Tuesday, April 10, 2012

Dharm Gyan( धर्म ज्ञान)

जानें कैसा था रामराज्य? ये रोचक बातें पढ़ हो जाएंगे हैरान!
त्रेतायुग में मयार्दापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा आदर्श शासन स्थापित किया गया। वह आज भी रामराज्य नाम से राम की तरह ही लोकप्रिय है। यह शासन व्यवस्था सुखी जीवन का आदर्श बन गई। व्यावहारिक जीवन में परिवार, समाज या राज्य में सुख और सुविधाओं से भरी व्यवस्था के लिए आज भी इसी रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है।

साधारण रूप से जिस रामराज्य को मात्र सुख-सुविधाओं का पर्याय माना जाता है। असल में वह मात्र सुविधाओं के नजरिए से ही नहीं बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों के पवित्र आचरण, व्यवहार और विचार और मर्यादाओं के पालन के कारण भी श्रेष्ठ शासन व्यवस्था का प्रतीक है।

जानते हैं शास्त्रों में बताई रामराज्य से जुड़ी कुछ खास बातें, जो धर्म के पैमाने पर आदर्श और हर काल में अपनाने के लिए श्रेष्ठ हैं, किंतु कलिकाल में हावी अधर्म से या यूं कहें कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में धर्म बनी दूरी से हैरान करने वाली भी लगती हैं। जानिए क्या थी रामराज्य की खासियत-

गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं रामचरित मानस में कहा है -

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

राम राज नहहिं काहुहि ब्यापा।।

- इस चौपाई के मुताबिक राम राज्य में शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सांसारिक तीनों ही दु:ख नहीं थे।

- राम राज्य में रहने वाला हर नागरिक उत्तम चरित्र का था।

- सभी नागरिक आत्म अनुशासित थे, वह शास्त्रो व वेदों के नियमों का पालन करते थे। जिनसे वह निरोग, भय, शोक और रोग से मुक्त होते थे।

- सभी नागरिक दोष और विकारों से मुक्त थे यानि वह काम, क्रोध, मद से दूर थे।

- नागरिकों का एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या या शत्रु भाव नहीं था। इसलिए सभी को एक-दूसरे से अपार प्रेम था।

- सभी नागरिक विद्वान, शिक्षित, कार्य कुशल, गुणी और बुद्धिमान थे।

- सभी धर्म और धार्मिक कर्मों में लीन और निस्वार्थ भाव से भरे थे।

- रामराज्य में सभी नागरिकों के परोपकारी होने से सभी मन और आत्मा के स्तर पर शांत ही नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी शांति और सुकून से रहते थे।

- रामराज्य में कोई भी गरीब नहीं था। रामराज्य में कोई मुद्रा भी नहीं थी। माना जाता है कि सभी जरूरत की चीजों का बिना कीमत के लेन-देन होता था। अपनी जरूरत के मुताबिक कोई भी वस्तु ले सकता था। इसलिए बंटोरने की प्रवृत्ति रामराज्य में नहीं थी।

- मान्यता यह भी है कि पर्वतों ने अपने सभी संपत्ति मणि आदि और सागर ने रत्न, मोती रामराज्य के लिए दे दिये। इसलिए वहां के नागरिक शौक-मौज के जीवन की लालसा नहीं रखते थे बल्कि कर्तव्य परायण और संतोषी थे।

श्रीराम की यह बात है कार्यक्षेत्र, रिश्तों व निजी जीवन की सफलता का गुर!
भारतीय संस्कृति में भगवान राम जन-जन के दिलों में बसते हैं। इसके पीछे मात्र धार्मिक कारण ही नहीं है, बल्कि श्रीराम चरित्र से जुड़े वह आदर्श व जीवन मूल्य हैं, जो मानवीय रूप में स्थापित किए गए। खासतौर पर श्रीराम के जीवन और आचरण से जुड़ी एक बात तो हर इंसान के लिए निजी, कार्यक्षेत्र व रिश्तों की सफलता व जीवन में ऊंचाईयों को छूने का अहम गुरु सिखाती है।

कौन-सी है श्रीराम चरित्र से जुड़ी यह बात, जो जीवन की सफलता व ऊंचे पद तक पहुंचने में बेहद निर्णायक सिद्ध होती है? जानिए-

पौराणिक मान्यताओं में श्रीराम भगवान विष्णु का सातवां अवतार हैं। भगवान का मानवीय रूप में यह अवतार इंसान को समाज में रहने के सूत्र भी सिखाता है। असल में भगवान श्रीराम ने इंसानी जिंदगी से जुड़ी हर तरह की मर्यादाओं और मूल्यों को स्थापित किया।

श्रीराम ने अयोध्या के राजकुमार से राजा बनने तक अपने व्यवहार और आचरण में स्वयं मर्यादाओं का पालन किया। एक आम इंसान परिवार और समाज के बीच रहकर कैसे बोल, व्यवहार और आचरण को अपनाकर जीवन का सफर पूरा करे, यह सभी सूत्र श्रीराम के बचपन से लेकर सरयू में प्रवेश करने तक के जीवन में छुपे हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक नजरिए से भी श्रीराम के जीवन को देखें तो पाते हैं कि श्रीराम ने त्याग, तप, प्रेम, सत्य, कर्तव्य, समर्पण के गुणों और लीलाओं से ईश्वर तक पहुंचने की राह और मर्यादाओं को भी बताया।

अयोध्या के राजा बनने के बाद मर्यादा, न्याय और धर्म से भरी ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की, जिसकी आर्थिक, सामजिक और राजनीतिक मर्यादाओं ने हर नागरिक को सुखी, आनंद और समृद्ध कर दिया। श्रीराम का मर्यादाओं से भरा ऐसा शासन तंत्र आज भी युगों के बदलाव के बाद भी रामराज्य के रूप में प्रसिद्ध है।

इस तरह मर्यादामूर्ति श्रीराम ने व्यक्तिगत ही नहीं राजा के रूप में भी मर्यादाओं का हर स्थिति में पालन कर इंसान और भगवान दोनों ही रूप में यश, कीर्ति और सम्मान को पाया। यही कारण है कि युग-युगान्तर से मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजनीय है।

श्री हनुमान की इस खासियत से सीखें काम में मन लगाना..जल्द पा लेंगे लक्ष्य
श्री हनुमान ऐसे भक्त के रूप में भी पूजनीय है, जिनकी भक्ति सर्वश्रेष्ठ, विलक्षण और अतुलनीय है। जिससे वह भक्त शिरोमणि भी पुकारे जाते हैं। हालांकि युग-युगान्तर से धर्मशास्त्रों में अनेक भक्त और उनकी ईश भक्ति के अनेक रूपों की अपार महिमा बताई गई है। किंतु श्री हनुमान की रामभक्ति की एक खासियत उनको श्रेष्ठ व सर्वोपरि बनाती है। वह है - शरणागति।

शरणागति यानी शरण में चले जाना। हालांकि शरणागति भी अलग-अलग रूपों में देखी जाती है। कमजोरी, भय या स्वार्थ से सबल का आसरा क्षणिक लाभ दे सकता है, किंतु लंबे वक्त के लिए नकारात्मक नतीजे भी देने वाला भी होता है। किंतु यश और सफलता के लिए गुण, शक्ति संपन्न होने पर भी निर्भयता के साथ अपनाई शरणागति ही सार्थक होती है। यह शरण देने वाले और शरणागत दोनों को ही बलवान और सुखी करती है।

शक्तिधर श्रीराम और बल, बुद्धि, विद्या संपन्न श्री हनुमान के भक्त और भगवान के गठजोड़ में भी शरणागति का ऐसा ही आदर्श छुपा है। जिसका संबंध श्री हनुमान द्वारा राम की शरणागति से है, जो व्यावहारिक जीवन में लक्ष्य प्राप्ति का एक बेहतरीन सूत्र सिखाता है।

असल में शरणागति के पीछे समर्पण और निष्ठा के भाव अहम होते  है। जिससे किया गया हर कार्य स्वार्थसिद्धि या हित की भावना से परे होता है। यहीं नहीं इससे कर्तव्य में अहं का भाव यानी मैं या मेरा का विचार नदारद हो जाता है। नतीजतन दोषरहित बुद्धि व विचार पूरी ऊर्जा के साथ कर्म करने में सहायक बनकर असंभव लक्ष्य को भी पाने की राह आसान कर देते हैं। श्री हनुमान लीला इस बात का प्रमाण भी है।

बस, द्वेष-ईर्ष्या, स्वार्थ से परे, अहंकार रहित, समर्पित, सच्चा व निष्ठावान बनाने वाला शरणागति का यही एक सूत्र अगर परिवार हो या कार्यक्षेत्र, में अपने कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा करने के लिये कर्म में उतार लें तो जीवन से जुड़े किसी भी मकसद को जल्द पूरा करना संभव हो जाएगा। अधिक सरल शब्दों में कहें तो श्री हनुमान की भांति हर काम लक्ष्य पर ध्यान टिकाकर, डूबकर और मन लगाकर हो।

जानें, कैसे काली, लक्ष्मी और सरस्वती पूजा कर बढ़ाएं प्राण, प्रतिष्ठा और प्रभाव
धर्मग्रंथों में धर्मयुद्धों से जुड़े प्रसंग हो या विज्ञान की अवधारणाएं, अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष की अहमियत उजागर करते हैं। वजूद के लिये यह जद्दोजहद जीवन, मान-सम्मान या जीवन से जुड़े किसी भी विषय से जुड़ी हो सकती है। किंतु संघर्ष चाहे जैसा हो, शक्ति के बिना संभव नहीं।

यही कारण है कि  शक्ति अस्तित्व का ही प्रतीक मानी गई है। चूंकि यह शक्ति मोटे तौर पर संसार में रचना, पालन व संहार रूप में दिखाई देती है। प्राकृतिक व व्यावहारिक रूप से स्त्री भी सृजन व पालन शक्ति की ही साक्षात् मूर्ति है। इसी शक्ति की अहमियत को जानकर ही सनातन संस्कृति में स्त्री स्वरूपा देवी शक्तियां पूजनीय और सम्माननीय है।

नवरात्रि शक्ति स्वरूप की पूजा का विशेष काल है। शक्ति पूजा में खासतौर पर महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती का विधान है, जो क्रमश: शक्ति, ऐश्वर्य और ज्ञान की देवी मानी जाती है।

व्यावहारिक जीवन की नजर से तीन शक्तियों का महत्व यही है कि तरक्की और सफलता के लिए सबल व दृढ़ संकल्पित होना जरूरी है। जिसके लिये सबसे पहले विचारों को सही दिशा देना यानी नकारात्मकता, अवगुणों व मानसिक कलह से दूर होना जरूरी है। महाकाली पूजा के पीछे यही भाव है। यही कारण है कि धन और ज्ञान पाने की कामना से नवरात्रि में पहले तीन दिन महाकाली पूजा की जाती है। बाद के तीन-तीन दिनों में महालक्ष्मी और महासरस्वती की पूजा।

महालक्ष्मी पावनता और महासरस्वती विवेक शक्ति का प्रतीक है, जो मन और तन को सशक्त बनाती है। ऐसी दशा ज्ञान, संस्कार आत्मविश्वास, सद्गगुणों, कुशलता और दक्षता पाने के लिये अनुकूल होती है। जिसके द्वारा कोई भी इंसान मनचाहा धन, वैभव बंटोरने के साथ ही सुखी और शांत जीवन की कामनाओं को सिद्ध कर सकता है।

इस तरह आज के दौर में इन तीन शक्तियों की पूजा का संदेश यही है कि जीवन में निरोगी, चरित्रवान, आत्म-अनुशासित, कार्य-कुशल व दक्ष बनकर शक्ति संपन्न बने और कामयाबी की ऊंचाईयों को छूकर प्राण, प्रतिष्ठा और प्रभाव को कायम भी रखें और इजाफा भी करें।

सावधान! नवरात्रि में इन 16 स्त्रियों के लिए न रखें बुरे भाव..
नवरात्रि में शक्ति की उपासना के साथ ही वासंतिक नवरात्र में भगवान राम की भी आराधना की जाती है। असल में शक्ति और श्रीराम उपासना के पीछे संदेश यह भी है कि जीवन में कामयाबी को छूने के लिए बेहतर व मर्यादित चरित्र व व्यक्तित्व की शक्ति भी जरूरी है।

इस तरह नवरात्रि व रामनवमी शक्ति के साथ मर्यादा के महत्व की ओर इशारा करती है। खासतौर पर शक्ति के मद में रिश्तों, संबंधों और पद की मर्यादा न भूलकर दुर्गति से बचना ही दुर्गा पूजा की सार्थकता भी है। जगतजननी का यही स्वरूप व्यावहारिक जीवन में स्त्री को माना जाता है।

यही कारण है कि वेद-पुराणों में 16 स्त्रियों को मां के समान दृष्टि रखने और सम्मान देने का महत्व बताया गया है। कौन हैं ये स्त्रियां जानिए -

स्तनदायी गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।

अभीष्टदेवपत्नी च पितु: पत्नी च कन्यका।।

सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्त्नी प्रियाप्रसू:।

मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा।।

मातु: पितुश्र्च भगिनी मातुलानी तथैव च।

जनानां वेदविहिता मातर: षोडश स्मृता:।।

जिसका अर्थ है कि वेद में नीचे बताई 16 स्त्रियां मनुष्य के लिए माताएं हैं-
स्तन या दूध पिलाने वाली, गर्भधारण करने वाली, भोजन देने वाली, गुरुमाता, यानी गुरु की पत्नी, इष्टदेव की पत्नी, पिता की पत्नी यानी सौतेली मां, पितृकन्या यानी सौतेली बहिन, सगी बहन, पुत्रवधू या बहू, सासु, नानी, दादी, भाई की पत्नी, मौसी, बुआ और मामी।

भगवान श्रीराम  के ये 16 गुण! जानें, क्या हैं सफल नेतृत्व के सरल सूत्र?
सांसारिक जीवन में आगे बढऩे, नाम कमाने यानी ख्याति, यश, कीर्ति के लिए सद्गुणों और अच्छे कामों की बड़ी भूमिका होती है। क्योंकि गुण और अच्छे कर्म सम्मान व प्रतिष्ठा का कारण ही नहीं बनते हैं, बल्कि किसी भी इंसान को असाधारण और विलक्षण नेतृत्व शक्तियों का स्वामी बना देते हैं। लेकिन कोई साधारण इंसान आगे रहने, बेहतर नेतृत्व क्षमता पाने या ऊंचाईयों को छूने के लिए के लिए किन खास गुणों पर ध्यान दें, यह समझने के लिए धर्मग्रंथों के नजरिए से भगवान श्रीराम का चरित्र श्रेष्ठ आदर्श है।

दरअसल, विष्णु अवतार भगवान श्रीराम ने भी मानवीय रूप में जन-जन का भरोसा और विश्वास अपने आचरण और असाधारण गुणों से ही पाया। उनकी चरित्र की खास खूबियों से ही वह न केवल लोकनायक बने, बल्कि युगान्तर में भी भगवान के रूप में पूजित हुए।

वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम की ऐसे ही सोलह गुण बताए गए हैं, जो आज भी नेतृत्व क्षमता बढ़ाने व किसी भी क्षेत्र में अगुवाई करने के अहम सूत्र हैं, जानते हैं इन गुणों को आज के संदर्भ में अर्थों के साथ -

- गुणवान (ज्ञानी व हुनरमंद)

- वीर्यवान (स्वस्थ्य, संयमी और हष्ट-पुष्ट)

- धर्मज्ञ (धर्म के साथ प्रेम, सेवा और मदद करने वाला)

- कृतज्ञ (विनम्रता और अपनत्व से भरा)

- सत्य (सच बोलने वाला, ईमानदार)

- दृढ़प्रतिज्ञ (मजबूत हौंसले वाला)

- सदाचारी (अच्छा व्यवहार, विचार)

- सभी प्राणियों का रक्षक (मददगार)

- विद्वान (बुद्धिमान और विवेक शील)

- सामर्थ्यशाली (सभी का भरोसा, समर्थन पाने वाला)

- प्रियदर्शन (खूबसूरत)

- मन पर अधिकार रखने वाला (धैर्यवान व व्यसन से मुक्त)

- क्रोध जीतने वाला (शांत और सहज)

- कांतिमान (अच्छा व्यक्तित्व)

- किसी की निंदा न करने वाला (सकारात्मक)

- युद्ध में जिसके क्रोधित होने पर देवता भी डरें (जागरूक, जोशीला, गलत बातों का विरोधी)

श्री हनुमान के ये 4 साहसी किस्से! भरे युवाओं में आगे बढऩे का जोश
आज अनेक युवाओं के संघर्ष भरे जीवन का एक बड़ा कारण लक्ष्य का अभाव भी है। जिससे तमाम कोशिशों के बाद भी अनेक अवसरों पर वह असफलता का सामना करते हैं। हालांकि लक्ष्य न साधने या एकाग्रता भंग होने का कारण कभी-कभी विपरीत हालात भी होते हैं। लेकिन ऐसे ही बुरे वक्त के थपेड़ों से जूझकर जो मकसद को पा ले, ऐसा चरित्र ही दुनिया में प्रेरणा बन जाता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में रुद्रावतार श्री हनुमान का चरित्र शक्ति, ऊर्जा, बल के सही उपयोग और मजबूत इरादों से लक्ष्य भेदने के सूत्र सिखाता है। यहां जानते हैं रामायण में श्री हनुमान से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से कुछ ऐसे ही अहम सूत्र -

रावण द्वारा सीताहरण के बाद श्री हनुमान ने माता सीता की खोज में लंका तक पहुंचते तक अनेक मुश्किलों का सामना किया। लेकिन इस दौरान अपने लक्ष्य के प्रति वह इतने दृढ़ थे कि उसको पाने के लिए उन्होंने बुद्धि, बल और साहस से सारी मुसीबतों को मात दी। यहां जानते हैं क्या सिखाते हैं श्री हनुमान -

मैनाक पर्वत - दरअसल, मैनाक पर्वत कर्मशील को विश्राम के लालच का प्रतीक है, ऐसा भाव लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए कहीं न कहीं आता है। श्री हनुमान द्वारा इसे ठुकराकर कर आगे बढऩा यही संदेश देता है कि लक्ष्य को पाना है तो हमेशा गतिशील रहें।

सुरसा - सुरसा उन बाधाओं और उतार-चढ़ाव का प्रतीक है, जो लक्ष्य में रुकावटे डालते हैं। किंतु श्री हनुमान ने अपने आकार को बढ़ा-छोटा कर यही संदेश दिया कि हालात के मुताबिक ढल कर लक्ष्य से ध्यान न हटाएं।

सिंहिका - मकसद को पाने के लिए ऐसा वक्त भी आता जब इंसान के मन में दूसरों की सफलता से द्वेष या ईष्र्या के भाव पैदा होते हैं, जिससे लक्ष्य पाना मुश्किल हो सकता है। सिंहिका ऐसे ही बुरे भावों की प्रतीक है। जिसे मारकर श्री हनुमान ने यही संदेश दिया कि लक्ष्य को पाने के लिए ऐसी सोच से दूर हो जाना चाहिए।

लंका और लंकिनी - लंका और उसकी रक्षक लंकिनी असल में खूबसूरती, मोह और आसक्ति का रूप है। जिसके कारण कोई भी संत और तपस्वी भी लक्ष्य से भटक सकता है। किंतु श्री हनुमान लंकिनी को मारकर और लंका के सौंदर्य से प्रभावित हुए बगैर सीता की खोज कर लंका में आग लगाकर यही संकेत करते हैं कि लक्ष्य को पाने के लिए प्रलोभन, मोह, आकर्षण से दूर रहना ही हितकर होता है।

हनुमान जयंती: जानिए कैसे हुआ हनुमान का जन्म
भगवान शंकर के हनुमान अवतार की पूजा पुरातन काल से ही शक्ति के प्रतीक के रूप में की जा रही है। हनुमान के जन्म के संबंध में धर्मग्रंथों में कई कथाएं प्रचलित हैं। उसी के अनुसार-

भगवान विष्णु के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया। सप्तऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहित कर वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी के गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए। हनुमान जी सब विद्याओं का अध्ययन कर पत्नी वियोग से व्याकुल रहने वाले सुग्रीव के मंत्री बन गए।

उन्होंने पत्नीहरण से खिन्न व भटकते रामचंद्रजी की सुग्रीव से मित्रता कराई। सीता की खोज में समुद्र को पार कर लंका गए और वहां उन्होंने अद्भुत पराक्रम दिखाए। हनुमान ने राम-रावण युद्ध ने भी अपना पराक्रम दिखाया और संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए। अहिरावण को मारकर लक्ष्मण व राम को बंधन से मुक्त कराया। इस प्रकार हनुमान अवतार लेकर भगवान शिव ने अपने परम भक्त श्रीराम की सहायता की।

हनुमान जयंती: किस प्रकार अपना लक्ष्य प्राप्त करें, सीखें हनुमान से
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण हिंदू धर्म का गौरव है। इस ग्रंथ में भगवान श्रीराम के साथ ही रुद्र अवतार वानरश्रेष्ठ हनुमान के पराक्रम का भी अद्भुत वर्णन है। हनुमान को भक्तशिरोमणि भी कहा जाता है। भगवान शंकर का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है। हनुमानजी के जीवन चरित्र से हमें अनेक शिक्षाएं भी मिलती हैं।

शिव का यह अवतार बल, बुद्धि विद्या, भक्ति व पराक्रम का श्रेष्ठ उदाहरण है। हनुमान अवतार से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि यदि आप अपनी क्षमता को पहचानें तो सब कुछ असंभव है। जिस तरह हनुमान ने अपनी क्षमता को जानकर समुद्र पार किया था उसी तरह हम भी अपने अंदर की क्षमता को पहचानें तथा कठिन से कठिन लक्ष्य को भी भेदने का साहस रखें।

हनुमान को भगवान राम का सेवक, मित्र, भाई, हितेषी तथा सच्चा भक्त कहा जाता है चूंकि जब भी भगवान श्रीराम पर कोई संकट आया तब हनुमानजी ने उन्हें बचाया तथा अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। धर्म के पथ पर चलते हुए श्रीराम का साथ हनुमान ने  दिया था उसी तरह यदि हम धर्म के मार्ग पर चलें तो भगवान हमारी सहायता भी अवश्य करेंगे।

जानें, किस नाम व रूप वाली हनुमान मूर्तिं की पूजा का क्या होता है प्रभाव?
श्री हनुमान भक्ति धर्म, गुण, आचरण, विचार, मर्यादा, बल और संस्कार से जोड़ देती है। श्री हनुमान के इस दिव्य चरित्र के कारण भी चिरंजीवी और कालजयी है। यही कारण है कि हर युग और काल में श्री हनुमान का स्मरण सुखदायी और संकटनाशक माना गया है। श्री हनुमान के प्रति ऐसी आस्था और विश्वास के साथ उनके अलग-अलग रूप पूजनीय है।

हनुमान जयंती के पुण्य अवसर पर हम यहां बता रहें हैं श्री हनुमान की कुछ विशेष मूर्तियों की उपासना से कौन-सी कामनाओं की पूर्ति और शक्तियां प्राप्त होती है?

वीर हनुमान - वीर हनुमान की प्रतिमा की पूजा साहस, बल, पराक्रम, आत्मविश्वास देकर कार्य की बाधाओं को दूर करती है।

भक्त हनुमान - राम भक्ति में लीन भक्त हनुमान की उपासना जीवन के लक्ष्य को पाने में आ रहीं अड़चनों को दूर करती है। साथ ही भक्ति की तरह वह मकसद पाने के लिए जरूरी एकाग्रता, लगन देने वाली होती है।

दास हनुमान - दास हनुमान की उपासना सेवा और समर्पण के भाव से जोड़ती है। धर्म, कार्य और रिश्तों के प्रति समर्पण और सेवा की कामना से दास हनुमान को पूजें।

सूर्यमुखी हनुमान - शास्त्रों के मुताबिक सूर्यदेव श्री हनुमान के गुरु हैं। सूर्य पूर्व दिशा से उदय होकर जगत को प्रकाशित करता है। सूर्य व प्रकाश क्रमश: गति और ज्ञान के भी प्रतीक हैं। इस तरह सूर्यमुखी हनुमान की उपासना ज्ञान, विद्या, ख्याति, उन्नति और सम्मान की कामना पूरी करती है।

दक्षिणामुखी हनुमान - दक्षिण दिशा काल की दिशा मानी जाती है। वहीं श्री हनुमान रुद्र अवतार माने जाते हैं, जो काल के नियंत्रक है। इसलिए दक्षिणामुखी हनुमान की साधना काल, भय, संकट और चिंता का नाश करने वाली होती है।

उत्तरामुखी हनुमान - उत्तर दिशा देवताओं की मानी जाती है। यही कारण है कि शुभ और मंगल की कामना उत्तरामुखी हनुमान की उपासना से पूरी होती है।

श्री हनुमान से सीखें कैसे पाएं शक्ति और पाने पर क्या हो रवैया?
भौतिक सुखों से भरे आज के माहौल में अनेक लोग अंदर और बाहरी द्वंद्व या संघर्ष से आहत हो सुख की राह पाने के लिये जूझते हैं। ऐसी मानसिक और व्यावहारिक मुश्किलों में एक श्रेष्ठ गुरु मिलना कठिन हो जाता है। अगर आप भी संकटमोचक गुरु की आस रखते हैं तो हनुमान जयंती (6 अप्रैल) यानी श्री हनुमान की जन्म तिथि की शुभ घड़ी में संकटमोचक हनुमान को इष्ट बनाकर गुरु के समान सेवा, भक्ति व उनका चरित्र स्मरण से एक श्रेष्ठ गुरु की कमी को पूरा करें।

श्री हनुमान का जन्म भी चैत्र शुक्ल पूर्णिमा तिथि पर माना गया है। इस शुभ मौके पर श्री हनुमान चरित्र में छिपे यहां बताए जा रहे सूत्र सफल जीवन के लिए मार्गदर्शन ही नहीं करता है, बल्कि संकटमोचक भी साबित होता है। सीखें, हनुमान चरित्र से शक्ति व कामयाबी के कुछ ऐसे ही खास गुरु मंत्रों में से पहला सूत्र -

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हनुमान भक्ति के रची गई हनुमान चालीसा की शुरुआत भी गुरु स्मरण से ही होती है। जिसमें श्री हनुमान के प्रति भी गुरु भक्ति का भाव छुपा है। ऐसे ही गुरु भाव से हनुमान का स्मरण कर शक्ति व सफलता पाने का पहला सूत्र सीखे तो वह है - विनम्रता।

जी हां, सांसारिक जीवन में इंसान थोड़े से सुख, पद, प्रतिष्ठा या अधिकार मिलने पर अहं भाव से घिरने लगता है, जो उसके अपयश या दूसरों की उपेक्षा, असहयोग के साथ अशांत जीवन का कारण भी बनता है।

ऐसे कलह से दूर रहने के लिए ही श्री हनुमान चरित्र यही सबक देता है कि गुण और शक्ति संपन्न बनने के लिए कठोर परिश्रम, संकल्प का भाव मन, वचन व कर्म में उतारें। ठीक वैसे ही जैसे श्री हनुमान का सूर्य को गुरु बनाने व ज्ञान पाने के लिए सूर्य रथ की गति से तालमेल बैठाकर चलना बेजोड़ उदाहरण व आदर्श है।

यही नहीं ज्ञानी व सबल बनने पर अहंकार से मुक्त रहे। जिस तरह श्री हनुमान का स्वभाव व चरित्र विनम्रता से भरा रहा। सार यही है किसी भी रूप में अहं को स्थान न दे। हमेशा नम्रता और सीखने का भाव मन में कायम रखें तो शक्ति व सफलता पाने व बढ़ाने का सिलसिला कायम रहेगा।

यह रोचक किस्सा भी था हनुमान की पूंछ से लंका जलने की वजह!
श्री हनुमान रामायण रूपी माला के रत्न पुकारे गए हैं, क्योंकि श्री हनुमान की लीला और किए गए कार्य अतुलनीय और कल्याणकारी रहे। श्री हनुमान ने जहां राम और माता सीता की सेवा कर भक्ति के आदर्श स्थापित किए, वहीं राक्षसों का मर्दन किया, लक्ष्मण के प्राणदाता बने, देवताओं के भी संकटमोचक बने और भक्तों के लिए कल्याणकारी बने। रामायण में आए श्री हनुमान से जुड़े ऐसे ही अद्भुत संकटमोचन करने वाले प्रसंगों में लंकादहन भी प्रसिद्ध है।

सामान्यत: लंकादहन के संबंध में यही माना जाता है कि सीता की खोज करते हुए लंका पहुंचे और रावण के पुत्र सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया। तब रावण के पुत्र मेघनाद ने श्री हनुमान को ब्रह्मास्त्र छोड़कर काबू किया और रावण ने श्री हनुमान की पूंछ में आग लगाने का दण्ड दिया। तब उसी जलती पूंछ से श्री हनुमान ने लंका में आग लगा रावण का दंभ चूर किया। किंतु पुराणों में लंकादहन के पीछे भी एक और रोचक बात जुड़ी है, जिसके कारण श्री हनुमान ने पूंछ से लंका में आग लगाई। जानते हैं वह रोचक बात -

दरअसल, श्री हनुमान शिव अवतार है। शिव से ही जुड़ा है यह रोचक प्रसंग। एक बार माता पार्वती की इच्छा पर शिव ने कुबेर से सोने का सुंदर महल का निर्माण करवाया। किंतु रावण इस महल की सुंदरता पर मोहित हो गया। वह ब्राह्मण का वेश रखकर शिव के पास गया। उसने महल में प्रवेश के लिए शिव-पार्वती से पूजा कराकर दक्षिणा के रूप में वह महल ही मांग लिया। भक्त को पहचान शिव ने प्रसन्न होकर वह महल दान दे दिया।

दान में महल प्राप्त करने के बाद रावण के मन में विचार आया कि यह महल असल में माता पार्वती के कहने पर बनाया गया। इसलिए उनकी सहमति के बिना यह शुभ नहीं होगा। तब उसने शिवजी से माता पार्वती को भी मांग लिया और भोलेभंडारी शिव ने इसे भी स्वीकार कर लिया। जब रावण उस सोने के महल सहित मां पार्वती को ले जाना लगा। तब अचंभित और दु:खी माता पार्वती ने विष्णु को स्मरण किया और उन्होंने आकर माता की रक्षा की।

जब माता पार्वती अप्रसन्न हो गई तो शिव ने अपनी गलती को मानते हुए मां पार्वती को वचन दिया कि त्रेतायुग में मैं वानर रूप हनुमान का अवतार लूंगा उस समय तुम मेरी पूंछ बन जाना। जब मैं माता सीता की खोज में इसी सोने के महल यानी लंका जाऊंगा तो तुम पूंछ के रूप में लंका को आग लगाकर रावण को दण्डित करना।

यही प्रसंग भी शिव के श्री हनुमान अवतार और लंकादहन का एक कारण माना जाता है।

श्री हनुमान की भक्ति से मिलती हैं ये 8 चमत्कारी सिद्धियां
रुद्र अवतार श्री हनुमान सर्वगुण, सिद्धि और बल के अधिपति देवता हैं। यही कारण है कि वह संकटमोचक कहलाते हैं। विपत्तियों से रक्षा के लिए श्री हनुमान का स्मरण और उपासना बेहद प्रभावी मानी जाती है।

इसी कामना से श्री हनुमान की भक्ति और प्रसन्नता के लिए बोली जाने वाली सबसे लोकप्रिय स्तुति है गोस्वामी तुलसीदास द्वारा बनाई गई श्री हनुमान चालीसा है। इसी चालीसा में एक चौपाई आती है। जिसमें श्री हनुमान को आठ सिद्धियों का स्वामी बताया गया है।

यह चौपाई है -

अष्टसिद्धि नव निधि के दाता।

अस बर दीन्ह जानकी माता।।

अक्सर, हर हनुमान भक्त चालीसा पाठ के समय इस चौपाई का भी आस्था से पाठ करता है। इस चौपाई के अनुसार यह अष्टसिद्धि माता सीता के आशीर्वाद से श्री हनुमान को मिली और साथ ही उनको इन सिद्धियों को अपने भक्तों को देने का भी बल प्राप्त हुआ। लेकिन, क्या आप जानतें हैं - कौन-सी हैं ये अष्टसिद्धियांनहीं, तो जानिए, इन आठ सिद्धियों के नाम और सरल अर्थ -

अणिमा - इससे बहुत ही छोटा रूप बनाया जा सकता है।

लघिमा - इस सिद्धि से छोटा और हल्का बना जा सकता है।

महिमा - बड़ा रूप लेकर कठिन और दुष्कर कार्यों को आसानी से पूरा करने की सिद्धि।

गरिमा - शरीर का वजन बढ़ा लेने की सिद्धि। अध्यात्म की भाषा में अहंकारमुक्त होने का बल।

प्राप्ति - इच्छाशक्ति से मनोवांछित फल पाने की सिद्धि।

प्राकाम्य - कामनाओं की पूर्ति और लक्ष्य पाने की दक्षता।

वशित्व - वश में करने की सिद्धि।

ईशित्व - इष्टसिद्धि और ऐश्वर्य सिद्धि।

सफलता के लिए क्यों, कब और कैसा संयम व साहस है जरूरी?
शास्त्र कहते हैं कि साहस व धैर्य के लिए शरीर से बलवान होना जरूरी नहीं, बल्कि साहस के मूल में सत्य, पवित्रता और संकल्प होता है। जब कोई भी इंसान मन, वचन और कर्म में ये तीनों बातें उतार लें तो धैर्य और साहस के बूते कोई भी लक्ष्य भेदना आसान बना सकता है।

यही सबक देता है श्री हनुमान का चरित्र। श्री हनुमान से धैर्य और निडरता का सूत्र जीवन की तमाम मुश्किल हालात में भी मनोबल देता है। श्री हनुमान की यह खूबी सुग्रीव से लेकर श्रीराम के लिए न केवल संकटमोचक बनी, बल्कि लक्ष्य को पाना आसान बना दिया।

खासतौर पर बल, शक्ति, धैर्य व हिम्मत के बूते ही श्री हनुमान ने सागर पार कर लंका पहुंचे व रावण राज के अंत का बिगुल बजाया।

आप भी जीवन में श्री हनुमान का स्मरण कर जिम्मेदारियों को संभालते हुए कामों को अंजाम दें निष्कपट, निस्वार्थ बने, तो उससे मिली हिम्मत व संयम से हर सफलता को मुट्ठी में करना आसाना हो जाएगा।

जानें, श्री हनुमान की ये 5 खूबियां! सीखें कैसे आसानी से पाएं सफलता?
हनुमान जयंती श्री हनुमान के जन्म का शुभ दिन माना जाता है। श्री हनुमान चरित्र पर गौर करें तो वे पवनसुत हैं। श्री हनुमान रुद्र के भी अवतार हैं, तो जगत की आत्मा माने जाने वाले देवता सूर्य के विलक्षण शिष्य भी। यही नहीं श्री हनुमान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के तो परम भक्त हैं।

इस तरह गौर करें तो श्री हनुमान के प्राकट्य से लेकर उनसे जुड़े हर रिश्तो में भी सकारात्मकता, ऊर्जा, गति, ज्ञान व सुख का भाव मिलता है। अगर उनके चरित्र में झांके तो शक्ति के साथ संयम, बुद्धि व विद्या का भी अद्भुत तालमेल व संतुलन प्रकट होता है।

यही कारण है कि सांसारिक जीवन के नजरिए से श्री हनुमान नाम सफलता व सुख का पर्याय या साधन माना जाता है। अगर आप भी जीवन में पारिवारिक, सामाजिक जीवन के साथ अपने कार्यक्षेत्र में मनचाही सफलता के लिए जुटे हैं, तो श्री हनुमान की यहां बताई जा रही 5 खूबियां आपके कामयाबी के राह को आसान बना सकती है -

- मान-समर्पण

- धैर्य ओर सफलता

- कृतज्ञता

- विवेक और निर्णय

- तालमेल की क्षमता

सबसे पहली खूबी पर विचार करें तो  श्री हनुमान ने हर रिश्तों को मान दिया और उसके प्रति समर्पित रहे, फिर चाहे वह माता हो, वानर राज सुग्रीव या अपने इष्ट भगवान राम।

संदेश है कि परिवार और अपने क्षेत्र से जुड़े हर संबंध में मधुरता बनाए रखें। क्योंकि इन रिश्तों के प्रेम, सहयोग और विश्वास से मिली ऊर्जा, उत्साह और दुआएं आपकी सफलता तय कर देती है।

'अहं' को 'हम' बना कैसे पाएं कामयाबी? सिखाए श्री हनुमान का यह गुर
सफल जीवन की प्रेरणा व उत्साह देने वाले अद्भुत देवता श्री हनुमान की सहज सफलता पाने का सबक देने वाली खूबियों की कड़ी में तीसरी खूबी है - कृतज्ञता।

दरअसल, शक्ति, पद, धन या समृद्धि, सफलता जैसे अनेक सकारात्मक कारण इंसान में अहं भी पैदा करने वाले होते हैं। इनके साथ ही अगर आत्म प्रशंसा का भाव जुड़ जाए तो फिर यह पतन का कारण भी बन सकते हैं। इंसान को इसका एहसास तब तक नहीं हो पाता, जब तक किसी हानि से दो-चार होने की नौबत न आए जाए या फिर घातक स्थितियां न बन जाए।

जीवन को ऐसी दुर्गति से बचाने के लिए ही श्री हनुमान का स्मरण कर उनकी विनम्रता व कृतज्ञ भाव को अपनाया जाए तो जीवन में दंभ या आत्म प्रशंसा की लालसा से परे रह सुख-शांति व सफलता आसान बनाई जा सकती है।

इसके लिए आप भी अपनी हर सफलता या शक्ति संपन्नता में परिजनों, इष्टजनों और बड़ों का योगदान न भूलें। जैसे श्री हनुमान ने अपनी तमाम सफलता का कारण श्रीराम को ही बताया।

वैशाख माह में सुबह नहाने से होते हैं ये 10 बड़े लाभ!
प्रात: काल यानी सुबह का वक्त धर्म व विज्ञान दोनों ने ही संयम व अनुशासन से जुड़ी बहुत सी बातों को अपनाकर जीवन में सफलता के हर मकसद को पूरा करने के लिए श्रेष्ठ माना है। सुबह ऐसी सुखद व ऊर्जावान घड़ी होती है, जो शरीर को ही नहीं बल्कि मन, विचारों को हमेशा जागने व उठकर चलने की ही प्रेरणा देती है। इस संदेश के साथ की शुरुआत बेहतर होगी तो बेहतर अंजाम व नतीजे भी तय है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में वैशाख माह में सुबह के इसी ही सुकूनभरे वक्त में जीवन को साधने के लिए ही स्नान का बड़ा महत्व बताया गया है। यहां तक कि रोग या किसी विवशता में भी अनेक विकल्पों के साथ स्नान करना गर्मी के इस मौसम में तन ही नहीं मन के कलह रूपी ताप को भी कम करने वाला माना गया है।

धार्मिक दृष्टि से वैशाख माह को दान, धर्म, तप व स्नान के लिए सभी माहों में सबसे श्रेष्ठ, अतुलनीय व पुण्यदायी माना गया है। पुराणों में लिखा गया है कि श्रीहरि विष्णु के आदेश से सूर्योदय से अगले 6 दंड यानी लगभग ढाई घंटे की शुभ घड़ी तक जल में सारे देवता व तीर्थ वास करते हैं। इसलिए सुबह तीर्थ स्नान से सभी पापों का नाश व उनसे रक्षा भी होती है।

सुबह स्नान की अहमियत पर शास्त्रों की बातों पर गौर करें तो स्नान से जुड़े 10 अहम फायदे भी बताए गए हैं। जिनका संबंध मानव के पूरे जीवन से है। इसलिए जानिए, पूरे वैशाख माह में धार्मिक लाभ के साथ-साथ व्यावाहारिक जीवन को शांत, सुखी व स्थिर बनाने के लिहाज से सुबह स्नान से होने वाले वे 10 लाभ कौन-से हैं?

