का प्रधान श हल व मूसल है। इसी कारण इन्हे हलधर भी कहा गया है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा। इसे हरछठ अथवा हलछट भी कहा जाता है।

हल को कृषिप्रधान भारत का प्राण तत्व माना गया है और कृषि से ही मानव जाति का कल्याण है। इसलिए इस दिन बिना हल चले धरती का अन्न व शाक, भाजी खाने का विशेष महत्व है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हलषष्ठी व्रत पूजन के अंत में हलषष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

इस दिन भगवान शिव पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय, नंदी और सिंह आदि की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस प्रकार विधिपूर्वक हलषष्ठी व्रत का पूजन करने से जिनको संतान नहीं है, उनको दीर्घायु और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है। इस व्रत एवं पूजन से संतान की आयु, आरोग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।

गोगा पंचमी, इनकी पूजा से नहीं काटता सांप
भादौ महीने की कृष्ण पक्ष की पंचमी को गोगा पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन गोगादेव की पूजा की जाती है। इस बार गोगा पंचमी का त्योहार 7 अगस्त, मंगलवार को है।

धार्मिक मान्यता है कि गोगादेव की पूजा करने से सांप द्वारा काटने के भय से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन नाग देवता की पूजा भी की जाती है। इससे जुड़ा महत्वपूर्ण त्योहार चार दिन बाद भादौ महीने के कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है, जो गोगा नवमी के नाम से प्रसिद्ध है। गोगा पंचमी के दिन गोगादेव के साथ ही नाग पर भी दूध चढ़ाया जाता है।

गोगादेव की पूजा के लिए साफ दीवार को गेरू से पोतकर दूध में कोयला मिलाकर चौकोर चौक बनाकर उसके अन्दर पांच सर्प बनाने चाहिए। इसके बाद इन सर्पों पर जल, कच्चा दूध, रोली, चावल, बाजरा, आटा, घी, चीनी मिलाकर चढ़ाना चाहिये और पण्डित को दक्षिणा देनी चाहिये।

यह भी मान्यता है कि गोगा देव बच्चों के जीवन की रक्षा करते हैं इसलिए विवाहित स्त्रियां अपनी संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए गोगा देव की पूजा करती है। इसके साथ ही इस पूजा से विवाहित स्त्रियां सौभाग्यवती होती है और नि:संतान स्त्री की संतान प्राप्त होती है।

जानिए, भगवान श्रीकृष्ण ने कैसे बचाए परीक्षित के प्राण
श्रीमद्भागवत के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद जब अश्वत्थामा ने सोए हुए द्रोपदी के पुत्रों का वध किया था तब उसका प्रतिशोध लेने के लिए अर्जुन व श्रीकृष्ण अश्वत्थामा के पीछे गए। घबराकर अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन जीवित रहे। तब अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़कर उसके मस्तक की मणि निकाल ली।

गुरुपुत्र होने के कारण पाण्डवों ने उसके प्राण नहीं लिए। अपने अपमान से झुब्ध होकर अश्वत्थामा ने एक बार फिर पुन: धरती को पाण्डवविहिन करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया यह ब्रह्मास्त्र जाकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर लगा। जिससे उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को प्राणों का भय हो गया।

तब श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के वंश को विनाश से बचाने के लिए सुक्ष्म रूप धारण किया तथा उत्तरा के गर्भ में जाकर ब्रह्मास्त्र के तेज से उस बालक की रक्षा की। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के प्राणों की रक्षा की तथा पाण्डवों के वंश का नाश होने से बचाया।

हर जगह फायदेमंद हैं श्रीकृष्ण के लीडरशिप के ये 2 खास उपाय
भगवान श्रीकृष्ण के ब्रज में बीते बचपन से लेकर कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान तक के जीवन पर व्यावहारिक नजरिए से विचार करें तो यही पाते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण एक कुशल प्रबंधक और रणनीतिकार थे। आज भी जीवन के हर क्षेत्र में उनकी नीतियों का सही उपयोग कामयाबी की वजह बन सकता है। 

द्वापर युग से कलियुग तक युग बदले लेकिन श्रीकृष्ण के चरित्र और व्यवहार में जीवन को जीने के जो सूत्र छुपे हैं, वह आज भी उतने ही मायने रखते हैं। यही वजह है कि श्रीकृष्ण भगवान ही नहीं लीडर या लोकनायक के रूप में भी भक्तों को प्यारे हैं। जानिए श्रीकृष्ण के चरित्र में उजागर परफेक्ट 
मैनेजमेंट के वे 2 खास सूत्र, जो घर हो या नौकरी हर जगह बड़ा फायदा देते हैं

श्रीकृष्ण की सफल रणनीति के दो सबसे खास सूत्र हैं - कुशलता और ताकत का सही उपयोग। सफलता के लिए जरूरी है - किसी भी क्षेत्र या विषय के बारे में गहराई से ज्ञान बटोर दक्ष और कुशल बने। साथ ही व्यावहारिक सोच रखें। यही योग्यता आपकी सबसे बड़ी ताकत होगी, जो आपको जीवन की दौड़ में आगे तक ले जाएगी।

श्रीकृष्ण के जीवन में देखें तो पाते हैं कि वह विष्णु अवतार थे यानी वह सबल और कुशल तो थे ही किंतु बचपन में ही उन्होंने बृज में आए हर संकट को न केवल इस ताकत के सही उपयोग से टाला बल्कि इन संकटों से उबरने के लिए उन्होंने मानवीय रूप में व्यावहारिक संदेश भी ब्रजवासियों को दिए। चाहे वह कालिया दमन हो, इंद्र का अहं चूर करना हो या कंस द्वारा भेजी गई पूतना और दूसरे दानवों का वध। इस तरह श्रीकृष्ण ने न केवल मुसीबतों से बचाया बल्कि हर बार ब्रजवासियों को उनकी शक्ति, कुशलता और काबिलियत का एहसास कराया और उनके आत्मविश्वास को जगाया। यही एक गुणी, सफल और कुशल प्रबंधक की पहचान है।