लिखा गया है कि -

गुणा दश स्नान परस्य साधो रूपञ्च तेजश्च बलं च शौचम्।
आयुष्यमारोग्यमलोलुपत्वं दु:स्वप्रनाशश्च यशश्च मेधा:।।

सरल शब्दों में अर्थ है कि सुबह स्नान करने से 10 गुण प्राप्त होते हैं। ये हैं - रूप यानी सौंदर्य, तेज, बल या शक्ति, पवित्रता, स्वास्थ्य, बुद्धि, बुरे सपनों से मुक्ति, निर्लोभता या लालसा से मुक्ति, आयु व यश।

सार यही है कि स्नान से तन निरोगी होने से मन-मस्तिष्क भी ऊर्जावान और तनावमुक्त रहता है। जिससे न केवल इंसान की उम्र बढ़ती है, बल्कि इनसे मिला मनोबल व पैदा अच्छे विचार सफल और यशस्वी बनाने वाले होते हैं।

इन आसान और छोटे धार्मिक कामों से मिटेंगे जाने-अनजाने पाप
वैशाख का महीना हमें सरलता और परोपकार की भावना से जीना सीखाता है। इसकी धर्म परंपराएं संवदेनाओं से भी भरी हुई हैं। स्कंद पुराण में देवर्षि नारद ने वैशाख माह का महत्व बताया कि विद्याओं में वेद श्रेष्ठ है, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णुवर्णों में ब्राह्मण, वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि श्रेष्ठ है, उसी तरह महीनों में वैशाख मास सर्वोत्तम है।

देवर्षि नारद ने इस माह की श्रेष्ठता के साथ ही वैशाख माह के धर्म और आचरण का महत्व भी बताया। जिसके मुताबिक इस विशेष काल में कुछ ऐसे छोटे-छोटे व आसान धार्मिक काम बताए गए हैं, जिनको दैनिक जीवन में अपनाने से जाने-अनजाने पाप भी नष्ट होते हैं और बहुत पुण्य मिलता है। जानिए, ऐसे ही कुछ काम और उनसे जुड़ी भावना -

- इस माह में गर्मी का मौसम होने से जलदान श्रेष्ठ है। इस माह में जलदान करने वाला, प्याऊ लगवाने वाला, कुएं और तालाब बनवाने वाला बहुत पुण्य कमाता है। जिसके पीछे संदेश यही है कि कि मानव ऐसे आचरण करें जिससे एक मानव दूसरे मानव से भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़ा रहे।

- मानव के साथ ही अमुक प्राणी और पक्षियों के जीवन के लिए भी जल बहुत आवश्यक होता है। इसलिए धर्म लाभ के ये आसान तरीके भी अपनाएं-

- पक्षियों के लिए जलपात्र रखें।

- चींटियों के लिए आटे-गुड़ से बनी गोलियां डालें।

- मछलियों को दाना दे।

इसके पीछे भाव यह है कि अहं भाव छोड़कर स्वयं के मन को सुकून देने के साथ ही दूसरों को भी सुख और तृप्ति दें। अमूक जीवों को जल और भोजन देना इंसान को प्रकृति से भी जोड़ता है।

- भूखे को भोजन कराएं, प्यासे को पानी पिलाएं।

- धूप से तपती जमीन से पैरों को बचाने के लिए पदयात्रियों को जूते-चप्पल या पादुका दान करें।

- ठंडक के लिए पंखा दान दें।

इन आसान कामों से धर्म के साथ मानवीय भावनाएं भी फैलती है।

- इसके अलावा सारे तप, यज्ञ, दान और स्नान के साथ भगवान विष्णु व श्रीकृष्ण की भक्ति, उपासना, कीर्तन, भजन, मंत्र जप के  यथाशक्ति उपाय अपनाना भी कामनासिद्धि करने वाले और बड़े ही पुण्यदायी व पापनाशक माने गए हैं।

जब भी तनाव व अशांति बढे़, तो ऐसा करें..!
जीवन में किसी भी कार्य को सरल बनाने के लिए जरूरी है कि उसे बेहद रुचि, समर्पण, निष्ठा और एकाग्रता से किया जाए। सरल शब्दों में कर्मयोग के पीछे भी यही भाव है। किंतु परिवार और कार्यक्षेत्र या जीवन में किसी भी जिम्मेदारी को पूरा करने के दौरान कार्य में तरह-तरह की कठिनाईयां भी आती है। समय, साधन या आपसी संबंधों में तालमेल का अभाव भी तनाव पैदा कर कार्यक्षमता पर असर डालता है। इससे अनेक अवसरों पर मन-मस्तिष्क में बुरे विचार हावी होते हैं।

अंदर और बाहरी तौर पर ऐसी अशांत स्थिति से छुटकारा ही परिवार के लिये जरूरतों की पूर्ति व कार्यक्षेत्र में लक्ष्य पाने में सफल बनाता है। कर्म के दौरान अशांति और तनावों से बचने के लिए हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भवदगीता में बताया एक सूत्र बेहद अहम साबित हो सकता है। जिसे जेहन में रखकर कार्य संपादन किया जाए तो न केवल व्यक्तिगत तनावों से बचा जा सकता है, बल्कि रिश्तों और संबंधों में नजदीकियां कायम रखी जा सकती हैं।

लिखा गया है कि -

मात्रस्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा:।

आगमापायिनो नित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।

इस श्लोक का अर्थ है कि इन्द्रिय और विषयों द्वारा मिलने वाले सर्दी-गर्मी व सुख-दुख स्थायी नहीं, बल्कि आते-जाते रहते हैं। इसलिए उनको सहन करना चाहिए। इस बात में व्यावहारिक जीवन के लिये सीधा संकेत यही है कि सहिष्णुता, यानी सहनशीलता ही वह सूत्र है, जिससे हर तनावभरे व अप्रिय स्थितियों से आसानी से निकला जा सकता है। साथ ही यह समझ लें कि वक्त हमेशा एक समान नहीं रहता, यानी बदलाव प्रकृति का नियम है, इसे स्वीकार कर आगे बढ़ते रहें।

क्यों बुधवार को जरूर लगाएं श्री गणेश को मोदक का भोग?
हिन्दू धर्म परंपराओं में बुधवार का दिन सभी सुखों का मूल बुद्धि के दाता भगवान श्री गणेश की उपासना का दिन है। श्री गणेश की प्रसन्नता के लिए अनेक विधि-विधान शास्त्रों में बताए गए हैं, जो सरल भी हैं व शुभ फलदायी भी।

इसी कड़ी में श्री गणेश को विशेष रूप से मोदक या लड्डू चढ़ाने की भी परंपरा है। माना जाता है कि श्री गणेश को मोदक बहुत प्रिय है। आखिर श्री गणेश को मोदक ही प्रिय क्यों है और क्यों खासतौर पर बुधवार के दिन मोदक का भोग लगाने का खास महत्व है? जानिए, इसके पीछे जुड़ी रोचक बातें -

दरअसल, हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक कलियुग में भगवान गणेश के धूम्रकेतु रूप की पूजा की जाती है। जिनकी दो भुजाएं है। किंतु मनोकामना सिद्धि के लिये बड़ी आस्था से भगवान गणेश का चार भुजाधारी स्वरूप पूजनीय है। जिनमें से एक हाथ में अंकुश, दूसरे हाथ में पाश, तीसरे हाथ में मोदक व चौथे में आशीर्वाद है। इनमें खासतौर पर श्री गणेश के हाथ में मोदक प्रतीक रूप में जीवन से जुड़े संदेश देता है -

दरअसल, मोदक का अर्थ है - जो मोद (आनन्द) देता है, जिससे आनन्द प्राप्त हो, संतोष हो, इसके अर्थ में गहराई यह है कि तन का आहार हो या मन के विचार वह सात्विक और शुद्ध होना जरूरी है। तभी आप जीवन का वास्तविक आनंद पा सकते हैं।

मोदक ज्ञान का प्रतीक भी है। जैसे मोदक को थोड़ा-थोड़ा और धीरे-धीरे खाने पर उसका स्वाद और मिठास अधिक आनंद देती है और अंत में मोदक खत्म होने पर आप तृप्त हो जाते हैं, उसी तरह वैसे ही ऊपरी और बाहरी ज्ञान व्यक्ति को आनंद नही देता परंतु ज्ञान की गहराई में सुख और सफलता की मिठास छुपी होती है। इस प्रकार जो अपने कर्म के फलरूपी मोदक भगवान के हाथ में रख देता है उसे प्रभु आशीर्वाद देते हैं। यही श्री गणेश के हाथ में मोदक होने और उनके प्रिय भी होने के पीछे का संदेश है।

बुधवार के स्वामी बुध ग्रह भी है, जो बुद्धि के कारक भी माने जाते हैं। इस तरह बुद्धि प्रधानता वाले दिवस पर बुद्धि के दाता श्री गणेश की मोदक का भोग लगाकर पूजा प्रखर बुद्धि व संकल्प के साथ सुख-सफलता व शांति की राह पर आगे बढऩे की प्रेरणा व ऊर्जा से भर देती है।

4 तरीके! जिनसे मिले, बढ़े, बचे और सुरक्षित रहे भरपूर पैसा..
जीवन में सुख अनेक रूपों में मिलते हैं। जिनमें अर्थ कामना यानी भोगने लायक विषय, वस्तु या साधन की चाहत छोटे-बड़े रूप में हर इंसान करता है। दरअसल, सुख पाने के लिए चाहे वह धन ही क्यों न हो, ज्ञान, गुण व शक्ति निर्णायक होते हैं।

खासतौर पर धन तो व्यक्ति के शरीर, मन और व्यवहार में असाधारण ऊर्जा और विश्वास भर देता है। वहीं धन के अभाव से बलवान व्यक्ति का जोश, उत्साह और मानसिक बल डांवाडोल हो जाता है। यही कारण है कि सांसारिक जीवन में सुख बंटोरने की चाहत से व्यक्ति धन कमाने ही नहीं, बल्कि उसे बचाने के लिए भी भरपूर कोशिश करता है।

इंसान की धन की इसी जरूरत को ही ध्यान में रखकर विचारे करें तो क्या कोई ऐसा उपाय है? जिससे कोई भी व्यक्ति धन कमा और बचा सकता है। धन की इसी अहमियत को समझाते हुए हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में लक्ष्मी का अधिकारी बनने के लिए विचार और कर्म से जुड़े 4 अहम सूत्र बताए गए हैं। जानिए, ये चार तरीके - जिनको अपनाकर ज्ञानी हो या अल्प ज्ञानी दोनों ही धनवान बन सकते हैं।

कहा गया है कि -

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भात् सम्प्रवर्धते।

दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत्ति।।

इस श्लोक में साफ तौर पर चार सूत्र बताए गए हैं। समझिए इनका शाब्दिक व व्यावहारिक मतलब -

- पहला अच्छे कर्म  से लक्ष्मी आती है। व्यावहारिक नजरिए से परिश्रम या मेहनत और ईमानदारी से किए गए कामों से धन की आवक होती है।

- दूसरा प्रगल्भता सरल शब्दों में धन का सही प्रबंधन यानी बचत से वह लगातार बढ़ता है।

- तीसरा चतुरता यानी अगर धन का सोच-समझकर उपयोग, आय-व्यय का ध्यान रखा जाए तो अधिक धन का संतुलन बना रहता है।

- चौथा और अंतिम सूत्र संयम यानी मानसिक, शारीरिक और वैचारिक संयम रखने से धन की रक्षा होती है। सरल शब्दों में कहें तो सुख पाने और शौक पूरा करने की चाहत में धन का दुरुपयोग न करें।

किन कामों से बिना कोशिश ही मोक्ष मिल सकता है?
एक बार की बात है मुनियों ने सूतजी से शिवपुराण सुनाने की प्रार्थना की। सुतजी ने सबसे पहले तो उन्हें शिवपुराण सुनने का पुरा विधान सुनाया। सुतजी कहते हैं मुनीश्वरों मैं आप लोगों के लिए एक प्राचीन वृतांत का वर्णन करूंगा, उसे ध्यान देकर आप लोग सुनें। एक बार की बात है, पराशर मुनि के पुत्र मेरे गुरु व्यासदेवजी सरस्वती नदी के किनारे सुंदर तट पर तपस्या कर रहे थे। एक दिन वहां सूर्य के  समान तेजस्वी विमान से यात्रा करते हुए। भगवान सनतकुमार अकस्मात वहां पहुंचे। उन्होंने मेरे गुरु को वहां देखा।

वे ध्यान मग्र थे। उन्होंने गंभीर वाणी में उनसे कहा मुने तुम सत्य का चिंतन करो। जागने पर उन्होंने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारजी को अपने सामने उपस्थित देखा। उन्होंने कहा भगवान शंकर श्रवण, कीर्तन और मनन ये तीन साधन हैं। एक बार की बात मैं मन्दराचल जा पहुंचा और वहां  तपस्या करने लगा। महेश्वर शिव की आज्ञा से भगवान नन्दिकेश्वर वहां आए। उनकी मुझ पर बहुत दया थी। शिवजी मुझ से बोले- तुम श्रवादि के तीनों का साधनों का ही अनुष्ठान करो। व्यासजी से ऐसा कहकर ब्रह्माकुमार सनत्कुमार ब्रह्माधाम को चले गए।

इस प्रकार से उस वृतांत का मैंने संक्षेप में वर्णन किया। ऋषि बोले- श्रवणादि तीन साधनों को आपने मुक्ति का उपाय बताया है लेकिन जो श्रवण आदि के तीनों साधनों में असमर्थ हो, वह मनुष्य किस उपाय का आवलंबन करके मुक्त हो सकता है। किन कामों से बिना कोशिश करे ही मोक्ष मिल सकता है? सूतजी कहते हैं- शौनक जो श्रवण, मनन और कीर्तन इन तीनों साधनों के अनुष्ठान में असमर्थ हो वह भगवान शिव की लिंग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य उसकी पूजा करें तो मोक्ष हो जाता है।

ऐसे करें शिवजी की पूजा तो जल्दी बनेंगे काम
मोक्ष के लिए शिवमूर्ति की स्थापना करें या जहां पूजा करें वहां सेवा के लिए धनराशि ले जाएं और अर्पित कर दें। साथ ही निरंतर उस लिंग और मूर्ति की पूजा भी करें। उसके लिए तीर्थ, मठ, मण्डप, गोपुर, तीर्थ की स्थापना करें और उत्सव रचाएं। वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, तथा पूआ शाक आदि व्यंजनों से भोग लगाएं। छत्र, ध्वजा, व्यंजन, चामर और अंगो सहित रजोपचार की भांति सब समान भगवान शिव के लिंग और मूर्ति को चढ़ाएं। प्रदक्षिणा, नमस्कार और यथाशक्ति दान दें।

आवाहन से लेकर विसर्जन तक प्रतिदिन भक्तिभाव से पूजा सम्पन्न करें। इस तरह भगवान शंकर की पूजा करने वाला व्यक्ति श्रवण आदि साधनों का अनुष्ठान न करे तो भी भगवान शिव की प्रसन्नता से सिद्धि प्राप्त कर लेता है। शिवलिंग की ऐसे पूजा करने से भवबंधन से मुक्ति मिलती है।

सिर्फ शिवजी का ही लिंग रूप में पूजन क्यों किया जाता है?
ऋषियों ने पूछा मूर्ति में हमेशा देवताओं की पूजा की जाती है लेकिन लिंग रूप में नहीं तो भगवान शिव की पूजा लिंग रूप में ही  क्यों की जाती है?

सूतजी ने कहा- मुनीश्वरों आपका यह प्रश्र तो बहुत ही पवित्र और अद्भुत है। इस विषय में महादेवजी ही सही वक्ता हो सकते हैं। इस प्रश्र के समाधान के लिए भगवान शिव ने जो कुछ कहा है और उसे मैंने गुरुजी के मुंह से जिस प्रकार सुना है। उसी तरह क्रमश: वर्णन करूंगा। एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के कारण निराकार कहे गए हैं।

रूपवान होने के कारण उन्हें सकल भी कहा गया है। शिव के निराकार होने के कारण ही उन्हें लिंग रूप में पूजा जाता है अर्थात शिवलिंग शिव के निराकार रूप का प्रतीक है। यही कारण है कि सभी लोग उन्हें मूर्ति और लिंग दोनो रूप में पूजते हैं। शिव के अलावा जो देवी देवता हैं, वे ब्रह्म का स्वरूप नहीं माने गए हैं। इसलिए उन्हें लिंग रूप में नहीं पूजा जाता।

ध्यान रखें ये बात कभी तीर्थ स्थल पर न हो आपसे कोई पाप क्योंकि...
सुतजी बोले- विद्वान बुद्धिमान मुनियों अब मोक्षदायक शिवक्षेत्रों का वर्णन सुनो। पर्वत वन काननों सहित इस पृथ्वी का विस्तार पचास करोड़ योजन है। भगवान शिव की आज्ञा से पृथ्वी संपूर्ण जगत को धारण करके स्थित है। भगवान शिव ने भूतल पर विभिन्न स्थानों में वहां-वहां के निवासियों को कृपापूर्वक मोक्ष देने के लिए शिवक्षेत्र का निर्माण किया है। कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें देवताओं और ऋषियों ने अपना निवास स्थान बनाकर अनुगृहित किया है। इसलिए उनमें तीर्थतत्व प्रकट हो गया अन्य बहुत से तीर्थ क्षेत्र ऐसे हैं जो

लोकहित के लिए स्वयं प्रकट हुए। तीर्थ क्षेत्र में जाने पर मनुष्य को सदा स्नान, दान, जप आदि करना चाहिए। अन्यथा वह रोग दरिद्रता तथा मूकता आदि दोषों का भागी होता है। जो मनुष्य इस भारतवर्ष के भीतर मरता है। वह अपने पुण्य फल से ब्रह्मलोक में वास करता है। पुण्य क्षेत्र में कोई पापकर्म किया जाए तो वह और अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए पुण्यक्षेत्र में निवास करते समय कोई भी पाप न करें।

इन 4 बातों से बचें स्त्रियां!..तो कभी साख पर नहीं आएगी आंच
धर्मशास्त्रों की बातों पर गौर करें तो शक्ति ही हर रचना व सृजन का आधार है। धार्मिक दृष्टि से यह शक्ति जगतजननी दुर्गा के रूप में पूजनीय है तो सांसारिक दृष्टि से सृजन शक्ति प्राप्त स्त्री शक्ति स्वरूपा मानी गई है। प्रकृति रूप ईश्वर से मिला रचना का यह वरदान एक ओर स्त्री को जननी तो धर्म भावों से देवी दुर्गा के वरदायिनी रूप में पूजता है।

इस विलक्षण गुण व शक्ति से ही स्त्री संसार व घर-परिवार की धुरी भी मानी जाती है। शास्त्रों के मुताबिक किसी भी शक्ति या बल की कमजोरी हितकारी नहीं होती। खासतौर पर जब बात सृजन व संसार से जुड़ी हो। इसलिए न केवल शक्ति के मूल स्त्री का सम्मान व सुरक्षा पुरुष का कर्तव्य बताया गया है, बल्कि स्वयं स्त्री के लिए भी अपने स्वाभिमान, शील व प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कुछ बातों से दूरी बनाए रखना जरूरी बताया गया है।

गरूड पुराण के मुताबिक आचरण व व्यवहार में नीचे लिखी चार बातों से दूर रहकर स्त्री का सम्मान व शील सुरक्षित रह सकता है। ये बाते हैं -

1. दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति का संग - ऐसा करना स्त्री के लिए बड़े अपयश का कारण बनता है।

2. बहुत ज्यादा विरह या सम्मान - किसी बात पर बहुत ज्यादा शोक या दु:ख या फिर किसी ओर का अत्यधिक सम्मान भावनात्मक रूप से कमजोर बनाकर मन व व्यवहार में दोष पैदा कर सकता है, जो स्त्री की साख गिराने वाले साबित हो सकते हैं।

3. दूसरों के लिए स्नेह - परिजनों या निकट संबंधियों की किसी कारण विशेष या क्षणिक लाभ के  लिए उपेक्षा या अपमान कर दूसरों के प्रति स्नेह जताना, अपनों के विरोध, द्वेष या असहयोग से बड़े दु:खों का कारण बन सकता है।

4. दूसरों के घर में रहना - कामना, स्वार्थ या राग के वशीभूत ऐसा कर्म निश्चित रूप से स्त्री की छबि बिगाडऩे वाला होता है।

इन 4 बातों से नजरिया बदल बंटोरें भरपूर शांति व सफलता
शांति में भी सुंदरता व आकर्षण होता है। जैसे सौंदर्य में खिंचाव होता है, वैस ही शांति के संपर्क में आते ही मन को सुख व सुकून मिलता है। शांति मन की चंचलता में ठहराव लाती है। जिससे विचार और कर्म नई ऊर्जा व उमंग से भर जाते हैं। अच्छे-बुरे के बीच फर्क को समझने की विचार शक्ति, शांति से संभव है। व्यावहारिक रूप से भी शांत स्थान, वातावरण हो या सहज व संयमित इंसान का साथ मनोबल व आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला होता है।

हिन्दू धर्मगंथ श्रीमद्भगवद्गीता में भी जीवन के प्रति गलत नजरिए को बदल शांत व सहज रहकर सफलता तक का सफर तय करने के बेहतर सूत्र मिलते हैं। अगर आप भी अशांत स्वभाव व व्यवहार के कारण मिले असहयोग, दुर्भाव, उपेक्षा से बार-बार असफलता का सामना कर रहे हैं, तो यहां बताई एक अहम बातों पर गौर करें -

लिखा गया है कि -

मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।

सिद्धयसिद्धयोनिर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते।।

गीता के इस श्लोक में जीवन में सात्विक ता सरल शब्दों में कहें तो कर्म, विचार, स्वभाव में सरलता, पवित्र, सहजता और शांति को उतारने की अहमियत बताई गई है। अर्थ के मुताबिक जिस इंसान में 4 बातें हो वह सात्विक माना गया है। ये बातें ही जीवन में सफलता में निर्णायक भूमिका होती है। ये हैं -

- संगरहित कर्ता, यानी स्वयं के पुरुषार्थ, गुण व शक्तियों पर विश्वास करने वाला, अपेक्षारहित इंसान। अपेक्षा व उम्मीदें मन को कमजोर कर अशांत करती है।

- अहंकार के बोल न बोलने वाला, यानी जो विनम्र रहे व बोल-बोलकर अपनी श्रेष्ठता का बखान न करता रहे या दूसरों को कमतर समझ उपेक्षा न करे। वहीं अहंकारी स्वभाव सबल होने पर भी अशांति का कारण बनता है।

- उत्साह से भरा यानी अपने कार्य व लक्ष्य के प्रति कभी भी उदासीन न रहे। हमेशा उसको पाने की चेष्टा करता रहे। इसके विपरीत निराशा इंसान को अशांत व तनावग्रस्त रखती है।

- कार्य में सफलता पर ज्यादा हर्ष या असफलता पर शोक में न डूबने वाला यानी हर स्थिति में संतुलित, संयमित रहने वाला इंसान। वहीं सफलता का ज्यादा मद या नाकामी पर हताशा होना जीवन की गति में बड़ी बाधा बन सकता है।

अब शनि-सूर्य आमने-सामने, शनि कृपा के इन 5 कामों से चूके तो खैर नहीं!
शास्त्रों के मुताबिक न्यायाधीश शनि सूर्य पुत्र हैं, किंतु पिता से शत्रुता व दण्डाधिकारी होने से उनके स्वभाव में कठोरता भी है। वहीं सूर्य से शत्रुता के भाव होने के कारण ज्योतिष शास्त्रों में भी शनि-सूर्य की बनने वाली कोई भी ग्रह स्थिति टकराव के रूप में देखी जाकर शुभ-अशुभ प्रभाव देने वाली मानी जाती है। 13 अप्रैल से सूर्य के मेष राशि में आने व शनि के तुला राशि में पहले से ही मौजूद होने से सूर्य-शनि यानी पिता-पुत्र के आमने-सामने की स्थिति बनी है। जिसका असर अन्य ग्रहों व योग के मुताबिक अलग-अलग राशियों के लोगों पर होगा।

खासतौर पर शनि के प्रभावों के नजरिए से उन राशियों के लोगों पर, जो शनि ढैय्या, साढ़े साती या महादशा के प्रभाव में हो। शनि के स्वभाव के संबंध में लिखा भी गया है कि -

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरिस तत्क्षणात्।

यानी अगर शनि की प्रसन्न हो तो राजसी सुख देते हैं, वहीं रुष्ट होने पर सारे सुख छीन दुर्गति कर देते हैं। जाहिर है कि शनि कृपा सद्गुणी को सौभाग्य व दुर्गुणी को दुर्भाग्य के रूप में मिलती है।

यही कारण है कि शास्त्रों में भी सूर्य-शनि की बनी ग्रह स्थिति में शनि के बुरे प्रभाव से बचने के लिए शनि भक्ति व पाठ-पूजा के साथ ही दैनिक जीवन में खासतौर पर बोल, व्यवहार और कर्म में 5 अच्छी बातों को अपनाना भी जरूरी बताया गया है। धर्मशास्त्रों के नजरिए से भी ये बातें हर इंसान का जीवन सफल बनाती हैं। माना जाता है कि इन कामों से शनि बिना पूजा-सामग्रियों या उपायों से भी प्रसन्न रहते हैं।

जानिए, शनि कृपा के लिए दैनिक जीवन में धर्म पालन से जुड़ी ये खास 5 बातें -

परोपकार -  दूसरों पर दया खासतौर पर गरीब, कमजोर को अन्न, धन या वस्त्र दान या शारीरिक रोग व पीड़ा को दूर करने में सहायता शनि की अपार कृपा देने वाला होता है। क्योंकि परोपकार धर्म का अहम अंग है।

दान - अहं व विकारों से मुक्त इंसान से शनि प्रसन्न होते हैं। जिसके लिये दान का महत्व बताया गया है। दान उदार बनाकर घमण्ड को भी दूर रखता है। इसलिए यथाशक्ति शनि से जुड़ी सामग्रियों या किसी भी रूप में दान धर्म का पालन करें।

सेवा - हमेशा माता-पिता या बड़ों का सम्मान व सेवा करने वाले पर शनि की अपार कृपा होती है। क्योंकि मान्यता है कि शनिदेव जरावस्था या बुढ़ापे के स्वामी है। इसलिए इसके विपरीत वृद्ध माता-पिता या बुजुर्गों को दु:खी करने वाला शनि के कोप से बहुत पीड़ा पाता है।

सहिष्णुता - शनि का स्वरूप विकराल है। वहीं शनि को कसैले या कड़वे पदार्थ जैसे सरसों का तेल आदि भी प्रिय माना गया है। किंतु इसके पीछे भी सूत्र यही है कि कटुता चाहे वह वचन या व्यवहार की हो, से दूर रहें व दूसरों के ऐसे ही बोल व बर्ताव को द्वेषता में न बदलें यानी सहनशील बनें।

क्रोध का त्याग - शनि का स्वभाव क्रूर माना गया है, किंतु वह बुराईयों को दण्डित करने के लिए है। इसलिए शनि कृपा पाने व कोप से बचने के लिए क्रोध जैसे विकार से दूर रहना ही उचित माना गया है।

सूर्य आया मेष राशि में..जानें, इससे जुड़ी 1 फायदे की बात!
सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देव माना जाता हैं। वहीं ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक सूर्य की यात्रा बारह माह में बारह राशियों से होकर पूरी होती है। सूर्य की इस यात्रा के दो भाग होते हैं। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। सूर्य जब मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ और मिथुन से गुजरने पर उत्तरायण होता है यानी आकाश में सूर्य का झुकाव उत्तर की ओर होता है, इसी प्रकार दक्षिणायण में दक्षिण की ओर। सूर्य की उत्तर की यात्रा शुभ मानी जाती है। हिन्दू पंचांग के वैशाख माह में वह मकर, कुंभ और मीन राशि से गुजरकर मेष राशि में संक्रमण करता है।

13 अप्रैल को सूर्य ने राशि बदल कर मेष राशि में प्रवेश किया है, जो उसकी उच्च राशि भी कहलाती है। जिससे सूर्य का ऐसा राशि परिवर्तन पद, प्रतिष्ठा सम्मान भी देने वाला माना गया है। अगर जीवन के नजरिए से सोचें तो सूर्य की इसी चाल बदलने में जीवन के लिए भी बड़ी फायदे की बात जुड़ी है। जानिए, क्या है यह बात -

दरअसल, मेष राषि में सूर्य का आना हिन्दू पंचांग के मुताबिक वैशाख माह में होता है। वैशाख माह की यह खासियत है कि इस माह में सूर्य उत्तरायण की आधी यात्रा पूर्ण कर लेता है। बस, इससे ही फायदे की बात जुड़ी है। क्योंकि सूर्य का यह गति परिवर्तन मानव को सिखाता है कि जीवन में अनुशासन को अपनाने से बेहतर नतीजे मिलते हैं। जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तो इस प्रयास के दौरान संयम, अनुशासन और आत्ममंथन रूपी विश्राम आवश्यक है, ताकि हम उस कार्य के लक्ष्य को पाने के लिए ऊर्जावान बने रहें। ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य के लिए वैशाख माह ऐसा काल होता है। जिससे वह दक्षिणायण की पूरी यात्रा के लिए ऊर्जा प्राप्त करता है। इस तरह सूर्य के लिए वैशाख माह पड़ाव स्थल की भांति होता है।

विवाहित स्त्री न करें ये 2 काम!..तो काम न आएंगे रंग-रूप व गहनों की सजधज
गृहस्थ जीवन तालमेल की ऐसी कला व गुण के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें अलग-अलग स्वभाव, आदतों, रुचियों, संस्कारों, विचारों के स्त्री-पुरुष आपस में बेहतर गठजोड़ व संतुलन बनाकर जीवन के अहम लक्ष्यों को साधते हैं।

शास्त्रों के मुताबिक गृहस्थी का केन्द्र पतिव्रता स्त्री ही होती है। खासतौर पर बुद्धिमान व सुशील स्त्री घर का सौभाग्य बन जाती है यानी ऐसी स्त्री घर-परिवार के लिए शुभ व लाभ का कारण बनती है, वहीं इसके उलट आचरण दु:ख-दरिद्रता की वजह।

चूंकि गृहस्थी में पुरुष के कार्यों में स्त्री की भी अहमियत होती है। यही कारण है कि धर्म शास्त्रों में गृहस्थ जीवन की सफलता के लिये त्रिवर्ग यानी धर्म, अर्थ व काम को पाने के लिये विवाहित स्त्री के लिए ऐसे दो काम भी जरूरी बताए गए हैं, जिसके अभाव में शारीरिक सौंदर्य भी बेमानी हो जाता है। जानिए, कौन से हैं ये दो काम -

लिखा गया है कि -

तासां त्रिवर्गसंसिद्धौ प्रदिष्टं कारणद्वयम्।

भर्तुर्यदनुकूलत्वं यच्च शीलमविप्लुतम्।।

न तथा यौवनं लोके नापि रूपं न भूषणम्।

यथा प्रियानुकूलत्वं सिद्धं शश्वदनौषधम्।।

सरल शब्दों अर्थ समझें तो विवाहित स्त्री गृहस्थी में दो कामों से न चूके - पहला हर तरह से पति को खुश रखें और दूसरा हर तरह से पवित्र रहे।

पहले काम पर गौर करें तो पति की इच्छा के मुताबिक चलने से पति का भाव व प्रेम स्त्री के लिए इतना गहरा बना रहता है कि जो रंग-रूप, यौवन और गहनों से लदे शरीर को देखकर भी नहीं पैदा होता।

ऐसा कर कोई भी सौंदर्यहीन स्त्री भी पति को प्रिय हो सकती है, वहीं युवा और सुंदर होने पर भी पति के खिलाफ जाने वाले वाली स्त्री, पति से दुराव होने से दु:खी हो जाती है।

इसी तरह दूसरी बात के मुताबिक स्त्री अपने तन, विचार से लेकर चरित्र को गहना मानकर उसकी चमक व पवित्रता बनाए रखे। क्योंकि घर-परिवार, कुल की प्रतिष्ठा के लिए कुलीन स्त्री बुरी संगति, काम या मनमाने तरीके से किसी जगह पर उठना-बैठना या आना-जाना कर अनचाहे कलंक या दोष से बचे और माता, पिता के कुल के साथ ही संतान को भी विवाद व कलंक लगने से बचाए।

गीता की इन बातों से जानें कि आखिर क्या है भूत-प्रेत योनि का रहस्य?
शास्त्रों की सीख है कि अच्छे कर्म और सोच जीवन के रहते सुख-सुकून व मृत्यु के बाद दुर्गति से बचने के लिए बहुत जरूरी हैं। व्यावहारिक रूप से भी किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए सही विचार होने और उसके मुताबिक काम को अंजाम देने पर ही मनचाहे नतीजे संभव है। अन्यथा सोच और क्रिया में तालमेल का अभाव या दोष बुरे नतीजों के रूप में सामने आते हैं।

मृत्यु के संदर्भ यही बात सामने रख शास्त्रों की बात पर गौर करें तो बताया गया है कि कर्म ही नहीं विचारों में गुण-दोष के मुताबिक भी मृत्यु के बाद आत्मा अलग-अलग योनि प्राप्त करती है। जिनमें भूत-प्रेत योनि भी एक है। हालांकि विज्ञान भूत-प्रेत से जुड़े विषयों को वहम या अंधविश्वास मानता है। लेकिन यहां बताई जा रही मृत्य के बाद भूत-प्रेत बनने से जुड़ी बातें मनोविज्ञान व व्यावहारिक पैमाने पर प्रामाणिक होने के साथ ही सुखी व शांति से भरे जीवन के एक अहम सूत्र भी उजागर करती हैं। जानिए, किस कारण मृत्यु के बाद मिलती है भूत-प्रेत योनि और क्या है इनमें छिपा जीवन सूत्र?

हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता में लिखी ये बातें मृत्यु के बाद भूत-प्रेत बनने का कारण उजागर करती है -

भूतानि यान्ति भूतेज्या:

यानी भूत-प्रेतो की पूजा करने वाले भूत-प्रेत योनि को ही प्राप्त करते हैं। इस बात को एक और श्लोक अधिक स्पष्ट करता है -

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:।।

यानी मृत्यु के वक्त प्राणी मन में जिस भाव, विचार या विषय का स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वही उसी भाव या विषय के अनुसार योनि को प्राप्त हो जाता है।

भूत-प्रेत होने के अंधविश्वासों से परे इन बातों में छिपे संदेश पर गौर करें तो संकेत यही है कि अगर व्यक्ति ताउम्र बुरे काम व उसका चिंतन करता रहे, तो वह बुराई के रूप में मन में स्थान बना लेते हैं और अन्तकाल में भी वही बातें मन-मस्तिष्क में घूमती हैं। ऐसे बुरे भावों के मुताबिक वह व्यक्ति भूत-प्रेत की नीच योनि को ही प्राप्त हो जाता है।

दरअसल, भूत-प्रेत भी मलीनता या बुराई के प्रतीक भी हैं। इसलिए यहां भूत-प्रेत उपासना का अर्थ बुराई का संग भी है। इसलिए सीख यही है कि जीवन में बुरे कर्मों से दूरी बनाए रखे, ताकि जीवन रहते भी व जीवन के अंतिम समय में मन के अच्छे भावों के कारण मृत्यु के बाद भी दुर्गति से बचें।

इन 3 में से किसी 1 कारण से होती है इंसान की मौत...
मौत एक ऐसी सच्चाई जिसे कोई झूठला नहीं सकता। एक न एक दिन मौत सभी को आनी है। इस सच्चाई को जानते हुए भी हम मौत से घबराते हैं। आखिर क्या है मौत का राज़? क्यों होती किसी की मृत्यु? यह वह सवाल है जो मानव मस्तिष्क को हमेशा परेशान करते आए हैं।

अगर आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मौत का अर्थ है शरीर से प्राण अर्थात आत्मा का निकल जाना। इसके बिना शरीर सिर्फ भौतिक वस्तु रह जाता है। इसे ही मौत कहते हैं। जबकि विज्ञान की दृष्टि से मृत्यु का अर्थ कुछ अलग है। उसके अनुसार शरीर में दो तरह की तरंगे होती हैं भौतिक तरंग और मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। साधारणत: मौत तीन प्रकार से होती है- भौतिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक।

किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी में आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है। जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे में सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मौत होती है तो ऐसे समय में भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है।

मौत का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना में मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह में समा जाता है तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।

ये सुखद अहसास व जागी भावनाएं संकेत है कि हो रहा है सच्चा प्रेम!
धर्म पालन के नजरिए से प्रेम अहम अंग है यानी सुखी व सफल जीवन के लिये स्नेह, भावना, विश्वास के रूप में प्रेम की मौजूदगी जरूरी है। क्योंकि जब तक बोल, व्यवहार और आचरण में प्रेम नहीं समाता या फिर सच्चे प्रेम की जगह स्वार्थ या कामनाएं हावी हों तो रिश्तों में सुखों की आस पूरी नहीं हो सकती। फिर चाहे ये रिश्ते इंसानी हो या भक्ति के रूप में भगवान से।

इस तरह किसी भी रूप में सरलता, अच्छाई को अपनाने या अच्छे नतीजों के लिए प्रेम बड़ा ही निर्णायक होता है। आखिर सच्चे प्रेम को कैसे जाने, पहचानें और अपनाएं? शास्त्रों में लिखी कुछ बातें इस सवाल का बेहतर जवाब देती है -

नारद भक्ति सूत्र में लिखा है - अनिर्वचनीयं प्रेम स्वरूपम्।

इसका व्यावहारिक मतलब है कि प्रेम महसूस किया जा सकता है, लेकिन बोलकर बताया नहीं जा सकता। प्रेम का भाव अटूट, अदृश्य, अनुभव योग्य, इच्छाओं और अपेक्षाओं से परे होता है।

इस तरह कहा जा सकता है कि अगर प्रेम, स्वार्थ, गुणों या इच्छा के वशीभूत है, तो वह सच्चा प्रेम नहीं, बल्कि आकर्षण मात्र है। इसके विपरीत नि:स्वार्थ प्रेम तन ही नहीं मन की गहराईयों से लेकर ऊंचाईयों तक फैल ऐसी भावनाओं में बदल जाए, कि जो न अपेक्षा रखे, न कभी कम हो यानी अमिट, निस्वार्थ, द्वेषता से परे और अंतहीन हो, तो यह सच्चे प्रेम के संकेत है। ऐसा प्रेम ही सांसारिक जीवन में मन-मस्तिष्क और व्यवहार से रिश्तों में नजदीकी, सुख व आनंद बनाए रखता है।

वहीं भक्ति में ऐसे प्रेम से भक्त का मन भगवान के ही चिंतन और मनन में डूब जाता और उसे दूसरों में भी देवत्व भाव यानी भगवान के अलावा कोई नजर नहीं आता।

मां-बहन हो या पत्नी से जुड़ी यह मर्यादा न लांघे पुरुष..वरना टूट जाएगी गृहस्थी
शास्त्रों के मुताबिक हर इंसान के लिए गृहस्थ जीवन सुख, शांति और सफलता के लक्ष्यों को पाने का अहम पड़ाव है। कहा गया है कि अगर इंसान गृहस्थी जीवन की मर्यादाओं व कर्तव्यों का समर्पण व निष्ठा के साथ पालन करे तो सांसारिक जीवन गुजारते हुए भी घर में ही स्वर्ग के सुखों का आनंद पा सकता है।

दरअसल, स्वर्ग शब्द पर गौर करें तो इसमें देवत्व भाव यानी शुभ, मंगल, सुख, पवित्र भाव, विचार व कर्मों की प्रधानता मानी गई है।  इसलिए सांसारिक जीवन में भी हर सुख की चाह में हर अच्छे अनुभव या स्थान को स्वर्ग शब्द से जोड़ा जाता है। इसके पीछे मर्यादा, नियम या व्यवस्थाओं का पालन होता है।

बस, यही बात गृहस्थी पर भी लागू होती है। जिसकी धुरी स्त्री मानी जाती है। गृहस्थ जीवन के दायित्वों को पूरा करने के विलक्षण गुण, क्षमता व संकल्प शक्ति के कारण वह अर्द्धांगिनी भी पुकारी गई है यानी पुरुष के समान ही सबल मानी गई है।

यही कारण है कि गृहस्थी को स्वर्ग यानी सुख-समृद्ध बनाने के लिए घर-परिवार या समाज में खासतौर पर पुरुष के लिए स्त्री के प्रति बोल, वचन और व्यवहार से जुड़ी मर्यादा पालन की ओर संकेत किया गया है। जिसको लांघने पर व्यक्ति खुद के साथ पूरे कुटुंब को नारकीय जीवन भोगने पर विवश कर सकता है। जानिए, यह सूत्र -

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र रमन्ते देवता।

अर्थ है कि जहां नारी की पूजा यानी सम्मान होता है, वहां देव कृपा या देव वास होता है। इस बात का व्यावहारिक संकेत यही है कि अगर घर-परिवार में कोई भी स्त्री अपमानित या उपेक्षित हो तो स्वाभाविक है कि इसका बुरा असर न केवल स्त्री की मनोदशा पर बल्कि गृहस्थी की व्यवस्था, संस्कार व जीवनमूल्यों पर भी होता है।

इस वजह से घर-परिवार के वातावण में घुली अशांति व कलह दरिद्रता, रोग, संकट या शोक का कारण बनते हैं। किंतु इसके विपरीत जननी के रूप में स्त्री का आदर गृहस्थी का माहौल सुखद, व्यवस्थित तनावरहित व प्रेरणादायी बना रहता है। साथ ही पीढ़ी दर पीढ़ी अच्छे संस्कार, आचरण व गुण फलते-फूलते हैं। जिनसे मिलने वाली खुशियां, समृद्धि व शांति स्वर्ग सा आनंद ही देती है।

रोज़ ये 5 काम भी कर लें, तो सफलता व शांति के साथ गुज़रेगा जीवन
जीवन को सुख, शांति और सफलता के साये में गुजारने के लिए दो बातें बेहद अहम हैं। पहली - अच्छे नतीजों के लिए बेहतर कोशिशें और दूसरी - असफलताओं से सबक लेकर कमियों की भरपाई करना।

अक्सर अनेक लोग अपेक्षाओं के दबाव, महात्वाकांक्षा या सफलता की व्यग्रता में बार-बार कमजोरियों को अनदेखा कर असफलता से दो-चार होते हैं। सही सोच, तरीकों या कोशिशों के ऐसे अभाव से मनचाहे सुख-सफलता पाने में बाधा ही नहीं आती, बल्कि होने वाली देरी कुंठा पैदा करती है।

शास्त्रों में इंसान को दोष और बुराईयों से बचने के लिए ऐसी 5 बातें उजागर की गई हैं। जिनको हर रोज भी अपनाएं, तो कोई भी व्यक्ति पूरा जीवन सुख, शांति व सफलता के साथ गुजार सकता है। मनुस्मृति में लिखा गया है कि -

अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।

एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वण्र्येब्रवीन्मनु:।।

सरल शब्दों में समझें तो जीवन में बुरे समय और परिणामों से बचने के लिये इन पांच बातों को मन, वचन, कर्म से जोडऩा चाहिए -

हिंसा से बचें - शरीर पर ही नहीं बुरे शब्द या विचार से आघात भी हिंसा होते हैं, जो जीवन को अशांत कर बुरे नतीजे देते हैं।

सच बोलें - सत्य बोल और व्यवहार ऐसा सूत्र है, जिससे किसी भी वक्त, किसी भी जगह इंसान भरोसा, पद या सम्मान पाता है।

चोरी से बचें  - धन ही नहीं किसी के जीवन, मान-सम्मान, विचार से जुड़े विषय या वस्तुओं पर लाभ के लिए अधिकार या अपहरण भी धर्म के नजरिए से चोरी है, जो दु:खों का कारण बनती है।

स्वच्छता रखें - मन व शरीर में पवित्रता शांत, सुखी व स्वस्थ्य जीवन के लिए जरूरी है।

संयम रखें - इंद्रिय संयम सरल शब्दों में कहें तो शौक-मौज, विलासिता से भरे जीवन के आकर्षण में तन और मन को भटकाने से अंतत: जीवन रोग, दु:ख और पीड़ाओं से घिर जाता है। इसलिए मन और शरीर की इच्छाओं को काबू में रखें।

शनि पीड़ा से न होंगे दीन-हीन..अगर अमावस्या पर बोलें ये 5 शनि मंत्र
इंसानी जीवन की एक सच्चाई यह भी है कि अक्सर उसकी कमजोरी या दोष ही मुसीबत बन कर जीवन पर हावी हो जाते हैं। चाहे फिर वह अवगुण, निर्बलता, विचारहीनता के रूप में क्यों न हो। ये अभाव या दोष तन, मन या जीवन की गति में रोग या दरिद्रता बन हमेशा रुकावटें डालते हैं। व्यावहारिक रूप से इससे बचने का बेहतर रास्ता यही है कि हमेशा खुद को अच्छे कर्म और सोच से जरूर जोड़ें।

इसी नजरिए से धार्मिक मान्यताओं पर गौर करें तो शनिदेव भी बुरे कामों या दोषों का दण्ड रोग, पीड़ा या दरिद्रता के रूप में देते हैं, जो शनि दोष या अशुभ दशा के रूप में मिलते हैं। इससे बचने के लिए ही व्यावहारिक रूप से पाप कर्मों से बचने व पूजा-पाठ के उपायों में शनिवार को शनि पीड़ा शांति के लिये कुछ आसान शनि मंत्रों के जप भी असरदार माने गए हैं।

खासतौर पर शनिवार व अमावस्या के योग (21 अप्रैल) में इन मंत्रों का शनिदेव को तिल या सरसों का तेल, काले तिल, काला गंध व फूल चढ़ाकर स्मरण रोग व कष्ट निवारण की कामना से करना चाहिए। ये मंत्र हैं -

ॐ दीनार्तिहरणाय नम:

ॐ अविद्यामूलनाशनाय नम:

ॐ आयुष्कारणाय नम:

ॐ शान्ताय नम:

ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नम:

धर्म आस्था है कि ये मंत्र इंसान को निरोगी, दीर्घ व दरिद्रता से मुक्त जीवन प्रदान करते हैं।

जानिए, शनिदेव से जुड़ी ये रोचक बातें!
पौराणिक मान्यता है कि शनिदेव का जन्म अमावस्या तिथि की ही शुभ घड़ी में हुआ था। इसलिए हिन्दू पंचांग के हर माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर शनि भक्ति बड़ी संकटमोचक होती है। खासतौर पर उन लोगों के लिए जो शनि ढैय्या, साढ़े साती, महादशा या कुण्डली में बने शनि के बुरे असर दु:ख, दारिद्र, कष्ट, संताप, संकट से जूझ रहे हों।

दरअसल, शास्त्रों पर गौर करें तो शनिदेव का चरित्र मात्र क्रूर या पीड़ादायी ही नहीं, बल्कि मुकद्दर संवारने वाले देवता के रूप भी प्रकट होता है। यही नहीं शास्त्रों में बताए शनिदेव के परिवार के अन्य सदस्य भी हमारे सुख-दु:ख को नियत करते हैं। इसलिए वैशाख माह में बने शनिवार-अमावस्या यानी शनिश्चरी अमावस्या (21 अप्रैल) के शुभ अवसर पर जानिए, शनि चरित्र और उनके कुटुंब से जुड़ी कुछ रोचक बातें-

- शनि के पिता सूर्यदेव और माता छाया हैं।

- शनि के भाई-बहन यमराज, यमुना और भद्रा है। यमराज मृत्युदेव, यमुना नदी को पवित्र व पापनाशिनी और भद्रा क्रूर स्वभाव की होकर विशेष काल और अवसरों पर अशुभ फल देने वाली बताई गई है।

- शनि ने शिव को अपना गुरु बनाया और तप द्वारा शिव को प्रसन्न कर शक्तिसंपन्न बने।

- शनि का रंग कृष्ण या श्याम वर्ण सरल शब्दों में कहें तो काला माना गया है।

- शनि का जन्म क्षेत्र - सौराष्ट क्षेत्र में शिंगणापुर माना गया है।

- शनि का स्वभाव क्रूर किंतु गंभीर, तपस्वी, महात्यागी बताया गया है।

- शनिकोणस्थ, पिप्पलाश्रय, सौरि, शनैश्चर, कृष्ण, रोद्रान्तक, मंद, पिंगल, बभ्रु नामों से भी जाने जाते हैं।

- शनि के जिन ग्रहों और देवताओं से मित्रता है, उनमें श्री हनुमान, भैरव, बुध और राहु प्रमुख है।

- शनि को भू-लोक का दण्डाधिकारी व रात का स्वामी भी माना गया है।

- शनि का शुभ प्रभाव अध्यात्म, राजनीति और कानून संबंधी विषयों में दक्ष बनाता है।

- शनि की प्रसन्नता के लिए काले रंग की वस्तुएं जैसे काला कपड़ा, तिल, उड़द, लोहे का दान या चढ़ावा शुभ होता है। वहीं गुड़, खट्टे पदार्थ या तेल भी शनि को प्रसन्न करता है।

- शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। शनि को अनुकूल करने के लिये नीलम रत्न धारण करना प्रभावी माना गया है।

- शनि के बुरे प्रभाव से डायबिटिज, गुर्दा रोग, त्वचा रोग, मानसिक रोग, कैंसर और वात रोग होते हैं। जिनसे राहत का उपाय शनि की वस्तुओं का दान है।

दान न बने, तो आखा तीज पर ये काम कर कमा लें अमिट दौलत व नाम
धर्म परंपराओं में अक्षय तृतीया ऐसा पर्व है, जो ऐसे अच्छे कामों के लिए प्रेरित करता है, जो अपने साथ दूसरों की खुशियां बढ़ाने वाले हों। इनमें से ही एक कर्म है - दान। अक्षय तृतीया दान का पावन दिन माना गया है। जिसमें संदेश जुड़ा है कि हम जीवन में ऐसे अच्छे कार्य करें, जिससे हमारा चरित्र और व्यक्तित्व बेहतर व श्रेष्ठ बने और अक्षय यश प्राप्त हो। अक्षय होने के यही वास्तविक मायने हैं।

अनेक लोग इस बात की अहमियत जानते हुए भी आज के तेजी से भागते दौर में दायित्वों या व्यस्तता के चलते अक्षय तृतीया जैसी पुण्य घड़ी में दान और धर्म-कर्म से चूक जाते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए यहां कुछ ऐसे छोटे-छोटे धर्म से जुड़े व्यावहारिक उपाय बताए जा रहे हैं, जो वैसा ही पुण्य, यश, दौलत और सफलता देने वाले हैं, जो धार्मिक परंपराओं को निभाने से मिलते हैं। जानिए, अक्षत तृतीया पर अपनाने के कौन-कौन से हैं, ये आसान उपाय -

- धर्म हो या सामाजिक दर्शन माता-पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है। ईश्वर की तरह वे ही हमारे अस्तित्व के कारण हैं। इसलिए अक्षय तृतीया पर माता-पिता का आशीर्वाद जरूर प्राप्त करें। भगवत कृपा, माता-पिता का आशीर्वाद और दुआओं की ताकत कामयाबी की राह में आने वाली बड़ी से बड़ी बाधा और संकट को दूर करने वाली होती है। अगर आप किसी कारण से घर से दूर हों तो फोन या मोबाईल द्वारा संपर्क कर माता-पिता का स्नेह, आशीर्वाद और भरोसा बंटोरें।

- शास्त्र और परंपराओं में गुरु का पद सबसे ऊपर बताया गया है। इसलिए अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर गुरु पूजन के साथ गुरु दक्षिणा भी देनी चाहिए।  क्योंकि इस दिन मिलने वाला गुरु का आशीर्वाद भी अक्षय होगा।

- विवाहित महिलाओं को सुहाग सामग्री धारण कर जैसे सिंदूर, लाल धागा गले में पहनना चाहिए और काल के नियंत्रक देवता शिव के मंदिर में जाकर पति की लंबी आयु के लिए कामना करें। अविवाहित कन्याओं को भी भगवान शिव से मनोवांछित पति के लिए कामना करना चाहिए।

- अक्षय सुख-समृद्धि के लिए धन और वैभव की देवी महालक्ष्मी का पूजा अनुष्ठान करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से घर में धन-संपदा के द्वार खुल जाते हैं।

यह दिन व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक जीवन में एक नई शुरुआत करने के लिए भी श्रेष्ठ है। कुछ ऐसे कार्य भी हैं जो पुण्य देने के साथ ही जीवन को बेहतर बनाते हैं -

- गाय, भैंस आदि को हरा चारा खिलाएं।

- जरूरतमंद, कमजोर और गरीब बच्चों की शिक्षा पर धन लगाएं।

- अच्छी आदतों को अपनाएं जैसे योग, अभ्यास, अध्ययन आदि।

- व्यक्तिगत जीवन में रिश्तों और संबंधों में घुली पुरानी कटुता और विरोध को भुलाकर क्षमाभाव के साथ फिर से मिठास के साथ संबंधों की नई शुरुआत करें।

- इस दिन धन का निवेश करें। नया कारोबार शुरू करें। शुभ और मंगल कार्य करें।

- इस दिन बुरी लतों जैसे धूम्रपान, शराब पीना आदि का त्याग कर दें।

जानें किन खास वजहों से बहुत शुभ घड़ी है अक्षय तृतीया!
हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया मांगलिक कार्यों के लिए शुभ व अबूझ मुहूर्त मानी जाती है। इसे ईश्वरीय तिथि भी पुकारा जाता है। दरअसल, 'अक्षय' शब्द का मतलब है- जिसका क्षय या नाश न हो। धर्म और अध्यात्म के नजरिए से विचार करें तो ईश्वर भी अक्षय, अनादि, अनंत माने गए हैं। किंतु सभी सांसारिक जीव या पदार्थ नाशवान हैं, जिससे मन में स्वाभाविक रूप से उनकी रक्षा या बचाने की चाह आसक्ति, स्वार्थ या लोभ को जन्म देती है, जो कलह या अशांति का कारण बनते हैं।

यही कारण है कि अक्षय तृतीया के शुभ दिन ईश्वर स्मरण के साथ दान व धर्म मन में त्याग, परोपकार, प्रेम और करुणा की भावना जगाकर अक्षय शांति और सुख पाने का बेहतर रास्ता बताते हैं।

इस धर्म दर्शन के अलावा अक्षय तृतीया कुछ खास पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी वजहों के कारण बहुत ही मंगलकारी घड़ी मानी जाती है। जिनके कारण माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन किया हुआ जप, तप, दान, धर्म का पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। जानिए, ये खास वजहें -

- अक्षय तृतीया से ही त्रेतायुग का आरंभ हुआ था, जो भगवान श्रीराम की लीला के लिए स्मरण किया जाता है। यही कारण है कि यह 'युगादि तृतीया' भी कहलाती है।

- विष्णु अवतार भगवान श्री परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया को हुआ। यह परशुराम तिथि भी कहलाती है।

- इसी दिन भगवान विष्णु ह्यग्रीव रूप में अवतरित हुए।

- इसी शुभ घड़ी में भगवान विष्णु ने नर-नारायण अवतार लिया।

इन पुण्य प्रसंगों के कारण लोक परंपराओं में भी हिंदू धर्म के चार धामों में से एक  श्री बद्रीनारायण के पट इस दिन खुलते हैं।

- वृंदावन में श्री बांकेबिहारी के चरण दर्शन केवल इसी दिन होते हैं, सामान्य दिनों में भगवान पूरे वस्त्र धारण किए होते हैं।

- वैशाख विष्णु भक्ति का मास है, इसलिए इस दिन भगवान विष्णु के साथ महालक्ष्मी की उपासना अक्षय सुख़, शांति व वैभव देने वाली मानी गई है।

औंधे मुंह गिरेंगे! अगर सुख व तरक्की के लिए चुने ये 5 गलत तरीके
बुरे वक्त से बाहर निकल तरक्की की चाहत और कोशिश हर इंसान के लिए मुनासिब है, मगर आज के दौर में भौतिक सुखों की चकाचौंध से इंसान के मन पर हावी स्वार्थ बहुत कम वक्त में ज्यादा पाने की लालसा भी पैदा करता है। जिसके चलते आगे बढऩे के लिए कुछ गलत सोच व तरीकों को अपनाना भी चतुराई या बुद्धिमत्ता का पैमाना मान लिया जाता है।

वहीं, धर्म शास्त्रों के नजरिए से तरक्की के लिए क्षणभर के लिए भी अपनाया गया गलत उपाय आखिर में पतन का कारण बन सकता है। जिससे उबरने के लिए उम्र और समय भी कम पड़ सकता है। यहां जानिए ऐसे कुछ काम जिनको तरक्की, स्वार्थ या क्षणिक सुख और लाभ के लिए कभी न अपनाएं तो बेहतर है-

मित्र से धोखा - अपने फायदे के लिए दोस्त से छल-कपट करना मित्रता को शत्रुता में बदलने का कारण बनता है। साथ ही बदनामी और अपयश का कारण भी।

पाप से धर्म - धर्म के नाम पर कर्म, व्यवहार, बोल, वेशभूषा द्वारा ऊपरी दिखावा कर धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना या गुमराह कर लाभ लेना पाप माना गया है, जो आखिरकार जीवन के लिए संकट का कारण भी बन सकता है।

दूसरों को दु:खी कर धन कमाना - अपने सुखों के लिए दूसरों के  साथ छल, कपट, बेईमानी या अन्य किसी गलत तरीकों को अपनाकर धन बंटोरना, धार्मिक नजरिए से न केवल पाप है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसके घातक नतीजे विरोध और शत्रुता, कलह भरे जीवन के रूप में सामने आते हैं।

बिना मेहनत के विद्या अर्जन - कुशलता और कामयाबी के लिए संपूर्ण विद्या व ज्ञान अहम होता है, जो समर्पण, परिश्रम के बिना असंभव है। किंतु तरक्की के लिए धन या किसी अन्य अनुचित तरीकों से शिक्षा या कौशलता का प्रमाण पत्र बिना मेहनत के पाना लंबे समय के लिए मान-सम्मान और तरक्की के लिए घातक ही साबित होता है।

कठोर व्यवहार से स्त्री को वश में करना - स्त्री से रिश्ता मां, बहन, पत्नी, बेटी किसी भी रूप में हो, प्रेम और स्नेह के साथ निभाने पर ही सुख देता है। किंतु स्त्री को कमतर मानकर, बुरी मानसिकता या भोग का साधन समझ बुरे व्यवहार से अधिकार या वश में करने की कोशिश अंतत: मान-प्रतिष्ठा को धूमिल ही नहीं करती, बल्कि जीवन को दु:खों से भर सकती है।

परशुराम जयंती 24 को, जानिए कौन थे भगवान परशुराम
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के  प्रमुख अवतारों में से एक थे। भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। प्रतिवर्ष भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है। इस बार परशुराम जयंती 24 अप्रैल, मंगलवार को है। भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

प्राचीन समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा कि आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं, सभी ओर मेरा ही राज है। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इसी श्राप के फलस्वरूप भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्नि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया।

एक अन्य कथा के अनुसार जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता गाय के रूप में भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया। तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वे धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे।

जानिए, क्यों कहते हैं राम को परशुराम
परशुराम भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक थे। धर्म शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (इस बार 24 अप्रैल, मंगलवार) को इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम महर्षि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। बाल्यावस्था में इनके माता-पिता इन्हें राम कहकर पुकारते थे।

जब राम कुछ बड़े हुए तो उन्होंने पिता से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और पिता के सामने धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। महर्षि जमदग्नि ने उन्हें हिमालय पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा मानकर राम ने ऐसा ही किया। उस बीच असुरों से त्रस्त देवता शिवजी के पास पहुंचे और असुरों से मुक्ति दिलाने का निवेदन किया। तब शिवजी ने तपस्या कर रहे राम को असुरों को नाश करने के लिए कहा।

राम ने बिना किसी अस्त्र की सहायता से ही असुरों का नाश कर दिया। राम के इस पराक्रम को देखकर भगवान शिव ने उन्हें अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इन्हीं में से एक परशु (फरसा) भी था। यह अस्त्र राम को बहुत प्रिय था। इसे प्राप्त करते ही राम का नाम परशुराम हो गया। शिवजी ने परशुराम को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया। परशुराम ने इसी परशु ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहिन कर दिया था।

जानिए, अपनी माता का वध क्यों किया था परशुराम ने
परशुराम भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। उनके पिता का नाम जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था। परशुराम के चार बड़े भाई थे लेकिन गुणों में यह सबसे बढ़े-चढ़े थे। एक दिन जब सब सब पुत्र फल लेने के लिए वन चले गए तब परशुराम की माता रेणुका स्नान करने को गई, जिस समय वह स्नान करके आश्रम को लौट रही थीं, उन्होंने राजा चित्ररथ को जलविहार करते देखा। यह देखकर उनका मन विचलित हो गया।

इस अवस्था में जब उन्होंने आश्रम में प्रवेश किया तो महर्षि जमदग्नि ने यह बात जान ली। इतने में ही वहां परशुराम के बड़े भाई रुक्मवान, सुषेणु, वसु और विश्वावसु भी आ गए। महर्षि जमदग्नि ने उन सभी से बारी-बारी अपनी मां का वध करने को कहा लेकिन मोहवश किसी ने ऐसा नहीं किया। तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गई।

तभी वहां परशुराम आ गए। उन्होंने पिता के आदेश पाकर तुरंत अपनी मां का वध कर दिया। यह देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और परशुराम को वर मांगने के लिए कहा। तब परशुराम ने अपने पिता से माता रेणुका को पुनर्जीवित करने और चारों भाइयों को ठीक करने का वरदान मांगा। साथ ही इस बात का किसी को याद न रहने और अजेय होने का वरदान भी मांगा। महर्षि जमदग्नि ने उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर दीं।

हर जवां पुरुष पढ़े परशुराम की बेजोड़ शक्ति और शौर्य के ये दिलचस्प पहलू!
सफलता की पहली शर्त है - लक्ष्य या मकसद। जिसे पाने के लिए जुनून होना जरूरी है, जिसके लिए युवा काल यानी जवानी सबसे बेहतर वक्त होता है। किंतु सफलता के लिए महत्वाकांक्षा या जोश ही काफी नहीं होता, बल्कि सुनियोजित तैयारी भी जरूरी है। वरना अनुभवहीनता और अपरिपक्वता से नाकामयाबी का सामना करना पड़ सकता है।

आज अक्सर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी निश्चित और आसान सफलता का पैमाना या जरिया बल या धन को ही मान बैठती है, जबकि मकसद को पूरा करना परिश्रम, समर्पण, आत्म अनुशासन और ईमानदारी के बिना संभव नहीं है। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मन को साधना भी बेहद जरूरी है। सफलता के यही सूत्र और पुरुषार्थ की भरपूर प्रेरणा भगवान परशुराम के जीवन से भी मिलती है। इसलिए हर जवां पुरुष इन बातों पर गौर करे -

भगवान परशुराम के चरित्र पर गौर करें तो पाते हैं कि भगवान परशुराम स्वयं विष्णु के अवतार थे। इसलिए स्वयं शक्ति संपन्न भी थे। किंतु जिस उद्देश्य से उनका अवतरण हुआ था, उसको पाने के लिए उन्होंने कठिन तप और पुरुषार्थ किया। परशुराम ने तपस्या के द्वारा अनेक शक्तियां प्राप्त की। जिनमें भगवान शिव की तपस्या से प्राप्त परशु अस्त्र प्रमुख है। जिसको पाने के बाद ही उनका नाम राम से परशुराम हो गया। इस तथ्य में भी युवाओं को संदेश यही है कि ऐसे सद्कर्म और पुरुषार्थ करें कि उनसे मिले सुफल आपको प्रतिष्ठित कर दें।

भगवान परशुराम के गुरु स्वयं संहार और सृजन के देवता भगवान शिव थे। युवा परशुराम भगवान शिव की घोर तपस्या और सेवा से अनेक अस्त्र-शस्त्र पाए। जिनमें प्रमुख हैं - ब्रह्मास्त्र, आग्रेयास्त्र, वायवास्त्र और रौदास्त्र सहित 41 अन्य अस्त्र। भगवान शिव से उन्होंने तंत्र-मंत्र और धनुर्विद्या भी पाई। इन्हीं सब अस्त्र-शस्त्र और विद्याओं का प्रयोग कर उन्होंने धर्म विरोधी बन चुके अनाचारी क्षत्रियों का अंत कर पृथ्वी को अत्याचारों से मुक्त किया।

भगवान परशुराम द्वारा प्राप्त यह अलग-अलग अस्त्र और विद्या युवाओं को संदेश देते है कि आप लक्ष्य से संबंधित हर विधा में दक्षता हासिल करें। अपने मन और मस्तिष्क को खुला रखकर यथासंभव अधिक से अधिक सीखनें की कोशिश करें। अपने आप को किसी सीमा में न बांधे। लेकिन यह भी आवश्यक है कि यह सब पाने के लिए आप भी भगवान शिव की तरह सर्वश्रेष्ठ गुरु के पास जाएं। हर युवा भी परशुराम की तरह आदर्श शिष्य बनने की प्रतिबद्धता रखें। ताकि आने वाली पीढ़ी भी आपकी सफलता को देखकर भगवान परशुराम के उत्तम चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर सके।

आखिर क्यों 21 बार परशुराम ने दहलाया क्षत्रियों का कुनबा?
भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम माने जाते हैं। भगवान परशुराम के बारे में यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने तत्कालीन अत्याचारी और निरंकुश क्षत्रियों का 21 बार संहार किया। लेकिन क्या आप जानते हैं भगवान परशुराम ने आखिर 21 बार ही पृथ्वी से क्षत्रिय वंश का नाश क्यों किया? इसी का जवाब देती है एक रोचक पुराण कथा -

एक बार भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि के आश्रम में राजा कार्तवीर्य अर्जुन यानी सहस्त्रार्जुन आये। ऋषि जमदग्रि ने देवराज इन्द्र से प्राप्त कामधेनु गाय के अनूठे गुणों की मदद से सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना के लिए भोजन और विश्राम का बंदोबस्त किया।

कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु को ले जाने लगा। तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई।

सहस्त्रार्जुन को खाली लौटना पड़ा। परम तपस्वी जमदग्रि ने अपने संत चरित्र के कारण सहस्त्रार्जुन का कोई विरोध नहीं किया और तप करते रहे। किंतु इस घटना के बाद  जब पितृभक्त परशुराम का वहां आना हुआ तो उनकी माता ने सारी बात बताई। परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेशित हो गए।

पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और परशुराम का युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़ परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया।

सहस्त्रार्जुन के वध के बाद पिता के आदेश से इस वध का प्रायश्चित करने के लिए परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गए। इसी बीच मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने तपस्यारत ऋषि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर वध कर दिया। जब परशुराम तीर्थ से वापिस लौटे तो आश्रम में माता को विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 घाव देखे।

यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा भी किया। इस भू-लोक से इक्कीस बार क्षत्रियों का नाश कर उनके बहते रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र में रक्त कुण्ड बन गए। जिससे उन्होंने अपने पिता का तर्पण भी किया।

परशुराम द्वारा तत्कालीन दुष्ट और अत्याचारी क्षत्रियों का अंत कर न केवल जगत को उनके आतंक से मुक्त कराया बल्कि इसके द्वारा एक लौकिक संदेश भी दे गए कि किसी भी व्यक्ति और समाज को असत्य, अन्याय और अत्याचार का निर्भय होकर, पुरुषार्थ और पराक्रम के साथ विरोध करना चाहिए। किंतु उसका उद्देश्य साथर्क होना चाहिए।

कैसे चलाएं घर-परिवार? परशुराम की चतुराई के इस किस्से में है 1 सबसे बड़ा सूत्र!
'अक्षय' और 'चिरंजीव' इन दो शब्दों का विशेष महत्व हिन्दू पंचांग के वैशाख शुक्ल तृतीया से जुड़ा है। क्योंकि यह तिथि अक्षय तृतीया और आठ चिरंजीवियों में एक भगवान परशुराम के अवतार के लिए भी जानी जाती है। असल में अक्षय या चिरंजीवी होने का संबंध मात्र धन या तन से नहीं है, बल्कि इसका सीधा संदेश ऐसे पवित्र व्यवहार, विचार और गुणों को अपनाने से है, जिनसे धर्म, परिवार, रिश्ते व इंसान भी अजर-अमर बन जाए।

भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का दिव्य चरित्र भी ऐसे जीवन मूल्य सिखाता है। भगवान परशुराम ने जीवन में माता-पिता, परिवार, भातृ प्रेम और कर्तव्यों के प्रति सर्मपण के ऐसे ऊंचे आदर्श प्रस्तुत किए, जो आज भी व्यक्ति और समाज को अलगाव और बिखराव से बचाना सिखाता है। जानिए, उनके जीवन से जुड़े एक प्रसंग और उनमें छुपे ऐसे ही संदेशों को -

भगवान परशुराम के पिता भृगुवंशी ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका भी। ऋषि जमदग्नि बहुत तपस्वी और ओजस्वी थे। ऋषि जमदग्रि और रेणुका के पांच पुत्र रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्ववानस और परशुराम हुए। एक बार रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गई। संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, जो बहुत सुंदर और आकर्षक था। जिसे देखकर रेणुका भी आसक्त हो गई। ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया।

ऋषि जमदग्नि ने पत्नी के ऐसे आचरण से आहत होकर अपने पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किंतु परशुराम को छोड़कर किसी भी पुत्र ने मां से स्नेह के कारण वध करने से मना कर दिया। वहीं परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया।

ऋषि जमदग्रि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया। वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगे।

परशुराम ने तीन वरदान मांगे - पहला अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को सिर कटने की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा अपने चारों भाईयों की चेतना फिर से लौट आए। तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके मुताबिक उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में नहीं हारें और उनको लंबी आयु प्राप्त हो। ऋषि जमदग्नि अपने पुत्र के इन वरदानों को सुनकर गदगद हो गए और उनकी कामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया।

भगवान परशुराम के जीवन से जुड़ी यह घटना संकेत देती है कि किस तरह परिवार, रिश्तों के प्रति समर्पण रखा जाए। परशुराम द्वारा पिता के आदेश पर माता का सिर काटना, पितृभक्ति, पिता से माता का फिर से जीवन मांगना मातृभक्ति, भाईयों की चेतना फिर से वापस मांगना भातृप्रेम और स्वयं को अपराजित और चिरंजीवी होने का वरदान मांगना दूरदर्शिता और विवेकशील होने का प्रमाण है। जिसके द्वारा ही उन्होंने पिता की प्रसन्नता और आशीर्वाद पाया। ऐसी भावना ही किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए अहम होते हैं। जिनको जीवन में उतारने से कोई भी व्यक्ति समाज, परिवार और संबंधों को टूटने से बचा सकता है।

जानिए, ब्राह्मण परशुराम के महायोद्धा बनने के पीछे का रहस्य!
भगवान परशुराम का अवतरण अक्षय तृतीया की शुभ घड़ी में माना गया है। उनका जन्म भृगु वंशीय ब्राह्मण कुल में हुआ, जो सामान्यत: सात्विक गुण, आचरण, ज्ञान, तप और विद्या के ज्ञाता होते हैं। यही कारण है कि परशुराम भी ज्ञानशक्ति और तपोबल के धनी थे। किंतु उनकी एक खूबी ने ब्राह्मण कुल को नई पहचान दी। वह बेजोड़ खासियत थी कि वह क्षत्रियों की तरह बलवान, वीर और पराक्रमी होने के साथ अद्भुत अस्त्र-शस्त्रों के स्वामी व युद्ध कला में माहिर थे। जिसके द्वारा ही उन्होंने  दुष्ट क्षत्रियों का अंत किया। भगवान परशुराम के एक ब्राह्मण होकर इसी क्षत्रिय आचरण और व्यवहार का रहस्य बताती है यह पौराणिक कथा -

प्राचीन काल में कन्नौज नगर में राजा गाधि का राज था। उन्होंने अपनी रूपवती  कन्या  सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषि के साथ किया। विवाह के बाद ऋषि भृगु अपने पुत्र और पुत्रवधू सत्यवती को आशीर्वाद देने के लिए वहां पहुंचे। ससुर भृगु ऋषि के कहने पर सत्यवती ने अपनी माता के पुत्रवती होने का वर मांगा। तब भृगु ऋषि ने सत्यवती को दो चरु पात्र दिए।

भृगु ऋषि ने सत्यवती को बताया कि इन चरुओं को तब ग्रहण करना जब तुम और तुम्हारी मां ऋतु स्नान कर ले। साथ ही तुम्हारी मां पुत्र की कामना से पीपल के पेड़ को अपनी बांहों में ले। इसी प्रकार तुम भी पुत्र की कामना से गूलर के पेड़ को अपनी बांहों में पकड़ों। ऋषि भृगु के जाने के बाद सत्यवती की माँ को जब यह मालूम हुआ है सत्यवती ने अपने ससुर से श्रेष्ठ संतान होने के लिए चरु प्राप्त किया है तो उसके मन में कपट आ गया और श्रेष्ठ पुत्र की चाह में उसने अपने और सत्यवती के चरु पात्र की अदला-बदली कर दी।