4 उपाय..जिनसे तेजी से मिलती है सफलता
हर इंसान खुशहाल रहने और दु:ख-दरिद्रता से परे रहने की तमाम कोशिशों और सही दिशा में चलने के बावजूद अनेक मौकों पर मकसद पूरा होने में वक्त लगने या मनचाहे नतीजे नहीं मिलने जैसे हालात से दो-चार होता है। इसके पीछे काम और व्यवहार की वह कमियां भी वजह होती हैं, जो शक्ति, और साधन के मुताबिक नियत योजना और लक्ष्य के बावजूद केवल जल्दबाजी से मन और सोच को बिगाड़ देती हैं।

शास्त्रों के नजरिए से जीवन के लक्ष्य चार पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी हिस्सों में बंटे हैं। इनको पाने के लिए चार अहम बातों को हमेशा ध्यान रखने पर हर लक्ष्य व सफलता को पाते हुए जीवन को यशस्वी और सफल बनाया जा सकता है। जानिए ये 4 अहम सूत्र हैं

पहला यह ध्यान रहे कि शास्त्रों के मुताबिक लक्ष्मी हमेशा सच का साथ देती है। सत्य के पीछे पवित्रता का भाव जुड़ा है। इसलिए जरूरी है कि सच्चाई और सफाई तन, मन और धन में बनाई रखी जाए।
दूसरा सूत्र - यश और कीर्ति हमेशा पवित्र भाव, त्याग व नम्रता का संग करती है। यही वजह है कि हर इंसान नाम कमा सकता है किंतु बुरे भाव व कर्म हावी होते ही वह अपयश का भागी बन जाता है।
तीसरा सूत्र है लगातार अभ्यास ही विद्यावान या दक्ष बनने में निर्णायक होता है। अभ्यास के बिना सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
चौथा सूत्र है बुद्धि की सार्थकता काम के साथ ज्ञान के गठजोड़ में है। जितना काम और ज्ञान का संयोग होगा उतना ही तेज दिमाग चलेग, जो तेजी से बेहतर नतीजे व सफलता दिलाने वाला साबित होगा।

ज़िंदगी की जंग में श्रीकृष्ण की इस नीति से पाएं हर मोर्चे पर फतह
आज अनेक लोग चाहे घर हो या कार्यालय में, अपनी जीवनशैली, दिनचर्या और वक्त के कुप्रबंधन की वजह से परेशान और तनाव में रहते हैं। ऐसे हालात से निजी जीवन से लेकर नौकरी या कारोबार से जुड़े सभी कामों पर बुरा असर पड़ता है। सही योजना और प्रबंधन की कमी से तमाम जद्दोजहद करने के बाद भी मनचाहे नतीजे नहीं मिल पाते। अनुभव और कुशलता से ऐसे परिणामों से बचा जा सकता है। लेकिन अगर अध्यात्म और धर्म के जरिए कुछ रणनीति सीखना चाहें तो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से कुछ तरीके सीखे जा सकते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का कुशल प्रबंधन और बेहतर रणनीति देखने को मिलती है- कुरुक्षेत्र के मैदान में। महाभारत के युद्ध में पाण्डव और उनकी सेना, कौरवों और उनकी सेना के मुकाबले संख्या और ताकत में कमतर थी। किंतु श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सही युद्ध नीति और प्रबंधन के जरिए पाण्डवों को छोटी सेना से भी जीत दिलाई।

जीवन भी कुरुक्षेत्र की भांति ही संघर्ष से भरा है, जहां हर व्यक्ति सफलता पाने और हक के लिए जूझता रहता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण की विजय में व्यावहारिक जीवन के लिए यही संदेश है कि कामयाबी के लिए ज्यादा या कम योग्यता और साधन ही मायने नहीं रखते बल्कि उस योग्यता का सही और कुशलता से उपयोग सफलता के लिए बहुत जरूरी है। आधुनिक समय में मानव प्रबंधन की बात करें तो सफलता में परिवार का साथ तो जरूरी है, पर बाहरी दुनिया या कार्यालय में सभी लोगों से संपर्क, सहयोग और मधुर व्यवहार की भी सफलता में अहम भूमिका होती है।

कम वक्त में ज्यादा तरक्की के लिए अपनाएं श्रीकृष्ण का यह सबक
भगवान श्रीकृष्ण योगेश्वर या कर्मयोगी भी पुकारे जाते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण की जीवन लीलाओं में कर्म है, योग है, विज्ञान है, जो युग-युगान्तर से इंसानी जीवन के लिए कारगर रहा है। श्रीकृष्ण के कर्म के पीछे पुरुषार्थ और मेहनत, योग के पीछे तन, मन को संयम द्वारा साधकर जीवन को अनुशासित और संतुलित करने का भाव और संदेश छुपा है। खासतौर पर आज के दौर में अगर आप कम वक्त में ज्यादा तरक्की के लिए कोशिश कर रहें हैं तो जानिए श्रीकृष्ण के यहां बताए जा रहे सबक को जेहन में रखें

व्यावहारिक रूप से भी विचार करें तो काम के बिना शरीर और सोच में आलस्य घर कर जाता है, जिससे कई तरह के दोष भी स्वभाव व व्यवहार में साथ चले आते हैं। जबकि आज तेज रफ्तारभरे जीवन की मांग गति और कुशलता है, ऐसे वक्त में परिश्रम के साथ कार्य कुशलता बेहद अहम हो गई है। काम ही आज के दौर में शीघ्र ही पहचान, सम्मान और ख्याति पाने का बेहतर जरिया है। 

भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म की इसी अहमियत को धर्मयुद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में धर्म और कर्म को भूलकर पस्त हो चुके महायोद्धा अर्जुन को विराट लीला के साथ उजागर किया। श्रीकृष्ण की इन बातों ने न केवल युद्ध बल्कि धर्म की जीत तय कर दी। श्रीकृष्ण की ये अनमोल बातें श्रीमद्भगवद्गीता के अहम उपदेश के रूप में जानी जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए कर्म संदेशों का यही मतलब है कि कर्म करना हर व्यक्ति का कर्तव्य भी है और हक भी। किंतु उसके फल यानी नतीजों पर वह अधिकार न समझें। कर्म आसक्ति या मोह के साथ न हो, न ही स्वयं को कर्मों के नतीजों का कारण मानो। आसान शब्दों में श्रीकृष्ण के कर्मयोग का सकारात्मक पक्ष यही है कि कोई भी काम करें, उसे पूरे समर्पण, सच्चाई, निष्ठा और स्वार्थ से परे होकर करें। बस, यही सूत्र व्यावहारिक जीवन में हर क्षेत्र में कामयाबी व ऊँचा मुकाम पाने या आगे बने रहने का बेहतर तरीका भी है।