जिससे सत्यवती ने अनजाने में अपनी माता के चरु को ग्रहण कर लिया। किंतु ऋषि भृगु ने अपनी ज्ञानशक्ति से सत्यवती की मां के इस बात को जान लिया। उन्होनें पुत्रवधू सत्यवती को बताया कि तुम्हारी माता के कपट के कारण तुमने अपनी मां के चरु का सेवन कर लिया है। इसलिए अब तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय जैसा व्यवहार करेगा।

इसी तरह से तुम्हारी मां का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मण का व्यवहार करेगा। किंतु सत्यवती ने अपने ससुर भृगु ऋषि से याचना कर यह अशीर्वाद पा लिया कि उसका पुत्र ब्राह्मण धर्म ही निभाएगा। किंतु पुत्र का पुत्र यानी पौत्र क्षत्रिय धर्म का पालन करेगा। यही कारण है कि सत्यवती के यहां ऋषि जमदग्रि का जन्म हुआ। ऋषि जमदग्रि की संतान भगवान परशुराम हुए। जिनका आचरण ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रियों की भांति रहा और उन्होंने दुराचारी हैहयवंशी क्षत्रियों से युद्ध कर उनका अंत कर दिया। भगवान परशुराम ने ऐसा कर न केवल ब्राह्मण धर्म की रक्षा की वरन इसमें जगत को सदा शुद्ध आचरण और वैचारिक पवित्रता को निडरता से अपनाने का भी संदेश छुपा है।

क्या आप जानते हैं अक्षय तृतीया से जुड़ी ये रोचक बातें?
वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। इस बार यह तिथि 24 अप्रैल, मंगलवार को है। यह स्वयंसिद्ध मुहूर्त है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया दान, हवन, पूजन या साधना अक्षय(संपूर्ण) होता है। हिंदू धर्म शास्त्रों में अक्षय तृतीया तिथि से जुड़े और भी कई रोचक तथ्यों का वर्णन मिलता है। यह तथ्य इस प्रकार हैं-

- भारतीय कालगणना के अनुसार वर्ष में चार स्वयंसिद्ध अभिजीत मुहूर्त होते हैं, अक्षय तृतीया (आखा तीज) भी उन्हीं में से एक है। इसके अलावा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा), दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि भी अभिजीत मुहूर्त हैं।

- धर्म ग्रंथों के अनुसार अक्षय तृतीया से ही त्रेतायुग का आरंभ भी माना जाता है।

- इस दिन से ही भगवान बद्रीनारायण के पट खुलते हैं।

- वर्ष में एक बार वृंदावन के श्री बांकेबिहारीजी के मंदिर में श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं।

- धर्म शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान नर-नारायण ने अवतार लिया था।

- भगवान विष्णु के अवतार श्रीपरशुरामजी का अवतार भी इसी दिन हुआ था।

- भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार भी इसी दिन माना जाता है।

- स्वयंसिद्ध मुहूर्त होने के कारण सबसे अधिक विवाह भी इसी दिन होते हैं।

- इस दिन शुभ एवं पवित्र कार्य करने से जीवन में सुख-शांति आती है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है।

घर में रोज इन 5 जगहों पर अनचाहे हो जाते हैं पाप! जानें, कैसे बचें?
धर्म का पालन जीवन में संयम, अनुशासन लाकर सुख, शांति लाता है। लेकिन इसके लिए धर्म परंपराओं में आस्था और विश्वास अहम है। इसी कड़ी में शास्त्रों की मानें तो हर घर में हिंसा के ऐसे पांच स्थान होते हैं। जहां अनजाने और अनचाहे भी रोज कुछ जीवों की हिंसा हो जाती है। धर्म के नजरिए से जाने-अनजाने हिंसा पाप कर्म ही है। इसलिए आप भी यहां जानिए उन खास 5 स्थानों को और बचने के 5 उपाय भी। लिखा गया है कि-

पञ्चसूना गृहस्थस्य चुल्की पेषण्युपुष्कर:।

कण्डनी चोलकुम्भश्च वध्यते वास्तु वाहयन्।।

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभि:।

पञ्च क्लृप्ता महायज्ञा: प्रत्यहं गृहमेधिनाम्।।

सरल अर्थ है कि नीचे बताए घर के इन पांच स्थानों पर हर रोज हिंसा हो जाती है। इससे बचने, प्रायश्चित या शांति के लिए पञ्च महायज्ञों को जरूर करना चाहिए। खासतौर पर द्विज यानी जनेऊधारी या ब्राह्मण को ये कर्म नहीं भूलना चाहिए। जानते हैं वह पांच स्थान और पंच महायज्ञों के नाम -

- चूल्हा यानी रसोई पकाने का साधन या स्थान।

- चक्की यानी अनाज पीसने आटा बनाने का यंत्र।

- झाडू यानी जहां-जहां सफाई की जाए।

- ओखली यानी अन्न या अन्य खाद्य सामग्री कूटने का पात्र या स्थान।

- पानी का घड़ा यानी जल पात्र या जल रखने या भरने का स्थान।

इन स्थानों पर कार्य के दौरान अन्न, जल या भूमि में रहने वाले छोटे-छोटे, सूक्ष्म जीवों की मृत्यु हो जाती है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से पाप या दोष शमन का उपाय नीचे बताए पांच महायज्ञ है-

- ब्रह्मयज्ञ

- देवयज्ञ

- भूतयज्ञ

- पितृयज्ञ

- मनुष्य यज्ञ

अगर रोज़ पढ़ लिया गीता का एक या आधा श्लोक भी..तो जानिए क्या हो जाएगा!
हिन्दू धर्म ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता में ईश्वर के विराट स्वरूप का वर्णन है। महाप्रतापी अर्जुन को इस दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के महामंत्र द्वारा अर्जुन के साथ संसार के लिए भी सफल जीवन का रहस्य उजागर किया।

भगवान का विराट स्वरूप ज्ञान शक्ति और ईश्वर की प्रकृति के कण-कण में बसे ईश्वर की महिमा ही बताता है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन, नर-नारायण के अवतार थे और महायोगी, साधक या भक्त ही इस दिव्य स्वरूप के दर्शन पा सकता है। किंतु गीता में लिखी एक बात यह भी संकेत करती है सांसाकिर जीवन में साधारण इंसान के लिए ऐसा तप करना कठिन हो तो उसे हर रोज पवित्र गीता से जुड़ा क्या उपाय करना चाहिए, जिसके शुभ प्रभाव जीवन में भलाई हो। जानिए, गीता में ही लिखी यह विशेष बात -

श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में ही देवी लक्ष्मी द्वारा भगवान विष्णु के सामने यह संदेह किया जाता है कि आपका स्वरूप मन-वाणी की पहुंच से दूर है तो गीता कैसे आपके दर्शन कराती है? तब जगत पालक श्री हरि विष्णु गीता में अपने स्वरूप को उजागर करते हैं, जिसके मुताबिक -

पहले पांच अध्याय मेरे पांच मुख, उसके बाद दस अध्याय दस भुजाएं, अगला एक अध्याय पेट और अंतिम दो अध्याय श्रीहरि के चरणकमल हैं।

इस तरह गीता के अट्ठारह अध्याय भगवान की ही ज्ञानस्वरूप मूर्ति है, जो पढ़, समझ और अपनाने से पापों का नाश कर देती है। इस संबंध में लिखा भी गया है कि कोई इंसान अगर हर रोज गीता के अध्याय या श्लोक  के एक, आधे या चौथे हिस्से का भी पाठ करता है, तो उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।

नाकामी से बचकर रहना है, तो गीता की यह बात जरूर पढ़ें!
सुख व सफलता की सोच तो बहुत आसान होती है। किंतु उनको पाने के लिए जरूरी बातें अपनाना या करना व्यावहारिक रूप से उतना सरल नहीं होता। यही कारण है कि हर धर्म इन मुश्किलों को कम करने के लिए हर अच्छाईयों को जीवन में उतारने का सरल तरीका बताता है। जिनको जानने के बाद भी अनेक बार इंसान पर स्वभाव व चरित्र के दोष इतने हावी हो जाते हैं कि वह सुखों के लिए गलत मार्ग पर भटक जाता है।

कैसे पैदा होते हैं पतन के कारण और क्या हो सकता है इसका हल? इसका बेहतर जवाब हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है। जानते हैं सुख और शांति पाने के लिए यह अहम बातें -

श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा गया है कि -

ध्यायतो विषयान् पुंस: सङ्गस्तेधूपजायते।

सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोभिजायते।

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।

स्मृतिर्भशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशत्प्रणश्यति।।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसामधिगच्छति।।

यहां पहले दो श्लोकों में पतन का कारण है तो अंतिम श्लोक में उससे बचने का हल भी है। सार रूप में समझें तो इंद्रियों से जुड़े विषयों पर सोच-विचार आसक्ति, आसक्ति से इच्छाएं, इच्छापूर्ति में बाधा क्रोध, क्रोध से सही-गलत की शक्ति, स्मरण शक्ति, स्मृति बुद्धि व ज्ञान का नाश होने से इंसान का पतन हो जाता है।

वहीं इसके विपरीत इंसान मोह, ईर्ष्या से दूर इंद्रियों पर संयम रखता है तो वह मन की पावनता व देव कृपा के द्वारा प्रसन्नता व सुखों को पाता है। उसका जीवन कलह व दु:ख से मुक्त हो जाता है और वह बुद्धि व ज्ञान से धनी हो जाता है।

अगर हर दिन करें ये 5 उपाय..तो घर में रहेगी स्वर्ग-सी सुख-शांति
हिन्दू धर्म परंपराओं में यज्ञ-हवन के पीछे त्याग और विश्व कल्याण का भाव जुड़ा है। अनेक तरह के यज्ञ से जुड़ी त्याग की भावना हर इंसान को स्वार्थ, अहं की भावना से मुक्त कर दोष और पापरहित बना देता है।

शास्त्रों में यज्ञों के अलग-अलग स्वरूपों में पांच यज्ञ ऐसे बताए गए हैं, जो घर में हुए अनचाहे-अनजाने पाप और दोष का नाश करते हैं। ये कर्म, विचार और व्यवहार को पवित्र बनाकर जीवन और गृहस्थी में अपार सुख-शांति व समृद्धि लाने वाले माने गए हैं। जिसे स्वर्ग के समान सुखा इसलिए इनको महायज्ञ भी पुकारा जाता है। धार्मिक दृष्टि से ये हर रोज दिनचर्या के दौरान ही संपन्न होते हैं।

जानें, कौन से कैसे होते हैं ये पांच महायज्ञ -
ब्रह्मयज्ञ - हर रोज वेदों का अध्ययन करने से ब्रह्मयज्ञ होता है। वेदों के अलावा पुराण, उपनिषद, महाभारत, गीता या अध्यात्म विद्याओं के पाठ से भी यह यज्ञ पूरा हो जाता है। यह न हो तो मात्र गायत्री साधना भी ब्रह्मयज्ञ संपूर्ण कर देती है। धार्मिक दृष्टि से इस यज्ञ से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। इसलिए इसे ऋषियज्ञ या स्वाध्याय यज्ञ भी  कहा जाता है।

देवयज्ञ - देवी-देवताओं की प्रसन्नता के लिए हवन करना देवयज्ञ कहलाता है।

भूतयज्ञ - कीट-पतंगों, पशु-पक्षी, कृमि या धाता-विधाता स्वरूप भूतादि देवताओं के लिए अन्य या भोजन अर्पित करना भूतयज्ञ कहलाता है।

पितृयज्ञ - मृत पितरों की संतुष्टि व तृप्ति के लिये अन्न-जल समर्पित करना पितृयज्ञ कहलाता है। जिससे पितरों की असीम कृपा से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। अमावस्या, श्राद्धपक्ष आदि इसके लिये विशेष दिन है।

मनुष्य यज्ञ - घर के दरवाजे पर आए अतिथि को अन्न, वस्त्र, धन से तृप्त करना या दिव्य पुरुषो के लिए अन्न दान आदि मनुष्य यज्ञ कहलाता है।

भगवान शिव के अवतार आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य, जिन्हें शंकर भगवद्पादाचार्य के नाम से भी जाना जाता है, वेदांत के अद्वैत मत के प्रणेता थे। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इनका जन्म वैशाख मास के शुक्ल पंचमी को हुआ था। इस बार शंकरचार्य जयंती 26 अप्रैल, गुरुवार को है। शंकराचार्य के विषय में कहा गया है-

अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्

षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्

अर्थात् आदि शंकराचार्य आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निपुण हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्य तथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्य की रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है।जिस समय हिंदू धर्म अपनी गरिमा खोता जा रहा था तथा अन्य धर्म हिंदू धर्म को नष्ट करने के लिए प्रयासरत थे उस समय आदि गुरु शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा हिंदू धर्म को उसका गौरव पुन: दिलाया। उन्होंने सनातन धर्म की प्रतिष्ठा हेतु भारत के चार क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किए तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उन पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को आसीन किया। तबसे इन चारों मठों में शंकराचार्य पद की परम्परा चली आ रही है।

चार मठ निम्नलिखित हैं-

1- उत्तरामण्य मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है।

2- पूर्वामण्य मठ या पूर्वी मठ, गोवर्धन मठ जो कि पुरी में स्थित है।

3- दक्षिणामण्य मठ या दक्षिणी मठ, शृंगेरी शारदा पीठ जो कि शृंगेरी में स्थित है।

4- पश्चिमामण्य मठ या पश्चिमी मठ, द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है।

जानिए कौन थे सूरदास
सूरदास का नाम कृष्ण भक्त कवियों में सबसे पहले लिया जाता है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। 26 अप्रैल, गुरुवार को इनकी जयंती है।

सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया।

सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं -

1 सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।

2 सूरसारावली

3 साहित्य-लहरी - जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।

4 नल-दमयन्ती

5 ब्याहलो

उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।

इन 10 बातों के बिना मुश्किल है यश और सफलता पाना व भुनाना!
जीवन में संयम भी एक ताकत है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह भौतिक रूप द्वारा नहीं बल्कि भाव रूप में इंसान को बहुत सबल बनाती है। हालांकि अनेक मौकों पर इसे कमजोरी मानने की चूक की जाती है। किंतु सिर्फ धैर्य रखने के बेहतर नतीजे होते हैं कि कोई भी इंसान यश, सफलता और सम्मान का हकदार बन सकता है।

संयम का ही शक्तिशाली स्वरूप धर्म और अध्यात्म क्षेत्र में अष्टांग मार्ग के रूप में भी जाना जाता है। जिसका पालन किसी भी इंसान, भक्त या साधक के लिए सुख, सफलता और मोक्ष सुनिश्चित कर देता है। जिसके लिये यम-नियम का महत्व बताया गया है।

जानते हैं यम-नियम से जुड़े इन 10 अनमोल सूत्रों से जुड़ी शास्त्रों में लिखी बातें -

यमा: पञ्च त्वहिंसाद्या अहिंसा प्राण्यहिंसनम्।।

सत्यं भूतहितं वाक्यमस्तेयं स्वाग्रहं परम्। अमैथुनं ब्रह्मचर्यं सर्वत्यागोपरिग्रह।।

जिसका अर्थ है कि यम के तहत इन पांच बातों का पालन जरूरी है -

अहिंसा - जीव हिंसा से बचना।

सत्य - सच खासतौर पर जीव के हित में सत्य बोलना।

अस्तेय - दूसरों की सामग्री, वस्तु की चोरी, कब्जे या अपहरण से बचना।

अपरिग्रह - सब कुछ त्याग करना।

इसी तरह यम के साथ पांच नियमों का पालन अहम है -

शौच - पवित्रता, जो अंदर और बाहर दोनों ही रूपों में जरूरी है।

संतोष - तृप्त होना। सरल शब्दों में हर स्थिति में संतुष्ट व प्रसन्नता का भाव।

इन्द्रिय निग्रह - सभी इन्द्रियों पर संयम रखना।

स्वाध्याय - मंत्र जप, धर्म-ज्ञान का अध्ययन और पालन।

प्राणिधान - देव उपासना, पूजा, अर्चना आदि।

श्रीसंप्रदाय के संस्थापक श्रीरामानुजाचार्य की जयंती 27 को
श्रीरामानुजाचार्यजी भक्ति आंदोलन के प्रथम संत थे। उनका जन्म 12 वीं शताब्दी में तिरुपति में हुआ था। श्रीसंप्रदाय की स्थापना भी श्रीरामानुजाचार्यजी ने ही की।27 अप्रैल, शुक्रवार को इनकी जयंती है।

इनके पिता का नाम केशव तथा माता का नाम कांतिमती था। ये वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। इनके गुरु यमुनाचार्य थे और उनके प्रभाव से ही इन्होंने संन्यास ग्रहण किया। श्रीरामानुजाचार्यजी विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ईश्वर शक्तिमान हैं और उसी से जगत की उत्पत्ति होती है। वह जगत का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता व विनाशकर्ता है। जगत सत्य है। आत्मा और जगत ईश्वर के विभिन्न रूप हैं। आत्मा भक्ति के द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर सकती है।

श्रीरामानुजाचार्यजी के अनुसार निम्न वर्ण के लोग भक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार ये पहले संत थे जिन्होंने शुद्रों को मोक्ष की प्राप्ति का अधिकारी माना। इनके प्रयास से ही शुद्रों को वर्ष में एक दिन मंदिरों में प्रवेश की अनुमति प्राप्त हुई। श्रीसंप्रदाय की स्थापना भी श्रीरामानुजाचार्यजी ने ही की।

जानिए, कितना भारी पड़ जाता है पराई दौलत या स्त्री पर रिझना.!
अक्सर जीवन में असफलता व दु:खों के पीछे स्वयं के बुरे काम, सोच और व्यवहार होते हैं। शास्त्र भी यही कहते हैं कि कर्म के मुताबिक ही नतीजे मिलते हैं। हालांकि व्यावहारिक रूप से अनेक अवसरों पर ऐसा लगता है कि दूसरों के द्वारा हानि पहुंचाई गई। किंतु असल में स्वयं के व्यक्तित्व, चरित्र की कोई न कोई कमजोरी से विरोधी या शत्रु नुकसान करने में सफल हो जाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में कर्म और व्यवहार ऐसे ही 3 दोष बताए गए हैं, जो न केवल मन, बुद्धि, स्वभाव और आचरण में विकृति लाते हैं, बल्कि इनसे मिले बुरे परिणाम व्यवहारिक जीवन में भी उथल-पुथल मचा सकते हैं। इसलिए सुखी जीवन की कामना है तो यहां बताए जा रहे 3 कामों से जरूर दूरी बनाए रखना चाहिए-

लिखा गया है कि -

हरणं च परस्वानां परदारभिमर्शनम्।

सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषा: क्षयावहा:।।

सरल शब्दो में अर्थ यही है कि जीवन में तीन काम या दोष निश्चित रूप से  पतन या नाश का कारण बन जाते हैं। ये हैं -

दूसरों की धन-संपत्ति हड़पना - यह कर्म में लालच, लोभ या स्वार्थ के वशीभूत होता है। धर्म के नजरिए से ये भाव बुरे और जीवन के लिये घातक होते हैं।

दूसरों की स्त्री से संबंध बनाना - संयम, संकल्प और अच्छे विचारों का अभाव इस बुरे कर्म में लिप्त करता है और भारी कलह, रोग और अपयश का कारण बनता है।

सज्जन व गुणी मित्र को छोड़ देना - अच्छी और बुरी संगति जीवन की दिशा तय करती है। ऐसे में सज्जन और गुणी मित्र, जो निस्वार्थ प्रेम, सहयोग और भावना से भरा हो, की उपेक्षा या अपमान किसी भी रूप में हानि ही करता है।

जानिए, झूठे बोल और कपट से मृत्यु के वक्त क्या होता है हश्र!
मृत्यु अटल सत्य है। इसलिए शास्त्रों में न केवल जीवन के रहते अच्छे या बुरे कर्मों को सुख और दु:ख का कारण बताया गया है, बल्कि इन सद्कर्मों व दुष्कर्मों को सुखद व दु:खद मृत्यु नियत करने वाला भी बताया गया है। जिसे दूसरे शब्दों में सद्गति व दुर्गति भी पुकारा जाता है। इसलिए हर ग्रंथ में हमेशा अच्छे गुण, विचार व आचरण को अपनाने की सीख दी गई है।

हिन्दू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में जीवन में किए अच्छे-बुरे कामों के मुताबिक मृत्यु के वक्त कैसे हालात बनते हैं? के बारे में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं बताया। जानिए, कैसे बोल या काम से मौत के वक्त क्या गति होती है-

- जो लोग सच बोलते हैं, ईश्वर में आस्था और विश्वास रखते हैं, विश्वासघाती नहीं होते, उनकी मृत्यु सुखद होती है।

- जो लोग आसक्ति का उपदेश और अविद्या या अज्ञानता फैलाते हैं, वे मृत्यु के समय बहुत ही कष्ट उठाते हैं।

- झूठ बोलने वाला, झूठी गवाही देने वाला, भरोसा तोडऩे वाला, शास्त्र व वेदों की बुराई करने वालों की दुर्गति सबसे अधिक होती है। वह बेहोशी में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही नहीं उनको लेने के लिये भयानक रूप और गंध वाले यमदूत आते हैं। जिसे देखकर जीव कांपने लगता है। तब वह माता-पिता व पुत्र को याद कर रोता है। ऐसी हालात में वह चाहकर भी मुंह से साफ नहीं बोल पाता। उसकी आंखे घूमने लगती है। मुंह का पानी सूख जाता है, सांस बढ़ जाती है और अंत में कष्ट से दु:खी होकर प्राण त्याग देता है। मृत्यु को प्राप्त होते ही उसका शरीर सभी के लिए न छूने और घृणा का पात्र बन जाता है।

इन पापों को करने वाले का अगला जन्म होता है ऐसा
जिंदगी में सभी के अपने कायदे या सिद्धांत होते हैं। हर व्यक्ति का जीवन जीने का अपना तरीका है। जो बात किसी के लिये उसका कर्तव्य और धर्म है वह किसी के लिए घोर पाप या नीच कृत्य हो सकता है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार जिन कर्मों को पाप माना गया है उसकी सजा उसे अपनी मृत्यु के बाद मिलती है। किस पाप की क्या सजा मिलती है। इसका वर्णन गरुड़ पुराण में कुछ इस प्रकार दिया हुआ है। गरुड़ जी बोले- भगवान जीवों को उनके कौन से पाप कौन सी सजा मिलती है। वे किस पाप के करने पर अगला जन्म किस रूप में लेते हैं व भी बताइए। भगवान कहते हैं गरुड़  ध्यान से सुनो-

- ब्रह्महत्या करने वाला क्षयरोगी।

- गाय की हत्या करने वाले कुबड़ा।

- कन्या की हत्या करने वाला कोढ़ी।

- स्त्री पर हाथ उठाने वाला रोगी।

- परस्त्री गमन करने वाला नपुंसक।

- गुरुपत्नी सेवन से खराब शरीर वाला।

- मांस खाने व मदिरा पीने वाले के दांत काले व अंग लाल होते हैं।

- दूसरे को न देकर अकेले मिठाई खाने वाले को गले का रोगी।

- घमंड से गुरु का अपमान करने वाले को मिरगी।

- झूठी गवाही देने वाला गूंगा।

- किताब चोरी करने वाला जन्मांध।

- झूठ बोलने वाला बहरा।

- जहर देने वाला पागल होता है।

- अन्न चोरी करने वाला चूहा।

- इत्र की चोरी करने वाले छछुंदर।

- जहर पीकर मरने वाले काले सांप।

- किसी की आज्ञा नहीं मानते वे निर्जन वन में हाथी होते हैं।

- ब्राह्मम्ण जो गायत्री जप नहीं करते वे अगले जन्म में बगुला होते हैं।

- पति को बुरा-भला कहने वाली पत्नी जूं बनती है।

- परपुरूष की कामना रखने वाली स्त्री चमगादड़ बनती है।

- मृतक के ग्यारहवे में भोजन करने वाला कुत्ता बनता है।

बात और बर्ताव में बस, इतनी-सी तब्दीली बना देगी लोकप्रिय!
पद, पैसा, ताकत और सफलता के मायने जीवन में यश और सम्मान के बिना अधूरे रह जाते हैं। दूसरे नजरिए से समझें तो कामयाबी का सिलसिला बरकरार रखना तभी संभव है, जब इंसान में हृदय को जीतने यानी लोकप्रिय बनने की भी खूबियां मौजूद हों।

धर्म के नजरिए से ऐसा सफल और लोकप्रिय बनने के लिए आपके स्वभाव और व्यवहार को साधना निर्णायक होता है। स्वभाव में बदलाव कठिन होता है, किंतु असंभव नहीं। इसलिए व्यवहारिक जीवन में यहां बताए सूत्रों के मुताबिक बात और बर्ताव में थोड़ी-सी तब्दीली भी आपकी लोकप्रियता में इजाफ़ा करने वाली साबित हो सकती हैं-

- सबसे पहली और अहम बात कि आप दूसरों की बुराई करना छोड़ दें। परनिंदा का स्वभाव धीरे-धीरे आपके ही गुणों और अच्छाईयों को लील जाता है।

- हमेशा अच्छे, गुणी और कर्मठ लोगों का संग करें। उनकी संगति आपकी ऊर्जा, उमंग और काम करने की ललक बनाए रखती है।

- दूसरों की सफलता से ईर्ष्या न कर उलटे उनकी सराहना का मौका न चूकें।

- इसी तरह अपनी सफलता का खुद बखान न करते फिरें। क्योंकि गुण और काबिलियत को कमतर दिखाने पर भी वह दब या छुप नहीं सकते।

- जब भी मौका मिले अपनों, इष्टमित्रों, पड़ौसियों, सहकर्मियों के सुख-दु:ख में जरूर शामिल होवें। इससे करुणा, प्रेम, परोपकार की भावना को बल मिलता है।

- बुराई और घमण्ड से आप स्वयं अशांत और बैचेन रहते हैं। इसलिए इनसे बचने के लिए दूसरों के बारे में कुछ कड़वा बोलने या व्यवहार करने के पहले खुद को उस स्थान पर रखकर देखें, भावनाओं व तकलीफों को समझें और विचार करें।

- झूठ, कपट और स्वार्थ से दूर होकर खुला और साफ वाणी और व्यवहार रखें। ऐसा करने पर दूसरों के मन में आपके प्रति भरोसा और विश्वास बढ़ेगा, जो आपकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता में इजाफा जरूर करेगा।

- आखिर में एक अहम सूत्र यही है कि लोकप्रियता के मायने तभी हैं जब आप गृहस्थी, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में संतुलन बनाकर चलें। अन्यथा आपकी लोकप्रिय छबि पलभर में दागदार हो सकती है। फिर आप चाहें कितने ही सफल व सक्षम क्यों न हों

ये 2 कमियां कर लें दूर!..तो न दिमाग होगा खाली, न बनेगा शैतान का घर
जीवन में हमेशा बुरा वक्त ही दु:ख, असंतोष या पीड़ा का कारण नहीं होता। बल्कि सच यह है कि इंसान की सोच ही उसके सुख-दु:ख को काफी हद तक नियत करते हैं। दरअसल, सही सोच सही दिशा और सही नतीजे तक पहुंचाने में मददगार होती है। वहीं गलत नजरिया भटकाव, अपयश, कलह व असफलता का मुंह दिखाता है। ऐसी कर्महीनता या दरिद्रता के बुरे नतीजों की ओर इशारा करता एक जुमला कहा भी जाता है कि 'खाली दिमाग शैतान का घर'

ऐसे मानसिक दोषों से बचने और अच्छे विचार, व्यवहार और कर्म की राह जानने के लिए धर्मग्रंथों की बातें श्रेष्ठ उपाय है। क्योंकि इनमें जीवन से जुड़े वही सूत्र हैं, जिनसे अनजान होने पर इंसान ठोकरें खाता है। हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में भी यशस्वी व सफल जीवन के लिये सही सोच और आदतों की अहमियत बताते हुए कुछ खास सूत्र बताए गए हैं।

ऐसे ही एक सूत्र में सुखी जीवन के लिये दो गलत सोच या आदतों को छोडऩे के संकेत दिए गए हैं। जिससे जीवन में हमेशा सुखी भी रहा जा सकता है। जानिए, क्या हैं ये सूत्र -

लिखा गया है कि -

द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बध्वा दृढां शिलाम्।

धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातस्विनम्।।

इस श्लोक के संकेत को सरल शब्दों में समझें तो नीचे बताई दो आदतें या विचार जीवन में दु:ख का सबब बन जाती हैं। यहां तक कि ऐसे दोषी मुनष्य को पत्थर बांधकर पानी में डूबो देने की बात कही गई है। जिसमें गूढ़ता यही है कि गलत सोच का इंसान निजी और दूसरों के जीवन में कलह घोलता है। ये 2 गलत सोच हैं -

धनवान होने पर भी दान न देना - धर्म पालन का अहम अंग दान माना गया है। दान स्वार्थ, अहं जैसे दोष दूर कर परोपकार, दया व प्रेम के भाव पैदा करता है। किंतु सक्षम होने पर भी ऐसा न करना विचार से लेकर व्यवहार तक दोषों को जन्म देते हैं, जो उपेक्षा, अपयश का कारण भी बनते हैं।

दरिद्रता में दु:ख न सह सके - अगर कर्महीनता या वक्त की मार से दरिद्रता या अभाव देखना पड़े तो उसे पूरी सहनशीलता और सकारात्मक सोच से स्वीकार करना चाहिए। किंतु ऐसा न करने वाले मनुष्य के जीवन में व्यर्थ अंसतोष, बेचैनी व मुश्किलें पैदा होती है। इसलिए कर्मप्रधान जीवन ही श्रेष्ठ बताया गया है।

यह 1 बात ही समझ लें..तो लक्ष्मी ही नहीं, सारे देवता बरसाएंगे मेहर!
अक्सर लक्ष्मी का संबंध मात्र धन-दौलत, संपत्ति के अर्थ में लिया जाता है। जबकि जीवन में लक्ष्मी की अहमियत अनेक रूपो में है। किंतु भौतिक सुख-सुविधाओं के इस दौर में हर इंसान धन रूपी लक्ष्मी के दर्शन व कृपा को ही पसंद करता है। चाहे फिर वह किसी भी तरीके या रूप में आए। जबकि शास्त्रों की बातों का निचोड़ समझें तो लक्ष्मी कृपा के लिए अगर एक बात ही जीवन में संकल्प के साथ अपना ली जाए तो लक्ष्मी अपने पूर्ण स्वरूप में इंसान पर मेहरबान हो जाती है। क्या है लक्ष्मी कृपा का यह अहम सूत्र? जानिए..

दरअसल, लक्ष्मी का संबंध शुद्धता, पवित्रता या शुचिता से है। पावनता का यही भाव जीवन के हर कर्म, व्यवहार और विचार में उतारने वाला ही लक्ष्मी की संपूर्ण कृपा का पात्र बन जाता है। लक्ष्मी उपासना के विशेष अवसरों पर सफाई या स्वच्छता की पीछे भी यही संदेश व भाव होता है। शास्त्र भी कहते हैं कि जहां लक्ष्मी रमती है, वहां तो सारे देवताओं की कृपा बरसती है।

असल में मन और विचारों की शुद्धता भी लक्ष्मी का रूप है। क्योंकि ऐसा होने पर ही इंसान के जीवन में तमाम सद्गुण जैसे सत्य, प्रेम, दया, संकल्प, इच्छाशक्ति, परोपकार और संस्कार प्रवेश करते हैं। जिनके द्वारा ही कोई भी व्यक्ति कर्म और सेवा से धन, ऐश्वर्य  के साथ सुख-शांति रूपी महालक्ष्मी का स्वामी बन सकता है। यहां तक कि इतना सबल बन सकता है कि नामुमकिन को भी मुमकिन करने में समर्थ हो जाता है।

लक्ष्मी की प्रसन्नता का एकमात्र यही सूत्र जन्म ही नहीं मृत्यु को भी सुधार कर शास्त्रों की इस बात को सार्थक साबित कर देता है -

असतो मा सद्गमय,

तमसो मा ज्योर्तिगमय,

मृत्योर्मा अमृतमगमय।।

यानी ईश्वर असत्य से सत्य की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर ले चले और मृत्यु से मुक्त कर अमरत्व प्रदान करे। यह सभी भाव पावनता को अपनाए बिना संभव नहीं और अगर अपना लें तो लक्ष्मी ही नहीं सारे देवताओं की कृपा संभव हो जाएगी, क्योंकि सत्य व पावनता ही ईश्वर का स्वरूप माना गया है।

जानिए, शिव के नामों से जुड़ी ये अनूठी और रोचक बातें!
माना जाता है कि भक्त जैसी भावना व कामना से ईश्वर का स्मरण करता है, ईश्वर वैसे ही स्वरूप में उसे कृपा और सिद्धि देता है। हिन्दू धर्म में ईश्वर का ऐसा ही कृपालु और विलक्षण स्वरूप भगवान शिव को माना जाता है। वह अनादि, अनंत और सर्वव्यापी माने जाते हैं। इसलिए शिव के शक्ति स्वरूपों की शास्त्रों में तरह-तरह के नामों से महिमा गाई गई है।

शिव के ये स्वरूप और नाम चमत्कारिक रूप से दैहिक, दैविक और आध्यात्मिक सिद्धि भी देने वाले माने गए हैं। शिव भक्ति के विशेष अवसरों पर इन नाम स्वरूपों का स्मरण बहुत ही मंगलकारी होता है। जानिए, इनमें से ही कुछ प्रसिद्ध नामों की भक्ति की महिमा और प्रभाव से जुड़े़ रोचक पहलू

- शिव को महादेव पुकारा जाता है और शिवलिंग आध्यात्मिक ऊर्जा का भंडार होता है। इसलिए शिवलिंग पूजा हर कमी, कमजोरी और रुकावटों का अंत कर देती है। जिससे नया विश्वास, साहस और शक्ति मिलती है।

- शिव महामृत्युंजय है। इस स्वरूप की उपासना काल, भय और रोग से मुक्त रखती है।

- भगवान शिव वैद्यनाथ के रूप में पूजनीय हैं। इसलिए इस स्वरूप की भक्ति निरोग बना देती है।

- शिव का साकार रूप शंकर है, जिसका मतलब शमन करने वाला होता है यानी भगवान शंकर का स्मरण दु:ख व संतापों का शमन कर देता है।

- शिव शम्भु कहलाते हैं। यह स्वरूप हर सांसारिक सुख का प्रदान करता है। जिनमें गृहस्थ जीवन व संतान सुख खास तौर पर पुत्र की कामना पूरी होती है।

- शिव आशुतोष यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसलिए यह भी तय है कि इस स्वरूप का स्मरण जल्दी ही इच्छा पूरी कर सदा प्रसन्न रखता है।

- शिव शर्व भी पुकारे जाते हैं यानी सभी कष्टों को हरने वाले। जिनमें बुरे कर्म और दुष्टों का नाश प्रमुख है। यही कारण है कि गई शिवभक्ति शत्रु बाधा के अंत के लिये अचूक मानी गई है।

- शिव त्रिलोकेश रूप में भी पूजनीय है। जिनकी आराधना जनम-मरण के बंधन से मुक्त करती है।

- शिव भक्तवत्सल है, इसलिए भगवान शिव की पूजा से सौभाग्यवृद्धि करती है।

- भगवान शिव कुबेर के स्वामी माने गए हैं। इसलिए शिव भक्ति धन कुबेर बना देगी।

- नीलकंठ नाम की महिमा वचनों में कटुता से बचने व धैर्य और संयम की सीख देती है।

- गंगाधर स्वरूप मन-मस्तिष्क में पावन विचारों को प्रवाहित करने की प्रेरणा है।

घर आए ऐसे लोगों को जल्द करे दें विदा! नहीं तो...
सनातन धर्म परंपराओं में घर आए अतिथि को देवता के समान माना जाता है। घर आए व्यक्ति की हर तरह से सेवा व सम्मान न केवल मानवीय धर्म के नजरिए से श्रेष्ठ व पुण्य का कार्य होता है, बल्कि इसमें व्यावहारिक रूप से भी सबक है कि जीवन में समाज से कुछ भी पाने के लिए पहले नि:स्वार्थ भाव से देने का संकल्प और इरादा लेकर चलें।

इंसानी जीवन की सार्थकता प्रेम, शांति, मेलजोल, सहायता और परोपकार के बिना कठिन है। घर आए अतिथि, इष्टजनों या कुटुंब के सदस्यों का सेवा-सत्कार भी व्यर्थ कलह व अशांति को दूर रखने का बेहतर जरिया भी है। क्योंकि तमाम मेल-मिलाप ही नहीं, मतभेद के बाद भी वे अच्छे-बुरे वक्त के वे संगी होते हैं।

वहीं इस पहलू पर धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति पर गौर करें तो संदेश है कि नि:संदेह अतिथि, राहगीर या बेसहारों की सेवा-सहायता सबसे बड़ा धर्म है। किंतु कुछ ऐसे लोग भी हैं जो घर आने पर अपने बोल, वचन और व्यवहार के दोषों से सुख-सुकून बर्बाद कर सकते हैं व जीवन को निरर्थक कलह में उलझाते हैं।

यही कारण है कि विदुर नीति में लिखी इस बात के जरिए ऐसे लोगों को घर से जल्द से जल्द विदा करने का सबक दिया गया है। जानिए, कौन-हैं ये लोग -

अकर्मशीलं च महाशनं च

लोकद्विष्टं बहुमायं नृशंसम्।

अदेशकालज्ञमनिष्टवेश-

मेतान् गृहे न प्रतिवासयेत।।

सरल शब्दों में अर्थ यही है कि क्लेश और अशांति से बचने के लिए इन लोगों को घर में कभी भी या अधिक देर तक न रुकने दें। ये लोग हैं -

- अकर्मण्य यानी आलसी या कामचोर

- बहुत खाने वाले

- सबके प्रति द्वेष या शत्रुता का भाव रखने वाले

- अधिक मायावी या कुटिलता, छल-कपट भरे मन के लोग

- देशकाल यानी वक्त और हालात की समझ न रखने वाले या उसके मुताबिक न ढलने वाले।

- निन्दित वेष रखने वाले यानी जिनका रहन-सहन, पहनावा ढंग का न हो।

जानिए, हिन्दू धर्म की वे 6 आसान परंपराएं, जिनमें हैं जीवन से जुड़े सारे फायदे..
ईश्वर और धर्म में गहरा विश्वास रखने वाला हर इंसान पाप-पुण्य पर विचार कर उसके मुताबिक अच्छे कर्मों को करने और बुरे कर्म से बचने की कोशिश करता है। जिसके लिए वह धार्मिक कर्म, धर्म ज्ञान, अध्ययन, सत्संग आदि में रुचि रखता है। शास्त्रों में ऐसे ही लोगों की पुण्य और मोक्ष पाने की भावना को सफल बनाकर पापमुक्त जीवन के लिए ही धर्म से जुड़ी 6 विशेष परंपराएं बहुत ही प्रसिद्ध हैं। जिनसे आस्था से जुडऩा न केवल मानसिक, शारीरिक, व्यावहारिक व आध्यात्मिक शांति देने वाली है बल्कि धर्म दृष्टि से मुक्तिदायक है।

जानते हैं पुराणों में बताई ये पुण्यदायी 6 बातें। लिखा है -

विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनव:।

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।।

जिसका सरल शब्दों में अर्थ है कि भगवान विष्णु, एकादशी व्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ ये 6 इस नाशवान संसार में लोगों के लिए मुक्तिदायी है। जानते हैं धर्म व व्यावहारिक नजरिए से इनका महत्व -

विष्णु - भगवान विष्णु परब्रह्म के तीन स्वरुपों में एक व जगतपालक माने गए हैं। वह सत्व गुणों, ऐश्वर्य, सुख, शांति के स्वामी भी हैं। उनकी व विष्णु अवतारों की भक्ति व पूजा धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाली मानी गई है।

एकादशी व्रत- भगवान विष्णु की भक्ति को ही समर्पित एकादशी व्रत संयम, नियम, व्रत-उपवास के द्वारा धर्म और अनुशासन से जोड़कर पुण्य तो देता ही है। साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से भी इस तिथि पर व्रत प्राकृतिक तत्वों के साथ शरीर का तालमेल बैठाकर स्वस्थ्य व दीर्घ जीवन देने वाला होता है।

तुलसी - तुलसी पौराणिक चरित्र है, जिसका पवित्रता के फलस्वरूप ही भगवान विष्णु से संबंध जुड़ा, जो तुलसी-शालिग्राम विवाह के रूप में प्रसिद्ध है। इसलिए तुलसी पूजा सुख-ऐश्वर्यदायी भी मानी गई है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से औषधीय पौधा भी है।

ब्राह्मण - ब्राह्मण को ब्रह्म या ईश्वर का ही अंश माना गया है। धार्मिक दृष्टि से ब्राह्मण ब्रह्म से जुडऩे की अहम कड़ी है। इसलिए ईश्वर का ही साक्षात् स्वरूप मानकर ब्रह्मपूजा, दान और सेवा सभी कलह और संताप का अंत करने वाली मानी गई है।

गीता - धार्मिक दृष्टि से गीता ईश्वर का ज्ञानस्वरूप है। इसलिए इसका किसी भी रूप में पाठ, स्मरण या व्यवहार में अपनाना शरीर और आत्मा के लिए सुख और मोक्षदायी ही है।

गौ - धर्म क्षेत्र में गौ यानी गाय को देव स्वरूप माना गया है। अनेक देवी-देवताओं का वास गौ में माना गया है। यही कारण है कि गौ का हर अंश दूध, दही, घी यहां तक कि मूत्र, गोमय भी देव कर्मों के लिए पवित्र और मंगलकारी माने गए हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह शरीर के लिए भी रोगनाशक है।

टटोलें, कहीं आप में भी तो नहीं यह खोट! संभलें, वरना खो देंगे सब कुछ
इंसान का अच्छा स्वभाव, व्यवहार और कर्म ही अंतत: सफल और सुखी जीवन का कारण होते हैं। किंतु यह भी सच है कि हर व्यक्ति के विचार और स्वभाव में गुण-दोष होते हैं, जो व्यवहार और कर्म को नियत करते हैं। जहां गुण मान-प्रतिष्ठा और यश देते हैं, वहीं दोष से अपयश ही नहीं मिलता, बल्कि कुछ दोष तो गुणों को भी दफन कर देते हैं।

ऐसा ही एक वैचारिक दोष है - ईर्ष्या, डाह या जलन। ईर्ष्या इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। जिससे वह अपनी ही बुरी सोच की आग में अंदर ही अंदर खुद ही जलकर बर्बाद हो सकता है। यह बुरी लत की तरह अंतत: बुरे नतीजों से पहचान, प्रतिष्ठा को नुकसान ही नहीं पहुंचाती, बल्कि अविश्वास का कारण बनती है।

यही कारण है कि  हिन्दू धर्म ग्रंथ महाभारत में ईर्ष्या या जलन को बुराई बताकर इससे यथासंभव दूर रहने की सीख दी गई है। चूंकि आज के दौर का सुख-सुविधाओं की चकाचौंध भरा जीवन हर किसी के मन को डांवाडोल कर सत्य, दया, परोपकार जैसी धर्म की राह से भटका देता है। इस नजरिए से यहां बताई जा रही बात न केवल आज के दौर के लिए सार्थक है, बल्कि सावधान करने की चेतावनी भी है। जानिए इंसान को किन-किन विषयों को लेकर ईर्ष्या का भाव मन में नहीं लाना चाहिए -

लिखा गया है कि -

य ईर्षु: परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये।

सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:।।

सरल शब्दों में अर्थ है कि किसी के सुख, सौभाग्य, पराक्रम, धन, रूप, कुलीनता और मान-सम्मान को देखकर ईर्ष्या करने का दोष लाइलाज बीमारी है।

इसमें सुखी जीवन का सूत्र यही है कि दूसरों के सुखों को देखकर अपने प्राप्त सुखों को खोते रहना भी अभाव और दरिद्रता को खुला निमंत्रण है। इसलिए ईर्ष्या के बजाय अपने कर्म, काबिलियत और विचार शक्ति पर भरोसा रख सुखों को बंटोरते रहें।

ये हैं वे 6 खूबियां! जिनसे बढ़ती जाती है पहचान और ताकत..
आज का दौर प्रतियोगिता से भरा है। जाहिर है प्रतियोगिता किसी न किसी रूप में प्रतिद्वंदिता या विरोधी भाव को भी पैदा करती है। जिसके चलते आगे बढऩे या निकलने के लिए कई अवसरों पर तमाम तरह के ऐसे हथकंडे या रास्ते भी अपनाए जाते हैं, जो नैतिक या मानवीय संबंधों के नजरिए से गलत होते हैं। इन तरीकों से कामयाबी मिलती भी है, लेकिन वह बरकरार रहेगी यह तय नहीं होता, बल्कि ऐसी सफलता मन को अशांत भी करती है।

फिर, क्या कोई ऐसा तरीका संभव है, जिनसे मिली सफलता का विरोधी भी सम्मान करे और स्वीकार करे, यही नहीं उन तरीकों से कामयाबी का सिलसिला चलता रहे और मन भी शांत और सुखी रहे?

इस जिज्ञासा का हल शास्त्रों में लिखी कुछ अनमोल बातों में मिलता है। जिनके मुताबिक कर्म ही सफलता का सबसे बड़ा सूत्र है। लेकिन ताकत, पहचान व सफलता पाने और उसको कायम रखने के लिए कर्म के साथ 6 गुण ऐसे बेहतर जरिया है, जो किसी भी बुरे हालात से उबार कर सफल बना देते हैं। डालिए ऐसे ही छ: गुणों पर एक नजर और जानिए, उनका व्यावहारिक पहलू -

1. उद्योग - मेहनत यानी परिश्रम का भाव जिसके साथ इच्छा शक्ति व संकल्प शक्ति शामिल होती है, जो लक्ष्य तक सफलतापूर्वक पहुंचाती है।

2. साहस - निडर, निर्भय होकर कर्म करते हुए लक्ष्य को पाने का जज्बा। जिससे नकारात्मक बातों की कोई जगह नहीं होती।

3. धैर्य - मकसद के मुताबिक नतीजे न मिलने, असफलता या हालात विपरीत होने पर भी मानसिक, शारीरिक और व्यावहारिक रूप से लक्ष्य से न भटकना और शांत रहकर सफलता को सुनिश्चत करने के प्रयास जारी रखना।

4.बुद्धि - बुद्धि बल कामयाबी का अहम अंग है। जिससे तमाम दुविधाओं, असुविधाओं, परेशानियों और समस्याओं का हल आसान होता है। यहीं नहीं अधिक सक्षम और सबल प्रतियोगी भी पस्त हो सकता है।

5. शक्ति - लक्ष्य भेद और सफलता के लिए बेहद जरूरी है ताकतवर होना। यह शक्ति मानसिक, शारीरिक और ज्ञान के रूप में होती है। भावनात्मक, आध्यात्मिक शक्ति  भी निर्णायक होती है।

6. पराक्रम - जुझारूपन या मारक यानी लड़ाकू क्षमता। जिसके पीछे भाव यही होता है कि कामयाबी पाना है तो किसी भी स्थिति में हार नहीं मानने का संकल्प और दृढ़ता बनाए रखी जाए।

शक्ति व सफलता की चाहत रखने वाले हर इंसान में कर्म के साथ ये छ: गुण जरूर होना चाहिए। ये कामयाबी के साथ अपार यश और सम्मान भी लाते हैं।

मरने के बाद ही नहीं पापियों को जन्म से पहले भी दी जाती है ऐसी सजा
कहा जाता है मरने के बाद पापियों को यमदूतों के द्वारा अनेक तरह से कष्ट दिए जाते हैं। लेकिन अगर गरुड़ पुराण की माने तो मरने के बाद पापियों को सिर्फ नरक में ही कष्ट देकर क्षमा नहीं किया जाता बल्कि उसके बाद भी उन्हें जन्म लेने से पहले मां के गर्भ में अनेक तरह की परेशानियां झेलनी होती हैं। वे जब किसी गर्भ में भी पहुंचती हैं तब भी उन्हें बहुत तरह के दुख झेलने पड़ते हैं। आइए जानते हैं कि किस तरह के दुख मरने के बाद पापी आत्माओं को मां के गर्भ में झेलने पड़ते हैं।

स्त्री के ऋतु मध्य में पापी पुरुष के शरीर की उत्पति होती है, विश्वरूप को मारने में इंद्र को हत्या लगी, उसका इंद्र ने चार विभाग कर पृथ्वी, जल, वृक्ष, और स्त्रियों को क्रम से दे दिया। स्त्रियों में ऋ तु आने से पुत्रादि की उत्पति होती है। इस कारण तीन दिन स्त्रियां अपवित्र रहती है। ऋतुकाल में प्रथम दिन स्त्री चांडाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के तुल्य, तृतीय दिन धोबिन होती है। कर्मों से शरीर धारण करने के लिए पुरुष के वीर्य से स्त्री के उदर में जीव प्रवेश करता है।

एक महीने में मस्तक, दूसरे महीने में भुजा आदि अंग की रचना होती है, तीसरे महीने में नख, रोम, हड्डी, चर्म, लिंग, दसद्वार के छिद्र, चौथे महीने में त्वचा, मांस, रक्त, पांचवें महीने में क्षुधा, तुषा उत्पन्न होती है। छटे महीने गर्भ की झिल्ली में ढककर कुक्षि में गर्भ भ्रमण करने लग जाता है। माता के भक्षण किए हुए दुषित अन्न से बढ़ता हुआ। पापी जीव गर्भ में विष्ठा, मूत्र आदि ग्रहण कर लेता है। वो जब उदर में शयन करता है। तब कृमि जीव के काटने से सब अंग कष्ट पाते हैं, वह बारम्बार मुर्छित भी होता है।

ये महापाप न करें वर्ना पिटते हुए जाएंगे यमलोक....
मान्यता है कि मृत्यु के बाद इंसान को अपने किए कर्मों का फल मिलता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जो लोग शुभ काम नहीं करते और हमेशा अशुभ काम ही करते हैं वह नरक में जाते है।
धर्मराजपुर (यमलोक) का गरुड़ पुराण में विस्तार से वर्णन मिलता है।

धर्मराजपुर के चार दरवाजे हैं। पूर्व,पश्चिम व उत्तर दिशा के दरवाजे धर्मात्माओं के लिए होते हैं जबकि दक्षिण दिशा का दरवाजा पापी लोगों के लिए होता है। ब्राह्मण हत्या करने वाले, मदिरा पीने वाले, गोहत्या करने वाले, बच्चों को सजा देने वाले, स्त्री को प्रताड़ित करने वाले, विश्वासघाती, स्त्रियों को विश्वास में लेकर उनसे धन छिनने वाले, खाने में किसी को जहर देने वाले, किसी को मारने वाले, नीचपुरुष से स्नेह रखने वाले, सुखी को दुखी बनाने वाले, कड़वा बोलने वाले, मन में बुरी बात रखने वाले।

हित की बात भी न सुनने वाले, उधार लेकर वापस न देने वाले, बच्चों का धन छिनने वाले शास्त्रों की आज्ञा न मानने वाले, अभिमानी, मूर्ख व्यक्ति जो खुद को ज्ञानी माने ये सभी लोग पाप के भागी माने जाते हैं। ये पाप जो लोग करते हैं, उन्हें दिन-रात सजा देते हुए और मारते हुए यमलोक तक ले जाया जाता है।

उग्र नृसिंह ने सिखाया कैसे बुरों से दबे नहीं, दबोच दें!
व्यक्ति या व्यवस्था में पैदा हुई दु:खदायी बुराईयों और दोषों का अंत करने के लिए निर्भय होकर ऐसी असाधारण कोशिशों और विचारों की जरूरत होती हैं, जो पवित्र और परोपकार की भावना से भरे हों। जिनको सही वक्त और मौके को चुनने और भुनाने से सफल व संभव बनाया जा सकता है। किंतु इस दौरान पैदा संघर्ष और कठिनाईयों से जूझने का मजबूत जज्बा भी सफलता के लिए सबसे अहम होता है।

ऐसे ही जीवन सूत्रों से भरा है भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का प्रसंग। जिसका शुभ काल वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (4 मई) को माना जाता है। पढ़ें और भगवान नृसिंह की उग्रता से सीख लें कि कैसे बुराई पर चढ़ाई कर जीवन में सुखद बदलाव लाएं -

जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर राक्षस हिरण्याक्ष का संहार किया, तो उसका भाई हिरण्यकशिपु उनका शत्रु बन गया। उसने घोर तप से ब्रह्मदेव से अमर होने का यह वरदान पाया कि वह न दिन में, न रात में, न मनुष्य से, न पशु से, न शस्त्र से न अस्त्र से, न घर में न बाहर, न जमीन पर न आसमान में और न भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु को प्राप्त होगा।

अमरत्व के वरदान से अहंकार में चूर हिरण्यकशिपु ने इंद्र समेत सभी देवताओं पर हमला बोला। पूरी प्रजा को मात्र उसकी भक्ति और पूजा करने के लिए सताया। किंतु स्वयं हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद ही भगवान विष्णु का परम भक्त था।

हिरण्यकशिपु ने उसको भी विष्णु भक्ति से रोकने के लिए अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जलाने, हाथी के पैर से कुचलने, पहाड़ से फेंककर मारने, तेल के कड़ाव में बैठाने जैसे यातनाएं दी। किंतु विष्णु भक्ति पर अडिग प्रहलाद विष्णु कृपा से बचा गया।

विष्णु भक्ति का ऐसा असर देख हिरण्युकशिपु ने आपा खो दिया। तब अंत में जब उसने प्रहलाद को एक गर्म लोहे के खंबे पर बांधने का आदेश दिया। तब भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद के प्राणों की रक्षा, भक्ति का मान रखने और हिरण्यकशिपु की यातना से जगत को छुटकारा देने के लिए वही खंबा फाड़कर आधे नर व आधे सिंह के उग्र रूप नृसिंह अवतार में प्रकट हो दुष्ट हिरण्यकशिपु का पेट अपने नाखूनों से चीरकर उसका अंत कर दिया।

हिरण्यकशिपु के वध के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार के लिए ऐसा समय, रूप और तरीका चुना, जो हिरण्युकशिपु के वरदान की सारी बातों की काट करता हो। भगवान नृसिंह अवतार, जो आधा मानव और आधा सिंह का रूप था, लेकर गोधुलि बेला में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकशिपु को दरवाजे की दहलीज पर बैठकर उसे अपनी जंघा पर रखा और अपने नाखूनों से चीर संहार किया।

इस प्रकार जब हिरण्यकशिपु का अंत हुआ तब वह घर में था, न घर के बाहर, न जमीन पर था, न आसमान पर, वह न अस्त्र से मरा न शस्त्र से, न दिन में मरा, न रात में। इन सबसें रोचक एक ओर बात है कि भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु के लिए उस काल को चुना जो बारह मासों से अलग था, वह था भगवान विष्णु का प्रिय मास पुरुषोत्तम मास, जो हिरण्युकशिप जैसे दुष्ट के विचारों से भी बाहर था।

नृसिंह जयंती, करें भगवान नृसिंह का पूजन
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस बार यह पर्व 4 मई, शुक्रवार को है।

इसलिए लिया था भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार

भगवान विष्णु ने अधर्म के नाश के लिए कई अवतार लिए तथा धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु ने दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए ही नृसिंह अवतार लिया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था।

उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया।

हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखुनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

इस विधि से करें भगवान नृसिंह का पूजन, हर मनोकामना पूरी होगी
4 मई, शुक्रवार को भगवान नृसिंह की जयंती है। इस दिन भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया था। इस दिन भगवान नृसिंह के निमित्त व्रत किया जाता है। व्रत विधि इस प्रकार है-

नृसिंह जयंती के दिन सुबह जल्दी नित्य कर्मों से निवृत्त होकर व्रत के लिए संकल्प करें।  इसके बाद दोपहर में नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर संध्या तर्पण करें। अब पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर उसमें अष्टदल कमल बनाएं। कमल के ऊपर पंचरत्न सहित तांबे का कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी शक्ति के अनुसार सोने की लक्ष्मीसहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें।

इसके बाद दोनों मुर्तियों को पंचामृत से स्नान करवाएं। योग्य विद्वान ब्राह्मण (आचार्य) को बुलाकर उनसे भगवान की पूजा करवाएं। फिर उस ब्राह्मण के हाथों फूल व षोडशोपचार सामग्रियों से विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं। भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूप-दीप दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती उतारें और नीचे लिखे मंत्र के साथ भोग लगाएं-

नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।

ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।।

(पद्मपुराण, उत्तरखंड 170/62)

अब भगवान नृसिंह से सुख की कामना करें। रात में जागरण करें तथा भगवान नृसिंह की कथा सुनें।

दूसरे दिन यानी पूर्णिमा के दिन स्नान करने के बाद फिर से भगवान नृसिंह की पूजा करें। ब्राह्मणों को दान दें उन्हें भोजन करवाएं व दक्षिणा भी दें। इसके बाद पुन: भगवान नृसिंह से मोक्ष की प्रार्थना करें। अंत में आचार्य (पूजन करने वाला ब्राह्मण) को दक्षिणा से संतुष्ट करके विदा करें तत्पश्चात स्वयं भोजन करें।

धर्म ग्रंथों के अनुसार जो इस प्रकार नृसिंह चतुर्दशी के पर्व पर भगवान नृसिंह की पूजा करता है उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है। उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

ध्यान रखें! बुरे कामों के आखिर भुगतेंगे ये 4 बुरे नतीजे भी..
इंसान अपने हित, सुख या स्वार्थ के पीछे पाप और पुण्य को भी अपने हिसाब से परिभाषित करने लगता है। ऐसाकर वह बुरे कर्मों को जानते-समझते हुए भी कुतर्कों के जरिए सही ठहराकर कुछ वक्त के लिए लाभ या सुख तो पा लेता है, फिर चाहे उसकी वजह से कोई और कितनी ही तकलीफों से क्यों न गुजरे? जबकि धर्म के नजरिए से पाप किसी भी रूप में हो वह आखिरकार व्यक्तिगत हानि का कारण बनता है।

धर्मशास्त्रों में पाप से पैदा हुए ऐसे ही 4 दोषों को बताया गया है, जो इंसान के लिए घातक ही साबित होते हैं। इनके पीछे गलत बोल, सोच या बर्ताव ही होते हैं। डालिए एक नजर उन चार वजहों पर -

1.रोग - बुरी सोच और काम मन के साथ शरीर पर भी निश्चित रूप से बुरा असर डालते हैं। जिससे बिगड़ा संयम और अनुशासन रोगों के रूप में सामने आता है, जो स्वयं के साथ परिवार के लिए भी दु:खदायी होता है।

2.शोक - शास्त्रों के मुताबिक जानकर ही नहीं अनजाने में किसी का अहित, बुराई या नुकसान भी पाप है, जो हर इंसान को अंदर से पीड़ा देता है। यहीं नहीं, दूसरों की हानि से पैदा बदले की भावना या पलटवार से प्राण, परिजन, धन या प्रिय वस्तु को खोना भी भारी शोक का कारण बन सकता है, जो शरीर, स्वभाव, चरित्र और व्यक्तित्व के लिए बुरा ही होता है।

3.संकट - स्वयं के हित के लिए दूसरों की भलाई को नजरअंदाज करने की लत हर वक्त संकट रूपी तलवार बनकर जीवन पर लटकी रहती है। जिसके बुरे नतीजों से परिजन ही नहीं समाज को भी गुजरना पड़ सकता है।

4.पतन या असफलता - पाप व बुरे कामों के कारण रोग, शोक और संकट से गुजरने या भुगतने के बाद अहंकारवश बुरे काम या सोच को अपनी ताकत मानकर भी अगर कोई इंसान पाप के रास्ते पर ही चलता रहे तो उसका अंत या पतन बहुत ही करीब होता है। धर्मग्रंथों के मुताबिक हिरण्यकशिपु से लेकर रावण या कंस तक ऐसी ही हालात से गुजरकर काल की गर्त में गिरे।

जानिए, स्वस्तिक बनाने से कैसे और क्यों होते हैं शुभ प्रभाव?
हिन्दू धर्म परंपराओं में हर मांगलिक, धार्मिक या नए काम की शुरुआत स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर की जाती है। स्वस्तिक शुभ व मंगल का प्रतीक माना जाता है। धर्मशास्त्रों में स्वस्तिक चिन्ह बनाने और शुभ होने  के पीछे खास कारण बताए गए हैं। जानिए, ये खास बातें -

दरअसल, शास्त्रों में स्वस्तिक विघ्रहर्ता व मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश का साकार रूप माना गया है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा 'गं' बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश की शक्ति व स्थान माना जाता है। इसमें, जो चार बिन्दियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है।

विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में भी स्वस्तिक के श्री गणेश का स्वरूप होने की पुष्टि होती है। हिन्दू धर्म की पूजा-उपासना में बोले जाने वाले वेदों के शांति पाठ मंत्र में भी भगवान श्री गणेश का स्वस्तिक रूप में स्मरण किया गया है। यह शांति पाठ है -

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:

स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु

इस मंत्र में चार बार आए 'स्वस्ति' शब्द चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ही ध्यान और आवाहन है।

असल में, स्वस्तिक बनाने के पीछे व्यावहारिक दर्शन यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम, प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सद्भाव, सौंदर्य, विश्वास, शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं श्री गणेश का वास होता है और उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है। चूंकि श्री गणेश विघ्रहर्ता हैं, इसलिए ऐसी मंगल कामनाओं की सिद्धि में विघ्रों को दूर करने के लिए स्वस्तिक रूप में गणेश स्थापना की जाती है। इसलिए श्री गणेश को मंगलमूर्ति भी पुकारा जाता है।

बुद्ध जयंती , बुद्ध के उपदेशों को जीवन में उतारें
वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन बुद्ध जयंती का पर्व भी मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 6 मई, रविवार को है। बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भगवान विष्णु के ही अवतार थे ऐसी मान्यता है, परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।

उनके स्वरूप को लेकर भी हिन्दू तथा बौद्ध मतों में कुछ भिन्नता व कटुता है। बौद्ध मत के अनुसार महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल की तराई में लुम्बिनी में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। अपने शुरुआती दिनों में रोगी, बूढ़ा और मृत शरीर को देखकर उन्हें वितृष्णा हुई। राजपरिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने जीवन की सारी सुविधाओं का त्याग कर सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हेतु बोधगया में कठोर तप किया और बुद्ध कहलाए।

उनके समकालीन शक्तिशाली मगध साम्राज्य के शासक बिम्बिसार तथा अजातशत्रु ने बुद्ध के संघ का अनुसरण किया। बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, जापान, तिब्बत तथा चीन तक फैलाया। ज्ञान प्राप्ति पश्चात भगवान बुद्ध ने राजगीर, वैशाली, लौरिया तथा सारनाथ में अपना जीवन बिताया। उन्होने सारनाथ में अंतिम उपदेश देकर अपना शरीर त्याग दिया। आज बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।

कूर्म जयंती, जानिए भगवान विष्णु ने क्यों लिया था कूर्म अवतार
वैशाख मास की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लिया था तथा समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इस बार कूर्म जयंती 6 मई, रविवार को है।

इसलिए हुआ कूर्म अवतार
एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इंद्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इंद्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके।

तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डुबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन का संपन्न हुआ।

नारद जयंती , भगवान विष्णु के ही अवतार हैं देवर्षि
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार ज्येष्ठ मास के प्रथम दिन देवर्षि नारद का पूजन किया जाता है। इस दिन नारद जयंती भी मनाई जाती है। इस बार नारद जयंती 7 मई, सोमवार को है।

शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है। ग्रंथों में देवर्षि नारद को भगवान विष्णु का अवतार भी बताया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं।

महाभारत के सभापर्व के पांचवें अध्याय में नारदजी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है- देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानों की शंकाओं का समाधान करने वाले और सर्वत्र गति वाले हैं। अठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण; बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है।

बड़े पद पर बैठे हों या काबिज होना चाहें, तो याद रखें यह अहम बात..
आज सुख के लिए ताने-बाने बुनता आदमी कई मौकों पर अनचाहे भी ऊंचे पद, हितपूर्ति या धन बंटोरने की ऐसी दौड़ में शामिल हो जाता है, जिसमें धर्म, ईमान और नैतिकता की कोई जगह नहीं होती। अपनी कमजोरी या लालसा से आगे निकलने की ऐसी होड़ में शामिल व्यक्ति जब बुरे नतीजों के जाल में उलझता है, तब उसे अशांत हुए जीवन में पछतावे के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता।

हिन्दू धर्म शास्त्र में बताई गई राजधर्म की एक सीख ऊंचे पद पर बैठे या चाह रखने वाले लोगों को ऐसी ही हालात से बचाने में कारगर साबित हो सकती है। क्या है यह खास सीख? जानिए -

शास्त्रों के मुताबिक अगर राजा यश, स्वर्ग और धन की चाहत रखता है तो उसे बुद्धिमान, कुशल, योग्य, समर्पित और काम की गहराई को समझने वाले व्यक्तियों को ही राज्य के कामों और व्यवस्था बनाने में नियुक्त करना चाहिए। अगर राजा  गुणों और ज्ञान को अनदेखा कर विद्वान और अयोग्य व्यक्तियों में अन्तर न समझ कर कांच को मणि और मणि को कांच समझने जैसी सोच रखता है, तो ऐसे राजा की सेवा करने, मदद करने या उसके प्रति निष्ठा रखने वाले दूर हो जाते हैं।

व्यावहारिक रूप से यह बात परिवार, कार्यक्षेत्र या शासन व्यवस्था के लिए भी सार्थक है। तीनों ही व्यवस्थाओं में योग्य, कुशल, गुणवान, निष्ठावान व्यक्तियों को जिम्मेदारियां सौंपने से बेहतर, सटीक और त्वरित नतीजों को पाना आसान हो जाता है। यहीं नहीं परिवार, कार्यालय या सत्ता से जुड़े व्यक्तियों के लिए यह स्थिति प्रेरणादायक और उत्साह बढ़ाने वाली होती है।

इस तरह राजधर्म से जुड़ा यह राज जानना, समझना और अपनाना अंत में सम्मान, सुख के साथ आर्थिक खुशहाली देता है।

इन 9 बातों से साधें जीवन, तो खूब कमाएंगे मान-सम्मान
जब इंसान कटु वाणी, अच्छे कर्म और व्यवहार करते हुए कई अवसरों पर अपयश या निंदा का पात्र बनता है, तो ऐसी स्थिति कहीं न कहीं मनोबल पर बुरा असर ही नहीं डालती, बल्कि अनेक अवसरों पर इंसान को यह सोचने पर मजबूत करती है कि क्या सही है और क्या गलत है?

ऐसी मानसिक दशा उसे भलाई और अच्छाई से भी दूरी ले जा सकती है, जो कि धर्मशास्त्रों की दृष्टि से ठीक नहीं है। शास्त्रों के मुताबिक ऐसी स्थिति के लिए इंसान की छोटी-सी भूल भी कारण होती है। वह है - सही समय की समझ। अगर शब्द, व्यवहार और कर्म की लिये सही समय और विचार में तालमेल न बैठे तो अच्छी बातें या काम भी बेकार हो जाते हैं।

समय, सोच व कर्म में सही तालमेल बनाने के लिये ही हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में 9 खास बातों का जिक्र किया गया है। जिसको अगर व्यावहारिक जीवन में अपना लें तो मुश्किलों से दो-चार न होकर सुखी, शांत व समृद्ध जीवन बिताना आसान हो जाता है। जानते हैं क्या है ये बातें?

लिखा गया है कि -

न संरम्भेणारभते त्रिवर्गमाकारित: शंसति तत्वमेव।

न मित्रार्थे रोचयते विवादं नापूतित: कुप्यति चाप्यमूढ:।।

न योभ्यसूयत्यनुकम्पते च न दुर्बल: प्रातिभाव्यं करोति।

नात्याह किंचित्क्षमते विवादं सर्वत्र ताद्दग् लभते प्रशंसाम्।।

इन श्लोकों में सीख दी गई है कि नीचे लिखी 9 बातों को अपनाने वाला इंसान हर जगह मान-सम्मान व प्रशंसा का पात्र बन जाता है -

- जो आवेश या जल्दबाजी के साथ धर्म, अर्थ या कर्म की शुरुआत न करे।

- पूछने पर व्यावहारिक व सत्य यानी यथार्थ बात ही बताए।

- मित्र की भलाई के लिये झगड़ा पसंद न करे।

- मान-सम्मान न मिले तो क्रोधित या कुंठित न हो।

- हमेशा सही और गलत की पहचान यानी विवेक कायम रखे।

- दूसरों में दुर्गण, दोष या कमी न देखे।

- दयालु हो।

- कमजोर होने पर किसी की जमानत न दे। सरल शब्दों में समझें तो अभाव में दूसरों के शक्तियों के बूते गलत काम न करे या न ऐसे लोगों व काम को समर्थन दे।

- बढ़-चढ़कर बातें न करें और विवाद को सहन कर ले।

इन 32 रूपों में होता है श्री गणेश की शक्तियों का शुभ प्रभाव..
श्री गणेश बुद्धि और विद्या के देवता है। जीवन को विघ्र और बाधा रहित बनाने के लिए श्री गणेश उपासना बहुत शुभ मानी जाती है। इसलिए हिन्दू धर्म के हर मंगल कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की उपासना की परंपरा है। माना जाता है कि श्री गणेश स्मरण से मिली बुद्धि और विवेक से ही व्यक्ति अपार सुख, धन और लंबी आयु प्राप्त करता है।

धर्मशास्त्रों में भगवान श्री गणेश के मंगलमय चरित्र, गुण, स्वरूपों और अवतारों का वर्णन है। भगवान को आदिदेव मानकर परब्रह्म का ही एक रूप माना जाता है। यही कारण है कि अलग-अलग युगों में श्री गणेश के अलग-अलग अवतारों ने जगत के शोक और संकट का नाश किया। इसी कड़ी में मुद्गल पुराण के मुताबिक भगवान श्री गणेश के ये 32  मंगलकारी स्वरूप नाम के मुताबिक भक्त को शुभ फल देते हैं।

श्री बाल गणपति - छ: भुजाओं और लाल रंग का शरीर
श्री तरुण गणपति - आठ भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री भक्त गणपति - चार भुजाओं वाला सफेद रंग का शरीर
श्री वीर गणपति - दस भुजाओं वाला रक्तवर्ण शरीर
श्री शक्ति गणपति - चार भुजाओं वाला सिंदूरी रंग का शरीर
श्री द्विज गणपति - चार भुजाधारी शुभ्रवर्ण शरीर
श्री सिद्धि गणपति - छ: भुजाधारी पिंगल वर्ण शरीर
श्री विघ्न गणपति - दस भुजाधारी सुनहरी शरीर
श्री उच्चिष्ठ गणपति - चार भुजाधारी नीले रंग का शरीर
श्री हेरम्ब गणपति - आठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री उद्ध गणपति - छ: भुजाधारी कनक यानि सोने के रंग का शरीर
श्री क्षिप्र गणपति - छ: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री लक्ष्मी गणपति - आठ भुजाधारी गौर वर्ण शरीर
श्री विजय गणपति - चार भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री महागणपति - आठ भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री नृत्त गणपति - छ: भुजाधारी रक्त वर्ण शरीर
श्री एकाक्षर गणपति - चार भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री हरिद्रा गणपति - छ: भुजाधारी पीले रंग का शरीर
श्री त्र्यैक्ष गणपति - सुनहरे शरीर, तीन नेत्रों  वाले चार भुजाधारी
श्री वर गणपति - छ: भुजाधारी रक्तवर्ण शरीर
श्री ढुण्डि गणपति - चार भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर
श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति - छ: भुजाधारी रक्ववर्णी, त्रिनेत्र धारी
श्री ऋण मोचन गणपति - चार भुजाधारी लालवस्त्र धारी
श्री एकदन्त गणपति - छ: भुजाधारी श्याम वर्ण शरीरधारी
श्री सृष्टि गणपति - चार भुजाधारी, मूषक पर सवार रक्तवर्णी शरीरधारी
श्री द्विमुख गणपति - पीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले
श्री उद्दण्ड गणपति-बारह भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर वाले, हाथ में कुमुदनी और अमृत का पात्र होता है।
श्री दुर्गा गणपति - आठ भुजाधारी रक्तवर्णी और लाल वस्त्र पहने हुए।
श्री त्रिमुख गणपति - तीन मुख वाले, छ: भुजाधारी, रक्तवर्ण शरीरधारी
श्री योग गणपति - योगमुद्रा में विराजित, नीले वस्त्र पहने, चार भुजाधारी
श्री सिंह गणपति - श्वेत वर्णी आठ भुजाधारी, सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले
श्री संकष्ट हरण गणपति - चार भुजाधारी, रक्तवर्णी शरीर, हीरा जडि़त मुकूट पहने

भोजन से पहले गाय को खिलाएं गोग्रास, क्योंकि..
सनातन धर्म परंपराएं संस्कार, मर्यादा, भावनाओं और जीवन मूल्यों से ओतप्रोत है। इसी कड़ी में गाय को ग्रास यानी भोजन से पहले उसका कुछ हिस्सा गाय को खिलाना भी प्रमुख है। जो धार्मिक परंपरा ही नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए एक अहम सबक भी जुड़ा है, जो खुशहाल जीवन के लिए बेहद अहम है। जानिए, क्या है गाय को ग्रास देने के पीछे खास संदेश

सनातन धर्म में गाय पवित्र और पूजनीय प्राणी है। इसके पीछे समुद्र मंथन से कामधेनु का निकलना या गाय में करोड़ों देवी-देवताओं के वास होने की धार्मिक मान्यताएं भी प्रमुख हैं। वहीं, व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि गाय के दूध से लेकर मूत्र तक शरीर को निरोगी रखने वाले होते हैं।

इस तरह देखा जाए तो पावनता ही गाय की सबसे बड़ी खासियत है। गो ग्रास भी गाय की तरह कर्म, स्वभाव, चरित्र और आचरण की पवित्रता का अहम संदेश देता है। क्योंकि ऐसा होने पर ही किसी व्यक्ति का परिवार या समाज में मान, प्रतिष्ठा, रुतबा और समर्थन बढ़ता है।

यही नहीं, गाय स्वभाव से अहिंसक प्राणी है, जो सिखाती है कि स्वभाव से भद्र बने। भद्र यानी विनम्र, निडर, खुले और सीधी सोच का इंसान। जिसकी संगति हर कोई पसंद करता है।

इस तरह गोग्रास परंपरा से चरित्र और स्वभाव की पावनता का सूत्र अपनाएं। जिससे मिला यशस्वी और सफल जीवन आपके साथ पूर्वजों का भी मान-सम्मान बरकरार रखेगा। वैसे ही जैसे गाय और उसकी देह का हर अंश अपेक्षित और पूजनीय है।