जानिए, श्रीकृष्ण ने कैसे किया इंद्र का घमंड चूर
भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने तथा इंद्र की पूजा न करने का कहकर इंद्र का घमण्ड तोड़ा था। चूंकि ग्रामवासियों द्वारा पूजित होने पर ही इंद्र वहां वर्षा करते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र का घमण्ड तोड़कर उसे यह बताया कि वर्षा करना आपका मौलिक कर्तव्य है। इसके लिए कोई आपकी पूजा करे यह आवश्यक नहीं है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने इंद्र को फल रहित कर्म करने का कर्तव्य बोध कराया था। इस संदर्भ का सार है कि सभी को अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक प्रकार से बिना किसी अतिरिक्त फल की अभिलाषा से करना चाहिए। चूंकि कर्तव्य का निर्वहन करना आपकी मौलिक जिम्मेदारी है।

जब श्रीकृष्ण ने अगुंली पर उठाया गोवर्धन
अच्छी वर्षा के लिए गोकुलवासी इंद्र को प्रसन्न करने के लिए उसकी पूजा करते थे। लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत का महत्व इंद्र से अधिक बताने पर जब ग्रामवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की तो इंद्र बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने गोकुलवासियों को सबक सीखाने के लिए भंयकर वर्षा की जिससे सारा गांव डूबने लगा।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठाकर गोकुलवासियों को आश्रय प्रदान किया था तथा इंद्र का घमण्ड भी तोड़ा था। श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जानकर इंद्र ने उनकी स्तुति की तथा क्षमायाचना की। तब श्रीकृष्ण ने इंद्र को समझाया था कि सभी स्थानों पर समान रूप से वर्षा करना आपका कर्तव्य है इसके लिए मन में पूजा की अभिलाषा रखना सर्वथा अनुचित है।

श्रीकृष्ण से सीखें सुखी गृहस्थी के खास सूत्र
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन आदर्श गृहस्थी का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धर्म ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण की 16 हजार से अधिक रानियां थीं। इनमें से तीन प्रमुख थीं। इसके बाद भी श्रीकृष्ण के दाम्पत्य में कभी आप अशांति नहीं पाएंगे क्योंकि श्रीकृष्ण सुखी गृहस्थ जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानते थे।

गृहस्थ जीवन के इन्हीं प्रमुख सात सूत्रों के बारे में श्रीमद्भागवत में विस्तृत वर्णन किया गया है जो श्रीकृष्ण ने संसार को दिए हैं। सुखी गृहस्थ जीवन का पहला सूत्र है संयम। पति-पत्नी के बीच में संयम होना अति आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के जीवन में संयम होगा तो जीवन आनंदमय कटेगा। दाम्पत्य का दूसरा सूत्र है संतुष्टि। संतोष के अभाव में दाम्पत्य का सुखमय होना मुश्किल है। इसी प्रकार सुखी गृहस्थ जीवन के अन्य सूत्र जो श्रीकृष्ण ने दिए हैं वे हैं संतान, संवेदनशीलतासंकल्प, सक्षम और अंतिम सूत्र है समर्पण।

भागवत के अनुसार इन सभी सूत्रों का पालन करने पर भी यदि दाम्पत्य में प्रेम न पवित्रता नहीं है तो यह सब व्यर्थ है। इन सात सूत्रों का पालन कर तथा जीवन में प्रेम व पवित्रता को लाकर हम भी हमारा गृहस्थ जीवन सुखमय बना सकते हैं।

ज़िंदगी की जंग में श्रीकृष्ण की इस नीति से पाएं हर मोर्चे पर फतह
आज अनेक लोग चाहे घर हो या कार्यालय में, अपनी जीवनशैली, दिनचर्या और वक्त के कुप्रबंधन की वजह से परेशान और तनाव में रहते हैं। ऐसे हालात से निजी जीवन से लेकर नौकरी या कारोबार से जुड़े सभी कामों पर बुरा असर पड़ता है। सही योजना और प्रबंधन की कमी से तमाम जद्दोजहद करने के बाद भी मनचाहे नतीजे नहीं मिल पाते। अनुभव और कुशलता से ऐसे परिणामों से बचा जा सकता है। लेकिन अगर अध्यात्म और धर्म के जरिए कुछ रणनीति सीखना चाहें तो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से कुछ तरीके सीखे जा सकते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का कुशल प्रबंधन और बेहतर रणनीति देखने को मिलती है- कुरुक्षेत्र के मैदान में। महाभारत के युद्ध में पाण्डव और उनकी सेना, कौरवों और उनकी सेना के मुकाबले संख्या और ताकत में कमतर थी। किंतु श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सही युद्ध नीति और प्रबंधन के जरिए पाण्डवों को छोटी सेना से भी जीत दिलाई।

जीवन भी कुरुक्षेत्र की भांति ही संघर्ष से भरा है, जहां हर व्यक्ति सफलता पाने और हक के लिए जूझता रहता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण की विजय में व्यावहारिक जीवन के लिए यही संदेश है कि कामयाबी के लिए ज्यादा या कम योग्यता और साधन ही मायने नहीं रखते बल्कि उस योग्यता का सही और कुशलता से उपयोग सफलता के लिए बहुत जरूरी है। आधुनिक समय में मानव प्रबंधन की बात करें तो सफलता में परिवार का साथ तो जरूरी है, पर बाहरी दुनिया या कार्यालय में सभी लोगों से संपर्क, सहयोग और मधुर व्यवहार की भी सफलता में अहम भूमिका होती है।

सुबह से शाम कब, क्या करते थे श्रीकृष्ण? सीखें टाइम मैनेजमेंट
भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म का अमर संदेश जगत को दिया, जो युगों के बदलाव के बाद भी प्रासंगिक है। कर्म का सिद्धांत बताकर जगत को गति देने वाले भगवान श्रीकृष्ण का नित्य जीवन यानि दिनचर्या भी समय और कर्म की अहमियत बताती है। भगवान श्रीकृष्ण की यह दिनचर्या श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कन्ध में बताई गई है।

भगवान श्रीकृष्ण की दिनचर्या आम व्यक्ति खासतौर पर युवा पीढ़ी के लिए यही प्रेरणा है कि जिंदगी के हर पल का सदुपयोग करें। किसी भी तरह व्यर्थ समय गंवाए अच्छे कार्यों में मन लगाएं, व्यवहार कुशल बनकर दूसरों की जिंदगी से जुड़ी परेशानियों को दूर करने में सहयोगी बने। परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अपने कर्तव्यों को संकल्प के साथ पूरा करें।

इस तरह भगवान श्रीकृष्ण की दिनचर्या समय काटने नहीं समय के साथ चलने का संदेश है। जानिए श्रीमद्भागवत में बताई भगवान श्री कृष्ण की इसी दिनचर्या की रोचक बातें, जिनके मुताबिक 

- भगवान श्री कृष्ण सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जागते हैं।

- इसके बाद स्नान कर तन पर धोती और दुपट्टा डालकर संध्या पाठ करते हैं।

- संध्या पाठ के बाद हवन और मौन साधकर गायत्री जप करते हैं।

- सूर्यदेव के उदय होने पर सूर्य पूजा और ऋषि, देवता और ब्राह्मणों की पूजा करते हैं।

- इसके बाद गायों का दान करते हैं। वह रोज 13084 गायों का दान करते हैं।

- ब्राह्मणों को वस्त्र-आभूषण दान करते हैं।

- गाय, ब्राह्मण, देवता, कुटुंब के बुजुर्गों, गुरु को नमन कर शुभ वस्तुओं को छूते हैं।

- सुबह की इन क्रियाओं के बाद वह अपना चेहरा घी और दर्पण में देखते हैं। इसके बाद फिर से गाय, बैल ब्राह्मण और देव मूर्तियों को नमन करते हैं।

- इसके बाद नगरवासियों और महल में रहने वालों वासियों की समस्या सुनकर सुलझातें और कामनाएं पूरी करते हैं।

- जब तक भगवान यह कार्य पूरा करते है, तब तक उनका सारथी दारुक रथ लेकर आ जाता है।

- तब भगवान श्रीकृष्ण उस रथ में उद्धवजी और सत्यकि के साथ बैठकर महल से बाहर आते हैं।

- जहां से वह यदुकुल के साथ दरबार में जाते हैं। जहां वह सिंहासन पर बैठकर राजपाट चलाते हैं। राज्य से संबंधित परेशानियों और जरूरतों पर विचार करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की दिनचर्या हमें बहुत ही सरल शब्दों में सीख देती है कि समय पर सोना, समय पर जागना हर व्यक्ति को स्वस्थ्य, धनवान और बुद्धिमान बनाता है। यह संदेश बचपन में ही हर व्यक्ति पाठशाला में सुन लेता है,लेकिन अपनाने में भूल करता या भूल जाता है। क्योंकि किसी सीख को जीवन में उतारना कर्मयोगी के लिए संभव है। ऐसे ही कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण भी पुकारे जाते हैं।

क्यों बालकृष्ण को लगाएं माखन का भोग?
कान्हा यानी बालकृष्ण 'माखन चोर' के नाम से प्रसिद्ध हैं। क्योंकि कान्हा को माखन खाना प्रिय है किंतु माखन खाने के लिए चोरी जैसा काम करने पर भी भगवान को माता से लेकर गोकुलवासियों का स्नेह और प्यार मिला। यहां तक कि आज भी उनको इसी बाललीला के कारण बालकृष्ण रुप में घर-घर पूजा जाता और माखन का भोग लगाया जाता है। खासतौर पर कान्हा के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पर। क्यों कान्हा को माखन का भोग लगाएं और लीलाधर श्रीकृष्ण ने माखन खाकर जगत को क्या संदेश देना चाहा, जानिए -

दरअसल, मक्खन की प्रकृति स्निग्ध यानी चिकनी और स्नेहक यानी ठंडक पहुंचाने वाली होती है। स्नेहक शब्द भी स्नेह से बना है। इसका मतलब हुआ कि मक्खन स्नेह यानी प्रेम या प्यार का ही प्रतीक है। बालकृष्ण के माखन खाने के पीछे यही संदेश है कि बचपन से ही हम बच्चों के जीवन में प्रेम उतारें यानी परिवार में उनसे बोल, व्यवहार और संस्कार में प्रेम ही मौजूद हो। क्योंकि अच्छे या बुरे संस्कार ही बाल मन पर सीधा असर करते हैं। इससे जीवनभर उसका अच्छा चरित्र, व्यवहार और जीवन नियत होता है।

व्यावहारिक जीवन में भी प्रेम ही ऐसा तरीका माना जाता है कि जिससे किसी का भी दिल जीता जा सकता है। विरोध में भी समर्थन मिल सकता है। इस तरह प्रेम भी मक्खन की तरह ठंडक पहुंचाता है। मक्खन की एक ओर खूबी है कि वह गर्मी पाकर पिघलता है। ठीक इसी तरह प्रेम, स्नेह और प्यार से भी कठोर और नफरत भरा मन पिघल जाता है। इसे बोलचाल में दिल चुराना भी कहा जाता है।

इस तरह बालकृष्ण के मक्खन खाने या उनको माखन का भोग लगाने के पीछे प्रेरणा है कि बोल से लेकर व्यवहार तक हर तरह से प्रेम के भावों में डूब जाएं। वैसे लोकभाषा में प्रचलित मक्खन की तरह पिघलने जैसे जुमलों के पीछे का मूल भाव प्रेम से ही जुड़ा है।


गीता को क्यों कहते हैं महान ग्रंथ?

एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत शुरू होने से पहले योगिराज भगवान श्रीकृष्ण ने अट्ठारह अक्षौहिणी सेना के बीच मोह में फंसे और कर्म से विमुख अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहते हैं। चूंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, अत: इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता पड़ा। भगवद्गीता में कई विद्याओं का उल्लेख आया है, जिनमें चार प्रमुख हैं - अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्मा विद्या।



माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है। साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है। ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहं और गर्व के विकार से बचता है। ब्रह्मा विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जागता है। गीता माहात्म्य पर श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में कहा है कि भवबंधन से मुक्ति के लिए गीता अकेले ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान होना माना गया है।



इस मंदिर में एक दिन पहले मनाते हैं जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भादौ महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूरे देश में मनाया जाता है। प्रमुख कृष्ण मंदिरों में इस दिन विशेष पूजन व दही हांडी फोड़ कर कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं। इस बार यह पर्व 10 अगस्त, शुक्रवार को है।



भारत में एक कृष्ण मंदिर ऐसा भी है जहां जन्माष्टमी का पर्व एक दिन पहले (इस बार 9 अगस्त, गुरुवार) मनाए जाने की परंपरा है। यह मंदिर मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में स्थित है। यहां पुराने शहर के बीचोंबीच स्थित गोपाल मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां प्रति वर्ष एक दिन पहले जन्माष्टमी का पर्व मनाने की परंपरा है। सिर्फ यहीं नहीं उज्जैन के ही महाकालेश्वर मंदिर में भी श्रीकृष्ण जन्मोत्सव एक दिन पहले ही मनाया जाता है।



दोनों मंदिरों में सिंधिया स्टेट के समय से परंपरानुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पहले मनाया जाता है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी के दिन पहले ब्राह्मण भगवान लड्डू गोपाल का अभिषेक करेंगे। इसके बाद भगवान द्वारिकाधीश व राधा-रुक्मिणी की प्रतिमा का अभिषेक पूजन होगा। श्रृंगार के बाद रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे व 2 बजे तक दर्शन होंगे।



यहां 64 दिन रहकर शिक्षा ग्रहण की थी श्रीकृष्ण और बलराम ने

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ। इसके बाद वे गोकुल में रहे। श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर महाराज उग्रसेन को मथुरा का राज सौंप दिया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण के माता-पिता ने उन्हें विद्याध्ययन करने का आदेश दिया।



विद्याध्ययन करने के लिए श्रीकृष्ण परम पावन धाम अवंतिकापुरी (वर्तमान में उज्जैन) आए। यहां भगवान श्रीकृष्ण व बलराम ने गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की। धर्म शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि मात्र 64 दिनों में ही भगवान श्रीकृष्ण व बलराम ने रहस्य (मंत्रोपनिषत्) व संग्रह (अस्त्रप्रयोग) के सहित संपूर्ण धनुर्वेद सीख लिया। यहां भी भगवान श्रीकृष्ण ने कई लीलाएं की, जिनका श्रीमद्भागवत आदि धर्म ग्रंथों में मिलता है।



इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अवंतिकापुरी में शिक्षा ग्रहण कर यहां की भूमि को पवित्र किया। उज्जैन में आज भी सांदीपनि गुरु का आश्रम मंगलनाथ मार्ग पर स्थित है, जो लोगों की आस्था का केंद्र है।



भगवान श्रीकृष्ण से सीखें मित्रता निभाने का गुण

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में हर रिश्ते का मान रखा। चाहे वह भाई का रिश्ता हो, पति का, शिष्य का या मित्र का। श्रीकृष्ण के जीवन में हमें ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगे जहां उन्होंने अपने हर रिश्ते को एक नई ऊंचाई दी और उस रिश्ते का महत्व समझाया। अपने मित्र सुदामा द्वारा उपहार में दिए गए  सुखे चावल खाकर श्रीकृष्ण ने अपने मित्र का मान रखा।



श्रीकृष्ण राजा थे और सुदामा एक गरीब ब्राह्मण लेकिन फिर भी श्रीकृष्ण ने बात को अपनी मित्रता के आढ़े नहीं आने दिया। जब सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका आए तो पहले तो द्वारपालों ने उन्हंे महल में आने ही नहीं दिया। इस बात से दु:खी होकर सुदामा वापस जाने लगे। इस बात की जानकारी जब श्रीकृष्ण को लगी तो वे सुध-बुध खोकर नंगे पैर सुदामा को लिवाने पहुंचे। यह श्रीकृष्ण का मित्र के प्रति प्रेम ही था जिसने उन्हें नंगे पैर दौडऩे पर मजबूर कर दिया। इस घटना से अभिप्राय है कि जब कोई सच्चा मित्र आपसे मिलने आए तो घर के साथ अपने ह्रदय के द्वार भी उसके लिए खोल देना चाहिए।


सुदामा जब श्रीकृष्ण से मिलने आ रहे थे जब उनकी पत्नी ने उपहार स्वरूप कुछ कच्चे चावल श्रीकृष्ण के लिए भेजे। श्रीकृष्ण ने यह चावल बड़े ही स्वाद से खाए। यह देखकर उनकी रानियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि इन चावलों में मित्रता की ऐसी मिठास है जो किसी भी मिठाई में नहीं हो सकती। इस तरह श्रीकृष्ण ने अपने मित्र का मान रखकर मित्रता के रिश्ते को सम्मानित किया।

जानिए, पूजन व व्रत विधि और शुभ मुहूर्त
10 अगस्त, शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के निमित्त व्रत रखा जाता है व विशेष पूजन किया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन जो भी व्रत रखता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह मोह-माया के जाल के मुक्त हो जाता है। यदि यह व्रत किसी विशेष कामना के लिए किया जाए तो वह कामना भी शीघ्र ही पूरी हो जाती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजन व व्रत की विधि इस प्रकार है-

व्रत व पूजन विधि
जन्माष्टमी (10 अगस्त, शुक्रवार) के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करंय व साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लें (जैसा व्रत आप कर सकते हैं वैसा संकल्प लें यदि आप फलाहार कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें और यदि एक समय भोजन कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें)।