मरने के बाद कौन लोग भूत- प्रेत बनकर भटकते रहते हैं?
प्रेतों के बारे में कहानियां तो हम सभी बचपन से सुनते आए हैं मगर ये प्रेत होते कौन हैं इनका स्वरूप क्या होता है इसके बारे में हम धार्मिक ग्रंथों से जरूर जान सकते हैं। कुछ ग्रंथों के अनुसार इस संसार में मनुष्य योनि, पशुयोनि, आदि दिखाई देने वाली योनियों के अलावा एक अदृश्य प्रेतयोनि भी हैं।प्रेत अदृश्य और बलवान होते हैं। अदृश्य होने के कारण उनका प्रत्यक्ष प्रमाण कोई नहीं दे सकता। अर्थववेद में इनके निराकरण के लिए मारण प्रयोग के लिए अनेक यंत्र-मंत्रों भरमार है।

पुराणों में भूतोमि देवनोय: ऐसा लिखा है। मृत व्यक्तियों का जब श्राद्ध होता है तो उनको प्रेत कहकर पिण्ड दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है प्रेतत्वविमुक्तये एष पिण्डस्तुभ्यं स्वधा।।ऐसा कहा जाता है इन सभी से प्रमाणित होता है कि प्रेतयोनी अवश्य है। इसमें अनेक भाग हैं। आयुर्वेद के अनुसार अठारह प्रकार के प्रेत हैं। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल, कुंवारी कन्या मरती है तो देवी होती है। इन सभी की उत्पति अपने जन्मार्जित पापों, व्याभिचार से,अकाल मृत्यु से, ओझा द्वारा किए गए डायन के मारण प्रयोग से या श्राद्ध न होने से होती है।

इनको खाने की इच्छा अधिक रहती है। इनकी इच्छा होती है कि समुद्र सोख ले। लेकिन इनका आकार सुई के बराबर होने के कारण ये जल नहीं पी सकते है। जरा सा अपराध होने पर वे बिगड़ जाते हैं। उपद्रव करने लगते हैं। अच्छी चीजों पर इनका अधिकार नहीं रहता है। यहां तक की वे उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकते हैं। वे बहुत दुखी और चिड़चिड़ा होते है। इनका शरीर कुंद सा रहता है। बलिष्ट इतने होते हैं कि बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ फेंके।

पाप नहीं करने वालों के साथ क्या होता है मरने के बाद?
गरुड़ पुराण के अनुसार यमपुरी के चार दरवाजे माने गए हैं। जिनमें से तीन दरवाजे धर्म मंदिर यानी स्वर्ग की तरफ खुलते हैं। धर्ममंदिर के मार्ग बहुत सुंदर है वहां एक बड़ा बगीचा है। इस मार्ग से ब्रहर्षि , पुनीत राजर्षि, विद्याधर, आदि स्वर्ग को जाते हैं। देवताओं की आराधना करने वाले, शिव भक्ति में तत्पर रहने वाले, माघ महीने में किसी को काष्ठ देने वाले उस मार्ग से धर्मराजपुर को जाते हैं।

वर्षाऋतु में वैरागी पुरुष आ जाए तो उनका दान मान से सत्कार करने वाला, दुखी पुरुषों को मधुर वाणी कहने वाला, सत्य धर्म में रत, क्रोध-लोभ से रहित, माता-पिता की भक्ति में रत, गुरूसेवा करने वाला, भूमिदान देनेवाला, घर दान देनेवाला, गाय दान देनेवाला, विद्यादान देनेवाला, शुद्ध  परायण भी अच्छा पुरुष, पवित्र और शुद्ध निर्मल पुरुष पूर्व द्वार से धर्मराजसभा में जाते हैं। यहीं से दूसरा मार्ग उत्तर दिशा का है। जिसमें बड़े-बड़े रथ व पालकी रखी है। उस मार्ग में हंस, सार, चकवा-चकवी, पक्षियों से सुशोभित अमृत बिंदु युक्त तलाब है।

वेद पढऩे वाले, अभ्यागत की पूजा करने वाले, दुर्गा, सूर्य, की सेवा करने वाले, पर्व में तीर्थ पर स्नान वाले। जो धर्मयुद्ध कर संग्राम में मरे, अनशन व्रत धारण कर मरे, वाराणसी, गोगृह में, तीर्थ जल में गिरकर जो मरे। ब्राह्मण के अर्थ स्वामी के निमित्त, योगाभ्यास से जो मरे। जो सुपात्र पूजक है। वे उत्तर दिशा के मार्ग से धर्मराज की सभा में प्रवेश करते हैं। तीसरा मार्ग पश्चिमदिशा का है, वन,रत्नों से मंदिर व्याप्त है, अमृत रस से सदा पूर्ण बावडिय़ों से युक्त है।

ये नौ काम जो भी करता है वह मूर्ख कहलाता है....
कहते हैं किताबें पढ़कर कोई भी पंडित नहीं बनता है। पंडित बनने के लिए इंसान में कई गुण होना जरुरी है। इसलिए यह माना जाता है कि शास्त्र पढ़कर भी लोग मूर्ख होते हैं, किंतु जो उसके अनुसार आचरण करता है, वस्तुत: वही विद्वान है।  महाभारत के उद्योग पर्व में विदुर नीति में मिले वर्णन के अनुसार कुछ काम ऐसे होते हैं उन्हें जो भी करता है वह मूर्ख कहलाता है।

- बिना पढ़े ही गर्व करने वाला।

- दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मंसूबे बांधने वाला।

- बिना काम किए ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पण्डित लोग मूर्ख कहते हैं।

- जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करता है।

- जो मित्र के साथ झूठा आचरण करता है।

- न चाहने वालों को चाहता है और चाहने वालों को त्याग देता है।

- जो हमेशा व्यर्थ के काम करता है।

- बात-बात पर संदेह करता है

- जल्दी होने वाले काम को भी क रने में देर लगाता है वह मूर्ख होता है।

बस, इन 5 लोगों से बैठा लें तालमेल!..तो बड़े सुकून से गुजरेगा जीवन
मुश्किलों से बचना या आसान जीवन जीना इंसान की स्वाभाविक चाहत है। किंतु सुरक्षित जीवन की यह भावना इंसान के दिमाग पर ज्यादा हावी हो जाती है, तो वह हर दिन, हर पल उठते-बैठते आस-पास के लोगों या बातों को लेकर असंतुष्ट होने लगता है। जिससे वह अशांत या व्यर्थ दबाव व तनाव में रहकर अकेलेपन का शिकार भी होने लगता है।

शास्त्रों के मुताबिक संसार में रहकर भी जीवन से जुड़े नजरिए को लेकर अज्ञानता ही ऐसी मनोदशा पैदा करती है। जिससे बचकर व्यावहारिक जीवन की सफलता के लिए हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में एक बेहतरीन सूत्र बताया गया है। जिसके मुताबिक हर व्यक्ति के जीवन में 5 तरह के लोग अहम भूमिका निभाते हैं। इंसान को इस बात को समझकर हर स्थिति का सामना करने को तैयार रहना चाहिए।

लिखा गया है कि -

पञ्च त्वानु गमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि।

मित्राण्यामित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविन:।।

इस श्लोक का मतलब व इसमें छिपा संकेत है कि जीवन में जहां-जहां भी जाएंगे, वहां पर इन पांच तरह के लोगों के बीच जीवन गुजारना होता है, इनसे सही तालमेल जीना आसान बना देता है। ये 5 लोग हैं -

मित्र - समान विचार, व्यवहार व भावना रखने वाले लोग आपके करीबी बन मित्र रूप में सहयोगी बनते हैं।

शत्रु - काम, स्वार्थ या हित के चलते विरोधी, द्वेषी या ईर्ष्या भाव रखने वाले लोग शत्रुता का व्यवहार करते हैं।

उदासीन - ऐसे लोग जो अच्छा हो या बुरा न आपका सहयोग न विरोध करे। ऐसे लोगों का व्यवहार असामान्य व निष्क्रियता से भरा होता है, जो किसी को भी बेचैन व निराश करता है।

पनाह देने वाले - कठिन समय में निस्वार्थ सहयोग व सेवा करने वाले या शरण देने वाले लोग।

पनाह पाने वाले - बुरे वक्त या हालात के कारण कमजोर, गरीब या अन्य किसी कारण से शरण में आने वाले लोग।

इस तरह जीवन में हर रोज इन पांच तरह के लोगों का सामना तय है। इसलिए वक्त व व्यक्तियों से तालमेल बैठाकर जीवन को सही दिशा में मोड़ना चाहिए, बजाए इन बातों से मुंह फेर खुद या
दूसरों को दोषी मानकर कलह व संताप के साथ वक्त व जीवन गुजारना।

मां लक्ष्मी को खुश करना चाहते हैं, तो पहले इन बातों पर भी करें गौर.
जीवन में सुख अनेक तरह से मिलते हैं। किंतु यह तय है कि हर सुख, खासतौर पर अर्थ सुख यानी भोगने लायक विषय, वस्तु या जरिया, जिसे अक्सर धन से जोड़ा जाता है, को पाने में ज्ञान, गुण व शक्ति निर्णायक साबित होते हैं। किंतु अक्सर यह भी देखा जाता है कि अनेक लोग ज्ञान व योग्यता के अभाव में भी धनवान बन सुख बंटोरते हैं।

ऐसे हालात अनेक काबिल लोगों के मन में यह विचार भी पैदा करते हैं कि क्या पैसा कमाने के लिए ज्ञान व योग्यता बेमानी है या फिर वे धनी होना भाग्यवाद से जोड़कर खुद को आलस्य और निराशा के जाल में उलझाते हैं। जबकि शास्त्रों की कुछ बातों पर गौर करें तो लक्ष्मी का अधिकारी बनने के लिए विचार और कर्म से जुड़ी कुछ खास बातें भी अहम होती है। जिनको अपनाकर ज्ञानी हो या अल्प ज्ञानी दोनों ही धनवान बन सकते हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में ऐसी ही बातों को जीवन में अपनाकर धनी बनने का सूत्र बताया गया है। जानिए, ये खास बातें -

लिखा गया है कि -

संनियच्छति यो वेगमुत्थितं क्रोध हर्षयो:।

स श्रियो भाजनं राजन् यश्चापत्सु न मुह्यति।।

इस श्लोक का मतलब है कि जो व्यक्ति गुस्से और खुशी के आवेग को रोक ले और संकट में भी संयम और धैर्य नहीं छोड़े, वह राजलक्ष्मी यानी शक्ति के साथ भरपूर धन, वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

इसमें व्यावहारिक नजरिए से संकेत साफ है कि गुस्सैल स्वभाव मानसिक परेशानियों का कारण नहीं बनता, बल्कि इससे दूसरे भी किसी भी तरह की मदद करने से कतराते हैं। इसी तरह खुशियों के मौके पर भी बोल या व्यवहार में संयम रखें, जिससे अहं पैदा न हो सके। वहीं, संकट में, खासतौर पर आर्थिक परेशानियों में मनोबल टूटना कर्म से दूर ले जाकर भारी नुकसान का कारण बन सकता है।

सूत्र यही है कि क्रोध, अहंकार से दूर और पक्के इरादों व हौंसलें वाला इंसान कहीं भी सत्ता के साथ आर्थिक सुख आसानी से पा सकता है।

कौन-सी है नरक से भी बदतर जगह?
हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नरक की धारणा खासतौर पर पाप और पुण्यों से जुड़ी हैं। अच्छे और पुण्य कर्म से आत्मा स्वर्ग में वास करती है। वहीं, पाप या बुरे कर्म से आत्मा नरक भोगती है। व्यावहारिक जीवन के नजरिए से सुखी जीवन स्वर्ग की तरह, वहीं दु:ख-अभावों की घड़ी नारकीय मानी जाती है।

अगर शास्त्रों में लिखी कुछ बातों पर गौर करें, तो इसी बात का एक रोचक पहलू भी सामने आता है। शास्त्रों में नरक भी अच्छा और बेहतर स्थान बताया गया है। यह बात सुखी जीवन गुजारने का भी अच्छा सूत्र हैं। जानिए, गरुड़ पुराण की यह दिलचस्प बात -

लिखा गया है कि -

वरं हि नरके वासो न तु दुश्चरिते गृहे।

नरकात् क्षीयते पापं कुगृहान्न निवर्तते।।

इस श्लोक के अर्थ में न केवल नरक से जुड़ा कुछ सकारात्मक पक्ष उजागर होता है, बल्कि उसके द्वारा सीख दी गई है कि अच्छाई को अपनाना ही बेहतर जीवन का सूत्र है। श्लोक में कहा गया है कि -

दुश्चरित्र यानी मन, वचन, कर्म से बुरे व पापी इंसान के साथ निवास करने के बजाए नरक में रहना बेहतर है। क्योंकि नरक में रहने से पापों का नाश तो होता है, किंतु पापी व्यक्ति के साथ रहने से पापों का अंत नहीं, बल्कि पाप बढ़ते हैं। पाप ही दु:ख, पतन और दुर्गति का कारण है, जो जीवन के रहते नरक से भी बदतर महसूस होते हैं।

इन 3 पैमानों पर परखें स्वभाव, खुद-ब-खुद जान लें अपना भविष्य भी..!
जीवन में अच्छे और बुरे कर्म ही इंसान की पहचान बन जाते हैं। शास्त्र भी पुण्य और पाप कर्मों को सद्गति और दुर्गति का कारण बताते हैं। अच्छाई-बुराई के पीछे अक्सर यह कारण भी होता है कि इंसान, अपने साथ दूसरों के गुणों की भी अनदेखी करता है और सोच को दोष व कमजोरियों पर ज्यादा टिकाता है। नतीजतन, वह दूसरों के गुणों से प्रेरित नही हो पाता और साथ ही अपने गुण व शक्तियों से भी अनजान रहता है।

दूसरी ओर दोषदर्शन (दूसरों के दोष देखने वाला)  बुद्धि और विवेक पर बुरा असर डालते हैं। जिससे दुर्गुण या निंदा से पैदा अनेक बुराइयां कर्म, विचार और व्यवहार पर हावी होने लगते हैं। फिर भी अनेक लोग तर्क या दलीलों के द्वारा अपनी ऐसी सोच, बोल या कामों को सही ठहराने की कवायद में लगे रहते हैं और बुरे नतीजे मिलने तक जान नहीं पाते कि वह पतन की राह पकड़ चुके हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथ गणेश पुराण में भगवान गणेश द्वारा स्वयं इंसान के स्वभाव और कर्म से जुड़े ऐसे ही लक्षणों को बताया गया है। इन लक्षणों के आधार पर मिलने वाले नतीजे भी उजागर किए गए हैं। जिसे जानकर कोई भी इंसान व्यावहारिक जीवन में अनचाही दुर्गति को टाल सकता है।

गणेश पुराण के मुताबिक स्वभाव के आधार पर तीन तरह के लोग होते हैं- पहला दैवीय, दूसरा आसुरी और तीसरा राक्षसी। जानिए, इनके लक्षण और नतीजे क्या होते हैं -

देवीय स्वभाव - ऐसा इंसान क्रोध से दूर, संयम और धैर्य रखने वाला, तेजस्वी, निडर और मान-सम्मान की इच्छा से दूर कर्मठ होता है। ऐसा इंसान पूरे जीवन ही सुख-सौभाग्य के साथ बिताकर अंत में मुक्ति भी पा लेता है।

आसुरी स्वभाव - ऐसा व्यक्ति अहंकारी, कामना और वासनाओं की पूर्ति की लालसा रखने वाला और पाखण्डी या बढ़-चढ़कर बातें करने वाला होता है। जिससे वह जीवन में पहले भोग और कामनापूर्ति तो करता है, किंतु अंत में वहीं उसके घोर दु:ख का कारण बनते हैं।

राक्षसी स्वभाव - राक्षसी स्वभाव का व्यक्ति संवेदना व भावनाहीन या कठोर, दुष्ट, अपवित्र कर्म,बुराई या निंदा करने वाला, ईर्ष्यालु, द्वेषी, मोह और मद में डूबा, तंत्र-मंत्र के मारक प्रयोग करने वाला, किंतु अंदर से भयभीत रहने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में बड़े दु:ख ही नहीं पाता, बल्कि अकाल मृत्यु और नरक भी पाता है।

यही नहीं यह भी बताया गया है कि आसुरी या राक्षसी स्वभाव के लोग पिछले जन्मों के बुरे कामों से मिले नरक भोगकर अगले जन्म में भी दीन-हीन,अंधे, लंगड़े या कुबड़े होकर जन्म लेते हैं।

धर्म-कर्म में आस्थावान कोई भी इंसान इन बातों के मूल संदेश यानी अच्छाई को अपनाकर जीवन को सही दिशा देकर बदहाली या दुर्गति से बच सकता है। जिसे ही शास्त्रों में नरक का नाम दिया गया है।

नवविवाहित पढ़ें सुखद दाम्पत्य से जुड़ी ये जरूरी बातें..!
अनेक लोग गृहस्थ जीवन का मतलब मात्र कुटुंब या वंशवृद्धि की सोच तक सीमित कर देते हैं। ऐसे विचार कहीं न कहीं इंसान की स्वार्थ की भावना को उजागर करते हैं। अगर धर्म के नजरिए से गृहस्थ धर्म की बात करें तो सनातन धर्म की परंपराओं में जीवन के चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को पाने के लिए इंसानी जीवन को चार आश्रम व्यवस्थाओं में बांटा गया,जिनमें गृहस्थाश्रम भी एक है।

गृहस्थ धर्म द्वारा पुरुषार्थों में एक 'काम' की अहमियत बताई गई है। किंतु इसका मतलब भी मात्र शारीरिक सुख नहीं है। बल्कि इसके पीछे जो संदेश छिपा है, वह यही है कि जिस तरह प्रकृति के पांच तत्वों जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, अग्रि से नियत प्रकृति चक्र के जरिए इंसानी जीवन का वजूद कायम रहता है, उसी तरह मानव स्वार्थ से दूर होकर प्रकृति के इसी चक्र को बनाए रखने में संतान उत्पत्ति के साथ जीवन व प्रकृति से जुड़े सारे दायित्वों को निभाए।

गृहस्थ धर्म हर व्यक्ति को संयम और अनुशासन की सीख देकर सभ्य और सुखी समाज बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। किंतु वक्त के बदलाव के साथ आज गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत जल्द ही मनमुटाव, बिखराव और  यहां तक कि अलगाव तक देखा जा रहा है। ऐसी स्थिति तभी निर्मित होती है जब दांपत्य जीवन में आपसी विश्वास और तालमेल की कमी हो जाती है ।

इसलिए आज के नवविवाहितों के लिए यहां सुखी गृहस्थ जीवन के ऐसे व्यावहारिक सूत्र बताए जा रहे हैं, जिसे गृहस्थ जीवन में अपनाकर आप धर्म पालन के साथ सुखी दाम्पत्य जीवन गुजार सकते हैं -
- पति-पत्नी एक-दूसरे के माता-पिता का पूरा सम्मान करें।

- पति-पत्नी एक-दूसरे के परिवार के सुख-दु:ख में साथ दें व सहयोग करें, इससे प्रेम और स्नेह बढ़ेगा।

- पति-पत्नी के बीच विश्वास और भावनाओं का संबंध होता है, इसलिए किसी भी बात को लेकर झूठ न बोलें।

- हर परिवार में दाम्पत्य जीवन के सुखी होने के लिए जरूरी है कि बहू से बेटी के समान ही स्नेह रखें, क्योंकि धर्म के नजरिए से जिस घर में स्त्री का सम्मान होता है, वहां लक्ष्मी और सरस्वती का वास होता है। अन्यथा दरिद्रता और मुसीबतों के आने में समय नहीं लगता।

- हर बहू स्वार्थ और अहं छोड़कर पूरे परिवार के सुख के लिए समर्पण भाव रखे। विपरीत हालात में हमेशा ससुराल में मौजूदगी को अहमियत दे।

- धार्मिक उपायो में, पति-पत्नी दोनों सोमवार के दिन दूध और जल से भगवान शिव का अभिषेक करें।

- घर में तुलसी खासतौर पर श्याम यानी काली तुलसी लगाएं और सुबह-शाम उसके सामने घी का दीपक जलाएं। इससे घर में कलह नहीं होता।

तनाव की कई वजहों को दूर कर देते हैं ये 10 दिलचस्प सवाल!
आज का समय रफ्तार और भाग-दौड़ से भरा है। शास्त्रों में युगों पहले लिखी बातों का भी सार यही है कि कलियुग में कामनाओं का बोलबाला होगा। देखा भी जाता है कि जरूरत, अपेक्षा, महत्वाकांक्षा, स्वार्थ अनेक रूपों में इच्छाएं मन-मस्तिष्क पर सवार होती हैं। इन कामनाओं को पूरा करने के लिए ही तन व मन गतिशील रहते हैं। इच्छापूर्ति सुखी व शांत रखती है, तो अभाव दोषों पैदा करता है।

बहरहाल, आज के दौर पर गौर करें तो अधूरी इच्छाओं से पैदा कुंठा या कलह ही इंसान पर हावी दिखाई देता है। जिससे निराशा और असफलता में डूबा इंसान खुद को सबसे बदनसीब या दु:खी मानने लगता है। ऐसी मनोदशा से बचना या बाहर निकलने के लिए शास्त्रों में कुछ ऐसे सवाल बताए गए हैं, जिनको पढ़कर कोई भी इंसान व्यावहारिक जीवन को समझने और जीने के तरीके में हो रही चूक को जान तनावों की कई वजहों को खुद-ब-खुद दूर कर सकता है। जानें और सीखें क्या हो जीवन के प्रति नजरिया?

लिखा गया है कि -

कस्य दोष: कुले नास्ति व्याधिना को न पीडित:।

केन न व्यसनं प्राप्तं श्रिय: कस्य निरन्तरा:।।

कोर्थं प्राप्य न गर्वितो भुवि नर: कस्यापदो नागता:

स्त्रीभि: कस्य न खण्डितं भुवि मन: को नाम राज्ञां प्रिय:।

क: कालस्य न गोचरान्तरगत: कोर्थी गतो गौरवं

को वा दुर्जनवागुरानिपतित: क्षेमेण यात: पुमान्।।

इन श्लोको में बताए सवाल व्यर्थ तनाव व दबावों से बाहर निकाल जीने का हौंसला देते हैं। इसलिए खुद से पूछें ये सवाल, कि -

- किसका कुल दोषरहित है?

- कौन रोगमुक्त है?

- किसका धन-संपदा स्थायी है?

- कौन धनवान बनने पर अहं से बचा रहता है?

- किस पर संकट नहीं आए?

- स्त्रियां किसके मन को विचलित करने या कलह का कारण नहीं बनी?

- राजाओं या सत्ता का कौन प्यारा रहा?

- कौन काल से बचा रहता है?

- किसका स्वाभिमान नष्ट नहीं हुआ?

- कौन दुर्जन के अधीन रहकर आसानी से और दक्षतापूर्वक आजीविका प्राप्त कर सकता है?

शादी करने से पहले इन बातों का ध्यान रखेंगे...तो दुखी नहीं होना पड़ेगा
शादी की उम्र हो जाने पर माता-पिता को अपनी संतान की शादी की चिंता होने लगती है। लड़का हो या लड़की अधिकतर देखा जाता है कि नए रिश्ते को जोडऩे से पहले लोग दो चीजें देखते हैं पहला शारीरिक बल और सुंदरता दूसरा आर्थिक स्थिति। लेकिन कृष्ण कहते हैं हम केवल इन दो पात्रताओं को ध्यान में रखकर ही कोई रिश्ता न बनाएं। शारीरिक बल या सुंदरता और आर्थिक स्थिति भक्ति के चारित्रिक प्रमाण पत्र नहीं होते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं -हमें चरित्र देखना चाहिए, व्यवहार देखना चाहिए,अपने कुटुम्ब और मित्रों में उसके रिश्ते कैसे हैं यह देखना चाहिए। इसी से उसकी योग्यताओं का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर इन मापदण्डों पर वह खरा उतरे तो फिर रिश्ते के लिए आगे सोचना चाहिए। हम यह देखें कि उसकी महत्वाकांक्षाएं क्या हैं,उसके भीतर धर्म कितना गहरा उतरा हुआ है। धर्म के लिए उसका नजरिया कैसा है,फिर रिश्ता तय करें।

अगर वह इन परिमाणों पर खरा है तो फिर बात आगे बढ़ाई जाए। तीसरी बात जो कृष्ण ने कही है वह भी बहुत गौर करने वाली है। कृष्ण कहते हैं, हम जब रिश्ते तय करें तो यह देखें कि उस युवक का भविष्य क्या है। कृष्ण दुर्योधन का भविष्य जानते थे सो दुर्योधन से सुभद्रा के विवाह के खिलाफ थे। उन्हें अर्जुन के भविष्य को लेकर निश्चिंतता थी,सो वे अर्जुन के पक्ष में थे। हम इन बातों पर विचार कर अगर बेटे-बेटियों के रिश्ते तय करेंगे तो हमें कभी भी अपने निर्णयों पर लज्जित या दुखी नहीं होना पड़ेगा।

तरक्की चाहें, तो जान लें किसका पकड़ें हाथ और किनसे रखें दूरी?
हर इंसान के स्वभाव व व्यवहार में गुण व दोष होते हैं। यही कारण है दैनिक जीवन में उठते-बैठते अक्सर किसी भी रूप में कभी हमारी खामियां दूसरों का जीवन, तो कभी दूसरों की कमियां हमारे जीवन पर बुरा असर डालती है। किंतु जो इंसान अपन दोषों को नजरअंदाज कर दूसरों की कमियां ढूंढने की कवायद में लगा रहता है, वह अक्सर कलह, संताप, आरोप-प्रत्योराप के जाल में जीवन को उलझाकर कुण्ठा या निराशा का शिकार होता है।

ऐसी स्थिति किसी भी इंसान को विवेकहीन बनाती है यानी सही-गलत की समझ से दूर कर सकती है। जीवन को ऐसी नकारात्मकता दशा से बचाने या बाहर आने के लिए धर्मग्रंथों में लिखी सीधी और साफ बातों पर गौर करें, तो पल में जीवन की सारी मुश्किलों का हल मिल सकता है। जानिए, ये खास बातें -

गरुड पुराण में लिखा गया है कि -

सद्भिरासीत सततं सद्भि: कुर्वीत संगतिम्।
सद्भिर्विवाद मैत्रीं च नासद्भि: किंचिदाचरेत्।।

पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञै: सत्यवादिभि:।
बन्धनस्थोपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलै: सह।।

इस श्लोक में व्यावहारिक जीवन को साधने व तरक्की के लिए कुछ बेहतरीन सूत्र उजागर किए गए हैं, जो हर इंसान के सारे भ्रम व संशय को दूर कर देते हैं। ये हैं -

- लगातार सज्जनों यानी गुणी, ज्ञानी, दक्ष व सरल स्वभाव के इंसानों की संगति में रहें।

- दोस्ती व विवाद भी करें तो सज्जनों से, क्योंकि उसमें भी ज्ञान की बातों से हल सामने आते हैं।

- दुर्जन यानी कुटिल, व्यसनी दुर्गणी व बुरे स्वभाव के व्यक्ति के साथ न मित्रता करें न शत्रुता।

- पण्डित यानी दक्ष, विनम्र, धर्म में आस्थावान, मन, वचन व कर्म से सच्चे इंसान हो, तो उसके साथ बंधन में भी रहना गलत नहीं होगा, क्योंकि ऐसा संग यश, लक्ष्मी व सफलता लाने वाला होता है।

- वहीं दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति के साथ शाही व आलीशान जीवन भी मिले तो उनको छोड़ देना चाहिए। क्योंकि अंतत वे अपयश, दु:ख या कलह का कारण बनते हैं।

अगर जिंदगी में कुछ बनना है तो इन छ: बुरी आदतों को छोड़ना जरुरी है....
जीवन में सफलता हासिल करने का वैसे तो कोई निश्चित फार्मूला नहीं है लेकिन मनुष्य आध्यात्मिक नियमों को अपनाकर कामयाबी के शिखर को छू सकता है। दरअसल व्यक्ति स्वयं ही अपनी असफलता का कारण है क्योंकि वह अपनी सफलता पर संदेह करता है और कार्य होने से पहले ही हार स्वीकार कर लेता है ।

केवल पढऩे या सुनने से जीवन नहीं बन सकता। इसके लिए लक्ष्य का निर्धारण और दिशा का बदलाव होना जरूरी है। जीवन एक नदी है और नदी का प्रवाह बहता जाता है। उस प्रवाह को रोककर बांध बना दिया जाए, उससे नहरे बना दी जाएं तभी जीवन सार्थक होता है और उन्नति होती है। इसीलिए उन्नति चाहने वाले हर व्यक्ति को कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है। महाभारत के सभापर्व में विदुर नीति के एक श्लोक के अनुसार-

उन्नति चाहने वाले पुरुषों की नींद, तंद्रा, डर, क्रोध, आलस्य और जल्दी होने वाले कामों में भी अधिक देर लगाना इन छ: दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।

शनिश्चरी अमावस्या को करें शनि दोष शांति का यह असरदार उपाय
हिन्दू ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक शनि की अलग-अलग ग्रहों से शत्रुता और मित्रता के अलावा कुण्डली में शनि का मित्र या शत्रु और उच्च या नीच राशि में होना भी अच्छे-बुरे नतीजों का कारण बनता है। इसलिए शनि दशा को कठिन और संघर्ष से भरा भी माना जाता है।

अगर आप भी लगातार मानसिक, शारीरिक या आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हो, तो संभव हो कि शनि दशा से प्रभावित हो। किंतु अनजाने में शनि दशा के उपायों को नहीं अपना पा रहे हों। इसलिए निर्भय होकर किसी विद्वान ज्योतिष से शनि दशा को जानकर शनि की आराधना और शांति के उपाय अपना सकते हैं।

अगर यह तरीका भी अपना न पाएं, तो 20 मई को शनिश्चरी अमावस्या को शनि शांति के लिए असरदार मानी गई इन वस्तुओं का दान परोपकार के भाव से करने से न चूकें। शनि दोष से बचने का यह सरल और सस्ता, पर असरदार उपाय माना गया है। हां, यथासंभव दान के पहले घर या नवग्रह मंदिर में शनि की सामान्य पूजा जरूर करें। यहां जानिए सामान्य पूजा और दान के बारे में -

- स्नान कर यथासंभव काले कपड़े पहन घर या मंदिर में शनिदेव की प्रतिमा पर गंध, पुष्प, काले वस्त्र, तिल का तेल चढ़ाकर अगरबत्ती और दीप से आरती करें। तेल से बने पकवानों का भोग लगाएं।

- पूजा के बाद शनि के सरल मंत्र जैसे 'ॐ शं शनैश्चराय नम:' का मन ही मन यथाशक्ति जप करें।

पूजा व आरती के बाद शनि शांति के लिए इन विशेष वस्तुओं का दान करें -

- उड़द

- तेल

- तिल

- काला कम्बल या काला कपड़ा

- लोहा या इससे बनी वस्तुएं

- किसी विद्वान ब्राह्मण का दक्षिणा

आर्थिक रूप से सक्षम होने पर नीचे बताई सामग्री या पशु का दान भी श्रेष्ठ होता है -

- नीलम रत्न

- काली गाय

- भैंस

हमें शुद्ध करते हैं शनि
नवग्रहों में शनि को अति विशिष्ट स्थान प्राप्त है, लेकिन भ्रांत धारणाओं के कारण लोग शनि से डरते हैं। शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैया शुरू होने की बात सुनकर भयभीत हो उठते हैं। जबकि ज्योतिष में इसे एक सामान्य प्रक्रिया माना गया है। उसके अनुसार, शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष रहता है। जब शनि किसी राशि से बारहवें घर में पहुंचते हैं, तब उस राशि के लिए शनि की साढ़ेसाती की शुरुआत होती है। इसके ढाई वर्ष बाद जब शनि राशि में प्रवेश करता है, तब साढ़ेसाती का मध्यकाल होता है। यहां ढाई वर्ष बिताने के बाद शनि राशि से दूसरे भाव में प्रवेश करके वहां भी ढाई वर्ष रहता है। इस प्रकार लगातार साढ़े सात वर्ष वह राशि शनि से प्रभावित रहती है और यह अवधि साढ़ेसाती कहलाती है।

राशि में चौथे अथवा आठवें शनि का प्रतिकूल स्थिति में बैठना ढैया कहलाता है। शनि न्यायाधीश की तरह हर व्यक्ति के अच्छे-बुरे कर्र्मो का फल देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने निकृष्ट कर्म किए हैं, तो उसे इस दौरान बुरा नतीजा भुगतना पड़ता है। अत: अच्छे कर्म करने वालों को शनि से डरना नहींचाहिए।

धर्मग्रंथों में कहा गया है कि हमें अपने अच्छे-बुरे कर्मो का फल अवश्य भोगना पड़ता है। सत्कर्मो से शुभ फल तथा दुष्कर्मो से अशुभ फल प्राप्त होते हैं। पाप (बुरे) कर्मो का प्रायश्चित उनके कुफल भोगने से ही होता है। शनिदेव को दंडाधिकारी (न्यायाधीश) माना गया है। साढ़ेसाती और ढैया में हमें अपने बुरे कर्मो का परिणाम भुगतना पड़ता है। इस समय मिलने वाला कष्ट शनिदेव द्वारा प्रदत्त दंड ही माना जाता है। क्योंकि उनका सिद्धांत है - जैसा करोगे, वैसा पाओगे। शनिदेव यह न्याय निष्पक्षता के साथ करते हैं।

धर्मग्रंथों में शनिदेव का वाहन गिद्ध बताया गया है, जिसकी दृष्टि बहुत तेज होती है। आसमान में ऊंचाई पर उड़ रहा गिद्ध पृथ्वी की छोटी वस्तुओं को भी साफ-साफ देख लेता है। उसी तरह शनिदेव की दृष्टि भी अत्यंत सूक्ष्म है, उनकी नजरों से हमारा कोई भी कृत्य छिपा नहीं रह सकता। वे हमें दुष्कर्मो के लिए दंडित करके सत्कर्मो के लिए प्रेरित करते हैं।

शनि हर व्यक्ति की परीक्षा लेते हैं। साढ़ेसाती और ढैया परीक्षा का समय होता है। इसमें वही व्यक्ति सफल हो पाता है, जो हर परिस्थिति में अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है। विपरीत स्थिति में भी अपना संयम नहीं खोता। अहंकार और क्रोध को त्यागकर विनम्रता अपनाता है। इस अवधि में ऐसी विषम परिस्थितियां आ सकती हैं, जब व्यक्ति का आत्मविश्वास डगमगा जाता है और उसके समक्ष निराशा का अंधकार छा जाता है। तब धर्माचरण की शक्ति और विवेक के प्रकाश से सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

शनि हमें जीवन की वास्तविकताओं से साक्षात्कार कराते हैं। हमें यह भी पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया। शनि हमें यथार्थ के धरातल पर ले आते हैं। जिस प्रकार सोना आग में तपकर कुंदन होता है, उसी तरह शनि प्रायश्चित की अग्नि में तपाकर व्यक्ति के चित्त को निर्मल बना देते हैं। हमारे दुर्गुण शनि की ज्वालामयी दृष्टि से भस्म हो जाते हैं, जिससे चरित्र में शुद्धता आती है और हमारा अंतस पवित्र हो जाता है। शनि हमें सदाचरण के रास्ते पर चलाते हैं।

इसलिए परेशानियां उत्पन्न होने पर शनि को कोसना व्यर्थ है। शनि से डरें नहीं, उन्होंने सदा निष्पक्ष दंडाधिकारी के रूप में काम किया है। वे न किसी के शत्रु हैं और न ही मित्र। शनिदेव का न्याय सदा पक्षपात रहित होता है।

इस स्थिति में शनि चमका देते हैं तकदीर!
जीवन में बुराईयों व दोषों को ढूंढने की मानसिकता या यूं कहें कि लत सुख, शांति व सफलता पाने में तमाम मुश्किलें खड़ी करती है। इसलिए जरूरी है कि हमेशा सही काम व सही नजरिए को अहमियत दी जाए, ताकि किसी भी खुशी से मोहताज न रहना पड़े। शनि चरित्र, स्वरूप व भक्ति में भी नकारात्मकता से बचने और सकारात्मक जीवन जीने के ऐसे ही सूत्र उजागर होते हैं।

दरअसल, सूर्य पुत्र शनि से भी कई नकारात्मक बातें जुड़ी हैं। जैसे - तामसी स्वभाव, काला रंग, डील-डौल भी सुंदर न होना, दु:खों से खलबली मचा देने वाली नजऱ और चाल का तिरछापन। जिनसे हर कोई डरकर शनि दशा या उनके कोप से बचना चाहता है। जबकि दण्डाधिकारी शनि का सकरात्मक पहलू यही है कि वे बुरे कर्मों का दण्ड नियत करते हैं यानी अच्छे कर्म व विचारों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

यही कारण है कि शनि को भाग्य विधाता यानी किस्मत को चमकाने वाले देवता भी माना गया है। क्योंकि शनि की दशा हमेशा ही पीड़ादायक नहीं होती, बल्कि दूसरे ग्रहों से मित्रता और शत्रुता या कुण्डली में बने बुरे योग भी शनि के अच्छे-बुरे प्रभाव नियत करते हैं।

शनि दशा में अन्य ग्रहों के साथ शुभ योग होने पर शनि कृपा से इंसान खुशहाल हो सकता है। शनि के ऐसे ही कल्याणकारी रूप को शनि चालीसा की चौपाईयां भी उजागर करती है। जिसमें शनिदेव के अलग-अलग प्राणियों के वाहन विशेष की सवारी के फल बताए गए हैं।

ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक शनि के एक ही वाहन की सवारी अलग-अलग लोगों के लिए शुभ और अशुभ भी हो सकती है। बहरहाल, शनि चालीसा की नीचे लिखी चौपाई से जानिए कि जिस व्यक्ति के जीवन में शनि हाथी को वाहन बनाकर आते हैं, तो कैसे शुभ फल मिलते हैं। लिखा है -

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।।

इस चौपाई का साफ मतलब है कि शनि देव जब हाथी पर सवार होकर आते हैं, तो अपार धन, सुख-संपदा, सौभाग्य व वैभव से इंसान का जीवन खुशहाल हो जाता है। हाथी लक्ष्मी का वाहन भी बताया गया है। इसलिए शनि इस स्थिति में कृपा करते हैं, तो घर-परिवार से दरिद्रता दूर होकर सुख और शांति आती है।

असल में, चालीसा में शनिदेव के अलग-अलग प्राणियों को वाहन बनाकर आना और उनका जीवन पर अच्छे-बुरे प्रभाव का संबंध शनि के शुभ-अशुभ ग्रह योग की ओर भी संकेत करता है। वहीं इसमें व्यावहारिक नजरिए से संकेत भी है कि बुरे काम, विचार, बोल व व्यवहार से दूरी बनाई जाए, ताकि दुःख रूपी शनि के कोप से बचा जा सके।

शनि पाताल क्रिया से मिलेगी हमेशा के लिए शनि दोष से मुक्ति
20 मई, रविवार को शनि जयंती है। ये ही वह दुर्लभ अवसर है जब आप शनि दोष से हमेशा के लिए मुक्ति पा सकते हैं। शनि पाताल क्रिया एक ऐसा उपाय है जो हमेशा के लिए शनि दोष से मुक्ति दिला सकता है। शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए यह एक दुर्लभ प्रयोग है। यह प्रयोग इस प्रकार करें-

किसी शुभ मुहूर्त में शनि देव की लोहे की प्रतिमा बनवाएं। इसके बाद इस प्रतिमा का विधिपूर्वक पूजन एवं प्राण प्रतिष्ठा करें फिर इस प्रतिमा के सामने यथा संभव नीचे लिखे मंत्र का जप करें-

ऊँ शं न देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तुन:।।

इसके बाद दशांश हवन करें और फिर ऐसे स्थान पर गड्ढा खोदें जहां से आपका फिर कभी निकलना न हो। इस गड्ढे में शनि देव की प्रतिमा को उल्टी सुला दें अर्थात शनि देव का मुख पाताल की ओर रहे। अब इस गड्ढे के ऊपर मिट्टी डालकर इसे समतल कर दें और शनि देव से प्रार्थना करें कि जीवन का हर दु:ख दूर हो जाए।

यह उपाय सच्ची श्रद्धा से किया जाए तो शनि दोषों से हमेशा के लिए छुटकारा संभव है।

ऐसा करने से हो जाता है सबसे बड़ा पाप? जानें, कहीं आपसे तो नहीं हुआ..
हम सभी जानते हैं कि धर्मग्रंथ ज्ञान का भण्डार है। यह ज्ञान जीवन से लेकर मृत्यु तक कर्म या व्यवहार से जुड़ी हर बात का सही तरीका व नजरिया उजागर करता है। इसके द्वारा हर इंसान सुखी और शांत जीवन बिता सकता है। हिन्दू धर्म में भी वेद, पुराण व शास्त्रों का ऐसा ही ज्ञान, पाप-पुण्य और अच्छाई-बुराई को सुख-दु:ख नियत करने वाला बताता है।

यह भी व्यावहारिक सत्य है कि धर्मग्रंथों का गहरा ज्ञान आसानी से समझकर जीवन में उतारना साधारण इंसान के लिए कठिन होता है। ऐसे में अनेक पुराण व धर्मग्रंथों में अलग-अलग देवी-देवता विशेष को सर्वोपरि बताकर की गई पाप-पुण्य कर्मों की व्याख्या सुन या पढ़ अनेक अवसरों पर साधारण बुद्धि का इंसान कुतर्कों द्वारा इस ज्ञान को विरोधाभासी साबित करने की कोशिश भी करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह इस सत्य को समझने में चूक करता है कि सारे देव ग्रंथ ईश्वर की एकात्मता को ही बताते हैं।

धर्मग्रंथों, खासतौर पर भगवान वेदव्यास द्वारा रचे 18 पुराणों में जीवन में जुड़े ज्ञान को समझने या भ्रम-संशय को दूर रखने करने के लिए ही पाप-पुण्य कर्मों का निचोड़ बताते हुए एक श्लोक द्वारा साफ किया गया है कि कौन-सा काम सबसे बड़ा पुण्य है और कौन-सा सबसे बड़ा पाप? जिसे सामान्य बुद्धि का इंसान भी समझ पापमुक्त और खुशहाल जीवन गुजार सकता है। जानिए सार -

लिखा गया है कि -

परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडऩम्।

अष्टादश पुराणानि व्यासस्य वचन।।

इस श्लोक द्वारा साफ कहा गया है कि व्यास मुनि द्वारा रचे गए 18 पुराणों में बताए ज्ञान का सार यही है कि जीवन में सबसे बड़ा पाप दूसरों को किसी भी रूप में कष्ट या पीड़ा पहुंचाना है और सबसे बड़ा पुण्य परोपकार यानी भलाई यानी दूसरों को सुख पहुंचाना ही है।

यह चमत्कारी मंत्र बोल मिटाएं जाने-अनजाने हुए गलत कामों के दोष
जीवन में बुराई का किसी भी रूप में संग मन में बुरे भाव ही पैदा करता है। ये भाव कर्म या कामनाओं के रूप में सामने आते हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों में बताए गए चार युगों में से कलियुग में भी पाप व बुरे कर्मों के बढ़ने व उनसे कर्म, विचार और जीवन पर बुरा असर पड़ने के बारे में लिखा गया है।

आज के दौर में भी उठते-बैठते इंसानी कर्मों व विचारों में स्वार्थ, ईर्ष्या, कामनाएं, क्रोध जैसे अनेक स्वाभाविक दोष हावी दिखाई देते हैं, जिससे जाने-अनजाने अनेक तरह के पाप होते हैं, जो आखिरकार दु:ख व कलह पैदा करते हैं।

मन, वचन और कर्मों से हुए पाप से बचने या प्रायश्चित के लिए हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में एक मंत्र विशेष बताया गया है, जो कलियुग के बुरे प्रभाव से बचाकर बुद्धि को पवित्र करने वाला माना गया है। जब भी मन में कोई पाप भाव उठे, तो सचेत होकर इस मंत्र का स्मरण कर दुर्गति की ओर बढऩे वाले कदमों को रोका जा सकता है -

लिखा गया है कि कर्कोटक नाग, नल-दमयन्ती और ऋतुपर्ण का नाम लेने से कलियुग का प्रभाव नहीं होता। इसलिए श्रद्धा-भाव से इस मंत्र द्वारा इनका नाम स्मरण करें -

कर्कोटस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च।

ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तनं कलिनाशनम्।।

करें इस भैरव मंत्र का जप, नहीं होगा बुरे साए का असर
भगवान शंकर का एक अवतार काल भैरव को भी माना गया है और काल भैरव का एक रूप बटुक भैरव हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार बटुक भैरव की साधना करने से कोई भी बुरी शक्ति आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। यदि आप भी किसी बुरी शक्ति या ऊपरी हवा से पीडि़त हैं तो नीचे लिखे बटुक भैरव मंत्र का जप श्रद्धा व विश्वास के साथ करें, आपकी हर समस्या का निदान हो जाएगा।

मंत्र

ऊँ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं

जप विधि

- सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें।

- इसके बाद भगवान काल भैरव की तस्वीर या मूर्ति की पंचोपचार पूजा करें। मदिरा अवश्य चढ़ाएं।

- इसके बाद कुश के आसन पर बैठ जाएं व रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें। कम से कम 5 माला जप अवश्य करें।

- कितना भी बड़ा संकट हो या बुरी शक्ति का असर है, बटुक भैरव की कृपा से वह टल जाएगा।

करें ये 5 काम तो न होगा शनि, न सूर्य ग्रहण का बुरा असर!
शास्त्रों के मुताबिक न्यायाधीश शनि सूर्य पुत्र हैं। जहां दण्डाधिकारी होने से उनके स्वभाव में कठोरता भी है, वहीं अपने पिता सूर्य से शत्रुता के भाव भी हैं। यही कारण है कि ज्योतिष शास्त्रों में भी शनि-सूर्य का बनने वाला कोई भी योग टकराव के रूप में देखा जाता है और  शुभ-अशुभ प्रभाव नियत करने वाला भी माना जाता है।

आज ज्येष्ठ माह की अमावस्या, जो कि शनिदेव की जन्मतिथि भी है, के साथ सूर्य ग्रहण का योग बना है। धार्मिक मान्यताओं में सूर्यग्रहण के सूतक काल की शुरुआत 12 घंटे पूर्व से ही मानी जाती है। इस दृष्टि से तकरीबन अर्द्धरात्रि के दौरान होने वाले सूर्य ग्रहण के साये में शनि जयंती भी मनाई जाएगी। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक शनि-सूर्य के ऐसे योग का असर अन्य ग्रहों व योग के मुताबिक अलग-अलग राशियों के लोगों पर होता है।

खासतौर पर शनि के प्रभावों के नजरिए से उन राशियों के लोगों पर, जो शनि ढैय्या, साढ़ेसाती या महादशा के प्रभाव में हो। शनि के स्वभाव के संबंध में लिखा भी गया है कि -

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरिस तत्क्षणात्।

यानी अगर शनि प्रसन्न हो तो राजसी सुख देते हैं, वहीं रुष्ट होने पर सारे सुख छीन दुर्गति कर देते हैं। जाहिर है कि शनि कृपा सद्गुणी को सौभाग्य व दुर्गुणी को दुर्भाग्य के रूप में मिलती है।

शास्त्रों में भी सूर्य-शनि के योग से बनी ग्रह स्थितियों में, खासतौर पर शनि के बुरे प्रभाव से बचने के लिए शनि भक्ति व पाठ-पूजा के साथ ही दैनिक जीवन में बोल, व्यवहार और कर्म में 5 बातों को अपनाना भी जरूरी बताया गया है। धर्मशास्त्रों के नजरिए से भी ये बातें हर इंसान का जीवन सफल बनाती हैं। माना जाता है कि इन कामों से शनि बिना पूजा-सामग्रियों के भी प्रसन्न हो जाते हैं, साथ ही ऐसे 5 पुण्य कर्मों से बैर भाव होने पर भी सूर्य कृपा कर अपार यश, प्रतिष्ठा देते है।

जानिए, शनि के साथ सूर्य  कृपा पाने के लिए दैनिक जीवन में धर्म पालन से जुड़ी ये खास 5 बातें
परोपकार -  दूसरों पर दया खासतौर पर गरीब, कमजोर को अन्न, धन या वस्त्र दान या शारीरिक रोग व पीड़ा को दूर करने में सहायता शनि की अपार कृपा देने वाला होता है। क्योंकि परोपकार धर्म का अहम अंग है।

दान - अहं व दोषों से मुक्त इंसान से शनि प्रसन्न होते हैं, जिसके लिए दान का महत्व बताया गया है। दान उदार बनाकर घमण्ड को भी दूर रखता है। इसलिए यथाशक्ति शनि से जुड़ी सामग्रियों या किसी भी रूप में दान धर्म का पालन करें।

सेवा - हमेशा माता-पिता व बड़ों का सम्मान व सेवा करने वाले पर शनि की अपार कृपा होती है। क्योंकि मान्यता है कि शनिदेव जरावस्था या बुढ़ापे के स्वामी है। इसलिए इसके विपरीत वृद्ध माता-पिता या बुजुर्गों को दु:खी करने वाला शनि के कोप से बहुत पीड़ा पाता है।

सहिष्णुता - शनि का स्वरूप विकराल है। वहीं शनि को कसैले या कड़वे पदार्थ जैसे सरसों का तेल आदि भी प्रिय माना गया है। किंतु इसके पीछे भी सूत्र यही है कि कटुता चाहे वह वचन या व्यवहार की हो, से दूर रहें व दूसरों के ऐसे ही बोल व बर्ताव को द्वेषता में न बदलें यानी सहनशील बनें।

क्रोध का त्याग - शनि का स्वभाव क्रूर माना गया है, किंतु वह बुराईयों को दण्डित करने के लिए है। इसलिए शनि कृपा पाने व कोप से बचने के लिए क्रोध जैसे विकार से दूर रहना ही उचित माना गया है।

इन पांचों की सेवा से दूर न भागें, तो जल्द साकार होंगे सफलता के ख़्वाब
जीवन में कर्म, वचन और व्यवहार से पाई सफलता ही सुख नहीं देती, बल्कि उसके साथ मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी अहम है। दूसरे शब्दों में कहें, तो यश के बिना कामयाबी बेमानी हो जाती है। शास्त्रों के मुताबिक यशस्वी न बनने का कारण दंभ भी होता है, जो इंसान सफलता पाकर अहं में डूब जाता है, वह गुणी होने पर भी अंतत: अपयश का पात्र बनता है।

यही कारण है कि अहंकार से बचकर सफल और यशस्वी जीवन के लिये शास्त्रों में विनम्रता को स्वभाव में उतारने का महत्व बताया गया है। जिसके लिये सेवा और सम्मान से जुडऩा बेहतर उपाय है। वैसे, किसी भी प्राणी की किसी भी रूप में सेवा सुयश ही देती है, किंतु हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत में मानवीय जीवन से जुड़े ऐसे 5 देवता व देव रूपों की सेवा व आदर की अहमियत बताई गई है, जो सुनिश्चित सफलता के साथ यश भी दिलाने वाली बताई गई है।

जानिए, किसकी सेवा व पूजा यशस्वी और सफल जीवन तय करती हैलिखा गया है कि -

पञ्चैव पूजयंल्लोके यश: प्राप्रोति केवलम्।

देवान् पितृन् मनुष्यांश्च भिक्षूनतिथिपञ्चामान्।।

इस श्लोक में साफ कहा गया है कि इन 5 की पूजा-सेवा यशस्वी व सफल जीवन बनाने वाली होती है -

देवता - पंच देव पूजा धार्मिक मान्यताओं में कार्य व कामनासिद्धि करने वाली मानी जाती है। वहीं जीवन में आत्मविश्वास कायम रखने के साथ सद्कर्मों से जोड़ती है।

पितर - पितृ स्मरण या पूजा धार्मिक नजरिए से दु:ख-दारिद्रय दूर करने वाली मानी जाती है। वहीं व्यावहारिक रूप से यह पितरों द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों और जीवन मूल्यों अच्छे कार्य की प्रेरणा देकर यश दिलाते हैं।

मनुष्य - मानव सेवा सबसे बड़ा धर्म माना गया है। दूसरों को अपना ही रूप मानकर की गई सेवा प्रेम, परोपकार, दया आदि द्वारा धर्म से जोड़कर यशस्वी बनाता है।

संन्यासी - शास्त्रों में सन्यासी देव रूप कहा गया है। संयम और तप की मूर्ति  सन्यासी सेवा देव पूजा का फल ही नहीं देती, बल्कि श्री व सुयश तय करती है।

अतिथि - अतिथि भगवान के समान माना गया है। दरअसल, इसके पीछे  मानवीय रिश्तों, भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़े रहने का संदेश है। जिसके बिना प्रेम, सेवा, दया, अहिंसा के धर्म भावों से जुडऩा व यशस्वी जीवन संभव नहीं होता।

स्त्री की इस 1 बात से पुरुष को होता है बड़ा फ़ायदा!
हिन्दू धर्मशास्त्रों में जीवन यात्रा के चार पड़ाव बताए गए हैं। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम व्यवस्था रूपी चार चरणों में जीवन में संयम व अनुशासन अपनाकर जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को पाने का लक्ष्य नियत किया गया है। इनमें स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही गृहस्थाश्रम अहम होता है।

शास्त्रों में शिव-शक्ति, प्रकृति-पुरुष या अर्द्धनारीश्वर के रूप में स्त्री-पुरुष को एक दूसरे की शक्ति बताया गया है। यही भाव सांसारिक जीवन में, खासतौर पर गृहस्थ जीवन में स्त्री-पुरुष के लिए एक-दूसरे के लिए कायम रखना सुख का सूत्र है। चूंकि गृहस्थी का मूल स्त्री को माना गया है। हर कार्य में स्त्री की प्रधानता होती है। इसलिए स्त्री की योग्यता और अयोग्यता पुरुष के जीवन की भी दिशा नियत करने वाली मानी गई है।

यही कारण है कि भविष्य पुराण में सुखी गृहस्थ जीवन के लिए पुरुष का कुछ विशेष लक्षणों वाली स्त्री के साथ विवाह करना बड़े सुख देने वाला बताया गया है, जो केवल स्त्री ही नहीं, बल्कि पुरूष की भी शक्ति बन उसे सिद्धि, समृद्धि और ख्य़ाति दिलाने वाले साबित होते हैं।

लिखा गया है कि -

लक्षणेभ्य: प्रशस्तं तु स्त्रीणां सद्वृत्तमुच्यते।

सद्वृत्तयुक्ता या स्त्री सा प्रशस्ता न च लक्षणै:।।

इस श्लोक में साफ संदेश है कि स्त्री के लक्षण, यानी सौंदर्य या रंग-रूप की तुलना में उसका सदाचार यानी अच्छा आचरण श्रेष्ठ है। अगर स्त्री के आचरण मर्यादित और गरिमामय नहीं है तो ऐसी स्त्री का रूपवती होना भी व्यर्थ या अपयश देने वाला होता है। इस तरह मर्यादित आचरण को स्त्री की शक्ति बताया गया है, जिसका संग पाकर पुरुष भी अपार मान-सम्मान, यश व सफलता पाता है।

कितना बाकी है कलियुग! जानिए, दिलचस्प आंकड़े
जब-जब धर्म की हानि होती है, ईश्वर अवतार लेकर अधर्म का अंत करते हैं। इस संदेश के साथ अलग-अलग युगों में जगत को दु:ख और भय से मुक्त करने वाले ईश्वर के अनेक अवतारों के पौराणिक प्रसंग हैं। दरअसल, इनमें सत्य और अच्छे कर्मों को अपनाने के भी कई सबक हैं। साथ ही इनके जरिए युग के बदलाव के साथ प्राणियों के कर्म, विचार व व्यवहार में अधर्म और पापकर्मों के बढ़ने के भी संकेत दिए गए हैं।

इसी कड़ी में सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के लिए बताया गया है कि इसमें अधर्म का ज्यादा बोलबाला होगा, जिसके अंत के लिए भगवान विष्णु का कल्कि रूप में दसवां अवतार होगा। रामचरितमानस में भी कलियुग में फैलने वाले अधर्म का वर्णन मिलता है।

आज के दौर में भी व्यावहारिक जीवन में आचरण, विचार और वचनों में दिखाई दे रहे सत्य, संवेदना, दया या परोपकार जैसे भावों के अभाव से आहत मन अनेक अवसरों पर कलियुग के अंत और कल्कि अवतार से जुड़ी जिज्ञासा को और बढ़ाता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ भविष्य पुराण में अलग-अलग युगों की गणना व अवधि बताई गई है। इस आधार पर जानते हैं कलियुग की अवधि कितनी लंबी या बाकी है?

पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि इस तरह है -

सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)

त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)

द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)

कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)

इस तरह सभी दिव्य वर्ष मिलाकर 12000 दिव्य वर्ष देवताओं का एक युग या महायुग कहलाता है, जो चार युगों के सौर वर्षों के योग 43,200,000 वर्षों के बराबर होता है। 

इन 11 सरल तरीकों से मिलती है भरपूर सुख-शांति 
जीवन में शांति न होने पर बड़े से बड़े सुखों में भी व्यक्ति अभावग्रस्त महसूस करता है। सुकून भरे इंसानी जीवन के सूत्र हर धर्म में बताए गए हैं। किंतु सनातन धर्म में परंपराओं के माध्यम से बताए गए रहने और जीने के सलीके खुशी के साथ मन में गहरी शांति भी देते हैं। जानिए, ऐसी ही कुछ बातें -

1. दूसरों में अपना रूप देखें, तभी वास्तविक प्रेम व मेलजोल से जीवन गुजारना संभव होगा।

2. यह कभी न भूलें कि शरीर की मृत्यु तय है। जीवन अस्थाई है। इससे अहं का भाव दूर रहेगा और प्रेम जीवन में उतरेगा। 
3. दूसरों के दोष न देखकर स्वयं के दुर्गुणों को पहचान उसे दूर करें।

4. पवित्रता, ईमानदारी के साथ सादा जीवन बिताते हुए नियत लक्ष्य पाना ही जीवन की सार्थकता और उपयोगिता है।

5. निजी हित और स्वार्थ को भूलकर परोपकार और दूसरों की भलाई की कोशिश करना।

6. सभी सुख-वैभव और भोग विलास में आसक्ति न रखना।

7. माता-पिता, गुरु, बुजुर्गों, विद्वान, संत, महापुरुषों, ब्राह्मणों एवं आचार्यों की सेवा एवं सम्मान करना।

8. गाय, गंगा, गीता, गायत्री, वेद और रामायण की पवित्रता का सम्मान करना।

9. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्रत, उपवास, तप और योग को अपनाएं।

10. सत्य, दया, अहिंसा, प्रेम, सेवा, त्याग के भाव जीवन में उतारना ही सनातन धर्म की पहचान है।

11. ईश्वर सर्वशक्तिमान है। इसलिए हर हालात में भगवान पर विश्वास रखें। 

इन 6 वजहों से लक्ष्मी छोड़ देती है साथ! रहें सावधान 
'तमसो मा ज्योर्तिगमय' यानी ईश्वर अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले। इस धर्म सूत्र में अज्ञानता से परे होकर ज्ञान की ओर बढ़ने के साथ-साथ दरिद्रता से दूरी व संपन्नता से नजदीकियों की कामना भी जुड़ी है। सांसारिक जीवन में समृद्धि व सफलता के लिए धन की चाहत अहम होती है, जिसे पूरा करने के लिए धर्म और कर्म दोनों ही तरीकों से वैभव की देवी माता लक्ष्मी को पूजने का महत्व बताया गया है। 

धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में भी धन संपन्नता या लक्ष्मी का साया सिर पर बनाए रखने की ऐसी ही चाहत पूरी करने के लिए व्यावहारिक जीवन में कर्म व स्वभाव से जुड़ी कुछ गलत आदतों से पूरी तरह से किनारा कर लेने की ओर साफ इशारा किया गया है। इन बुरी आदतों के कारण लक्ष्मी की प्रसन्नता मुश्किल बताई गई है। 

जानिए, वैभवशाली, प्रतिष्ठित व सफल जीवन के लिए बेताब इंसान को किन बुरी आदतों को छोड़ देना चाहिए  
महाभारत में लिखा है कि -

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

इस श्लोक मे कर्म, स्वभाव व व्यवहार से जुड़ी इन छ: आदतों से यथासंभव मुक्त रहने की सीख है

नींद - अधिक सोना समय को खोना माना जाता है, साथ ही यह दरिद्रता का कारण बनता है। इसलिए नींद भी संयमित, नियमित और वक्त के मुताबिक हो यानी वक्त और कर्म को अहमियत देने वाला धन पाने का पात्र बनता है।

तन्द्रा - तन्द्रा यानी ऊंघना निष्क्रियता की पहचान है। यह कर्म और कामयाबी में सबसे बड़ी बाधा है। कर्महीनता से लक्ष्मी तक पहुंच संभव नहीं।

डर - भय व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करता है, जिसके बिना सफलता संभव नहीं। निर्भय व पावन चरित्र लक्ष्मी की प्रसन्नता का एक कारण है।

क्रोध - क्रोध व्यक्ति के स्वभाव, गुणों और चरित्र पर बुरा असर डालता है। यह दोष सभी पापों का मूल है, जिससे लक्ष्मी दूर रहती है।

आलस्य - आलस्य मकसद को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। संकल्पों को पूरा करने के लिए जरूरी है आलस्य को दूर ही रखें। यह अलक्ष्मी का रूप है।

दीर्घसूत्रता - जल्दी हो जाने वाले काम में अधिक देर करना, टालमटोल या विलंब करना।

याद रखें श्री हनुमान की यह सीख, तो मुसीबतों में भी बुलंद रहेगा हौंसला
साधारण इंसान दु:खों से दूर जीवन को ही सफल और सुखी मानकर चलता है। यही कारण है कि इंसान जीवन को सुखी और निश्चिंत बनाने के लिये हर दिन जूझता है। हालांकि यह सच है कि सुख और दु:ख के रास्ते ही जीवन का सफर तय होता है। इस सफर को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिये गुण, योग्यता, विचार और शक्तियां अहम होती है। किंतु सुरक्षित रहने और दु:खों से परे रहने की सोच और आतुरता अनेक अवसरों पर उसको सुकून के बजाए अधिक चिंता में डूबो देती है।

धर्मशास्त्रों में ऐसे ही दु:खों और चिंता से मुक्त जीवन के लिये ऐसे सूत्र बताए गए हैं, जिनमें छुपे अर्थ को गंभीरता से समझा जाए तो वह जीवन में संतुलन लाने के साथ तमाम मुश्किलों से निजात दिला सकते हैं।

इसी कड़ी में संकटमोचक देवता और संयम के महान आदर्श श्री हनुमान द्वारा रामचरितमानस में दु:ख को बुरा मानने के स्थान पर अच्छा मानकर उसका सामने करने के लिये बताया एक सूत्र सांसारिक जीवन के लिये बहुत ही सटीक और कारगर है।
रामचरित मानस में श्री हनुमान के बोल हैं कि -

कह हनुमंत बिपत्ति प्रभु सोई। जब तब सुमिरन भजन न होई।।

इस चौपाई में श्री हनुमान द्वारा देव स्मरण, भक्ति और समर्पण की अहमियत बताते हुए जीवन को सुखी बनाने का बहुत ही अच्छा संदेश दिया है। इसमें दु:ख को अच्छा मानते हुए संकेत है कि साधारण इंसान दु:ख को मुसीबत मानता है, किंतु असल में दु:ख सुख से श्रेष्ठ इसलिए हो जाता है कि ऐसे वक्त में ही भगवान की याद आती है। इसके विपरीत बुरा समय तो वह होता है जब भगवान का स्मरण न हो।

व्यावहारिक रूप से प्रेरणा यही है कि चूंकि बुरा वक्त इंसान को सोने की तरह तपाकर निखारने वाला होता है। इसलिए ऐसे वक्त हिम्मत हारकर रुकने के बजाय इंसान ईश्वर और खुद पर विश्वास रख आगे बढ़ता चले। साथ ही वह दु:ख ही नहीं बल्कि सुखों में भी अहं भाव से परे होकर उनको ईश्वर की देन मानकर हमेशा सरल और सहज भाव से देव स्मरण कर जीवन गुजारता चले।

इस तरह श्री हनुमान के इस सूत्र को अपनाने से बड़े से बड़े दु:ख में भी इंसान अस्थिर और अशांत नहीं होता। 
जब भी कोई मुश्किल हो रामचरितमानस की ये चौपाई जरूर पढ़े-

जानउं सदा भरत कुलदीपा। बार-बार मोहि कहेउ महीपा कसे कनकु मनि पारिखि पाएं।
पुरुष परिखिअहिं समयं सुभाएं। अनुचित आजु कहब अस मोरा।
सोक सनेहं सयानप थोरा। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी।
भई सनेह बिकल सब रानी। सोना कसौटी पर कसे जाने पर रत्न पारखी।

रामचरित मानस में मिले वर्णन के अनुसार सोना कसौटी पर कसे जाने पर रत्न पारखी के मिलने पर और वैसे ही किसी भी इंसान की पहचान परीक्षा के समय पर ही होती है। बात एकदम सही भी है क्योंकि प्यार और दुख में अच्छे-अच्छे लोग भी अपना सयानापन या विवेक भूल जाते हैं। तुलसीदासजी ने बहुत ही सुंदर बात कही है कि असली टैलेंट की या धैर्य की परीक्षा हमेशा विपरीत समय में ही होती है जो इंसान परिस्थितियों की दुहाई देकर हार नहीं मानता है।

कठोर परिस्थितयों में भी धैर्य के साथ निर्णय लेता है वही अपने लक्ष्य तक पहुंच पाता है। यहां कौसल्या जी भरत जी के शील, गुण आदि की प्रशंसा करते हुए कह रही हैं कि ये भरतजी की परीक्षा का समय है उन्हें धैर्य से काम लेना चाहिए। तुलसी लिखते हैं कि कौसल्याजी सीताजी की मां से दुख भरे हृदय से कहती है।

राम-लक्ष्मण और सीता वन में जाएं। इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिंता है। ईश्वर के अनुग्रह और आपके आर्शीवाद से मेरे पुत्र और बहुए गंगा के समान पवित्र है। मैं राम की कसम खाकर सत्य भाव से कहती हूं। भरत के शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन बहुत ज्यादा है। उनके अच्छेपन का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है।

गंगा दशहरा 30 को, इसी दिन धरती पर आई थी गंगा
हिंदू संस्कृति में गंगा को सबसे पवित्र व पापों का नाश करने वाली नदी कहा गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार गंगा देवनदी है जो मनुष्य के कल्याण के लिए धरती पर आई है। धर्म ग्रंथों के अनुसार धरती पर गंगा का अवतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ था इसीलिए इस तिथि को गंगा दशहरा या गंगा दशमी के नाम से जाना जाता है-

दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठमासे बुधेहनि।

अवतीर्णा यत: स्वर्गाद्धसतक्र्षे च सरिद्वरा।।

गंगा तट पर इस दिन भव्य रूप से सांस्कृतिक व धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस बार यह उत्सव 30 मई, बुधवार को है। इस दिन गंगा स्नान व दान का विशेष महत्व है-

ज्येष्ठस्य शुक्लादशमी संवत्सरमुखा स्मृता।

तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषत:।।

इस दिन गंगा स्नान व पूजन से दस प्रकार के पापों (तीन कायिक, चार वाचिक व तीन मानसिक) का नाश होता है इसीलिए इसे दशहरा कहते हैं-

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशमी हस्तसंयुता।

हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृता।।

(ब्रह्मपुराण)

वैसे तो गंगा तट पर हर दिन एक उत्सव की तरह ही होता है लेकिन गंगा दशहरा पर्व पर आयोजित कार्यक्रम हिंदू सभ्यता में गंगा के महत्व का आभास दिलाते हैं। इस दिन गंगा तटों पर बड़ी संख्या में धर्मालुजन गंगा स्नान व पूजन के लिए आते हैं और स्वयं को धन्य महसूस करते हैं।

गंगा दशहरा इस विधि से करें मां गंगा का पूजन
30 मई, बुधवार को गंगा दशहरा का पर्व है। यह पर्व भारतीय संस्कृति के गौरव का प्रतीक है। इस दिन अनेक स्थानों व प्रमुख तीर्थों पर धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तथा गंगा के महत्व का वर्णन किया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन विधि-विधान पूर्वक गंगा स्नान व पूजन करता है उसी हर मनोकामना तो पूरी होती ही है साथ ही उसे मोक्ष भी प्राप्त होता है। गंगा दशहरा के दिन गंगा पूजन की विधि इस प्रकार है-

संकल्प पूर्वक गंगा में या अन्य किसी पवित्र नदी में दस बार डुबकी लगाएं व साफ वस्त्र पहनकर पितृ तर्पण करें। फिर उस तीर्थ की पूजा करके घी से चुपड़े हुए दस मुट्ठी काले तिल हाथ में लेकर जल में डाल दें। इसी तरह गुड़ से बने दस सत्तू के लड्डू भी जल में डाल दें। इसके बाद तांबे या मिट्टी के घड़े पर रखी सोने, चांदी अथवा मिट्टी से बनी गंगाजी की प्रतिमा का पूजन नीचे लिखे मंत्र के साथ करें-

नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै।

शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नन्दिन्यै ते नमो नम:।।

इसके बाद भगवान नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ व हिमालय को वहां उपस्थित जानकर उनका भी पंचोपचार पूजन करें।

पूजन में जो सामग्री उपयोग में ले उनकी संख्या दस होनी चाहिए जैसे दस तरह के फूल, दशांग धूप, दस दीपक, दस प्रकार के नैवेद्य, दस पान व दस फल होने चाहिए। दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को दें किंतु उन्हें दान में दिए जाने वाले जौ व तिल सोलह-सोलह मुट्ठी होना चाहिए। इस दिन सोने अथवा चांदी के मछली, कछुए और मेंढ़क बनाकर उनकी पूजा कर नदी में डालने की भी विधान है। अगर सोने-चांदी के नहीं बनवा पाएं तो आटे के भी बनाए जा सकते हैं। पूजा के बाद दीपक नदी में प्रवाहित कर दें।

गायत्री जयंती 30 को, करें मां गायत्री की आराधना
हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा जाता है अर्थात सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी भी कहा जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मां गायत्री का अवतरण माना जाता है। इस दिन को हम गायत्री जयंती के रूप में मनाते है। इस बार गायत्री जयंती का पर्व 30 मई, बुधवार को है।

धर्म ग्रंथों में यह भी लिखा है कि गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती। गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं। विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विपत्तियों के समय उसकी रक्षा करती है।

हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है जिसका अर्थ है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। यही कारण है गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है इसीलिए भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को प्रतिदिन गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिए।

ये 5 बातें बना देती है पापी! जानें और संभलें..
धर्मशास्त्रों की बातों पर गौर करें तो मोटे तौर पर कर्मों के दो नतीजे बताए गए हैं - पाप और पुण्य। जहां पाप सुखों से वंचित कर दु:ख का कारण बनते हैं, वहीं पुण्य पापों को कम या उनसे मुक्त करने वाले माने गए हैं।

अक्सर देखा जाता है कि इंसान पाप कर्मों से तो जल्द जुड़ता है, वहीं सद्कर्मों और पुण्य कर्मों को लेकर अधिक सोच-विचार करता और वक्त लेता है। शास्त्रों में ऐसी प्रवृत्ति के पीछे 5 खास बातें बताई गई हैं, जिनके चलते सांसारिक जीवन में हर कोई जाने-अनजाने पाप कर बैठता है। इसलिए पापों से बचने के लिए इन बातों को सामने रख कर्म, विचार और व्यवहार पर हमेशा ध्यान देना जरूरी बताया गया है। जानिए ये 5 बातें-

लिखा गया है कि -

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा:।।

संदेश है कि इन पांच कलह के वश में होने से पाप होते हैं। ये पांच क्लेश हैं-

अविद्या - अज्ञान का रूप है। सरल शब्दों में समझें तो हर स्थिति और विषय को लेकर सही समझ का अभाव। जिससे बुरे कर्म या सोच में भी सुख और अच्छा लगता है, जिसके नतीजे पाप के रूप में सामने आते हैं।

अस्मिता - मैं या अहं भाव। जिसे मन, मस्तिष्क व विचारों को जकडऩे वाला माना गया है। रावण, हिरण्यकशिपु या कंस भी इस दोष के कारण पाप कर्म में लिप्त होकर दुर्गति को प्राप्त हुए।

राग - आसक्ति का ही एक नाम, जो अच्छे-बुरे की समझ से दूर कर इंद्रिय  असंयम का कारण बन पाप करवाती है।

द्वेष  - मनचाहा न होने पर दु:खी और क्रोधित होने का भाव, जिससे कर्म, विचार और व्यवहार में दोष पैदा होता है।

अभिनिवेश - मौत का भय। हर इंसान यह जानते हुए भी कि मृत्यु अटल है, इससे बचने के लिए किसी न किसी रूप में तन, मन या धन का दुरुपयोग कर पाप कर्म करता है।

महामृत्युञ्जय मंत्र है देता मौत को भी मात, क्योंकि..
शास्त्रों में शिव के अनेक कल्याणकारी रूप और नाम की महिमा बताई गई है। शिव ने विषपान किया तो नीलकंठ कहलाए, गंगा को सिर पर धारण किया तो गंगाधर पुकारे गए। भूतों के स्वामी होने से भूतभावन भी कहलाते हैं।

इसी क्रम में शिव का एक अद्भुत स्वरूप हैं - मृत्युञ्जय। माना गया है कि शिव की इस स्वरूप की दिव्य शक्तियों के आगे काल भी पराजित हो जाता है। मृत्युञ्जय का मतलब भी होता है - मृत्यु को जीतने वाला। काल के अलावा  शिव की यह शक्ति सभी सांसारिक पीड़ा व भय को भी हर लेती है।

ऐसा है मृत्युञ्जय स्वरूप -
शास्त्रों के मुताबिक शिव का मृत्युञ्जय स्वरूप अष्टभुजाधारी है। सिर पर बालचन्द्र धारण किए हुए हैं। कमल पर विराजित हैं। ऊपर के हाथों से स्वयं पर अमृत कलश से अमृत धारा अर्पित कर रहें हैं। बीच के दो हाथों में रुद्राक्ष माला व मृगमुद्रा। नीचे के हाथों में अमृत कलश थामे हैं।

कैसे पराजित होता है काल?
महामृत्युञ्जय के मृत्यु को पराजित करने के पीछे शास्त्रों के मुताबिक यह भी दर्शन है कि असल में यह स्वरूप,आनंद, विज्ञान, मन, प्राण व वाक यानी शब्द, वाणी, बोल इन पांच कलाओं का स्वामी है। व्यावहारिक जीवन में भी जो इंसान इन कलाओं में माहिर और पूर्ण होता है। वह सुखी, निरोगी, पीड़ा और तनाव मुक्त हो दीर्घ काल तक जीवन जी सकता है।