इसके बाद पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की (यथाशक्ति) मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करें।  श्रीकृष्ण को नए वस्त्र अर्पित करें। पालने को सजाएं। इसके बाद सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम उच्चारण करें। अंत में माता देवकी को अघ्र्य दें। भगवान श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें। चन्द्रमा को शंख में जल, फल, कुश, फूल, गंध डालकर अघ्र्य दें एवं पूजन करें।

रात्रि में 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। पालने को झूला करें। पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाएं। आरती करें और रात्रि में शेष समय स्तोत्र, भागवद्गीता का पाठ करें। दूसरे दिन पुन: स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें।

इस विधि व मुहूर्त में करें पूजन, मिलेगा शुभ फल
10 अगस्त, शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के निमित्त व्रत रखा जाता है व विशेष पूजन किया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन जो भी व्रत रखता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह मोह-माया के जाल के मुक्त हो जाता है। यदि यह व्रत किसी विशेष कामना के लिए किया जाए तो वह कामना भी शीघ्र ही पूरी हो जाती है।

व्रत व पूजन विधि - जन्माष्टमी (10 अगस्त, शुक्रवार) के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें व साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लें (जैसा व्रत आप कर सकते हैं वैसा संकल्प लें यदि आप फलाहार कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें और यदि एक समय भोजन कर व्रत करना चाहते हैं तो वैसा संकल्प लें)। इसके बाद पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की (यथाशक्ति) मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करें। श्रीकृष्ण को नए वस्त्र अर्पित करें। पालने को सजाएं। इसके बाद सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करें। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम उच्चारण करें। अंत में माता देवकी को अघ्र्य दें। भगवान श्रीकृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें। चन्द्रमा को शंख में जल, फल, कुश, फूल, गंध डालकर अघ्र्य दें एवं पूजन करें। रात्रि में 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। पालने को झूला करें। पंचामृत में तुलसी डालकर व माखन मिश्री का भोग लगाएं। आरती करें और रात्रि में शेष समय स्तोत्र, भागवद्गीता का पाठ करें। दूसरे दिन पुन: स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें।


शुभ मुहूर्त- सुबह 06:20 से 07:05 तक- चल, सुबह 6: 32 से 8: 45 बजे तक (सिंह लग्न में), सुबह 07:50 से 09:20 तक- लाभ, सुबह 09:20 से 10:50 तक- अमृत, दोपहर 12:20 से 01:50 तक- शुभ, दोपहर 1:10 से 3: 26 बजे तक (वृश्चिक लग्न में), शाम 04:50 से 06:20 तक- चल, मध्यरात्री 12: 01 से 1: 59 बजे तक (वृष लग्न में- सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त)




गोगा नवमी, जानिए कौन थे गोगादेव

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी (इस बार 11 अगस्त, शनिवार) गोगा नवमी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन श्रीजाहरवीर गोगाजी का जन्मोत्सव बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस अवसर पर बाबा जाहरवीर गोगाजी के भक्तगण अपने घरों में इष्टदेव की थाड़ी (थान-वेदी) बनाकर अखण्ड ज्योति जागरण कराते हैं तथा गोगादेवजी की शौर्य गाथा एवं जन्म कथा सुनते हैं। इस प्रथा को जाहरवीर का जोत कथा जागरण कहते हैं। इस दिन कहीं मेले लगते हैं तो कहीं भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। ऐसी मान्यता है कि श्रीगोगादेव भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

कौन थे श्रीगोगादेव महाराज
किवदंती के अनुसार श्रीगोगादेव का जन्म नाथ संप्रदाय के योगी गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। योगी गोरक्षनाथ ने ही गोगादेवजी की माता बाछल को प्रसाद रूप में अभिमंत्रित गुग्गल दिया था। जिसके प्रभाव से महारानी बाछल से जाहरवीर (श्रीगोगादेव महाराज), पुरोहितानी से नरसिंह पाण्डे, दासी से मज्जूवीर, महतरानी से रत्नावीर तथा बन्ध्या घोड़ी से नीलाववीर का जन्म हुआ। इन सभी ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए विधर्मी राजाओं से घोर युद्ध किया जिसमें श्रीगोगादेवजी व नीलाश्व को छोड़कर अन्य वीरगति को प्राप्त हुए। अंत में गुरु गोरक्षनाथ के योग, मंत्र व प्रेरणा से श्रीजाहरवीर गोगाजी ने नीले घोड़े सहित धरती में जीवित समाधि ली।

श्रीकृष्ण की इस सोच को अपनाकर दे परेशानियों को पटखनी

जब जीवन में अच्छा समय होता है, तब हर कोई खुश रहता है। चेहरे पर चमक और मुस्कराहट बनी रहती है। किंतु अगर जीवन में बुरे वक्त का सामना कोई बिना चेहरे पर शिकन या बेचैनी लाकर मुस्कुराहट के साथ करे, तब व्यक्तित्व की गहराई और ऊंचाई उजागर होती है। फिर ऐसा व्यक्ति ही महान बनकर भगवान की तरह सम्मान पाता है।



व्यावहारिक नजरिए से ऐसा ही चरित्र और जीवन दिखाई देता है भगवान श्रीकृष्ण में। भगवान श्रीकृष्ण ने बचपन से ही संघर्ष और कठिन हालातों का सामना किया। किंतु श्रीकृष्ण ने बिना भय, बेचैनी और चिंता के साथ उनका सामना किया। उन्होंने गोकुल से लेकर द्वारिका तक अत्याचार से दु:खी परिजनों और गोकुलवासियों को मुश्किल हालातों से बाहर निकाला। साथ ही यह भी संदेश दे गए कि कठिन और बुरे वक्त से बाहर आने का सही तरीका क्या है। दु:ख में सुख कैसे खोजा जाए और सुख को बरकरार कैसे रखा जाए? यह सिखाया भगवान श्रीकृष्ण ने।



भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्द्धरात्री में अंधकार से भरे कारागार में हुआ। जन्म लेते ही पिता ओर माता से अलग हुए। अंधेरी रात में भारी बारिश में उफनती नदी से होकर गोकुल पहुंचे। इसके बाद भी सारी परेशानियों से परे बाललीलाओं से उन्होंने गोकुलवासियों को आनंदित कर दिया।



वहां भी कठिन समय ने उनका साथ नहीं छोड़ा। कंस ने अपनी म़ृत्यु के भय से उनको मारने के लिए कई रूपों में राक्षस भेजे। इनमें पूतना, बकासुर, धेनुकासुर, शंखचूड़, व्योमासुर व अघासुर राक्षस प्रमुख थे। वास्तव में यह सारे राक्षस जीवन में आने वाली तरह-तरह की परेशानियों का ही प्रतीक हैं। किंतु श्रीकृष्ण ने इन सभी का अंत न केवल आसानी से किया, बल्कि जिस तरह से किया वह जगत को सबक भी दे गया।



यही नहीं खेल-खेल में ही उन्होंने कालिया नाग के आतंक को रौंद दिया। गोवर्धन उठाकर इंद्र का दंभ तोड़ा। ब्रह्मदेव के अहं को भी चूर किया। ऐसा कर उन्होंने यही संदेश दिया कि जीवन में सुख की आस है तो किसी भी तरह से दिल-दिमाग में घमण्ड का कोई स्थान न हो, क्योंकि यही सबसे बड़े दु:ख की वजह है।



इस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने जगत को बताया और सिखाया कि कठिन से कठिन हालात में भी जीवन के सही मायने ढूंढे जा सकते हैं। उनके पूरे जीवन के हर प्रसंग में सुख और आनंद मिल जाता है। यह भी सच है कि उनकी हर लीला और कर्म का परिणाम जगत के लिए सुखद और भलाई के रूप में सामने आया। यही कारण है कि आज भी कृष्ण नाम जन-जन की मन-वाणी-व्यवहार में आनंद और सुख का रस घोल देता है। वास्तव में जीवन को खेल माना जाए तो उसकी बारीकियां कृष्ण के जीवन से सीखी जा सकती हैं।





यह रोचक बात करे साफ कि रासलीला है भोग नहीं योग लीला

भगवान श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्त्तम कहलाते हैं। क्योंकि पूरे जीवन की गई श्रीकृष्ण की लीलाओं में कोई लीला मोहित करती है तो कोई अचंभित करती है। लेकिन हर लीला जीवन से जुड़े कोई न कोई बेहतरीन संदेश देती है।


भगवान श्रीकृष्ण की सभी लीलाओं में रासलीला के कई पहलू एक ओर श्रद्धा व आस्था तो दूसरी तरफ उत्सुकता और जिज्ञासा का विषय भी रहे हैं। किंतु युग के बदलाव, धर्म की गहरी समझ की कमी और बदलती संस्कृति व संस्कारों से पैदा हुई गलत मानसिकता की वजह से रासलीला शब्द को लंपटता या गलत अर्थ में उपयोग किया जाता है। खासतौर पर स्त्रियों से संबंध रखने और उनके साथ रखे जाने वाले व्यवहार के लिए रासलीला के आधार पर अनेक युवा भगवान कृष्ण को आदर्श बताने का अनुचित प्रयास करते हैं।

इसलिए बताए जा रहे एक रोचक पहलू से खासतौर पर युवा समझ्रें कि रासलीला से जुड़ा व्यावहारिक सच क्या है दरअसल, श्रीकृष्ण की रासलीला जीवन के उमंग, उल्लास और आनंद की ओर इशारा करती है। इस रासलीला को संदेह की नजर से सोचना या विचार करना इसलिए भी गलत है, क्योंकि रासलीला के समय भगवान श्रीकृष्ण की उम्र तकरीबन 8 साल की मानी जाती है और उनके साथ रास करने वाली गोपियों में बालिकाओं के साथ युवतियां, यहां तक कि बड़ी उम्र की भी गोपियां शामिल थीं। 

जबकि कलियुग में भी इतनी कम उम्र में बालक के सोच व व्यवहार में यौन इच्छाएं नहीं देखी जाती तो फिर कृष्ण के काल द्वापर में कल्पना करना व्यर्थ है। गोपियों का कान्हा के साथ रास पवित्र प्रेम था। जिस तरह रामायण में श्रीराम के साथ शबरी और केवट के बीच इच्छा और स्वार्थ से दूर प्रेम उजागर होता है, ठीक उसी तरह का प्रेम कृष्ण और गोपियों के बीच रासलीला के जरिए प्रकट होता है। रासलीला योग साधना का स्वरूप थी। धर्म के नजरिए से प्रेम जब आत्मा की तह को छूता है तो वह साधना बन जाता है। जबकि शरीर के दायरे में रहने वाला प्रेम वासना बनकर कलह और विकार ही पैदा करता है। इस तरह रासलीला के अर्थ के साथ मर्म को समझें तो यही बात सामने आती है कि भगवान श्रीकृष्ण की गोपियों के संग रासलीला काम नहीं काम विजय लीला है, जो भोग नहीं योग से जीवन को साधने का संदेश देती है।

जया एकादशी, ये है व्रत विधि व महत्व
भादौ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसका महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। उसी के अनुसार यह एकादशी सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाली है। इस अजा एकादशी भी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 13 अगस्त, सोमवार को है। जया एकादशी व्रत की विधि इस प्रकार है-

जया एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि (12 अगस्त, रविवार) की रात से ही शुरु करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें। उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।

इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा विधि-विधान से करें।(यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।

विष्णु सहस्त्रनाम का जप एवं उनकी कथा सुनें। रात को भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

राजा हरिशचंद्र ने भी किया था जया एकादशी व्रत
13 अगस्त, सोमवार को जया एकादशी का व्रत है। इस अजा एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत की कथा भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी, जो इस प्रकार है-

प्राचीनकाल में हरिशचंद्र नामक एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। उन्होंने किसी कर्म के वशीभूत होकर अपना सारा राज्य व धन त्याग दिया, साथ ही अपनी स्त्री, पुत्र तथा स्वयं को भी बेच दिया और चांडाल के दास बनकर सत्य को धारण करते हुए जीवन व्यतीत करने लगे। इस प्रकार राजा को कई वर्ष बीत गए। एक दिन जब राजा चिंता में डूबे थे तो वहां गौतम ऋषि आ गए। राजा ने उन्हें अपनी समस्या बताई।

तब गौतम ऋषि ने ने बताया कि आज से सात दिन बाद भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जया नाम की एकादशी आएगी, तुम विधिपूर्वक उसका व्रत करो। उस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे। राजा ने उनके कथनानुसार एकादशी आने पर विधिपूर्वक व्रत व जागरण किया। उस व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए।

स्वर्ग से बाजे बजने लगे और पुष्पों की वर्षा होने लगी। व्रत के प्रभाव से राजा का मृतक पुत्र जीवित हो गया और राज्य भी पुन: मिल गया। अंत में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग को गए।

गोवत्स द्वादशी (बछवारस): जानिए, महत्व व पूजन विधि
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को गोवत्स द्वादशी कहते हैं। इसे बछवारस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं गाय व बछड़ों का पूजन करती हैं। इसे पुत्रवती स्त्रियां ही करती हैं। इस बार यह पर्व 14 अगस्त, मंगलवार को है।

यदि किसी के यहां गाय व बछड़े न हों तो वह किसी दूसरे की गाय या बछड़े की पूजा करें। यदि गांव में भी न हों तो गीली मिट्टी से गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर पाटे पर रखकर उनकी पूजा करें। उस पर दही, भीगा हुआ बाजरा, आटा, घी आदि चढ़ाएं। रोली से तिलक करें, चावल और दूध चढ़ाएं।

फिर मोठ, बाजरा पर रुपया रखकर अपनी सास को दें। इस दिन बाजरे की ठंडी रोटी खाएं। गाय का दूध, दही, गेहूं व चावल न खाएं। अपने कुंवारे लड़के की कमीज पर स्वस्तिक बनाकर तथा पहनाकर कुएं की पूजा करें। इससे बच्चे के जीवन की रक्षा होती है और वह भूत-प्रेत तथा नजर के प्रकोप से बचा रहता है।

बछवारस का उद्यापन(उजमन)

जिस वर्ष लड़के का विवाह हो या लड़का पैदा हो तो उजमन किया जाता है। इस दिन से एक दिन पहले बाजरा दान दें। बछवारस के दिन एक थाली में तेरह मोंठ बाजरे की ढेरी बनाकर उन पर दो मुट्ठी बाजरे का आटा, जिसमें घी-शक्कर मिली हो रख दें। तिल और रुपए रखें। इस सामान को हाथ फेरकर अपनी सास को दें और पांव छूकर आशीर्वाद लें। बाद में बछड़े और कुएं की पूजा करें फिर मंगल गीत गाएं व ब्राह्मण को दक्षिणा दें।






ये काम करने वाले बनते हैं भूत-प्रेत!

शास्त्रों में बताई भूत-प्रेत योनि दरिद्रता और अपवित्रता की प्रतीक भी हैं। इसलिए दैनिक जीवन में शरीर की साफ-सफाई न रखने से लेकर अज्ञानता, कटु बोल और व्यवहार से मिलने वाले बुरे नतीजे, दु:ख व अभाव भी जीवित रहते हुए शास्त्रों में बताई मृत्यु के बाद बुरे कर्मों से मिलने वाली प्रेत योनि भुगतने के समान ही माने गए हैं।

दरअसल, धर्मशास्त्र जीवन को साधने की ही सीख देते हैं। इसी कड़ी में हिन्दू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में भी व्यावहारिक जीवन में बुरे कामों की सजा प्रेत योनि मिलना भी बताया गया है। इसके पीछे मकसद यही है कि हर व्यक्ति सदाचार, संस्कार, मर्यादा व अच्छे कामो से जुड़कर रहे तो सुख-सम्मान भरा जीवन बिता सकता है, अन्यथा जीते-जी उसकी भूत-प्रेत की तरह दुर्गति हो जाती है।

जानिए गरुड़ पुराण के मुताबिक व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन के दौरान किए गए ऐसे ही गलत काम, जिनकी सजा मौत के बाद प्रेत योनि के रूप में मिलती है। लिखा गया है कि -

मातरं भगिनीं ये च विष्णुस्मरणवर्जिता:। अदृष्दोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम्।

पैसा होने पर भी आती हैं ये 3 बड़ी परेशानियां! जानिए कैसे निपटें
धन सुखी, शांत व स्थिर जीवन का अहम जरिया है। धर्मग्रंथ भी 'अर्थ' के रूप में जीवन के लिए जरूरी 4 पुरूषार्थ में शामिल कर धन की उपयोगिता को उजागर और प्रमाणित करते हैं। वैभव, ऐश्वर्य, सम्मान, यश, सुविधा जैसे अनेक रूपों में धन सुख का साधन है। जीवन में निराशा और असफलता के वक्त भी धन का संग मिल जाए तो मन और तन को नई जीवन शक्ति मिल जाती है।

जीवन में सुख पाने के लिए धन की इतनी अहमियत होने के बावजूद भी यही धन जीवन में अनेक दु:ख व परेशानियों की वजह भी बन जाता है। व्यावहारिक जीवन में धन कैसे और कब धन सुख-चैन छिन लेता है? इन बातों को धर्मग्रंथ साफ करते हैं। इन बातों को जानकर कोई भी इंसान चाहे वह अमीर हो या गरीब, जीवन के हर हालात में संतुलन और संयम कायम रख सकता है। लिखा गया है कि -
  
अर्थस्योपार्जने दु:खमर्जितस्यापि रक्षणे।

आये दु:खं व्यये दु:खमर्थेभ्यश्च कुत: सुखम्।।

चौरेभ्य: सलिलादग्रे: स्वजनात् पार्थिवादपि।

भयमर्थवतां नित्यं मृत्यो: प्राणभृतामिव।।

खे यातं पक्षिभिर्मांसं भक्ष्यते श्र्वापदैर्भुवि।