यही कारण है कि आनंद स्वरूप महामृत्युञ्जय शिव की उपासना से मिलने वाली प्रसन्नता से मौत ही मात नहीं खाती बल्कि निर्भय व निरोगी जीवन भी प्राप्त होता है। इसके लिए महामृत्युञ्जय मंत्र का स्मरण भी बेहद असरदार माना गया है। महामृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय पुकारा गया है। ऋषि माकण्डेय ने इसे सिद्ध कर यमराज को भी लौटने पर विवश किया। इसलिए पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक वे अमर हैं व 8 चिरंजीवियों में एक है। यह महामृत्युंजय मंत्र है - 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

नौतपा - जानें सूरज की ऐसी गर्मजोशी से जुड़ा रोचक ज्ञान और विज्ञान
वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। व्यावहारिक रूप से भी सूर्य से अनेक तरह से मिलने वाली जीवन शक्ति इस बात को साबित भी करती है। हिन्दू धर्म में सूर्य प्रमुख देवताओं में एक है। यही नहीं, पूरी कालगणना सूर्य की गति पर आधारित है। ज्योतिष शास्त्रों में भी सूर्य की चाल से इंसानी जीवन पर होने वाले शुभ-अशुभ प्रभावों को उजागर किया गया है। इसी कड़ी में 24-25 मई की रात से शुरू हुए नौतपा का नाता भी सूर्य की गति से है। जानिए, क्या है नौतपा से जीवन और जगत में होने बदलावों से जुड़ा रोचक ज्ञान और विज्ञान -

क्या है  नौतपा ?
हिन्दू पंचांग के तीसरे माह ज्येष्ठ में वृष संक्राति यानी वृषभ राशि में रहते हुए सूर्य जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तो वह  नौतपा की शुरुआत मानी जाती है। इस दौरान 15 दिन की अवधि में से पहले 9 दिनों को  नौतपा पुकारा जाता है। इस दौरान सूर्य का तापमान व चमक चरम पर होते हैं।

रोहिणी नक्षत्र - रोहिणी नक्षत्र आकाश मण्डल का चौथा नक्षत्र है, जो वृषभ राशि के चारों चरणों में रहता है। इस राशि के स्वामी शुक्र हैं, वहीं नक्षत्र के स्वामी चंद्रदेव है। रोहिणी के नियंत्रक देवता ब्रह्मदेव भी माने जाते हैं।

ज्येष्ठ माह -  सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देव माना जाता हैं। सूर्य की यात्रा बारह माह में बारह राशियों से होकर पूरी होती है। सूर्य की इस यात्रा के दो भाग होते हैं - पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। सूर्य मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ और मिथुन से गुजरने पर उत्तरायण होता है यानी आकाश में सूर्य उत्तर की ओर झुका होता है, सूर्य की उत्तर की यात्रा शुभ मानी जाती है।

इसी कड़ी में हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ माह में सूर्य, उत्तरायन की यात्रा के दौरान जब मकर, कुंभ, मीन राशि, मेष राशि से गुजरकर वृष राशि में संक्रमण करता है, जो वृष संक्रांति कहलाती है। ज्येष्ठ माह ग्रीष्म ऋतु का काल होता है।

क्या कहता है विज्ञान? - वृष संक्रांति में नौतपा के दौरान पड़ने वाली अधिक गर्मी बारिश के लिहाज से सुखद मानी जाती है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यही है कि इस दौरान सूर्य की किरणें धरती पर सीधी गिरती हैं, जिससे तापमान बढ़ता है। अधिक गर्मी से जमीन पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जो समुद्र की लहरों को अपनी ओर खींचता है, जिससे शीतल वायु जमीन की ओर बढ़ती है। इससे समुद्र में उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाता है। नतीजतन अच्छी बारिश होती है।

जीवन दर्शन - उत्तरायन में  नौतपा से जुड़ी सूर्य की गति व ताप से मानव के लिए भी ताप व संताप से राहत पाने के संदेश भी छिपे हैं। इसके मुताबिक सूर्य की तरह ही जीवन में अनुशासन को अपनाकर हम अपने व्यक्तित्व व चरित्र को  उजला व ऊर्जावान बना लें, जो सूर्य की चाल व गति की तरह ही बिना अपनी राह से विचलित हुए आगे बढ़ते रहने से संभव हो सकता है।

इससे हम न केवल अपने लक्ष्य को पाने के लिए ऊर्जावान बने रहेंगे, बल्कि भीषण गर्मी की तरह असहनीय लगने वाले दु:ख, संकट व संताप से भी आसानी से पार पा लेंगे। ठीक उसी प्रकार जैसे सूर्य के लिए ज्येष्ठ माह ऐसा काल होता है, जिसमें वह अपनी नियत गति व चाल के साथ उत्तरायन की आधी यात्रा पूरी कर चुका होता है और दक्षिणायण की पूरी यात्रा के लिए ऊर्जा प्राप्त करता है।

इस बार  नौतपा दिनांक - 24-25 मई की रात से 1 जून तक

पंचांग भेद से - 25 मई से 3 जून तक ।

ये 3 काम उजागर करते हैं किसी व्यक्ति की बुरी नियत!
धर्मग्रंथों के सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म और न्याय-अन्याय के बीच युद्ध से जुड़े प्रसंग व्यावहारिक जीवन के लिए सूत्र यही देते हैं कि जीवन में तरक्की और सफलता की डगर पर आगे बढ़ते रहने के लिए अच्छे-बुरे का फर्क जान-समझने पर ही लक्ष्य को आसान बनाना संभव है।

दूसरे शब्दों में कहें तो संगति ही उत्कर्ष या पतन का कारण बनती है। खासतौर पर आज के प्रतियोगी और रफ्तारभरे माहौल में आगे बढऩे के लिए स्वार्थ या द्वेष मन पर हावी रहता है। ऐसे में सज्जन-दुर्जन के बीच फर्क जान तालमेल न बैठा पाना बड़े नुकसान का कारण बन सकता है।

अच्छे-बुरे की पहचान वैसे तो कर्म, वचन और व्यवहार में छोटी-छोटी बातों से उजागर हो जाती है। किंतु शास्त्रों में 3 ऐसे काम या दोष बताए गए हैं, जो किसी व्यक्ति की दुर्जनता या बुरी नियत को उजागर करते हैं। जानिए हैं ये 3 बुराईयां -

शास्त्रों में लिखा गया है कि -

मित्रद्रोही कृतघ्रश्च यश्च विश्वासघातक:।

ते नरा नरकं यान्ति यावच्चचन्द्रदिवाकरौ।।

इस श्लोक के मुताबिक नीचे बताई 3 दोषों वाले व्यक्ति दुर्जन होकर नरक को प्राप्त होते हैं -

मित्रद्रोही - सच्चा मित्र नि:स्वार्थ होकर हर बुरे वक्त से भी बाहर ले आता है, किंतु जो व्यक्ति कठिन हालात में भी बार-बार साथ या संग छोड दे। ऐसा इंसान मित्रद्रोही व दुर्जन ही कहलाता है।

कृतघ्र - किसी के द्वारा मुश्किल वक्त में किसी भी रूप में की गई मदद, उपकार या सहायता या उस व्यक्ति को ही भुला दे, कृतघ्र व दुर्जनता की पहचान है।

विश्वासघाती - विश्वास व प्रेम का अटूट संबंध है। किंतु जो इंसान स्वार्थ, ईर्ष्या या क्षणिक लाभ के लिए परिजन, मित्र या निकटतम व्यक्तियों का विश्वास वचन, कर्म या व्यवहार द्वारा तोड़ता है, विश्वासघाती ही नहीं बल्कि दुर्जन की श्रेणी में गिना जाता है। 

क्यों देव नदी है गंगा? जानें रोचक बातें 
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (30 मई) पावन गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण का पवित्र दिन माना जाता है। पृथ्वी पर वह पवित्र तीर्थ जहां गंगा उतरी, गंगोत्री धाम है। हिन्दू धर्म में गंगा को मोक्षदायिनी और पापनाशिनी माना गया है। इसके साथ ही प्रमुख ग्रंथों और पुराणों में गंगा नदी की पवित्रता और देवीय रूप की महिमा बताई गई है। जानिए पावन गंगा से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक पौराणिक बातों को, जिसकी वजह से वह देवनदी भी पुकारी जाती हैं - 

- हिन्दू धर्म की सबसे प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में पवित्र गंगा राजा सगर के 60 हजार पुत्रों के कपिल ऋषि के शाप से भस्म होने के बाद उनके मोक्ष के लिए राजा सगर के ही वंशज राजा भगीरथ के घोर तप के बाद हिमालय क्षेत्र में स्वर्ग से भू-लोक में उतरी।

- श्रीमद्भागवत की कथा अनुसार भूलोक के पापों का नाश करने के लिए विष्णु अवतार भगवान वामन के बाएं पैर के अंगूठे से गंगा का प्रगट हुई।

- पद्मपुराण में लिखा है कि गंगा जहां से प्रवाहित होती सभी पवित्र तीर्थ है, किंतु इनमें से गंगोत्री, प्रयाग और गंगासागर श्रेष्ठ हैं।

- महाभारत में गंगा को श्रेष्ठ तीर्थ बताया गया है।

- पुराणों में लिखा है कि देव-दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले विष से सृ़ष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने वह विष पीकर अपने कंठ में भर लिया, जिससे वह नीलकंठ कहलाए। ऐसा माना जाता है कि इसी विष की दाह से शांति के लिए आज भी शिव पर गंगा जल चढ़ाने की पंरपरा है। इसी श्रद्धा और भक्ति के साथ रामेश्वरम में भगवान शिव पर गंगोत्री का जल चढ़ाया जाता है। इस परंपरा को आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा शुरू  किया गया था।

क्यों गंगाजल है चमत्कारी? जानें धर्म और विज्ञान की नजर से.. 
गंगा नदी धर्म, आस्था, श्रद्धा और पवित्रता का साक्षात् स्वरूप है। गंगा नदी स्थान विशेष पर ही नहीं, बल्कि धर्म-कर्म और परंपराओं के जरिए हर धर्मावलंबी के विचार-व्यवहार में भी पावनता के साथ हमेशा बहती रही है। सनातन परंपराओं में गंगाजल का उपयोग हर धार्मिक व मांगलिक कार्यों में पवित्रता के लिए किया जाता है। शिशु जन्म हो या मृत्यु से जुड़े कर्म, सभी में गंगा जल से शुद्धि की परंपरा है। मृत्यु के निकट होने पर व्यक्ति को गंगा जल पिलाने और दाह संस्कार के बाद उसकी राख को गंगा के पवित्र जल में प्रवाहित करने की भी पंरपरा रही है। 

धार्मिक दृष्टि से गंगा पापों का नाश कर मोक्ष देने वाली, मंगलकारी और सुख-समृद्धि देने वाली, कामनाओं को पूरा करने वाली देव नदी मानी गई है। ऐसी जीवनदायी और पावन होने के कारण गंगा के जल को अमृत  भी पुकारा जाता है। वैज्ञानिक तथ्यों से भी इस बात को बल मिलता है कि गंगा जल पवित्र और चमत्कारी है। जानिए गंगा जल की पवित्रता से जुड़े विज्ञान को -

गंगा जल की वैज्ञानिक खोजों ने साफ कर दिया है कि गंगा गोमुख से निकलकर मैदानों में आने तक अनेक प्राकृतिक स्थानों, वनस्पतियों से होकर प्रवाहित होती है। इसलिए गंगा जल में औषधीय गुण पाए जाते हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधानों में यह पाया गया है कि गंगाजल में कुछ ऐसे विशेष जीव होते हैं जो जल को प्रदूषित करने वाले विषाणुओं को पनपने ही नहीं देते बल्कि उनको नष्ट भी कर देते हैं, जिससे गंगा का जल लंबे समय तक खराब नहीं होता है। इस प्रकार के अनूठे गुण किसी अन्य नदी के जल में नहीं पाए गए हैं। 
इस तरह गंगा जल धर्म भाव के कारण मन पर और विज्ञान की नजर से तन पर सकारात्मक प्रभाव देने वाला होने से जीवन के लिए अमृत के समान है। यही कारण है कि गंगा की धारा के साथ हर भारतीय की रग-रग में धर्म बहता चला आ रहा है।

क्यों और कैसे करें निर्जला एकादशी का व्रत
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए व्रत करने का विधान है। इस बार यह एकादशी 31 मई गुरुवार को है। निर्जला एकादशी का व्रत विधान इस प्रकार है-

निर्जला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर सर्वप्रथम शेषशायी भगवान विष्णु की पंचोपचार से पूजा करें। इसके पश्चात मन को शांत रखते हुए ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। शाम को पुन: भगवान की पूजा करें व रात में भजन कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें। दूसरे दिन किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर उसे भोजन कराएं तथा जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढक कर और उस पर शर्करा (शक्कर) तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें । इसके अलावा यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन करें।

धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष दूर हो जाता है तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलता है-

एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।

सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥

इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी करने से इतना होगा शुभ!
हिन्दू धर्म पंचांग के ज्येष्ठ माह कृष्ण पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। क्योंकि विष्णु भक्ति की यह व्रत परंपरा व्रती को बिना पानी पिए पूरी करनी होती है। कल यही शुभ तिथि है। निर्जला एकादशी व्रत (31 मई) परम पुण्यदायी और सुफल देने वाला माना गया है। शास्त्रों और धर्मग्रंथों में इस व्रत से मिलने वाले फलों का वर्णन है, जो इस प्रकार है -

- निर्जला एकादशी के व्रत से पूरे साल की सभी 26 एकादशियों के बराबर फल प्राप्त हो जाता है।

- एकादशी व्रत से मिलने वाला पुण्य सभी तीर्थों और दानों से ज्यादा है। मात्र एक दिन बिना पानी के रहने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है।

- व्रती मृत्यु के बाद यमलोक न जाकर भगवान के पुष्पक विमान से स्वर्ग को जाता है।

- व्रती स्वर्ण दान का फल मिलता है। हवन, यज्ञ करने पर अगणित फल पाता है। व्रती विष्णुधाम यानी वैकुण्ठ पाता है।

- व्रती चारों पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करता है।

व्रत भंग दोष - शास्त्रों के मुताबिक अगर निर्जला एकादशी करने वाला व्रती, व्रत रखने पर भी भोजन में अन्न खाए, तो उसे चांडाल दोष लगता है और वह मृत्यु के बाद नरक में जाता है।

जानिए, निर्जला एकादशी पर पानी न पीने के हैं क्या-क्या फायदे
बिना जल पिए निर्जला एकादशी का व्रत पालन किया जाएगा। प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा बनाया ज्येष्ठ मास में निर्जला एकादशी का व्रत विधान सनातन धर्म के मनुष्य और जगत कल्याण के दर्शन का प्रमाण है। इस व्रत में निर्जल या जल नहीं पीने के पीछे न केवल धार्मिक बल्कि व्यावहारिक और वैज्ञानिक लाभ भी छुपे हैं।

धर्म की दृष्टि से यह व्रत आयु, आरोग्य और पापों का नाश करने वाला माना गया है। वहीं इसके व्यावहारिक पक्ष पर विचार करें तो पाते हैं कि यह व्रत वास्तव में पानी की अहमियत को बताता है। जल पंच तत्वों में एक माना गया है। चूंकि अक्सर इंसान किसी विषय या वस्तु का महत्व उससे शरीर और मन में होने वाले अनुभव के आधार पर ही समझता है। यही कारण है कि इस व्रत का विधान जल का महत्व बताने के लिए ही धर्म के माध्यम से परंपराओं में शामिल किया गया। जब व्रती पूरे दिन जल ग्रहण नहीं करता है, तब जल की प्यास से खुद-ब-खुद उसे जल का महत्व महसूस हो जाता है। किंतु धर्म भाव के कारण वह दृढ़ता से व्रत संकल्प पूरा करता है। यह समय एक कठिन तप के समान होता है। वह भी गर्मी के ऐसे मौसम में जबकि पानी का अभाव होता है और जल के साथ ठंडक की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होती है। यह बातें भारतीय मनीषियों की दूरदर्शिता को उजागर करती है।

दरअसल, यह व्रत संदेश देता है कि हम जल का संरक्षण करें। हर व्यक्ति जल उपलब्ध होने पर यह बात भूल जाता है और जल की कमी होने पर हाहाकार मचाता है। इसलिए अगर हम चाहते हैं कि हम जल के साथ और जल हमारे साथ हमेशा रहे तो निर्जला एकादशी के व्रत की मूल भावना को अपनाकर जल का अपव्यय न करने का संकल्प जरूर लें। संकल्प ही व्रत का पर्याय होते हैं।

इसी तरह इस व्रत के वैज्ञानिक पहलू पर गौर करें तो चिकित्सा विज्ञान भी इस बात की सलाह देता है कि स्वस्थ्य रहने के लिए नियमित और संतुलित भोजन, सधी हुई दिनचर्या व जीवनशैली जरूरी है। साथ ही एकाग्रता के लिए ध्यान या मेडिटेशन करने पर भी जोर देता है। निर्जला एकादशी के व्रत पालन में भी व्यवस्थित दिनचर्या और आहार के साथ जल संयम का विधान है। भगवान विष्णु के स्मरण, मंत्र जप और ध्यान से मेडिटेशन की तरह ही एकाग्रता और ऊर्जा मिलती है। आहार और जल का संयम हमारी पाचन क्रिया को बल प्रदान करता है। इस प्रकार अगर कोई इस व्रत को चाहे धार्मिक दृष्टि से न भी कर पाए, तो निरोग रहने के लिए भी इस व्रत का पालन बहुत फायदेमंद साबित होगा।

जानें, कैसी होती हैं अप्सराएं, उनके काम और दिलचस्प नाम
हिन्दू धर्म के अनेक पौराणिक प्रसंगों में अलग-अलग अप्सराओं का वर्णन मिलता है। रंभा, मेनका, उर्वशी आदि प्रमुख देवलोक की अप्सराओं ने अनेक सिद्ध पुरुषों को अपने रूप-रंग से मोहित कर तप भंग किया। वास्तव में भारतीय समाज में अप्सरा रूप और सौंदर्य का पर्याय बन गई है। आप भी जानिए आखिर कौन होती हैं-अप्सराएं, उनका काम व कुछ प्रमुख अप्सराओं के नाम -

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार अप्सरा देवलोक में रहने वाली अनुपम अति सुंदर, अनेक कलाओं में दक्ष, तेजस्वी और अलौकिक दिव्य स्त्री है। अप्सरा रंभा को अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

रंभा एक अद्भुत प्रतिभाशाली और कुशल नर्तकी भी है। वह संगीत और प्रेमकला में भी माहिर मानी जाती है। वह अपने जादुई गायन और नृत्य के द्वारा स्वर्ग में देवताओं का मनोरंजन करती है। पुराणों के अनुसार देवताओं के राजा इंद ने सिंहासन की रक्षा के लिए अनेक  बार संत-तपस्वियों के कठोर तप को भंग करने के लिए रंभा को भेजा। रंभा ने भी अपने रूप और आकर्षण से उनको मोहित कर लक्ष्य में सफलता पाई। इन प्रसंगों में विश्वमित्र का एक अप्सरा द्वारा तप भंग किया जाना प्रमुख है।

अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008  तक बताई गई है। लेकिन यहां प्रमुख अप्सराओं के नाम बताए जा रहे हैं।

- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता

- बुदबुदा,

- चंद्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा

- हर्षा, इंद्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा

- लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मेनका, मिश्रास्थला, मृगाक्षी

- नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा

- रक्षिता, रंभा, रितुशला,

-साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका

-सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता

-तिलोत्तमा,

- उमलोचा, उर्वशी

- वपु, वरगा, विद्युतपर्ना, विषवची 

जानिए क्यों की जाती है वट वृक्ष की पूजा 
हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ माह की अमावस्या और पूर्णिमा (4 जून) को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस दिन खासतौर पर स्त्रियों द्वारा वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। जानिए आखिर वट पूजा परंपरा से जुड़े धार्मिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलु क्या हैं - 

धार्मिक दृष्टि से वटवृक्ष की जड़ में ब्रह्मदेव, मध्य भाग में भगवान विष्णु और अगले भाग यानी पत्ते और डालियों में भगवान शिव का वास और पूरे वृक्ष को सावित्री यानी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखण्ड सौभाग्य देने के साथ ही हर तरह के कलह और संताप मिटाने वाली होती है। लेकिन इस व्रत के व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलू पर भी गौर करें तो इस व्रत की सार्थकता और ज्यादा साफ हो जाती है।

वट, बड़ या बरगद एक विशाल वृक्ष होता है, जो पर्यावरण की दृष्टि से एक प्रमुख वृक्ष है। क्योंकि इस वृक्ष पर अनेक जीवों और पक्षियों का जीवन निर्भर रहता है। हवा को शुद्ध करने और मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी वृक्ष की अहम भूमिका होती है। प्राचीन काल में मानव ईंधन और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए लकड़ियों पर निर्भर रहता था। चूंकि बारिश का मौसम पेड़-पौधों के फलने-फूलने के लिए सबसे अच्छा समय होता है। वहीं इसी दौरान अनेक प्रकार के जहरीले जीव-जन्तु भी जंगल में घूमते हैं। इसलिए वर्षाकाल व उसके शुरू होने के कुछ वक्त पहले वृक्षों को कटाई से बचाने के साथ मानव जीवन की रक्षा के लिए भी ऐसे व्रत विधान धर्म के साथ जोड़े गए, ताकि ऐसे मौसम में वृक्ष भी फले-फूले और उनसे जुड़ी जरूरतों की अधिक समय तक पूर्ति होती रहे।

चंद्रग्रहण 4 को: कब से कब तक, कहां दिखाई देगा, किन बातों का रखें ध्यान
ज्योतिषियों के अनुसार 4 जून, सोमवार (ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा) को खण्डग्रास चंद्रग्रहण होगा। यह चंद्रग्रहण ज्येष्ठा नक्षत्र, वृश्चिक राशि में होगा। भारत में यह चंद्रग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए धार्मिक दृष्टि से भारत में इसकी कोई मान्यता नहीं रहेगी।

ज्योतिषियों के अनुसार ग्रहण का प्रारंभ दोपहर 3 बजकर 30 मिनट से होगा जो शाम 5 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगा। ग्रहण का सूतक काल 4 जून को सुबह सूर्योदय के साथ ही प्रारंभ हो जाएगा। ग्रहण का कुल समय 3 घंटे 09 मिनट रहेगा। यह चंद्रग्रहण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर और दक्षिण अमेरिका, पेसिफिक महासागर आदि स्थानों पर दिखाई देगा।

इन बातों का रखें ध्यान
धर्म शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में अपने इष्टदेव का ध्यान, गुरु मंत्र का जाप, धार्मिक कथाओं का श्रवण एवं मनन करना चाहिए। इनमें से कुछ न कर पाने की स्थिति में राम नाम का या अपने इष्टदेव के नाम का जप भी कर सकते हैं। इस दौरान भगवान की मूर्ति को छूना, भोजन पकाना या खाना एवं पीना, सोना, मनोरंजन या कामुकता का त्याग करना चाहिए। ग्रहण के पश्चात पूरे घर की शुद्धि एवं स्नान कर दान देने का महत्व है।

ये लोग न देखें ग्रहण
जिसके जन्म नक्षत्र, जन्मराशि, जन्म लग्न पर ग्रहण हो वे लोग ग्रहण के दर्शन न करें। ग्रहण के लगते ही स्नान करके जप, पाठ आदि पूजन करें। ग्रहण के मध्य समय में हवन व देव पूजन करें। ग्रहण के अंत में या बाद में दान-दक्षिणा दें। मोक्ष के बाद पुन: स्नान करें।

जानिए चंद्रग्रहण के बारे में कुछ रोचक जानकारी
ज्योतिषियों के अनुसार 4 जून 2012, सोमवार (ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा) को खण्डग्रास चंद्रग्रहण होगा। यह चंद्रग्रहण ज्येष्ठा नक्षत्र, वृश्चिक राशि में होगा। भारत में यह चंद्रग्रहण दिखाई नहीं देगा इसलिए धार्मिक दृष्टि से भारत में इसकी कोई मान्यता नहीं रहेगी। जानिए चंद्रग्रहण से जुड़ी कुछ रोचक बातें-

हिंदू धर्म में ग्रहण का बड़ा महत्व है। चाहे वह सूर्य ग्रहण हो या चंद्रग्रहण। ग्रहण से जुड़ी कई मान्यताएं हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित है। वैसे देखा जाए तो ग्रहण पूर्णत: खगोलीय घटना है। ग्रहण को लेकर हमारे समाज में कई अंधविश्वास भी है जबकि विज्ञान ग्रहण को लेकर किसी अंधविश्वास को नहीं मानता। जानते हैं आखिर चंद्रग्रहण होता कैसे है-

वैज्ञानिक कारण
चंद्रग्रहण पूर्णिमा को होता है। जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी होती है और तीनों (सूर्य, पृथ्वी व चंद्रमा) बिल्कुल एक सीध में, एक सरल रेखा में होते हैं। पृथ्वी जब सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और चंद्रमा पृथ्वी की छाया में होकर गुजरता हैं तो चंद्रग्रहण होता है। पृथ्वी की वह छाया चंद्रमा को ढंक देती है जिससे चंद्रमा में काला मंडल दिखाई देता है। यह खगोलीय घटना ही चंद्रग्रहण कहलाती है।

धार्मिक कारण
अमृत प्राप्ति के लिए जब देवताओं व दानवों ने समुद्र मंथन किया तो समुद्र में से धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर निकले, इस अमृत कलश को इंद्र का पुत्र जयंत लेकर भाग गया। अमृत कलश के लिए देवताओं व दानवों में घोर युद्ध हुआ। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लिया और कहा कि मैं बारी-बारी से देवता व दानवों को अमृत पिला दूंगी। सभी सहमत हो गए। मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु चालाकी से देवताओं को अमृत पिलाने लगे और दानवों के साथ छल लिया। यह बात राहु नामक दैत्य ने जान ली और वह रूप बदलकर सूर्य व चंद्र के बीच जा बैठा।

जैसे ही राहु ने अमृत पीया, सूर्य व चंद्रदेव ने उसे पहचान लिया और मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु को यह बात बता दी। तत्काल भगवान ने सुदर्शन चक्र निकाला और राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन अमृत पीने के कारण वह मरा नहीं। राहु के दो टुकड़े हो गए। एक बना राहु दूसरा बना केतु। इस घटना के बाद से राहु ने सूर्य व चंद्रदेव से दुश्मनी पाल ली। धर्म ग्रंथों के अनुसार राहु व केतु उसी बात का बदला ग्रहण के रूप में लेते हैं।

सिक्खों के छठे गुरु हरगोविंद सिंह की जयंती 5 को
गुरु हरगोविंद सिंह सिक्खों के छठे गुरु थे। ये सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुनसिंह के पुत्र थे। गुरु हरगोविंद सिंह ने ही सिक्खों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिक्ख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया। वे स्वयं एक क्रांतिकारी योद्धा थे। इस बार 5 जून, मंगलवार को गुरु हरगोविंद सिंह की जयंती है।

गुरु हरगोविंद सिंह ने अपना ज्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एव युद्ध कला में लगाया तथा बाद में वह कुशल तलवारबाज, कुश्ती व घुड़सवारी में माहिर हो गए। मुगलों के विरोध में गुरु हरगोविंदसिंह ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की किलेबंदी की। गुरु हरगोविंद सिंह ने ही अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन) का निर्माण किया। उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला बनवाया और उसका नाम लौहगढ़ रखा। उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने अनुयायियों में युद्ध के लिए इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया।

मुगल बादशाह जहाँगीर ने सिक्खों की मजबूत होती हुई स्थिति को खतरा मानकर गुरु हरगोविंद सिंह को ग्वालियर में कैद कर लिया। गुरु हरगोविंद सिंह बारह वर्षों तक कैद में रहे लेकिन उनके प्रति सिक्खों की आस्था और मज़बूत हुई। गुरु हरगोविंद सिंह ने यह भाँपकर कि मुगलों के साथ संघर्ष का समय नजदीक है, अपनी पुरानी युद्ध नीति जारी रखी और लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे। अंत में उन्हें कश्मीर के पहाड़ों में शरण लेनी पड़ी, जहाँ सन् 1644 ई. में कीरतपुर, पंजाब में उनकी मृत्यु हो गई।

क्रांतिकारी योद्धा थे गुरु हरगोविंदसिंह
सिक्खों के छटे गुरु हरगोविंदसिंह क्रांतिकारी विचार रखते थे। वे केवल धर्मोपदेशक ही नहीं कुशल संगठनकर्ता भी थे और उन्होंने अपने अनुयायियों को शस्त्र धारण करने के लिए प्रेरित किया तथा छोटी सी सेना इकट्ठी की। आज 5 जून, मंगलवार को गुरु हरगोविंदसिंह की जयंती है।

मुगल सम्राट जहाँगीर की मृत्यु के बाद बादशाह शाहजहाँ सिक्खों व हिंदुओं पर जुल्म करने लगा। गुरु हरगोविंदसिंह ने जब यह देखा तो उन्होंने सिक्खों को इसका विरोध करने के लिए कहा और एक सेना का संगठन किया। इस सेना ने मुगलों की अजेयता को झुठलाते हुए गुरु हरगोविंदसिंह के नेतृत्व में चार बार शाहजहाँ की सेना को मात दी। गुरु हरगोविंदसिंह की बढ़ती शक्ति से घबरा कर जहाँगीर ने उन्हें और उनके 52 साथियों को ग्वालियर के किले में बंदी बना कर रखा। जहाँगीर ने सन् 1619 ई. में देश भर के लोगों द्वारा गुरु हरगोविंदसिंह को छोड़ने की अपील पर दीवाली वाले दिन मुक्त किया था।

गुरु हरगोविंदसिंह ने रिहा होने के बाद भी अपनी पुरानी युद्ध नीति जारी रखी और लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे। अंत में उन्हें कश्मीर के पहाड़ों में शरण लेनी पड़ी, जहाँ सन 1644 ई. में कीरतपुर, पंजाब में उनकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से ठीक पहले गुरु हरगोविंदसिंह ने अपने पोते हर राय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।

ऐसी देव पूजा में जरूरी नहीं मंत्र या मंदिर, फिर भी मिलती है सिद्धि!
ईश्वर में विश्वास करने वाले देव पूजा के लिये देवालय जाते हैं। वहां देव उपासना के लिये मंत्र स्मरण या स्तुति पाठ भी करते हैं। अनेक लोग ऐसे हैं जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते, जिनको नास्तिक भी कहा जाता है। वहीं, ईश्वर में विश्वास करने वाले कुछ लोग व्यस्तता के चलते देव आराधना का समय निकाल नहीं पाते।

ईश्वर उपासना से दूर रहने वाले ऐसे लोगों के लिये ही यहां बताया जा रहा है एक ऐसा व्यावहारिक सूत्र, जिसके लिये अगर आप देव उपासना के लिये कोई मंत्र न बोलें या मंदिर न भी जा पाएं, फिर भी देव पूजा का सुख और फल पाया जा सकता है।

हिन्दू धर्मग्रंथ गीता में लिखा है कि -

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।

जिसका सरल अर्थ है यही है कि स्वाभाविक कामों के रूप में भगवान की उपासना करते हुए मनुष्य सिद्ध बन सकता है।

संकेत यही है कि व्यावहारिक जीवन में अहं या मोह के कारण इंसान अनेक गलतियां करते हुए गलत बातों और व्यवहार के कारण दोष का भागी ही नहीं बनता, बल्कि अच्छे संग और देव स्मरण से भी दूर होता है। इसलिए इंसान सुख पाने के लिये अगर देव स्मरण न भी करें, पर अहंकार और मोह को छोड़कर अपने कर्तव्यों को पूरा करता चले तो यह भी भगवान की पूजा ही मानी गई है। दायित्वों को पूरा करना ही सफलता, तरक्की और प्रतिष्ठा देने वाला साबित होता है।

सार यही है कि कर्म को ही पूजा मानकर चलने वाले व्यक्ति पर भगवान भी मेहरबान रहते हैं।

काम बनाना है, तो इन 5 तरीकों से न करें बातचीत 
धर्म और व्यवहार दोनों ही नजरिए से वाणी की पावनता व मिठास भी इंसान की सफलता का सूत्र माना गया है। बोल में सत्य और मधुरता ही भरोसेमंद बनाकर आगे बढऩे का मौका देते हैं। इस तरह मन और कर्म ही नहीं बल्कि बोल या शब्दों में संयम व अनुशासन भी जीवन में सुख-दु:ख नियत करने वाले होते हैं। 

धर्मग्रंथों में भी यशस्वी और कामयाब जीवन के लिए शब्द शक्ति का महत्व बताते हुए सत्य वचन के प्रति हमेशा संकल्पित और वचन दोष से सावधान रखने की सीख दी गई है। किंतु व्यावहारिक जीवन में अक्सर स्वार्थ या हितपूर्ति व असंयम के चलते इंसान ऐसे कटु शब्द व वाणी के उपयोग का अभ्यस्त हो जाता है, जो आखिरकार बुरे नतीजों का कारण बनते हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथों में जीवन के लिए बाधक व घातक बनने वाली ऐसी ही पांच तरह की बातों से बचना स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी हितकारी बताया गया है। ये 5 वाचिक पाप भी कहे गए हैं। जानिए बातचीत के दौरान कैसे 5 तरह के बोल से किनारा कर लें-

- अनियन्त्रित प्रलाप यानी विषय से हटकर या अनावश्यक रूप से या आपत्ति के बाद भी लगातार अपनी बात ही बोलते चले जाना। ऐसे बोल दूसरों की परेशानी या कष्ट का कारण बनते हैं।

- अप्रिय यानी कटु, कठोर या अपशब्दों से भरे बोल बोलकर दूसरों को आहत करना।

- असत्य यानी किसी भी स्वार्थ, गलत कामों के दुराव-छुपाव या हानि पहुंचाने के लिए झूठ बोलना।

- परनिन्दा यानी ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थसिद्धि या मानहानि के उद्देश्य से दूसरों में दोष दर्शन।

- पिशुनता या चुगली - लक्ष्य व स्वार्थ सिद्धि व किसी की हानि की मंशा से एक व्यक्ति से जुड़ी बातों को तोड़-मरोड़, बढ़ा-चढ़ाकर या शिकायत के रूप में दूसरों तक पहुंचाना।

शास्त्र कहते हैं कि बातचीत के दौरान शब्दों को इन 5 गलत तरीकों व भावनाओं से उजागर करना मन व विचारों में हमेशा दोष व अशांति बनाए रखते हैं। इनसे तत्कालिक या क्षणिक लाभ हो सकता है, किंतु लंबे वक्त के लिए ऐसे शब्द अपयश व पतन का कारण बनते हैं।

इस लक्ष्मी मंत्र से पूजा बना देगी मालदार
हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक शुक्रवार को देवी पूजा अज्ञान, कलह और दरिद्रता को मिटाने की शुभ घड़ी है। जिसके लिए माता लक्ष्मी की उपासना का विशेष महत्व है। देवी लक्ष्मी वैभव की अधिष्ठात्री हैं।

अगर आप भी जीवन में धन की परेशानियों का सामना कर रहे हैं, नौकरी या व्यवसाय में मनचाहा धनलाभ प्राप्त नहीं कर पा रहे, परिवार में अनचाहे खर्चों से आर्थिक तंगी से जूझ रहे हों या जल्द व अधिक धन कमाने की इच्छा रखते हैं तो यहां बताए जा रहे देवी लक्ष्मी की विशेष मंत्र से उपासना के आसान उपाय को अपनाकर लक्ष्मी कृपा पा सकते हैं -

- शाम स्नान के बाद एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर देवी लक्ष्मी की यथासंभव चांदी की प्रतिमा को स्थापित करें।

- लक्ष्मी की प्रतिमा को गाय के कच्चे दूध व गंगाजल से स्नान कराएं।

- स्नान के बाद देवी लक्ष्मी को लाल चंदन, लाल अक्षत, फूल, वस्त्र व दूध से बने पकवानों का भोग लगाकर श्रीसूक्त के नीचे लिखे लक्ष्मी मंत्र का स्मरण कर भरपूर आर्थिक समृद्धि की कामना करें।

मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।

पशूनां रूप मन्नस्य मयि श्री: श्रयतां यश:।।

- इस मंत्र के अलावा जानकारी होने पर श्रीसूक्त का पूरा पाठ अवश्य करें। देवी लक्ष्मी की आरती धूप व घी के दीप से करें। मन, वचन व शब्दों से पाप की क्षमा मांगे।

- एक दीप प्रज्जवलित कर लक्ष्मी को आमंत्रण की भावना से घर के मुख्य द्वार पर रखें।

- शुक्रवार को यह पूजा समृद्धिदायक मानी गई है।

अगर सड़क चलते ये लोग सामने आ जाएं तो फौरन दें रास्ता!
हिन्दू धर्मग्रंथों में बताए सुखद व सफल जीवन के लिए चार पुरुषार्थ रूपी अहम लक्ष्यों को पाने के लिए नियम, संयम, अनुशासन, मर्यादा, ज्ञान, कर्तव्य व संस्कार को अपनाना अहम है, जो जन्म से लेकर मृत्यु कर्मों तक के लिए नियत हैं। इसी लिहाज से जीवन में उठते-बैठते अनेक ऐसी छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखने का महत्व बताया गया है, जो सुनने-पढऩे में दिलचस्प भी हैं, लेकिन उनको अपनाना अनुशासन, सम्मान व आपसी सद्भाव बढ़ाने वाला है। जानिए, ऐसी रोचक बातें-

भविष्य पुराण की यहां बताई जा रही बात का संबंध राह में चलते वक्त किसी व्यक्ति विशेष के सामने आने पर किए जाने वाले व्यवहार से जुड़ी है। लिखा गया है कि -

चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिण: स्त्रिया:।

स्नातकस्य तु राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।

एपां समागमे तात पूज्यौ स्नातकपार्थिवौ।

आभ्यां समागमे राजन् स्नातको नृपमानभा